हिंदसा

शुक्रवार, 7 मई 2021

गंगा स्नान करने चलोगे? संस्मरण 2.

  हिंदी साहित्य में संस्मरण की गणना दूसरी अन्य गद्य विधाओं की तरह ही  होती है अर्थात जैसे रेखाचित्र रिपोर्ताज आत्मकथा जीवनी एवं पत्र साहित्य आदि की होती है वैसे ही  संस्मरण विधा होती है। संस्मरण साहित्य में कथावाचक जिन घटनाओं, पात्रों एवं शब्द चित्र प्रस्तुत करता है, उसकी प्रामाणिकता संदिग्ध नहीं होती है।संस्मरण में कथाकार अपनी स्मृतियों के आधार पर कथा का निर्माण करता है। संस्मरण का शाब्दिक अर्थ - सम्यक संस्मरण होता है। यह संस्मरण व्यक्ति, घटना, दृश्य और किसी से भी संबंधित हो सकता है। संस्मरण में कथानक का विकास एक रेखीय रूप अर्थात आदि से अंत तक  एक लय में नहीं होता है बल्कि कथानक की लड़ियां विशृंखलित होती हैं । लेखक समय की आवाजाही कथानक में अपनी स्मृतियों के आधार पर करता है। संस्मरण में यह संभव है कि कोई कथाकार वृद्धा अवस्था की घटना का जिक्र कर रहा है और उसके तुरंत बाद युवा अवस्था के विवरणों को देने लगे। कुल मिलाकर संस्मरण में स्मृति स मुख्य होती है| कथाकार को घटनाएं या पात्र या दृश्य जैसे जैसे याद आते हैं वह वैसे वैसे उनका जिक्र करता चलता है गंगा स्नान करने चलोगे पाठ भी  विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखा गया एक संस्मरण है

गंगा स्नान करने चलोगे? संस्मरण विश्वनाथ त्रिपाठी जी के द्वारा लिखा गया है।  इसमें उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के साथ बिताए गए दिनों  को याद करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के चरित्र की अनेक विशेषताओं को ओर इंगित किया है। विश्वनाथ त्रिपाठी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जब काशी में साथ- साथ रहते थे तो गर्मियों में कई बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी जी को गंगा स्नान करने के लिए कभी-कभी लेकर जाते थे। जब वह गंगा स्नान करने के लिए जाते थे तो रास्ते में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी को अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों के बारे में बताते थे- कि कौन- सी पुस्तक पढ़नी चाहिए और वह पुस्तक कहां मिलेगी? वह पुस्तक किस लाइब्रेरी में मिलेगी? आदि-आदि। एक रात जाड़े के दिनों में लगभग रात के 7:00 बजे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी जी से  कहते हैं कि गंगा स्नान करने चलोगे? आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कहने पर विश्वनाथ त्रिपाठी उनके साथ चल पड़े।  जाड़े की  रात में, वह भी 7:00 बजे, गंगा स्नान करने जाने की बात सुनकर विश्वनाथ त्रिपाठी जी हैरान थे बावजूद इसके वे बिना कुछ कहे ही हजारी प्रसाद जी के साथ चल पड़े। उस दिन हजारी प्रसाद द्विवेदी गंगा के तट पर जाने की बजाय वे विश्वनाथ त्रिपाठी जी को विश्वविद्यालय के बहुत बड़े विद्वान पंडित सुखलाल जी के यहां लेकर गए और उनसे विश्वनाथ त्रिपाठी जी का परिचय कराया पंडित सुखलाल जी ने भी विश्वनाथ त्रिपाठी जी को संस्कृत पढ़ने की बात कहते हुए अनेक महत्वपूर्ण बात बताई इस तरह से वापस लौटते हुए पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने विश्वनाथ त्रिपाठी को कहा कि हो गया न गंगा स्नान क्योंकि सुखलाल जी उस समय के बहुत बड़े विद्वान थे और उनसे मिलना या उनसे परिचय होना वास्तव में किसी भी गंगा स्नान से कम नहीं था। इसके अतिरिक्त इस संस्मरण के माध्यम से हमें पता चलता है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बहुत बड़े विद्वान थे जिस उम्र में लोग गंभीरता पूर्वक पढ़ना शुरू करते हैं उस उम्र में द्विवेदी जी बहुत बड़े विद्वान बन चुके थे लगभग 30 वर्ष की आयु में हजारी प्रसाद द्विवेदी को आचार्य कहकर पुकारा जाता जाने लगा था।

 एक अध्यापक के रूप में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी जी लिखते हैं कि क्लास में कोई विद्यार्थी नए अर्थ का संकेत करता था तो वे उसकी बहुत तारीफ करते थे पहली बार तारीफ करने से मन नहीं भरता थोड़ी-थोड़ी देर पर पीरियड में तीन चार बार तारीफ करते-  बहुत ठीक मैंने नहीं सोचा था... मैं तो खींच खांचकर अर्थ कर रहा था ..प्रसन्न होकर वह शिष्यों से कहते-  पुस्तकें भी पढ़ो, पुस्तकालय भी पढ़ो, किताबों की दुकान पढ़ो,  किताबों की दुकान पर जाकर पता चलता है कि कितना कम पढ़ा है पढ़ने को कितना है आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी विद्वानों के लिए संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं का आना भी जरूरी मानते थे आचार्य द्विवेदी जी विद्वान होने से ज्यादा अच्छा मनुष्य बनना मानते थे वह कहते थे कि विद्वान होने से क्या है 50 किताबें पढ़ने से तो कोई भी व्यक्ति विद्वान हो सकता है। मनुष्य बनने की साधना करना बड़ी बात है।

  विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का क्लास में पाठ्यक्रम कभी समाप्त नहीं होता था क्योंकि वह पंक्तियों की व्याख्या बहुत विस्तार से करते थे कबीर के 11 दोहे का अर्थ बताने में वे तीन चार घंटे लगाते थे इस तरह से कोर्स खत्म नहीं होता था और परीक्षाएं सिर पर आ जाती थी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने विद्यार्थियों को घर पर बुलाकर भी पढ़ाते थे इसके साथ साथ वे लिखने में उनकी विशेष रूचि रखते थे, तुलसीदास जी पर लिखना चाहते थे, उत्तरमेघ लिखना चाहते थे। हमेशा वह कुछ न कुछ लिखने के लिए सोचते रहते थे । स्वास्थ्य खराब होने पर भी  उनकी इच्छा लिखने की रहती थी। इसलिए वे अपने शिष्यों को घर बुलाकर, बोलकर कुछ लिखवाने का प्रयास करते थे । विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने इस संस्मरण में उस घटना का उल्लेख भी किया है जब 1960 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थी। इस घटना का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। यह उनके साथ गलत हुआ था और इस बात का उन्हें ताउम्र मलाल  रहा भी और इस जैसी कुछ और घटनाओं के कारण ही उनका सत्य और मानवीयता से एक तरह से भरोसा उठ गया था क्योंकि उनको लगता था कि इस संसार में असत्य और अमानवीयता सत्य और मानवीयता से ज्यादा शक्तिशाली है।

   आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तीन बातों से हमेशा नाराज हो जाते थे- अगर कोई व्यक्ति किसी महिला के चरित्र की निंदा करता था जब या फिर दोपहर के भोजन के बाद  सोते में उन्हें जगा दे या फिर रविंद्र नाथ ठाकुर, मदन मोहन मालवीय, गांधी जी और जवाहरलाल नेहरू के बारे में हल्की बात करने पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी नाराज हो जाते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कालिदास से बड़ा किसी अन्य कवि को नहीं मानते थे। आधुनिक साहित्यकार भी हजारी प्रसाद द्विवेदी से अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस करते थे। इसलिए उनकी शव यात्रा में आधुनिक साहित्यकारों की संख्या पुराने साहित्यकारों से भी ज्यादा थी। वे नई पीढ़ी का सम्मान करते थे। उनका मानना था कि काल की वस्तुगत सत्ता नहीं होती। वह केवल बोझ या मनोविकार है। काल घटनाओं से झलकता है । वह केवल घटनाओं को नापने का बोध माध्यम मात्र है इसलिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कोई घटना कब घटी, किसी व्यक्ति की उम्र क्या है? वह बूढ़ा है या किशोर। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी सोच या उसका दृष्टिकोण होता है। नयापन आधुनिकता का पर्याय नहीं है। नया पुरातन पंथी भी हो सकता है। प्राचीन साहित्य को भी आधुनिक दृष्टि से देखा जा सकता है। इसलिए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को आधुनिक साहित्यकार भी बहुत सम्मान देते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी किसी को दुख नहीं पहुंचाना चाहते थे अनुचित के प्रति विरोध करना जानते थे लेकिन संघर्ष करना उनके वश में नहीं था। वे प्रत्येक व्यक्ति में गुण देख लेते थे और मनुष्य के गुणों का ही बखान करते थे उनका मानना था कि तारीफ कर देने से क्या बिगड़ जाता है मनुष्य कोई रचना थोड़ा ना है कि उसकी समीक्षा की जाए। विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखी एक हस्तलिखित नोटबुक का भी जिक्र किया है। उस नोटबुक के कवर पर हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने हनुमान जी का चित्र बनाया था और उन्होंने एक काव्य पत्र भी लिखा था जो उस समय के प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय जी को भेजा था। उन्होंने इसमें लिखा था कि क्या हो गया? बड़े बड़े कवियों की कविताओं से, क्या दमन, शोषण, अन्याय कुछ भी रुक पाया अर्थात नहीं रुक पाया । इसीलिए द्विवेदी जी के मन में सत्य के प्रति अविश्वास पैदा हुआ और उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ गई। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का पद छोड़ने से पहले और बाद के हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के मनोबल में बहुत अंतर आ गया था। क्योंकि उन्होंने भारतीय व्यवस्था के दो मुंहेपन को देखा था । जिसको वह कभी भुला नहीं पाए। इस तरह से विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने अनेक ऐसे स्मृति चित्रों का उल्लेख इस संस्मरण में किया है जो पाठक के मन मस्तिष्क पर हजारी प्रसाद को लेकर एक अलग ही छाप छोड़ते हैं और वह हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के संघर्षशील जीवन से प्रेरणा पाते हैं और हिंदी के महान साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के चरित्र की  अनेक खूबियों से परिचित या अवगत होते हैं

    गंगा स्नान करने चलोगे नामक संस्मरण खड़ी बोली में लिखा गया है। इसकी भाषा सरल है। विषय के अनुसार भाषा और वाक्य संरचना का चयन किया गया है। शब्दों का प्रयोग भी स्वाभाविक है।  ट्रेन, पीरियड, गाड़ी,क्लास आदि अंग्रेजी  के शब्दों के साथ-साथ तत्सम, तद्भव, देशज शब्दों का भी प्रयोग इस संस्मरण में हुआ है । साहित्यिक भाषा का पुट इस संस्मरण के महत्व को और भी बढ़ा देता है। भाषा मे कहीं भी बनावटी पन नजर नहीं आता । कुल मिलाकर या संस्मरण पाठक को भाव विभोर कर देता है। 

बहादुर कहानी का उद्देश्य और अन्य प्रश्न

 प्रश्न 1

‘बहादुर’ कहानी का सारांश संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए। 

                                या

‘बहादुर’ कहानी की कथावस्तु का उल्लेख कर सिद्ध कीजिए कि यह एक यथार्थवादी कहानी है।

उत्तर : - अमरकान्त जी द्वारा लिखी कहानी ‘बहादुर’, एक मध्यमवर्गीय परिवार में नौकर के साथ परिवारजनों द्वारा किये गये अत्यधिक कटु व्यवहार की कहानी है। लेखक ने स्वयं को कहानी का पात्र बनाते हुए कहानी की आत्म-कथात्मक रूप में रचना की है। अपने से सम्पन्न रिश्तेदारों के घर नौकर द्वारा जुटाई सुविधा एवं शान को देखकर लेखक की पत्नी निर्मला स्वयं भी एक नौकर रखना चाहती है। बहादुर नेपाल को 12-13 साल का लड़का है, जो अपनी माँ के दुर्व्यवहार से तंग आकर घर छोड़कर शहर चला आता है और निर्मला के परिवार में नौकर रख लिया जाता है। निर्मला और उसका परिवार बहादुर के प्रति पहले तो अच्छा व्यवहार करते हैं, परन्तु धीरे-धीरे कठोरता बरतने लगते हैं। वह घर का सारा कार्य करता है, इसके बावजूद उसके साथ गाली-गलौज से मारपीट तक की नौबत आ जाती है। झूठी चोरी का इल्जाम लगाकर उसे अपमानित किया जाता है और पीटा जाता है। अन्तत: बहादुर घर छोड़कर चला जाता है। अब परिवार के सभी सदस्य उसे ढूंढ़ते हैं, क्योंकि उसके कारण सब आराम के आदी हो चुके हैं।

बहादुर की उपयोगिता देखकर सभी अब अपना घरेलु कार्य करने से घबराते हैं, वहादुर के घर छोड़ जाने पर वे सभी पश्चात्ताप करते हैं तथा अच्छा व्यवहार करने की सोचते हैं। परन्तु अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत। बहादुर में सहनशीलता और स्वाभिमान की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। उसके इसी चरित्र के कारण यह कहानी हमें प्रिय है।

प्रश्न 2 ‘बहादुर’ कहानी के उद्देश्य का विवेचनात्मक परिचय दीजिए। बहादुर कहानी की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। 

                                  या

‘बहादुर’ कहानी की कथावस्तु का विवेचन कीजिए और कहानी का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। 

                             या

‘बहादुर’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। 

उत्तर:- आधुनिक कथा-जगत् में प्रेमचन्द की कहानी-कला को अक्षुण्ण रखने वाले कलाकारों में अमरकान्त अग्रणी हैं। इनकी कहानियों में मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग की पारिवारिक परिस्थितियों का सजीव, आदर्श तथा यथार्थवादी चित्रण मिलता है। इनकी ‘बहादुर’ कहानी; मध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी करने वाले बहादुर नाम के पहाड़ी लड़के पर आधारित एक समस्यामूलक कहानी है। कहानी-कला के तत्त्वों के आधार पर कहानी की संक्षिप्त समीक्षा आगे प्रस्तुत है–

(1) शीर्षक-प्रस्तुत कहानी का शीर्षक लघु, आकर्षक, सरल तथा सार्थक है। कहानी की कथा इसके प्रमुख पात्र बहादुर के चारों ओर घूमती है; अत: शीर्षक की दृष्टि से ‘बहादुर’ कहानी एक सफल रचना है।

(2) कथानक-प्रस्तुत कहानी में लेखक ने समाज के वर्ग-भेद को उजागर किया है। बहादुर 12-13 वर्ष की उम्र का एक गरीब बालक है। वह एक साधारण परिवार में नौकर है, जिसका मुखिया स्वयं लेखक है। प्रारम्भ में तो उसका परिवार में पालतू पशु-पक्षियों की तरह बड़ा आदर-सत्कार होता है और वह भी बड़ी मेहनत व लगन से काम करता है, किन्तु कुछ दिनों बाद वह लेखक के बड़े लड़के किशोर और उसकी पत्नी निर्मला द्वारा डॉट, मार खाने लगता है। उससे अपनी रोटी स्वयं सेंक लेने को भी कहा जाता है। एक दिन घर में आये कुछ रिश्तेदारों द्वारा बहादुर के ऊपर चोरी करने का आरोप लगाया जाता है और लेखक द्वारा बहादुर को मारा-पीटा भी जाता है। पत्थर की एक सिल के टूट जाने और समस्त परिवारजनों के दुर्व्यवहार से पीड़ित होने के कारण वह उस घर से भाग जाता है। वह अपने साथ घर का और अपना कोई भी सामान नहीं ले जाता। बहादुर के चले जाने के बाद परिवार के लोगों को बहादुर के गुणों की अनुभूति होती है और वे अपने द्वारा उसके प्रति किये गये अमानवीय व्यवहारों पर पश्चात्ताप करते हैं।

कहानी का कथानक रोचक, सुगठित, संक्षिप्त तथा समस्याप्रधान है। इसमें बताया गया है कि मात्र पूँजीपति ही श्रम का शोषण नहीं करते, वरन् सामान्य मध्यम वर्ग भी इस कुकृत्य में पीछे नहीं है। इस प्रकार कथानक-तत्त्व की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

(3) उद्देश्य ( सन्देश)—इस कहानी का उद्देश्य समाज में उत्पन्न वर्ग-संघर्ष को मानवीय सहानुभूति द्वारा समाप्त करने का सन्देश देना है। शोषितों के प्रति मानवता एवं प्रेम का व्यवहार, ऊँच-नीच के भेद के कारण दिलों में पड़ी दरार को भर देता है। बहादुर भी मानवीय स्नेह एवं संवेदनाओं का भूखा है। मालिक द्वारा पीटे जाने और प्रतिक्रिया स्वरूप उसके द्वारा घर छोड़ दिये जाने पर परिवार के सभी लोगों को पश्चात्ताप का अनुभव होता है। वे स्वयं को दोषी महसूस करते हैं। धनी और निर्धन का वर्ग-भेद मानवीय भावनाएँ ही कम कर सकती हैं। लेखक का मुख्य उद्देश्य दोनों के हृदयों का परिवर्तन है और सबके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार बनाये रखने का सन्देश देना है।

