हिंदसा

रविवार, 24 जून 2018

एक वह अजेय (कहानी संग्रह )


                                                                
                                 
(समीक्षा)       

‘एक वह अजेय’ कहानी संग्रह दिल्ली में जन्मे डॉ. वीरेन्द्र कुमार जी का है| डॉ. वीरेन्द्र कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले ईशा ज्ञानदीप प्रकाशन से उनके ‘अन्नदाता’ और ‘अपने-अपने कुरुक्षेत्र’ नामक दो कहानी संग्रह छप चुके हैं| 
यह उनका तीसरा कहानी संग्रह है| पिछली कहानियों की तरह ही डॉ. वीरेन्द्र कुमार की इन कहानियों में भी कल्पना कम यथार्थ ज्यादा है। सरल एवं सहज भाषा में लिखी गई ये कहानियां पठनीय होने के साथ-साथ मध्यम वर्गीय जीवन के एकदम करीब हैं , कहानियों का निर्माण किसी भारी भरकम और सुनियोजित कथ्य से न होकर उन छोटी-छोटी साधारण घटनाओं से हुआ है जो हर घर में, परिवार में और हर समाज में घटित होती हैं| समाज और परिवार में रहते हुए व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में कुछ सामान्य-सी घटनाओं और अपने-परायों के बीच अक्सर जिन छोटी-छोटी समस्याओं से रूबरू होता है, उन्हीं का चित्रण-वर्णन हमें इस संग्रह की कहानियों में देखने-पढ़ने को मिलता है| मनुष्य अपने आस-पास घटित होने वाली ऐसी आदतों-बातों और मुलाकातों को बहुत सहज रूप में लेते हैं जबकि ये घटनाएं किसी भी व्यक्ति के जीवन को सही-गलत दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसी ही कुछ घटनाओं का संग्रह कर लेखक ने इन कहानियों को गुना-बुना है|
प्रकृति से मनुष्य का अटूट रिश्ता है, इसका अहसास कहानियों को पढ़ते हुए बखूबी होता है| लेखक ने भावों की गहराई को समझाने के लिए प्रकृति का ही सहारा लिया है “ मेरे भीतर का वात्सल्य रसायन बनकर रुके हुए जलस्त्रोत के प्रवाह की तरह दुग्ध रूप में फूट पड़ा है” सर्दी-गर्मी-बरसात आदि सभी ऋतुएं, सुबह-शाम-दोपहर-रात-दिन, आदि दिन के पहर, इन सबका किसी भी कहानी के देशकाल और वातावरण के निर्माण में अहम् रोल होता है, इस बात को लेखक अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए प्रत्येक कहानी में कहीं-न-कहीं प्रकृति के उपादानों का चित्रण अवश्य हुआ है| इस कहानी-संग्रह की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि प्रत्येक कहानी में प्रत्येक स्तर पर लेखक की दृष्टि सामाजिक, पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण पर बनी रही है| 
        जीवन का एक और नाम संघर्ष है, कदम कदम पर नई-नई मुसीबतें-समस्याएं और परेशानियाँ मुंह बाए खडी रहती हैं, ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपने सारे निर्णय सोच-समझ कर लेता है| फिर भी कई बार जब समय प्रतिकूल होता है तो सज्जन व्यक्ति भी अपनी बिना किसी भूमिका के ऐसी मुश्किल में पड़ जाता है कि उसकी सारी सूझ-बुझ धरी की धरी रह जाती है, उसकी जीवन-नैया डगमगाने लगती है, ऐसी दुःख की घड़ी में अगर कोई इंसान मदद के लिए आगे आता है तो वही सच्चा इंसान होता है, देखा जाये तो यही इंसान होने की पहचान है, इंसान वह है, जो अपने आसपास के लोगों को दुख से उभारे, उनकी मदद करें|  मगर ये दुनिया इतनी सीधी-साधी नहीं है, होता अक्सर ये है कि जब मनुष्य कष्ट में होता है तो लोग उसका साथ छोड़ देते हैं, उससे दूरी बना लेते हैं, यहाँ तक कि लोग अपने को पराया करने में सेकंड नहीं लगाते। तब ऐसा लगता है जैसे ये धरती रहने लायक जगह नहीं है, इंसान, इंसान नहीं, हैवान है और ये जीवन जीवन न होकर एक सजा है, अगर जीवन, दुनिया या इस समाज को लेकर आप भी ऐसा सोचते हैं तो आपको  ‘एक वह अजेय’ कहानी संग्रह ज़रूर पढ़ना चाहिए| क्योंकि इन कहानियों के सदपात्र जीवन में हारे हुए कुछ ऐसे ही लोगों का सहारा बनने के लिए पैदा हुए हैं| लेखक ने ‘अपनी बात’ में  इस ओर संकेत भी किया है, वे लिखते हैं- “प्रस्तुत कहानी संग्रह ‘एक वह अजेय’ में जीवन संघर्ष से जूझते हुए कुछ ऐसे सदपात्र हैं जो जगह-जगह अपनी स्वर्णिम किरणों की आभा से प्रकाश फैला रहे हैं| स्वयं को होम करने वाले यह पात्र स्वयं कष्टों को झेलते हुए किसी दूसरे को बनाकर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं और यह विश्वास दृढ़ बना देते हैं कि दुनिया अभी जीने लायक है और ‘मनुष्यता मरी नहीं है’  लेखक ने अपना उद्देश्य स्पष्ट करने के लिए जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कृति कामायनी से कुछ पंक्तियाँ भी उद्रित की हैं - 'औरो को हंसते देखो मनु, हँसों और सुख पाओ। अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ।'
                           इस संग्रह में कुल आठ कहानियां संकलित हैं| प्रत्येक कहानी की रचना में लेखक का अपना अनुभव, स्मृतियां, सोच और दृष्टि का अहम् रोल रहा हैं| लेखक समाज में बदलाव चाहता है| वह चाहता है कि समाज प्रगतिशील तो बने और समाज की परंपरागत सोच में भी सकारात्मक परिवर्तन आए, लेकिन ये बदलाव पारिवारिक मूल्यों की बलि देकर नहीं होना चाहिए, शुरू से लेकर आखिर तक लेखक की यही मंसा दिखाई देती है| अगर परम्पराओं में बदलाव लाने से व्यक्ति का जीवन सुखी होता है तो इसके लिए लेखक रूढ़ हो चुकी परम्पराओं को ख़त्म कर नई परम्पराओं की स्थापना करने के लिए तैयार है, ऐसी सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने में लेखक इस बात की भी परवाह नहीं करता कि समाज के ‘चार लोग क्या कहेंगे’, लेकिन जहाँ फ़र्ज या जिम्मेदारियों को निभाने की बात आती है तो वहां लेखक  इस बात की फिक्र करता है कि 'कौन क्या कहेगा' | ‘चिकनगुनिया’ कहानी में अरुण अपने पिता को कहता है-“पापा आप हमेशा कहते हो, लोग क्या कहेंगे ? लोग क्या सोचेंगे ?……कौन हैं वे लोग जो आपके बारे में सोचते हैं; चिंता करते हैं आपकी, मुझे बताइए किसने आपको क्या दिया ?.......|” इसी तरह  ‘क्या करे अनुज’ कहानी का पात्र ‘अनुज’ अपने परिवार, अपने खानदान और समाज के प्रति अपने फ़र्ज और अपनी जिम्मेदारियों को समझता है और उनको निभाना चाहता है। उसे इस बात का खेद है कि जिनकी वो मदद करता है वो उसके प्रति कृतज्ञता भी प्रकट नहीं करते। बावजूद इसके वह अपने बीमार भाई की तन-धन-मन से मदद करता है| जबकि हम सब जानते हैं कि इस महंगाई के ज़माने में ऐसा करने वाले विरले ही मिलेंगे क्योंकि इतनी महंगाई में आज का दंपति सिर्फ अपनी पत्नी और बच्चों की खुशहाली तक ही सोच पाता है, सच्चाई तो यह है कि अपने परिवार के दूसरे सदस्यों अर्थात अपनी बहन या भाई की मदद करने के लिए ना तो उनके पास पैसा होता है और ना ही समय| कहानी पढ़कर दिमाग में यही आता है कि  हमें केवल अपने बारे में ही नहीं, अपने परिवार के दूसरे सदस्यों के बारे में भी सोचना चाहिए। ऐसा करके लेखक ने समाज और परिवार को तोड़ने की नहीं जोड़ने की बात की है|                                      
        साहित्य समाज का दर्पण होता है| समाज के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों को दिखाना किसी भी अच्छे लेखक का धर्म ही नहीं कर्तव्य भी होता है| कहानी-संग्रह का लेखक अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति सचेत है और इसी का पालन करते हुए लेखक ने दो कहानियों के माध्यम से जिम्मेदार और गैरजिम्मेदार युवा वर्ग पर प्रकाश डाला है| ‘अनाथ संसार का एक वह बालक’ और  ‘एक वह अजेय’ नामक दोनों कहानियों का निर्माण लेखक की इसी दृष्टि को रेखांकित करता है|  ‘अनाथ संसार का एक वह बालक’ कहानी आज के समय में प्रासंगिक है क्योंकि आज की नई पीढ़ी को मेहनत कम, रुपया ज्यादा चाहिए| इलेक्ट्रोनिक गैजेट और आभासी दुनिया को ही अपना सब कुछ मानने वाली  यह पीढ़ी अपने बूते पर नहीं बल्कि माता-पिता की कमाई के बूते पर बहुत-कुछ और बहुत बड़ा आदमी बनने का सपना देखती है| ऐसे में माता-पिता उन्हें पैसे देने वाली एटीएम मशीन लगने लगते हैं, एक ऐसी मशीन जिसका अपना कोई शौक या जरूरत शेष नहीं बची| यह पीढ़ी माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने से भी कतराती है।|  ‘अनाथ संसार का एक वह बालक’ कहानी का एकांत कुछ इसी तरह का बालक है| दूसरी तरफ  ‘एक वह अजेय’ कहानी में राधिका है जो ऐसे युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो समाज और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझाता है| राधिका जो कम उम्र में ही परिवार की मुखिया की भूमिका का निर्वाह करती है, अपने पिता को जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ देखकर अपनी छोटी बहनों की शादी की जिम्मेदारी वह खुद अपने कंधों पर लेती है ....राधिका अपने पिता को कहती है कि आप चिंता क्यों करते हैं? मैं हूँ न ..आप अपना ध्यान रखिए। कहानी, समाज की उस परंपरावादी सोच को खारिज करती हुई आगे बढती है कि लड़कियां लड़कों वाले काम नहीं कर सकती या लड़के ही माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा होते हैं, जो लोग लड़कियों को कमतर मानते हैं उनको यह कहानी यह संदेश देती है कि आज के समय में लड़कियां भी अपने माता-पिता और परिवार की उसी तरह से मदद करती हैं जिस तरह से एक लड़का मदद करता है। अतः माता पिता को लड़के लड़कियों की परवरिश में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए। दोनों कहानियों  का आदि, मध्य और अंत सही दिशा में विकास करता नजर आता है और कहानी के तत्वों के आधार पर भी मूल्यांकन करें तो भी ये बहुत ही अच्छी कहानी साबित होती हैं|
                   ‘चिकनगुनिया कहानी’ बुजुर्गों के अकेले जीवनयापन को लेकर लिखी गई है, अरुण और करुणा अपने-अपने माता-पिता के नए संबंध का समर्थन करते हैं| उनका यह निर्णय उनकी आधुनिक सोच का परिचायक है|  आज रोजी-रोटी के चक्कर में नई पीढ़ी माता-पिता को छोड़ विदेशों में जाकर बस रही है, माता- पिता बुढ़ापे में अकेले जीवनयापन करने  को मजबूर हो रहे हैं| ऐसे समय में पारिवारिक संबंधों की परिधि, सीमाएं बढ़ रही हैं,  उनकी परिभाषाएं बदल रही हैं, लेखक ने सांकेतिक रूप से जाहिर कर दिया है कि अब हमें पारिवारिक संबंधों को लेकर अपनी पारंपरिक सोच को त्याग कर समयानुसार नई सोच को अपनाना पड़ेगा| देखा जाये तो पाठक भी यही चाहता है इसलिए मौसी का अरुण के साथ जाना पाठक को शुकून देता है क्योंकि जीवन केवल जवानी का नाम नहीं है, उसमें बुढ़ापा भी आता है और जवानी में हमें शायद सहारे की उतनी जरूरत नहीं होती जितनी बुढ़ापे में होती है| ‘उनके अपने फूफा जी’ कहानी समाज के यथार्थ रूप को उजागर करती है। समाज में कुछ लोग दोहरे चरित्र के व्यक्ति होते हैं जो देखने में बहुत ही सीधे-साधे और सामाजिक लगते हैं लेकिन बहुत ही कुटिल कुलषित हृदय वाले होते हैं। अपनी चौधराहट बनी रहे बस, भलाई से इन लोगों का कोई लेना-देना नहीं होता। अपने स्वार्थ के सिवा इनको कुछ नहीं दिखाई देता। इस कहानी में लेखक ने ऐसे लोगों के चरित्र पर पड़ी परतें उतार उनके चरित्र का वास्तविक रूप दिखाया है।
            ‘अपना अपना गणित’ कहानी में लेखक ने घरेलु कामों को लेकर एक दम्पति के बीच हुए वार्तालाप को आधार बनाया है| घरेलु काम महिला और पुरुष किसके कर्मक्षेत्र में आते हैं ? यही प्रश्न वार्तालाप का मुख्य केंद्र बिंदु है| आजकल महिला और पुरुष दोनों ही काम करते हैं। प्राय: सभी घरों में घरेलू काम महिला के सर पर मंड दिए जाते हैं, पुरुष अगर किसी काम को करता है तो वह ये कह कर महिला पर अहसान जताता है कि उसने ये सारे काम उसके बांटे के किये हैं| जबकि आज महिला पुरुष के बराबर कमाती है| ऐसे में घर के काम भी दोनों के हुए, लेकिन महिला के हिस्से में कुछ ज्यादा ही काम रहता है, उस पर कार्यक्षेत्र और घरेलू दोनों जगहों के कामों को करने की जिम्मेदारी आ जाती है| या यूँ कहे कि नाते-रिश्ते निभाने की जिम्मेदारी महिलाओं की ज्यादा होती है| इसलिए वह अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को छोड़ नहीं पाती और ना ही वह अपने निजी कार्य क्षेत्र में किसी तरह की लापरवाही दिखाना चाहती, इसलिए वह इन दोनों के बीच में अंततः संघर्ष में करती रहती है जिसका कहीं ना कहीं उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है| कह सकते हैं कि महिलाओं के  पक्ष को इस कहानी में बड़े अच्छे से रखा गया है और वो भी एक पुरूष पात्र के द्वारा, यह तभी संभव हो पाता है जब उस अहसास को उस पुरूष पात्र ने महसूस किया हो| 
                   ‘एक बेरोजगार’ कहानी में यह बहुत ही अच्छी तरह दर्शाया है कि एक व्यक्ति अपने अस्थाई रोजगार को बनाए रखने के लिए क्या-क्या नहीं करता?, कुछ चापलूस और अत्यधिक महत्वाकांक्षी लोग सत्ताधारी को ऐसा चश्मा पहनाते है कि उसको फिर वही दीखता है जो वे दिखाना चाहते हैं, लेकिन कहते हैं न कि जिसको लागे वही जाने, शायद इस पीड़ा का तनिक भी अहसास न तो सरकार को है और न ही किसी संस्थान के सर्वेसर्वा को| इसलिए यह कोई नहीं जानता कि अस्थाई होने का दंश झेलते-झेलते व्यक्ति हरे-भरे पेड़ से सूखी लकड़ी-सा हो जाता है, हमारा प्रशासन, हमारी व्यवस्था, संस्थान का सर्वेसर्वा इस अस्थाई या बेरोजगार को सुखी लकड़ी बनाकर अपने ओछे स्वार्थ के चुल्हे में जलाकर किस प्रकार अपनी रोटियाँ सकते हैं, यह ‘एक बेरोजगार’ कहानी से पता चलता है, लेकिन बेरोजगारों को नाकामियों से घबराकर आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए|
         कहानी संग्रह की अंतिम कहानी माधवी है| माधवी कहानी की मुख्य पात्र है जो एक लडके से प्रेम करती है| वह जानती है कि सच्चे प्रेम में भोग-वासना का कोई स्थान नहीं है| जो ‘प्रेम’ जैसे पवित्र शब्द को भी यूज एंड थ्रो की तर्ज पर प्रयोग करते हैं ऐसे प्रेमियों को माधवी ने बड़े सटीक शब्दों में प्रेम के पवित्र भाव को समझाने की कोशिश की है| अंत में कहा जा सकता है कि एक दो जगह लेखक भाव में बहकर कहानीकार के बदले उपदेशक की भूमिका में ज़रूर आ गए हैं, थोड़ी लेखनी भी डगमगाई है, जिसके कारण बीच-बीच में संवादों में थोडा-सा विरोधाभास उत्त्पन्न होता है लेकिन कथा के प्रवाह में, गति में, कहीं कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती| कुल मिलाकर सभी कहानियां पाठक को सामाजिक सरोकारों से जोड़ती हैं|
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शुक्रवार, 15 जून 2018

संस्कृत के प्रख्यात काव्य शास्त्री

                                             संस्कृत के प्रख्यात काव्य शास्त्री
 संस्कृत के जितने भी काव्य शास्त्रीय ग्रंथ उपलब्ध  हैं उनके आधार पर भरतमुनि को काव्यशास्त्र का सबसे पहला आचार्य माना जाता है और इस परंपरा के अंतिम आचार्य पंडित राज जगन्नाथ को माना गया है। सैकड़ों वर्षों पुराना यह शास्त्रीय साहित्य अपनी व्यापक विषय सामग्री, अपूर्व तर्क सम्मत विवेचन पद्धति और गंभीर शैली तथा स्थापनाओं के कारण  भारतीय वाङ्ग्मय  में अपना विशिष्ट स्थान रखता है।  संस्कृत के इन महान आचार्यों में भरत, भामह, वामन, आनंद वर्धन, कुंतक, महिम भट्ट, जगन्नाथ आदि आते हैं।  आचार्यों द्वारा प्रस्तुत मान्यताएं एवं धारणाएँ तो संभवत पहले भी विद्वत गोष्ठियों में प्रचलित रही होंगी किंतु ग्रंथ आकार के रूप में इन्हें प्रस्तुत करने का श्रेय इन्हीं आचार्यों को जाता है। संभावना यह भी है कि कई ग्रंथ उपलब्ध नहीं  हो किंतु उनकी अनुपलब्धि पर्यन्त  इन आचार्यों को यह श्रेय मिलता रहेगा।
कुछ प्रख्यात आचार्यों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
भरतमुनि-
भरतमुनि भारतीय का संस्कृत काव्यशास्त्र के सबसे प्राचीन आचार्य हैं। उनकी ख्याति नाट्यशास्त्र के रचयिता के रूप में है। परन्तु उनके जीवन और व्यक्तित्व के विषय में इतिहास अभी तक मौन है।  इस संबंध में विद्वानों का एक मत यह भी है कि भरत वस्तुतः एक काल्पनिक मुनि का नाम है। संस्कृत के प्राचीन महाकाव्य में जो उल्लेख  मिलता है उसके अनुसार नाटक के नट को भरत कहा जाता था। नाट्य विधान के जो तत्व समय-समय पर निर्मित होते गए, उनका संग्रह 'भरत' (नाटकीय नट) के नाम पर कर दिया गया। संग्रहकारों में विशेष उल्लेखनीय नाम  कोहल का है, और उसके पश्चात शांडिल्य, दत्तिल और मतंग का। संभव है कि भरत नामक किसी मुनि का भी इस संग्रह को प्रस्तुत करने में प्रमुख हाथ रहा हो।
          नाट्यशास्त्र के दो संस्करण उपलब्ध है- 1 काव्य माला मुंबई (निर्णय सागर) का संस्करण और 2.काशी संस्कृत सीरीज काशी (चौखंबा) का संस्करण। इन में क्रमशः 36 और 37 अध्याय हैं। बड़ौदा से भी गायकवाड ओरिएंटल सीरीज में 'अभिनव भारती' सहित नाट्यशास्त्र का प्रकाशन दो खंडों में (न. 36  और 38) हुआ है, पर वह अभी तक अपूर्ण है। रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल द्वारा नाट्यशास्त्र के प्रथम 27 अध्यायों का अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। उसके अनुवादक हैं- श्री एम. एन. घोष। इसके अतिरिक्त दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा 'हिंदी अभिनव भारती' नाम से नाट्यशास्त्र के प्रथम, द्वितीय तथा षष्ठ अध्यायों की हिंदी व्याख्या, मूल पाठ तथा टीका भाग सहित प्रकाशित कराई गई है| इसके व्याख्या कार हैं- आचार्य विश्वेश्वर।
                      नाट्यशास्त्र नाट्य विधानों का एक अमर विश्वकोश है। नाट्य की उत्पत्ति, नाट्यशाला, विभिन्न प्रकार के अभिनय, नाट्य संधियाँ, वृत्तियां, संगीत शास्त्रीय सिद्धांत आदि इसके प्रमुख विषय हैं। इनके अतिरिक्त छठे सातवें और अठहरावे अध्यायों में काव्य शास्त्र काव्य शास्त्रीय अंगों- गुण, दोष, अलंकार तथा छंद का भी निरूपण हुआ है। नायक-नायिका भेद का भी इस ग्रंथ में निरूपण है। स्वाधीनपतिका आदि अष्ट नायिकाओं का उल्लेख सबसे पहले इसी ग्रंथ में उपलब्ध है। ग्रंथकार रस वाद का पूर्ण समर्थक है। रस स्वरूप निर्देशक प्रसिद्ध सूत्र, तथा रस निष्पत्ति विषयक अन्य प्रचुर सामग्री भी इसी ग्रंथ में उपलब्ध है। विषय के स्पष्टीकरण के लिए इसी प्रसंग में गद्य का भी आश्रय लिया गया है।
                        नाट्यशास्त्र के प्राचीन व्याख्याकारों में निम्न नाम प्रसिद्ध है - उद्भट, लोल्लट, भट्टनायक,  भट्टतौत, शंकुक और अभिनव गुप्त। इनमें से केवल अभिनव गुप्त की ही टीका अभिनव भारती उपलब्ध है। शेष टीकाकारों का उल्लेख सर्वप्रथम इसी टीका में मिलता है। संभावना यह भी है कि इन टीकाकारों की टिकाएं स्वतंत्र ग्रंथों के रूप में कभी निर्मित ही नहीं हुई हों। केवल इनके मान्य सिद्धांत ही मौखिक रूप में प्रचलित रहे हो ऐसा माना जा सकता है।
भामह
