उसने कहा था
'चंद्रधर शर्मा गुलेरी' हिंदी जगत के उन कहानीकारों में से एक हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के वास्तविक स्वरूप को गढ़ा है। हिंदी कहानी के विकास में यह कहानी आधारशिला का काम करती है। इस कहानी का प्रकाशन वर्ष सन् 1915 है । यह कहानी अपने समय प्रसिद्ध हिंदी पत्रिका 'सरस्वती' में प्रकाशित हुई थी। गुलरी जी संस्कृत भाषा के प्रकांड पंडित अथवा विद्वान थे, किंतु जिस समय उन्होंने यह कहानी लिखी वह समय भारत में खड़ी बोली के विकास का समय था, गुलेरी जी ने खड़ी बोली के श्रेष्ठ रूप का वर्णन किया है। कहानी के केंद्र में प्रेम का पवित्र भाव है| यह प्रेम अपने कर्तव्य, अपने राज्य और अपनी कौम के लिए है तथा दूसरी ओर कहानी में मानवीय प्रेम का उदात्त स्वरूप दिखाया गया है| इसके अतिरिक्त लेखक ने बड़ी ही रोचकता के साथ भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को दिखाने का प्रयास भी किया है।
कहानी की शुरुआत अमृतसर के बंबूकाट बाजार से होती है जहां लहना सिंह अपने मामा के लिए दही लेने गया था। वहां उसकी मुलाकात एक लड़की से होती है, जिसकी ओर आकर्षित होकर वह पूछता है कि 'तेरी कुड़माई हो गई' और लड़की कहती है- धत्त। यह कई बार घटित होता है। परन्तु एक बार लडके की संभावना के विपरीत लड़की की और से धत्त की जगह 'हां' जवाब आता है और लड़का जिसका नाम लहना सिंह है, बहुत व्याकुल हो जाता है, इस व्याकुलता के कारण वह रास्ते में किसी से टकराकर अंधे की उपाधि पाता हुआ तथा किसी के ठेले टकराकर उसका दूध गिरा कर अर्थात ठोकर खाता एवं मारता हुआ विक्षिप्त अवस्था में घर की तरफ चल देता है। दो युवाओं के अनायास मिलन, आकर्षण, क्षणिक संवाद और तत्पश्चात एक लंबे अंतराल तक पुनः ना मिलने का दृश्य उपस्थित कर कहानी आगे बढ़ती है। एकाएक यह कहानी उस समय नया मोड़ लेती है जब युवा लहना सिंह मिलिट्री में सिपाही है और वह लड़की उसी सेना के सूबेदार की पत्नी है। सूबेदार के घर पर्दे की ओट में लहना सिंह से सूबेदारनी का पुनः संवाद होता है। इस घटना के 25 वर्षों के बाद अब लहना सिंह नंबर 77 राइफल्स में जमादार है। वह यह सारी घटना को भूल चुका है। प्रथम विश्व युद्ध के लिए छुट्टियों से लौटते वक्त सूबेदार लहना सिंह के घर से होकर जाते हुए सूबेदारनी से भेंट वाली वह स्मृति ताजी हो जाती है और वहां वह अपने बचपन के सात्विक प्रेम के लिए सूबेदारनी से वादा करता है कि वह सूबेदार व बोधा सिंह (जो उसका एकमात्र लड़का है) उसके प्राणों की रक्षा करेगा।
कहानी पंजाब के सिख परिवार के एक युवक और युवती की है। इन दोनों के माध्यम से रचनाकार ने न केवल अमृतसर की माधुर्यमयी वाणी का दर्पण प्रस्तुत किया है, अपितु पंजाबी भाषा, खानपान की संस्कृति, बाजार की गहमागहमी, युवक-युवतियों के विचारों में खुलापन तथा संबंधों की गरिमा को सहज रूप में प्रस्तुत कर दिया है। युवक- युवतियों के प्रेम संबंध, को दर्शाते समय देश, पारिवारिक मर्यादाओं, सीमाओं को भी ध्यान में रखते हुए प्रेम को यह कहकर परिभाषित किया है "देखते नहीं यह मेरा नया सालू," .. इतनी बात सुनते ही युवक की प्रतिक्रिया समाज के गली के पूरे ताने-बाने को प्रस्तुत कर देती है। पंजाबी संस्कृति का एक दूसरा रूप जिसमें