‘बहादुर’ कहानी अत्यन्त मार्मिक कहानी है। यह आत्म-कथात्मक शैली में प्रस्तुत की गयी है। अमरकान्त जी ने बड़े सटीक और सुन्दर ढंग से कहानी को प्रस्तुत करके पाठकों के मन पर अमिट छाप छोड़ी है। कहानी-कला के तत्त्वों की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

प्रश्न 3 ‘बहादुर’ कहानी में उद्घाटित समाज के शोषक चरित्र पर प्रकाश डालिए।

उत्तर:- अमरकान्त द्वारा रचित ‘बहादुर’ कहानी का नायक ‘दिल बहादुर’ नामक नेपाली लड़का, एक निम्नवर्गीय परिवार का सदस्य है और निर्मला का परिवार मध्यमवर्गीय स्थिति को परिवार है। यह आर्थिक दृष्टि से अधिक सम्पन्न परिवार नहीं है, लेकिन झुठे दिखावे और शान-शौकत के लिए नौकर की आवश्यकता को बनाये हुए है। निर्मला पड़ोसियों को अपनी शान-शौकत से प्रभावित करना चाहती है। निर्मला का पति भी दिखावे और प्रदर्शन को ही अपने जीवन का वास्तविक आधार मानता है। अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद अपने रिश्तेदारों की नकल करते हुए वह अपने यहाँ नौकर रख लेता है। निर्मला का लड़का किशोर, नौकर को हीन दृष्टि से देखता है और बात-बात पर उसे गाली देता है। नौकर रखने का प्रदर्शन, नौकर के प्रति दिखावे का व्यवहार, नौकर पर रोब डालना, नौकर से जी-तोड़ काम लेना, उसको बात-बात पर पीटना-गाली देना आदि क्रिया-कलाप मध्यमवर्गीय परिवारों; जो कि समाज का सबसे बड़ा तबका है; की शोषक मानसिकता को उजागर करते हैं और समाज के शोषक चरित्र पर प्रकाश डालते हैं।

हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ कथाकार अमरकान्त’ द्वारा लिखित कहानी ‘बहादुर’ वस्तुतः एक मध्यवर्गीय परिवार में नौकर के साथ परिवारजनों द्वारा किए जाने वाले अत्यधिक कठोर एवं असभ्य व्यवहार पर आधारित कहानी है। अमरकान्त हिन्दी के उन कहानीकारों में से हैं, जिन्होंने अपनी कहानियों में मध्य एवं निम्न वर्ग के प्रति सामाजिक जीवन की अमानवीय स्थितियों को एक यातनागार के रूप में प्रस्तुत किया है।

पात्र-परिचय-

लेखक- कहानी का वक्ता

निर्मला- लेखक की पत्नी

साले साहब- लेखक के साले साहब

दिलबहादुर- एक नेपाली लड़का तथा लेखक के घर का नौकर, जिसका नाम दिलबहादुर से केवल बहादुर कर दिया जाता है।

किशोर- लेखक का बड़ा लड़का,  बहादुर को देख लेखक के मन में नौकर रखने की आवश्यकता का अनुभव करना

एक दिन लेखक के साले साहब एक नेपाली लड़के को लेकर लेखक के घर आते हैं। उसकी उम्र बारह-तेरह वर्ष के लगभग थी, ठिगना चकइठ शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह। वह सफेद नेकर, आधी बाँह की सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने खड़ा था। उसे देखते ही लेखक को स्मरण हुआ कि उसके सभी भाई और रिश्तेदारों के यहाँ नौकर हैं। दोनों भाभियाँ रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती रहती हैं, जबकि उसकी पत्नी निर्मला सुबह से शाम तक घर के कामों में व्यस्त रहती है। यह सोच लेखक का मन ईर्ष्या से जल उठा तथा निर्मला भी हर वक्त नौकर रखने की रट लगाए रहती थी। यही स्मृति बहादुर को देखकर लेखक को नौकर रखने की आवश्यकता का अनुभव कराती है। साले साहब द्वारा लेखक व उसके परिवार को बहादुर का परिचय देना। साले साहब लेखक व उसके परिवार को बहादुर का परिचय देते हुए कहते हैं कि यह एक नेपाली बालक है, जिसका गाँव नेपाल और बिहार की सीमा पर था तथा इसके पिता युद्ध में मारे जा चुके हैं। घर परिवार का भरण-पोषण इसकी माँ करती थी। वह चाहती थी कि लड़का घर के काम-काज में हाथ बटाए, परन्तु शरारती प्रवृत्ति के कारण इसने एक बार उसी भैंस को बहुत मारा जिसको उसकी माँ बहुत प्यार करती थी। इसलिए माँ ने इसे बहुत मारा, जिसकी वजह से इसका मन माँ से कट गया और एक दिन यह माँ के रखे रुपयों में से दो रुपए निकाल कर वहाँ से भाग आया। लेखक तथा उसकी पत्नी निर्मला द्वारा ‘दिलबहादुर’ को नौकर ‘बहादुर’ बनने की प्रक्रिया समझाना

लेखक द्वारा लड़के का नाम पूछने पर वह अपना नाम ‘दिलबहादुर’ बताता है। लेखक उसे अपने घर में नौकर बनकर रहने के फायदे बताते हुए कहता है कि तुम अपनी सभी शरारतें छोड़कर ढंग से काम करना और इस घर को अपना ही घर समझना। हमारे घर में नौकर-चाकर को बहुत प्यार और इज्जत से रखा जाता है, जो सब खाते-पहनते हैं, वही नौकर-चाकर खाते-पहनते हैं। यदि तुम हमारे घर में रह गए तो सभ्य बन जाओगे, घर के और लड़कों की तरह पढ़-लिख जाओगे और तुम्हारी जिन्दगी सुधर जाएगी। निर्मला भी उसे नौकर बनने से पहले घर के कुछ व्यावहारिक उपदेश देती। हर्ड कहती है कि इस मोहल्ले में बहुत तुच्छ लोग रहते हैं न तो तुम्हें किसी के । घर जाना है और न ही किसी का कोई काम करना है। कोई बाजार से कुछ । लाने को कहे तो ‘अभी आता हूँ’ कहकर खिसक आना। तुम्हें घर के सभी सदस्यों से आदर व सम्मान से बोलना होगा तथा अपनी हिदायतें समाप्त करते हुए बड़ी ही उदारता के साथ वह उस लड़के के नाम में से ‘दिल’ हटा देती है। अब उसका नाम केवल ‘बहादुर’ ही बचता है।

बहादुर का परिश्रमी व हँसमुख स्वभाव

बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है, जो अपनी मेहनत से पूरे घर को न केवल साफ-सुथरा रखता है, बल्कि घर के सभी सदस्यों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है। उसके आने से परिवार के सभी सदस्य बड़े ही आरामतलबी एवं कामचोर व आलसी बन जाते हैं। इतना काम करने के बावजूद वह हमेशा हँसता रहता है। हँसना और हँसाना मानो उसकी आदत बन गई थी। वह रात में सोते समय कोई-न-कोई गीत अवश्य गुनगुनाता है।

बहादुर के प्रति किशोर का दुर्व्यवहार

निर्मला का बड़ा लड़का किशोर एक बिगड़ा हुआ लड़का है, जो शान-शौकत तथा रोब से रहना पसन्द करता है। वह अपने सारे काम बहादर को सौंप देता है। यदि बहादुर उसके काम में थोड़ी-सी भी लापरवाही करता, तो वह बहादुर को गालियाँ देता तथा छोटी-छोटी गलती पर बहादुर को पीटता भी है। बहादुर पिटकर एक कोने में चुपचाप खड़ा हो जाता और कुछ देर बाद फिर घर के

कामों में पूर्ववत् जुट जाता। एक दिन किशोर बहादुर को सुअर का बच्चा’ कह देता है, जिससे उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है और वह किशोर का काम करने से मना कर देता है। उसने लेखक के पूछने पर रोते हुए बताया कि-“बाबूजी, भैया ने मेरे मरे हुए बाप को क्यों लाकर खड़ा किया?” इतना कहकर वह रो पड़ता है।

बहादुर के प्रति निर्मला का बदलता व्यवहार

निर्मला बहुत पतली-पतली रोटियाँ सेंकती है, इसलिए वह रोटी बनाने का। काम बहादुर से न करवाकर स्वयं करती है, परन्तु मोहल्ले की किसी औरत ने उसे भड़का दिया कि परिवार के लिए रोटियाँ बनाने के बाद बहादुर से कहे कि वह अपनी रोटी खुद बना लिया करे। तुम यदि नौकरों को पतली-पतली रोटी बनाकर खिलाओगी तो उनकी आदतें खराब हो जाती हैं। निर्मला के दिमाग में उस औरत की बात घर कर जाती है। अब वह बहादर के लिए रोटियाँ सेंकना बन्द कर देती है, लेकिन बहादुर भी अपने लिए रोटियाँ नहीं सेंकता। निर्मला कई बार उसे रोटियाँ सेंकने के लिए कहती है, परन्तु बहादुर रोटियाँ बनाने के लिए मना कर देता है। निर्मला का गुस्सा बढ़ जाता है और वह लपककर उसके माथे पर तीन थप्पड़ जड़ देती है। निर्मला, बहादुर से चिढ़ जाती है। अब वह हर छोटी गलती पर उसे मारती व गालियाँ देने लगती है। निर्मला के रिश्तेदार द्वारा बहादुर पर चोरी का आरोप लगाना। एक दिन निर्मला के रिश्तेदार अपने पूरे परिवार के साथ उसके घर आते हैं। चाय-नाश्ते के बाद बातचीत के दौरान अचानक रिश्तेदार की पत्नी अपने ग्यारह रुपए खो जाने की बात कहती है। सभी बहादुर पर सन्देह करते हैं। बहादुर लगातार मना करता है कि मैंने रुपए नहीं लिए फिर भी उसे डराया-धमकाया जाता है तथा लेखक द्वारा पीटा भी जाता है। इसके बाद निर्मला भी उसे डराती-धमकाती है तथा दो-चार तमाचे भी जड़ देती है। तब भी बहादुर अपने निर्दोष होने की बात कहता है, परन्तु उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं करता। घर के सभी लोगों का बहादुर के प्रति कटुतापूर्ण व्यवहार, चोरी की घटना के बाद घर के सभी सदस्य बहादुर को घृणा व सन्देह की दृष्टि से देखने लगते हैं और उसे कुत्ते की तरह दुत्कारने लगते हैं। बहादुर भी अब उदास रहने लगता है, अब उसके मन में घरवालों के प्रति कोई अपनापन व लगाव न रहा।बहादुर को अब पहले की अपेक्षा अधिक डाँटा व मारा जाता है। उससे अब गलतियाँ व भूलें भी अधिक होने लगती हैं, जिस कारण अब वह काम में भी लापरवाही करने लगता है।

बहादुर का घर से भाग जाना

एक दिन उसके हाथ से सिल छूटकर गिर गई और उसके दो टुकड़े हो गए। पिटाई के डर तथा लोगों के क्रूर एवं असभ्य व्यवहार से तंग आकर वह अपना सारा सामान घर में ही छोड़कर कहीं चला जाता है। निर्मला, उसके पति एवं किशोर को उसकी ईमानदारी पर विश्वास हो गया था। वे जानते थे कि रिश्तेदार के रुपए उसने नहीं चराए थे। अन्त में सभी बहादुर पर स्वयं द्वारा किए गए अत्याचारों के लिए। पश्चाताप करने लगते हैं।

प्रश्न:- कहानी के तत्त्वों के आधार पर ‘बहादुर’ कहानी की समीक्षा कीजिए। अथवा ‘बहादुर’ कहानी की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अथवा ‘बहादुर’ कहानी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। 'अथवा' बहादुर’ कहानी का कथानक अपने शब्दों में लिखिए।


उत्तर:-  प्रसिद्ध नए कहानीकार अमरकान्त रचित ‘बहादुर’ कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर आधारित कहानी है। इसमें एक बेसहारा पहाड़ी लड़के की मार्मिक कथा का वर्णन है। कहानी के तत्त्वों के आधार पर प्रस्तुत कहानी की समीक्षा इस प्रकार है-

(i) कथावस्तु / कथानक

कथावस्तु की दृष्टि से अमरकान्त की सभी कहानियाँ जीवन के अन्तर्विरोधों को वास्तविक रूप में चित्रित करती हैं। उन्हें दलित, निम्न व पिछड़े वर्ग से विशेष सहानुभूति है। ‘बहादुर’ कहानी का प्रधान चरित्र उसी पिछड़े बेसहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। बहादुर बारह-तेरह वर्ष का लड़का है, जो पिता की मृत्यु के बाद, माँ की उपेक्षा व मार से खीझकर शहर भाग आता है। उसे एक मध्यम परिवार द्वारा नौकर के रूप में अपने घर में रख लिया जाता है। वह घर के सभी काम ईमानदारी व लगन से करता है। घरवालों द्वारा डाँट-फटकार तथा मार खाकर भी वह यथास्थिति काम करता रहता है। घरवालों द्वारा चोरी का आरोप लगाना उसे सबसे अधिक आघात पहुँचाता है, जिसके कारण वह एक दिन बिना किसी को बताए घर से चला जाता है। आरम्भ से अन्त तक सम्पूर्ण कहानी बहादुर के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। सहजता, स्वाभाविकता, मनोवैज्ञानिकता व यथार्थता की पृष्ठभूमि पर सुसंगठित कथावस्तु की दृष्टि से यह सफल कहानी है।

(ii) पात्र और चरित्र-चित्रण

‘बहादुर’ कहानी में मुख्य पात्र बहादुर है तथा लेखक, निर्मला, किशोर, रिश्तेदार, साले साहब, बहादुर के माता-पिता गौण पात्र हैं। कहानी की सम्पूर्ण कथावस्तु बहादुर के चरित्र पर टिकी हुई है तथा कहानी का शीर्षक भी चरित्र प्रधान है। कहानीकार ने निम्न वर्ग व मध्यम वर्ग की आन्तरिक वास्तविकताओं को उनके स्वभावगत रूप में पात्रों का चरित्र-चित्रण किया है। सभी पात्र कहानी की कथावस्तु के अनुरूप दृष्टिगत होकर अपनी-अपनी मनोवैज्ञानिकता को प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं।

(iii) कथोपकथन संवाद

प्रस्तुत कहानी का आरम्भ लेखक द्वारा आत्मकथात्मक शैली से होता है, परन्तु कहानी के मध्य में कथोपकथन/संवादों का सटीक प्रयोग हुआ है। कहानीकार ने सरल संक्षिप्त रोचक व गतिशील संवादों का सटीक प्रयोग कर कहानी के विकास को निरन्तर गति दी है; जैसे

“चल बना रोटी”

“नहीं बनाऊँगा”

“जी नहीं बाबूजी!”

अतः कहा जा सकता है, कहानी के कथोपकथन/संवाद पात्रानुकूल व स्थिति के अनुकूल सजीव बन पड़े हैं।

(iv) भाषा-शैली

प्रस्तुत कहानी में अमरकान्त ने सरल, स्वाभाविक और सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है तथा साथ ही चित्रात्मक शैली का भी प्रयोग किया है। भाषा कथा के अनुरूप है, जिसमें अन्य भाषाओं के शब्द भी लिए गए हैं; जैसे-शरारत, ओहदा, किस्सा, इज्जत आदि उर्दू शब्द हैं। लोकोक्तियों तथा मुहावरों का भी प्रयोग हुआ है; जैसे-माथा ठनकना, नौ दो ग्यारह होना, पंच बराबर होना आदि। इसके अतिरिक्त इसमें वर्णनात्मक, काव्यात्मक और आलंकारिक शैली का प्रयोग किया गया है।

(v) देशकाल और वातावरण

कहानी में देशकाल और वातावरण का भी ध्यान रखा गया है। कहानी में निम्न तथा मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सजीव तथा स्वाभाविक वातावरण का चित्रण किया गया है। अपनी आर्थिक तंगी के बावजूद समाज का मध्यम वर्ग अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करना चाहता है। नौकर पर रोब जमाना, उससे जी तोड़ काम कराना, उसे बात-बात पर बार-बार पीटना, गाली देना आदि घटनाओं तथा घर की अव्यवस्थित स्थिति ने पारिवारिक वातावरण को मार्मिक बना दिया है।

(vi) उद्देश्य

‘बहादुर’ कहानी उद्देश्य प्रधान कहानी है, यह कहानी निम्न एवं मध्यमवर्गीय समाज के मनोविज्ञान के वास्तविक चित्र को प्रदर्शित करती है। इस कहानी के माध्यम से वर्ग भेद मिटाने को प्रोत्साहन दिया गया है, जो मानवीय सहानुभूति के आधार पर ही मिट सकता है। कहानीकार ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि वर्तमान समाज झूठे प्रदर्शन व मान प्रतिष्ठा में स्वयं को इतना फँसा चुका है कि वह अपनी मनुष्यता व संवेदना को नष्ट करता जा रहा है।

(vii) शीर्षक

कहानी का ‘बहादुर’ शीर्षक आकर्षक व मुख्य पात्राधारित है। अमरकान्त जी की कहानी के शीर्षक व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित हैं। सम्पूर्ण कहानी की कथावस्तु घटनाएँ ‘बहादुर’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं बहादुर’ कहानी का शीर्षक अत्यन्त सरल, संक्षिप्त एवं रोचक है, जो पाठक के मन में कौतूहलता उत्पन्न करता है। अतः शीर्षक की दृष्टि स ‘बहादुर’ कहानी सफल व सार्थक है।

2 बहादुर’ कहानी के आधार पर बहादुर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

अथवा बहादुर’ कहानी के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर:-  बहादुर कहानी का मुख्य पात्र व नायक है। वह एक नेपाली किशोर है, जो अपने गाँव से शहर भाग आता है। बहादुर की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) छल-कपट रहित भोला बालक बारह-तेरह वर्ष का नेपाली बालक बहादुर’ बहुत ही भोला है और छल-कपट से कोसों दूर है। उसमें न तो किसी प्रकार की कृत्रिमता या बनावटीपन है और न ही किसी बात को छिपाने की कला। वह किसी भी बात का बिल्कुल सच एवं स्पष्ट उत्तर देता है।

(ii) परिश्रमी बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है। वह घर के सभी सदस्यों के अधिकांश कार्यों को करता है और उन्हें करते हुए न कोई आलस्य दिखाता है और न कोई अनमनापन। वह बड़े ही प्यार एवं जिम्मेदारी के साथ अपने कार्यों को सम्पन्न करता है।

(iii) हँसमुख एवं मृदुभाषी बहादुर हर समय हँसते रहने वाला लड़का है। वह । किसी भी बात को कहकर अपनी नैसर्गिक, स्वाभाविक हँसी जरूर हँसता है, जो सामने देखने-सुनने वालों के हृदय को झंकृत कर देती है। वह सभी लोगों के प्रश्नों का उत्तर बड़े ही मीठे स्वर में हँसकर देता है।

(iv) व्यवहार कुशल बहादुर बहुत व्यवहार कुशल बालक है। इसी व्यवहार कुशलता के कारण वह घर के सभी सदस्यों को अत्यधिक प्रभावित कर देता है। मोहल्ले के बच्चों को भी वह अपने गाने सुनाकर मोहित कर लेता है।

(v) स्नेही, सहनशील एवं स्वाभिमानी बालक वह निर्मला के अन्दर अपनी माँ की छवि देखता है। वह स्नेह का भूखा है। जब निर्मला उसका ध्यान रखती है, तो वह भी बीमार निर्मला का बहुत ख्याल रखता है। । बहादुर बड़ा सहनशील बालक है। वह घर के सारे काम करने के बावजूद निर्मला की डाँट खाता रहता है। किशोर भी बहादुर के साथ कई बार दुर्व्यवहार करता था। जिन्हें थोड़ी देर में ही वह भूल जाता है और अपने काम में पूर्ववत् लग जाता है। एक बार किशोर द्वारा उसके पिता से सम्बन्धित गाली देने पर उसका स्वाभिमान जाग जाता है। वह किशोर का काम करने से इनकार कर देता है।

(vi) मातृ-पितृभक्त बालक बहादुर का हृदय मातृभक्ति एवं पितभक्ति की भावना से ओत-प्रोत है। माँ द्वारा पीटे जाने के कारण घर से भागा बहादुर माँ के पास जाना नहीं चाहता, लेकिन माता-पिता के प्रति अपने फर्ज को वह अच्छी तरह समझता है। इसलिए वह अपने कमाए पैसों को माँ को ही देना चाहता है। अपने पिता के प्रति प्रेम ने ही उसे किशोर का काम करने से मना करने हेतु प्रेरित किया। ।

(vii) ईमानदार एवं सच्चा व्यक्तित्व गरीब होने के बावजूद भी बहादुर अत्यधिक ईमानदार बालक है, जिसे बेईमानी छु तक नहीं पाई है। उसके मन में कोई लालच नहीं है। वह घर छोड़कर जाते समय भी अपना सामान तक नहीं ले जाता है। इस प्रकार, बहादुर पाठकों के हृदय पटल पर अपना अमिट चित्र अंकित कर देता है। पाठक उसे लम्बे समय तक याद रखते हैं।

3 बहादुर कहानी के उददेश्य पर प्रकाश डालिए।

उत्तर :- अमरकान्त जी ने बहादुर कहानी में सामाजिक ढाँचे के भीतर आर्थिक विषमताओं के बीच जीवन जीने वाले दो भिन्न वर्गों के यथार्थ को चित्रित करने के साथ-साथ बाधित बचपन की कहानी को भी गति प्रदान की है।

बारह-तेरह वर्ष की उम्र के बहादुर का बचपन जीवन में लगातार आने वाली बाधाओं से रीता (खाली) ही रह गया। पहले माँ की ओर फिर। निर्मला की हृदयहीनता उसके बचपन व किशोरावस्था के सन्धिकाल के स्वाभाविक विकास में बाधा बनती है। जानवरों की भाँति क्रियाकलाप करते हुए, उसका अलमस्त रहना और हर पीड़ा के बाद सकारात्मक दृष्टिकोण से अपने लिए खुशी ढूँढ लेना बहादुर द्वारा बचपन को बचाए रखने का प्रमाण है। इसके साथ ही कहानीकार ने उस विसंगति को उजागर क्रिया है, जहाँ मध्य वर्ग की मानसिकता अपने ही वर्ग के विरोध में खड़े होकर उच्च वर्ग में शामिल होने की आकांक्षा को दिखाकर, मानवीय संवेदना को जागृत करना ही कहानी का मुख्य उद्देश्य है।

4 अमरकान्त की कहानियों का वातावरण पात्रों की मानसिक स्थिति का प्रतिबिम्बन है।” कथन के आधार पर ‘बहादुर’ कहानी की मूल संवेदना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर अमरकान्त ने ‘बहादुर’ कहानी में बहादुर के जीवन की निरन्तर तीव्र होती त्रासदी को एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए अत्यन्त सशक्त रूप में चित्रित किया है। जीवन तथा समाज के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण रखने वाले कथाकार अमरकान्त की कहानी ‘बहादुर’ के सभी चरित्र यथार्थवादी भूमि पर ही खड़े हैं। निर्मला, किशोर और गृहस्वामी जैसे पात्र केवल निर्मला के घर तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे मध्यवर्ग के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं। ये सभी पात्र परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव के कारण मानवीयता और संवेदनहीनता के अन्तर्द्वन्द्व में निरन्तर झूलते रहते हैं। अपने घर में मातृप्रेम को तरसता बहादुर,। निर्मला में माँ की और गृहस्वामी में पिता की छवि देखता है, परन्तु काँच की इन छवियों के टूटकर बिखरने और इनकी पीड़ा अनुभव करने वाला बहादुर, अन्ततः अपने भीतर के बच्चे को निर्मला के घर ही छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के पश्चात् घर में एक अजीब-सी उदासी छा जाती है; जैसे-अँगीठी न जलना, आँगन का गन्दा होना, बर्तन गन्दे होना , कहानी का त्रासद वातावरण समूचे घर की निष्क्रियता का प्रतीक बनकर सामने आता है। बहादुर की उपस्थिति जहाँ कहानी के भीतर घर के वातावरण को ऊर्जा से भर देती थी तथा व्यवस्था बनाए रखती थी, वहीं उसकी अनुपस्थिति में सुखमय घर की तस्वीर के स्थान पर घर काटने लगता है। अतः कहा जा सकता है कि बहादुर इस घर को और इस घर में रहने वालों को अपना मानता था लेकिन लगता है नौकर तो नहीं होता है फिर चाहे वो कितनी ही ईमानदारी से काम क्यों न करें।

Shubhakamana sandesh

तृतीय वर्ष, 2021 की छात्राओं के लिए विशेष संदेश

 नमस्कार 

आज  का दिन तृतीय वर्ष की छात्राओं के लिए बहुत विशेष है। उनका विदाई समारोह है, बेशक आप कॉलेज से चली जाएंगी लेकिन आप सब के साथ बिताया गया समय , आप सबका व्यवहार, काम, आप सब की बातें, आपकी यादें हमेशा हमारे साथ रहेंगी । वास्तव में देखा जाए तो ये खुशी का दिन है क्योंकि आप सब अपने मुकाम या मंजिल की और बढ़ रही हैं। 

आज मुझे पुराने विदाई समारोह भी याद आ रहे हैं, जब  लड़कियां नई साड़ियां पहन कर, सज-धज कर, बड़े जोश के साथ आती थीं, गले मिलती थीं,आंखों में आंसू होते थे, यादें होती थी... इसके साथ ही मुझे इस बात पर खेद भी है कि पिछले वर्ष हमारी बच्चियों ने ये सोचकर फेयरवेल लेने से मना कर दिया था कि शायद अगले वर्ष तक महामारी खत्म  हो जाएंगी  लेकिन हालात पिछले साल से भी ज्यादा खराब हैं,  आज परिस्थितियां बहुत ही चिंताजनक हैं, समय बहुत भयभीत करने वाला है। खैर... हिम्मत और धैर्य रखेंगे तो ये समय भी बीत ही जाएगा। कहते हैं -

"सूरज शाम को ढल ही जाता है

 फूल बसंत में खिल ही जाता है 

 मुसीबत में हिम्मत न हारना मेरे दोस्त 

 समय कैसा भी हो गुजर ही जाता है। 

 तो ये समय भी चला ही आएगा"

मैं आपको कहना चाहुंगी कि आप तो हिंदी विभाग की बेटियां हैं जिस तरह से मायके वाले अपनी बेटियों के साथ हमेशा खड़े रहते हैं हर संभव उनकी मदद करते हैं उनके अच्छे भविष्य की कामना करते हैं, उसी प्रकार  हिंदी विभाग भी आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है। आपको खुले आसमान में उड़ान भरते हुए, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है।  इस सफर में कभी भी आपको जरूरत पड़े हम हमेशा आपकी मदद के लिए तैयार हैं   

अंत में मैं 2 पंक्तियों से अपनी बात खत्म करना चाहूंगी-

सोचा!!! बहुत सोचा,

 क्या दूं मैं तुमको आज , 

बहुत ही खासमखास, 

जो रहे हमेशा तुम्हारे साथ ,

 तभी दिल पर रखा अपना हाथ ,

 हुआ मुझे एक प्यारा सा अहसास, 

और मन किया दे दूं तुम्हें आज , 

जीभकर दुआएं और आशीर्वाद  ..

अत: सभी प्यारी बालिकाओं के लिए ढेर सारी दुआएं, प्यार और आशीर्वाद। आप अपनी शिक्षा और संस्कार से भविष्य में मैत्रेयी कुटुंब का नाम रोशन करें,यही हम सब की कामना है, इसके लिए तुम्हें ढेर सारी शुभकामनाएं।

 धन्यवाद


मंगलवार, 23 मार्च 2021

चीफ की दावत - भीष्म साहनी

  भीष्म साहनी की कहानी  ‘चीफ की दावत’  


प्रस्तुत कहानी में नगरों-महानगरों में रहने वाले मध्यवर्गियों में परिवारिक मूल्यों के प्रति बढ़ती अनास्था और पनप रही अवसरवादिता का यथार्थ चित्रण किया गया है। 

भीष्म साहनी की ‘चीफ की दावत’ कहानी में मध्यवर्गीय समाज उसके परिवेश और मानसिकता को वास्तविकता के साथ अभिव्यक्त किया है। इसी अभिव्यक्ति में इनकी कहानियों में वैयक्तिक चेतना का किंचित पुट लक्षित होता है। इस वर्ग की कुण्ठाओं, घुटन, बिखराव को यथार्थ के धरातल पर रेखांकित किया है। खोखली मर्यादाओं, बाह्य आडम्बरों और आरोपित नैतिकता के प्रति भीष्म साहनी ने व्यंग्यपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया

भीष्म साहनी की कहानियों में यथार्थ के प्रति आग्रह दिखाई देता है, जिसके पीछे विशेष रूप से आदर्श की स्थापना का हेतु है। नगरों-महानगरों के लोग पारिवारिक मूल्यों की खिल्ली उड़ाते नजर आते है। ऐसे में वे यह भूल जाते है कि जीवन कितना खोखला होता जा रहा है। अपने बड़ों के प्रति असंवेदनशील होने से, ममता, दया, करुणा, सहानुभूति जैसे जीवन के मूलभूत तत्व लुप्त होते जा रही है। इसी प्रकार के यथार्थ को प्रस्तुत कहानी में चित्रित किया है। प्रगतिशील कहानीकार होते हुए भी भीष्म साहनी की कहानियाँ आक्रोशयुक्त राजनीति की शिकार नहीं हुई है। प्रस्तुत कहानी में मध्यवर्गीय के हृदय की थाह ली गई है। व्यंग्य के पुट द्वारा कहानी मार्मिक बनी है।