                                भामह कश्मीर निवासी कहे जाते हैं ।इनका जीवन काल छठे शतक का मध्य काल माना गया है। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यालंकार है। इनके ग्रंथ का एक अन्य नाम भामहालंकार भी है। इस ग्रंथ में छह परिच्छेद हैं और कुल 400 श्लोक हैं|  इसमें काव्य शरीर, अलंकार, दोष, न्याय निर्णय और शब्द शुद्धि विषयों का निरूपण किया गया है।
                        भामह अलंकारवाद के समर्थक थे। इन्होंने वक्रोक्ति को सब अलंकारों का मूल माना है। काव्य का लक्षण सबसे पहले इन्होंने प्रस्तुत किया है। दस के स्थान पर तीन काव्य गुणों की स्वीकृति भी इन्होंने सबसे पहले दी है। तथा वैदर्भ और गौड़  नामक काव्य रीतियों के 'प्रदेशाभिधान' का भी उन्होंने सबसे पहले खंडन किया है। इनके ग्रंथ की महत्ता का प्रमाण इससे भी ज्ञात होता है कि उद्भट जैसे आचार्य ने भामह- विवरण नाम से इनके ग्रंथ पर भाष्य लिखा था। अर्थात इनके ग्रंथ की टीका की थी जिसका नाम भामह-विवरण है। 
                            आज यदि यह भाष्य उपलब्ध हो तो उससे भामह-सम्मत सिद्धांतों के स्पष्टीकरण में अत्यधिक सहायता मिलती। अलंकारवाद के अन्य प्रख्यात आचार्य दंडी भी इन्हीं के अधिकांश रूप में ऋणी हैं। क्योंकि उन्होंने सिद्धान्तों की स्थापना में इनके ग्रंथ से मदद ली है। इनके अतिरिक्त उद्भट ने अपने ग्रंथ काव्यालंकार सार संग्रह के निर्माण में दंडी के अतिरिक्त भामह का भी आधार ग्रहण किया है।
दंडी
दंडी सातवीं शती के आचार्य थे। इनके तीन ग्रंथ उपलब्ध हैं- काव्यादर्श, दशकुमारचरित और अवंतिसुंदरीकथा। प्रथम ग्रंथ काव्य शास्त्र विषयक है और शेष दो गद्य काव्य हैं। काव्यादर्श में तीन परिच्छेद हैं और श्लोकों की संख्या 660 है ।प्रथम परिच्छेद में काव्य लक्षण, काव्य भेद, रीति और गुण का निरूपण है। और द्वितीय परिच्छेद में अलंकारों का निरूपण किया गया है। तृतीय परिच्छेद में यमक, चित्र -बंध और प्रहेलिका के अतिरिक्त दोषों का भी निरूपण किया गया है।
                 दंडी अलंकारवाद के समर्थक थे। काव्य के विभिन्न अंगों को अलंकार में ही अंतर्निहित समझना इनका मान्य सिद्धांत था। यहां तक कि रस, भाव आदि को भी इन्होंने रसवदादि अलंकार माना है। भामह के समान इन्होंने भी वैदर्भ और गौड़ यह दो काव्य रूप माने हैं तथा इन्हें 'मार्ग' नाम दिया है। अर्थात जिसे वामन ने रीति कहा उसे इन्होंने मार्ग कहा है। गौड़ मार्ग की अपेक्षा वैदर्भ मार्ग इन्हें अधिक प्रिय था।फिर भी गौड़ मार्ग को इन्होंने सर्वथा हेय और त्याज्य नहीं कहा, हां वैदर्भ से अपेक्षाकृत हीन अवश्य माना है। अलंकारों के लक्षणों में इन पर भामह का प्रभाव है। दस गुणों और दस दोषों के स्वरूप निर्धारण में इन्होंने भरत से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहायता ली प्रतीत होती है।
काव्यादर्श अत्यंत लोकप्रिय ग्रंथ रहा है। कहा जाता है कि सिंहली और कन्नड़ भाषाओं के काव्य शास्त्रीय ग्रंथों का प्रभाव काव्दयार्श पर स्पष्ट दिखाई देता है। संस्कृत में इस ग्रंथ पर अनेक टीकाएँ रची गई। हिंदी के इस ग्रंथ के तीन अनुवाद उपलब्ध है- श्री बृजरत्न दास का, डॉक्टर रणवीर सिंह का तथा श्री रामचंद्र मिश्र का।
उद्भट
उद्भट भी कश्मीर निवासी थे और ये कश्मीरी राजा जयापीड़ के सभापंडित थे। इनका समय नौवीं शती का पूर्वार्ध  माना गया है । इनके तीन अन्य ग्रंथ है- काव्यालंकारसार संग्रह,  भामह- विवरण और कुमारसंभव। इनमें से केवल प्रथम ग्रंथ उपलब्ध है। जिसके 6 वर्गों में अलंकारों के लक्षण उदाहरण के साथ प्रस्तुत किए गए हैं। अलंकारों के स्वरूप निर्देश में प्रायः इन्होंने भामह का आश्रय लिया है। कुछ अलंकारों के उदाहरण स्वरचित कुमारसंभव काव्य से भी लिए गए हैं। 
          उद्भट अलंकारवादी आचार्य थे। दंडी के समान यह भी रस, भाव आदि को रसवदादि अलंकारों के अंतर्गत मानते थे। इन अलंकारों को सर्वप्रथम व्यवस्थित रूप देने का श्रेय उद्भट को जाता है। अनुप्रास अलंकार के अंतर्गत उपनागरिका आदि वृत्तियों के निरूपण करने की जो शैली आगे चलकर मम्मट ने चलाई उसका मूलाधार भी यही ग्रंथ काव्यालंकारसार संग्रह है। इस ग्रंथ पर दो टिकाएं उपलब्ध हैं- राजानक तिलक की उद्भट विवेक और प्रतिहारेन्दूराज की लघुवृति। उद्भव प्रणीत भामह विवरण अप्राप्य है पर आनंदवर्धन, प्रतिहारेन्दू राज, अभिनव गुप्त, रुय्यक,मम्मट, जगन्नाथ आदि ने उद्भट सम्मत जिन सिद्धांतों का उल्लेख बार-बार बड़े समादर के साथ किया है, उनका मूल स्रोत यही ग्रंथ प्रतीत होता है।
 वामन
उद्भट के समान वामन भी कश्मीरी राजा जयापीड़ के सभापंडित थे। इनका समय आठवीं ईसवी के आसपास है। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यालंकारसूत्रवृति है। काव्य शास्त्रीय ग्रंथों में यह पहला सूत्र बद्ध ग्रंथ है। सूत्रों की वृत्ति भी स्वयं वामन ने लिखी है। इस ग्रंथ में पांच अधिकरण हैं। प्रत्येक अधिकरण में कुछ अध्याय हैं और हर अध्याय में कुछ सूत्र। ग्रंथ के पांचों अधिकरणों में अध्यायों की संख्या  बारह है, और सूत्रों की संख्या तीन सौ उन्नीस। प्रथम अधिकरण में काव्य प्रयोजन आदि का उल्लेख हुआ है और उसके उपरांत रीति के तीन भेदों तथा काव्य के विभिन्न प्रकारों का निरूपण है।  अगले तीन अधिकरणों में क्रमशः दोष, गुण और अलंकारों का विवेचन है तथा अंतिम अधिकरण में शब्द शुद्धि समीक्षा है।
                            वामन रीतिवादी आचार्य थे। इन्होंने रीति को काव्य की आत्मा माना है। इनके मतानुसार गुण, रीति के आश्रित हैं। गुण काव्य के नित्य अंग हैं और अलंकार अनित्य अंग है। रस को इन्होंने 'कांति' नामक गुण से अभिहित किया है।  वामन पहले आचार्य हैं जिन्होंने वक्रोक्ति को लक्षणा का पर्याय मानते हुए इसे अर्थालंकार में स्थान दिया है। काव्यालंकार सूत्र वृत्ति के संस्कृत, अंग्रेजी और हिंदी तीनों भाषाओं में अनुवाद अथवा भाष्य प्रकाशित हो चुके हैं। हिंदी भाष्य आचार्य विश्वेश्वर ने प्रस्तुत किया है तथा इसकी सारगर्भित, गंभीर एवं विस्तृत भूमिका डॉ नगेंद्र ने लिखी है।
 रूद्रट
