हिंदसा

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

द्विवेदी युग

        द्विवेदी युग के काव्य और  उसकी विशेषताएं
भारतेंदु युग आधुनिक काल के साहित्य का प्रवेश द्वार है और द्विवेदी युग हिंदी साहित्य के विकास का मार्ग है। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस युग के प्रमुख साहित्यकार हैं। इस युग में जो नई चेतना जागृत हुई उसका श्रेय महावीरप्रसाद द्विवेदी को जाता है।  द्विवेदी जी ने निबंध, कविता, आलोचना के क्षेत्र में साहित्यकारों का मार्गदर्शन किया। भाषा की दृष्टि से भी इस युग में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। इसका श्रेय भी महावीरप्रसादद्विवेदी को ही जाता है। अब काव्य खड़ी बोली में लिखा जाने लगा । इस प्रकार कविता, निबंध, आलोचना, नाटक, कहानी, उपन्यास आदि सभी विधाओं में खड़ी बोली का प्रयोग किया जाने लगा। भाव, भाषण और विषय की दृष्टि से इस युग के साहित्य में विविधता दिखाई देती है । इसकी प्रमुख काव्य प्रवृत्तियां इस प्रकार है - राष्ट्रीय भावना, आदर्शवादिता, इतिवृत्तात्मकता,  सामाजिक सुधार का प्रयत्न, धार्मिक रूढ़ियों का विरोध तथा धर्म के प्रति नए विचार उत्पन्न करना, प्रकृति चित्रण, स्वच्छंदता, भाषा सुधार, काव्य के विविध रूप आदि।
राष्ट्रीय भावना
भारतेंदुकालीन साहित्य में जो राष्ट्रीय भाव धारा उत्पन्न हुई थी वह द्विवेदी युग में और अधिक प्रवाहित होने लगी। भारतेंदु युग के कवियों की राष्ट्रीय भावना वेशभूषा और भोजन तक सीमित थी, उसमें निराशा का भाव अधिक था। लेकिन द्विवेदी युग के कवियों की राष्ट्रीय भावना और देश प्रेम को भारत के अतीत गौरव से अधिक बल मिला। इन कवियों के विचार में भारतीय संस्कृति महान है। उन्होंने भारत के अतीत  को गौरव मानकर देश प्रेम की भावना को जागृत किया। जातीय आदर्शों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय आदर्शों को ग्रहण कर भारत की अखंडता और उसकी स्वतंत्रता को पाने और सुरक्षित रखने के लिए इन कवियों ने भारत की जनता में अपने काव्य के द्वारा साहस और उत्साह का संचार किया। इस युग के कवियों में गिरधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, गोपाल शरण सिंह, मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय, सियारामशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी आदि शामिल हैं। इस युग के प्रायः सभी कवियों ने मातृभूमि के प्रति हृदय का सच्चा प्रेम प्रकट किया। इन्होंने देश की वर्तमान दुर्दशा तथा स्वर्णिम अतीत को अपने काव्य में चित्रित करके देश की उन्नति के प्रति अपना दृढ़ विश्वास प्रकट किया।
आदर्शवादिता
द्विवेदी युग का साहित्य प्राचीन आदर्शों से युक्त है। सुधार और आदर्श की भावना के कारण ही इस युग के कवियों ने श्रंगार भावना को भी संयम के साथ चित्रित किया है। ये कवि सौंदर्य को अधिक महत्व नहीं देते। इनका उद्देश्य तो समाज का उत्थान करना ही है। इन्होंने सत्यम शिवम सुंदरम में से सत्यम और शिवम को अधिक महत्व दिया। यह काव्य नैतिक उत्थान का संदेश देता है और इसलिए कहीं कहीं इस काल का काव्य नीरस तथा शुष्क प्रतीत होता है।
इतिवृत्तात्मकता
आदर्श की स्थापना को लक्ष्य बनाने वाले इन कवियों में काव्य में इतिवृत्तात्मक शैली के दर्शन होते हैं। यह काव्य वर्णन प्रधान है। यह शैली नैतिकता और आदर्श की प्रतिष्ठा के लिए अत्यंत उपयुक्त भी है। इस काल में अनेक पौराणिक कथाओं को लेकर काव्य की रचना की गई। इसलिए इतिवृत्तात्मक शैली को इस युग में प्रधानता मिली। इस काव्य में कल्पना और अनुभूति की गहराई कम है। इस काल की रचनाओं में रचनात्मकता तथा कोमल कांत पदावली का अभाव है जिसके परिणाम स्वरूप छायावादी काव्य का जन्म हुआ।
सामाजिक सुधार का प्रयत्न
संत कवियों के समान भारतेंदु व द्विवेदी काल के कवियों ने भी समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए अपनी रचनाएं लिखी। अनमेल विवाह, बाल विवाह, विधवा विवाह, दहेज प्रथा, अंधविश्वास, धार्मिक रूढ़ियाँ  आदि का इन कवियों ने काव्य के माध्यम से विरोध भी किया है। इन कवियों ने समाज की सर्वांग उन्नति को लक्ष्य बनाकर अपने विचार प्रकट किए। धार्मिक रूढ़ियों का विरोध
 द्विवेदी युग के कवियों की धार्मिक चेतना भी पर्याप्त उदार और व्यापक है। इन्होंने केवल ईश्वर का गुणगान ही नहीं किया बल्कि अपने आराध्य राम व कृष्ण में मानवता के आदर्शों की प्रतिष्ठा भी की। विश्व प्रेम तथा जनसेवा इस युग की धार्मिक भावना का मुख्य अंग है। गोपाल शरण सिंह नेपाली कहते हैं-           जग की सेवा करना ही बस है सब सारों का सार
        विश्व प्रेम के बंधन ही में मुझको मिला मुक्ति का द्वार
प्रकृति चित्रण
द्विवेदी युग के कवियों ने  अपने काव्य में प्रकृति चित्रण भी किया है। इनकी रचनाओं में प्रकृति को आलंबन, मानवीकरण तथा उद्दीपन आदि रूप में चित्रित किया गया है। श्रीधर पाठक कश्मीर के प्रकृति सौंदर्य का चित्रण करते हुए कहते हैं
  प्रकृति जहां एकांत बैठी बिन रूप संवारती,
   पल-पल पलटती भेष क्षणिक छवि दिन-दिन धारती।
श्री रामनरेश त्रिपाठी के पथिक और स्वप्न तथा हरिऔध के प्रियप्रवास में तथा मैथिलीशरण गुप्त के साकेत व पंचवटी में भी  प्रकृति के विविध चित्र अंकित किए गए हैं।
स्वच्छंदतावाद
प्राचीन रूढ़ियों को तोड़कर नई शैली में, नए काव्य विषय को साथ लेकर जो साहित्य रचना की गई उसे स्वच्छंदतावाद कहा जा सकता है। यद्यपि छायावादी युग में स्वच्छंदतावाद का पूर्ण स्वरूप दिखाई देता है। फिर भी इस युग के श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी में स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। भाषा सुधार
खड़ी बोली को काव्य भाषा के रूप में स्वीकार किए जाने के बाद द्विवेदी युग के कवियों ने खड़ी बोली में सुधार और परिष्कार करके उसे काव्य के योग्य बनाया। द्विवेदी जी ने सरस्वती नामक पत्रिका का संपादन करके अपने समय के कवियों का ध्यान भाषा की व्याकरण की ओर खींचा। द्विवेदी जी के अथक प्रयासों से काव्य भाषा में सजीवता उत्पन्न हुई तथा सरसता, मधुरता और प्रौढ़ता लाने का पूरा प्रयत्न किया गया। मैथिलीशरण गुप्त ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है।
काव्य के विविध रूप
इस युग में प्रबंध और मुक्तक दोनों ही प्रकार के काव्य लिखे गए । लेकिन प्रबंध काव्य की रचनाओं में इन कवियों को अधिक सफलता मिली। प्रियप्रवास, वैदेही वनवास, साकेत, रामचरित चिंतामणि इस काल के प्रसिद्ध महाकाव्य हैं। तथा जयद्रथ वध, पंचवटी, पथिक, स्वप्न आदि खंडकाव्य भी इसी काल में लिखे गए। मुक्तक रचनाएं भी लिखी गई। उपरोक्त सभी विशेषताओं के कारण द्विवेदी युग का आधुनिक हिंदी साहित्य में अपना विशेष महत्व है। कवियों ने इस युग के काव्य में आदर्शवाद की स्थापना करके एक महान कार्य किया है।

