माखनलाल चतुर्वेदी का साहित्यिक परिचय
माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 में मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में हुआ था| उनके पिता का नाम नंद लाल चतुर्वेदी था ,जो गांव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे| प्राइमरी शिक्षा के बाद इन्होंने घर पर ही संस्कृत, बंगला, अंग्रेजी और गुजराती आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया | माखनलाल चतुर्वेदी का हिंदी साहित्य जगत में महत्त्वपूर्ण स्थान है | वे हिंदी के प्रसिद्ध कवि, लेखक और पत्रकार, निबंधकार थे| उनकी रचनाएं हिंदी साहित्य में अत्यंत लोकप्रिय हुई| उन्होंने प्रभा और कर्मवीर जैसे प्रसिद्ध पत्रों का संपादन किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ जोरदार प्रचार किया| माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने पत्रों के माध्यम से नई पीढ़ी को गुलामी की जंजीरों को तोड़ कर बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया | स्वाधीनता के बाद उनको मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के लिए भी चुना गया था लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया |
माखनलाल चतुर्वेदी ने बीसवीं सदी के सबसे पहले दशक में ही कविता लिखना शुरु कर दिया था| लेकिन आजादी के संघर्ष में सक्रियता के साथ उनका लेखन परवान चढ़ा| माखनलाल चतुर्वेदी सच्चे देश प्रेमी थे| उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया जेल भी गए | 1924 ईस्वी में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद इन्होंने प्रताप नामक पत्र का संपादन भी किया| माखनलाल चतुर्वेदी जैसा बोलते थे वैसा ही लिखते थे| उनका कवित्व उनके भाषणों में साफ दिखाई देता था | ऐसे व्यक्ति को कलम के धनी या वाणी के धनी कहने से काम नहीं चलता शायद कोई शब्द उनकी व्याख्या नहीं कर सकता | वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, स्वाभिमानी और स्पष्ट वादी होने के साथ-साथ भावुक भी थे, यही कारण है कि उनकी काव्य रचनाओं में जहां एक और आग है तो दूसरी ओर करुणा की भागीरथी भी बहती दिखाई देती है| कुल मिलाकर माखनलाल चतुर्वेदी ने त्याग, बलिदान, देशभक्ति का अनूठा संगम हिंदी काव्य सरिता को प्रदान किया है| शब्द उनकी भावनाओं का अनुगमन करते प्रतीत होते हैं| आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में माखनलाल चतुर्वेदी का साहित्यिक योगदान उल्लेखनीय है|
मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र ने उनका सार्वजनिक सम्मान भी किया था| माखनलाल चतुर्वेदी गांधीवादी थे, बावजूद इसके वे किसी सीमा में बंदे नहीं थे, वे विद्रोही थे, वैष्णव मधुर साधना और समर्पण आदि तो उनमें था ही इसके साथ-साथ उन पर सूफी प्रभाव भी था | उन्होंने रूस की समाजवादी क्रांति के समर्थन में कर्मवीर में लिखकर एक सामाजिक कार्यकर्त्ता की भूमिका निभाई |
साहित्य अकादमी पुरस्कार की स्थापना होने पर माखनलाल चतुर्वेदी को हिंदी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार दिया गया |पुष्प की अभिलाषा और अमर राष्ट्र जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता इस महाकवि के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय में सन 1959 में डी.लिट की मानद उपाधि से विभूषित किया| 1963 में भारत सरकार ने पदम भूषण से भी माखनलाल चतुर्वेदी को अलंकृत किया| 10 सितंबर 1967 को राष्ट्रभाषा हिंदी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में माखनलाल चतुर्वेदी ने यह अलंकरण लौटा दिया| 1968 ईस्वी में माखनलाल चतुर्वेदी इस दुनिया को छोड़ कर चले गए |
रचनाएँ -
हिमकिरीटिनी, हिम तरंगिणी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूंजे धरा, बीजुरी काजल आँज रही आदि इनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ हैं। कृष्णार्जुन युद्ध, साहित्य के देवता, समय के पांव, अमीर इरादे :गरीब इरादे आदि इनकी प्रसिद्ध गद्यात्मक रचनाएँ हैं |
माखनलाल चतुर्वेदी ने खड़ी बोली में लिखा है | उनकी भाषा बहुत सरल है | उन्होंने ज्यादातर प्रचलित शब्दों का ही प्रयोग किया है | कुछ कासंग्रहों में संस्कृत निष्ट हिंदी का भी प्रयोग किया है |
माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 में मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में हुआ था| उनके पिता का नाम नंद लाल चतुर्वेदी था ,जो गांव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे| प्राइमरी शिक्षा के बाद इन्होंने घर पर ही संस्कृत, बंगला, अंग्रेजी और गुजराती आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया | माखनलाल चतुर्वेदी का हिंदी साहित्य जगत में महत्त्वपूर्ण स्थान है | वे हिंदी के प्रसिद्ध कवि, लेखक और पत्रकार, निबंधकार थे| उनकी रचनाएं हिंदी साहित्य में अत्यंत लोकप्रिय हुई| उन्होंने प्रभा और कर्मवीर जैसे प्रसिद्ध पत्रों का संपादन किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ जोरदार प्रचार किया| माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने पत्रों के माध्यम से नई पीढ़ी को गुलामी की जंजीरों को तोड़ कर बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया | स्वाधीनता के बाद उनको मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के लिए भी चुना गया था लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया |
माखनलाल चतुर्वेदी ने बीसवीं सदी के सबसे पहले दशक में ही कविता लिखना शुरु कर दिया था| लेकिन आजादी के संघर्ष में सक्रियता के साथ उनका लेखन परवान चढ़ा| माखनलाल चतुर्वेदी सच्चे देश प्रेमी थे| उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया जेल भी गए | 1924 ईस्वी में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद इन्होंने प्रताप नामक पत्र का संपादन भी किया| माखनलाल चतुर्वेदी जैसा बोलते थे वैसा ही लिखते थे| उनका कवित्व उनके भाषणों में साफ दिखाई देता था | ऐसे व्यक्ति को कलम के धनी या वाणी के धनी कहने से काम नहीं चलता शायद कोई शब्द उनकी व्याख्या नहीं कर सकता | वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, स्वाभिमानी और स्पष्ट वादी होने के साथ-साथ भावुक भी थे, यही कारण है कि उनकी काव्य रचनाओं में जहां एक और आग है तो दूसरी ओर करुणा की भागीरथी भी बहती दिखाई देती है| कुल मिलाकर माखनलाल चतुर्वेदी ने त्याग, बलिदान, देशभक्ति का अनूठा संगम हिंदी काव्य सरिता को प्रदान किया है| शब्द उनकी भावनाओं का अनुगमन करते प्रतीत होते हैं| आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में माखनलाल चतुर्वेदी का साहित्यिक योगदान उल्लेखनीय है|
मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र ने उनका सार्वजनिक सम्मान भी किया था| माखनलाल चतुर्वेदी गांधीवादी थे, बावजूद इसके वे किसी सीमा में बंदे नहीं थे, वे विद्रोही थे, वैष्णव मधुर साधना और समर्पण आदि तो उनमें था ही इसके साथ-साथ उन पर सूफी प्रभाव भी था | उन्होंने रूस की समाजवादी क्रांति के समर्थन में कर्मवीर में लिखकर एक सामाजिक कार्यकर्त्ता की भूमिका निभाई |
साहित्य अकादमी पुरस्कार की स्थापना होने पर माखनलाल चतुर्वेदी को हिंदी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार दिया गया |पुष्प की अभिलाषा और अमर राष्ट्र जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता इस महाकवि के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय में सन 1959 में डी.लिट की मानद उपाधि से विभूषित किया| 1963 में भारत सरकार ने पदम भूषण से भी माखनलाल चतुर्वेदी को अलंकृत किया| 10 सितंबर 1967 को राष्ट्रभाषा हिंदी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में माखनलाल चतुर्वेदी ने यह अलंकरण लौटा दिया| 1968 ईस्वी में माखनलाल चतुर्वेदी इस दुनिया को छोड़ कर चले गए |
रचनाएँ -
हिमकिरीटिनी, हिम तरंगिणी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूंजे धरा, बीजुरी काजल आँज रही आदि इनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ हैं। कृष्णार्जुन युद्ध, साहित्य के देवता, समय के पांव, अमीर इरादे :गरीब इरादे आदि इनकी प्रसिद्ध गद्यात्मक रचनाएँ हैं |
माखनलाल चतुर्वेदी ने खड़ी बोली में लिखा है | उनकी भाषा बहुत सरल है | उन्होंने ज्यादातर प्रचलित शब्दों का ही प्रयोग किया है | कुछ कासंग्रहों में संस्कृत निष्ट हिंदी का भी प्रयोग किया है |