रूद्रट नाम से ये कश्मीरी आचार्य मालूम पड़ते हैं। इनका जीवन काल नवम शती का आरंभ माना जाता है। इनके ग्रंथ का नाम काव्यालंकार है, जिसमें सोलह अध्याय हैं और कुल सात सौ चौतीस पद्य हैं। सोलह अध्यायों में से आठ अध्यायों में अलंकारों को स्थान मिला है और शेष स्थानों में काव्य स्वरूप, काव्य भेद, रीति, दोष, रस और नायक- नायिका भेद का निरूपण है। यद्यपि रूद्रट अलंकारवादी युग के आचार्य हैं। किंतु भरत के उपरांत रस का व्यवस्थित और स्वतंत्र निरूपण इनके ग्रंथ में उपलब्ध है। नायक नायिका भेद का विस्तृत निरूपण भी सर्वप्रथम इन्होंने ही किया है। नायिका के प्रसिद्ध तीन भेद- स्वकीया, परकीया और सामान्या का उल्लेख सबसे पहले इसी ग्रंथ में मिलता है। प्रेयान रस की सर्वप्रथम चर्चा भी रूद्रट ने ही की है। तथा अलंकारों का वर्गीकरण भी सबसे पहले इन्होंने प्रस्तुत किया है। इस प्रकार रूद्रट काव्य शास्त्रीय आचार्यों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। कुछ विद्वान इन्हें अलंकारवादी मानते हैं किंतु अलंकार की अपेक्षा रस के प्रति इनका झुकाव कहीं अधिक है। वस्तुत:  रूद्रट उधर ध्वनि पूर्ववर्ती तथा इधर ध्वनि परवर्ती आचार्यों के बीच एक अनिवार्य कड़ी हैं। इनके ग्रंथ की हिंदी व्याख्या प्रकाशित  है।
आनन्दवर्धन
आनंदवर्धन कश्मीर के राजा अवंति वर्मा के सभापंडित थे। इनका जीवन काल भी नवम शती का मध्य भाग माना गया है। इनकी ख्याति ध्वन्यालोक नामक अमर ग्रंथ के कारण है। इस  ग्रंथ के दो प्रमुख भाग हैं- कारिका और वृत्ति। यद्यपि इस विषय में विद्वानों का मतभेद है कि इन दोनों भागों का कर्ता एक व्यक्ति है या दो हैं।  परन्तु अधिकतर विद्वान आनंद वर्धन को ही दोनों भागों का कर्ता मानते हैं।
इस ग्रंथ में चार उद्योत हैं और एक सौ सत्रह कारिकाएँ।  प्रथम उद्योत में तीन प्रकार के ध्वनि विरोधियों- (अभाववादी, भक्तिवादी और अलक्षणीयतावादी) का खंडन किया गया है। तथा ध्वनि का स्वरूप प्रतिपादित किया गया है। द्वितीय और तृतीय उद्योत में ध्वनि भेदों का विस्तृत निरूपण है। प्रसंगवश गुण, अलंकार, संघटना और रस विरोधी तत्व अर्थात दोषों का भी इसी उद्योत में यथेष्ट निरूपण है। अभिधा और लक्षणा के होते हुए भी ध्वनि की स्थिति क्यों आवश्यक है, इस विषय पर भी तृतीय उद्योत में प्रकाश डाला गया है, तथा गुणीभूतव्यंग्य- काव्य और चित्र -काव्य का स्वरूप भी निर्दिष्ट किया गया है ।चतुर्थ उद्योत में ध्वनि से संबद्ध प्रसंगों का पर्याप्त विवेचन है।   काव्यशास्त्रीय आचार्यों में आनंदवर्धन एक युगांतकारी आचार्य हैं। इन्होंने ध्वनि को काव्य की आत्मा माना है और गुण, रीति आदि का भी ध्वनि में ही समावेश कर दिया है। यद्यपि रस को ध्वनि का ही एक भेद इन्होंने माना है पर रस ध्वनि के प्रति अन्य ध्वनि भेदों की अपेक्षा इन्होंने अधिक समादडर प्रकट किया है। इनके रसध्वनि- सिद्धांत ने काव्य शास्त्रीय विधान को एक नई दिशा की ओर मोड़ दिया अब अलंकार बाह्य आभूषण मात्र रह गए। गुण रीति के विशिष्ट धर्म ने होकर रस के ही नित्य धर्म बन गए। रीति संघटना मात्र तथा रसोपकर्त्री बन गई। दोषों का अनौचित्य  तथा उनकी नित्यानित्य- व्यवस्था रस पर ही आआधृत हो गई। निष्कर्ष यह है कि भामह, दंडी, उद्भट और वामन के सिद्धांत इनके ध्वनि सिद्धांत के आगे न केवल बदल गए अपितु मंद पड़ गए। इनके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व ने काव्य शास्त्री आचार्यों में विभाजन रेखा खीँच कर इन्हें दो भागों में विभक्त कर दिया। पूर्व ध्वनिकालीन आचार्य और उत्तर ध्वनिकालीन आचार्य। 
इनके ग्रन्थ ध्वन्यालोक के प्रधान टीकाकार अभिनव गुप्त  हैं।टीका का नाम 'लोचन' है। ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत का अंग्रेजी अनुवाद तथा संपूर्ण ग्रंथ की हिंदी व्याख्या भी प्रकाशित हो चुकी है। इस व्याख्या के कर्ता भी आचार्य विश्वेश्वर हैं। ध्वनि के प्रयोजनों का वर्णन भी आनंद वर्धन ने किया है और इसके साथ साथ काव्य के तीन भेद किए हैं-  पहला -उत्तम अर्थात ध्वनिकाव्य,  इन्होंने ध्वनि काव्य को उत्तम माना है। दूसरा - गुणीभूतव्यंग्य काव्य और तीसरा है- चित्र काव्य अर्थात रीति, गुण और अलंकार को इसमें शामिल किया है।
अभिनव गुप्त
अभिनव गुप्त दसवीं शती के अंत और एकादश शती आरम्भ में विद्यमान थे। इनका काव्यशास्त्र के साथ-साथ दर्शनशास्त्र पर भी समान अधिकार था। यही कारण है कि ये काव्य शास्त्रीय विवेचन को अत्यंत उच्च स्तर पर ले गए।  ध्वन्यालोक पर 'लोचन' और नाट्यशास्त्र पर 'अभिनव भारती' नामक टीकाएं इनके द्वारा लिखी गई हैं। इन टिकाओं के गंभीर एवं स्वस्थ विवेचन तथा मार्मिक व्याख्यान के कारण इन्हें स्वतंत्र ग्रंथ का भी महत्व प्राप्त है, और अभिनव गुप्त को टीकाकार के स्थान पर आचार्य जैसे महान पद पर सुशोभित किया जाता है। लोचन और अभिनव भारती में स्थान स्थान पर इनके गुरुओं- भट्टेन्दुराज और भट्ट तौत  के भी सिद्धांतों का उल्लेख यह बड़े समादर के साथ किया गया है। इनके अतिरिक्त भरत के रससूत्र के अन्य व्याख्याकारों- शंकुक, लोल्लट तथा भट्ट नायक के सिद्धांतों की चर्चा भी इन टिकाओं में की गई है। इस प्रकार ये दोनों टीकाएँ  सिद्धान्तों के क्रमिक विकास को प्रतिपादित करने की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण बन गई है। अभिनव गुप्त का अभिव्यक्तिवाद, रस सिद्धांत में एक प्रौढ़ एवं व्यवस्थित वाद है। यद्यपि इस वाद का समय-समय पर खंडन किया गया है किंतु फिर भी इसका महत्त्व बना हुआ है। यहां तक कि जगन्नाथ जैसे पंडित राज ने भी इसे ज्यों का त्यों अपना लिया है। अभिनव भारती की हिंदी व्याख्या भी आचार्य विश्वेश्वर द्वारा ही की गई है । अभिनव गुप्त के द्वारा लिखे गए दर्शनशास्त्र के कतिपय ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं- ईश्वर प्रत्यभिज्ञाविमर्षिणी, तंत्रसार और परमार्थसार ।
राजशेखर