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

घनानंद की कविता का प्रतिपाद्य

                   घनानंद की कविता का प्रतिपाद्य
 घनानंद रीतिकाल की रीति मुक्त काव्य धारा के स्वच्छंद प्रेम के कवि हैं। उनके कविता में भावों की विविधता है और  उन सभी भावों में श्रृंगार और प्रेम ही सर्वत्र समाया हुआ है। आलोचकों का मानना है कि रीतिकाल यदि श्रृंगार काल है तो घनानंद उस श्रृंगार के तिलक हैं ।  घनानंद अपने काव्य में प्रेम की वियोग जन्य  पीड़ा का वर्णन करते हैं । वे अपने को प्रेम में चातक पक्षी  की तरह तरसता हुआ महसूस करते हैं। उनकी यह पीड़ा कविता में मार्मिक रूप में  व्यक्त हुई है। घनानंद का कहना है कि बादल तो बरसात में ही बरसते हैं लेकिन उनकी आंखें प्रेमी के वियोग में नित्य ही बरसती रहती हैं । वे अपने प्रेम के सामने मछली के प्रेम को भी कुछ नहीं समझते क्योंकि मछली अपने प्रिय 'पानी' के वियोग में प्राण त्याग देती है, इससे उसका प्रेमी कलंकित होता है । .. वे अपनी प्रेमिका को समझाते हुए कहते हैं कि प्रेम का मार्ग बड़ा सीधा है, इसमें चालाकी नहीं चलती। घनानंद कहते हैं कि यह तुम्हारा कौन-सा प्रेम का व्यवहार है कि लेते तो मन भर हो और देते छटांक भर भी नहीं, यानी इतने बड़े प्रेम का कोई प्रत्युत्तर नहीं देते। घनानंद के लिए प्रेम-प्रसंग बहुत अधिक सुख देने वाला होता है उससे उसकी आत्मा और शरीर के कष्ट दूर हो जाते हैं । सुजान का रूप अति  सुंदर है। उसका मुख, उसकी तरुणाई, उसका अंग सौंदर्य, वस्त्र आभूषण सब आनंद देने वाले हैं। उसकी छवि चकित कर देने वाली है। सुजान के रूप का प्रभाव ऐसा है कि कवि को नींद भी नहीं आती। हृदय में प्रेम की पीड़ा समाई हुई है। घनानंद को उसके चंद्र मुख को देखे बिना सिर से पैर तक मानो विष व्याप्त हुआ लगता है। घनानंद के विरह वर्णन के विषय में डॉ. रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं- "वह तो घनानंद की पूंजी ठहरा, विरह के जो स्वर उनके हृदय से निकले हैं, वे रीतिकाल तो क्या, सूर की कविता में भी दुर्बलता से मिलते हैं। रीतिकाल की बौद्धिक विरहानुभूति की  निष्प्राणता और कुंठा के वातावरण में घनानंद की पीड़ा की टीस सहसा ही हृदय को चीर देती है और मन सहज ही यह मान लेता है कि दूसरों पर किराए के आंसू बहाने वालों के बीच यह एक ऐसा कवि है जो सचमुच अपनी ही पीड़ा से रो रहा है।" घनानंद का वियोग व्यक्तिगत है। सुजान के साथ न चलने पर जब शाही दरबार का गौरवपूर्ण पद त्याग कर घनानंद चले होंगे तब उनका हृदय वियोग वेदना से कराह उठा होगा।  उल्लेखनीय बात यह है कि घनानंद ने एक ही छंद में, एक ही साथ, अनेक भाग प्रस्तुत किए हैं , उन्होंने प्रिय की कठोरता और उदासीनता के उपरांत भी प्रिय को शुभकामना ही दी है।  इसका तात्पर्य यही है कि घनानंद एक सच्चे प्रेमी थे। उन्होंने प्रेम का भव्य, आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। प्रेम घनानंद की बड़ी ही मूल्यवान पूंजी है जिसकी ताकत पीड़ा  है। लेकिन इसकी विशेषता यह है कि इसमें भी आनंद है।
 घनानंद ने अपने काव्य में  ब्रज भाषा का प्रयोग किया है। ब्रज भाषा में तो उनकी गहरी पैठ थी। उन्होंने भाषा का साहित्यिक रूप प्रस्तुत करते हुए भी ठेठ ब्रज के लोक प्रचलित स्वरूप का ही प्रयोग किया है। साथ ही उनकी भाषा में संस्कृत, फारसी आदि भाषाओं के शब्द तत्सम रूप में बहुत कम आए हैं, और जो आए हैं वह उनकी भाषा शैली के सांचे में ढले हुए मिलते हैं। बृज भाषा के संदर्भ में घनानंद के कवित्त, सवैया तथा पद छंदों का लालित्य देखते ही बनता है। घनानंद की भाषा की प्रमुख विशेषता है कि उन्होंने कोमल कांत पदावली का प्रयोग किया है। वे अपनी कविता में भाषा को भावों के अनुकूल मोड़ देने का प्रयास करते हैं। घनानंद वर्णों की योजना करते समय कभी वर्ण संगति और कभी संगीत को महत्व देते हैं, क्योंकि घनानंद एक कवि होने के साथ-साथ अच्छे संगीतज्ञ थे।  उनकी शब्द योजना की बात करें तो उन्होंने तत्सम, तद्भव और इसके साथ-साथ उन्होंने मुहावरे और लोकोक्तियों  का भी प्रयोग किया है। अलंकार विधान भी उनकी कविता को अलंकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

