हिंदसा

सोमवार, 30 नवंबर 2020

हिंदी का आरंभिक रूप तिड

                                                         हिंदी का आरंभिक रूप

हिंदी के आरंभिक रूप से तात्पर्य उस भाषा रूप से है जससे हम हिंदी का आरंभ मान सकते हैं। यहां हिंदी के आरंभ का अर्थ किसी समय सीमा से ना होकर अपभ्रंश के उस परिवर्तित रूप से है जिससे हम हिंदी का आरंभ मान सकते हैं। जैसाकि परवर्ती अध्ययन से पता चलता है कि हिंदी का जन्म अपभ्रंश से हुआ है। अत: आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक का समय वो समय है जब अपभ्रंश की साहित्यिक भाषा जन सामान्य की भाषा के निकट आने लगी थी| इस समय की रचनाओं में अपभ्रंश का जो बदला हुआ रूप मिलता है, उसको हिंदी का आरम्भिक रूप कहा जा सकता है। ये भी सत्य है कि इस समय की कुछ रचनाएँ अपभ्रंश के निकट तो कुछ पुरानी हिंदी के निकट प्रतीत होती हैं और जो रचनाएं मिलती हैं, उनमें से अधिकतर की प्रामाणिकता भी सन्दिग्ध है।
  

अपभ्रंश शब्द का प्रयोग-
अपभ्रंश शब्द का प्रयोग छठी शताब्दी की रचनाओं में मिलता है। संस्कृत के प्रसिद्ध अलंकारवादी आचार्य भामह ने भी अपने ग्रंथ काव्यालंकार में भी अपभ्रंश शब्द का उल्लेख किया है। इस ग्रंथ की रचना भी छठी शताब्दी में ही हुई थी। साथ ही इसी शताब्दी में दंडी ने काव्यादर्श में भी अपभ्रंश भाषा के साहित्य की बात की है। अपभ्रंश भाषा के क्षेत्र को लेकर विद्वानों का मत है कि अपभ्रंश में "देश के विभिन्न भागों में गुजरात से लेकर गौड़ और कलिंग तक का क्षेत्र शामिल था, जिसमें अनेक भाषाएं बोली जाती थीं, उन्हीं का सामूहिक नाम अपभ्रंश था। विद्वानों ने अपभ्रंश के पश्चिमी और पूर्वी भेद किए हैं क्योंकि पश्चिमी और पूर्वी भारत में रचित साहित्य की भाषा में पर्याप्त अंतर है।
आठवीं शताब्दी में जैन कवि स्वयंभू की रचनाओं में अपभ्रंश भाषा का प्रयोग मिलता है, उसके बाद सरहपा, शबरपा आदि सिद्धों की रचनाएं भी अपभ्रंश में मिलती हैं। दसवीं शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी तक अपभ्रंश साहित्य उपलब्ध होता है। आठवीं शताब्दी से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी तक आते-आते अपभ्रंश भाषा के परिवर्तित रूप के लिए अवहत्थ, अवहंस, देशी भाषा, अवहट्ठ आदि शब्द प्रचलन में आए। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे, उन्होंने अपभ्रंश को पुरानी हिंदी कहा है | चन्द्रधर शर्मा गुलेरी विक्रम की सातवीं से ग्याहरवीं शताब्दी तक की भाषा को अपभ्रंश और उसके बाद वाली अपभ्रंश को पुरानी हिंदी माना है। उनका मानना है कि यही वो समय था जब अपभ्रंश पुरानी हिंदी में परिणत हो गई थी।
गुलेरी जी के अनुसार पुरानी हिंदी में देशी शब्दों की प्रधानता हो गई थी , विभक्तियों में परिवर्तन आ गया था , वे घिस गई थी, एक कारक की विभक्ति कई कारकों की विभक्ति बन गई थी। गुलेरी जी ने माना है कि पुरानी अपभ्रंश, संस्कृत और प्राकृत से मिलती है और परवर्ती अपभ्रंश यानी बाद वाली अपभ्रंश पुरानी हिंदी से मिलती है| उन्होंने कहा है कि अपभ्रंश कहां समाप्त होती है और पुरानी हिंदी कहां आरंभ होती है, इस बात का निर्णय करना बहुत कठिन है| इसलिए अपभ्रंश और पुरानी हिंदी को अलग करने के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा नहीं बताई जा सकती| कुछ उदाहरण ऐसे हैं जिन्हें अपभ्रंश भी कह सकते हैं और पुरानी हिंदी भी कह सकते हैं। गुलेरी जी ने पुरानी हिंदी का जो स्वरूप बताया है, वह सिद्ध कवियों की भाषा में मिलता हैं| इसलिए सरहपा को हिंदी का पहला कवि माना गया है|
गुलेरी जी ने 11 वीं शताब्दी तक की अपभ्रंश को अपभ्रंश भाषा माना है, परंतु जैसाकि हम देख चुके हैं, आठवीं शताब्दी तक सिर्फ स्वयंभू और सरहपा जोकि सिद्ध कवि थे, उनकी रचनाएं अपभ्रंश में मिलती हैं| जहाँ तक जैन कवियों की बात है तो उनमे से केवल देवसेन, पुष्पदंत, नयनंदी ही इस समय सीमा में आते हैं| अतः मात्र तीन चार कवियों के आधार पर तत्कालीन भाषा (अपभ्रंश) को और पुरानी हिंदी को अलग रखना उचित नहीं जान पड़ता है| अत: इस आधार पर वह भी पुरानी हिंदी ही सिद्ध होती है |
राहुल सांकृत्यायन ने भी अपभ्रंश को हिंदी ही माना है, वे लिखते हैं - "वह (अपभ्रंश) उससे भी कहीं अधिक हिंदी भाषा है जितनी की आज की मालवी, मारवाड़ी, मल्ली (भोजपुरी) और मैथिली|" गुलेरी जी और राहुल सांकृत्यायन ने लगभग एक ही बात कही थी| अंतर मात्र यह है कि राहुल सांकृत्यायन ने उसे हिंदी कहा है और गुलेरी जी ने उसे पुरानी हिंदी कहा है|
राहुल जी ने अपभ्रंश को संस्कृत, पाली और प्राकृत से भिन्न माना है| उनके अनुसार पालि और प्राकृत प्रायः संस्कृत के नजदीक है पर अपभ्रंश को लेकर ऐसा नहीं कहा जा सकता | वे लिखते हैं -"यहां आकर भाषा में असाधारण परिवर्तन हो गया| इसका ढांचा ही बिल्कुल बदल गया| उसने नए सुबन्तों, तिङन्तों की सृष्टि की और ऐसी सृष्टि की है जिससे वह हिंदी से अभिन्न हो गई है|
साहित्यिक भाषा या बोलचाल की भाषा में अंतर होता है| अपभ्रंश और पुरानी हिंदी के प्रारंभ में भी रहा होगा लेकिन चौदहवीं शताब्दी के अंत तक जनसामान्य की भाषा का कोई रूप और उसके क्षेत्र का कोई परिचय हमें उपलब्ध नहीं होता , हो सकता है इसी को देसी भाषा कहा गया होगा| छठी शताब्दी के आसपास उसमें साहित्य रचना भी प्रारंभ हुई होगी पर वह आज उपलब्ध नहीं है| संभव है कि इस साहित्यिक भाषा को अपभ्रंश नाम दे दिया गया हो यदयपि सरहपा और स्वयंभू दोनों में से किसी ने भी अपनी भाषा को अपभ्रंश नहीं कहा, यह भी निश्चित है कि तत्कालीन अपभ्रंश संस्कृत, पालि, प्राकृत की अपेक्षा जनसामान्य के निकट थी और संभवत: तत्कालीन कवियों ने स्थानीय प्रयोगों को महत्व देते हुए ‍‌‌इन्हीं भाषा शैलियों को अपना लिया होगा पर 11वीं 12वीं शताब्दी तक आते-आते यह साहित्यिक अपभ्रंश प्राकृत के प्रभाव को कम करती हुई जनसामान्य के निकट आने लगी| ऐसी स्थिति में यही उचित प्रतीत होता है कि पूर्ववर्ती अपभ्रंश, परवर्ती अपभ्रंश आदि अलग-अलग नाम देने के स्थान पर संपूर्ण अपभ्रंश भाषा को हिंदी कहना चाहिए और अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य|
एक अन्य पारिभाषिक पद "प्रारंभिक हिंदी" भी देखने में आ रहा है| इस संबंध में गोपाल राय लिखते हैं- "इसका कारण है संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में हिंदी के पाठ्यक्रम में अर्ली हिंदी अंग्रेजी पद का प्रयोग| हिंदी में इसका अनुवाद प्रारंभिक हिंदी तो सटीक है पर कभी-कभी पुरानी हिंदी और प्रारंभिक हिंदी का पर्यायवाची पदों के रूप में प्रयोग होता है, जिससे भ्रम पैदा होता है| वस्तुतः पुरानी हिंदी पद अपभ्रंश (10 वीं शताब्दी के बाद की अपभ्रंश) का द्योतक है| प्रारंभिक हिंदी पद अब तक सुपरिभाषित नहीं है, प्रारंभिक हिंदी के अंतर्गत 1450 ईसवी के पूर्व रचित अवधी, ब्रज भाषा, खड़ी बोली, मैथिली और पिंगल की रचनाएं रखी जानी चाहिए| इस प्रकार की पहली रचना ग्यारहवीं शताब्दी में रचित 'रोडा' कृत 'राउरबेल' है जिसमें अवधी और टक्की (आधुनिक खड़ी बोली) में काव्य रचना के प्रथम उदाहरण मिलते हैं, खड़ी बोली में काव्य रचना के प्रारंभिक प्रयास शेख फरीद शकर गंज (1173 से 1265 ईस्वी) अमीर खुसरो (1253 से 1325) में, महाराष्ट्र के दामोदर पंडित, संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर और गोंडा बाई तथा प्रसिद्ध सूफी संत शेख सरफुद्दीन अली कलंदर आदि की रचनाओं में देखे जा सकते हैं| पर भाषा की दृष्टि से इन रचनाओं की प्रामाणिकता संदिग्ध है| दक्षिणी हिंदी के प्रथम कवि सूफी संत ख्वाजा बंदा नवाज गेसूदराज की रचनाएं की प्रारंभिक हिंदी की उदाहरण मानी जा सकती हैं| यद्यपि उनका लेखन काल 1412 से 1437 ई. है| भाषा की दृष्टि से गेसूदराज की रचनाएं प्रामाणिक मानी जा सकती हैं| 1450 ईसवी के पूर्व में भी कमोबेश मात्रा में रचनाएँ की हों पर उनका प्रामाणिक पाठ आज उपलब्ध नहीं है, अतः भाषा की दृष्टि से हिंदी के स्वरूप निर्धारण में उनसे कोई सहायता मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती | अमीर खुसरो की ब्रजभाषा छंद भी प्रामाणिक पाठ की दृष्टि से संदिग्ध हैं और उनकी संख्या भी अधिक नहीं है | संत नामदेव (1270 से 1350 ईसवी) और उनके समकालीन त्रिलोचन ने भी ब्रज भाषा में कुछ पद लिखे थे | परवर्ती काल में दामोदर पंडित की उक्ति व्यक्ति प्रकरण, मौलाना दाऊद की चंदायन और विद्यापति की मैथिल रचनाओं को ही प्रारंभिक हिंदी की प्रामाणिक रचनाएं स्वीकार किया जा सकता है।
इस काल की भाषा में व्याकरणिक स्थिरता आनी प्रारंभ हो गई थी। विद्यापति की रचनाओं में सरलता एवं सरसता और चंदायन अवधी का अच्छा उदाहरण है |इस प्रकार यद्यपि हिंदी के आरंभिक रूप की कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती तथापि सामान्य रूप से हम इसका काल विक्रमी की पंद्रह शताब्दी मान सकते हैं । इस दृष्टि से उपयुक्त हिंदी को हिंदी का आरंभिक रूप कहा जा सकता है पुरानी हिंदी और प्रारंभिक हिंदी को पर्याय नहीं माना जा सकता पर हिंदी के आरंभिक रूप में इन दोनों का सहज समावेश संभव है।

रविवार, 29 नवंबर 2020

वापसी कहानी, विष्णु प्रभाकर

                                                              वापसी (कहानी)

- विष्णुप्रभाकर


वापसी विष्णुप्रभाकर की प्रमुख कहानी है। लेखक ने कहानी में ग्रामीण क्षेत्र की माली अर्थव्यवस्था, विधवा स्त्री की विवशता, एक परिवार में गरीबी और पारिवारिक संबंधों से उपजे दुख को उजागर किया है। लेखक ने कहानी में यह भी दिखाने की कोशिश की है कि ये परिस्थितियां बालक के बाल मन पर कितना बुरा प्रभाव डालती हैं? ऐसे समाज में जन्मा नन्हा बालक जो अपने पिता की बातों पर अटूट विश्वास रख अपने आप को बड़ा समझ कर मां की जिम्मेदारी अपने नन्हें कंधों पर उठाने का साहस रखता है। उस बालक के मष्तिष्क में पनपा विकार उसे बड़ा होने पर भी बार- बार उद्वेलित करता रहता है। बालमन में उपजी नफरत उसे अपराधी बनने पर मजबूर कर देती है। इस कहानी के कथानक का विकास चार चरणों में होता है। पहला चरण है - प्रारंभ अर्थात रामसिंह के पिता की मृत्यु और माँ का चाचा के घर जाना , दूसरा चरण है- विकास अर्थात रामसिंह का घर से भागकर मुंबई जाना , तीसरा है- चरम अर्थात रामसिंह का वापिस गांव आकर आग में कूदकर बालकों को निकालकर लाना और चौथा और अंतिम चरण है- कहानी का अंत जब रामसिंह के मुँह से माँ शब्द निकलता है। कहानी का अंत दुखात्मक है। लेकिन कहानी यथार्थवादी है । कहानी के अंत में लेखक पाठक पर छोड़ देता है कि वह स्वयं अपने विवेक से सही और गलत का निर्णय ले। कहानी का मुख्य पात्र एक गरीब परिवार में जन्मा रामसिंह है जो गांव में ही एकमात्र पक्के मकान में रहने वाले और उनकी गरीबी का फायदा उठाकर उसकी मां को अपने साथ रहने के लिए एक तरह से मजबूर करने वाले, अपने सगे चाचा से बदला लेना चाहता है। कहानी में लेखक ने आधुनिक कहानियों के लेखन की नई शैली फ्लैश बैक तकनीक का प्रयोग किया है। कहानी की कथा संक्षेप में इस प्रकार है-

राम सिंह बचपन में शांत स्वभाव का 6 या 7 साल का बच्चा था लेकिन जीवन मे आने वाली विपरीत परिस्थितियां उसे उग्र स्वभाव का बालक बना देती हैं । हुआ यूं कि रामसिंह जब छोटा था तो वह अपने माता - पिता के साथ अपने पैतृक गांव में रहता था। उसके गांव में सिंचाई हेतु पानी न होने के कारण खेती लगभग न के बराबर होती थी। पूरा गांव गरीबी में जीवन भसर करता था । लोग कच्चे मकानों में रहते थे। राम सिंह के पिता , जो उसे बहुत प्यार करते थे वे भी गांव के दूसरे लोगों की तरह ही गरीब थे। गरीबी के कारण और ऊपर से सर्दी के कारण उसके पिता की असमय मृत्यु हो जाती है। राम सिंह के चाचा, जो किसानी के साथ-साथ ब्याज-बट्टा भी करते थे और गांव के खलियान में ही पक्का मकान बनाकर रहते थे। जब राम सिंह के पिता बीमार थे तो वह कभी भी उनकी मदद करने के लिए नहीं आए। लेकिन जब उसके पिता की मृत्यु हो जाती है तो उसके चाचा उसके घर बार बार आने लगते हैं और मां से बात करने लगते हैं। शुरू शुरू में मां चाचा से लड़ती भी है उसको झिड़कती भी है। लेकिन महीनों तक उसके चाचा उसके घर बार-बार आते रहे। घर को चलाने में असमर्थ, गरीब मां और विधवा स्त्री क्या करती आखिरकार वही हुआ जो चाचा चाहते थे। एक दिन वह राम सिंह को कहती है- क्यों रे रामू! तू चाचा के घर चलेगा? रामू समझा नहीं । मां ने फिर प्यार से समझाया- 'अरे वही अपने चाचा! उनके घर चलेगा? अपने चाचा के घर! मां ने हकलाते हुए कहा - अब हम वहीं रहेंगे। लेकिन राम सिंह चाचा के घर बिल्कुल नहीं जाना चाहता। वह जाने से सख्त मना कर देता है क्योंकि वह जानता है कि उसका चाचा अच्छा आदमी नहीं है । अगर वह उनका हितैषी होता तो गरीबी में उसके पिता की मदद करता और उसके पिता को गरीबी के कारण मरने न देता। रामू जानता है कि वह अपने स्वार्थ के कारण उसकी मां से बात करता है। ऐसे में उसे अपने बापू की याद आती है। उसे याद आता है कि उसके बापू उसे बहुत प्यार करते थे। उसके मस्तिष्क में बार-बार उसके पिता के कहे हुए शब्द गूंजने लगते हैं। वे उसको कंधे पर बिठाकर कहते थे कि रामू जब बड़ा होगा तो यहां रेत नहीं उड़ेगी, कहत नहीं पड़ेंगे, यहां नहर आ जाएगी, खूब पानी होगा, खूब अनाज होगा, हम खूब मालामाल हो जाएंगे। पिता मि कही गई बातों को याद करके राम सिंह अपनी मां को चाचा के घर जाने से मना करता है वह उसको विश्वास दिलाता है कि वह अब बड़ा हो रहा है इसलिए बापू नहीं रहे तो क्या हुआ वह तो है, और वह सब संभाल लेगा लेकिन मां जानती है कि रामसिंह अभी बहुत छोटा है , जब तक वह बड़ा होगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। तब तक वे मां- बेटा भूखे मर जाएंगे और खत्म हो जाएंगे । अंततः एक दिन मां रामसिंह को लेकर चाचा के घर चली जाती है , लेकिन वह अपने चाचा को पिता के रूप में वह कभी स्वीकार नहीं कर पाया। यहां तक कि एक बार वह अपने चाचा को पीटता भी है। कुछ दिनों के पश्चात चाचा से मां की गोद में एक बालक आ जाता है , यह बालक राम सिंह को नहीं सुहाता था और वह उसे पीटता था। यहां तक कि उसे मिटा देना चाहता था। इसी कारण कई बार मां भी उसे मारती थी। उसे लगा कि चाचा ने उसकी मां को उससे छीन लिया।जब धीरे-धीरे मां उससे दूर होती गई तो एक दिन वह मां और चाचा के घर को छोड़कर मुंबई भाग जाता है लेकिन वहां भी राम सिंह का मन शांत नहीं होता और मन ही मन ठान लेता है कि बड़ा होकर अपने चाचा को मार डालेगा। वह एक छुरा खरीदता है और उसे संभालकर तकिए के नीचे रख लेता है। आठ साल बाद वह चाचा को मारने के लिए वापस अपने गांव आता है। क्योंकि चाचा के कारण मां उससे दूर हो गई थी, वह अनाथ हो गया था, वह बेघर हो गया था , वह अपनी मां को कभी भूल नहीं पाया क्योंकि वह अपनी मां से भी बहुत प्यार करता था उसे परदेश में भी अपनी माँ की बार बार याद आती थी , लेकिन जब माँ का चाचा के साथ चले जाने की बात याद आती है तो वह दुखी हो जाता है और उसका अंतर्मन कह उठता है - माँ तू मर क्यों नहीं गई। उसका अंतर्मन बार-बार उसे अपने अतीत को भुलाने के लिए कहता है, लेकिन वह अपने अतीत को भुला नहीं पाता और चाचा को मारने के लिए गांव की ओर चल पड़ता है।
जब वह गांव में पहुंचता है तो देखता है कि गांव अब पहले जैसा नहीं रहा। गांव में पानी आ गया है, नहर आ गई है और खूब फसल हो रही है , अब गांव में उसका कड़वा व्यतीत नहीं था बल्कि आनंद था जो थकान उतारता है और तन मन सहलाता है। वह एक बार फिर अपने अतीत को भूलकर फिर से जिंदगी जीना चाहता है, उसे फिर से अपने पिता के कहे हुए शब्द याद आने लगे। वही परिचित प्यार भरा स्वर , "रामू जब बड़ा होगा तो यहां रेत नहीं उड़ेगी, कहत नहीं पड़ेगी, यहां नहर आ जाएगी, खूब पानी होगा, खूब अनाज होगा, हम खूब मालामाल हो जाएंगे .... यह शब्द बार-बार उसके मस्तिष्क में घूमने लगे ...लेकिन उसे फिर याद आता है कि वह अपने चाचा को मारने आया है और वह उसे मारेगा वह भी अपने चाचा और उसके परिवार को दर-दर का भिखारी बना देगा। यह सब सोचते हुए वह गांव के पास पहुँच गया
उसका गांव पेड़ों के उस पार छिपा हुआ था। उसके मस्तिष्क में वही अतीत के चित्र उभरने लगे, वह सोचने लगा कि शायद सब लोग सो गए होंगे , शायद मर्द अभी बैठे हुक्का पी रहे होंगे, शायद चाचा भी वही हो, शायद माँ भी जाग रही हो ...यह सब फुसफुसाते हुए वह आगे बढ़ रहा था। गांव के तालाब के पास पहुंचते ही कुत्तों के भौंकने की आवाज आने लगी। उसने देखा कि गांव में धुआं उठ रहा है और कहीं आग लगी है। शायद आग खलियान में लगी है जब वह आग के पास पहुंचता है तो उसने देखा कि आग खलियान में नहीं बल्कि गांव के एकमात्र पक्के मकान में अर्थात उसके चाचा के घर आग लगी हुई है। उसने देखा कि एक व्यक्ति दबे पांव खलियान की ओर जाकर कुछ फेंकना चाहता है, हालांकि लेखक ने यहाँ कहानी में थोड़ी अस्पष्टता दिखाई है लेकिन पाठक समझ जाता है कि यह कोई और नहीं बल्कि उसका चाचा ही था,राम सिंह उसे पकड़ लेता है और कुछ क्षणों में उसकी जांघ में छुरा घोंप कर उसे वहीं ढेर कर देता है और उसके बाद वह उसी आवेश में जलते हुए मकान की ओर भागता है। आग की लपटे मकान के बीच में से इधर से उधर लपलपाती हुई ऊपर की ओर उठ रही थी। आसपास के लोग पानी, रेत , मिट्टी जो भी मिल रहा था आग पर फेंक रहे थे , राम सिंह ने बिना घबराए हुए आग के अंदर प्रवेश किया । कुछ देर बाद दरवाजा खुला और माँ के साथ साथ रामसिंह दो संज्ञाहीन बालकों को छाती से चिपका कर आग से बाहर आया। उसने बालकों को मां के समीप धरती पर लेटा दिया और खुद भी पछाड़ खाकर वही मां के चरणों में गिर पड़ा और गिरते-गिरते उसके मुंह से मां शब्द निकला। यह माँ शब्द सब सुनने वालों के कानों में गूंजता है । इस तरह रामसिंह अपनी मां से अलग होकर भी अलग नहीं हुआ था वह माँ के निर्णय को बर्दाश्त नहीं कर पाया। कहानी का अंतिम भाग बताता है कि राम सिंह ऊपर से उग्र स्वभाव का दिखने वाला अंदर से बहुत ही कोमल हृदय वाला था। वह अपनी जान पर खेलकर मां और बच्चों को बचाने के लिए आग में कूद पड़ता है। उसके मन मे नफरत बस अपने चाचा के लिए थी क्योंकि वह जानता था कि उसका चाचा भला मानुष नहीं है इसलिए वह माँ को चाचा के घर जाने से मना करता है। मां का चाचा के घर जाना उसका बाल मन भुला नहीं पाया। परिणामस्वरूप मां का चाचा के घर जाने से अंत मे किसी का भी भला नहीं हो पाया न चाचा का, न रामसिंह का , न ही उसकी माँ का और न ही चाचा के बच्चों का , अर्थात सब खत्म हो गया ।
कहानी खड़ी बोली में लिखी गई है, अध्ययन के उपरांत पता चलता है कि भाषा प्रभावपूर्ण, प्रवाहमयी और सरल है । लेखक ग्रामीण परिवेश को व्यक्त करने में पूरी तरह से सफल रहा है। कहानी पढ़ते-पढ़ते पाठक की आँखों के सामने खेत खलियान, कच्चे मकान के चित्र अंकित होने लगते हैं। कुत्तों के भौंकने में श्रव्य बिम्ब, आग लगने के दृश्य में चक्षु बिम्ब भाषा को सार्थक बनाते हैं । साथ ही फ्लैश बैक तकनीक, सटीक वाक्य संरचना और सार्थक शब्दों के चयन से कहानी शुरू से लेकर अंत तक पाठक को बांधे रखती है।

सोमवार, 14 सितंबर 2020


 

हिंदी भाषा (कविता)

हिंदी मेरे हिंद की भाषा
तू ही तो मेरी पहचान है|
तू ही मेरी मातृ भाषा
तू ही मेरा रोजगार है।
तू नहीं आई ओर कहीं से
तू भारत माँ की सौगात है।
देवभाषा है तेरी जननी
तू राष्ट्र का अभिमान है।
सरलता है आभूषण तेरा
तू विपुल वर्णों का मेल है।
पहन मात्राओं का बाना
बिंदी से करती श्रृंगार है।
जो भी आई विदेशी भाषा
तूने सबका किया सत्कार है।
तेरा नहीं किसी से झगड़ा
तू भारत देश की शान है।
बस्ती तुझमें भारत-आत्मा
सभी को तुझसे प्यार है।
हिंदी मेरे हिंद की भाषा
तू ही तो मेरी पहचान है।

@डॉ. अनिता देवी

रविवार, 26 अप्रैल 2020

प्रयोगवाद एवं नई कविता

प्रयोगवाद या नई कविता
छायावाद के उपरांत ऐसे नवयुवक कवि काव्य जगत में आए जिन्होंने अपनी कविता के माध्यम से हिंदी कविता को नया मोड़ दिया, इस कविता को साहित्य में प्रयोगवादी कविता कहा गया।  प्रयोगवादी कविता से पहले दो प्रमुख काव्य आंदोलन आए- एक छायावाद और दूसरा प्रगतिवाद।  छायावादी कविता का आरम्भ १९३८ से माना जाता है| हिंदी साहित्य में यह बहुत महत्त्वपूर्ण काल माना जाता है  परन्तु  अंत तक आते आते लाक्षणिकता, कल्पनाशीलता  और  पलायनवादी होने का आरोप लगाया जाने लगा | फलत:  प्रगतिवादी  कविता का जन्म हुआ| इस  काव्यधारा ने  1936 से 1943 तक जीवन जिया|
प्रगतिशील काव्य के उपरांत, 1943 में 'तार सप्तक' नामक संग्रह के प्रकाशन के साथ ही जो काव्य आंदोलन आया, उसको प्रयोगवाद का नाम दिया गया। इससे पहले की हिंदी कविता अर्थात सारी की सारी कविता स्वाधीनता से  पहले की कविता है और प्रयोगवादी कविता स्वाधीनता के बाद की पहली कविता है। पहले की कविता में भाव बोध की प्रधानता थी और उसमें समाजिकता का आग्रह ज्यादा था। इस कविता में सम्प्रेषण पर भी  ज्यादा ध्यान दिया गया, लेकिन तार सप्तक के बाद की अर्थात प्रयोगवादी और नई कविता में व्यैक्तिकता पर तथा रूप और शिल्प के स्तर पर नए प्रयोग पर ज्यादा ध्यान दिया गया। जो सामाजिक, राजनैतिक बिंदु या चिंताएं छयावाद के पास थी ,वे बिंदु या चिंताएं प्रयोगवादी कविता के पास नहीं हैं इसके साथ ही यह कविता ज्यादा बौद्धिकता प्रधान हो गई। जब कविता व्यैक्तिकता प्रधान और  बौद्धिकता प्रधान होगी और जिसमें प्रयोग की चिंता रहेगी तो स्वाभाविक है कि वो कविता दुरुह भी होगी इसलिए दुरूहता भी इस कविता की एक विशेषता है। देखा जाए तो प्रयोगवाद और नई कविता को समझने के लिए तीनों तार सप्तकों का समझना जरूरी है।
           पहला तार सप्तक जो 1943 में निकला, जिससे प्रयोगवाद का आरम्भ माना जाता है, उसके कवि हैं-  गजानन माधव मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर, नेमीचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, रामविलास शर्मा, अज्ञेय | इस संग्रह की भूमिका में सच्चिदानंद वात्सायन अज्ञेय ने प्रयोग पर ज्यादा बल दिया है, जिस वजह से इस संग्रह की कविता के आधार पर नहीं इसकी भूमिका के आधार पर लोगों ने इस कविता को प्रयोगवादी कविता कहना शुरू कर दिया। 1943 में प्रकाशित इस तार सप्तक में नए तत्व और यथार्थ के धरातल की अभिव्यक्ति देने के लिए नए प्रयोगों को स्पष्ट किया |
                                    सन् 1951 में दूसरा 'तार सप्तक' प्रकाशित हुआ। 1951 में जब हमारे सामने दूसरा तार सप्तक आया तो प्रयोगवाद के स्थान पर नई कविता शब्द का स्थापन हो चुका था| इसके कवि हैं-  भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंतला माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती|इस तार सप्तक की भूमिका अज्ञेय ने लिखी थी और उन्होंने  नई कविता शब्द का प्रयोग किया था, लेकिन उससेे पहले शमशेर बहादुर सिंह ने अपने व्यक्तव्य में  नई कविता शब्द का प्रयोग किया था और अज्ञेय ने भूमिका शमशेर बहादुर सिंह  के व्यक्तव्य के बाद लिखी थी अतः सबसे पहले नई कविता शब्द का प्रयोग शमशेेेर  बहादुर सिंह ने किया।  इसके अलावा अज्ञेय ने इस भूमिका में प्रयोगवाद के नाम पर विरोध भी प्रकट किया। उन्होंने कहा कि "प्रयोग का कोई विवाद नहीं है। हम वादी नहीं रहे, नहीं है, नए प्रयोग अपने आप में इष्ट का साध्य है ठीक इसी तरह  कविता का भी कोई वाद नहीं। अतः हमें प्रयोगवादी कहना उतना ही सार्थक या निरर्थक है जितना इसे कविता वादी कहना।" इसके अलावा अज्ञेय इस पूरे वाद के संचालक थे और उन्होंने  19 52 में अपनी वार्ता में  (पटना ) नई  कविता  की विस्तार से  व्याख्या की  है, उन्होंने  उसकी विशेषताओं का भी उल्लेख किया है अत: ध्यान रखने की बात यह है कि नई कविता का जन्म दूसरे तारसप्तक के प्रकाशन के साथ हुआ।

