कबीरदास
संत कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के प्रमुख संत कवि हैं, उन्होंने अपनी वाणी द्वारा आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त धार्मिक आडंबरों पर कुठाराघात किया। वह कर्म प्रधान समाज की पैरवी करते हैं, इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ़ झलकती है। मानो लोक कल्याण हेतु ही उन्होंने जन्म लिया था।
कबीरदास के जन्म के संबंध में मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में हुआ वे लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के पुष्प के ऊपर प्राप्त हुए। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे, नीरु और नीमा जुलाहे को इनके माता-पिता माना गया है और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं।
कबीर के जन्मस्थान के संबंध में तीन मत हैं : मगहर, काशी और आजमगढ़ में बेलहरा गाँव। मगहर के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि कबीर ने अपनी रचना में वहाँ का उल्लेख किया है : "पहिले दरसन मगहर पायो पुनि कासी बसे आई अर्थात् ..............काशी में रहने से पहले उन्होंने मगहर देखा।..... मगहर आजकल वाराणसी के निकट ही है और वहाँ कबीर का मक़बरा भी है। कबीर का अधिकांश जीवन काशी में व्यतीत हुआ। वे काशी के जुलाहे के रूप में ही जाने जाते हैं। .......... बहुत से लोग आजमगढ़ ज़िले के बेलहरा गाँव को कबीर साहब का जन्मस्थान मानते हैं। वे कहते हैं कि ‘बेलहरा’ ही बदलते-बदलते लहरतारा हो गया। पता लगाने पर न तो बेलहरा गाँव का ठीक पता चला पाता है और न यही मालूम हो पाता है कि बेलहरा का लहरतारा कैसे बन गया और वह आजमगढ़ ज़िले से काशी के पास कैसे आ गया ? वैसे आजमगढ़ ज़िले में कबीर, उनके पंथ या अनुयायियों का कोई स्मारक नहीं है।
कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। उनकी कविता का एक-एक शब्द पाखंडियों के पाखंडवाद और धर्म के नाम पर ढोंग व स्वार्थपूर्ति की निजी दुकानदारियों को ललकारता हुआ आया और असत्य व अन्याय की पोल खोल धज्जियाँ उड़ाता चला गया। कबीर का अनुभूत सत्य के सामने अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियाँ कहीं नहीं ठहर पाती । सत्य भी ऐसा जो आज तक के परिवेश पर सवालिया निशान बन चोट भी करता है और खोट भी निकालता है।
कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में कहलवा लिया– बन गया है तो सीधे–सीधे, नहीं दरेरा देकर। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार–सी नज़र आती है। उसमें मानो ऐसी हिम्मत ही नहीं है कि इस लापरवाह फक्कड़ की किसी फ़रमाइश को नाहीं कर सके। जैसी ताकत कबीर की भाषा में है वैसी बहुत ही कम लेखकों में पाई जाती है।
कबीर का साहित्य और उसकी कुछ विशेषताएं-
उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाओं में कबीर बीजक, सुखनिधन, होली अगम, शब्द, वसंत, साखी और रक्त शामिल हैं। हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि कबीरदास जी ने अपनी रचनाओं को बेहद सरल और आसान भाषा में लिखा है, उन्होंने अपनी कृतियों में बेबाकी से धर्म, संस्कृति एवं जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखी है
` विशेषताएं- गुरु का महत्त्व , जाति-पाति का विरोध , सामाजिक समानता , कुरीतियों , धार्मिक आडम्बरों , पाखंडो का विरोध , रहस्यवाद , करनी-कथनी में अभेद , नाम स्मरण और ध्यान को महत्त्व , सत्य पर बल , मूर्ति पूजा और बहु देववाद का विरोध , समाज सुधार , जागरण के अग्रदूत , जीवन की क्षण्भंगुर, शुद्ध आचरण पर बल ,अहिंसा, माँसाहार करना माहापाप, अनुशासन, बिना गुरु के दान करना निषेध, व्यभिचार निषेध. छूआछात निषेध
1. करता था तो क्यूँ रह्या, अब करि क्यूँ पछताइ। बोवै पेड़ बबूल का,अम्ब कहाँ तैं खाइ॥
व्यक्ति जैसे कर्म करता है वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है. जीवन भर व्यक्ति स्वंय की लालसाओं और स्वार्थों की पिछे भागता फिरता है. कबीर साहेब ने कर्म प्रधानता पर बल दिया है, जैसे हमारे कर्म होंगे वैसे ही फल हमें प्राप्त होंगे. इसलिए साधक को चाहिए की वह सद्मार्ग पर चलते हुए नेक कार्य करे और हरी के नाम का सुमिरण करे. बगैर हरी नाम के सुमिरण के इश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है.
तैसी चालै नाहिं : वैसा करता नहीं है (आचरण में नहीं है)
मानिष नहीं ते स्वान गति : वह मनुष्य नहीं है, वह तो कुत्ता है, कुत्ते की भाँती से है.
बाँध्या जमपुर जाँहिं : बंधकर यमलोक/यमपुर जाता है.
जैसी : जिस प्रकार की, जैसी.
मुष तें : मुख से.
नीकसै : निकलती है, बोलता है. तैसी चालै नाहिं : वैसा चलता नहीं है.
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ।