शत्रु
अज्ञेय हिंदी साहित्य में एक मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक कहानीकार भी माने जाते हैं| उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा मानव मन का गहन विश्लेषण किया है, इनकी शत्रु नामक कहानी भी विचार प्रधान, मनोवैज्ञानिक कहानी है | प्रस्तुत कहानी एक नवीन एवं विशिष्ट शैली में लिखी गई है, इसमें उन्होंने बताया है कि मनुष्य का वास्तविक शत्रु उसका अहंकार ही है, किंतु वह भ्रमवश अन्य बातों को अपना विरोधी मान बैठता है| कहानी कला की दृष्टि से शत्रु कहानी अत्यंत सफल व उत्कृष्ट कहानी है।
कथानक
इस कहानी का कथानक यद्यपि फैला हुआ है लेकिन फिर भी उसमें सुगठिता तथा एकसूत्रता का गुण है, ज्ञान के जीवन की अनेक घटनाएं- एक ही मूल उद्देश्य से गुथी हुई हैं, ज्ञान का स्वप्न कहानी की आरंभिक अवस्था है, ज्ञान की एक विधवा स्त्री से भेंट, जेल यात्रा, विदेशी से मुलाकात आदि- कथावस्तु को विकास की ओर अग्रसर करती हैं , किले में बंद हो जाने के बाद उसका अंतर्मंथन और आत्महत्या का निश्चय संघर्ष की अवस्था है, दीवार पर से नीचे खाई में अपनी परछाई देखना और यह समझना कि उसकी पलायन वृत्ति अर्थात हर कठिनाई से मुंह मोड़ना ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है| यही कहानी की चरम सीमा है| इस तरह कहानी के संपूर्ण कथानक में एक सूत्रता है लेखक कथानक में पाठक की जिज्ञासा अंत तक बनाए रखने में सफल रहा है| हर बार ज्ञान का बदला हुआ निश्चय पाठक के मन में यह प्रश्न उत्पन्न करता है कि अब क्या होगा? कहानी का अंत अत्यंत नाटकीय ढंग से किया गया है।
पात्र एवं चरित्र चित्रण
इस कहानी का मुख्य और एकमात्र पात्र ज्ञान ही है जो वास्तविक न होकर प्रतीकात्मक है, उसके चरित्र का अंकन फ्राइड के मनोविश्लेषण के आधार पर किया गया है, ज्ञान के माध्यम से अज्ञेय ने मानव जीवन के एक वैचारिक पहलु पर प्रकाश डाला है| प्रत्येक मनुष्य जीवन में कोई न कोई उलझन आने पर उसी प्रकार किसी एक या दूसरे वर्ग को अपना शत्रु समझने लगता है जिस तरह ज्ञान ने क्रमशः धर्म, समाज, विदेशी सरकार और भूख को अपना शत्रु समझ लिया| आदिकाल से मनुष्य का की जीवन से पलायन की प्रवृत्ति रही है अर्थात जीवन के विभीषिकाओं से भागता रहा है- इसी तथ्य का उद्घाटन अज्ञेय जी ने ज्ञान की माध्यम से किया है| गौण पात्रों में विधवा तथा विदेशी को लिया जा सकता है, इनका चरित्र भी प्रतीकात्मक है | स्त्री के माध्यम से समाज की विभिन्न रुढियों का शिकार बनने वाली नारियों की दुर्दशा की ओर संकेत किया है, विदेशी के द्वारा बताया है कि मूलतः सभी मानव एक हैं, परंतु यह एकरूपता विपत्ति के समय ही स्पष्ट होती है, वास्तव में इस कहानी के पात्र व्यक्तिगत न होकर वर्ग गत है और वास्तविक न होकर प्रतीकात्मक है|
कथोपकथन
शत्रु कहानी में कथोप कथन का स्थान नहीं है क्योंकि अन्य पात्रों की प्रत्यक्ष अवधारणा ही नहीं की गई है| संपूर्ण कहानी लेखक के वर्णन पर आधारित है| कहीं-कहीं ज्ञान अथवा अथवा लोगों की कोई बात कथन के रूप में प्रस्तुत कर दी गई है| जैसे- "उसने कहा- धर्म झूठा बंधन है|" या कहने लगा- मैं मसीह हूं पैगंबर हूं |" अथवा किसी ने कहा- जो व्यक्ति पराई और बहिष्कृत औरत को अपने साथ रखता है , उसकी बात हम क्यों सुने? वह समाज से पतित है , नीच है |"
देश काल और वातावरण
इस दृष्टि से प्रस्तुत कहानी सफल है| अज्ञेय वातावरण निर्माण में कुशल हैं| इस कहानी में यद्यपि लेखक ने प्रत्यक्ष रूप से यह उल्लेख नहीं किया है कि इसका संबंध किसी स्थान विशेष या किस युग से है, लेकिन ज्ञान को जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है उनसे स्पष्ट है कि इस कहानी में पराधीन भारत की दशा की ओर संकेत किया गया है| उन दिनों विदेशियों के विरुद्ध विद्रोह की भावना थी, भूख और गरीबी के विरुद्ध संघर्ष चल रहा था, धर्म और समाज के नाम पर प्रचलित रूढ़ियों का भी खंडन किया जा रहा था, इन सब बातों का इस कहानी में यथार्थ चित्रण हुआ है।
भाषा शैली
अज्ञेय जी ने एक गूढ़ तत्व को स्पष्ट करने के लिए सरल शब्दावली का प्रयोग किया है| भाषा में सर्वत्र प्रवाह और लचक है, इस कहानी की भाषा परिमार्जित और परिनिष्ठित खड़ी बोली है, यथा - "वह ईश्वर का प्रतिनिधि है तो उसे मानव जाति को पथ पर लाना होगा| अंधकार से बाहर खींचना होगा , उसका नेता बनकर उसके शत्रु से युद्ध करना होगा, कहानी की शैली आदि से अंत तक वर्णनात्मक है ,पात्रों को बोलने का अवसर बहुत कम दिया गया है| सर्वत्र लेखक ही बात कहता चला है |
उद्देश्य
शत्रु एक विचार -प्रधान मनोवैज्ञानिक कहानी है| इस कहानी का लक्ष्य यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य भ्रमवश धर्म, समाज भूख आदि को अपना शत्रु समझ लेता है, किंतु इन शत्रुओं से सच्चे अर्थों में संघर्ष न करके वह अपनी सरलता के लिए नित्य नया रास्ता अपना लेता है| इसी कारण उसे किसी भी लक्ष्य में सफलता नहीं मिलती| मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं को पहचाने, उसे कठिनाइयों से संघर्ष करने की क्षमता अपने आप में पैदा करनी चाहिए| यही इस कहानी का मूल अभीष्ट है | कहानी के अंत में भी ज्ञान को उसके सच्चे स्वरूप का ज्ञान कराकर इसी लक्ष्य की ओर संकेत किया गया है|
शीर्षक की सार्थकता
कहानी के उद्देश्य को ही लक्षित करके कहानी का नाम शत्रु रखा गया है| इसी शीर्षक में लेखक का मूल अभीष्ट निहित है| यह नामकरण प्रतीकात्मक है| उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शत्रु कहानी एक विचार प्रधान और मनोवैज्ञानिक कहानी है| मनुष्य का वास्तविक शत्रु उसका अहंकार है , किंतु वह भ्रमवश अन्य बातों को अपना विरोधी मान लेता है , इसी तथ्य को पाठक से अवगत कराने के लिए अज्ञेय ने इस कहानी की रचना की है कहानी के तत्वों का भी सफल निरूपण प्रस्तुत कहानी में किया गया है|