हिंदी साहित्य -घनानंद का काव्य

                                                            घनानंद का काव्य 

घनानंद हिंदी के रीति काल की रीतिमुक्त काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। उन्होंने अपने काव्य में रीतिकालीन की बँधी-बधाई परिपाटी का त्याग कर स्वच्छंद रूप से श्रृंगार काव्य की रचना रचना की अर्थात प्रेम की पीड़ा का वर्णन किया है। जैसे-

अति सूधो स्नेह को ...............................देहु छटाँक नहीं।।

शब्दार्थ:
सूधो- सरल,। मार्ग- रास्ता, साँचे- सच्चाई। सयानप- सयानापन, चतुराई । निसांक - निशंक । बांक- टेढापन। झझकै- हिचकते हैं।  तजि-छोड़कर पाटी पढ़े- पट्टी पढ़े हो। मन- हृदय, मन भर। छटाँक- थोड़ा सा भी।

प्रसंग-
प्रस्तुत अवतरण बी.कॉम (प्रोग्राम) हिंदी 'ग' के पाठ्यक्रम में संकलित रीतिकालीन स्वच्छंद काव्यधारा के प्रमुख कवि घनानंद द्वारा रचित है। इसमें कवि अपनी प्रिय सुजान को उपालंभ की शैली में प्रेम मार्ग की शिक्षा दे रहे हैं। कवि कहते हैं-
व्याख्या:
घनानंद कहते हैं कि हे प्रिय । प्रेम का मार्ग अत्यंत सरल और सीधा है। इसमें बिल्कुल भी टेढापन नहीं हैं अर्थात इस रास्ते पर चलने वालों को चतुराई का व्यवहार करने की जरूरत नहीं होती। क्योंकि चतुराई से चलने वाला प्रेम के मार्ग में सफल नहीं हो सकता।प्रेम का मार्ग तो सच्चा  प्यार करने वालो के लिए हैं जो अपना अहं भाव त्याग कर या अपना सब कुछ प्रेमी के प्रति न्यौछावर कर इस मार्ग पर चलते हैं, जिनका ह्रदय पवित्र है उसमें तनिक भी अर्थात धोड़ा से भी छल कपट नहीं है । वे ही प्रेम के मार्ग पर चल सकते हैं। जिनको प्रेम में सफलता और असफलता की शंका होती है यह मार्ग उनके लिए नहीं है।
      कवि कहता है कि हे सुजान !सच्चा प्रेमी तो वही होता है न जो प्रेम के मार्ग पर सीधी रेखा की तरह चल पड़ता है और वह इधऱ-उधर की नहीं सोचता और न ही विचलित होता है । कवि सुजान को उपालम्भ देता हुआ कहता है कि आपने प्रेम की कौन सी पट्टी पढ़ी है, या प्रेम करने का कौन सा ढंग या रीति सीखी है ।आपका प्रेम करने का ढंग बड़ा ही अनोखा है । तुम दूसरे के मन को बड़ी चतुराई से मोह लेती हो पर बदले में अपना मन जरा भी किसी को नहीं देती हो। अर्थात प्रेम मार्ग पर चलकर हमने तुम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया पर तुम्हारा ध्यान हमारी तरफ तनिक भी नहीं जाता। कहने का मतलब यही है कि तुम तनिक भी हमसे प्रेम नहीं करती हो।
विशेष:
कवि ने प्रेम में शुद्ध मन और सीधेपन को महत्व दिया है।
मन लेहु, देहु छटाँक नहीं, में मुहावरों का व्यंजक प्रयोग है , सुंदर शब्द मैत्री दर्शनीय है
मन शब्द में श्लेष अलंकार है।
ब्रज भाषा का  प्रयोग है।


बुधवार, 14 सितंबर 2016

छंद के अंग / तत्त्व

छंद के लक्षण में मुख्य रूप से मात्रा, वर्ण/अक्षर/स्वर ध्वनि, यति, गति,लय, तुक या ताल, पाद/चरण एवं गण आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए छंद के भेदों को समझने से पहले इन शब्दों का अर्थ या स्वरूप जान देना आवश्यक है। इन शब्दों का अर्थ जाने बिना हम छंद को नहीं समझ सकते। अतः: ये शब्द और उनका अर्थ/ स्वरूप इस प्रकार है-
1. मात्रा- (लघु और गुरु)
किसी भी अक्षर के बोलने में लगने वाला समय मात्रा कहलाता है। मात्रा दो होती हैं - एक लघु और दूसरी गुरु। मात्राएं स्वरों की लगती हैं । जो ह्रस्व स्वर होते हैं उन की एक मात्रा लगती है और उनका चिन्ह इस प्रकार है -(।), जो स्वर दीर्घ होते हैं उन की दो मात्राएं लगती हैं और उसका चिन्ह इस प्रकार है-(S)

लघु के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें ध्यान देने योग्य हैं -
  • संयुक्त अक्षर स्वयं लघु होते हैं
  • अनुनासिक युक्त अर्थात चंद्रबिंदु वाले ह्रस्व स्वर भी लघु माने जाते हैं |
  • स्वर की लघुता अथवा गुरुता का प्रमुख आधार उसके उच्चारण में लगने वाला समय है अत: यदि किसी छंद में दीर्घ स्वर का उच्चारण भी ह्रस्व स्वर की भांति अल्प समय में होता है तो उसे लघु ही माना जायेगा
  • ह्रस्व मात्राओं से युक्त सभी वर्ण लघु होते हैं|
  • हलन्त व्यंजन भी लघु माने जायेंगे |
  • लघु का चिन्ह (I) है | अर्थात एक मात्रा की गिनती की जाती है।
गुरु- दीर्घ स्वर गुरु कहलाते हैं -आ ई , ऐ आदि ,
गुरु के संबंध में कुछ अनिवार्य बातें-