कहानी के मुख्य बिंदु -


1 मध्यवर्गीय अवसरवादिता और मानवीय मूल्यों का विघटन

2 आधुनिकता, सुसंस्कृति का पाखंड और अवसरवादिता

3 कहानी का निहित उद्देश्य

4 कहानी का कलात्मक पक्ष

5 सारांश

1 मध्यवर्गीय अवसरवादिता और मानवीय मूल्यों का विघटन- 


भीष्म साहनी एक प्रगतिशील कलाकार हैं, इन्होंने कहानियों के साथ ही उपन्यासों और नाटकों की भी रचना की है।भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ की दावत’ का मुख्य उद्देश्य मध्यम वर्गीय व्यक्ति की अवसरवादिता, उसकी महत्वाकांक्षा में पारिवारिक रिश्ते के विघटन को उजागर करना है। मध्यवर्ग के व्यक्ति की यह सामान्य विशेषता है कि वह उच्च वर्ग में शामिल होने के अवसरों की तलाश में रहता है, चाहे वह स्वयं निम्नवर्ग से मध्यवर्ग में पहुँचा हो। . औद्योगीकरण के विकास के साथ भारत में मध्यवर्ग का तेजी से विकास हुआ। शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरी पाकर या आजीविका का अन्य साधन पाकर निम्नवर्ग का व्यक्ति मध्यवर्ग में पहुँच कर उच्चवर्ग की संस्तुति के लिए उच्चवर्ग के मुँह की ओर ताकने लगा। इस कहानी का नायक श्यामनाथ दफ्तर की नौकरी पाकर उच्च पद पाने की महत्वाकांक्षा रखने लगा और उस की पूर्ति के लिए अपने दफ्तर के विदेशी चीफ की खुशामद में लग गया। चीफ की दावत का प्रबन्ध अपने घर में करके वह अपनी बूढी माँ की उपेक्षा करता है। महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए माँ के साथ उस का खून का रिश्ता भी गौण हो जाता है। आधुनिक परिवारों में बूढों की किस प्रकार उपेक्षा होती है और उन की क्या दुर्दशा होती है, यह दिखाना भी इस कहानी का उद्देश्य है।आधुनिक दिखने की चाह में मध्यवर्गीय व्यक्ति प्रदर्शन प्रिय हो गया और बूढ़ी माँ चीफ की दावत के समय प्रदर्शन योग्य वस्तु नहीं, बल्कि कूड़े की तरह कही छिपाने की वस्तु हो गई है। इस झूठी प्रदर्शन प्रियता और छद्म आधुनिकता की कलात्मक व्यंजना इस कहानी में हुई है। समग्रतः ‘चीफ की दावत’ पारिवारिक जीवन मूल्यों के विघटन को स्पष्ट करने के उद्देश्य को लेकर लिखी गई कहानी है। लेकिन माँ की ममता और उसके महत्व की स्थापना के माध्यम से लेखक ने माँ के रूप तथा स्वस्थ पुरानी परम्परा को वरेण्य सिद्ध किया है। श्यामनाथ जिस माँ को उपेक्षित होने लायक वस्तु मान रहे है, उसी के माध्यम से उसकी पदोन्नति होती है। चीफ की दावत कहानी के घटनाक्रम के विकास के आधार पर इसे दो भागों में बाँट कर विश्लेषित किया जा सकता है। यह कृत्रिम विभाजन है, पर अध्ययन की सुविधा के लिए यह विभाजन किया गया है। पहले भाग में चीफ की दावत के लिए की जा रही तैयारी के दृश्य हैं। श्यामनाथ और उस की पत्नी घर की सजावट, विशेषतः ड्राइंग रूम की सजावट, के लिए विशेष चिन्तित हैं। आधुनिक दिखने के लिए और उच्चवर्ग के विदेशी चीफ की नजरों में सुंसस्कृत दिखने के लिए यह प्रदर्शनप्रियता उनके लिए आवश्यक हो गई है। घर को सजाना सामान्यतः सुरुचि का परिचायक है। हर कोई अपने घर को, बैठक को अच्छी दशा में देखना चाहता है। यह सुरुचि सम्पन्नता मानव का विशेष गुण है। बल्कि कहा जा सकता है कि इस आदिम सुरुचि से पशु जगत भी खाली नहीं है! तभी तो कुत्ता जहाँ बैठता है, उस जगह को अपनी पूंछ से साफ कर लेता है। कहानी के प्रारम्भ में ही श्यामनाथ की सुसंस्कृति सम्पन्नता की प्रवृत्ति हास्यास्पद प्रतीत होने लगती है। सुसंस्कृत और सुरुचि सम्पन्न होना एक बात है, पर वैसा दिखना दूसरी बात है, अर्थात प्रदर्शन प्रियता है। प्रायः ऐसा होता है कि व्यक्ति में जिस गुण या चीज का अभाव होता है या उसकी कमी होती है, उसका ही वह प्रदर्शन करता है। श्यामनाथ और उस की पत्नी की यह तथाकथित रुचि सम्पन्नता और सांस्कृतिकबोध वहाँ अपने असली रुप में दिखाई देता है, जहाँ श्यामनाथ की बूढी माँ उन दोनों के लिए कूड़े की तरह छिपाने की वस्तु बन जाती है। जब कूडे और माँ में कोई अन्तर नहीं रहता, तब वहाँ सुरुचि सम्पन्नता और आधुनिकता बोध नहीं, व्यक्ति की फूहड़ता प्रकट होती है। कहानी के इस भाग में कहानीकार ने श्यामनाथ के छद्म आधुनिकता बोध, संस्कृति के नाम पर उसकी प्रदर्शन प्रियता की प्रवृति को स्वाभाविक तथा कलात्मक ढंग से प्रस्तुत कर दिया है। कथाक्रम में आगे दिखाया गया कि जब श्यामनाथ को लगा कि घर में माँ को छिपाया नहीं जा सकता और उसे पडोस की विधवा के घर भेजने से भी उसकी नाक कट जाएगी, तब उसे यह चिन्ता सताने लगी कि चीफ के आने पर माँ कहाँ बैठगी, कैसे – बैठेगी, कौन से कपड़े पहनेगी और कौन सा जेवर पहनेगी। दूसरे शब्दों में उसकी चिन्ता यह थी कि प्रदर्शन के अयोग्य माँ को प्रदर्शन की वस्तु (show piece) कैसे बनाया जाए। इस बारे में माँ के साथ उसके संवाद बड़े रोचक और अर्थगर्भित है। “और माँ हम लोग पहले बैठक में बैठेंगे। उतनी देर तुम वहाँ बरामदे में बैठना। फिर जब हम वहाँ आ जाएँ, तो तुम गुसलखाने के रास्ते बैठक में चली जाना।” माँ अवाक् बेटे का चेहेरा देखने लगी। फिर धीरे से बोली – “अच्छा, बेटा।’ (एक दुनिया समानान्तर – पृ. 224) माँ कहाँ बैठेगी, इस बारे में निर्देश देकर श्यामनाथ ने एक समस्या का समाधान तो कर लिया। दूसरी चिन्ता को श्यामनाथ ने कैसे दूर करने की कोशिश की, यह इस उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है| एक कुर्सी को उठा कर बरामदे में कोठरी के बाहर रखते हुए बोले – “आओ माँ, इस पर जरा बैठो तो।” माँ माला सँभालती, पल्ला ठीक करती हुई उठी, और धीरे से कुर्सी पर आकर बैठ गई। “यूँ नहीं, माँ, टाँगे ऊपर चढ़ाकर नहीं बैठते। यह खाट नहीं है। माँ ने टाँगें नीचे उतार लीं।” (एक दुनिया समानान्तर – पृ. 224) तात्पर्य यह कि श्यामनाथ अपनी माँ को उचित स्थान पर उचित ढंग से उसी प्रकार रखने के लिए व्यग्र दिखाया गया है, जैसे वह घर के सामान को सजाने के लिए प्रयत्नशील था। कहानी के इस भाग में श्यामनाथ अपनी माँ को यह निर्देश भी देता है कि वह कैसी साड़ी पहने। वह माँ को कुर्सी पर बैठ कर सोने की मनाही भी कर जाता है, क्योंकि सोते समय माँ जोर के खर्राटे लेती है, जिस से चीफ की दावत में बाधा पड़ सकती है। माँ का उत्तर बड़ा करुण है “क्या करूँ बेटा, मेरे बस की बात नहीं है। जब से बीमारी से उठी हूँ नाक से सांस नहीं ले सकती।” (वही – पृ. 224) श्यामनाथ की एक समस्या यह भी है कि वह अपनी सम्पन्नता का प्रदर्शन कैसे करे| घर के कोने-कोने को सजा कर और विशेष रुप से बैठक को सजा कर वह अपनी सुरुचि के साथ अपनी सम्पन्नता और समृद्धि का प्रदर्शन कर के चीफ के ऊपर अपनी धाक जमाना चाहता है। इस इच्छा से प्रेरित होकर वह माँ को निर्देश देता है कि वह सफेद कमीज और सफेद सलवार पहन ले। माँ नये कपड़े पहन कर आई तो उस से श्यामनाथ का जो संवाद हुआ, वह उस की शूद्र मानसिकता का परिचायक है। “चलो ठीक है। कोई चूड़ियाँ-बूड़ियाँ हों तो वह भी पहन लो। कोई हर्ज नहीं।” “चूड़ियाँ कहाँ से लाऊँ बेटा, तुम तो जानते हो, सब जेवर तुम्हारी पढ़ाई में बिक गए।” यह वाक्य श्यामनाथ को तीर की तरह लगा। तुनक कर बोले “यह कौन सा राग छेड़ दिया माँ, सीधा कह दो, नहीं है जेवर, बस। इसमें पढ़ाई-वढ़ाई का क्या ताल्लुक है?” ऊपर के संवाद से स्पष्ट हो जाता है कि उस की पढ़ाई में माँ ने जेवर बेचकर जो त्याग और वात्सल्य का प्रमाण दिया था, उस के उल्लेख मात्र से वह खिन्न हो गया। उसकी खिन्नता से लगता है कि वह अपने ऊपर किए गए माँ के एहसान को स्वीकार नहीं करता और अपनी माँ के वात्सल्य का अपमान इन शब्दों में करता ‘जितना दिया था उस से दुगना ले लेना।’ क्योंकि माँ की ममता के मूल्य को कभी चुकाया जा सकता है? पर इस कहानी का श्यामनाथ माँ के एहसान को ना ही मानता, बल्कि उस के वात्सल्य का अपमान भी करता है। माँ ने अपनी विपन्नता का केवल संकेत किया था, क्योंकि उसके पास कोई जेवर नहीं बचा था, पर अपनी समृद्धि के प्रदर्शन के नशे में मस्त श्यामनाथ माँ की विपन्नता के उल्लेख मात्र से तिलमिला गया। यह उसकी प्रदर्शनप्रियता के साथ उसकी शूद्रता का सूचक है। इस प्रकार ‘चीफ की दावत’ कहानी के प्रथम भाग में मध्यवर्गीय व्यक्ति के अवसरवादी चरित्र का उद्घाटन हो जाता है। श्यामनाथ के माध्यम से कहानीकार ने पारिवारिक जीवन मूल्यों के विघटन, और . परिवार में बूढ़ों की दुर्दशा का चित्रण किया है। श्यामनाथ के घर में बूढ़ी माँ की जो दुर्दशा है, वह अनेक परिवारों में बूढ़ों की होगी।


2. आधुनिकता, सुसंस्कृति का पाखंड और अवसरवादिता


‘चीफ की दावत’ कहानी के दूसरे भाग में दावत के समय की स्थितियों, श्यामनाथ और उसकी पत्नी के खुशामदपूर्ण व्यवहार, चीफ के सामने पड़ने पर माँ की विचित्र स्थिति आदि का वर्णन है। दावत के समय भोजन से पहले शराब का दौर रात के लगभग साढ़े दस बजे तक चला। यह पश्चिमी सभ्यता का सूचक है। इस कहानी का चीफ तो विदेशी है, पर अतिथियों में अन्य कई हिन्दुस्तानी हैं। पर सब पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे दिखाए गए हैं। दावत में उपस्थित सभी पुरुष और महिलाएँ बेहिचक शराब पीती हैं और वह भी कई घंटों तक। चीफ की पत्नी हिन्दुस्तानी औरतों की दृष्टि का केन्द्र बनी हुई है। शराब के नशे के बीच खुशामद, हँसी, कहकहों की लहरें उठती गई, पर श्यामनाथ की माँ बरामदे में कुर्सी पर बैठी रही और थक कर सो गई तो खर्राटों की आवाज आने लगी। कहानी के इस भाग में माँ की विचित्र स्थिति, और उसकी विवशता को बड़ी कुशलता से दिखाया गया है। बरामदे में कुर्सी पर बैठी, सोती हुई और खर्राटे लेती हुई माँ आखिर चीफ और अतिथियों के सामने पड़ ही गई। वही स्थिति सामने आ गई, जिसे श्यामनाथ टालना चाहता था। माँ हड़बड़ा कर उठी। श्यामनाथ ने चीफ द्वारा माँ को नमस्ते कहने के जवाब में माँ को हाथ मिलाने का आदेश दिया। माँ ने अपना बायाँ हाथ आगे कर दिया तो सब कहकहे लगाने लगे। हाथ मिला कर अभिवादन करना पश्चिमी ढंग है. पर माँ को इसके लिए विवश किया गया। पर ऐसा करते हए वह सब के उपहास का पात्र बन गई। श्यामनाथ इतने पर संतुष्ट नहीं हुआ। चीफ ने माँ से पूछा “How do you do?” तो श्यामनाथ ने अनपढ़ माँ से अंग्रेजी शब्दों को दुहराने का आदेश दिया। पर जब माँ “हौ डू डू’ ही कह सकी तो फिर कहकहे की आवाज गूंज उठी। माँ बेटे के आदेश का पालन करने और सब के उपहास के केन्द्र बनने के लिए विवश थी। माँ की विवशता के कई करुण चित्र कहानी के इस भाग में देखे जा सकते हैं। श्यामनाथ चीफ की खुशामद में इतना सक्रिय है कि उसे खुश करने के प्रयत्न में वह अपनी माँ का उपयोग करना आवश्यक मानता है। चीफ की इच्छा जान कर वह माँ से गाने की फरमाइश भी कर बैठा। यहाँ भी माँ की विवशता बड़ी करुण हो उठी। मना करते करते भी उसे पंजाबी लोकगीत गाना पड़ा और उसके गाने पर भी हँसी और कहकहों के स्वर तेज हो गए। उस दृश्य को कहानीकार ने यो प्रस्तुत किया है “बरामदा तालियों से गूंज उठा। साहब तालियाँ पीटना बन्द ही न करते थे। श्यामनाथ की खीज प्रसन्नता और गर्व में बदल उठी थी। माँ ने पार्टी में नया रंग भर दिया था।” (एक दुनिया समानान्तर – पृ. 228) माँ की विवशता श्यामनाथ के लिए ‘प्रसन्नता और गर्व’ का कारण थी। यह प्रसन्नता कितनी झूठी है और गर्व कितना खोखला है, कहानी के पिछले भाग पर ध्यान देने से स्पष्ट हो जाता है, जहाँ श्यामनाथ की मुख्य चिन्ता यह थी कि माँ को चीफ की नजरों से कैसे दूर रखा जाए और उसे घर के कूड़े की तरह कहाँ छिपाया जाए। कहानी के दूसरे भाग में एक और प्रसंग है, जिससे स्थिति का विद्रूप और स्पष्ट हो जाता है। चीफ के सामने फुलकारी का उल्लेख हुआ तो श्यामनाथ ने माँ को फुलकारी दिखाने का आदेश दे डाला। वह बिचारी अपनी पुरानी फटी फुलकारी ले आई। माँ की विपन्नता का हाल फटी हुई फुलकारी बता रही थी। इस स्थिति को कहानीकार ने यों प्रस्तुत किया .“साहब बड़ी रुचि से फुलकारी देखने लगे। पुरानी फुलकारी थी, जगह जगह से उसके तागे टूट रहे थे और कपड़ा फटने लगा था। साहब की रुचि देखकर श्यामनाथ बोले – ‘यह फटी हुई है, साहब, मैं आपको नयी बनवा दूंगा। माँ बना देंगी। क्यों माँ, साहब को फुलकारी बहुत पसन्द है, इन्हें ऐसी ही एक फुलकारी बना दोगी न?” माँ चुप रही। फिर डरते-डरते धीरे से बोली “अब मेरी नजर कहाँ है, बेटा! बूढ़ी आँखें क्या देखेंगी।” मगर माँ का वाक्य बीच में ही तोड़ते हुए श्यामनाथ साहब से बोले “वह जरूर बना देंगी। आप उसे देख कर खुश होंगे।” (वही पृ. 228) ऊपर के उद्धरण से स्पष्ट है कि श्यामनाथ माँ को नई फुलकारी लाकर नहीं दे सका, पर साहब के लिए वह नई फुलकारी बनवाने के लिए चिन्तित है। साहब को फुलकारी पसन्द है, यह बात उसके लिए अधिक महत्वपूर्ण है। माँ की नजर कमजोर है और नई फुलकारी बनाने के योग्य नहीं, यह बात उपेक्षणीय है। इसलिए माँ की असमर्थता और उसकी मनाही की उपेक्षा करके वह उसे साहब के लिए नई फुलकारी बनाने का आदेश देता है, क्योंकि साहब ‘उसे देखकर खुश होंगे।’ माँ की असमर्थता और विवशता के बावजूद श्यामनाथ को साहब की खुशी चाहिए। साहब खुश होंगे तो उसकी तरक्की होगी। ‘चीफ की दावत’ कहानी का अन्त बड़ा करुण और स्वाभाविक है। दावत के अंत में कहानीकार ने माँ की दयनीय अवस्था का जो चित्र खींचा है, वह बड़ा करुण तथा मार्मिक है। दावत के बाद माँ अपनी कोठरी में चली गई ओर अश्रु की नदी में डूब गई। आधी रात के बाद बेटे ने कोठरी का दरवाजा खटकाया तो माँ का दिल बैठ गया। वह अनेक आशंकाओं से भर उठी। वह सोचने लगी कि उस से फिर कोई भूल हो गई, जिसके लिए उसके बेटे ने उसे क्षमा नहीं किया। इस से अनुमान लगाया जा सकता है कि बूढ़ी माँ बेटे के घर में घुट-घुट कर जी रही थी। इस घुटन भरे वातावरण से मुक्ति पाने के लिए उसने बेटे के सामने प्रस्ताव रखा कि उसे हरिद्वार भेज दे, जिसे श्यामनाथ ने अपनी बदनामी के डर से स्वीकार नहीं किया। फिर उसने दूसरी चिन्ता यह प्रकट की- ‘तुम चली जाओगी तो फुलकारी कौन बनाएगा? साहब से तुम्हारे सामने ही फुलकारी देने का इकरार किया है।’ “मेरी आँखें नहीं हैं, बेटा, जो फुलकारी बना सकूँ। तुम कहीं और से बनवा लो। बनी बनाई ले लो।”“माँ, तुम मुझे धोखा देकर यूँ चली जाओगी? मेरा बनता काम बिगाड़ोगी? जानती नहीं, साहब खुश होगा तो मुझे तरक्की मिलेगी। (वही, पृ. 229) बेटे की तरक्की की आशा देख कर माँ ने फुलकारी बनाने का वादा कर लिया। बेटे को माँ की लाचारी का ध्यान नहीं आया, पर माँ बेटे की तरक्की की आशा देखकर अपनी लाचारी भूल गई और फुलकारी बनाने को तैयार हो गई। पुत्र के दुर्व्यवहार के बाद भी माँ बेटे की तरक्की की आशा मात्र से अपना दुख भूल गई। श्यामनाथ की माँ वात्सल्य की प्रतिमा के रूप में चित्रित हुई है और श्यामनाथ मध्यवर्ग के एक दुनियादार, महत्वाकांक्षी, खुशामदी, प्रदर्शन-प्रिय, अवसरवादी व्यक्ति के रूप में ही दिखाया गया है। कहानीकार ने उसे ‘मिस्टर शामनाथ’ के रूप में प्रस्तुत किया है। यहाँ ‘मिस्टर’ शब्द मनमाने ढंग से ‘श्री’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त नहीं हुआ है, बल्कि पश्चिमी सभ्यता के रंग में डूबे उसके आधुनिक चरित्र का सूचक है।


