हिंदसा

बुधवार, 17 मई 2017

शत्रु (कहानी) अज्ञेय

                                                               शत्रु 
अज्ञेय हिंदी साहित्य में एक मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक कहानीकार भी माने जाते हैं| उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा मानव मन का गहन विश्लेषण किया है, इनकी शत्रु नामक कहानी भी विचार प्रधान, मनोवैज्ञानिक कहानी है | प्रस्तुत कहानी एक नवीन एवं विशिष्ट शैली में लिखी गई है, इसमें उन्होंने बताया है कि मनुष्य का वास्तविक शत्रु उसका अहंकार ही है, किंतु वह  भ्रमवश  अन्य बातों को अपना विरोधी मान बैठता है| कहानी कला की दृष्टि से शत्रु कहानी अत्यंत सफल व उत्कृष्ट कहानी है।
 कथानक 
इस कहानी का कथानक यद्यपि फैला हुआ है लेकिन फिर भी उसमें सुगठिता  तथा एकसूत्रता का गुण है, ज्ञान के जीवन की अनेक घटनाएं- एक ही मूल उद्देश्य से गुथी हुई हैं, ज्ञान का स्वप्न कहानी की आरंभिक अवस्था है, ज्ञान की एक विधवा स्त्री से भेंट, जेल यात्रा, विदेशी से मुलाकात आदि- कथावस्तु को  विकास की ओर अग्रसर करती हैं , किले में बंद हो जाने के बाद उसका अंतर्मंथन और आत्महत्या का निश्चय संघर्ष की अवस्था है, दीवार पर से नीचे खाई में अपनी परछाई देखना और यह समझना कि उसकी पलायन वृत्ति अर्थात हर कठिनाई से मुंह मोड़ना ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है| यही कहानी की चरम सीमा है| इस तरह कहानी के संपूर्ण कथानक में एक सूत्रता है लेखक कथानक में पाठक की जिज्ञासा अंत तक बनाए रखने में सफल रहा है| हर बार ज्ञान का बदला हुआ निश्चय पाठक के मन में यह प्रश्न उत्पन्न करता है कि अब क्या होगा? कहानी का अंत अत्यंत नाटकीय ढंग से किया गया है।
 पात्र एवं चरित्र चित्रण
 इस कहानी का मुख्य और एकमात्र पात्र ज्ञान ही है जो वास्तविक न  होकर प्रतीकात्मक है, उसके चरित्र का अंकन फ्राइड के मनोविश्लेषण के आधार पर किया गया है, ज्ञान के माध्यम से अज्ञेय ने मानव जीवन के एक वैचारिक पहलु पर प्रकाश डाला है| प्रत्येक मनुष्य जीवन में कोई न कोई उलझन आने पर उसी प्रकार किसी एक या दूसरे वर्ग को अपना शत्रु समझने लगता है जिस तरह ज्ञान ने  क्रमशः धर्म, समाज, विदेशी सरकार और भूख को अपना शत्रु समझ लिया| आदिकाल से मनुष्य का की  जीवन से  पलायन की प्रवृत्ति रही है अर्थात जीवन के विभीषिकाओं  से भागता रहा है- इसी तथ्य का उद्घाटन अज्ञेय जी ने ज्ञान की माध्यम से किया  है| गौण  पात्रों में विधवा तथा विदेशी को लिया जा सकता है, इनका चरित्र भी प्रतीकात्मक है | स्त्री  के माध्यम से समाज की विभिन्न रुढियों  का शिकार बनने वाली नारियों की दुर्दशा की ओर संकेत किया है, विदेशी के द्वारा बताया है कि मूलतः सभी मानव एक हैं, परंतु यह एकरूपता  विपत्ति के समय ही स्पष्ट होती है, वास्तव में इस कहानी के पात्र व्यक्तिगत न होकर वर्ग गत है और वास्तविक न  होकर प्रतीकात्मक है| 
कथोपकथन 
 शत्रु कहानी में कथोप कथन का स्थान  नहीं है क्योंकि अन्य पात्रों की प्रत्यक्ष अवधारणा ही नहीं की गई है| संपूर्ण कहानी लेखक के वर्णन पर आधारित है| कहीं-कहीं ज्ञान अथवा अथवा लोगों की कोई बात कथन के रूप में प्रस्तुत कर दी गई है| जैसे- "उसने कहा- धर्म झूठा बंधन है|" या कहने लगा- मैं मसीह हूं पैगंबर हूं |" अथवा किसी ने कहा- जो व्यक्ति पराई और बहिष्कृत औरत को अपने साथ रखता है , उसकी बात हम क्यों सुने? वह समाज से पतित  है ,  नीच है |"
देश काल और वातावरण
 इस दृष्टि से प्रस्तुत कहानी सफल है| अज्ञेय  वातावरण निर्माण में कुशल हैं| इस कहानी में यद्यपि लेखक ने प्रत्यक्ष रूप से यह उल्लेख नहीं किया है कि इसका संबंध किसी स्थान विशेष या किस युग से है, लेकिन ज्ञान को जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है उनसे स्पष्ट है कि इस कहानी में पराधीन भारत की दशा की ओर संकेत किया गया है| उन दिनों विदेशियों के विरुद्ध विद्रोह की भावना थी, भूख और गरीबी के विरुद्ध संघर्ष चल रहा था, धर्म और समाज के नाम पर प्रचलित रूढ़ियों का भी खंडन किया जा रहा था, इन सब बातों का इस कहानी में यथार्थ चित्रण हुआ है।
 भाषा शैली
 अज्ञेय जी ने एक गूढ़ तत्व को स्पष्ट करने के लिए सरल शब्दावली का प्रयोग किया है| भाषा में सर्वत्र प्रवाह  और लचक है, इस कहानी की भाषा परिमार्जित और परिनिष्ठित खड़ी बोली है, यथा - "वह ईश्वर का प्रतिनिधि है तो उसे मानव जाति को पथ  पर लाना होगा|  अंधकार से बाहर खींचना होगा , उसका नेता बनकर उसके शत्रु से युद्ध करना होगा, कहानी की शैली आदि से अंत तक वर्णनात्मक है ,पात्रों को बोलने का अवसर बहुत कम दिया गया है| सर्वत्र लेखक ही बात कहता चला है |
उद्देश्य 
शत्रु एक विचार -प्रधान मनोवैज्ञानिक कहानी है| इस कहानी का लक्ष्य यह स्पष्ट करता  है कि मनुष्य भ्रमवश  धर्म, समाज भूख  आदि को अपना शत्रु समझ लेता है, किंतु इन शत्रुओं से सच्चे अर्थों में संघर्ष न करके वह अपनी सरलता के लिए नित्य नया रास्ता अपना लेता है| इसी कारण उसे किसी भी लक्ष्य में सफलता नहीं मिलती| मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं को पहचाने, उसे  कठिनाइयों से संघर्ष करने की क्षमता अपने आप में पैदा करनी चाहिए| यही इस कहानी का मूल अभीष्ट है | कहानी के अंत में भी ज्ञान को उसके सच्चे स्वरूप का ज्ञान कराकर इसी लक्ष्य की ओर संकेत किया गया है| 
शीर्षक की सार्थकता
 कहानी के उद्देश्य को ही लक्षित करके कहानी का नाम शत्रु रखा गया है| इसी शीर्षक में लेखक का मूल अभीष्ट  निहित है| यह नामकरण प्रतीकात्मक है| उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शत्रु कहानी एक विचार प्रधान और मनोवैज्ञानिक कहानी है|  मनुष्य का वास्तविक शत्रु उसका अहंकार है , किंतु वह भ्रमवश  अन्य बातों को अपना विरोधी मान  लेता है , इसी तथ्य को पाठक से अवगत कराने के लिए अज्ञेय  ने इस  कहानी की रचना की है कहानी  के तत्वों का भी सफल निरूपण प्रस्तुत कहानी में किया गया  है|