  • इसका चिन्ह (S) है | अर्थात दो मात्राओं की गिनती की जाती है।
  • दीर्घ स्वर - आ,ई ,ऊ ऐ, ओ अं, अ: , ओं ,औ और अनुस्वार के मेल से बने व्यंजन (का ,की ) भी गुरु हो जाते हैं |
  • अनुस्वार युक्त वर्ण गुरु हो जाते हैं
  • विसर्ग युक्त वर्ण भी गुरु हो जाते हैं
  • संयुक्त अक्षर से पूर्व के वर्ण गुरु हो जाते हैं |
  • जिस ह्रस्व स्वर के आगे दो व्यंजनों का संयोग होगा, उसे गुरु माना जायेगा| जैसे -बुद्धि सत्य आदि |
  • जहाँ जहाँ अनुस्वार होगा और विसर्ग से युक्त लघु वर्ण भी गुरु माना जाता है जैसे- हंस, बंदी, षष्ठ: |
  • अनुनासिक से युक्त ह्रस्व स्वर भी लघु ही माना जायेगा|
  • कभी-कभी ऐसा भी होता है कि चरण के अंत में आवश्यकता के अनुसार लघु को गुरु और गुरु को लघु मान लिया जाता है, जैसे- 'लीला तुम्हारी अति ही विचित्र' यहां पर त्र लघु है पर इसे गुरु माना जाएगा|
    2 . वर्ण/अक्षर/स्वरध्वनि - मुख से नि:सृत हर उस छोटी से छोटी ध्वनि को वर्ण या अक्षर कहते हैं , जिसके और खंड नहीं किए जा सकते या कहें तो जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते| जैसे- अ, इ, उ, ऋ आदि| छंद शास्त्र में स्वर अथवा स्वर युक्त व्यंजन को वर्ण माना जाता है। स्वर रहित व्यंजनों को वर्ण स्वीकार नहीं किया जाता। जैसे मोहन शब्द में व्याकरण की दृष्टि से म,ओ, ह,अ,न,अ ये छः अक्षर हैं , किंतु छंद शास्त्र की दृष्टि से इसमें केवल ओ,अ,अ तीन ही अक्षर हैं । अर्थात छंद शास्त्र स्वर ध्वनियों पर आधारित है, इसमें स्वर ध्वनियों की गणना दो प्रकार से की जाती है- मात्राओं अर्थात स्वर की इकाइयों को गिन कर तथा दूसरा वर्णों और उनके क्रम को गिनकर|

    3. पाद/चरण - प्रायः छंद में 4 चरण होते हैं इन्हें पद या पाद भी कहते हैं । चौपाई छंद 4 चरणों वाला होता है , पूरा रामचरित मानस दोहा और चौपाई में ही लिखा गया है | साधारण रूप से हम चरण को छंद की एक पंक्ति कह सकते हैं । कुछ छंदों के दो चरण एक पंक्ति में लिखे जाते हैं जैसे दोहा, सोरठा, बरवै आदि। कुछ छंदों के छह चरण भी होते हैं जैसे- कुंडलियां और छप्पय। जिस छंद के 6 पद होते हैं उसके छठे अंश को एक पाद कहा जाता है।

    4 . यति- जब हम बोलते हैं तो कुछ समय बाद हमें विराम या विश्राम लेना पड़ता है क्योंकि हम ज्यादा देर तक लगातार नहीं बोल सकते अत: हमें कुछ समय के उपरांत कुछ देर के लिए रुकना ही पड़ता है| दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि काव्य में जिस-जिस स्थान पर जिह्वा स्वेच्छा से रुकती है, उसको छंद शास्त्र में यति कहते हैं| यति छंद का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है और काव्य में कहाँ ठहराव आना चाहिए इसका भी नियम होता है| यति का एक दूसरा नाम ही ठहराव है।.. एक छंद में दो या तीन यति हो सकती हैं, ये कवि को तय करना पड़ता है कि उसे कहाँ पर यति रखनी हैं और कहाँ पर नहीं| छंद में गति, प्रवाह और लय का माधुर्य उत्पन्न करने के लिए यति नियम का पालन करना पड़ता है। इसी के कारण पद के चरणों का भी नियमन होता है।
    उदाहरण -
    जो मैं कोई, विहाग उड़ता, देखती व्योम में हूँ |

    यहाँ कोई के बाद (,) और उड़ता के बाद (,) यति है

    5 .तुक, लय एवं ताल
    समान स्वर वाले वर्णों पर चरण की समाप्ति तुक कहलाती है, अर्थात जब दो या चार चरणों के अंत में अक्षरों (स्वर और व्यंजन) की समानता मिलाती है तब उसे तुक कहते हैं | हिंदी के अधिकांश परंपरा युक्त छंद तुकांत हैं। किंतु आजकल कविता में तुक पर कोई ध्यान नहीं ,दिया जाता है। हमें अधिकतर छंदमुक्त और अतुकान्त कविता ही पढ़ने को मिल रही हैं। कहा जा सकता है कि अतुकांत छंदों का प्रयोग बढ़ रहा है। संस्कृत साहित्य तथा उर्दू की शायरी में भी तुकांत छंदों का अभाव मिल रहा है। हिंदी के दोहा, चौपाई, सवैया आदि तथा अंग्रेजी के अधिकांश छंद तुकांत ही होते हैं।
    लय का संगीत शास्त्र में प्रयोग होता है, छंद में लय का आगमन संगीत शास्त्र से हुआ है, गीत को वाद्य को और नृत्य को आपस में जोड़ने वाला तत्त्व लय ही है, कहने का तात्पर्य यह है कि लय ही गायन, संगीत और नृत्य के बीच सामंजस्य स्थापित करती है| काव्य में गेयता का तत्त्व लय और ताल से ही आता है| कविता को जब गाकर सुनाया जाता है तब वह लय से ही संभव हो पाता है|
    लय से जुड़ा हुआ तत्व ही ताल है| ताल प्रवाह को मापने का एक माप है, कहाँ उतार होना है, कहाँ चढ़ाव होना है या आरोह -अवरोह का सारा विधान ताल पर ही निर्भर करता है |

    6 . गति - गति का अर्थ होता है- प्रवाह। निराला ने काव्य में प्रवाह को महत्तवपूर्ण माना है| छंद में मात्रा या वर्णों की नियमित संख्या से ही काम नहीं चलता। उसमें पढ़ते समय एक प्रकार का प्रवाह भी होना चाहिए, जिससे कहीं व्यर्थ रुकना न पड़े इसी प्रवाह को गति कहते हैं। अर्थात काव्य में गति भंग नहीं होनी चाहिए क्योंकि काव्य में गति न होने से उसको पढ़ने में आनंद नहीं आता | इसलिए यह काव्य का अनिवार्य अंग होता है | काव्य में प्रवाह निरंतर अभ्यास से आता है|