   तीसरा तारसप्तक 1959 में निकला, उसके कवि हैं- कुंवर नारायण, कीर्ति चौधरी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मदन वात्सायन, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, विजयदेव नारायण साही | तीसरे  तारसप्तक के साथ ही  नई कविता का अंत माना जा सकता है। इसका मतलब ये हुआ कि जहाँ दूसरा सप्तक नई कविता का आरंभिक संग्रह माना जा सकता है तो तीसरा सप्तक नई कविता आंदोलन का आखिरी संग्रह माना जा सकता है।  नई कविता केे एक रघुवीर सहाय और दूसरे   शमशेर बहादुर सिंह बहुत महत्वपूर्ण कवि हैैं।
हिंदी के आधुनिक साहित्य पर पश्चिम के साहित्य का गहरा प्रभाव है|  स्वछंदतावाद की धारा पर अंग्रेजी के रोमांटिसिज्म का प्रभाव है और छायावाद को भी उससे जोड़ कर देखा जाता है| प्रगतिवाद को भी प्रोग्रेसिवसिज़्म के प्रभाव का परिणाम माना गया है। इसी प्रकार प्रयोगवाद का केंदीय तत्व प्रयोग भी अंग्रेगी के एक्स्प्रिमेंट का अनुवाद है। और प्रयोगवाद एक्सप्रैमेंटिसिज्म का अनुवाद है| इन सप्तकों में से बहुत सारे कवि प्रयोगवाद से चलकर आगे नई कविता से भी जुड़ गए जैसे स्वयं अज्ञेय या मुक्तिबोध आदि। यही कारण है कि प्रयोगवाद की विशेषताओं को नई कविता में भी देखा जा सकता है। पहले की कविता की तरह ही नई कविता भी अंग्रेजी प्रभाव से  कैसे बच नहीं सकती थी इसलिए माना जाता है कि नई कविता के समय भी अंगेजी में new poem और new  year (वर्ष) नाम से कविताएँ छपी थी और नई कविता शब्द भी उसी  के प्रभाव का परिणाम माना जा सकता है | अत:  1960 के बाद नई कविता समाप्त होती दिखाई देती है।
          बिहार के तीन प्रसिद्ध कवियों - नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार व नरेश मेहता ने इस युग को नकेल वाद या प्रपद्यवाद नाम दिया|  इस प्रकार प्रगतिवाद की परवर्ती  काव्यधारा को अनेक नामों से जाना जाता है| जैसे - प्रयोगवाद, प्रतीकवाद प्रपद्यवाद नकेनवाद ,नई कविता आदि|  प्रयोगवाद शब्द का आज भी प्रयोग करते हैं| इसी तरह नई कविता शब्द भी सर्वाधिक प्रचलित है|
               कुछ विद्वान प्रयोगवाद तथा नई कविता को भिन्न भिन्न मानते हैं किंतु वास्तविकता यह नहीं है यह दोनों एक ही कविता धारा के विकास की अवस्थाएं हैं, प्रयोगवाद नई कविता की आरंभिक अवस्था है और नई कविता उसकी विकसित अवस्था है| प्रयोगवादी कवि ही नई कविता के निर्माता हैं|  नई कविता आधुनिक हिंदी काव्य की प्रवाहमान धारा है|
                इन तारसप्तक कविता संग्रहों के अतिरिक्त अनेक पत्रिकाएं भी निकली, जिनमें नई कविता परिलक्षित होती है इनमें पाटल, दृष्टिकोण, कल्पना, अजंता, राष्ट्रवाणी, धर्मयुग आदि| 1954 में नई कविता शीर्षक नामक पत्रिका डॉक्टर जगदीश गुप्त के संपादन में निकली| यह वार्षिक पत्रिका है | निकष भी  नई कविता की प्रमुख पत्रिका है| अज्ञेय जी के अनेक कविता संकलन भी प्रकाश में आए जैसे- हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, में भी नई कविताओं की विशेषताएं लक्षित होती हैं|  गिरिजाकुमार माथुर की मंजीर, नाश और निर्माण, भारत भूषण अग्रवाल की ओ  प्रस्तुत मन,  देवराज की धरती और स्वर्ग भी नई कविता के अंतर्गत शामिल की जा सकती है|
       इसके अतिरिक्त केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, कीर्ति चौधरी, अजीत कुमार, दुष्यंत कुमार, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि कवियों की कविताएं भी इसी कोटि के अंतर्गत आती हैं |  विजयदेव नारायण साही की भी कविताएं इसी के अंतर्गत आती हैं|
         यदि इन कवियों की रचनाओं पर दृष्टिपात करें तो निम्नलिखित विशेषताएं लक्षित होती है
  निराशा की भावना
    नई कविता में सामान्य रूप से निराशा की भावना सर्वत्र व्याप्त है और अविश्वास, असहायता, अकेलापन आदि के कारण जो मानवीय मूल्यों में विघटन हुआ, कवि के मन पर इसका प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है। नई कवियों के सामने सामाजिक विषमताएँ मुंह बाए खड़ी है और कवि को इनसे संघर्ष करना पड़ता है। समाज में सभ्य असभ्य, नागरिक ग्रामीण, ईमानदारी बेईमानी, धोखाधड़ी आदि के प्रत्यक्ष दर्शन कवि को होते हैं। विजयदेव नारायण साही की कविता-
 'हम सभी बेच कर आए हैं अपने सपने' में निराशा की अभिव्यक्ति हुई है। में निराशा की अभिव्यक्ति हुई है
 आस्था और विश्वास
    नई कविता में जहां एक और निराशा है वहाँ दूसरी ओर आस्था और विश्वास भी व्यक्त हुआ है। दुष्यंत कुमार की 'अभी तो' शीर्षक कविता में भविष्य की आभा अत्यंत सुंदर है भविष्य की आशा अत्यंत सुंदर है-
 रात के घने काले समय में,
 मेरी हथेली पर,
 तुमने बनाया है जो सूरज,
 मेहंदी से,
 कहीं सुबह तक रचेगा
 लाल होगा
 यू उतावले मत हो
 रचेगा जरूर
 सूरज है
 तुमने बनाया है
 लेकिन प्रिय अभी अंधेरा है।
 नमी है हथेली में सुबह की प्रतीक्षा है।
 कीर्ति चौधरी की कविताओं में भविष्य के लिए अपार विश्वास झलकता है। 'प्रतीक्षा' नामक कविता में कीर्ति चौधरी लिखती है-
"आखिर  तो
.........
आएगा भविष्य कभी
करूंगी प्रतिक्षा अभी।
नए कवियों में अज्ञेय मुख्य रूप से आस्थावादी कवि हैं। वे मानते हैं- नकारों में जीवन नहीं चलता'
ईश्वर के प्रति अनास्था-
     बौद्धिक युग की पुत्री होने के कारण नई कविता का भावनात्मक दृष्टिकोण के साथ जन्मजात विरोध है। नई कविता में ईश्वर, नियति, मंदिर, देवी- देवता आदि में कोई आस्था नहीं है। नए कवि को यदि कहीं नर या भगवान के दर्शन होते हैं तो वे केवल अपनी प्रिया में।
क्षण का महत्व
 नई कविता में क्षण को अत्यंत महत्व देते हैं। नए कवि क्षण की उपेक्षा नहीं करते। शरीर में जिस प्रकार अंगों को नगण्य  नहीं समझा जा सकता वैसे ही काल-शरीर में क्षण-अंगों को महत्वहीन नहीं माना जा सकता। अज्ञेय ने  क्षण के महत्व को प्रमुख मानते हुए लिखा है-
 एक क्षण
 क्षण प्रवहमान
 व्याप्त संपूर्णता ।
अज्ञेय ने क्षण में ही संपूर्णत्व, स्थायित्व, अस्तित्व, सत्य के साक्षात दर्शन किए हैं। गजानन मुक्तिबोध ने मृत्यु और कवि शीर्षक रचना में लिखा है-
क्षणभंगुरता के इस क्षण में,
जीवन की गति जीवन का स्वर
दो सौ  वर्ष आयु यदि होती तो क्या
 अधिक सुखी होता नर।
भोगवाद या वासना की प्रवृत्ति
सुखवाद से प्रभावित नए कवियों ने लोक मर्यादा की ओर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। संयोग श्रृंगार का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करने में नए कवि हिचके नहीं। वासना, मांसलता, इन्द्रीयता इन कवियों में पाई जाती है। पाश्चात्य सिद्धांत eat, drink and be marry  को इन कवियों ने पूरी तरह से अपनाया है। शकुंतला माथुर की इन पंक्तियों में संयोग श्रृंगार का उदाहरण है-
 चली आई बेला
सुहागिन पायल पहने
बाण बिध हिरनी सी
बाहों में सिमट जाने को
उलझने को लिपट जाने को
 मोती की लड़ी समान।
 धर्मवीर भारती की कविता में वासना का खुला चित्र है-
 जिस दिन से तुमने फूल बिखेरे माथे पर
अपने तुलसी दल जैसे पावन ओंठों से
मैं महज तुम्हारे गर्म वक्ष में
 शीश छिपा चिड़ियों के सहमें बच्चे सा
 हो गया मूक।
 इन उद्धरणों में सुखवाद मांसलता के साथ ही आध्यात्मिकता को भी भौतिकता के धरातल पर खींच लाया है।
वेदना की प्रमुखता
नई कविता में वेदना व्यापक रूप से छाई हुई है। नरेश मेहता की प्रार्थना कविता में वेदना का सुंदर चित्रण हुआ है।
 वहन करो ओ मन
 ओ मन वन करो पीड़ा।
 भारत भूषण अग्रवाल ने भी वेदना के अंदर भविष्य के नए प्रकाश को देखने का प्रयास किया है।
 व्यंग्य की प्रधानता
 नई कविता में व्यंग्य की प्रधानता सर्वत्र दिखाई देती है। मानव जीवन की विभीषिकाओं, विकटताओं, असफलताओं व अभावों के कारण ये कवि सभ्यता पर व्यंग्य करते हैं-
सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं
न होंगे,
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछूं
उत्तर दोगे
फिर कैसे सीखा डसना, विष कहां से पाया।
 कुंवर नारायण की कविता 'बहार आई है, में भी शहरी सभ्यता पर प्रकाश डाला गया है।
 यह जंगली फूल जो हर साल
 हल्ला बोल कर जो शहर में घुस आते हैं
और राह चलते, आते जाते लोगों को
 बेशर्मी से घूरते फुसलाते हैं
पर क्या मालूम नहीं
 कि शहरों में इनकी सख्त मनाही है।
 कि कोई किसी से बिना जान-पहचान बोले
 कि देखो बाहर आई है।
 विगत दो महायुद्धों का अभिशाप इस देश में भोगा व सहा है।इसके परिणामों से आज का कवि युद्ध का विद्रोह करता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कलाकार और सिपाही आदि कविताएं युद्ध के प्रति व्यंग्यात्मक रचनाएं हैं। भवानी प्रसाद मिश्र का गीत फरोश कवि की विवशता का जीवित चित्र है। नई कविता में व्यंग्य एक बहुत बड़ी शक्ति के रूप में देखा जा सकता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पंक्तियां हैं-
 लेकिन मैं देखता हूं कि आज के जमाने में
 आदमी से ज्यादा लोग पोस्टरों को पहचानते हैं,
 वे आदमी से बड़े सत्य हैं।
 भदेश चित्रण
नई कविता में भदेश का चित्रण एक अपनी विशेषता है। नए कवियों ने इन सभी विषयों को स्थान दिया जो अब तक उपेक्षित थे । काव्य में सौंदर्य बोध की परिणति हमारे आनंद  बोध में होती है इसलिए करुण, भयानक, रौद्र, विभक्त रसों के साधारणीकरण से हम दुख, डर, विनाश या घृणा की प्राप्ति न कर आनंद के बीच अपनी आत्मा की अवस्थिति पाते हैं।
      नई कविता में विरूपता अश्लीलता जैसी कोई चीज ही नहीं मानी गई है। असुंदर का भी सौंदर्य पक्ष में महत्व है ।इसलिए नई कविता ने भदेश, असुंदर और अरूप के प्रति एक प्रकार का आग्रह देखने को मिलता है। नागार्जुन की पंक्तियों में भदेश का बोध होता है-
 सरग था ऊपर
नीचे पाताल था
अपच के मारे बहुत बुरा हाल था ।
दिल दिमाग.........।
 इस प्रकार की कविताओं में भदेस का चित्रण है

शैली पक्ष
कला पक्ष के क्षेत्र में इस युग में सबसे अधिक प्रयोग हुए हैं ।इनका पहला नारा है भाषा का सर्वथा वैयक्तिक प्रयोग। इसलिए इन्होंने शब्दों में एक नया सारगर्भित अर्थ भरने का प्रयत्न किया है। इसी प्रयत्न में कभी-कभी शब्दों का अनर्गल    प्रयोग भी हो गया है।
   नई कविता में यौन वर्जनाओं की अभिव्यक्ति प्रतीकों के माध्यम से हुई है। कहीं-कहीं मानसिक उलझनों को अभिव्यक्त करने के लिए भी प्रतीकों का प्रयोग किया है। अतः कुछ इसे प्रतीकवाद भी कहते हैं । इन कवियों ने प्राचीन प्रतीकों के स्थान पर नए प्रतीक लिए हैं । जैसे प्रकाश के लिए दीप मशाल आदि के स्थान पर टॉर्च शब्द का प्रयोग किया है।
  सघन जीवन निशा
 विद्युत लिए मानो अंधेरे में
 बटोही जा रहा हो टॉर्च ले
इसी प्रकार नई कविता में सुंदर बिंबों का प्रयोग हुआ है ।
वर्षा की पहली बूंद को देखकर कवि एक सुंदर बिंब की सृष्टि करता है
बूंद टपकी एक नभ से
 किसी ने झुककर झरोखे से
 कि जैसे हंस दिया हो
हंस रही थी आँख ने जैसे किसी को
कस दिया हो
 इन कवियों ने प्राचीन काल के रूढ़ उपमानों का बहिष्कार करके इनके प्रति विद्रोह प्रकट किया है।
 जैसे
चांदनी सदृश चंदन हम क्यों लिखें
मुख कमलों सरीखे क्यों दिखे
 हम लिखेंगे चांदनी उस रुपए सी है
 जिसमें चमक है पर खनक गायब है
कहीं-कहीं नूतनता का मोह हास्यास्पद बन गया है जैसे
मेरे सपने इस तरह टूट गए
जैसे भुना हुआ पापड़
कहीं-कहीं ध्वन्यात्मकता अथवा ध्वनि चित्र भी सुंदर बन पड़े हैं जैसे
 नींद भरे आलिंगन में चूड़ी की फिसलन
 आज का कवि मुक्त छंद में विश्वास रखता है। शिवमंगल सिंह सुमन के शब्दों में "भावनाओं की व्यापकता को संवारने के लिए मुक्त छंद बड़ा ही उपयुक्त प्रतीत होता है और युग की चेतना स्वाभाविक रूप से उसकी ओर उन्मुख हो उठी। इन्हीं विचारों के कारण आलोचकों ने इस कविता को काव्य न मानकर गद्य माना है। परंतु कविता का अनिवार्य तत्व भावाभिव्यक्ति जो इन कविताओं में शुद्ध रूप में मिलती है और अतुकांत होते हुए भी यह कविताएं भावों की एक विशेष प्रकार की लय लिए हुए हैं।
   नई कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि  वादात्मक धरातल से मुक्त है। दिनकर के शब्दों में यह शुद्ध साहित्यिक आंदोलन है , कला का आंदोलन है , उसका मुख्य ध्येय हमारी धारणाओं को परिवर्तित करना है।
    इस प्रकार नई कविता में वादों की उन्मुक्तता बढ़ती आ रही है । नई कविता की किसी वाद के प्रति रुचि न होने के कारण  स्वतंत्र पथ पर अग्रसर होती हुई प्रतीत होती है। इसका सबसे बड़ा योगदान मतवादी धरातल का परित्याग कहा जा सकता है।
      नई कविता के संबंध में अज्ञेय के शब्दों में कहा जा सकता है-
 फिर भी तुम मरे नहीं तुमसे तुम्हारी
संभावनाएं बढ़ी है।
            संघर्षों में बढ़ती हुई नई कविता के प्रति अज्ञेय की यह आस्था अपने आप में नई उपलब्धि है।
       आज का कवि स्वतंत्रता, समानता, क्रांति, स्वच्छंदता में विश्वास रखता है। हिंदी साहित्य की आधुनिक कविता के विकास को तीन उत्थानों में बांटा जा सकता है। प्रथम उत्थान की विशेषता भाव परिवर्तन  द्वितीय उत्थान की विशेषता भाषा परिवर्तन और तीसरा उत्थान अभिव्यंजना की नवीन प्रणाली है। मानसिक संकीर्णता और  विद्वेष को छोड़कर  यदि आधुनिक काव्य को पढ़ा जाए तो जीवन के विस्तृत क्षेत्र मिलने के साथ सर्वत्र महान संदेश भी सुनाई देगा।