राजशेखर विदर्भ के निवासी थे और कन्नौज के प्रतिहार वंशी महेंद्र पाल और महिपाल की राजगुरु थे। इनका जीवन काल दशम सती का प्रथम  अर्ध माना गया है। काव्यशास्त्र से संबद्ध 'काव्यमीमांसा' नामक इनका एक ग्रंथ प्रसिद्ध है जो अठारह भागों या अधिकरणों में विभक्त है। परन्तु इस ग्रंथ का अभी तक कविरहस्य नामक एक ही भाग प्राप्त हो पाया है। जिसे सर्वप्रथम गा.ओ.सी. बड़ोदा ने और फिर बिहार राष्ट्रभाषा परिषद ने (हिंदी अनुवाद सहित) प्रकाशित कराया है।  इस भाग में अठारह अध्याय हैं। जिनमें काव्य स्वरूप, काव्य भेद, काकु वक्रोक्ति, रीति प्रकार, कवि भेद, आलोचक भेद, कविचर्या, राजचर्या, राजदरबारी वैभव, शब्दाहरण, अर्थहरण, कवि-समय, काल-विभाग आदि नवीन एवं पुरातन विषयों का अद्भुत और विशाल संग्रहात्मक निरूपण है। इनके अतिरिक्त स्थान-स्थान पर भौगोलिक तथ्यों का उल्लेख आचार्य की वायावर वंश से उत्पत्ति की सार्थकता घोषित करता है। साहित्यविद्यावधू और काव्य-पुरुष की यात्रा की काल्पनिक कथा में एक ही साथ काव्य के तीन अंगों- वृत्ति, रीति और प्रवृत्ति का देशपरक स्वरूप-निर्देश किया गया है। इससे राजशेखर की इतिहास- प्रवृत्ति, भूगोल-रुचि तथा साहित्यिक कल्पनाशक्ति का भी परिचय मिलता है। इस ग्रंथ के आरंभ में अनेक प्रख्यात आचार्यों के नामों का उल्लेख होना भारतीय काव्यशास्त्र की विशाल परंपरा और महान साहित्य का परिचायक है। निस्संदेह अपने प्रकार का यह संग्रह ग्रंथ एक निराला एवं अभिनव प्रयास है, जो कि अनेक दृष्टियों से अपना ऐतिहासिक महत्व रखता है। राजशेखर ने विषय-सामग्री प्रतिपादन और शैली दोनों ही दृष्टियों से परंपरा मुक्त ग्रंथ लिखे हैं। उन्होंने पहली बार नए कवियों हेतु कवि शिक्षा की बात की है। जिसको आगे चलकर रीतिकाल के आचार्य केशव  भी दोहराया है। राजशेखर के अन्य ग्रंथ हैं- बाल रामायण, बालभारत, कर्पूरमंजरी (प्राकृत) और विद्वशाल भंजिका।
धनन्जय और धनिक
कहा जाता है कि धनंजय और धनिक दोनों भाई थे। वे दसवीं शती के अंत में विद्यमान थे। धनंजय का ग्रंथ दशरूपक है। और धनिक ने उस पर 'अवलोक' नामक टीका लिखी है जो विद्वतापूर्ण और सारगर्भित है। दशरूपक नाट्य शास्त्र से संबंधित ग्रंथ है, इसमें चार प्रकाश  और  लगभग तीन कारिकाएँ हैं। प्रथम प्रकाश में संधि आदि नाटकीय अंगों का निरूपण है, और द्वितीय प्रकाश में नायक-नायिका भेद का निरूपण हुआ है। तृतीय प्रकाश में दृश्य काव्य का सांगोपांग निरूपण है, और अंतिम प्रकाश में रस-विवेचन है। रस निष्पत्ति के विषय में इन्होंने व्यंजनावाद को अस्वीकृत कर तात्पर्यवाद का समर्थन किया है। (व्यंजना शब्दशक्ति का एक नाम तात्पर्य भी माना गया है।)  साधारणीकरण के प्रसंग में इन्होंने सर्वप्रथम कवितत्त्व का समर्थ शब्दों में निर्देश किया है। शांत रस को यह काव्य में तो ग्राह्य मानते हैं पर नाटक में नहीं। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र नाटक संबंधी विशाल ग्रंथ था, उसके बाद कई शताब्दी के बाद तक केवल काव्य शास्त्रीय ग्रंथों का भी अविरत सर्जन होता रहा। इन दोनों कारणों से पाठक नाट्य विधानों से अपरिचित सा होता जा रहा था। धनंजय ने अपने इस लघु किंतु सारगर्भित ग्रंथ द्वारा साहित्य मर्मज्ञ को नाट्य शास्त्रीय विधान की ओर आकृष्ट किया। परिणाम स्वरूप सागर-नंदी और रामचंद्र गुणचंद्र जैसे आचार्यों ने नाट्य शास्त्र संबंधी ग्रंथ लिखे तथा विश्वनाथ जैसे आचार्यों ने अपने सकल  काव्यांग निरूपक ग्रंथ में नाटक विधान से भी संबद्ध एक परिच्छेद सम्मिलित कर दिया। इस ग्रंथ की संस्कृत में कई टीकाएँ है इधर हिंदी में भी दो टीकाएँ उपलब्ध है - एक गोविंद त्रिगुणायत द्वारा प्रणीत और दूसरी डॉ भोला शंकर व्यास द्वारा प्रणीत।
कुन्तक
कुन्तक का समय दशम शती का अंत तथा एकादश शती का आरंभ माना जाता है। इनकी प्रसिद्धि 'वक्रोक्ति जीवितम' नामक ग्रंथ के कारण है। इसमें चार उन्मेष हैं। प्रथम उन्मेष में काव्य का प्रयोजन तथा वक्रोक्ति का स्वरूप और उसके छः भेद निर्दिष्ट किए गए हैं। द्वितीय उन्मेष में वक्रोक्ति के प्रथम तीन भेदों-  वर्ण विन्यास वक्रता, पदपूर्वार्ध वक्रता तथा प्रत्ययवक्रता का वर्णन है। तृतीय उन्मेष में वाक्य वक्रता का विस्तृत निरूपण है तथा अंतिम उन्मेष में दो भेदों-  प्रकरण वक्रता और प्रबंध वक्रता का विवरण है।
    कुंतक प्रतिभा संपन्न आचार्य थे । इन्होंने वक्रोक्ति को काव्य का जीवित माना इसके उक्त छह भेदों में इसके काव्य के सभी अंगों को अंतर्भूत किया। कुंतक की मौलिकता स्तुत्य है। उन्होंने सर्वप्रथम अलंकारों की वर्तमान संख्या को स्थिर करने का मार्ग दिखाया। स्वभावोक्ति अलंकार के संबंध में इन की धारणा साहस पूर्ण है और रसवदादि अलंकारों का विवेचन नितांत मौलिक है। वैदर्भा आदि मार्गों के प्रदेशाभिधानवाद का इन्होंने प्रबल शब्दों में खंडन किया है। तथा परंपरा से हटकर इन्होंने नवीन गुणों का उल्लेख किया है।
उपलब्ध प्रतियों में ग्रंथ के प्रथम दो उन्मेष तो पूर्ण हैं परंतु अंतिम दो खंडित है। इस ग्रंथ का आचार्य विश्वेशर प्रणीत हिंदी भाष्य भी उपलब्ध है । इसके मूल पाठ में अधिकतर खंडित पाठ को आचार्य जी ने अपने विचार अनुसार जोड़ दिया है तथा कहीं-कहीं शुद्ध भी किया है। इसकी गंभीर एवं मार्मिक भूमिका डॉ नगेंद्र ने लिखी है। इन्होंने विचित्र उक्ति को वक्रोक्ति मानना है जो प्रमाता को एक लोकोत्तर  आनंद प्रदान करती है। उन्होंने वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा या प्राण सिद्ध किया है। कुंतक ने जिस तरह से वक्रोक्ति को रखा है उससे वक्रोक्ति का महत्व बढ़ जाता है।
महिम भट्ट
महिम भट्ट कश्मीर निवासी प्रतीत होते हैं। इनका समय 11वीं शती का प्रथम चरण है। इनकी रचना का नाम व्यक्तिविवेक है ।जिसका शाब्दिक अर्थ है व्यक्ति अर्थात व्यंजना का विवेक। ग्रंथ में तीन विमर्श हैं। महिम भट्ट अनुमानवादी आचार्य थे। किंतु इन्होंने इस ग्रंथ का नाम अनुमानवाद से संबंधित न करके व्यक्ति या व्यंजना से किया है। पर आज का समालोचक एवं मनोवैज्ञानिक इसे हीन भावना की प्रतिक्रिया कहेगा।
        इस ग्रंथ के प्रथम और तृतीय विमर्श में इन्होंने आनंदवर्धन सम्मत ध्वनिसिद्धांत को अनुमान में अंतरभूत करके अपने विलक्षण पांडित्य का परिचय दिया है। पर महिम भट्ट के अनुमानवाद का अनुसरण नहीं हुआ। यहां तक कि इस ग्रंथ के ही टीकाकार रुय्यक ने, जो ध्वनिवाद के समर्थक थे, इस वाद का खंडन तथा उपहास किया है। द्वितीय विमर्श का संबंध दोष से है, जिसे उन्होंने अनौचित्य नाम दिया है। मम्मट ने जिन दोषों को अपने ग्रंथ में निरूपित किया है। उनमें से पांच दोषों के लिए वे महिम भट्ट के ऋणी हैं। यह ग्रंथ गंभीर गद्य शैली में लिखित होने के कारण  अधिकांशतः जटिल है।
क्षेमेद्र
