हिंदसा

गुरुवार, 23 जून 2022


                                                                           कबीरदास


संत कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के प्रमुख संत  कवि हैं,  उन्होंने अपनी वाणी द्वारा आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त धार्मिक आडंबरों पर कुठाराघात किया। वह कर्म प्रधान समाज की पैरवी करते हैं, इसकी  झलक उनकी रचनाओं में साफ़ झलकती है।  मानो लोक कल्याण हेतु ही उन्होंने जन्म लिया था।   

कबीरदास के जन्म के संबंध में मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में हुआ वे लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के  पुष्प के ऊपर प्राप्त हुए। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे, नीरु और नीमा जुलाहे को इनके माता-पिता माना गया है और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। 

कबीर के जन्मस्थान के संबंध में तीन मत हैं : मगहर, काशी और आजमगढ़ में बेलहरा गाँव। मगहर के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि कबीर ने अपनी रचना में वहाँ का उल्लेख किया है : "पहिले दरसन मगहर पायो पुनि कासी बसे आई अर्थात् ..............काशी में रहने से पहले उन्होंने मगहर देखा।..... मगहर आजकल वाराणसी के निकट ही है और वहाँ कबीर का मक़बरा भी है। कबीर का अधिकांश जीवन काशी में व्यतीत हुआ। वे काशी के जुलाहे के रूप में ही जाने जाते हैं। .......... बहुत से लोग आजमगढ़ ज़िले के बेलहरा गाँव को कबीर साहब का जन्मस्थान मानते हैं। वे कहते हैं कि ‘बेलहरा’ ही बदलते-बदलते लहरतारा हो गया। पता लगाने पर न तो बेलहरा गाँव का ठीक पता चला पाता है और न यही मालूम हो पाता है कि बेलहरा का लहरतारा कैसे बन गया और वह आजमगढ़ ज़िले से काशी के पास कैसे आ गया ? वैसे आजमगढ़ ज़िले में कबीर, उनके पंथ या अनुयायियों का कोई स्मारक नहीं है।

कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। उनकी कविता का एक-एक शब्द पाखंडियों के पाखंडवाद और धर्म के नाम पर ढोंग व स्वार्थपूर्ति की निजी दुकानदारियों को ललकारता हुआ आया और असत्य व अन्याय की पोल खोल धज्जियाँ उड़ाता चला गया। कबीर का अनुभूत सत्य के सामने अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियाँ कहीं नहीं ठहर पाती । सत्य भी ऐसा जो आज तक के परिवेश पर सवालिया निशान बन चोट भी करता है और खोट भी निकालता है।

कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में कहलवा लिया– बन गया है तो सीधे–सीधे, नहीं दरेरा देकर। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार–सी नज़र आती है। उसमें मानो ऐसी हिम्मत ही नहीं है कि इस लापरवाह फक्कड़ की किसी फ़रमाइश को नाहीं कर सके।  जैसी ताकत कबीर की भाषा में है वैसी बहुत ही कम लेखकों में पाई जाती है।



कबीर का साहित्य और उसकी कुछ विशेषताएं-

उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाओं में कबीर बीजक, सुखनिधन, होली अगम, शब्द, वसंत, साखी और रक्त शामिल हैं। हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि कबीरदास जी ने अपनी रचनाओं को बेहद सरल और आसान भाषा में लिखा है, उन्होंने अपनी कृतियों में बेबाकी से धर्म, संस्कृति एवं जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखी है

`  विशेषताएं- गुरु का महत्त्व , जाति-पाति का विरोध , सामाजिक समानता , कुरीतियों , धार्मिक  आडम्बरों , पाखंडो का विरोध , रहस्यवाद , करनी-कथनी में अभेद  , नाम स्मरण और ध्यान  को महत्त्व , सत्य पर बल , मूर्ति पूजा और बहु देववाद का विरोध ,  समाज सुधार , जागरण के अग्रदूत , जीवन की क्षण्भंगुर, शुद्ध आचरण पर बल ,अहिंसा, माँसाहार करना माहापाप, अनुशासन, बिना गुरु के दान करना निषेध, व्यभिचार निषेध. छूआछात निषेध

1. करता था तो क्यूँ रह्या, अब करि क्यूँ पछताइ। बोवै पेड़ बबूल का,अम्ब कहाँ तैं खाइ॥