3. कहानी का निहित उद्देश्य


चीफ की दावत कहानी नयी कहानी के दौर की एक विशिष्ट कहानी है। इसमें भी मध्यवर्गीय मानसिकता और पारिवारिक संबंध बड़ी कुशलता से समाविष्ट हुए हैं। लेकिन भीष्म साहनी, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर आदि भाववादी-व्यक्तिवादी कहानीकारों से भिन्न यथार्थवादी प्रगतिवादी कहानीकार हैं। इन्होंने स्वस्थ परम्परा और पारिवारिक संबंधों के महत्व को स्वीकार किया है। अन्य नए कहानीकार जहाँ माँ-बाप और सगे संबंधियों को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं, वहाँ भीष्म साहनी ने संबंधों के महत्व को स्वीकार किया है। अतः इस कहानी में लेखक ने माँ को पुरानी परंपरा का . एक प्रतीक भी माना है। पार्टी के दौरान श्यामनाथ की महत्वाकांक्षा पर पानी फिर चुका था, क्योंकि पदोन्नति के संबंध में कोई बात नहीं हो पाई थी। माँ की वजह से श्यामनाथ का चीफ के साथ एक पारिवारिक रिश्ता कायम होता है, जिससे चीफ फिर घर पर आने और फुलकारी ले जाने का वादा करता है। इस तरह माँ रूपी परंपरा के कारण ही श्यामनाथ को पदोन्नति की आशा बंधती है और उसके साथ हार्दिक रूप से जुड़ पाता है। इन सभी तथ्यों को भीष्म साहनी ने माँ के माध्यम से अत्यंत बारीकी से संकेतित कर दिया है। गंदे कूड़े की तरह छिपाने की वस्तु बनने वाली माँ श्यामनाथ के लिए पदोन्नति का सार्थक दरवाजा बनकर प्रतिष्ठित हुई है। इस प्रकार भीष्म साहनी ने मध्यवर्गीय यथार्थ के टुच्चेपन पर एक प्रगतिशील परिप्रेक्ष्य अपनाया है। माँ के रूप में पुरानी किंतु स्वस्थ परंपरा त्याज्य नहीं, वरन् वरेण्य बनकर प्रस्तुत हुई है।


4. कहानी का कलात्मक पक्ष


यह कहानी यथार्थवादी शिल्प में लिखी गई है। इस प्रकार यह यथार्थवादी कहानी कही जा सकती है। मध्यवर्गीय परिवार की यथार्थ स्थिति का इसमें अंकन है। यथार्थ स्थिति के कई पक्ष इस में उद्घाटित हुए हैं, जैसे मध्यवर्गीय व्यक्ति की अवसरवादिता, आधुनिकता का आडम्बर, प्रदर्शन प्रियता, पारिवारिक रिश्तों के प्रति उपेक्षा श्यामनाथ के  व्यवहारों से प्रकट हुई है। साथ ही मध्यवर्गीय व्यक्ति की मानसिकता उसके व्यवहारों, शब्दों के माध्यम से भी व्यक्त हुई है, जिससे यथार्थ चित्रण में मनोवैज्ञानिकता का समावेश भी हो गया है। कहा जा सकता है कि कहानी में यथार्थ का चित्रण मनोविज्ञान के आलोक में किया गया है। भीष्म साहनी यथार्थवाद का जो अर्थ लेते हैं, उस पर ध्यान दें तो यथार्थवादी शिल्प पर भी प्रकाश पड़ेगा। ‘हिन्दी कहानी संग्रह (प्रकाशक – साहित्य अकादमी, दिल्ली, पृ. 14, तृतीय संस्करण सन् 1994) की भूमिका में भीष्म साहनी ने यथार्थवाद के बारे में लिखा ‘किसी घटना का यथावत् चित्रण ही यथार्थ नहीं कहलाता, उसकी तह में काम करने वाले तत्वों और अन्तर्विरोधों की पकड़ रचना को यथार्थवादी बनाती है। प्रस्तुत कहानी में चित्रित श्यामनाथ और उसकी पत्नी के व्यवहारों के पीछे छिपे स्वार्थों, और अन्तर्विरोधों को लेखक ने कुशलता से सूचित किया है। विभिन्न पात्रों के संवादों में उनकी मनःस्थितियाँ ध्वनित हो जाती हैं। उपेक्षित माँ की घुटन उसके संक्षिप्त संवादों और विभिन्न क्रियाकलापों से स्पष्ट हो जाती है। समग्रतः कहा जा सकता है कि जीवन के यथार्थ और पात्रों के मनोविज्ञान का कुशल समन्वय इस कहानी में हुआ है। ‘चीफ की दावत’ कहानी में शहरी व्यक्ति की बोलचाल की भाषा प्रयुक्त हुई है, जिसमें संस्कृत शब्दों के बजाए उर्दू शब्दों, तद्भव शब्दों के प्रति लेखक की अधिक रूचि प्रकट होती है। भीष्म साहनी मिली जुली भाषा के प्रयोग में सिद्धहस्त हैं। भाषा के बारे में उनका दृष्टिकोण शुद्धतावादी नहीं है। भाव स्थितियों के मूर्तीकरण के लिए उन्हें जिस किसी स्रोत से शब्द मिले वे ले लेते हैं। इस कहानी में आधुनिकता के सूचक कुछ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी हुआ है, जैसे ड्रैसिंग गाउन, पाउडर, मिस्टर, नैपकिन, ड्रिंक, डिनर, चीफ, साइज़ आदि। श्यामनाथ संज्ञा के पहले कहानीकार ने ‘मिस्टर’ शब्द जानबूझ कर लगाया है, जो श्यामनाथ के व्यक्तित्व के अंग्रेजीकरण का सूचक है। कहानीकार ने श्यामनाथ को कई जगह “मिस्टर श्यामनाथ’ लिखा है। फिर मुख्य अतिथि के लिए भी ‘चीफं’ शब्द का प्रयोग किया है। कहानी का शीर्षक ‘चीफ की दावत’ कहानी की मुख्य कथा वस्तु, उसके मुख्य घटना स्थल, और उसकी मुख्य संवेदना के अनुकूल है। ‘चीफ’ कोई भी हो सकता है, इसलिए उसका नाम नहीं बताया गया, पर प्रत्येक ‘ चीफ’ को खुश करने के लिए उसे दावत देना जरूरी है। आधुनिक संस्कृति दिखावे की संस्कृति है, पर इस संस्कृति में माँ के लिए कोई स्थान नहीं है। इसीलिए दावत के समय माँ को कूड़े की तरह छिपाने की आवश्यकता महसूस होती है। कहानी का शीर्षक कहानीकार की भाषागत रुचि की ओर भी संकेत करता है। शीर्षक कहानी से अलग नहीं होता। उसे उसका आवश्यक भाग ही मानना चाहिए। इसलिए प्रत्येक कहानी का कोई सधा हुआ शीर्षक होता है। यह शीर्षक भी सधा हुआ और सोच-समयकर बनाया गया है।


5. सारांश

प्रस्तुत कहानी के प्रथम भाग में ‘चीफ की दावत’ के लिए की जा रही तैयारी का वर्णन है। इसमें श्यामनाथ और उसकी पत्नी लगी है। उन्हें विदेशी चीफ की नजरों में आधुनिक तथा सुसंस्कृत दिखने की अधिक चिंता है। इस चिंता के कारण से सामान्यतः पूरे घर की सजावट और विशेषतः ड्राइंग रूम की सजावट पर विशेष ध्यान देते हैं। प्रत्यक वस्तु को उसके उचित स्थान पर रखने और घर के कूड़े को कहीं छिपाने के लिए दोनों प्रयत्नशील है। वह ड्राइंगरूम को एक प्रदर्शनी बनाना चाहते हैं। आधुनिकता और संस्कृति के प्रदर्शन की तैयारी में एक बाधा तब उपस्थित हो गई जब श्यामनाथ का ध्यान अपनी बूढ़ी माँ की ओर गया, जो उसकी नजरों में प्रदर्शन के योग्य नहीं है और इसलिए वह चीफ से मिलाने के योग्य नहीं है। तब बूढी माँ उसके लिए एक फालतु सामान या कूड़े में रुपांतरित हो जाती है। कूड़ा और उसकी माँ में कोई अंतर नहीं रहता। श्यामनाथ अपनी माँ से दुर्व्यवहार करता है। इससे उसके सुसंस्कृत होने का पता नहीं चलता, बल्कि उसका टुच्चापन, उसकी अवसरवादिता और शूद्रता ही उजागर होती है। कहानी में शुरू में यह भी दिखाया गया है कि जब श्यामनाथ का ध्यान अपनी माँ की ओर गया और उसे लगा कि उसे चीफ की नज़रों से ओझल नहीं किया जा सकता तो उसने माँ को प्रदर्शन योग्य बनाने का निश्चय कर लिया। पहले माँ को छिपाने की चिन्ता सता रही थी, अब वह माँ को प्रदर्शन की वस्तु बनाने में लग गया। उसने माँ को बताया कि कैसे कुर्सी पर बैठा जाए और वह कैसे कपड़े पहने। जैसे उसने ड्राइंग रूप और बरामदे में प्रत्येक वस्तु को उचित स्थान पर उचित ढंग से सजा दिया था, वैसे माँ को भी सजावट के सामान की तरह उचित स्थान पर उचित ढंग से बिठाने की कोशिश करने लगा। जब चीफ और अन्य अतिथि ड्राइंग रूम में हों तो माँ के लिए उचित स्थान बरामदे में कुर्सी निर्धारित की गई और उसे यह भी बता दिया गया कि वह कुर्सी पर पाँव लटका कर बैठे और सोये नहीं, क्योंकि सोने पर उसके खर्राटे दावत में बाधा डाल सकते हैं। श्यामनाथ की एक चारित्रिक विशेषता अपनी झूठी सम्पन्नता के प्रदर्शन की भी है। आधुनिकता और सुसंस्कृति के प्रदर्शन की तरह वह अपनी समृद्धि का भी प्रदर्शन करना चाहता है। तभी उसने माँ से पूछा कि सोने की चूड़ियाँ कहाँ हैं और वह उन्हें पहन ले, ताकि अतिथियों को पता लग जाए कि उसकी बूढ़ी माँ हाथों में सोने की चूड़ियाँ पहने है। माँ द्वारा यह सूचना पाकर कि सारे जेवर उसकी पढ़ाई में बिक गए, श्यामनाथ तिलमिला जाता है। उसकी तीखी प्रतिक्रिया से माँ के प्रति अवमानना, कृतघ्नता तथा उसकी शुद्रता का पता चलता है। वह माँ की ममता का मूल्य चुकाने की बात कह कर उसके वात्सल्य का भी अपमान करता है। यहाँ मध्यवर्गीय व्यक्ति की प्रदर्शन प्रियता, आधुनिकता और सुसंस्कृति का पाखंड, पारिवारिक जीवन मूल्यों का विघटन, बूढ़ों की दुर्दशा आदि समस्याएँ श्यामनाथ के क्रियाकलापों के माध्यम से सफलतापूर्वक उद्घाटित हो जाती हैं। कहानी के दूसरे भाग में चीफ की दावत के समय के वातावरण का कुशल अंकन है। भोजन से पहले शराब का लम्बा दौर रात के साढ़े दस बजे तक चला। श्यामनाथ और उसकी पत्नी का खुशामदपूर्ण व्यवहार परिस्थिति के अनुकूल है। दावत में विदेशी अफसर सब की दृष्टियों का केंद्र है और उसकी पत्नी सब महिला अतिथियों की आँखों की पुतली बनी हुई है। दावत में सभी स्त्री पुरुष शराब पीते हुए दिखाए गए हैं। यह पश्चिमी सभ्यता का सूचक है। इस रंगीन वातावरण से अलग श्यामनाथ की बूढ़ी माँ बरामदे में कुर्सी पर बैठी-बैठी थक कर सो गई और खर्राटों की आवाज वातावरण में गूंजने लगी। कहानी के इस भाग में माँ की विचित्र स्थिति और उसकी विवशता का कुशल वर्णन है। मदिरापान के लम्बे सत्र की समाप्ति के बाद चीफ और अन्य अतिथि भोजन के लिए बरामदे में आए तो चीफ के सामने खर्राटे लेती माँ पड़ गई। श्यामनाथ ने माँ को चीफ का स्वागत करने के लिए कहा तो माँ ने हाथ जोड़ दिए, पर चीफ ने अपना हाथ बढ़ाया तो माँ को आदेश मिला कि वह साहब से हाथ मिलाए। उसने बायाँ हाथ आगे कर दिया, पर सबके उपहास और कहकहों का केन्द्र बन गई। चीफ द्वारा ‘how do you do’ कहने पर श्यामनाथ ने अनपढ़ माँ को अंग्रेजी शब्दों को दोहराने के लिए विवश किया और उससे जब ‘हौ ड्रडू’ कहते नहीं बना तो वह फिर सब के उपहास का पात्र बन गई। माँ की विवशता के कई करुण चित्र इस कहानी में बिखरे पड़े हैं। चीफ की इच्छा जान कर श्यामनाथ अपनी माँ से गाने की फरमाइश कर बैठा। मना । करते करते भी उसे एक पंजाबी लोक गीत की कुछ पंक्तियाँ गानी पड़ी। यह श्यामनाथ के लिए प्रसन्नता और गर्व की बात थी, क्योंकि माँ ने पार्टी में नया रंग भर दिया था। कहानी के उस मोड़ पर बूढ़ी माँ की स्थिति तब और भी निरीह हो गई जब उसके बेटे ने आदेश दिया कि चीफ को अपनी फुलकारी दिखा दे। उसने पुरानी फटी हुई फुलकारी आगे कर दी। साहब ने फुलकारी में थोड़ी रुचि दिखाई तो श्यामनाथ ने तुरंत वादा कर लिया कि उसकी माँ उसके लिए नई फुलकारी बना देगी। उसकी सबसे बड़ी चिन्ता साहब को खुश करने की थी। साहब की खुशी पर उस ने अपनी बूढी लाचार माँ की विवशता ओर कमजोर आँखों को न्योछावर कर दिया। माँ की असमर्थता के बावजूद उसे साहब की खुशी चाहिए। मध्यवर्गीय परिवार का आधुनिक व्यक्ति अपने बुजुर्गो की कितनी उपेक्षा करता है, वह बूढ़ी माँ के प्रति श्यामनाथ के व्यवहार से स्पष्ट है। दावत के बाद माँ अपनी कोठरी में जा कर आँसुओं की नदी में डूब गई। आशंकाओं के बीच जब उसने कोठरी का दरवाजा खोला तो उसने घुटन भरे वातावरण से मुक्ति पाने के लिए श्यामनाथ से कहा कि वह उसे हरिद्वार छोड़ आए। माँ की घुटन और विषाद को अनदेखा कर श्यामनाथ क्रुद्ध होकर बोला – “तुम चली जाओगी तो फुलकारी कौन बनाएगा?” अपनी तरक्की का सपना दिखा कर उसने माँ को साहब के लिए फुलकारी बनाने के लिए राजी कर लिया। बेटे की कृतघ्नता के आगे माँ का वात्सल्य विजयी हुआ। बेटे की तरक्की की आशा में माँ अपना दुःख भूल गई। कहानी का अंत करुण है, पर माँ की ममता को गौरवान्वित कर जाता है।

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

बहादुर (पाठ)