भारतीय कव्य शास्त्र (छंद) 1

छंद

छंद संस्कृत साहित्य से ही काव्यशास्त्र का प्रमुख अंग रहा है। क्या होता है ये छंद ? और काव्य में इसका क्या महत्त्व होता है? आइए जानते हैं-
छंद का लक्षण -
जिस रचना के हर पाद में मात्रा या वर्णों को विशेष क्रम,यति ,एवं गति के अनुसार रखा गया है, उसे छंद कहते हैं |
अथवा
जिस रचना में मात्रा संख्या, वर्ण संख्या तथा उनके विशेष क्रम का एवं यति तथा गति के नियम का पालन करके पाद बनाया जाता है, उसे छंद कहते हैं।
अथवा
जब किसी भी काव्य को लय, विराम आदि में बांधकर तथा वर्णों व मात्राओं के नियमों का पालन करते हुए काव्य रचना करते हैं, तब वह छंद बद्ध रचना कहलाती है।
पहले संस्कृत काव्य में छंद के माध्यम से ही काव्य-रचना होती थी।

किसी भी छंद की रचना में वर्ण/अक्षर/स्वर ध्वनि, मात्रा (लघु व गुरु) यति, गति, लय, ताल, चरण/पाद ,गण आदि का प्रयोग किया जाता है, व छंद वर्णो तथा गुरु- लघु मात्राओं के सहयोग बनता है। क्योंकि गुरु -लघु मात्राओं का समुचित प्रयोग काव्य में लय उत्पन्न करता है इसलिए काव्य को पढ़ते समय हमें संगीत का-सा आनंद मिलता है या आभास होता है। जैसे -
रघुकुल रीति सदा चली आई
प्राण जाई पर वचन न जाई ।
छंद शब्द 'छद' धातु से निष्पन्न हुआ है। छंद धातु के अनेक अर्थ हैं - प्रसन्न करना , फुसलाना , बांधना, आच्छादित करना, ढक देना, ढाँप देना आदि। इन्हीं अर्थों के कारण छंद का अर्थ प्रसन्न करने वाली वस्तु, आच्छादन और बंधन आदि लिया जाता है| जिस प्रकार हम अपने शरीर को कपड़ों से ढकते हैं उसी प्रकार छंद भी शब्दार्थमय काव्य- शरीर को ढक देता है। काव्य का शरीर शब्द-अर्थ से युक्त होता है। छंद काव्य के भाव को बढ़ाते हैं, और भाषा में सुंदरता उत्पन्न करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार से सुंदर पहनावा शरीर के सौंदर्य को बढ़ाता है उसी प्रकार सुंदर छंद भी काव्य में प्रयुक्त होकर उसके सौंदर्य को बढ़ाते हैं उसे सहज, सुंदर और मनोरम बनाते हैं |
काव्य और छंद -
संकृत काव्यशास्त्र में छंद काव्य का महत्वपूर्ण अंग माना गया है , वहां छंद के बिना काव्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन हिंदी साहित्य में विशेष कर आधुनिक काल में छंद की अनिवार्यता को स्वीकार नहीं किया गया , विशेषकर निराला ने कविता को छंदमुक्त अर्थात छंद के बंधन से मुक्त कविता की हिमाकत की है, लेकिन देखा जाये तो वह भी एक छंद ही है| निराला ने कविता में प्रवाह को महत्त्व दिया है| इसके विपरीत आचार्य रामचंद्र शुक्ल और सुमित्रा नंदन पन्त ने कविता के लिए छंद के महत्त्व को स्वीकार किया है | रामचंद्र शुक्ल में कहा है कविता को पढ़ा नहीं जाता बल्कि गाया जाता है और गायन तभी संभव होता है जब कविता छन्दोबद्ध होती है | इसलिए काव्य में छंद की अनिवार्यता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता |
किसी भी साहित्य को रचना की दृष्टि से दो भागों में बांटा जा सकता है एक गद्य और दूसरा पद्य | छन्दोबद्ध साहित्य पद्य कहलाता है; और मात्रा, गण, यति आदि के बंधन से मुक्त साहित्य को गद्य की संज्ञा दी जाती है|
अर्थात छंद गद्य और पद्य में अलगाव का आधार भी हो जाता है | माना जाता है कि गद्य बुद्धि प्रधान होता है तथा पद्य रागात्मक प्रधान होता है | व्याकरण को गद्य का नियामक तत्त्व माना गया है अत: गद्य के लिए व्याकरण महत्वपूर्ण होती है| जब हम कविता या कहानी, उपन्यास लिखते हैं तो हमें व्याकरण के नियमों का ध्यान रखना पड़ता है और पद्य लिखते समय हमे अलंकार और छंद पर ध्यान देने की जरूरत होती है अतः: काव्य के लिए छंद नियामक तत्त्व हैं। ये एक मनोवैज्ञानिक तथ्य भी है कि लय रागात्मक वृत्ति का प्रेरक तत्त्व होता है, और लय की सृष्टि छंद के माध्यम से ही हो सकती है| इसीलिए काव्य में छंद का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है| अंत में कह सकते हैं कि छंद काव्य का अपरिहार्य अंग है| क्योंकि जब कवि छंदों के द्वारा काव्य में ह्रदय की सच्ची अनुभूति को नाद और लय के साथ उतारता है तो उस काव्य का पाठक के हृदय पर अधिक प्रभाव पड़ता है ।
छंद के अंग / तत्त्व

