हिंदसा

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

घनानंद की कविता का प्रतिपाद्य

                   घनानंद की कविता का प्रतिपाद्य
 घनानंद रीतिकाल की रीति मुक्त काव्य धारा के स्वच्छंद प्रेम के कवि हैं। उनके कविता में भावों की विविधता है और  उन सभी भावों में श्रृंगार और प्रेम ही सर्वत्र समाया हुआ है। आलोचकों का मानना है कि रीतिकाल यदि श्रृंगार काल है तो घनानंद उस श्रृंगार के तिलक हैं ।  घनानंद अपने काव्य में प्रेम की वियोग जन्य  पीड़ा का वर्णन करते हैं । वे अपने को प्रेम में चातक पक्षी  की तरह तरसता हुआ महसूस करते हैं। उनकी यह पीड़ा कविता में मार्मिक रूप में  व्यक्त हुई है। घनानंद का कहना है कि बादल तो बरसात में ही बरसते हैं लेकिन उनकी आंखें प्रेमी के वियोग में नित्य ही बरसती रहती हैं । वे अपने प्रेम के सामने मछली के प्रेम को भी कुछ नहीं समझते क्योंकि मछली अपने प्रिय 'पानी' के वियोग में प्राण त्याग देती है, इससे उसका प्रेमी कलंकित होता है । .. वे अपनी प्रेमिका को समझाते हुए कहते हैं कि प्रेम का मार्ग बड़ा सीधा है, इसमें चालाकी नहीं चलती। घनानंद कहते हैं कि यह तुम्हारा कौन-सा प्रेम का व्यवहार है कि लेते तो मन भर हो और देते छटांक भर भी नहीं, यानी इतने बड़े प्रेम का कोई प्रत्युत्तर नहीं देते। घनानंद के लिए प्रेम-प्रसंग बहुत अधिक सुख देने वाला होता है उससे उसकी आत्मा और शरीर के कष्ट दूर हो जाते हैं । सुजान का रूप अति  सुंदर है। उसका मुख, उसकी तरुणाई, उसका अंग सौंदर्य, वस्त्र आभूषण सब आनंद देने वाले हैं। उसकी छवि चकित कर देने वाली है। सुजान के रूप का प्रभाव ऐसा है कि कवि को नींद भी नहीं आती। हृदय में प्रेम की पीड़ा समाई हुई है। घनानंद को उसके चंद्र मुख को देखे बिना सिर से पैर तक मानो विष व्याप्त हुआ लगता है। घनानंद के विरह वर्णन के विषय में डॉ. रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं- "वह तो घनानंद की पूंजी ठहरा, विरह के जो स्वर उनके हृदय से निकले हैं, वे रीतिकाल तो क्या, सूर की कविता में भी दुर्बलता से मिलते हैं। रीतिकाल की बौद्धिक विरहानुभूति की  निष्प्राणता और कुंठा के वातावरण में घनानंद की पीड़ा की टीस सहसा ही हृदय को चीर देती है और मन सहज ही यह मान लेता है कि दूसरों पर किराए के आंसू बहाने वालों के बीच यह एक ऐसा कवि है जो सचमुच अपनी ही पीड़ा से रो रहा है।" घनानंद का वियोग व्यक्तिगत है। सुजान के साथ न चलने पर जब शाही दरबार का गौरवपूर्ण पद त्याग कर घनानंद चले होंगे तब उनका हृदय वियोग वेदना से कराह उठा होगा।  उल्लेखनीय बात यह है कि घनानंद ने एक ही छंद में, एक ही साथ, अनेक भाग प्रस्तुत किए हैं , उन्होंने प्रिय की कठोरता और उदासीनता के उपरांत भी प्रिय को शुभकामना ही दी है।  इसका तात्पर्य यही है कि घनानंद एक सच्चे प्रेमी थे। उन्होंने प्रेम का भव्य, आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। प्रेम घनानंद की बड़ी ही मूल्यवान पूंजी है जिसकी ताकत पीड़ा  है। लेकिन इसकी विशेषता यह है कि इसमें भी आनंद है।
 घनानंद ने अपने काव्य में  ब्रज भाषा का प्रयोग किया है। ब्रज भाषा में तो उनकी गहरी पैठ थी। उन्होंने भाषा का साहित्यिक रूप प्रस्तुत करते हुए भी ठेठ ब्रज के लोक प्रचलित स्वरूप का ही प्रयोग किया है। साथ ही उनकी भाषा में संस्कृत, फारसी आदि भाषाओं के शब्द तत्सम रूप में बहुत कम आए हैं, और जो आए हैं वह उनकी भाषा शैली के सांचे में ढले हुए मिलते हैं। बृज भाषा के संदर्भ में घनानंद के कवित्त, सवैया तथा पद छंदों का लालित्य देखते ही बनता है। घनानंद की भाषा की प्रमुख विशेषता है कि उन्होंने कोमल कांत पदावली का प्रयोग किया है। वे अपनी कविता में भाषा को भावों के अनुकूल मोड़ देने का प्रयास करते हैं। घनानंद वर्णों की योजना करते समय कभी वर्ण संगति और कभी संगीत को महत्व देते हैं, क्योंकि घनानंद एक कवि होने के साथ-साथ अच्छे संगीतज्ञ थे।  उनकी शब्द योजना की बात करें तो उन्होंने तत्सम, तद्भव और इसके साथ-साथ उन्होंने मुहावरे और लोकोक्तियों  का भी प्रयोग किया है। अलंकार विधान भी उनकी कविता को अलंकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