 प्रयोगवाद की भूमिका
प्रगतिवादी काव्यधारा 1936 से 1943 के अंत समय तक ही जीवित रह सकी और उसके पश्चात प्रयोगवाद का जन्म हुआ। प्रगतिवाद के अंत के कई कारण थे-  दिनकर के अनुसार "प्रगतिवाद ने साहित्य पर ऐसा कोई भी प्रभाव नहीं डाला जिसे हम किसी भी दृष्टि से साहित्यिक प्रभाव कह सके। यह मुख्यतः असाहित्यिक आंदोलन था जो साहित्य के भीतर केवल राजनीतिक उपयोग के लिए साहित्यकारों का शोषण करने आया था। इसलिए उसे मार्क्सवादी साहित्यिक संस्करण कहा गया। विषय वस्तु भी विषय वस्तु की संकीर्णता .....रूबी के प्रति असंतोष ही प्रगतिवाद के ह्रास का कारण ही नहीं अपितु शिल्प सौंदर्य के प्रति उदासीनता भी कारण था। प्रगतिवाद में कला पक्ष में प्रगति के स्थान पर गति उत्पन्न की।... द्वितीय महायुद्ध के परिणाम स्वरुप में छिपी अनेक भावनाएं वे चिंताएं छिपकर आ रही थी जीवन अपने शहर सरलता खो रहा था।...... युद्ध के कारण मानव मूल्यों में अस्थिरता गई थी। शाश्वत और चिरंतन मूल्यों पर एक प्रश्न चिन्ह लग गया था। पुरानी आस्थाएं टूट गई पर नई स्थान नहीं ले पा रही थी। इसी प्रकार मानव मूल्यों में अराजकता, अस्थिरता, बिखराव पनप रहा था। उसमें भाव बोध को व्यक्त करने के लिए नई तकनीक की आवश्यकता महसूस हुई और परिणाम स्वरुप प्रयोगवाद का जन्म हुआ।

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

रीतिकाल


                       ‘रीतिकाल’ 
हिंदी साहित्य के इतिहास को विभिन्न विद्वानों ने मुख्यतः चार भागों में बांटा है- आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल| रीतिकाल संवत 1700 से 1900 विक्रमी तक माना गया है| इसे उत्तर मध्य काल भी कहा गया है| आदिकाल की तरह ही इस कालखंड के नामकरण को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है| उन्होंने रीतिकाल को कई नाम दिए हैं, अलंकरण की प्रधानता के कारण  मिश्र बंधुओं ने इसे ‘अलंकृत काल’ नाम दिया है, पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने  ‘श्रृंगार काल’ ,रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’ ने ‘कला काल’ और आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे रीतिकाल कहा है| इन सभी नामों के पीछे विद्वानों ने अपने-अपने तर्क दिए हैं| मिश्र बंधुओं का तर्क था- “इस युग में कविता को अलंकृत करने की परिपाटी अधिक थी|”१ रीतिकालीन प्रवृतियों को देखते हुए यह तर्क बिलकुल सही है| परन्तु यह भी सत्य है कि यह नाम रीतिकाल की सभी विशेषताओं को इंगित नहीं करता| बच्चन सिंह लिखते हैं- “यह तर्क अपने आप में निर्मूल नहीं है जिसे सहसा अस्वीकृत कर दिया जाए| रीतिकालीन काव्यों के अनुशीलन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अलंकार की प्रवृत्ति इस युग की प्रमुख प्रवृत्तियों में से एक थी| किंतु यह सर्वप्रमुख  नहीं थी| कवियों की दृष्टि रस एवं भाव की ओर भी थी| रीतिमुक्त काव्यों तथा वीर रस की कविताओं में भावों की ही मूल प्रेरणा है, तथा मुख्य लक्ष्य भावाभिव्यक्ति है|”२  पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने रीतिकाल का नाम ‘श्रृंगार काल’ सुझाया है| “रीतिकाल की काव्य प्रवृत्तियों को देखते हुए यह नाम अधिक वजनदार प्रतीत होता है”३ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी इस नाम को स्वीकृति दी है| डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं “जहां तक शेष दो विशेषणों ‘रीति’ और ‘श्रृंगार’ का प्रश्न है- वे दोनों ही अपने-अपने स्थानों पर महत्वपूर्ण हैं |
इस युग के लिए ‘रीति’ विशेषण का प्रयोग करने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल तक ने इसे श्रृंगार काल कहे जाने पर आपत्ति प्रकट नहीं की| किंतु, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इस युग को श्रृं’गारकाल’ कहना सर्वथा समीचीन है| इस नाम के पक्ष में जो यह तर्क दिया जाता है कि इस युग के कवियों की व्यापक प्रवृत्ति श्रृंगार-वर्णन की थी, उसके स्वीकार किए जाने में आपत्ति की जा सकती है| क्योंकि इसमें संदेह नहीं कि इस युग में अधिकांश रचनाएं श्रृंगारिक ही हैं, लेकिन ये भी सत्य है कि ये रचनाएं आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए लिखी गई थी। इसका प्रेरक तत्व कवियों की कामवासना नहीं ‘अर्थ’ है; जो विलासी आश्रयदाताओं से इस प्रकार के काव्य की रचना करके ही प्राप्त किया जा सकता था|”३ इसलिए इसे श्रृंगार काल कहना न्यायसंगत नही लगता। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल को ‘रीतिकाल’ नाम दिया है|  रीतिकाल से मिलता-जुलता रीतिकाव्य शब्द शुक्ल से पूर्व ग्रियर्सन ने भी इस काल के लिए प्रयोग किया है| उन्होंने अपने साहित्य “मॉडर्न वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान के सातवें अध्याय में इस युग को रीति काव्य कहा है|”४ इस प्रकार सभी नामों और तर्कों पर विचार करने के उपरांत अंत में आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा दिया गया ‘रीतिकाल’ नाम ही अधिक संगत प्रतीत होता है|
        अब ‘रीति’ शब्द पर भी विचार करना आवश्यक है|  क्योंकि यह प्रश्न भी उठता है कि क्या रीति शब्द का कुछ संबंध संस्कृत काव्यशास्त्र के ‘रीतिसंप्रदाय’ से भी है| क्योंकि हिंदी साहित्य में प्रयोग होने से पहले इस शब्द का संस्कृत काव्यशास्त्र में भी प्रयोग हुआ है| संस्कृत काव्यशास्त्र में रस संप्रदाय, अलंकार संप्रदाय की तरह ‘रीतिसंप्रदाय’ भी है जिसमें ‘रीति’ को काव्य की आत्मा माना गया है, इस सिधांत का प्रतिपादन आचार्य वामन ने किया था| कुछ विद्वानों ने इस संबंध को स्वीकार भी किया है- “यह संस्कृत के काव्यशास्त्र का बहुत कुछ समानार्थी कहा जा सकता है, क्योंकि संस्कृत के काव्यशास्त्र की तरह इसमें भी काव्य-रचना के विविध उपकरणों की परिभाषा और व्याख्या होती है, पर संस्कृत काव्यशास्त्र की परिस्थिति और गंभीर विवेचना इसमें कहां? ”५ 
                   वास्तव में देखा जाये तो इन सब बातों से अलग रीतिकाल में ‘रीति’ शब्द एक विशेष प्रकार की परिपाटी का सूचक है| हिंदी में ‘रीति’ को काव्य रचना की एक विशिष्ट प्रणाली के रूप में ग्रहण किया गया है| तात्पर्य यह है कि रीतिकाल में कवियों ने एक विशिष्ट प्रणाली को दृष्टि में रखते हुए काव्य की रचना की| इस विशिष्ठ प्रणाली में सबसे पहले कवि आचार्य धर्म का निर्वाह करते हुए काव्य रचना की रीति या लक्षण प्रस्तुत करते थे और फिर उसके अनुरूप ही उदाहरणों की रचना करते थे| ये उदाहरण उनके स्वयं के रचित भी होते थे और कभी-कभी दूसरे कवियों द्वारा रचित उदाहरण भी दिए जाते थे| इस प्रकार इस युग में लक्षण बताकर उदाहरण देने की परंपरा सी बन गई थी और इस प्रकार की रचना-पद्धति को ‘रीति’ का नाम दिया गया| ‘रीति’ के संबंध में बच्चन सिंह अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में लिखते हैं- “काव्यरीति, रसरीति, अलंकाररीति आदि का प्रयोग इस काल के अनेक कवियों ने स्वयं किया है|”६  अंत में कहा जा सकता है कि रीतिकालीन काव्य ऐसा काव्य है जो अलंकार. रस, गुण ,ध्वनि, नायिका-भेद आदि की काव्यशास्त्रीय प्रणाली के आधार पर रचा गया हो|
          जहाँ तक श्रृंगार रस की बात है, मानाकि इन कवियों में श्रृंगार की प्रवृत्ति प्रमुख रही है| लेकिन इस बात को भी भुलाया नहीं जा सकता कि इन्होंने श्रृंगार के अतिरिक्त अन्य काव्य अंगों का भी विवेचन किया है| बहुत से कवियों ने नीति और भक्ति तथा वीर भावना को आधार बनाकर काव्य रचना की है| इसके साथ-साथ इन कवियों ने संस्कृत की काव्यशास्त्रीय परंपरा का निर्वाह करते हुए अलंकार, रस, नायिका-भेद, ध्वनि आदि को भी अपने काव्य में स्थान दिया है| इसलिए  माना जा सकता है कि रीतिकालीन साहित्य पर संस्कृत की काव्य शास्त्रीय परंपरा का गहरा असर है, परंतु यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी जरुरी है कि हिंदी में रीति शास्त्र लिखने वाले प्रत्येक लेखक ने संस्कृत काव्यशास्त्र का पूरा अध्ययन नहीं किया था बल्कि हिंदी में लक्षण ग्रंथों की रचना करने वाले ये विद्वान पूर्णत संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ नहीं थे, परन्तु ऐसे कवि अपने आप को आचार्य कहते थे, ऐसे आचार्यों के संबंध में रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं- “हिंदी में लक्षण ग्रंथों की परिपाटी पर रचना करने वाले जो सैकड़ों कवि हुए हैं, आचार्य की कोटि में नहीं आ सकते, वे वास्तव में कवि ही थे, उनके अपर्याप्त लक्षण साहित्य शास्त्र का सम्यक बोध कराने में असमर्थ हैं|”७ अर्थात आचार्य शुक्ल ने ऐसे आचार्यों को मूलत; कवि ही माना है| 
रीतिकालीन साहित्य का वर्गीकरण तीन काव्य धाराओं में किया जाता है- रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त| रीतिबद्ध काव्यधारा  में केशव, मतिराम और पद्माकर आदि आते हैं| रीतिसिद्ध काव्यधारा में बिहारी का नाम लिया जाता है और रीतिमुक्त काव्य में घनानंद, बोधा, आलम और ठाकुर आदि लेखकों का नाम आता है|
            रीतिबद्ध काव्य धारा में उन कवियों को गिना जाता है जिन्होंने लक्षण ग्रंथों की परिपाटी पर काव्यांगों का लक्षण व उदाहरण देते हुए रीति ग्रंथों की रचना की है| इन कवियों का मुख्य उद्देश्य अपने काव्य शास्त्रीय ज्ञान का परिचय देना था| इस काव्यधारा में ऐसा भी वर्ग था जिनका लक्षणों व उदाहरणों पर समान रूप से अधिकार था| इन्होंने लक्षणों की स्वयं व्याख्या की और उदाहरण भी स्वयं ही रचे| कुछ आचार्यों ने जैसे कि कुलपति, देव आदि ने काव्य के सभी अंगों, काव्य-लक्षण, काव्य-हेतु, काव्य-प्रयोजन, काव्य की आत्मा आदि का विवेचन अपने ग्रंथों में किया है| ऐसे आचार्य को सर्वांग निरूपक आचार्य कहा गया है| कुछ आचार्यों ने काव्य के विशिष्ट अंगों पर अपना काव्य लिखा है इन्हें विशेषटांग आचार्य कहा गया है| जैसे मतिराम, भूषण आदि |
            रीतिसिद्ध कवि उन कवियों को कहा गया है जिन्होंने किसी भी लक्षण ग्रंथ की रचना तो नहीं कि यद्यपि उन्हें लक्षणों की पूरी जानकारी थी। जिसका उपयोग उन्होंने अपने काव्य ग्रंथों की रचना करते समय किया है। इस धारा के कवियों ने काव्यशास्त्र के सिद्धांत एवं लक्षण प्रस्तुत नहीं किए हैं। परंतु जो काव्य लिखा है वह पूर्णतया काव्यशास्त्र परिपाटी से मुक्त नहीं है। बिहारी इसी काव्य धारा के अंतर्गत आते हैं जिन्होंने किसी भी प्रकार के लक्षण ग्रंथों की रचना नहीं की परंतु फिर भी रीति परिपाटी की सभी रचनाएं उनकी बिहारी सतसई में मिलती है। रीति सिद्ध काव्य में केवल यही अंतर है कि जहां वे किसी विशिष्ट लक्षण से जुड़े हुए हैं, वहां यह काव्य शास्त्रीय नियमों का पालन करते हुए भी मुक्त है।
रीति मुक्त काव्य धारा में उन कवियों को शामिल किया गया है जिन्होंने रीति से मुक्त होकर स्वच्छंद रूप से काव्य सृजन किया है।इस काव्य धारा को स्वच्छंद काव्यधारा भी कहा गया है। रीतिमुक्त कवियों के लिए काव्य साधन नहीं था। इन्होंने कविता प्रयत्न करके नहीं लिखी बल्कि यह उनके हृदय से स्वत: ही फूट पड़ी है। रीतिमुक्त काव्य धारा के प्रमुख कवि घनानंद, ठाकुर, बोधा और आलम हैं |
              यह युग मुक्तक रचना का युग था|  कवित्त, सवैया और दोहे इस युग में खूब लिखे गए। कवि राजाश्रित होते थे। इसलिए इस युग की कविता अधिकतर दरबारी रही। जिसके फलस्वरूप इसमें व्यंजना का चमत्कार विशेष मात्रा तो मिलती है परंतु कविता साधारण जनता से विमुख भी हो गई।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