 अमरकांत की कहानी 'बहादुर' का पाठ 

सहसा मैं काफी गंभीर था, जैसा कि उस व्यक्ति को हो जाना चाहिए, जिस पर एक भारी दायित्व आ गया हो। वह सामने खड़ा था और आँखों को बुरी तरह मटका रहा था। बारह-तेरह वर्ष की उम्र। ठिगना शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह। वह सफेद नेकर, आधी बाँह की ही सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने था। उसके गले में स्काउटों की तरह एक रूमाल बँधा था। उसको घेरकर परिवार के अन्य लोग खड़े थे। निर्मला चमकती दृष्टि से कभी लड़के को देखती और कभी मुझको और अपने भाई को। निश्चय ही वह पंच बराबर हो गई थी।
उसको लेकर मेरे साले साहब आए थे। नौकर रखना कई कारणों से बहुत जरूरी हो गया था। मेरे सभी भाई और रिश्तेदार अच्छे ओहदों पर थे और उन सभी के यहाँ नौकर थे। मैं जब बहन की शादी में घर गया तो वहाँ नौकरों का सुख देखा। मेरी दोनों भाभियाँ रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती थीं, जबकि निर्मला को सबेरे से लेकर रात तक खटना पड़ता था। मैं ईर्ष्या से जल गया। इसके बाद नौकरी पर वापस आया तो निर्मला दोनों जून ‘नौकर-चाकर’ की माला जपने लगी। उसकी तरह अभागिन और दुखिया स्त्री और भी कोई इस दुनिया में होगी? वे लोग दूसरे होते हैं, जिनके भाग्य में नौकर का सुख होता है…
पहले साले साहब से असाधारण विस्तार से उसका किस्सा सुनना पड़ा। वह एक नेपाली था, जिसका गाँव नेपाल और बिहार की सीमा पर था। उसका बाप युद्ध में मारा गया था और उसकी माँ सारे परिवार का भरण-पोषण करती थी। माँ उसकी बड़ी गुस्सैल थी और उसको बहुत मारती थी। माँ चाहती थी कि लड़का घर के काम-धाम में हाथ बटाए, जब कि वह पहाड़ या जंगलों में निकल जाता और पेड़ों पर चढ़कर चिड़ियों के घोंसलों में हाथ डालकर उनके बच्चे पकड़ता या फल तोड़-तोड़कर खाता। कभी-कभी वह पशुओं को चराने के लिए ले जाता था। उसने एक बार उस भैंस को बहुत मारा, जिसको उसकी माँ बहुत प्यार करती थी, और इसीलिए उससे वह बहुत चिढ़ता था। मार खाकर भैंस भागी-भागी उसकी माँ के पास चली गई, जो कुछ दूरी पर एक खेत में काम कर रही थी। माँ का माथा ठनका। बेचारा बेजबान जानवर चरना छोड़कर यहाँ क्यों आएगा? जरूर लौंडे ने उसको काफी मारा है। वह गुस्से-से पागल हो गई। जब लड़का आया तो माँ ने भैंस की मार का काल्पनिक अनुमान करके एक डंडे से उसकी दुगुनी पिटाई की और उसको वहीं कराहता हुआ छोड़कर घर लौट आई। लड़के का मन माँ से फट गया और वह रात भर जंगल में छिपा रहा। जब सबेरा होने को आया तो वह घर पहुँचा और किसी तरह अंदर चोरी-चुपके घुस गया। फिर उसने घी की हंडिया में हाथ डाल कर माँ के रखे रुपयों में से दो रुपये निकाल लिए। अंत में नौ-दो ग्यारह हो गया। वहाँ से छह मील की दूरी पर बस स्टेशन था, जहाँ गोरखपुर जाने वाली बस मिलती थी।
‘तुम्हारा नाम क्या है, जी?’ मैंने पूछा।

‘दिल बहादुर, साहब।’

उसके स्वर में एक मीठी झनझनाहट थी। मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने उसको क्या हिदायतें दी थीं। शायद यह कि शरारतें छोड़कर ढंग से काम करे और उस घर को अपना घर समझे। इस घर में नौकर-चाकर को बहुत प्यार और इज्जत से रखा जाता है। अगर वह वहाँ रह गया तो ढंग-शऊर सीख जाएगा, घर के और लड़कों की तरह पढ़-लिख जाएगा और उसकी जिंदगी सुधर जाएगी। निर्मला ने उसी समय कुछ व्यावहारिक उपदेश दे डाले थे। इस मुहल्ले में बहुत तुच्छ लोग रहते हैं, वह न किसी के यहाँ जाए और न किसी का काम करे। कोई बाजार से कुछ लाने को कहे तो वह ‘अभी आता हूँ’, कहकर अंदर खिसक जाए। उसको घर के सभी लोगों से सम्मान और तमीज से बोलना चाहिए। और भी बहुत-सी बातें। अंत में निर्मला ने बहुत ही उदारतापूर्वक लड़के के नाम में से ‘दिल’ शब्द उड़ा दिया।
परंतु बहादुर बहुत ही हँसमुख और मेहनती निकला। उसकी वजह से कुछ दिनों तक हमारे घर में वैसा ही उत्साहपूर्ण वातावरण छाया रहा, जैसा कि प्रथम बार तोता-मैना या पिल्ला पालने पर होता है। सबेरे-सबेरे ही मुहल्ले के छोटे-छोटे लड़के घर के अंदर आकर खड़े हो जाते और उसको देखकर हँसते या तरह-तरह के प्रश्न करते। ‘ऐ, तुम लोग छिपकली को क्या कहते हो?’ ‘ऐ, तुमने शेर देखा है?’ ऐसी ही बातें। उससे पहाड़ी गाने की फरमाइशें की जातीं। घर के लोग भी उससे इसी प्रकार की छेड़खानियाँ करते थे। वह जितना उत्तर देता था उससे अधिक हँसता था। सबको उसके खाने और नाश्ते की बड़ी फिक्र रहती।
निर्मला आँगन में खड़ी होकर पड़ोसियों को सुनाते हुए कहती थी – ‘बहादुर आकर नाश्ता क्यों नहीं कर लेते? मैं दूसरी औरतों की तरह नहीं हूँ, जो नौकर-चाकर को तलती-भूनती हैं। मैं तो नौकर-चाकर को अपने बच्चे की तरह रखती हूँ। उन्होंने तो साफ-साफ कह दिया है कि सौ-डेढ़ सौ महीनाबारी उस पर भले ही खर्च हो जाय, पर तकलीफ, उसको जरा भी नहीं होनी चाहिए। एक नेकर-कमीज तो उसी रोज लाए थे… और भी कपड़े बन रहे हैं…’
धीरे-धीरे वह घर के सारे काम करने लगा। सबेरे ही उठकर वह बाहर नीम के पेड़ से दातून तोड़ लाता था। वह हाथ का सहारा लिए बिना कुछ दूर तक तने पर दौड़ते हुए चढ़ जाता। मिनट भर में वह पेड़ की पुलई पर नजर आता। निर्मला छाती पीटकर कहती थी – अरे रीछ-बंदर की जात, कहीं गिर गया तो बड़ा बुरा होगा। वह घर की सफाई करता, कमरों में पोंछा लगाता, अँगीठी जलाता, चाय बनाता और पिलाता। दोपहर में कपड़े धोता और बर्तन मलता। वह रसोई बनाने की भी ज़िद्द करता, पर निर्मला स्वयं सब्जी और रोटी बनाती। निर्मला की उसको बहुत फिक्र रहती थी। उसकी उन दिनों तबीयत ठीक नहीं रहती थी, इसलिए वह कुछ दवा ले रही थी। बहादुर उसको कोई काम करते देखकर कहता था – ‘माता जी, मेहनत न करो, तकलीफ बड़ जाएगा।’ वह कोई भी काम करता होता, समय होने पर हाथ धोकर भालू की तरह दौड़ता हुआ कमरे में जाता और दवाई का डिब्बा निर्मला के सामने-लाकर रख देता।
जब मैं शाम को दफ्तर से आता तो घर के सभी लोग मेरे पास आकर दिन भर के अपने अनुभव सुनाते थे। बाद में वह भी आता था। वह एक बार मेरी ओर देखकर सिर झुका लेता और धीरे-धीरे मुस्कराने लगता। वह कोई बहुत ही मामूली घटना की रिपोर्ट देता – ‘बाबू जी, बहिन जी का एक सहेली आया था।’ या ‘बाबू जी, भैया सिनेमा गया था।’ इसके बाद वह इस तरह हँसने लगता था, गोया बहुत ही मजेदार बात कह दी हो। उसकी हँसी बड़ी कोमल और मीठी थी, जैसे फूल की पंखुड़ियाँ बिखर गई हों। मैं उससे बातचीत करना चाहता था, पर ऐसी इच्छा रहते हुए भी मैं जान-बूझकर बहुत गंभीर हो जाता था और दूसरी ओर देखने लगता था।
निर्मला कभी-कभी उससे पूछती थी – बहादुर, तुमको अपनी माँ की याद आती है?

‘नहीं।’

‘क्यों?’

‘वह मारता क्यों था?’ इतना कहकर वह खूब हँसता था, जैसे मार खाना खुशी की बात हो।
‘तब तुम अपना पैसा माँ के पास कैसे भेजने को कहते हो?’
‘माँ-बाप का कर्जा तो जन्म भर भरा जाता है’ वह और भी हँसता था।
निर्मला ने उसको एक फटी-पुरानी दरी दे दी थी। घर से वह एक चादर भी ले आया था। रात को काम-धाम करने के बाद वह भीतर के बरामदे में एक टूटी हुई बँसखट पर अपना बिस्तर बिछाता था। वह बिस्तरे पर बैठ जाता और अपनी जेब में से कपड़े की एक गोल-सी नेपाली टोपी निकालकर पहन लेता, जो बाईं ओर काफी झुकी रहती थी। फिर वह एक छोटा-सा आईना निकालकर बंदर की तरह उसमें अपना मुँह देखता था। वह बहुत ही प्रसन्न नजर आता था। इसके बाद कुछ और भी चीजें उसकी जेब से निकलकर उसके बिस्तरे पर सज जाती थीं – कुछ गोलियाँ, पुराने ताश की एक गड्डी, कुछ खूबसूरत पत्थर के टुकड़े, ब्लेड, कागज की नावें। वह कुछ देर तक उनसे खेलता था। उसके बाद वह धीमे-धीमे स्वर में गुनगुनाने लगता था। उन पहाड़ी गानों का अर्थ हम समझ नहीं पाते थे, पर उनकी मीठी उदासी सारे घर में फैल जाती, जैसे कोई पहाड़ की निर्जनता में अपने किसी बिछुड़े हुए साथी को बुला रहा हो।
दिन मजे में बीतने लगे। बरसात आ गई थी। पानी रुकता था और बरसता था। मैं अपने को बहुत ऊँचा महसूस करने लगा था। अपने परिवार और संबंधियों के बड़प्पन तथा शान-बान पर मुझे सदा गर्व रहा है। अब मैं मुहल्ले के लोगों को पहले से भी तुच्छ समझने लगा। मैं किसी से सीधे मुँह बात नहीं करता। किसी की ओर ठीक से देखता भी नहीं था। दूसरे के बच्चों को मामूली-सी शरारत पर डाँट-डपट देता। कई बार पड़ोसियों को सुना चुका था – जिसके पास कलेजा है, वही आजकल नौकर रख सकता है। घर के सवांग की तरह रहता है। निर्मला भी सारे मुहल्ले में शुभ सूचना दे आई थी – आधी तनखाह तो नौकर पर ही खर्च हो रही है, पर रुपया-पैसा कमाया किसलिए जाता है? ये तो कई बार कह ही चुके थे कि तुम्हारे लिए दुनिया के किसी कोने से नौकर जरूर लाऊँगा… वही हुआ।
निस्संदेह बहादुर की वजह से सबको खूब आराम मिल रहा था। घर खूब साफ और चिकना रहता। कपड़े चमाचम सफेद। निर्मला की तबीयत भी काफी सुधर गई। अब कोई एक खर भी न टकसाता था। किसी को मामूली-से-मामूली काम करना होता तो वह बहादुर को आवाज देता। ‘बहादुर, एक गिलास पानी।’ ‘बहादुर पेन्सिल नीचे गिरी है, उठाना।’ इसी तरह की फरमाइशें! बहादुर घर में फिरकी की तरह नाचता रहता। सभी रात में पहले ही सो जाते थे और सबेरे आठ बजे के पहले न उठते थे।
मेरा बड़ा लड़का किशोर काफी शान-शौकत और रोब-दाब से रहने का कायल था और उसने बहादुर को अपने कड़े अनुशासन में रखने की आवश्यकता महसूस कर ली थी। फलतः उसने अपने सभी काम बहादुर को सौंप दिए। सबेरे उसके जूते में पालिश लगनी चाहिए। कालेज जाने के ठीक पहले साइकिल की सफाई जरूरी थी। रोज ही उसके कपड़ों की धुलाई और इत्री होनी चाहिए। और रात में सोते समय वह नित्य बहादुर से अपने शरीर की मालिश कराता और मुक्की भी लगवाता। पर इतनी सारी फरमाइशों की पूर्ति में कभी-कभी कोई गड़बड़ी भी हो जाती। जब ऐसा होता, किशोर गर्जन-तर्जन करने लगता, उसको बुरी-बुरी गालियाँ देता और उस पर हाथ छोड़ देता। मार खाकर बहादुर एक कोने में खड़ा हो जाता – चुपचाप।
‘देख बे’, किशोर चेतावनी देता – ‘मेरा काम सबसे पहले होना चाहिए। अगर एक काम भी छूटा तो मारते-मारते हुलिया टाइट कर दूँगा। साला, कामचोर, करता क्या है तू? बैठा-बैठा खाता है।’
रोज ही कोई-कोई ऐसी बात होने लगी, जिसकी रिपोर्ट पत्नी मुझे देती थी। मैंने किशोर को मना किया, पर वह नहीं माना तो मैंने यह सोचकर छोड़ दिया कि थोड़ा-बहुत तो यह चलता ही रहता है। फिर एक हाथ से ताली कहाँ बजती है? बहादुर भी बदमाशी करता होगा। पर एक दिन जब मैं दफ्तर से आया तो मैंने किशोर को एक डंडे से बहादुर की पिटाई करते हुए देखा। निर्मला कुछ दूरी पर खड़ी होकर ‘हाँ-हाँ’ कहती हुई मना कर रही थी।
मैंने किशोर को डाँट कर अलग किया। कारण यह था कि शाम को साइकिल की सफाई करना बहादुर भूल गया था। किशोर ने उसको मारा तथा गालियाँ दीं तो उसने उसका काम करने से ही इनकार कर दिया।

‘तुम साइकिल साफ क्यों नहीं करते?’ मैंने उससे कड़ाई से पूछा।

‘बाबूजी, भैया ने मेरे बाप को क्यों लाकर खड़ा किया?’ वह रोते हुए बोला।
मैं जानता था कि किशोर उसको और भी भद्दी गालियाँ देता था, लेकिन आज उसने ‘सूअर का बच्चा’ कहा था, जो उसे बरदाश्त न हुआ। निस्संदेह वह गाली उसके बाप पर पड़ती थी। मुझे कुछ हँसी आ गई। खैर, किशोर के व्यवहार को अच्छा नहीं कहा जा सकता, पर गृहस्वामी होने के कारण मुझ पर कुछ और गंभीर दायित्व भी थे।
मैंने उसे समझाया – ‘बहादुर, ये आदतें ठीक नहीं। तुम ठीक से काम करोगे तो तुमको कोई कुछ भी नहीं कहेगा। मेहनत बहुत अच्छी चीज है, जो उससे बचने की कोशिश करता है, वह कुछ भी नहीं कर सकता। रूठना-फूलना मुझे सख्त नापसंद है। तुम तो घर के लड़के की तरह हो। घर के लड़के मार नहीं खाते? हम तुमको जिस सुख-आराम से रखते हैं, वह कोई क्या रखेगा? जाकर दूसरे घरों में देखो तो पता लगे। नौकर-चाकर भर पेट भोजन के लिए तरसते रहते हैं। चलो, सब खत्म हुआ, अब काम-धाम करो…’
वह चुपचाप सुनता रहा। फिर हाथ-मुँह धोकर काम करने लगा। जल्दी वह प्रसन्न भी हो गया। रात में सोते समय वह अपनी टोपी पहन कर देर तक गाता रहा।
लेकिन कुछ दिनों बाद एक और भी गड़बड़ी शुरू हुई। निर्मला बहुत पतली-पतली रोटियाँ सेंकती थी, इसलिए वह रोटी बनाने का काम कभी बहादुर से नहीं लेती थी, लेकिन मुहल्ले की किसी औरत ने उसे यह सिखा दिया कि परिवार के लिए रोटियाँ बनाने के बाद वह बहादुर से कहे कि वह अपनी रोटी खुद बना लिया करे, नहीं तो नौकर-चाकर की आदत खराब हो जाती है, महीन खाने से उनकी आदत बिगड़ जाती है।
यह बात निर्मला को जँच गई थी और रात में उसने ऐसा ही प्रयोग किया। वह अपनी रोटियाँ बनाकर चौके में से उठ गई। बहादुर का मुँह उतर गया। वह चूल्हे के पास सिर झुकाकर चुपचाप खड़ा रहा।
‘क्या हो गया, रे?’ निर्मला ने पूछा।