    7. गण- मात्राओं या अक्षरों के समूह को छंद शास्त्र में गण कहते हैं। गण दो प्रकार के होते हैं। एक वर्ण-गण दूसरा मात्रा-गण। तीन-तीन अक्षरों के समूह को वर्ण-गण कहते हैं। अक्षरों के लघु और गुरु के विचार से गणों के आठ भेद हैं। गणों को सरलता पूर्वक याद करने और पहचान करने के लिए निम्नलिखित सूत्र को याद करना चाहिए-
    'यमाताराजभानसलगा'
    इस सूत्र का कोई अर्थ नहीं होता है | इस सूत्र पंक्ति में 10 वर्ण (य, म,त,र, ज, भ, न, स, ल, ग) हैं | 'ल' और 'ग' को छोड़कर प्रत्येक वर्ण का एक 'गण' है अर्थात 'य' का एक गण 'म' का एक गण 'त' का गण.... .......| कहने का तात्पर्य यह है कि हर एक वर्ण या अक्षर का एक-एक गण कहलाता है और और हर गण में तीन-तीन अक्षरों का समूह रहता है| पहले आठ वर्णों (य, म,त,र, ज, भ, न, स) से आठ गणों ( यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण) का ज्ञान होता है | अंतिम दो से लघु - गुरु का ज्ञान होता है| गण बनाने के लिए एक- एक अक्षर हटाते चले जाएंगे तो हमारे गण बनते चले जाएँगे| जैसे- 'य से -यमाता, म से- मातारा, त से-ताराज,र से- राजभाज से- जभान, भ से- भानस, न से- नसल, स से- सलगा'

    • य से यगण, यगण में (प्रथम लघु दो गुरु वर्ण) यमाता ( ISS)
    • म से मगण, मगण (तीनों गुरु वर्ण) मातारा (SSS)
    • त से तगण, तगण से (प्रथम दो गुरु एक लघु वर्ण) ताराज (SSI)
    • रा से रगण, रगण में (प्रथम गुरु, मध्य लघु, तृतीय गुरु वर्ण) राजभा (SIS)
    • ज से जगण, जगण में (प्रथम लघु, मध्य गुरु,एक लघु वर्ण) जभान (ISI)
    • भा से भगण. भगण में (प्रथम गुरु शेष लघु वर्ण) भानस (SII)
    • न से नगण, नगण में (तीनों लघु वर्ण) नसल (III)
    • स से सगण, सगण में (प्रथम दो वर्ण लघु तृतीय गुरु) सलगा (IIS)
    • ल से लघु (I)
    • गा से गुरु (S)

    इस सूत्र में सम्पूर्ण छंद शास्त्र के चिन्ह समाहित हैं |



    छंद के भेद

    छंद के मुख्य रूप से दो भेद होते हैं - एक मात्रिक और दूसरा वर्णिक। लेकिन आजकल उभय छंद और मुक्त या स्वच्छंद छंद को भी छन्दों में शामिल किया जाता है , इस दृष्टि से कुल 4 छंद माने जा सकते हैं - वर्णिक, मात्रिक, उभय, मुक्त या स्वच्छंद।
    मात्रिक छंद
    जिन छन्दों में मात्राओं की निश्चित और नियमित संख्या रहती है। उन छन्दों में वर्णों की संख्या पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता ,.... दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मात्रिक छंद वे होते हैं जिनकी रचना मात्राओं की गणना के आधार पर होती है।
    उदाहरण -

    शशि मुख पर घूंघट डाले मात्रा -14 वर्ण - 11
    अंचल में दीप छिपाएं मात्रा -14 वर्ण - 9
    जीवन की गोधूलि में मात्रा -14 वर्ण - 8
    कौतूहल से तुम आए मात्रा -14 वर्ण - 9

    इस छंद के प्रत्येक चरण में मात्राओं की संख्या निश्चित और नियमित है| कहने का मतलब है कि प्रत्येक चरण में 14 -14 मात्राएं हैं; किंतु वर्णों की संख्या निश्चित नहीं है, वह पूरी तरह से अनियमित है, इसलिए यह मात्रिक छंद का उदाहरण है

    मात्रिक छंद को हम तीन भागों में बांट सकते हैं -
    1. सममात्रिक छंद - सममात्रिक छंद वे छंद होते हैं जिनके चारों चरणों में मात्राओं की संख्या समान होती है |
    2. अर्धसममात्रिक छंद - ये वो छंद होते हैं जिनके पहले और तीसरे (विषम ) तथा दूसरे और चौथे (चरणों की मात्राएं समान होती हैं|
    3. विषममात्रिक छंद- इनके चरणों में मात्राएं संख्या में समान नहीं होती हैं, परंतु उनमें गति और लय होती है |
    वर्णिक छंद -
    वर्णिक छंद में मात्राओं पर ध्यान न देकर वर्णों की संख्या तथा वर्णों से बनने वाले गणों पर ध्यान दिया दिया जाता है । कह सकते हैं कि वर्णिक छंद वे होते हैं जिनकी रचना वर्णों की गणना के आधार पर होती है।
    उदाहरण 
    कैसे मैं फिरुँगा मुझे कौन बताएगा?                              मात्रा-15 ,  वर्ण - 15
    कैसे मैं फिरूँगा हाय?शुन्य लंका धाम में?                      मात्रा-15 ,  वर्ण - 15
     दूंगा सांत्वना क्या मैं तुम्हारी उस माता को।                   मात्रा-17 ,  वर्ण - 15
     कौन बतलाएगा, मुझे है वत्स पूछेगी मात्रा-                     मात्रा-15 ,  वर्ण - 15
     इस छंद में मात्राओं की संख्या पर ध्यान न रखकर वर्ण- विधान पर ध्यान रखा गया है। प्रत्येक चरण में 15- 15 वर्ण हैं, जबकि मात्राओं की संख्या भिन्न भिन्न है। वर्णों  के इसी नियमित विधान के कारण यह वर्णिक छंद है।
    वर्णिक छंद के भी तीन प्रकार होते हैं -
    1. समवर्णिक छंद-समवर्णिक छंद वे छंद होते हैं जिनके चारों चरणों में वर्णों की संख्या समान होती है |
    2. अर्धसमवर्णिक छंद- ये वो छंद होते हैं जिनके पहले और तीसरे (विषम ) तथा दूसरे और चौथे (चरणों में वर्णों की संख्या समान होती है|
    3. विषमवर्णिक छंद- विषम छंद वे छंद कहलाते हैं जो सम और अर्द्ध सम न होकर चारों चरणों में वैषम्य रखते हैं |