अलंकार का अर्थ एवं स्वरूप

                                      अलंकार

अलंकार का अर्थ एवं स्वरूप-
अलंकार संप्रदाय संस्कृत काव्य शास्त्र के छ: सम्प्रदायों (रस,  अलंकार, रीति,ध्वनि,वक्रोक्ति और औचित्य में से सबसे  प्राचीनतम संप्रदाय है|  अलंकारवादी  आचार्य - भामह से प्रारंभ होकर दंडी, रुद्रट, उदभट, अप्पय दिक्षित, केशव,पदमाकर, कुलपति मिश्र आदि सभी अलंकारवादी आचार्य हैं|  इन सभी ने काव्य के लिए  अलंकार को महत्त्वपूर्ण माना है| 
अलंकार का शाब्दिक अर्थ= अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना होता है – अलम + कार।  अलंकार का शाब्दिक अर्थ  ‘आभूषण’ होता है अर्थात् जो अलंकृत अथवा भूषित करता  है, वह अलंकार है | जिस प्रकार आभूषणों से नारी का लावण्य अर्थात सौन्दर्य बढ़ जाता है, उसी प्रकार अलंकार से कविता की शोभा बढ़ जाती है | कहने का तात्पर्य यह है कि शब्द तथा अर्थ की जिस विशेषता से काव्य का श्रृंगार होता है उसे ही अलंकार कहते हैं|
अलंकार  की व्युत्पत्तिपरक अर्थ='अलंकरोति इति अलंकारः' (जो सुशोभित करता है, वही  अलंकार है।) ‘अलंक्रियते अनेन इति अलंकार’ (जिसके द्वारा काव्य की शोभा होती है अथवा अलंकृत किया जाता है, वह अलंकार है|)  अर्थात  अलंकार काव्य का वह तत्व है जो काव्य को सुन्दर बनाता है|
लक्षण एवं  परिभाषाएं-
भरत- अलंकार का सर्वप्रथम उल्लेख भरत  के नाट्यशास्त्र में मिलता है जहाँ  उन्होंने वाचिक अभिनय का चमत्कृत करने के लिए उपमा, रूपक, यमक और दीपक आदि चार अलंकारों का उल्लेख मिलता है|
भामह- काव्यालंकार ग्रन्थ में उनका  विवेचन इतना व्यवस्थित है कि यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि भामह ही अलंकार के आदि प्रतिष्ठापक रहे होंगे | भामह ने अलंकारों को काव्य का प्रमुख अंग माना है | उनका मत है कि काव्य अलंकार के बिना ठीक उसी प्रकार सुशोभित नहीं होता जिस प्रकार बिना  आभूषणों के स्त्री - “न कान्त मपि निभूर्षम विभाति वनिता मुखं|”
दंडी- भामह के उपरांत आचार्य दंडी ने अपने ग्रन्थ काव्यादर्श में अलंकारों का विवेचन किया है | दंडी काफी उदार रहे हैं |इन्होंने अलंकार को काव्य का  शोभाकर धर्म माना हैं और कहा है की काव्य की शोभा सर्वथा अलंकार के आश्रित है | उन्होंने लिखा है-  “काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते |” 
वामन- काव्यालंकार सूत्र ग्रंथ के रचियता आचार्य वामन ने काव्य-गुणों को  शोभा का कारण  मानते हुए अलंकार को सौन्दर्य-वृद्धि करने वाला तत्त्व बताया है- ‘काव्य शोभाया: कर्तारो धर्मा: गुणा:’  (काव्यालंकार सूत्र)
अलंकार के भेद - अलंकार के मुख्यत: तीन भेद माने जाते हैं-
1.शब्दालंकार- जहाँ शब्दों में सौन्दर्य अथवा चमत्कार निहित होता है और उनके स्थान पर सामान अर्थ वाले पर्यायवाची शब्द रख देने से वह आकर्षण नष्ट हो जाता है| जैसे - अनुप्रास , यमक, श्लेष , वक्रोक्ति आदि अलंकार|
2.अर्थालंकार - जहाँ अलंकार का सौंदर्य शब्द पर निर्भर न कर उसके अर्थ पर निर्भर करता है और उनके स्थान पर सामान अर्थ वाले पर्यायवाची शब्द रख देने पर भी वह आकर्षण नष्ट नहीं होता है|  जैसे- उपमा , उत्प्रेक्षा , रूपक आदि |
3.उभयालंकार- जहाँ कवि की उक्ति में शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार समाविष्ट हो अत: ऐसे स्थलों पर एकाधिक अलंकार होने  के कारण उभयालंकार की स्थिति मानी जाती है| 
शब्दालंकार- शब्दालंकार से अभिप्राय है जहां काव्य का सौंदर्य शब्द में निहित होता है और शब्दालंकार में निम्न अलंकार आते हैं- अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति,  पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।