हिंदी साहित्य -घनानंद का काव्य

                                                            घनानंद का काव्य 

घनानंद हिंदी के रीति काल की रीतिमुक्त काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। उन्होंने अपने काव्य में रीतिकालीन की बँधी-बधाई परिपाटी का त्याग कर स्वच्छंद रूप से श्रृंगार काव्य की रचना रचना की अर्थात प्रेम की पीड़ा का वर्णन किया है। जैसे-

अति सूधो स्नेह को ...............................देहु छटाँक नहीं।।

शब्दार्थ:
सूधो- सरल,। मार्ग- रास्ता, साँचे- सच्चाई। सयानप- सयानापन, चतुराई । निसांक - निशंक । बांक- टेढापन। झझकै- हिचकते हैं।  तजि-छोड़कर पाटी पढ़े- पट्टी पढ़े हो। मन- हृदय, मन भर। छटाँक- थोड़ा सा भी।

प्रसंग-
प्रस्तुत अवतरण बी.कॉम (प्रोग्राम) हिंदी 'ग' के पाठ्यक्रम में संकलित रीतिकालीन स्वच्छंद काव्यधारा के प्रमुख कवि घनानंद द्वारा रचित है। इसमें कवि अपनी प्रिय सुजान को उपालंभ की शैली में प्रेम मार्ग की शिक्षा दे रहे हैं। कवि कहते हैं-
व्याख्या:
घनानंद कहते हैं कि हे प्रिय । प्रेम का मार्ग अत्यंत सरल और सीधा है। इसमें बिल्कुल भी टेढापन नहीं हैं अर्थात इस रास्ते पर चलने वालों को चतुराई का व्यवहार करने की जरूरत नहीं होती। क्योंकि चतुराई से चलने वाला प्रेम के मार्ग में सफल नहीं हो सकता।प्रेम का मार्ग तो सच्चा  प्यार करने वालो के लिए हैं जो अपना अहं भाव त्याग कर या अपना सब कुछ प्रेमी के प्रति न्यौछावर कर इस मार्ग पर चलते हैं, जिनका ह्रदय पवित्र है उसमें तनिक भी अर्थात धोड़ा से भी छल कपट नहीं है । वे ही प्रेम के मार्ग पर चल सकते हैं। जिनको प्रेम में सफलता और असफलता की शंका होती है यह मार्ग उनके लिए नहीं है।
      कवि कहता है कि हे सुजान !सच्चा प्रेमी तो वही होता है न जो प्रेम के मार्ग पर सीधी रेखा की तरह चल पड़ता है और वह इधऱ-उधर की नहीं सोचता और न ही विचलित होता है । कवि सुजान को उपालम्भ देता हुआ कहता है कि आपने प्रेम की कौन सी पट्टी पढ़ी है, या प्रेम करने का कौन सा ढंग या रीति सीखी है ।आपका प्रेम करने का ढंग बड़ा ही अनोखा है । तुम दूसरे के मन को बड़ी चतुराई से मोह लेती हो पर बदले में अपना मन जरा भी किसी को नहीं देती हो। अर्थात प्रेम मार्ग पर चलकर हमने तुम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया पर तुम्हारा ध्यान हमारी तरफ तनिक भी नहीं जाता। कहने का मतलब यही है कि तुम तनिक भी हमसे प्रेम नहीं करती हो।
विशेष:
कवि ने प्रेम में शुद्ध मन और सीधेपन को महत्व दिया है।
मन लेहु, देहु छटाँक नहीं, में मुहावरों का व्यंजक प्रयोग है , सुंदर शब्द मैत्री दर्शनीय है
मन शब्द में श्लेष अलंकार है।
ब्रज भाषा का  प्रयोग है।


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