    उभय छंद-

    इस छंद में वर्णों तथा मात्राओं, दोनों की ही संख्या निश्चित और नियमित होती है|
    उदाहरण के लिए देख सकते हैं -
    ऊपर को जल सूख, सूखकर उड़ जाता है |   मात्रा-24  ,  वर्ण - 17
    सर्दी से सकूचाय, जलद पदवी पाता है |  मात्रा-24  ,  वर्ण - 17
    पिंघलावै रविताप, धरातल पै गिरता है| मात्रा-24  ,  वर्ण - 17 
    बार-बार इस भांति, सदा हिरता- फिरता है |                   मात्रा-24  ,  वर्ण - 17

    इस छंद के प्रत्येक चरण में नियम के अनुसार 24-24 मात्राएं और 17-17 वर्ण हैं | साथ ही 11 और 13 मात्राओं पर तथा 8 और 9 वर्णो पर यति है|
    मुक्त या स्वच्छंद छंद-

    यह वे छंद होते हैं जिनमें परम्परित परिपाटी से या प्राचीन परंपरा से हटकर रचना की जाती है | इस तरह की कविता में मात्राओं और वर्णों का कुछ खास घ्यान नहीं रखा जाता| वे छंदमुक्त या मुक्त छंद में लिखी कविता कहलाती हैं| इन छंदों में प्रवाह या लय पर तो ध्यान रहता है किंतु मात्राओं तथा वर्णों की गिनती या नियमों की कोई चिंता नहीं की जाती है|
    इस प्रकार के छंदों को हम दो भागों में रख सकते हैं- पहला वर्ग वह है जिसमें वे छंद आते हैं, जिनमें परंपरा से ग्रहण किए गए चार चरणों के स्थान पर 5, 6 या अधिक चरण रखे जाते हैं | दूसरे वर्ग के अंतर्गत वे छंद होते हैं या आते हैं जो अंग्रेजी की पद्धति पर रचे जाते हैं | इस प्रकार के छंदों में यदि पहले चरण में 8 अक्षर हैं तो दूसरे में 13, तीसरे में 2 , और चौथे में 15 |
    कहने का आशय यह है कि दूसरे प्रकार के मुक्त छंदों में अक्षरों का कोई नियमित विधान नहीं रहता है|

    शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

    काव्य के भेद/ काव्य रूप

    काव्य के भेद/ काव्य रूप

    साहित्य शब्द का अर्थ -
    जब साहित्य का प्रारंभ हुआ तो उसके लिए वाङ् मय शब्द का प्रयोग किया जाता था | वाङ् मय शब्द वाक् +मय से बना है जिसका अर्थ होता है- वाणी का आलेख , यानि जो -जो वाणी के द्वारा कहा गया है वह सब वाङ् मय है इसलिए वाङ् मय संपूर्ण साहित्य के लिए प्रयोग जाता था और काव्य शब्द भी साहित्य के पर्याय रूप में मिलता हैं, अंग्रेजी में इसके लिए लिटरेचर शब्द प्रसिद्ध है, अगर हिंदी की दूसरी शैली उर्दू की बात करें तो उसमें अदब शब्द प्रयोग होता है|
    जहाँ तक आज की बात है तो साहित्य शब्द अधिक प्रचलन में है और काव्य शब्द कहने से केवल पद्य का संकेत मिलता है गद्य का नही। लेकिन जब हम साहित्य कहते हैं तो उसमें गद्य और पद्य दोनों ही सम्मिलित हो जाते हैं इसीलिए आज हम साहित्य शब्द का ही प्रयोग करते हैं। लेकिन अगर हम काव्य रूप की बात करते हैं तो उसमें भी संपूर्ण साहित्य की बात हो जाती है।
    सबसे पहले हम देखते हैं कि साहित्य शब्द का अर्थ क्या है साहित्य से हम क्या समझते हैं? व्युत्पत्तिपरक अर्थ की दृष्टि से देखें तो साहित्य शब्द बना है- = सहितस्य भाव: साहित्यम = यहाँ सह का अर्थ है साथ होना अर्थात जहां शब्द और अर्थ, विचार और भाव का परस्पर अनुकूलता के साथ सहभाव का संबंध होता है, उसे हम साहित्य कहते हैं । सहभाव किसका ? अर्थात शब्द और अर्थ का होता है या भाव और विचार में होता है लेकिन सहभाव परस्पर अनुकूलता के साथ होना चाहिए। मूल रूप में कह सकते हैं कि जहां शब्द और अर्थ , मानसिक विचार और मानसिक भाव का परस्पर संबंध हो , वह साहित्य कहलाता है साहित्य शब्द के लिए अंग्रेजी में लिटरेचर शब्द आता है जो लेटर से बना है या अक्षर से बना है |और साहित्य में जो हित शब्द जुड़ा है अर्थात कहा गया है- हितेन सह सहितं = इसका अर्थ है हित के साथ होना ,यानि साहित्य में हित का होना आवश्यक है अर्थात शब्द और अर्थ का स्वभाव तो रहेगा ही लेकिन वह हित से जुड़ा हूं, जिससे हित का संपादन हो, अब प्रश्न उठता है कि किसके हित का संपादन हो? कह सकते हैं कि जब काव्य से रचना करने वाले का भी और पाठक या दर्शक या श्रोता का भी हित का संपादन हो तब वह साहित्य कहलाता है।
    साहित्य व्यापक अर्थ-
    साहित्य ऐसी शाब्दिक रचना है जिसमें कोई हित या प्रयोजन हो जैसा की संस्कृत साहित्य में साहित्य को वाङ् मय का पर्याय कहा गया है इसका अर्थ है कि जितना भी हमारा शब्द भंडार और वाणी का विस्तार है वह सब साहित्य कहलाता है और जब हम यह कहते हैं कि जितना भी शब्द भंडार है जितना भी वाणी का विस्तार है वह सारा साहित्य है तो यह कह देने पर हमारा सारा ज्ञान विज्ञान का साहित्य और दूसरा साहित्य सब इसके अंतर्गत आ जाएगा। फिर चाहे वह कला है चाहे वह विज्ञान है चाहे वह समाजशास्त्र हो, नीतिशास्त्र हो अर्थात जितना भी साहित्य है वह इसके अंतर्गत आ जाता है।
    साहित्य के रूप-
    साहित्य के मुख्य रूप से दो रूप मान सकते हैं, पहला सर्जनात्मक साहित्य और दूसरा ज्ञान विज्ञान का साहित्य।
    जिस साहित्य में भावना की प्रधानता है, जो रसात्मक साहित्य है अर्थात जो रस से युक्त है जो पाठक और दर्शक का हित लाभ करता है, उसे सृजनात्मक साहित्य कहेंगे। इसके लिए अंग्रेजी में लिटरेचर ऑफ पावर शब्द का प्रयोग मिलता है और उसे ही शक्ति का साहित्य काव्य कहा है, सर्जनात्मक साहित्य वह है जिसमें भावना की प्रधानता हो जिसमें रसात्मकता हो। जैसे महाकाव्य ,खंडकाव्य, कहानी, उपन्यास निबंध आदि.....। तो इसको हम सृजनात्मक साहित्य कहेंगे।
    इस तरह से हम साहित्य के दो रूप मानते हैं पहला सर्जनात्मक साहित्य और दूसरा ज्ञान विज्ञान का साहित्य | जिसे अंग्रेजी में लिटरेचर ऑफ नॉलेज कहा जाता है, हिंदी में ज्ञान विज्ञान के साहित्य के अंतर्गत राजनीतिक विज्ञान, समाजशास्त्र, नीति शास्त्र, भूगोल, गणित, ज्योतिषशास्त्र आदि आ जाते हैं।
    एक दूसरा साहित्य भी है जिसे हम आलोचनात्मक साहित्य कहते हैं | आलोचनात्मक साहित्य वह होता है, जिसमें शास्त्र सिद्धान्तों, कृतियों की आलोचना और आलोचनात्मक निबंध शामिल हैं। इसके भी दो रूप मिलते हैं - एक सैद्धांतिक/शास्त्रीय आलोचना और दूसरा व्यवहारिक आलोचना | सैद्धांतिक आलोचना को शास्त्रीय आलोचना भी कहते हैं जिसका प्रारंभ भरतमुनि का नाट्यशास्त्र से माना जाता है। उसके बाद दंडी, विश्वनाथ और आगे चलकर यह परंपरा हिंदी साहित्य के मध्यकाल में देखी जा सकती हैं, विशेष रूप से रीतिकाल में केशव, कुलपति मिश्र, चिंतामणि, मतिराम आदि अनेक कवि या आचार्यों ने शास्त्रीय आलोचना की है। आधुनिक काल में हिंदी साहित्य पर बंगला साहित्य और अंग्रेजी साहित्य का प्रभाव जब पड़ा तो साहित्य में सैद्धांतिक आलोचना के साथ-साथ व्यवहारिक आलोचना की भी शुरुआत हुई। इसे समीक्षा शास्त्र कहा जाता है। आधुनिक हिंन्दी साहित्य में रामचंद्र शुक्ल, गुलाब राय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और डॉ नामवर सिंह आदि अनेक आलोचक हुए हैं जिन्होंने आलोचना साहित्य को समृद्ध किया है । आधुनिक काल में डॉ.नगेद्र का नाम भी एक अच्छे आलोचक के रूप में गिना जाता है।
    सर्जनात्मक साहित्य-
    पाश्चात्य काव्यशास्त्र के प्रभाव के कारण (अंग्रेजी साहित्य ) हमें काव्य रूपों के भिन्न-भिन्न रूप मिलते हैं लेकिन भरतमुनि या विश्वनाथ के आधार पर या संस्कृत के काव्य शास्त्रियों ने जो काव्य का विभाजन किया है अर्थात जिन काव्य रूपों की बात की है या जो काव्य का वर्गीकरण किया है या जो हमारी परंपरा रही है उनकी अगर बात करें तो वह विभाजन इस प्रकार या इस आधार पर किया जा सकता है-
    1 सर्जनात्मक साहित्य
    सर्जनात्मक साहित्य के अनेक भेद हैं और इन भेदों के पीछे चार प्रमुख आधार हैं-
    1. गोचरता ( इंद्रियजन्य )
    2. शैलीबंध की दृष्टि से
    3. कवि की जीवन दृष्टि
    4. कवि मन: प्रवृत्ति
    गोचरता के आधार पर साहित्य के मूल रूप से दो भेद किए जाते हैं -
    दृश्य काव्य
    श्रव्य काव्य
    1 दृश्य काव्य - जिसे हम अपनी आंखों से या नेत्र इंद्री से देखते हैं और जिसे हम कानों/ कर्ण से सुनकर जिस का आनंद लेते हैं वह दृश्य काव्य कहलाता है।
    दृश्य काव्य = दृश्य काव्य वह है जिसमें हम अपनी नेत्र इंद्रियो से रस की अनुभूति को प्राप्त करते हैं । इसके मूलतः दो भेद हैं= रूपक और उपरूपक।
    रूपक
    रूपक के 10 भेद है-
    1 नाटक 2 प्रकरण 3 भाण 4 व्यायोग 5 वीथि 6 अंक
    7 प्रहसन 8 समवकार 9 डिम 10 ईहामृग ।
    उप रूपक-
    उपरूपक के 18 भेद -
    1 नाटिका 2 त्रोटक 3 गोष्टी 4 सट्टक 5 नाट्य रासक 6 प्रस्थानक 7 उल्लाप्य 8 काव्य 9 प्रेङखण 10 रासक 11 संलापक 12 श्रीगदित 13 शिल्पक 14 बिलासिका 15 दुर्मल्लिका 16 प्रकरणिका 17 हल्लीस 18 भणिका

