हिंदसा

रविवार, 1 मार्च 2015

साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम'

                                                    'साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम'
किसी  विद्वान् के द्वारा  कहा गया  है-
बन जाते सिद्धांत प्रथम,
फिर पुष्ट  हुआ करती है|
अर्थात सिद्धांतों का निर्माण तो पहले हो जाता है और उनकी व्याख्या आलोचकों के लिए छोड़ दी जाती है। यह उक्ति सत्यम शिवम और सुंदरम  सिद्धांत पर भी लागू होती है। इसका इतिहास बहुत पुराना है। लेकिन भारत में इसका प्रचलन आधुनिक युग में हुआ। कुछ बहुत पुराने आस्थावादी या भाग्यवादी विचारकों का कहना है कि तीन की संख्या शुभ मानी गई हैऔर यह सूत्र भी तीन शब्दों का ही है, अतः तीन शब्दों के इस सूत्र का निर्माण बहुत पहले हुआ है ।
       आधुनिक युग में बाबू गुलाब राय ने इसको The  Truth, The Good, The Beautiful  का अनुवाद माना और बताया कि भारतीय साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम का प्रयोग बंगला भाषा से लिया है। वैसे भी बंगला से बहुत कुछ मिला है फिर चाहे राष्ट्र गीत हो या राष्ट्र गान हो, माना गया है कि  सबसे पहले इस उक्ति का प्रयोग रविंद्र नाथ टैगोर के पिता महर्षि देवेंद्रनाथ में प्रयोग किया था और इस प्रकार बाद में  बंगला से हिंदी साहित्य में यह सूत्र आया। क्योंकि यह उक्ति भारतीय विचारकों के अनुकूल थी, अतः हिंदी में घुलमिल गई और मौलिक रूप में प्रतीत होने लगी।  रविंद्र का कथन है- सत्य और सौंदर्य का घनिष्ठ संबंध है। सत्य में सौंदर्य का होना और सौंदर्य में शिव का होना अनिवार्य है।
साहित्य में सत्यम-
                               साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम से क्या अभिप्राय है?  इस पर विचार करना जरूरी है। दार्शनिक सत्य और वैज्ञानिक सत्य का संबंध बुद्धि और आत्मा से है। जबकि काव्य या साहित्य के सत्य का संबंध व्यक्ति की भावना से है। वस्तुतः काव्य दार्शनिक, वैज्ञानिक सत्य को ही प्रस्तुत करेगा पर उसे कल्पना का आवरण पहनाकर। वैज्ञानिक सत्य यथार्थवादी है जबकि काव्य सत्य आदर्शवादी है। अरस्तु का कहना है कि इतिहास घटित घटनाओं का तथा काव्य संभव घटनाओं का चित्रण करता है। इसलिए काव्य में इतिहास और कल्पना का समन्वय रहता है। इसलिए नीरस इतिहास को सरस रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय काव्य को जाता है।
साहित्य में  शिवम-                   
                                इस धारणा (साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम) से कतिपय आलोचक  सहमत नहीं हैं कि साहित्य लोक कल्याण के लिए लिखा जाए। क्योंकि जीवन आशा निराशा सापेक्ष है। जीवन में किसी कृति की उपयोगिता शिव में निहित है तो किसी की  सुंदरम में।  आचार्य शुक्ल का निबंध 'काव्य में लोकमंगल की साधना अवस्था' में इसी पर बल दिया गया है।
साहित्य में सुंदरम-
                               सौंदर्य मानव की मूलभूत वृति है। यही कारण है कि सृष्टि का मानव  कण-कण में सौंदर्य की सत्ता खोजने का प्रयास करता है। काव्य में सौंदर्य को ही चित्रित करने का प्रयास किया जाता है। कवि कुरूपता को भी सुंदर रूप में प्रस्तुत करता है। निराला की 'विधवा' नामक कविता में मानव जीवन के अत्यंत दयनीय प्रसंग को लिया गया है पर फिर भी पाठक उससे साधारणीकृत होता है क्योंकि कवि ने जीवन के कुरुप पक्ष को सुंदर रूप प्रदान किया।
                                   काव्य सौंदर्य केवल जगत के बाह्य सौंदर्य से संबंधित नहीं है।आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- सौंदर्य बाहर की वस्तु नहीं मन के भीतर की वस्तु है। महादेवी वर्मा ने 'रामा' नामक संस्मरण में इसी तथ्य की ओर संकेत किया है-  "वास्तव में जीवन सौंदर्य की आत्मा है|" रामा का बाह्य व्यक्तित्व कुरुप होते हुए भी उसकी अंतरात्मा अत्यंत स्वच्छ थी, निर्मल थी।