1. अनुप्रास अलंकार- 
यह एक शब्दालंकार हैं| जब किसी काव्य को सुंदर बनाने के लिए किसी एक या अधिक वर्णों  की बार-बार आवृति होती  है तो वहा अनुप्रास अलंकार कहलाता है। किसी विशेष वर्ण की बार-बार आवृति से वाक्य सुनने में सुंदर लगता है। भाषा में लालित्य ,सरसता और संगीत्मकता उत्पन्न हो जाती है | जैसे -
चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल थल में। (वृत्यानुप्रास अलंकार)
          दिये गए उदाहरण में  ‘च’ वर्ण की बार -बार आवृति हो रही है और आवृति होंने  से वाक्य का सौन्दर्य बढ़ रहा है। अतः यह अनुप्रास अलंकार का उदाहरण होगा।
अनुप्रास अलंकार के पांच भेद हैं : 
अनुप्रास की परिभाषा में कहा गया है कि जहाँ किसी एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है तो वहाँ पर अनुप्रास अलंकार होता है, अब यह आवृत्ति कितने प्रकार की होती है? किस तरह से होती है, कैसे होती है उसी के आधार पर अनुप्रास के भेद किए गए हैं। 
छेका अनुप्रास छेकानुप्रास अलंकार- जहाँ एक या अनेक व्यजनों की एक बार स्पष्टत: एवं  क्रमश: आवृति हो। इसमें किसी व्यंजन की या वर्ण की, वर्ण  एक भी हो सकता है , दो या तीन वर्ण भी हो सकते हैं, उनकी केवल एक बार  ही आवृत्ति होती है, बार-बार आवृत्ति नहीं, केवल एक बार आवृत्ति होती है। जैसे- अति आनंद मगन महतारी  राधा के बर बैन सुनी। यहां  अति औरआनंद में अ की और मगन, महतारी में म की और बार, बैन में ब की एक बार आवृत्ति हुई है तो यहाँ पर छेका अनुप्रास कहलाएगा| 
श्रुत्यानुप्रास अलंकार- जहाँ मुख के उच्चारण स्थान से संबंधित विशिष्ट वर्णों के साम्य हो |  हमारे मुख के अंदर विभिन्न उच्चारण अवयव हैं, जब हम स्वरों का उच्चारण करते हैं तो हमारी जिव्हा मुख के अंदर किसी ना किसी भाग से टकराती है, कभी दांत से टकराती है, तो कभी तालु या ओष्टय से टकराती है तो वह जहां हो टकराती है वह उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहलाता है, वर्णों के उच्चारण स्थान जो हैं, वे निश्चित होते हैं तो एक ही उच्चारण स्थान से उच्चारित होने वाले वर्णों का जब किसी चरण में एक साथ प्रयोग किया जाता है जब उनकी आवृत्ति काव्य में सौंदर्य उत्पन्न करती है और तब वह श्रुत्यानुप्रास  अलंकार कहलाता है। जैसे- तुलसीदास सीदत निसदिन देखत तुम्हारी निठुराई। (त वर्ग कई वर्ण आ गए हैं , त, द, थ, न आदि सब एक ही स्थान से उच्चरित होते हैं।) 
वृत्यानुप्रास अलंकार-  जहाँ एक या अनेक व्यंजनों की अनेक बार स्पष्टत: एवं  क्रमश: आवृत्ति हो। जब एक वर्ण की एक से अधिक बार आवृत्ति हो तब वहां वृत्यानुप्रास कहलाता है जहां एक या अनेक वर्ण की अनेक बार आती हो तो वहां वृतानुप्रास अलंकार होता है। जैसे- चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल थल में,  तो यहाँ  च वर्ण  की आवृत्ति बार-बार हुई है। इसी तरह 'तरनि तनुजा तट तमाल  तरूवर बहु छाए।' में त वर्ण की  बार-बार आवृत्ति हुई है तो यहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार है| 
लाटानुप्रास अलंकार-  जहाँ  शब्द, अर्थ तथा वाक्य की आवृत्ति की हो वहां लाटानुप्रास होता है। जहां समान अर्थ वाले शब्दों की या  वाक्यों की आवृत्ति हो तो वहां पर लाटानुप्रास  अलंकार होता है। अभी हम बात कर रहे थे वर्णों की, व्यंजनों  की एक या बार-बार आवृत्ति की, पर लाटानुप्रास में शब्दों की या पूरे पूरे वाक्य की आवृत्ति होती है किंतु वे अन्वय या स्वर/ व्यंजन बलाघात के कारण वे अलग अर्थ देंते हैं, अर्थात अर्थ में भिन्नता आ जाती है। लाटानुप्रास को उदाहरण से समझे, जैसे पंक्ति है- 'पूत कपूत तो का धन संचय, पूत सपूत तो का धन संचय।' तो  दोनों चरणों में सभी शब्द समान हैं, केवल क और स का अंतर है, लेकिन अर्थ में अंतर आ गया। कपूत कहने से अर्थ है नालायक पुत्र और सपूत का मतलब है लायक पुत्र। अर्थ में परिवर्तन आ गया है कि पुत्र यदि लायक है तो जरूरत क्या धन संचय करने की और नालायक है तो फिर भी घन संचय की क्या आवश्यकता है क्योंकि वह सारे पैसे उड़ा देगा। तो इन पंक्तियों में पूरा अर्थ बदल गया है।अन्त्यानुप्रास अलंकार- जहाँ पद के अंत के एक ही वर्ण, एक ही स्वर या व्यंजन  की साम्यमूलक आवृत्ति होने से तुक बनती हो। जैसे- अबला जीवन तेरी यही कहनी, आँचल में दूध, आँखों में पानी। यहां चरण के अंत में कहानी और पानी शब्द आया है अतः तुक की समानता है।
2. यमक अलंकार - यह भी एक शब्दालंकार  हैं | जिसका अर्थ है - युग्म अथवा जोड़ा | जहाँ एक जैसे शब्दों की आवृति हो लेकिन भिन्न-भिन्न अर्थ दे रहें  हो , वहां यमक अलंकार होता है | जैसे -‘कनक कनक ते सौगुनी मादकता अधिकाय। या खाए बौरात नर या पा बौराय।’ इसमें ‘कनक’ शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है। प्रथम कनक का अर्थ ‘सोना’ और दुसरे कनक का अर्थ ‘धतूरा’ है। अतः ‘कनक’ शब्द का दो बार प्रयोग और भिन्नार्थ के कारण उक्त पंक्तियों में यमक अलंकार की छटा दिखती है। यमक अलंकार के दो भेद हैं- 1. अभंग - जहाँ सम्पूर्ण शब्द की भिन्न अर्थ में आवृति होती है|  उदाहरण से समझिए-  'तो पर बारौं उरबसी  सुनी राधिके  सुजानतू मोहन के उरबसी  ह्वै उरबसी समान।' यहां उरबसी के तीन भिन्न अर्थ हैं - पहला उर्वशी नामक अप्सरा, दूसरा ह्रदय में बसी हुई, और तीसरा गले में पहनने वाला आभूषण 2. सभंग -जहाँ शब्द के किसी भाग की आवृति होती है | और जहाँ  शब्द को तोड़कर या संधि विच्छेद से भिन्न अर्थ निकले, उदाहरण से समझिए- 'नेह सरसावन में मेह  बरसावन में सावन में झूलिबो सुहावनो लगत हैं।' यहां सावन शब्द का प्रयोग तीन बार हुआ है, किंतु सरसावन बरसावन में शब्द तोड़कर सावन शब्द लेना पड़ता है। इसलिए यहां पर सभंग यमक अलंकार है।
3 .श्लेष अलंकार- श्लेष का अर्थ होता है चिपका हुआ या मिला हुआ।  जब एक ही शब्द में हमें अनेक अर्थ मिलते हों, या जब किसी शब्द का प्रयोग एक बार ही किया जाता है लेकिन उससे अर्थ कई निकलते हैं, तब  उस समय श्लेष अलंकार होता है। जैसे:  रहिमन पानी राखिये,बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून। यहाँ रहीम ने पानी को तीन अर्थों में प्रयोग किया है : पानी का पहला अर्थ मनुष्य के संदर्भ में - विनम्रता से है| पानी का दूसरा अर्थ मोती के सन्दर्भ में आभा, तेज या चमक से है| पानी का तीसरा अर्थ जल से है ,जिसे चून से जोड़कर दर्शाया गया है। श्लेष अलंकार के भी दो भेद हैं - 1.अभंग (एक सम्पूर्ण शब्द से , एक बार प्रयुक्त होने पर भी एकाधिक अर्थ निकलते हों |)  जैसे-जो रहीम गति दीप की कुल कपूत की सोय बारे उजियारे करें, बढ़े अंधेरो होय यहां बारे, उजियारे, बढे,अंधेरों  शब्दों में श्लेष है। कवि दीपक और कपूत का वर्णन कर रहा है कि जैसे दीपक को जब जलाते हैं तो हर तरफ प्रकाश फैल जाता है और जब दीपक बढ़ता है अर्थात बुझ जाता है तो अंधेरा हो जाता है और ऐसे ही कपूत की स्थिति होती है घर में जब वह पुत्र पैदा होता है तो खुशियां मनाई जाती हैं , मिठाई बांटी जाती है और जैसे-जैसे वह बड़ा होता है और उसके बुरे कामों का पता चलता है तो  बहुत दुःख होताहै अर्थात जिसे घर का चिराग समझा जाता था, बड़ा होने पर वह उस घर को प्रकाश देने वाला अर्थात उस घर के यश व समृद्धि को बढ़ाने वाला नहीं साबित हुआ । बारे का एक अर्थ होता है बाल्यकाल और दूसरा अर्थ होता है जलाना, उजियारे का अर्थ होता है माता-पिता को आनंदित करना और दूसरा अर्थ होता है प्रकाश करना  बड़े का एक अर्थ होता है बड़ा होना और दूसरा अर्थ होता है बुझ जाना, अंधेरों का एक अर्थ होता है दुख और दूसरा होता है अंधकार , तो यहां शब्दों को बिना तोड़े, बिना अलग-अलग किए यहाँ अलग-अलग अर्थों की प्रतीति हो रही है| इसलिए यहां पर अभंग श्लेष अलंकार है। 2. सभंग- (एक बार प्रयुक्त शब्द के टुकड़े करके एकाधिक अर्थ की प्राप्ति |) उदाहरण देखिए-चिर जीवौ जोरी जुरै क्यों न स्नेह गंभीर को घटि  ए वृषभानुजा , वे हलधर के वीर (बिहारी ) यहां वृषभानु जा और हलधर के वीर शब्दों में श्लेष अलंकार है और इन दोनों शब्दों को तोड़कर ही या अलग अलग करके ही हम अलग-अलग अर्थों को ले सकते हैं। बिना तोड़े भिन्न भिन्न अर्थों की प्रतीति नहीं हो सकती। इसलिए यहां पर सभंग  अलंकार है|
4. वक्रोक्ति अलंकार- वक्रोक्ति में काकु या श्लेष के द्वारा वक्ता  वाक्य का अभिप्रेत अर्थ ग्रहण न कर श्रोता उससे कोई अन्य अर्थ   ग्रहण करता है। अर्थात जहाँ श्रोता द्वारा किसी उक्ति का अर्थ जान-बूझकर वक्ता के  अभिप्राय से अलग लिया जाता है, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। उदाहरण-  'एक कबूतर देख हाथ में पूछा कहां पर है उसने कहा अ पर कैसा वह उड़ गया सपर है|' (ये उदाहरण श्लेष वक्रोक्ति अलंकार का है)  अथवा 'मैं सुकुमारी, नाथ बन जोगु ।तुम ही उचित तप, मो कहँ भोगू|' (ये उदाहरण काकु वक्रोक्ति अलंकार   का है)  वक्रोक्ति अलंकार के दो भेद हैं-1 श्लेष वक्रोक्ति अलंकार 2 काकु वक्रोक्ति अलंकार| 
5. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार- पुनरुक्ति प्रकाश में शब्द दो बार आया है तो अर्थ एक ही हो या लिया जाता है|उदहारण - 'पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया  न कोय ' यहाँ पढ़ि पढ़ि शब्द दो बार आया है दोनों बार पढ़ने के अर्थ में ही आया है, अर्थात जहाँ शब्द क्रमशः दो बार शब्द आये और उस शब्द काअलग अलग अर्थ न होकर एक ही अर्थ निकलता हो, वहां  पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार होता है |
अर्थालंकार- 
जहाँ अलंकार का सौंदर्य शब्द पर निर्भर न कर उसके अर्थ पर निर्भर करता है और उनके स्थान पर सामान अर्थ वाले पर्यायवाची शब्द रख देने पर भी वह आकर्षण नष्ट नहीं होता है| 