युवक की कर्तव्य परायणता का समावेश है, उसकी प्रस्तुति भी कहानी में सहज वर्णन प्रक्रिया के तहत चित्रण हुआ है। प्रथम विश्वयुद्ध में लहना सिंह अंग्रेजों की ओर से जर्मन सेनाओं के खिलाफ लड़ता है| वह अपनी समझदारी, कर्तव्य निष्ठा एवं साहस से अपने साथियों तथा सूबेदार हजारा सिंह एवं बोधा सिंह की रक्षा करता है। वह खुद भी घायल है, गोली का जख्म बहुत गहरा है लेकिन किसी को अपने गहरे घाव की खबर नहीं होने देता| घायलों को के जाने के लिए शिविर में गाड़ी आती है| सभी को गाड़ी में बिठाते हुए लहना सिंह सूबेदार से कहता है जब घर जाओ तो यह कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया। गाड़ी के जाते ही लहना सिंह लेट जाता है, मृत्यु के पहले उसे सभी घटनाओं की स्मृति आती है, यह स्मृतियां ही 25 वर्ष के अंतराल को खत्म कर एक दूसरे से संबंधित करती हैं, इस तरह कहानीकार में कथानक में आदि, मध्य और अंत का सुंदर नियोजन किया है। इस कहानी के सुंदर नियोजन के संबंध में डॉ नगेंद्र का मत है कि - उसने कहा था कहानी का आदि चंचल, मधुर है पर अंत में जैसे सारी ही कहानी रस में डूब जाती है। 8 साल की उस छोटी सी घटना से माधुर्य और लहना सिंह के पुरुषार्थी व्यक्तित्व से शक्ति प्राप्त कर अंत में उसके बलिदान की करुणा अधिक गंभीर हो जाती है। लहना सिंह सूबेदारनी के एक कथन की रक्षा करने के लिए या कहें कि अपने प्रेम की समर्पण शीलता हेतु जीते जी आन बान के साथ निभाना चाहता है। सूबेदार और उसके पुत्र दोनों की रक्षा करता है| सूबेदार के गाड़ी पर बैठने के समय लहना सिंह का यह कहना कि 'उसने कहा था' का संदेश प्रेषित कर देना ही इस कहानी की आत्मा है।
कहानी के अंत में पंजाब की संस्कृति का एक और आनंदमय रूप दिखाई पड़ता है पसली के घाव से रक्त बह कर जम चुका है उसका अंत समय बिल्कुल नजदीक है। प्राण शरीर से निकलना ही चाहते हैं, लहना सिंह के मस्तिष्क में जीवन के बीते हुए क्षण एक-एक करके सामने आते हैं। यह भारतीय संस्कृति की ऐसी चेतना है जिसका कोई तार्किक जवाब नहीं है किंतु यह माना जाता है कि व्यक्ति के अंतिम समय में उसके भले- बुरे कर्म उसे एक- एक कर याद आ रहे होते हैं। लहना सिंह इसी स्थिति में है। सूबेदारनी का प्रश्न और वह उसके नेत्रों से जा चुका है अब उसे कुछ याद है तो वह है अपने भाई की बातें, अपने घर का आंगन जहां आम का वृक्ष लगा हुआ था, उस अमराई की छांव में दोनों भाई बैठे हैं। लहना सिंह जानता है कि अब उसके प्राण निकलने वाले हैं इसलिए वह अपने बड़े भाई कीरत सिंह की गोद में है और वह अपने बड़े भाई से कुछ कह रहा है लहना का सिर अपनी गोद में रखकर वजीरा सिंह बैठा है जब वह पानी मांगता है तब वजीरा सिंह पानी पिला देता है| आधे घंटे तक लहना सिंह चुप रहा फिर बोला 'कौन? कीरत सिंह! वजीरा सब कुछ समझ गया था इसलिए उसने 'हाँ' कहा था| लहना सिंह उसको कह कहा था - 'भैया मुझे और ऊंचा कर ले, अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले। वजीरा सिंह ने वैसा ही किया जबकि उसके आंसू टप- टप टपक रहे थे। कहानी का अंत इस खबर के साथ होता है कि 68 वीं सूची मैदान में घावों से मरा- नंबर 77 सिख राइफल्स जमादार लहना सिंह। इस प्रकार इस कहानी का अंत बेहद मार्मिक बन पड़ा है|