 क्षेमेद्र भी कश्मीर निवासी थे। वह 11वीं शती के उत्तरार्द्ध में विद्यमान थे। इनके तीन ग्रंथ प्रसिद्ध हैं- औचित्यविचारचर्या, सुवृत्ततिलक और कविकंठाभरण। प्रथम ग्रंथ में औचित्य को लक्ष्य में रखकर इन्होंने वाणी के विभिन्न अंगों- वाक्य, गुण, क्रिया, करण, लिंग, उपसर्ग, देश, स्वभाव आदि का स्वरूप निर्धारित किया है। द्वितीय ग्रंथ में छंद के औचित्य का निर्देश है। तीसरा ग्रंथ कवि शिक्षा से संबद्ध है। इस ग्रंथ की पाँच संधियों में क्रमशः कवित्व प्राप्ति के उपाय, कवियों के भेद, काव्य के गुण तथा दोष का विवेचन है। क्षेमेन्द्र के ग्रंथ लघु काय हैं। पर इनमें काव्य के बहुविध अंगों पर प्रकाश डाला गया है। यद्यपि औचित्य कोई नया तत्व नहीं है। आनंद वर्धन औचित्य शब्द को और महेश भट्ट अनौचित्य शब्द को अपने दोष प्रकरणों में स्थान  पहले ही दे आए थे। पर इसी के आधार पर समस्त वाङ्ग्मय को निर्धारित कर देना क्षेमेन्द्र की मौलिक प्रतिभा का परिचायक है । विद्वानों ने औचित्य को भी काव्यशास्त्र का एक सिद्धांत माना है।
भोजराज
भोजराज धारा के नरेश थे। इनका जीवन काल 11वीं शती का प्रथमार्द्ध है। भोज कवियों के आश्रयदाता होने के अतिरिक्त स्वयं भी प्रगाढ़, आलोचक एवं काव्यशास्त्री थे। काव्यशास्त्र से संबद्ध इनके दो ग्रंथ उपलब्ध है- सरस्वतीकंठाभरण और श्रंगार प्रकाश। यह दोनों ग्रंथ विशालकाय हैं। प्रथम ग्रंथ में पांच परिच्छेद हैं। इनमें दोष, गुण, अलंकार और रस का विशद और संग्रहआत्मक विवेचन है। स्थान-स्थान पर प्राचीन आचार्यों के उद्धरण से यह ग्रंथ भरा पड़ा है। शृंगार प्रकाश में 36 प्रकाश हैं। प्रथम 8 प्रकाशों में व्याकरण संबंधी सिद्धांतों का प्रतिपादन है। अगले 4 प्रकाशों में गुण, दोष, महाकाव्य और नाटक का विवेचन है तथा अंतिम 24 प्रकाशों में रस का सांगोपांग विशद निरूपण है। भोज का प्रमुख सिद्धांत है- केवल शृंगार रस की मान्यता तथा इसी में अन्य रसों का अंतर्भाव। शृंगार के विषय में भोज की धारणा परंपरागत श्रंगार रस से नितांत भिन्न है। श्रंगार प्रकाश अभी तक अप्रकाशित है पर डॉ राघवन के अंग्रेजी भाषा में लिखित प्रबंधओजस शृंगार प्रकाश से इस ग्रंथ का सम्यक परिचय मिल जाता है। इस प्रबंध के  प्रथम दो भाग प्रकाशित हो चुके हैं तथा शेष दो अभी प्रकाशित नहीं हुए हैं। भोजराज के उपर्युक्त दोनों ग्रंथों को काव्य शास्त्रीय विश्वकोश कहना चाहिए। सरस्वती कंठाभरण पद्य ग्रंथ है और इसकी शैली सरल सुबोध है किंतु  शृंगार  प्रकाश गंभीर और प्रौढ़ शैली में लिखा गया गद्य-पद्यबद्ध ग्रंथ है। इन दो विभिन्न शैलियों को देखकर सहज अनुमान होता है कि इन ग्रंथों के कर्ता कदाचित भिन्न-भिन्न व्यक्ति हैं, और यह अनुमान भोजराज जैसे आश्रयदाता के विषय में ठीक भी हो सकता है। संभव है कि दो विभिन्न आचार्यों ने यह ग्रंथ लिखकर भोजराज के नाम पर समर्पित कर दिए हो। किंतु फिर भी निश्चय पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। हिंदी में भोज के इन दोनों ग्रंथों की हिंदी व्याख्या अत्यंत अपेक्षित है।
मम्मट
मम्मट भी कश्मीर के निवासी माने जाते हैं। इनका जीवन काल भी 11वीं शती का उत्तरार्ध है। इन्होंने कोई नई स्थापना तो नहीं की थी परंतु इन्होंने जो पहले से स्थापित था उसका विवेचन करते हुए उसमें से ध्वनि को स्वीकार किया है। इनकी ख्याति काव्यप्रकाश ग्रंथ के कारण है ।जिसमें दश उल्लास हैं। प्रथम उल्लास में काव्य लक्षण ,काव्य प्रयोजन, काव्य हेतु तथा काव्य भेदों की चर्चा है अगले दो उल्लास में शब्द शक्ति का विवेचन है। चतुर्थ उल्लास में ध्वनि भेदों का तथा उनके अंतर्गत रस भावादि का गंभीर विवेचन है। पंचम उल्लास में गुणी भूत व्यंग्य काव्य के भेदों के स्वरूप निर्देश के उपरांत ध्वनि की स्थापना की गई है। छठे उल्लास में चित्र काव्य का संक्षिप्त परिचय है तथा अंतिम चार उल्लासों में क्रमशः दोष, गुण शब्दालंकार तथा अर्थालंकार का निरूपण है। अनुप्रास नामक शब्दालंकार के अंतर्गत वृत्तियों अथवा रीतियों की भी चर्चा इन्होंने की है। इन्होंने काव्य हेतु, भेद शब्द शक्ति, प्रयोजन आदि पर भी बात की है। इस प्रकार उनका यह ग्रंथ सर्वांगपूर्ण बन गया है।
काव्यशास्त्र के आचार्यों में मम्मट का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इनके निरूपण की प्रमुख विशेषता है कि अपने समय तक की काव्यशास्त्रीय सभी विषय सामग्री का स्वच्छ एवं उपादेय संकलन तथा उसका ध्वनि-संप्रदाय की दृष्टि से व्यवस्थापूर्ण संपादन। यह ग्रंथ इतना सुव्यवस्थित और सुसंबद्ध है कि अद्यावधि इसके अध्ययन के बिना काव्य शास्त्र का ज्ञान अपूर्ण समझा जाता है। मम्मट ने ध्वनि संप्रदाय की पुष्टि करने के लिए अनुमानवादी, अभिधावादी, लक्षणावादी आदि आचार्यों का प्रबल तर्कों द्वारा खंडन प्रस्तुत कर ध्वनि की स्थापना की है। अभिनव गुप्त की 'अभिनव भारती' अथवा अथवा अन्य स्रोतों से भरत सूत्र के 4 व्याख्याताओं भट्ट लोलक आदि के व्याख्यान को इन्होंने अत्यंत संक्षिप्त किंतु सारगर्भित एवं सुसंबद्ध शैली में इतनी परिपूर्णता से प्रस्तुत किया है कि काव्यशास्त्र के विद्यार्थी को मूल स्रोत के अध्ययन की विशेष आवश्यकता नहीं रहती। इससे एक हानि भी हुई। मूल स्रोत धीरे-धीरे लुप्त हो गए। पर हां इससे मम्मट की प्रतिष्ठा में क्षति होने के स्थान पर वृद्धि ही हुई है।
            काव्यप्रकाश की एक अन्य विशेषता है- तीन गुणों की स्वीकृति और उसमें वामन सम्मत बीस गुणों का समाहार, दोष निरूपण का विस्तार इस ग्रंथ की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता है। ध्वनि संप्रदाय के समर्थक होने के नाते इन्होंने आनंदवर्धन के समान अन्य काव्यांगों का स्वरूप, रस-ध्वनि के आधार पर स्थिर किया है। मम्मट की इन विशेषताओं का प्रभाव आगामी आचार्यों पर भी पड़ा। विश्वनाथ जैसे आचार्य ने, जिसने मम्मट के काव्य लक्षण का बुरी तरह से खंडन किया है, अपने ग्रंथ के निर्माण के लिए कुछ एक स्थलों को छोड़कर प्रायः शेष सामग्री काव्यप्रकाश से ही लेकर उसे पद्य बद्ध कर दिया है। इधर हिंदी के रीतिकालीन सर्वांगनिरूपक आचार्यों को भी साक्षात अथवा असाक्षात रुप से काव्यप्रकाश की शरण लिए बिना अन्य मार्ग नहीं सूझा। इस ग्रंथ की ख्याति और उपादेयता का परिचय इससे भी मिलता है कि संस्कृत में इस पर सत्तर  से अधिक टीकाएँ रची गई हैं। जिनमें से मौलिकता की दृष्टि से गोविंद ठाकुर की काव्यप्रदीप टीका सर्वश्रेष्ठ है। और संकलन की दृष्टि से भट्ट वामन की बालबोधिनी। हिंदी में भी कई टीकाएं उपलब्ध हैं।