करता था : जब तुमने कर्म किये (बुरे कर्म किये) तो क्यूँ रह्या : तब क्यों नहीं रहे, उसे करते ही क्यों रहे (छोड़ा क्यों नहीं)अब करि क्यूँ पछताइ : अब क्यों पछता रहे हो.बोवै पेड़ बबूल का : तुमने बबूल का पेड़ बोया है. अम्ब कहाँ तैं खाइ : अब तुम आम कहाँ से खाओगे.अम्ब : आमखाइ- खाओगे.खाई-खाओगे. 
कबीर साहेब की वाणी है की जीवात्मा जब बुरे काम करती है तो विचार नहीं करती है. वह बाद में पछतावा करती है लेकिन पछतावा करने से कोई लाभ नहीं होने वाला है. तुमने यदि बबूल के पेड़ को बोया है तो अब तुम आम का फल कहाँ से खाओगे. जो
व्यक्ति जैसे कर्म करता है वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है. जीवन भर व्यक्ति स्वंय की लालसाओं और स्वार्थों की पिछे भागता फिरता है. कबीर साहेब ने कर्म प्रधानता पर बल दिया है, जैसे हमारे कर्म होंगे वैसे ही फल हमें प्राप्त होंगे. इसलिए साधक को चाहिए की वह सद्मार्ग पर चलते हुए नेक कार्य करे और हरी के नाम का सुमिरण करे. बगैर हरी नाम के सुमिरण के इश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है.

2. कबीर इस संसार को, समझाऊँ कै बार। पूँछ जु पकड़ै भेड़ की, उतर्‌या चाहै पार॥
कबीर इस संसार को : इस संसार को समझाऊँ कै बार : कितनी बार समझाऊ. पूँछ जु पकड़ै भेड़ की : जो लोग भेड़ की पूंछ कर. उतर्‌या चाहै पार : वह भव से पार होना चाहता है. कबीर इस संसार को : इस जगत को, समझाऊँ कै बार : कितनी बार समझाऊं, कैसे समझाऊं. पूँछ जु : जो पूंछ पकड़ते हैं.पकड़ै : पकड़ता है. भेड़ की : भेड़ की. उतर्‌या : उतरना चाहता है. चाहै पार : चाहता है.
कबीर साहेब कहते हैं मैं इस जगत को कैसे/कितनी बार समझाऊं ? इस जगत को समझाना कठिन है. यह जगत भेड़ की पूंछ पकड़ कर भव सागर पार करना चाहता है. भेड़ की पूंछ पकड़ लेने से भाव है की वह कर्मकांड और बाह्य जगत की भक्ति के माध्यम से इश्वर को प्राप्त करना चाहता है. सच्ची भक्ति अलग है और दिखावे की भक्ति अलग होती है. लोग देखा देखी में कार्य करते हैं. शास्त्रीय भक्ति, कर्मकांड आदि भेड़ की पूंछ पकड़ने के समान ही है. अतः हृदय से भक्ति करना महत्त्व रखता है, दिखावे की भक्ति से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है.

3. जैसी मुष तें नीकसै, तैसी चालै नाहिं। मानिष नहीं ते स्वान गति, बाँध्या जमपुर जाँहिं॥
जैसी मुष तें नीकसै : जैसा व्यक्ति कहता है (जो आदर्श हैं)
तैसी चालै नाहिं : वैसा करता नहीं है (आचरण में नहीं है)
मानिष नहीं ते स्वान गति : वह मनुष्य नहीं है, वह तो कुत्ता है, कुत्ते की भाँती से है.
बाँध्या जमपुर जाँहिं : बंधकर यमलोक/यमपुर जाता है.
जैसी : जिस प्रकार की, जैसी.
मुष तें : मुख से.
नीकसै : निकलती है, बोलता है. तैसी चालै नाहिं : वैसा चलता नहीं है. 
कबीर साहेब की वाणी है की जो व्यक्ति अपनी कथनी और करनी में भेद रखता है, जैसा कहता है वैसा करता नहीं है वह मनुष्य नहीं अपितु स्वान (कुत्ता) होता है. जैसे कुत्ते को हेय माना जाता है, इसी प्रकार से ऐसा व्यक्ति दुत्कार के काबिल होता है जो कहे कुछ और करे कुछ. ऐसे व्यक्ति को यमराज बांधकर अपने साथ लेकर जाता है.
भक्ति मार्ग में आगे बढ़ने के लिए सर्वप्रथम हमें अपनी कथनी और करनी का भेद समाप्त करना होगा. जो आदर्श हम कहते हैं, उसे अपने आचरण में उतारना आवश्यक होता है. आचरण में भिन्नता होने पर कल्याण संभव नहीं है.