वर्ण/अक्षर/ स्वर ध्वनि - मुख से नि:सृत हर उस छोटी से छोटी ध्वनि को वर्ण या अक्षर कहते हैं , जिसके खंड नहीं किए जा सकते या कहें तो जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते |जैसे- अ, इ, उ, ऋ आदि
मात्रा (लघु और गुरु )- प्रत्येक वर्ण के उच्चारण में कुुुछ समय लगता है, जितना समय लगता है, उसे ही छंद के संदर्भ में मात्रा कहते हैं| इस दृष्टि से वर्ण दो प्रकार के माने जाते हैं - ह्रस्व और दीर्घ , इन्हीं को छंद शास्त्र में क्रमश: लघु और गुरु कहा जाता है | ह्रस्व स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसकी एक मात्रा मानी जाती है, और दीर्घ स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसके लिए दो मात्रा मानी जाती हैं। वैदिक संस्कृत में प्लुत स्वर भी होता था जिसके उच्चारण में ह्रस्व स्वर की अपेक्षा तीन गुना समय लगता था। किंतु हिंदी में अब प्लुत स्वर का लगभग लोप हो चुका है। मात्राओं को लगाने के नियम तय हैं जैसे-

  • अ,इ,उ,ऋ, चंद्रबिंदु (ँ) की एक मात्रा लगती है। उसे ह्रस्व या लघु कहते हैं।
  • आ,ई, ऊ, ए,ऐ,ओ,औ, अनुस्वार (ं) विसर्ग (ः) की दो मात्राएं लगती हैं उन्हें दीर्घ या गुरु कहते हैं।
  • अर्थात विसर्ग से युक्त वर्ण भी गुरु माना जाता है |
  • संयुक्त वर्णों से पहला स्वर दीर्घ हो जाता है जैसे - सत्य, धर्म तथा रक्षा में स,ध तथा र गुरु वर्ण हैं।
  • कहीं-कहीं बोलते समय ह्रस्व स्वर पर बल नहीं पड़ता तो संयुक्त वर्णों से पहले होने पर भी वह दीर्घ नहीं होता । जैसे कन्हैया में क ह्रस्व ही रहेगा न और ह के संयुक्त होने से दीर्घ नहीं होगा।



चरण या पाद 
प्रत्येक छंद कुछ पंक्तियों का समूह होता है।  उदाहरण के लिए जैसे सवैया छंद में 4 पंक्तियां होती हैं, छंद की इन पंक्तियों को चरण या पाद कहते हैं। एक पंक्ति एक चरण कहलाती है। हिंदी के अधिकतर छंद चार चरणों के होते हैं परंतु कुंडलियां, छप्पय आदि में 4 से अधिक चरण या पाद भी होते हैं,  दोहा, सोरठा बरवै आदि छंद केवल दो चरणों के ही होते हैं।
  • यति
  • गति
  • तुक
  • लय
  • ताल
  • गण




नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...