अर्थालंकारों के उपभेद- 
  • समानतामुलक अथवा सादृश्य मूलक अर्थालंकार-मूल में उपमेय और उपमान की समता सादृश्य का भाव | उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, उपमेयोपमा| 
  • विरोध मूलक अर्थालंकार- परस्पर विरोध का आभास होता है किन्तु वास्तव में विरोध नहीं होता| 
  • श्रंखलामूलक अर्थालंकार- वस्तुओं आदि का क्रमिक, श्रंखला बद्ध वर्णन होता है| 
  • न्याय मूलक अर्थालंकार- तर्क, उदहारण, लोक-प्रमाण के माध्यम से कथन में रोचकता का विधान होता है|
  • व्यंग्यार्थ मूलक अर्थालंकार- वाच्यार्थ की अपेक्षा व्यग्यार्थ की प्रतीति पर बल रहता है|  
समानतामुलक अथवा सादृश्य मूलक अर्थालंकार
1.उपमा अर्थालंकार- उपमा के अंग - उपमेय, उपमान ,साधारण धर्म , वाचक शब्द |उपमा के मुख्य रूप से तीन भेद किए जाते हैं - 1.पूर्णोपमा -जहां उपमा के चारों अंगों का उल्लेख किया जाए जैसे सीता का मुख चंद्रमा के समान सुंदर है यहां पर सीता उसमें है चंद्रमा उपमान है समान  वाचक शब्द है और सुंदर साधारण धर्म है| 2.लुप्तोपमा- जहां पर इन चारों अंगों में से किसी एक या दो अंगो का या तीन अंगों का उल्लेख न किया जाए तो वहां पर लुप्तोपमा अलंकार होगा जैसे- सीता का मुख चंद्रमा के समान है। यहां साधारण धर्म सुंदर का लोप हो गया है इसलिए यहां पर लुप्तोपमा अलंकार है। 3. मालोपमा-  जहां पर एक उपमेय की अनेक उपमानों से समानता दिखाई जाए अर्थात एक उपमेय के लिए अनेक उपमानों का प्रयोग किया जाए तो वहां पर मालोपमा अलंकार होता है जैसे सीता का मुख कमल, चंद्रमा और रति के समान सुंदर है। यहां मुख उपमेय की सुंदरता की तुलना तीन उपमानो कमल, चंद्रमा और रति से की गई है इसलिए यहां पर मलोपमा अलंकार है। अनेक उपमानों की एक माला सी बन जाती है।
2. उपमेयोपमा -जहां उपमेय और उपमान एक दूसरे के उपमान और उपमेय बन जाते हैं, अर्थात दो वस्तुओं को एक दूसरे के सदृश इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके समान कोई तीसरी वस्तु नहीं होती| जैसे- रमणी- मुख शशि तुल्य है, शशि रमणी मुख तुल्य| इसी तरह से एक उदाहरण और देखते हैं- भरत राम सम, राम भरत सम| इस अलंकार में पहले जो उपमेय होता है वह अगले चरण में उपमान बन जाता है और जो परम चरण में उपमान होता है वह अगले चरण में उपमेय बन जाता है |
3. उत्प्रेक्षा अलंकार- उत्प्रेक्षा अलंकार में उपमेय में उपमान की संभावना की जाती है कवि जहाँ अपने काव्य में चमत्कार लाने या सौंदर्य लाने के लिए उपमेय में उपमान की कल्पना  कर लेता है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।  उत्प्रेक्षा अलंकार कवि की कल्पना से अधिक जुड़ा हुआ है। जहां गुण, धर्म आदि के आधार पर भिन्नता जानते हुए भी कि उपमान और उपमेय भिन्न है, तो भी उपमेय में उपमान की संभावना जहां की जाती है वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है और उत्प्रेक्षा अलंकार में वाचक शब्द इव, जनों, जानो, मनो, मानो, ज्यों, जैसे, जनु आदि वाचक शब्दों   का प्रयोग किया जाता है। एक उदाहरण से समझते हैं। 'नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहा मृदुल अधखुला अंग, खिला हो ज्यों बिजली का फूल मेघ बन बीच गुलाबी रंग।' यहाँ पहली दो पंक्तियों में उपमेय अर्थात प्रस्तुत का वर्णन है आगे की दो पंक्तियों में अप्रस्तुत का वर्णन है। कवि यहां श्रद्धा के सौंदर्य को लेकर कल्पना करता है कि जैसे वह बादलों के बीच बिजली का गुलाबी रंग का फूल है। यहाँ ज्यों वाचक शब्द है  श्रद्धा के परिघान और सौंदर्य को लेकर कल्पना करता है।  वस्तु, हेतु या कारण और फल के आधार पर उत्प्रेक्षा के तीन भेद किये गए हैं| 1.वस्तूत्प्रेक्षा - जहाँ एक वस्तु में दूसरी वस्तु की सम्भावना या कल्पना की जाए। जैसे- 'सोहत ओढ़े पीत पट श्याम सलोने गात।मनहुँ नील मनि सैल पर आतप परयौ प्रभात।' कृष्ण के सौंदर्य का वर्णन है और उनका कैसा रंग है -साँवला रंग है तो स्याम सलोने रंग पर पीले वस्त्र ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे प्रभात काल की धूप हो इस समय की धूप सुखदायक होती है और प्रभु का रूप भी सुखदायक है। 2.हेतूत्प्रेक्षा- हेतु से अभिप्राय है कारण। जहां अकारण में कारण की संभावना की जाए इसमें वस्तु का कार्य स्वाभाविक होता है परन्तु उसे कारण मान लिया जाता है।जैसे अरुण भये कोमल चरण भुवि चलने ते मानु।  यहाँ धरती  पर चलने के कारण प्रभु के कोमल चरण  मानो  लाल हो गए हैं देखिए यहाँ पर चारणों के  लाल होने का कारण धरती पर चलना माना गया है जबकि चरण तो लाल ही होते हैं अतः अकारण में कारण मान लिया गया है। 3.फलोत्प्रेक्षा- जो वास्तव में फल न हो उसको फल मानकर उत्प्रेक्षा की जाए जैसे- ताड का वृक्ष मानों आकाश को छूने के लिए लम्बा हो गया है। एक और उदाहरण देखते हैं - 'नित्य ही नहाता है चंद्रमा क्षीर सागर में| सुंदरी! मानो तुम्हारे मुख की समता के लिए।' यहाँ  चन्द्रमा नित्य ही अस्त होता है क्षीर सागर में ,लेकिन कवि कल्पना करता है कि हे सुंदरी! चंद्रमा तुम्हारे मुख सौंदर्य से समता करने के लिए अर्थात तुम्हारे जितना सुंदर बनने के लिए हर रोज सागर में नहाने जाता है।

3. रूपक अलंकार-
जब गुण की अत्यंत  समानता के कारण उपमेय को ही उपमान बता दिया जाए यानी उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप कर दिया जाता है, तब वह रूपक अलंकार कहलाता है। रूपक अलंकार में उपमान और उपमेय में कोई अंतर नहीं दिखायी पड़ता है जैसे - 'बीती विभावरी जागरी ! अम्बर पनघट में डुबो रही तारा घाट उषा नगरी'। -जयशंकर प्रसाद| रूपक अलंकार के भेद -1.निरंग रूपक- निरंग रूपक में उपमेय में अन्य अंगों के बिना उपमान का आरोप होता है जैसे - 'लोचन कमल खिल गए सहसा|' 2.सांग रूपक- सॉन्ग का अर्थ होता है स+ अंग अर्थात संबद्ध वस्तुओं के साथ या सहित।  सांग रूपक में प्रधान उपमेय के ऊपर ही नहीं बल्कि उसके अंगों पर भी उपमान और उसके अंगों का आरोप किया जाता है। जैसे- "बीती विभावरी जाग री।अंबर पनघट में डुबो रही, तारा घट उषा नागरी।" यहां दिए गए उदाहरण में उषा उपमेय और उसके अंगों पर नागरी उपमान का अंगों सहित आरोप किया गया है। उषा के अंग अंबर, तारा उपमेय हैं और पनघट व घट का उपमान के रूप में वर्णन किया गया है। इसलिए उषा का अंग सहित वर्णन होने से यहां सांग रूपक है। इसी तरह से सांग रूपक का  एक और उदाहरण देखा जा सकता है- "उदित उदयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग| बिकसे संत सरोज सब हरसे लोचन भृंग।"  (तुलसीदास)  यहां राम उपमेय है और उनसे संबंधित अन्य वस्तुओं जैसे मंच संत लोचन सभी में उपमान के रूप में बाल सूर्य और उदयाचल कमल भवरें का आरोप भी किया गया है इसलिए यहां सांग रूपक है। 3. परम्परित रूपक- जहाँ एक आरोप दूसरे आरोप का कारण बन जाये यहाँ दो रूपकहोते हैं और दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए होकर एक रूपक दूसरे रूपक का कारण बन जाता है।
व्यतिरेक अलंकार= व्यतिरेक का अर्थ होता है उत्कृष्ट अर्थात जहाँ किसी गुण विशेष या किसी विशेष योग्यता के कारण उपमान को श्रेष्ठ या उत्तम बताया जय तब वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है। देखिए हम हमेशा उपमान को उपमेय से श्रेष्ठ बताते हैं लेकिन व्यतिरेक अलंकार में हम उल्टा पाते हैं अर्थात उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ । अर्थात मुख को चंद्रमा से भी श्रेष्ठ बताए जैसे - "स्वर्ग कि तुलना उचित  ही है यहाँ, किन्तु सुर सरिता कहाँ सरयू कहाँ।"


अपह्नुति अलंकार

जब किसी वस्तु या बात को छिपा कर उसके स्थान पर किसी अन्य झूठी वस्तु या बात की स्थापना की जाती है तो वहाँ पर अपहनुति अलंकार होता है। हम कह सकते हैं कि उपमेय का निषेध करके उसके स्थान पर उपमान का आरोप करने पर अपहनुति अलंकार होता है। जैसे-
बन्धु न होय मोर यह काला। यहाँ सुग्रीव ने राम से अपने भाई बाली के विषय में सच्ची बात अर्थात उसका बन्धु होना या भाई होना छिपाया और कहा कि यह मेरा काल है ..यह झुठ की स्थापना की गई है।अपह्नुति अलंकार के छ: भेद हैं -
शुद्धापहनुति
हेत्वापहनुति
पर्यस्तापहनुति
भ्रांतापहनुति
छेकापहनुति
कैतवापहनुति
अतिश्योक्ति अलंकार-
अतिश्योक्ति में किसी कथन को सामान्य रूप में प्रस्तुत न कर उसे बहुत बाधा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है , अर्थात जब किसी वस्तु, व्यक्ति आदि का वर्णन बहुत बाधा चढ़ा कर किया जाए तब वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है।वहां अतिश्योक्ति अलंकार होता है |जैसे- ‘हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई गए निशाचर भाग।’
अतिश्योक्ति अलंकार के भेद-
रूपकातिश्योक्ति 
भेदकातिश्योक्ति
संबंधातिश्योक्ति
अक्रमतिश्योक्ति
चपलातिश्योक्ति
अत्यंतातिश्योक्ति 
निदर्शना अलंकार-
निदर्शना का अर्थ होता है- कुछ रचकर दिखाना | जब उपमेय और उपमान में सादृश्यॉ का आरोप कर दोनों में बिंब-प्रतिबिंब का भाव प्रकट किया जाए| अथवा जब दो वस्तुओं या दो कार्यों को उनकी समानता सूचित करने के लिए एक बताया जाए जबकि वे एक हो तो निदर्शना अलंकार है|
विरोधाभास अलंकार- 
जहाँ विरोध न होने पर भी कथन में विरोध की प्रतीति हो, किन्तु अर्थ को समझने के उपरांत उस विरोध की प्रतीति समाप्त हो जाये वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है|जैसे- या अनुरागी चित्त की गति समुझै नहिं कोइ। ज्यौं-ज्यौं बूड़ै स्याम रँग त्यौं-त्यौं उज्जल होइ’ (बिहारी)|
विभावना अलंकार-
विभावना का अर्थ है -विशेष प्रकार का विचार | जहाँ कारण के अभाव में कार्य के होने का वर्णन हो वहां विभावना अलंकार  होता है जैसे -'निदंक नियरे राखिये आंगन कुटि छबाय, बिनु पानी बिनु साबुना निर्मल करे सुभाय'- (संत कबीरदास)
विशेषोक्ति अलंकार- 
जहाँ  प्रसिद्ध कारण  के विद्यमान होने पर भी कार्य के न होने का वर्णन हो वहां  विशेषोक्ति अर्थालंकार होता है| जैसे - "देखो दो-दो मेघ  बरसते,  मैं प्यासी की प्यासी।"
अत्युक्ति अलंकार-
इस अलंकार में रोचकता लाने के लिए किसी योग्य पुरुष के विषय में बढ़ी-चढ़ी हुई झूठी बात कही जाती है | तब अत्युक्ति अलंकार होता है | इस अलंकार के  वीरता, सुन्दरता , उदारता , कीर्ति  की अत्युक्ति आदि भेद किए जाते हैं |
अभ्यास के लिए प्रश्न-
1.अलंकार से आप क्या समझते  हैं ? किन्हीं दो शब्दालंकारों  और दो अर्थालंकारों का उल्लेख कीजिए|
2. संस्कृत के अलंकारवादी आचार्यों द्वारा दी गई अलंकार की परिभाषाओं या लक्षणों पर प्रकाश डालिए |
3. शब्दालंकार की परिभाषा बताते हुए  प्रमुख  शब्दालंकारों  का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए|  4.अर्थालंकार की परिभाषा बताते हुए  प्रमुख  अर्थालंकारों  का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए|
5.किन्हीं तीन अलंकारों के लक्षण-उदाहरण लिखिए-  अनुप्रास अलंकार, वक्रोक्ति अलंकार, श्लेष अलंकार,  रूपक अलंकार, विभावना अलंकार|
सन्दर्भ ग्रंथ सूची - 
भारतीय काव्यशास्त्र , डॉ. सत्यदेव चौधरी
भारतीय काव्यशास्त्र , डॉ. हर्ष बाला शर्मा
भारतीय काव्यशास्त्र , सत्य नारायण शर्मा

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