रुय्यक
रुय्यक  कश्मीर निवासी थे। इनका समय 12वीं शती का मध्यकाल है। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ अलंकारसर्वस्व है। इन्होंने व्यक्तिविवेक ग्रंथ पर भी टीका लिखी थी। पर इसमें उन्होंने महिम भट्ट के अनुमानवाद को अमान्य ठहराया है। तथा एक स्थान पर उसका उपहास भी किया है। अलंकारसर्वस्व ग्रन्थ अलंकारों का प्रौढ़ एवं प्रामाणिक ग्रंथ है। इसमें दो नवीन अलंकारों विकल्प और विचित्र का समावेश किया गया है। अलंकारों की शब्दगतता अथवा अर्थगतता का आधार मम्मट ने अन्वयव्यतिरेक- संबंध को माना था। किंतु रुय्यक ने 'आश्रयाश्रयिभाव' को माना है। रुय्यक के ग्रंथ की एक अन्य विशेषता यह है कि इसके आरंभ में पूर्ववृत्ति आचार्यों के विभिन्न सिद्धांतों के संबंध में सारगर्भित, मार्मिक और तुलनात्मक समीक्षण का समावेश भी है। यह समीक्षण जितनी संक्षिप्त है उतना ही महत्वपूर्ण और सुसंबद्ध है। इनका ग्रंथ अलंकार विषयक है, किंतु इसी आधार पर इन्हें भामह आदि के समान अलंकारवादी नहीं कहना चाहिए। ये अलंकार निरूपक तो हैं पर इन्हें अलंकारवादी किसी रूप में नहीं कहना चाहिए।
विश्वनाथ
 विश्वनाथ कदाचित उड़ीसा के निवासी थे। इनका समय चौदवीं शती का पूर्वार्ध है। यह रसवादी आचार्य माने गए हैं। इनकी ख्याति साहित्य दर्पण नामक ग्रंथ के कारण हुई है। इसमें 10  परिच्छेद है। प्रथम परिच्छेद में काव्य स्वरूप, काव्य भेद आदि का निरूपण है। द्वितीय में शब्द शक्ति का, तृतीय में रस और नायक नायिका भेद का, चतुर्थ परिच्छेद में ध्वनि तथा गुणीभूत व्यंग्य के प्रकारों का विवेचन है। पंचम परिच्छेद में व्यंजन आवृत्ति की स्थापना की गई है। षष्ठ में दृश्य काव्य का सांगोपांग निरूपण है। अंतिम चार परिच्छेदों में क्रमशः दोष गुण, रीति  और अलंकार का निरूपण है।  विश्वनाथ ने मम्मट, आनंद वर्धन, कुंतक, भोजराज आदि के काव्य लक्षणों का खंडन प्रस्तुत करने के उपरांत रस को काव्य की आत्मा घोषित करते हुए काव्य का लक्षण निर्धारित किया है। सबसे घोर खंडन मम्मट के काव्य लक्षण का किया गया है। किंतु फिर भी अपने ग्रंथ की अधिकांश सामग्री के लिए वे मम्मट की ऋणी है। आश्चर्य तो यह है कि रस को काव्य की आत्मा मानते हुए भी इन्होंने आनंद वर्धन तथा मम्मट के समान रस को ध्वनि के एक भेद- 'असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य' ध्वनि का अपर अर्थात दूसरा नाम माना है। अलंकारों के स्वरूप निर्देशन के लिए इन्होंने मम्मट के अतिरिक्त रुय्यक से भी सहायता ली है। साहित्य दर्पण अत्यंत लोकप्रिय ग्रंथ रहा है। इसका एक ही कारण है काव्यप्रकाश की सूत्रबद्ध और समास-प्रधान शैली की तुलना में सुबोध शैली में प्रायः  पद्यबद्ध-सिद्धांत प्रतिपादन।
इसी विशेषता के द्वारा विश्वनाथ ने अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है। पर मौलिक प्रतिभा और आचार्यत्व की दृष्टि से इनकी देन अधिक नहीं है। मम्मट और विशेषत: आनंद वर्धन एवं कुंतक के काव्य लक्षणों के खंडन में इतना सार नहीं है, जितना दुराग्रह अथवा पूर्वाग्रह है। वस्तुतः वे खंडन केवल खंडन के लिए ही हैं। इनके ग्रंथ की उल्लेखनीय विशेषता है- नायक-नायिका भेद तथा दृश्य काव्य के भेद और उपभेदों का समावेश। इन प्रसंगों के लिए वे धनंजय के ऋणी हैं, पर यहां भी सुबोध शैली इनकी अपनी है। साहित्य दर्पण पर जीवानंद शास्त्री की संस्कृत टीका तथा शालग्राम शास्त्री की विमला नामक हिंदी-टीका अति प्रख्यात है। इन की हिंदी व्याख्या डॉ सत्यव्रत सिंह ने भी प्रस्तुत की है। विश्वनाथ का दूसरा ग्रंथ है- काव्यप्रकाश दर्पण, जिसमें काव्यप्रकाश पर टीका लिखी गई है, पर यह उपलब्ध नहीं है।
  जगन्नाथ
जगन्नाथ का यौवन काल दिल्ली के प्रसिद्ध शासक शाहजहां के दरबार में बीता था। यह सत्रवीं शती के मध्य भाग के आचार्य थे और ध्वनिवादी आचार्य थे। शाहजहां ने ही इन्हें पंडित राज की उपाधि से विभूषित किया था। अतः ये पंडित राज जगन्नाथ के नाम से प्रसिद्ध हैं। किन की प्रसिद्ध रचना 'रसगंगाधर' है जो अपूर्ण है। इसमें दो आनंन हैं। प्रथम आनंन में काव्य लक्षण, काव्य हेतु तथा काव्य भेदों के निरूपण के पश्चात रस, रस दोष तथा गुण आदि का सांगोपांग विशद विवेचन है। दूसरे आनंन में ध्वनि के विभिन्न भेदों उपभेदों के विवेचन के उपरांत अभिधा तथा लक्षणा का विवेचन है। इसके बाद अलंकार निरूपण प्रारंभ हो जाता है। सत्तर अलंकारों के निरूपण के पश्चात ग्रंथ का अगला भाग उपलब्ध नहीं है। अधिक संभावना यही है कि इसके आगे ग्रंथ लिखा ही नहीं गया हो।
      जगन्नाथ का काव्य लक्षण अधिकांशत है परिपूर्ण तथा सुबोध है। इन्होंने काव्य के चार भेद माने हैं- उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम तथा अधम। वैसे ये ध्वनिवादी आचार्य थे परंतु फिर भी रस के प्रति इन्होंने अधिकतम आदर प्रकट किया है। भरत सूत्र पर उपलब्ध ग्यारह व्याख्याओं का विशुद्ध संकलन भी इसी ग्रंथ में किया गया है। गुण को रस के अतिरिक्त शब्द, अर्थ और रचना का भी धर्म इन्होंने सर्वप्रथम समान रूप से स्वीकार किया है। जगन्नाथ की समर्थ भाषा शैली, सिद्धांत प्रतिपादन की अद्भुत एवं परिपक्व विचार-शक्ति, और खंडन करने की विलक्षण प्रतिभा इन्हें प्रौढ़ एवं सिद्ध आचार्य मानने को बाध्य करती है। भाषा की कठिनता के कारण विद्वानों की ज्ञान परीक्षा के लिए रसगंगाधर ग्रंथ भले ही एक निकष रहा हो, पर साधारण पाठक इसे नहीं अपना सके। किंतु इससे पंडितराज के गंभीर पांडित्य की कोई क्षति नहीं होती। इस ग्रंथ की दो हिंदी व्याख्याएं उपलब्ध हैं- एक पुरुषोत्तम शर्मा चतुर्वेदी द्वारा प्रणीत और दूसरी पंडित मदन मोहन झा के द्वारा प्रणीत। रसगंगाधर के अतिरिक्त काव्यशास्त्र से संबद्ध इनका एक अन्य ग्रंथ भी उपलब्ध है- चित्रमीमांसा-खंडन। इसमें अप्पयदीक्षित के अलंकार-विषयक चित्रमीमांसा ग्रंथ की कटु शैली में, किंतु यथार्थ आलोचना प्रस्तुत की गई है।

नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...