                                   विभिन्न आलोचकों के विचारों को देंखे तो अनेक मनीषी, कवि और उपन्यासकार इससे सहमत हैं कि साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम का समन्वय हो। इसी कड़ी में गुलाब राय का मानना है कि श्रेय और प्रेय का समन्वय ही सच्ची कला है।  प्रेमचंद ने माना है कि साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और सुंदर बनाता है।  गंगा प्रसाद पांडे के अनुसार साहित्य विचारशील आत्माओं की अमर अभिव्यक्ति है, इसमें जीवन संबंधी विशेष विचारों का संकलन होता है जो हमारे यथार्थ जीवन की प्रगति करता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल लोक में फैली दुख की छाया को हटाने में  ही काव्य या कला  ब्रह्मानंद  और शक्तिमय  रूप धारण करती है| उसकी भीषणता  में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचंडता में भी गहरी आद्रता साथ लगी रहती है, विरोधों का यही सामंजस्य कर्मक्षेत्र का सौंदर्य है। भीषणता और सरसता, कोमलता और कठोरता, कटुता और मधुरता, प्रसन्नता और मृदुता  का सामंजस्य ही लोक धर्म का सौंदर्य है।
     महात्मा गांधी ने कहा है  "यदि कला जीवन को सुमार्ग पर न ला सके तो वह कला क्या होगी?"  सुमित्रानंदन पंत ने माना है कि "सत्य शिव में स्वयं निहित है| जिस प्रकार फूल में रूप, रंग है, फल में जीवन उपयोगी रस और फूल की परिणति फल में सत्य के नियमों द्वारा ही होती है उसी प्रकार सुन्दरम् की परिणति शिवम में सत्य द्वारा ही हो सकती है।"
                   यदि हम हिंदी साहित्य पर विहंगम दृष्टि डालें तो कहा जा सकता है कि जितने भी साहित्यकार हुए उन्होंने साहित्य में तीनों भावनाओं का ही चित्रण किया है।
संस्कृत के आचार्य मम्मट ने काव्य के प्रयोजन में शिव की भावना पर बल दिया है।
तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है-
"बुद्धि विवेक नहीं कुछे मोरे,
सत्य कहुँ लिखि कागद कोरे |"  (सत्य)
इसी तरह एक जगह और तुलसीदास लिखते हैं-
                                                         कीर्ति मनीति भूति भली सोई
सुरसरि सम सब हितकर होई |  (शिव)
जहाँ तक रीतिकाल के साहित्य  की बात है, इसमें सत्यम शिवम सुंदरम का अभाव मिलता है। लेकिन बिहारी में तीनों तत्वों (सत्यम शिवम सुंदरम) का समन्वय मिलता है-
"लिखन बैठी जाकी सवी गहि गहि गरब गरूर
 भए न केते जगत के चतुर चितेरे कूर।"   (सुंदर)
(उस नायिका के रूप का क्या कहना) जिसके चित्र को अत्यंत गर्व और अभिमान के साथ बनाने के लिए बैठकर संसार के कितने चतुर चित्रकार बेवकूफ बन गए -उनसे छत्र नहीं बन सका |
इसी तरह से उनके काव्य में शिव के दर्शन भी होते हैं - "नहीं पराग नहीं मधुर मधु नहिं विकास यहि काल अली कली ही सो बंध्यो आगे कौन हवाल|"  (शिव)
इसी तरह से प्रसाद ने कामायनी में लिखा है- 
"ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की, एक दूसरे से न मिल सके, यह विडंबना है जीवन की।"
इसी तरह पंत ने रश्मिबंध में की  'परिवर्तन' कविता  में 
"मुक्त करो नारी को|" 
लिखा है। पंत ने  सत्यम शिवम सुंदरम का साहित्य में समावेश करते हुए लिखा है-
 "इस धरती के रोम रोम में भरी सहज सुंदरता, 
 इसकी रज को छू प्रकाश, बन मधुर विनम्र निखरता|"   युगवाणी (पंत)
साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम का समावेश किसी भी  कवि को रससिद्ध  कवि बना देता है और वे रस सिद्ध कवि प्रसिद्ध होकर सदा के लिए अमर हो जाते हैं।

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