4.पद गाए मन हरषियां, साँखी कह्यां अनंद।
सो तत नांव न जाणियां, गल में पड़िया फंद॥
जैसे भगवा पहन कर दिखावा करना, पाखण्ड करना लाभदाई नहीं है वैसे ही पद और साखी को मात्र गा देने से भी कोई लाभ प्राप्त नहीं होने वाला है, लाभ तो तभी होगा जब उसे जीवन में उतार लिया जाय,
5. 
जप तप दीसैं थोथरा, तीरथ व्रत वेसास ।
सूवै सैंवल सेविया यौ, जग चल्या निरास ॥
जप तप तीर्थ, वर्त एंव विभिन्न देवताओं में विश्वास रखने वाला व्यक्ति थोथा होता है ऐसे व्यक्ति को सदा ही निराशा ही हाथ लगती है जैसे सेमल  के फुल में चोंच मारने पर तोते को निराशा ही हाथ लगती हैं। भाव है की जीव को सच्चे मन से ईश्वर का सुमिरण किया जाना चाहिए।
जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह ।
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ।
 जो जानबूझ कर सत्य का साथ छोड़ देते हैं झूठ से प्रेम करते हैं हे भगवान् ऐसे लोगों की संगति हमें स्वप्न में भी न देना।

बुधवार, 12 जनवरी 2022

                                                     उसने कहा था 

                                'चंद्रधर शर्मा गुलेरी' हिंदी जगत के उन कहानीकारों में से एक हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के वास्तविक स्वरूप को गढ़ा है। हिंदी कहानी के विकास में यह कहानी आधारशिला का काम करती है। इस कहानी का प्रकाशन वर्ष सन् 1915 है । यह कहानी अपने समय प्रसिद्ध हिंदी पत्रिका 'सरस्वती' में प्रकाशित हुई थी। गुलरी जी संस्कृत भाषा के प्रकांड पंडित अथवा विद्वान थे, किंतु जिस समय उन्होंने यह कहानी लिखी वह समय भारत में खड़ी बोली के विकास का समय था, गुलेरी जी ने खड़ी बोली के श्रेष्ठ रूप का वर्णन किया है। कहानी के केंद्र में प्रेम का पवित्र भाव है| यह प्रेम अपने कर्तव्य, अपने राज्य और अपनी कौम के लिए है तथा दूसरी ओर कहानी में  मानवीय प्रेम का उदात्त स्वरूप दिखाया गया है| इसके अतिरिक्त लेखक ने बड़ी ही रोचकता के साथ भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को दिखाने का प्रयास भी किया है। 

                कहानी की शुरुआत अमृतसर के बंबूकाट बाजार से होती है जहां लहना सिंह अपने मामा के लिए दही लेने गया था। वहां उसकी मुलाकात एक लड़की से होती है, जिसकी ओर आकर्षित होकर वह पूछता है कि 'तेरी कुड़माई हो गई'  और लड़की कहती है- धत्त।  यह कई बार घटित होता है। परन्तु एक बार लडके की संभावना के विपरीत लड़की की और से  धत्त की जगह 'हां' जवाब आता है और लड़का जिसका नाम लहना सिंह है, बहुत व्याकुल हो जाता है,  इस व्याकुलता के कारण वह रास्ते में किसी से टकराकर अंधे की उपाधि पाता हुआ तथा किसी के ठेले  टकराकर उसका दूध गिरा कर अर्थात ठोकर खाता एवं मारता हुआ  विक्षिप्त अवस्था में घर की तरफ चल देता है। दो युवाओं के अनायास मिलन, आकर्षण, क्षणिक संवाद और तत्पश्चात एक लंबे अंतराल तक पुनः ना मिलने का दृश्य उपस्थित कर कहानी आगे बढ़ती है। एकाएक यह कहानी उस समय नया मोड़ लेती है जब युवा लहना सिंह मिलिट्री में सिपाही है और वह लड़की उसी सेना के सूबेदार की पत्नी है।  सूबेदार के घर पर्दे की ओट में लहना सिंह से सूबेदारनी का पुनः संवाद होता है। इस घटना के 25 वर्षों के बाद अब लहना सिंह नंबर 77 राइफल्स में जमादार है। वह यह सारी घटना को भूल चुका है। प्रथम विश्व युद्ध के लिए छुट्टियों से लौटते वक्त सूबेदार लहना सिंह के घर से होकर जाते हुए सूबेदारनी से भेंट वाली वह  स्मृति ताजी हो जाती है और वहां वह अपने बचपन के सात्विक प्रेम के लिए सूबेदारनी से वादा करता है कि वह सूबेदार व बोधा सिंह (जो उसका एकमात्र लड़का है) उसके प्राणों की रक्षा करेगा।