वह कुछ नहीं बोला।

‘चल, चुपचाप बना अपनी रोटियाँ। तू सोचता है कि मैं तुझे पतली-पतली, नरम-नरम रोटियाँ सेंककर खिलाऊँगी? तू कोई घर का लड़का है? नौकर-चाकर तो अपना बनाकर खाते ही रहते हैं। तीता तो इनको इसलिए लग रहा है कि सारे घर के लिए मैंने रोटियाँ बनाईं, इनको अलग करके इनके साथ भेद क्यों किया? वाह रे, इसके पेट में तो लंबी दाढ़ी है! समझ जा, रोटियाँ नहीं सेंकेगा तो भूखा रहेगा।’
पर बहादुर उसी तरह खड़ा रहा तो निर्मला का गुस्से से बुरा हाल हो गया। उसने लपककर उसके गाल पर दो-तीन थप्पड़ जड़ दिए – ‘सूअर कहीं के! इसीलिए तुझे किशोर मारता है। इसी वजह से तेरी माँ भी मारती होगी। चल, बना रोटी…’
‘मैं नहीं बनाऊँगा… मेरी माँ भी सारे घर की रोटियाँ बनाकर मुझसे रोटी सेंकवाती थी।’ वह रोने लगा था।
‘तो क्या मैं तेरी माँ हूँ कि तू मुझसे जिद कर रहा है? घर के लड़कों के बराबर बन रहा है? मारते-मारते मुँह रँग दूँगी।’
पर उसने अपने लिए रोटी नहीं बनाई। मुझे भी बड़ा गुस्सा आया। मैंने उसको डाँटा और समझाया। पर वह नहीं माना। रात भर वह भूखा ही रहा।
पर सबेरे उठकर वह पहले की तरह ही हँसने लगा। उसने अँगीठी जला कर अपने लिए रोटियाँ सेंकी। अपनी बनाई मोटी और भद्दी रोटियों को देखकर वह खिलखिलाने लगा। फिर रात की बची हुई सब्जी से उसने खाना खा लिया।
लेकिन निर्मला का भी हाथ खुल गया था। वह उससे कुछ चिढ़ भी गई थी। अब बहादुर से कोई भी गलती होती तो वह उस पर हाथ चला देती। उसको मारने वाले अब घर में दो व्यक्ति हो गए थे और कभी-कभी एक गलती के लिए उसको दोनों मारते।
बरसात बीत गई थी। आकाश दर्पण की तरह स्वच्छ दिखाई देता। मैंने बहादुर की माँ के पास चिट्ठी लिखी थी कि उसका लड़का मेरे पास मजे में है और मैं उसकी तनख्वाह के पैसे उसके पास भेज दिया करूँगा, लेकिन कई महीने के बाद भी उधर से कोई जवाब नहीं आया था। मैंने बहादुर से कह दिया था कि उसका पैसा यहाँ जमा रहेगा, जब वह घर जाएगा तो लेता जाएगा।

पर अब बहादुर से भूल-गलतियाँ अधिक होने लगी थीं। शायद इसका कारण मारपीट और गाली-गलौज हो। मैं कभी-कभी इसको रोकना चाहता, फिर यह सोचकर चुप लगा जाता कि नौकर-चाकर तो मार-पीट खाते ही रहते हैं।

एक दिन रविवार को मेरी पत्नी के एक रिश्तेदार आए। वह बीवी-बच्चों के साथ थे। वह अपने किसी खास संबंधी के यहाँ आए थे तो यहाँ भी भेंट-मुलाकात करने के लिए चले आए थे। घर में बड़ी चहल-पहल मच गई। मैं बाजार से रोहू मछली और देहरादूनी चावल ले आया। नाश्ता-पानी के बाद बातों की जलेबी छनने लगी। पर इसी समय एक घटना हो गई।
अचानक उस रिश्तेदार की पत्नी नीचे फर्श पर झुककर देखने लगी। फिर उन्होंने चारपाई के अंदर झाँककर देखा। अंत में कमरे के अंदर गईं और फर्श पर पड़े हुए कागजों को उठाकर जाँच-पड़ताल करने लगीं।

‘क्या बात है?’ मैंने पूछा।
रिश्तेदार की पत्नी जबरदस्ती मुस्कराकर मजबूरी में सिर हिलाते हुए बोली – ‘क्या बताएँ… ग्यारह रुपये साड़ी के खूँट से निकालकर यहीं चारपाई पर रखे… पर वे मिल नहीं रहे हैं…’
‘आपको ठीक याद है न…’
‘हाँ-हाँ खूब अच्छी तरह याद है। ये रुपये मैंने खूँट में बाँधकर रखे थे… रिक्शेवाले को देने के लिए खूँट खोला ही था, फिर वे रुपये चारपाई पर रख दिए थे कि चार रुपये की मिठाई मँगा लूँगी और कुछ बच्चों के हाथ पर रख दूँगी। रास्ते में कोई ढंग की दुकान नहीं मिली थी, नहीं तो उधर से ही लाती। किसी के यहाँ खाली-हाथ जाने में अच्छा भी नहीं लगता। बताइए, अब तो मैं कहीं की न रही – फिर मेरी ओर झुककर धीमे स्वर में कहा था – जरा उससे पूछिए न! वह इधर आया था। कुछ देर तक वह यहाँ खड़ा रहा, फिर तेजी से बाहर चला गया था।
‘अरे नहीं, वो ऐसा नहीं है’, मैंने कहा।

‘यू डू नाट नो दीज पीपुल आर एक्सपर्ट इन दिस आर्ट’ रिश्तेदार ने कहा। मैंने बहादुर की ओर तिरछी दृष्टि से देखा। वह सिर झुका कर आटा गूँथ रहा था। उसके चेहरे पर संतुष्टि एवं प्रफुल्लता थी। उसने ऐसा काम तो कभी नहीं किया, बल्कि जब कभी उसने दो-चार आने इधर-उधर पड़े देखे तो उठाकर निर्मला के हाथ में दे दिए थे। पर किसी के दिल की बात कोई कैसे जान सकता है? न मालूम अचानक मुझे क्या हो गया और मैं गुस्से में आ गया।
‘बहादुर!’ – मैंने कड़े स्वर में कहा।

‘जी, बाबू जी।’

‘इधर आओ।’

वह आकर खड़ा हो गया।

‘तुमने यहाँ से रुपये उठाए थे?’

‘जी नहीं, बाबूजी’, उसने निर्भय उत्तर दिया।

‘ठीक बताओ… मैं बुरा नहीं मानूँगा।’

‘नहीं बाबूजी। मैं लेता तो बता देता।’

‘तुम यहाँ खड़े नहीं थे?’ – रिश्तेदार की पत्नी ने कहा ‘फिर तेजी से बाहर चले गए थे। देखो भैया, सच-सच बता दो। मिठाई खरीदने और बच्चों को देने के लिए ये रुपये रखे थे। मैं तो बुरी फँसी। अब वापस जाने के लिए रिक्शे के भी पैसे नहीं।’

‘मैं तो बाहर नमक लेने गया था।’

‘सच-सच बता बहादुर! अगर नहीं बताएगा तो बहुत पीटूँगा और पुलिस के सुपुर्द कर दूँगा।’ मैं चिल्ला पड़ा।

‘मैंने नहीं लिया, बाबूजी।’ – बहादुर का मुँह काला पड़ गया था।
पता नहीं मुझे क्या हो गया। मैंने सहसा उछलकर उसके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया। मैं आशा कर रहा था कि ऐसा करने से वह बता देगा। तमाचा खाकर वह गिरते-गिरते बचा। उसकी आँखों से आँसू गिरने लगा।
‘मैंने नहीं लिया…’
इसी समय रिश्तेदार साहब ने एक अजीब हरकत की – ‘अच्छा छोड़िए, इसको पुलिस के पास ले जाता हूँ।’ इतना कहकर उन्होंने बहादुर का हाथ पकड़ लिया और उसको दरवाजे की ओर घसीटकर ले गए। पर दरवाजे के पास उससे धीरे-से बोले – ‘देखो, तुम मुझे बता दो… मैं कुछ नहीं करूँगा, बल्कि तुमको इनाम में दो रुपये दे दूँगा।’
पर बहादुर ने इनकार कर दिया। इसके बाद रिश्तेदार साहब दो-तीन बार उसको दरवाजे की ओर खींचकर ले गए, जैसे पुलिस को देने ही जा रहे हैं। लेकिन आगे बढ़कर वह रुक जाते और उससे धीमे-धीमे शब्दों में पूछ-ताछ करने लगते।
अंत में हारकर उन्होंने उसको छोड़ दिया और वापस आकर चारपाई पर बैठते हुए हँसकर बोले – ‘जाने दीजिए… ये सब बड़े घाघ होते हैं। किसी झाड़ी-वाड़ी में छिपा आया होगा या जमीन में गाड़ आया होगा। मैं तो इन सबों को खूब जानता हूँ। भालू-बंदर से कम थोड़े होते हैं ये। चलिए, इतना नुकसान लिखा था।’

इसके बाद निर्मला ने भी उसको डराया-धमकाया और दो-चार तमाचे जड़ दिए, पर वह ‘नहीं-नहीं’ करता रहा।
इस घटना के बाद बहादुर काफी डाँट-मार खाने लगा। घर के सभी लोग उसको कुत्ते की तरह दुरदुराया करते। किशोर तो जैसे उसकी जान के पीछे पड़ गया था। वह उदास रहने लगा और काम में लापरवाही करने लगा।
एक दिन मैं दफ्तर से विलंब से आया। निर्मला आँगन में चुपचाप सिर पर हाथ रखकर बैठी थी। अन्य लड़कों का पता नहीं था, लेकिन लड़की अपनी माँ के पास खड़ी थी। अँगीठी अभी नहीं जली थी। आँगन गंदा पड़ा था। बर्तन बिना मले हुए रखे थे। सारा घर जैसे काट रहा था।

‘क्या बात है?’ मैंने पूछा।

‘बहादुर भाग गया।’

‘भाग गया। क्यों?’

‘पता नहीं। आज तो कुछ हुआ भी नहीं था। सबेरे से ही बड़ा प्रसन्न था। हमेशा माताजी माताजी, किए रहा। दोपहर में खाना खाया। उसके बाद आँगन से सिल-बट्टा लेकर बरामदे में रखने जा रहा था कि सिल हाथ से छूटकर गिर गई और दो टुकड़े हो गई। शायद इसी डर से वह भाग गया कि लोग मारेंगे। पर मैं इसके लिए उसको थोड़े कुछ कहती? क्या बताऊँ, मेरी किस्मत में आराम ही नहीं…’
‘कुछ ले गया?’
‘यही तो अफसोस है। कोई भी सामान नहीं ले गया है। उसके कपड़े, उसका बिस्तर, उसके जूते – सभी छोड़ गया है। पता नहीं उसने हमें क्या समझा? अगर वह कहता तो मैं उसे रोकती थोड़े? बल्कि उसको खूब अच्छी तरह पहना-ओढ़ाकर भेजती, हाथ में उसकी तनख्वाह के रुपये रख देती। दो-चार रुपये और अधिक दे देती। पर वह तो कुछ ले ही नहीं गया…’
‘और वे ग्यारह रुपये?’
‘अरे वह सब झूठ है। मैं तो पहले ही जानती थी कि वे लोग बच्चों को कुछ देना नहीं चाहते, इसलिए अपनी गलती और लाज छिपाने के लिए यह प्रपंच रच रहे हैं। उन लोगों को क्या मैं जानती नहीं? कभी उनके रुपये रास्ते में गुम हो जाते हैं… कभी वे गलती से घर ही छोड़ आते हैं। मेरे कलेजे में तो जैसे कुछ हौड़ रहा है। किशोर को भी बड़ा अफसोस है। उसने सारा शहर छान मारा, पर बहादुर नहीं मिला। किशोर आकर कहने लगा – ‘अम्माँ, एक बार भी अगर बहादुर आ जाता तो मैं उसको पकड़ लेता और कभी जाने न देता। उससे माफी माँग लेता और कभी नहीं मारता। सच, अब ऐसा नौकर कभी नहीं मिलेगा। कितना आराम दे गया है वह। अगर वह कुछ चुराकर ले गया होता तो संतोष हो जाता…’
निर्मला आँखों पर आँचल रखकर रोने लगी। मुझे बड़ा क्रोध आया। मैं चिल्लाना चाहता था पर भीतर-ही-भीतर मेरा कलेजा जैसे बैठ रहा हो। मैं वहीं चारपाई पर सिर झुका कर बैठ गया। मुझे एक अजीब-सी लघुता का अनुभव हो रहा था। यदि मैं न मारता तो शायद वह न जाता।
मैंने आँगन में नजर दौड़ाई। एक ओर स्टूल पर उसका बिस्तर रखा था। अलगनी पर उसके कुछ कपड़े टँगे थे। स्टूल के नीचे वह भूरा जूता था, जो मेरे साले साहब के लड़के का था। मैं उठकर अलगनी के पास गया और उसके नेकर की जेब में हाथ डालकर उसके सामान निकालने लगा – वही गोलियाँ, पुराने ताश की गड्डी, खूबसूरत पत्थर, ब्लेड, कागज की नावें…

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

नाटक

                                                                    नाटक का विकास

नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में नाट्य साहित्य की बहुत समृद्ध परंपरा मिलती है लेकिन हिंदी भाषा में नाटक का आरंभ 19 में शताब्दी में भारतेंदु युग से ही हुआ है। भारत में लोक परंपरा के रूप में भी नाटक विधा भारतीय लोक साहित्य में हमें मिलती है। हर प्रदेश का अपना लोक रंगमंच है। रासलीला, नौटंकी, स्वांग, रामलीला ,जात्रा यह सब लोक नाट्य परंपरा के ही रूप हैं। किंतु हिंदी नाटक के विकास की जहां तक बात है वह आधुनिक युग से ही आरंभ होता है इससे पहले जो हमें नाटक मिलते हैं वह गद्य में न मिलकर पद्य में मिलते हैं। वास्तव में हिंदी नाटक के आरंभ का श्रेय भी भारतेंदु को ही जाता है जैसे कि गद्य की दूसरी विधाएं निबंध और कहानी आदि का विकास भारतेंदु युग में होता है उसी तरह से नाटक का विकास भी भारतेंदु हरिश्चंद्र के द्वारा आधुनिक काल में ही किया गया।

हिंदी का सबसे पहला मौलिक नाटक नहुष को माना जाता है जो 1857 में भारतेंदु के पिता गोपाल चंद्र गिरधर दास के द्वारा लिखा गया था। हालांकि कुछ विद्वान विश्वनाथ सिंह के आनंद रघुनंदन नाटक को भी हिंदी का पहला मौलिक नाटक मानते हैं जो 1780 के आसपास लिखा गया था। किंतु उसमें एक तो ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है। दूसरा वह रामलीला की पद्धति पर ही लिखा गया है। इसलिए वह उतना आधुनिक नाटक कला के निकट नहीं है जितना कि नहुष नाटक। इस समय संस्कृत के अभिज्ञान शाकुंतलम् का हिंदी अनुवाद जो राजा लक्ष्मण सिंह ने किया जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। जहां तक नाटक के विकास की बात है तो अध्ययन की सुविधा के लिए उसे भी हम तीन युगों में विभाजित कर लेते हैं-