     कहानी पंजाब के सिख परिवार के एक युवक और युवती की है। इन दोनों के माध्यम से रचनाकार ने न केवल अमृतसर की माधुर्यमयी वाणी का दर्पण प्रस्तुत किया है, अपितु पंजाबी भाषा, खानपान की संस्कृति,  बाजार की गहमागहमी, युवक-युवतियों के विचारों में खुलापन तथा संबंधों की गरिमा को सहज रूप में प्रस्तुत कर दिया है। युवक- युवतियों के प्रेम संबंध, को दर्शाते समय देश, पारिवारिक मर्यादाओं, सीमाओं को भी ध्यान में रखते हुए प्रेम को यह कहकर परिभाषित किया है "देखते नहीं यह मेरा नया सालू," .. इतनी बात सुनते ही युवक की प्रतिक्रिया समाज के गली के  पूरे ताने-बाने को प्रस्तुत कर देती है। पंजाबी संस्कृति का एक दूसरा रूप जिसमें युवक की कर्तव्य परायणता का समावेश है, उसकी प्रस्तुति भी कहानी में सहज वर्णन प्रक्रिया के तहत चित्रण हुआ है। प्रथम विश्वयुद्ध में लहना सिंह अंग्रेजों की ओर से जर्मन सेनाओं के खिलाफ लड़ता है| वह अपनी समझदारी, कर्तव्य निष्ठा एवं साहस से अपने साथियों तथा सूबेदार हजारा सिंह एवं बोधा सिंह की रक्षा करता है। वह खुद भी घायल है, गोली का जख्म बहुत गहरा है लेकिन किसी को अपने गहरे घाव की खबर नहीं होने देता|  घायलों को के जाने के लिए शिविर में  गाड़ी आती है| सभी को गाड़ी में बिठाते हुए लहना सिंह सूबेदार से कहता है जब घर जाओ तो यह कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया। गाड़ी के जाते ही लहना सिंह लेट जाता है, मृत्यु के पहले उसे सभी घटनाओं की स्मृति आती है, यह स्मृतियां ही  25 वर्ष के अंतराल को खत्म कर एक दूसरे से संबंधित करती हैं, इस तरह कहानीकार में कथानक में आदि, मध्य और अंत का सुंदर नियोजन किया है। इस कहानी के सुंदर नियोजन के संबंध में डॉ नगेंद्र का मत है कि - उसने कहा था कहानी का आदि चंचल, मधुर है पर अंत में जैसे सारी ही कहानी रस में डूब जाती है। 8  साल की उस छोटी सी घटना से माधुर्य और लहना सिंह के पुरुषार्थी व्यक्तित्व से शक्ति प्राप्त कर अंत में उसके बलिदान की करुणा अधिक गंभीर हो जाती है। लहना सिंह सूबेदारनी के एक कथन की रक्षा करने के लिए या कहें कि अपने प्रेम की समर्पण शीलता हेतु जीते जी आन बान के साथ निभाना चाहता है। सूबेदार और उसके पुत्र दोनों की रक्षा करता है| सूबेदार के गाड़ी पर बैठने के समय लहना सिंह का यह कहना कि 'उसने कहा था' का संदेश प्रेषित कर देना ही इस कहानी की आत्मा है। 

कहानी के अंत में पंजाब की संस्कृति का एक और आनंदमय रूप दिखाई पड़ता है पसली के घाव से रक्त बह कर जम चुका है उसका अंत समय बिल्कुल नजदीक है। प्राण शरीर से निकलना ही चाहते हैं,  लहना सिंह के मस्तिष्क में जीवन के बीते हुए क्षण एक-एक करके सामने आते हैं। यह भारतीय संस्कृति की ऐसी चेतना है जिसका कोई तार्किक जवाब नहीं है किंतु यह माना जाता है कि व्यक्ति के अंतिम समय में उसके भले- बुरे कर्म उसे एक- एक कर याद आ रहे होते हैं। लहना सिंह इसी स्थिति में है। सूबेदारनी का प्रश्न और वह उसके नेत्रों से जा चुका है अब उसे कुछ याद है तो वह है अपने भाई की बातें, अपने घर का आंगन जहां आम का वृक्ष लगा हुआ था, उस अमराई की छांव में दोनों भाई बैठे हैं। लहना सिंह जानता है कि अब उसके प्राण निकलने वाले हैं इसलिए वह अपने  बड़े भाई कीरत सिंह की गोद में है और वह अपने बड़े भाई से कुछ कह रहा है लहना का सिर अपनी गोद में रखकर वजीरा सिंह बैठा है जब वह पानी मांगता है तब वजीरा सिंह पानी पिला देता है|  आधे घंटे तक लहना सिंह चुप रहा फिर बोला 'कौन? कीरत सिंह! वजीरा सब कुछ समझ गया था इसलिए उसने 'हाँ' कहा था| लहना सिंह उसको कह   कहा था - 'भैया मुझे और ऊंचा कर ले, अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले। वजीरा सिंह ने वैसा ही किया जबकि उसके आंसू टप- टप  टपक रहे थे। कहानी का अंत इस खबर के साथ होता है कि 68 वीं सूची मैदान में घावों से मरा- नंबर 77 सिख राइफल्स जमादार लहना सिंह।  इस प्रकार इस कहानी का अंत बेहद मार्मिक बन पड़ा है|

नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...