भारतेंदु युग
प्रसाद युग
प्रसादोत्तर युग
भारतेंदु युग - भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आधुनिक युग में मौलिक और अनुदित नाटको की रचना कर नाटको की प्राचीन परंपरा को आगे बढाया| भारतेंदु ने स्वं म भी नाटक लिखे और दूसरे साहित्यकारों को भी लिखने के लिए प्रोत्साहित किया । भारतेंदु युगीन नाटकों का मूल उद्देश्य पाश्चात्य संस्कृति के समक्ष भारतीय संस्कृति का महत्व प्रतिपादित करना, भारतीयों में राष्ट्रीय भावना को जागृत करना तथा सामाजिक बुराइयों से भारतीयों को अवगत करा कर उन बुराइयों को दूर करना रहा है। भारतेंदु ने युगीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ऐसे नाटकों की रचना की। इस युग के नाटककार देश की सामाजिक और धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक दुर्दशा से भी आहत थे। उन्होंने देखा कि समाज को जगाने में नाटक सबसे ज्यादा प्रबल विधा है तो इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस युग के नाटककारों ने नाटक लिखें। इसलिए उन्होंने नाट्य साहित्य के माध्यम से समाज को जागृत करने का संकल्प लिया| इस युग के नाटककारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, श्रीनिवास दास, राधाचरण गोस्वामी, अंबिकादत्त व्यास प्रमुख है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने तो नाटकों की रचना के साथ साथ अभिनय भी किया और निर्देशन भी किया। उन्होंने मौलिक और अनुदित दोनों प्रकार के नाटकों का सृजन किया। अनुदित नाटक मूलतः बंगला, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं के हैं और अनूदित और मौलिक कुल मिलाकर 22 नाटकों की रचना की। जिनमें से प्रमुख है- चंद्रावली, नील देवी, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, विद्या सुंदर, मुद्राराक्षस, सत्य हरिशचंद्र, रत्नावली आदि।
भारतेंदु के समकालीन नाटककारों में बालकृष्ण भट्ट का नाम भी प्रमुख है उन्होंने 15 नाटकों की रचना की। रेनू संहार, जैसा काम वैसा परिणाम, दमयंती स्वयंवर उनके मौलिक नाटक है। भट्ट जी ने देश काल संबंधी सामाजिक यथार्थ स्थिति का सजीव चित्र प्रस्तुत किया है| उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य करके नैतिकता और मर्यादा को प्रतिष्ठित करना चाहा है| इसी कड़ी में लाला श्रीनिवास दास का नाम आता है जिन्होंने तप्ता संवरण, प्रहलाद चरित्र, रणधीर प्रेम मोहिनी, संयोगिता स्वयंवर नाम के चार नाटक लिखे| रणधीर प्रेम मोहिनी उनकी श्रेष्ठ रचना है जिसको हिंदी का प्रथम दुखांत नाटक भी माना जाता है| इन्होंने अपनी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य नृत्य शैलियों का समन्वय किया है| राधा कृष्ण दास भी भारतेंदु युग के प्रमुख नाटककार माने जाते हैं| इन्होंने दुखिनी बाला, महारानी पद्मावती, महाराणा प्रताप सिंह आदि नाटक लिखें| इनके नाटकों में क्रमिक विकास दिखाई देता है| प्रताप नारायण मिश्र ने भी सामाजिक विषयों पर- दूध का दूध पानी का पानी, हम्मीर हठ आदि नाटकों की रचना की है| कहने का तात्पर्य यह है कि संक्रांति किस काल में उत्पन्न युग के समस्याओं जैसे पारस्परिक फूट, धार्मिक अंधविश्वास, पाखंड छुआछूत, आर्थिक शोषण, बाल विवाह, विधवा विवाह, वेश्या गमन, मधपान, समाज सुधार, राष्ट्रीय गौरव आदि का चित्रण इस युग के नाटककार ने बखूबी किया है| इन नाटकों का मूल उद्देश्य समाज की कुरीतियों का समापन करना था |
प्रसाद युग- नाटक के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद का नाम बड़े गौरव के साथ लिया जाता है। जयशंकर प्रसाद के आगमन से नाटक के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। प्रसाद ने ऐसे चरित्रों को निर्मित किया जो ऐतिहासिक होते हुए भी समस्याओं की दृष्टि से प्रासंगिक थे| इन के नाटकों में भारतीय और पाश्चात्य तत्वों का समुचित समाहार दिखाई देता है| भारत के अतीत के प्रति गौरवमयी अनुभूति, प्रेम की भावुक तथा मानवीय संवेदना, अतीत की राष्ट्रीय गरिमा का आधुनिक संदर्भों में चित्रण आदि प्रसाद युग के नाटकों के प्रमुख विचारक तत्व हैं| जयशंकर प्रसाद के प्रमुख नाटकों में सज्जन, विशाल, अजातशत्रु, राज्यश्री, कामना, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी आदि शामिल हैं|उन्होंने मुख्य रूप से ऐतिहासिक नाटक लिखें, कामना उनका प्रतीक नाटक है, प्रसाद के नाटकों में उनके अंतिम नाटक ध्रुवस्वामिनी का भी विशेष स्थान है, यह एक ऐतिहासिक और समस्या प्रधान नाटक है| इस नाटक में प्रसाद ने नारी समस्या को प्रस्तुत किया है| पुनर्विवाह का अधिकार हिंदू स्त्री को है और इस समस्या को उन्होंने इस नाटक में बड़ी ही कौशल से रखा है| शिल्प की दृष्टि से प्रसाद जी के नाटक बेजोड़ हैं, उनमें भारतीय और पाश्चात्य नाट्यकला का संतुलित समन्वय हुआ है| पाश्चात्य नाटकों में पाया जाने वाला संघर्ष, अंतर्द्वंद, व्आयक्दिति वैचित्र्य का प्रसाद के नाटकों में समावेश हुआ है| प्रसाद जी के नाटक न तो सुखांत है ना दुखांत| बल्कि वे प्रसादांत है| उनके नाटक श्रेष्ठ नाटकों की कोटी में श्रेणी में रखे जाते हैं| प्रसाद जी के नाटकों पर आरोप लगाया जाता है कि ये पाठ्य अधिक है, अभिनेय कम| दृश्यों की अधिकता, पात्रों की अधिकता, कलिष्ट भाषा, दार्शनिकता , बड़ा आकार उनके नाटकों में के दोष बताए जाते हैं| इसके बावजूद कहा जा सकता है कि प्रसाद महान नाटककार हैं प्रसाद युग के अन्य नाटक कारों में हरि कृष्ण प्रेमी, लक्ष्मीनारायण मिश्र, सेठ गोविंद दास, गोविंद बल्लभ पंत उपेंद्रनाथ अश्क, वृंदावनलाल वर्मा, पांडे बेचन शर्मा उग्र आदि के नाम लिए जा सकते हैं | हरि कृष्ण प्रेमी का स्थान भी इस युग में महत्वपूर्ण है| उन्होंने भी ऐतिहासिक नाटकों की रचना की है| रक्षाबंधन उनका प्रसिद्ध नाटक है| इसी तरह से सेठ गोविंद दास ने भी अपने नाटकों में समकालीन सामाजिक समस्याओं जैसे छुआछूत, भ्रष्टाचार, पाखंड, नेताओं की स्वार्थपरता आदि का निरूपण करते हुए संतोष कहां ,त्याग और ग्रहण आधी नाटकों की रचना की है| उनके नाटक रंगमंच के अनुकूल हैं |
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि प्रसाद युग नाटक के विकास में एक क्रांतिकारी पड़ाव था, यह युग एक नवीन चेतना से युक्त था जिसमें राष्ट्रीयता की भावना की मुखर अभिव्यक्ति दिखाई देती है| भारत की सांस्कृतिक चेतना और प्राचीन गौरव को जयशंकर प्रसाद के साथ-साथ इस युग के दूसरे नाटककार ने भी अपने नाटकों में चित्रित किया है| हां इस युग के नाटक रंगमंच की दृष्टि से थोड़े कमजोर दिखाई पड़ते हैं।
प्रसादोत्तर युगीन
यह नाटक के विकास का एक नया युग माना जा सकता है| इस युग नाटकों में उन सभी प्रयोगों का विकसित रूप हम देख सकते हैं जो जयशंकर प्रसाद ने शुरू किए थे | साथ ही नाटकों में जीवन के नए यथार्थ बोध के कारण नवीन दृष्टि विकसित हुई| शिल्प की दृष्टि से भी अनेक रूप में उभरकर आए| इस युग के नाटककारों ने पौराणिक विषयों की तुलना में समसामयिक समस्या मूलक विषयों की ओर अधिक ध्यान दिया| देश में स्वतंत्रता के बाद एक नई चेतना का विकास हुआ तथा जनमानस ने जो अपेक्षाएं की थी वह भी पूरी नहीं हो सकी, इसलिए स्वार्थपरता, छल कपट, भ्रष्टाचार, अवसरवादीता का ही साम्राज्य हर तरफ दिखाई देता है, बढ़ती हुई जनसंख्या में बेरोजगारी, उससे उत्पन्न तनाव, औद्योगिकरण के कारण जीवन में अनेक समस्याओं का जाल फैला|
महानगरों में जीवन का गिरता स्तर, मूल्यों में हुए परिवर्तन आदि को इस युग के नाटककारों ने अपनी रचनाओं में व्यक्त किया है| इस काल के नाटक जीवन के यथार्थ से जुड़े हुए हैं और शिल्प के स्तर पर भी नंदी पाठ, भारत वाक्य, प्रस्तावना, गीत, नृत्य आदि कम ही दिखाई देते हैं| सूत्रधार के स्थान पर कमेंटेटर का प्रयोग होना शुरू हो गया था| दो या तीन अंकों में नाटक की समाप्ति इस युग में मिलती है कुल मिलाकर रंगमंच एवं अभिनेता का विशेष ध्यान, जिसका आभाव हमें प्रसाद युग में मिलता है|
इस युग के नाटक कारों में विष्णु प्रभाकर ,,जगदीश चंद्र माथुर, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, सुरेंद्र वर्मा, लक्ष्मी नारायण लाल, रामकुमार वर्मा आदि आते हैं| जगदीश चंद्र माथुर इस युग के प्रमुख नाटककारों में से एक हैं| इन्होंने अपने नाटकों के द्वारा रंगमंच को नई दिशा प्रदान की| कोणार्क, पहला राजा आदि इनके प्रसिद्ध नाटक हैं| धर्मवीर भारती और मोहन राकेश, विष्णु प्रभाकर भी इस युग के प्रमुख नाटककारों में आते हैं| धर्मवीर भारती ने अंधा युग, विष्णु प्रभाकर ने डॉक्टर, युगे युगे क्रांति, टूटते परिवेश और मोहन राकेश ने आधे अधूरे, आषाढ़ का एक दिन ,लहरों के राजहंस आदि नाटक लिखें| यह तीनों ही नाटककार इस युग के प्रमुख नाटककार हैं जिन्होंने युगीन समस्याओं के साथ-साथ रंगमंच को दृष्टि में रखते हुए अपने नाटकों की रचना की| इन सबके अतिरिक्त उत्तर आधुनिक युग के नाटककारों में ऐसे बहुत रचनाकार हैं जिन्होंने इस विधा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है और दे रहे हैं| जिसमें दुष्यंत कुमार, रमेश बख्शी, विनोद रस्तोगी, अमृतराय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और भीष्म साहनी का कबीरा खड़ा बाजार में, मृदुला गर्ग का एक और अजनबी, त्रिपुरारी शर्मा का बहू, मीरा कांत का नेपथ्यय राग बहुत महत्हत्वपूर्ण नाटक हैं | ये सब नाटक लिखकर नाटक विधा को समृद्ध कर रहे हैं | आज राष्टीय नाट्य विद्यालय के साथ-साथ अस्मिता थियेटर, एकजुट थियेटर आदि अनेक ग्रुप नाटकों के मंचन और प्रस्तुति में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं|

बुधवार, 27 जनवरी 2021

रेखाचित्र/संस्मरण

    रेखाचित्र/संस्मरण 

आधुनिक हिंदी साहित्य की अन्य गद्य विधाओं की तरह से ही रेखाचित्र एवं  संस्मरण भी नवीन विधाएं हैं | ये  दोनों ऐसी विधाएं हैं जो अपने रूप में, एक दूसरे में अंतरण करती हुई सी प्रतीत होती हैं | स्मृति के आधार पर घटनाओं का प्रभावशाली शब्दों के माध्यम से अंकन और विवरण-प्रस्तुति ने ही संस्मरण विधा को जन्म दिया| ठीक इसी तरह पाठकों के समक्ष किसी घटना व्यक्ति अथवा प्रसंग की चित्रात्मक अभिव्यक्ति रेखाचित्र कहलाती है,  इसे अंग्रेजी के स्केच का पर्याय कहा गया है| बेनीपुरी जी ने इसके लिए शब्द चित्र का प्रयोग किया है|  डॉ नगेंद्र ने इसे स्मृति चित्र कहकर संस्मरण विधा के गुणों को भी इसके ऊपर परिगणित कर दिया|  

                        वास्तव में रेखाचित्र को संस्मरण का ही विकसित रूप कहा जा सकता है| यह साहित्यिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक घटना प्रधान, व्यक्ति प्रधान आदि हो सकते हैं| अपने आकार में यह छोटे और विवरण प्रधान हो सकते हैं| यह विधा यथार्थ जीवन से जुड़ी होने के कारण इसमें कल्पना का आश्रय कम लिया जाता है| एक कुशल और सफल रेखाचित्रकार  के लिए अनुभूति की गहनता, सत्यता एवं अभिव्यक्ति की कुशलता आवश्यक है|  

                  रेखाचित्र हिंदी गद्य की एक नवीन विधा है | हिंदी की समस्त आधुनिक विधाओं में रेखाचित्र ने भी अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है| जिस प्रकार चित्रकला में बिना रंगों का प्रयोग किए हुए मात्र रेखाओं से रेखाचित्र बनाए जाते हैं उसी प्रकार जब शब्दों के माध्यम से किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को उभारा जाता है तो उसे रेखा चित्र कहते हैं| रेखा चित्र का विषय काल्पनिक ने होकर वास्तविक होता है और उसकी आंतरिक और बाहरी विशेषताएं बड़े कलात्मक ढंग से अभिव्यक्ति पाती है| रेखा चित्र में किसी वस्तु या किसी व्यक्ति का चित्र लेकर तटस्थता  के साथ भरा जाता है| इसमें व्यक्ति का संपूर्ण चित्र अंकित होता है| यह व्यक्ति साधारण असाधारण दोनों तरह का हो सकता है|

                        हिंदी साहित्य में आधुनिक गद्य की प्रायः प्रत्येक विधा की शुरुआत भारतेंदु युग से ही हुई है| रेखा चित्र  विधा की शुरुआत भी भारतेंदु युग से ही होती है| भारतेंदु युग में पाश्चात्य साहित्य हिंदी साहित्य को प्रभावित किया है| पाश्चात्य साहित्य में भी रेखाचित्र का पर्याप्त विकास हो चुका था| उस समय चार्ल्स डिकेंस, चेखव आदि के रेखा चित्रों को अर्थात स्केच को बहुत प्रसिद्धि मिली थी| इनके प्रभावस्वरूप ही हिंदी में रेखा चित्रों का उदय हुआ है, ऐसा माना जाता है|

                                      वास्तव में हिंदी साहित्य में रेखाचित्र का उद्भव बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में हुआ| उस समय 1929 में प्रकाशित पंडित पदम सिंह शर्मा के पदमपराग निबंधों से इसका आरंभ माना जाता है| इसी आधार पर पदम पदम सिंह शर्मा को रेखाचित्र का जनक भी स्वीकार किया गया है| यद्यपि इनको  आधुनिक रेखाचित्र तो नहीं कहा जा सकता परंतु इनमें वर्तमान रेखाचित्र के पर्याप्त तत्व मिलते हैं और एक तरह से यह रेखा चित्रों की पृष्ठभूमि का कार्य करते हैं|

              सन 1936 ईस्वी से हिंदी रेखाचित्र में विकास की रेखाएं मिलने लगती है और इसका श्रेय पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी को जाता है| बनारसीदास चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक रेखाचित्र में देश विदेश के साहित्यकारों, पत्रकारों, राजनीतिज्ञ, समाज सेवकों के जीवन को अंकित किया है| इनमें राष्ट्रीय भावना के साथ विश्व प्रेम और अंतरराष्ट्रीयता की  झलक भी मिलती है| 

                    पंडित श्रीराम शर्मा का नाम भी हिंदी रेखा चित्रकारों में आदर के साथ लिया जाता है| इनका प्रथम संग्रह बोलती प्रतिमा है| श्रीराम शर्मा ने रेखाचित्र निर्माण में साहित्यकारों का पथ प्रदर्शन किया| उनकी विषय प्रतिपादन क्षमता अत्यंत आकर्षक और रोचक है| उनके रेखा चित्र संग्रह है- प्राणों का सौदा, जंगल के जीव| जंगल के जीव में उन्होंने जंगली जानवरों को रेखा चित्रों का विषय बनाया है|

                                हिंदी रेखाचित्र की विकास यात्रा में रामवृक्ष बेनीपुरी का नाम भी महत्वपूर्ण है| इस विधा में उन्हें अपूर्व सफलता प्राप्त हुई है| बेनीपुरी जी के लाल तारा, माटी की मूरतें, गेहूं और गुलाब, मील के पत्थर रेखा चित्र संग्रह उल्लेखनीय है| बेनीपुरी जी ने सामाजिक और राजनीतिक विषमताओं के प्रति आक्रोश तथा समाज के दीन- दलित वर्ग के प्रति ममता अभिव्यक्त करते हुए बहुत ही मार्मिकता के साथ रेखाचित्र लिखे हैं|                                                                       हिंदी रेखाचित्र के विकास में महादेवी वर्मा का नाम भी अलग ही पहचान रखता है| उनके रेखाचित्र हिंदी साहित्य में सर्वोच्च स्थान रखते हैं| सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी महादेवी की कलम का स्पर्श पाकर अपने समग्र चरित्र के साथ रेखा चित्रों में गरिमा मंडित हो गए हैं|  उन्होंने अपने रेखा चित्रों में ऐसे व्यक्तियों को विषय बनाया है जो सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत साधारण स्तर के हैं |यह सभी पात्र दूसरों की नजर में एक मिट्टी के ढेले के समान है| परंतु इन मिट्टी के ढेरों में से महादेवी वर्मा ने मानवता के विभिन्न रूपों को खोजा है| उनके रेखा चित्रों का मूल विषय करुणा है| ग्रामीण जीवन से संबंधित अनेक पात्र उनके रेखा चित्रों केविषय बने हैं| इस विद्या से संबंधित उनके चार संकलन है- अतीत के चलचित्र,  स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी, मेरा परिवार|  अतीत के चलचित्र उनका पहला संग्रह है और इसी में पहली बार रेखाचित्र की समस्त विशेषताएं सामने आती  हैं|   रामा और घीसा आदि उनके महत्वपूर्ण रेखाचित्र है|  रेखाचित्र विधा को पल्लवित करने का श्रेय प्रकाश चंद्र गुप्त, राधिका रमण प्रसाद सिंह, शिवपूजन सहाय, देवेंद्र सत्यार्थी, विष्णु प्रभाकर, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर आदि का नाम भी आता है | संस्मरण रेखाचित्र में निकट होते हुए भी उससे कुछ भिन्न है इसमें रेखाचित्र की अपेक्षा आत्म निष्ठा की अपेक्षा की जाती है|                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         


नाट्य साहित्य की परम्परा

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