    अभी हमने बात की दृश्य काव्य की अब हम बात करते हैं - श्रव्य काव्य की। ये भी इंद्रिय जन्य है।
    2 श्रव्य काव्य =
    श्रव्य काव्य जिसे हम कानों से यानी कर्ण इंद्रियों से सुनकर आनंद प्राप्त करते हैं क्योंकि हमारा आरम्भिक काव्य मूलतः मौखिक रूप में ही प्रचलित था और कहानी या कविता आदि को सुनाया जाता था और सुनकर के आनंद लिया जाता था तो इसलिए श्रव्य काव्य कहा जाता है। आज इसी श्रव्य काव्य के लिए पठ्य काव्य भी कहा जाता है अर्थात जिसको पढ़ कर आनंद लिया जाए।
    इस प्रकार दृश्य काव्य वह है जो मंच पर अभिनीत किया जाए और जिसको देखकर आनंद लिया जाता है और श्रव्य वह है जिसे सुनकर या पढ़कर के आनंद लिया जाए।
    दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य में अंतर
    नाटक आदि को दृश्य काव्य कहा कहा गया है। दृश्य काव्य समाज से जुड़ा हुआ है, उसको आप एक प्रकार से समाज समूह के साथ बैठकर देखते हो और इसका आनंद शिक्षित, अल्प शिक्षित, अशिक्षित, अर्थात सभी वर्ग के लोग ले सकते हैं इसलिए नाटक को पंचम वेद भी कहा गया है। इन दोनों के बीच यही मूल अंतर है कि जो दृश्य काव्य है वह समाज से जुड़ा हुआ है उसको आप समूह के साथ बैठकर देखते हो अर्थात जब आप नाटक या फ़िल्म देखने जाते हैं तो समाज समुह के बीच बैठकर देखते हैं और उस नाटक का आनंद सामुहिक रूप से उठाते हैं। उसको देखने का की समय सीमा तय होती है, परंतु जो श्रव्य काव्य है उसका आनंद एकांत में बैठकर भी लिया जा सकता है और सामूहिकता में भी। इसमें बैठने की सीमा भी नहीं होती | अगर आपने कोई कहानी पढ़नी शुरू की एक घंटा भी पढ़ कर बाकी अगले दिन पढ़ने के लिए छोड़ सकते हैं। फिर अगले दिन कुछ पढ़ लिया, या एक सप्ताह , एक महीना तक भी उसको पढ़ने में समय लगा सकते हैं , उसमें समय सीमा नहीं है काव्य का आनंद आप अकेले ले सकते हैं या बैठे हुए, सोते हुए भीआप उसका आनंद ले सकते हैं ।
    श्रव्य काव्य
    श्रव्य काव्य के तीन भेद किए जाते हैं
    1 पद्य
    2 गद्य
    3 चंपू काव्य
    अब हम बात करते हैं - श्रव्य काव्य की ये भी इंद्रिय जन्य है
    पद्य-
    पद्य से अभिप्राय है छंदोंबध रचना, जिसमें छंदों का ध्यान रखा गया है उसे हम पद्य कहते हैं, पद्य अर्थात कविता या पोएट्री, जिसमें भावों को प्रमुखता दी जाती है और गद्य जिसे प्रोज कहा जाता है और जो छंद बद्ध नहीं होती, जिसमें विचारों की प्रधानता रहती है, अर्थात ये रचनाएं विचारात्मक होती हैं और चंपू काव्य वह कहलाता है जो गद्य और पद्य का मिश्रित रूप होता है। उसमें गद्य रहता है और पद्य भी रहता है।
    पद्य के भेद-
    अब सबसे पहले हम बात करते हैं पद्य के दो भेदों की । इसके दो भेद माने गए हैं-
    प्रबंध काव्य और मुक्तक काव्य
    प्रबंध काव्य से अभिप्राय है जो बंधा हुआ रहता हो। जिसकी कथा में पूर्वा पर संबंध रहता हो, एक कथा होती है उसमें किसी की पूरी कहानी होती है जिसमें से हम एक घटना को एक कथा को अलग नहीं कर सकते प्रबंध काव्य किसी पात्र के संपूर्ण जीवन का चित्रण होता है
    और मुक्तक काव्य होता है वह पूर्वा पर संबंध से रहित रहता है उसमें प्रत्येक क्षण अपने आप में स्वतंत्र होता है अलग-अलग होते हैं चाहे वह कविता के रूप में हो सवैया के रूप में हो दोहे के रूप में हो पदों के रूप में हो पर प्रत्येक क्षण अपने पूर्ववर्ती छंद से या प्रवृत्ति छंद से आश्रित नहीं रहता वह पूर्णत स्वतंत्र रहता है जबकि प्रबंध काव्य में प्रत्येक क्षण एक दूसरे से बंधा होता है और प्रबंध काव्य के 2 मूल भेद किए जाते हैं
    1 महाकाव्य
    2 खंड काव्य
    महाकाव्य इतिहास प्रसिद्ध कथा को लेकर या किसी प्रख्यात आख्यान को लेकर लिखा जाता है और उसका जो नायक या नायिका होता है या होती है, उसके संपूर्ण जीवन का चित्रण किया जाता है। नायक के जन्म से लेकर अंत तक पूर्ण जीवन का चित्रण महाकाव्य में रहता है।
    दूसरा खंडकाव्य में नायक के पूर्ण जीवन का चित्रण न होकर उसके जीवन की किसी एक घटना पर आधारित रहता है। जैसे रामचरितमानस एक महाकाव्य है जिसमें राम के जन्म से लेकर उनके वनवास और उनके वापस अयोध्या आने तक का पूरी कथा रहती है और अगर उसमें से केवल केवट प्रसंग को आधार बनाकर लिखा जाए तो वह खंडकाव्य है। जैसे दिनकर कर्ण के जीवन को लेकर रश्मि बंध लिखा और तुलसीदास ने पार्वती मंगल की रचना की है। खंडकाव्य में नायक के जीवन की किसी एक विशेष घटना, प्रसंग को लेकर उस को आधार बनाकर काव्य की रचना की जाती है। महाकाव्य और खंडकाव्य के आकार में भी विभिन्नता होती है ।महाकाव्य विशाल आकार का होता है और खंडकाव्य लघु आकार का होता है। महाकाव्य का नायक धीरोदात्त होता है , इतिहास प्रसिद्ध होता है, खंडकाव्य में ऐसा आवश्यक नहीं होता। उसका नायक कोई उदात्त चरित्र वाला भी हो सकता है। उसका नायक कोई सामान्य पात्र भी हो सकता है। महाकाव्य अनेक वर्गों में विभक्त होता है। महाकाव्य में अनेक प्रासंगिक कथाएं होती हैं और वे प्रासंगिक कथाएं आधिकारिक कथा को आगे बढ़ाने में सहायक रहती है महाकाव्य में प्रत्येक छंद के अंत में छंद परिवर्तन हो जाता है। रामचरित मानस में इस विधान को देख सकते हैं। महाकाव्य में प्रकृति का चित्रण होगा, नायक के चरित्र का विस्तार से वर्णन होगा, वस्तु वर्णन अधिक होता है जैसे- आखेट वर्णन, नगर वर्णन आदि मिलते हैं इस प्रकार महाकाव्य का आकार विस्तृत होता है और खंडकाव्य का आकर सीमित होता है। महाकाव्य संस्कृत में अनेक मिलते हैं जैसे कालिदास का रघुवंश। इसी तरह से हिंदी साहित्य में भी महाकाव्य और खंंडकाव्य गए हैं संस्कृत में रामायण बहुत बड़ा महाकाव्य है। हिंदी में तुलसीदास का रामचरितमानस है या सूफी काव्य जैसे जायसी का पद्मावत है। आधुनिक काल में हम देखते हैं मैथिलीशरण गुप्त का साकेत है, हरिऔध का प्रियप्रवास है और इसी तरह से खंडकाव्य की रचना भी हिंदी साहित्य में हुई है। हिंदी में अनेक खंडकाव्य मिलते हैं जैसे पंचवटी है, मिलन है तो इस प्रकार अनेक खंडकाव्य लिखे गए हैं।
    पद्य का दूसरा भेद है मुक्तक काव्य
    मुक्तक काव्य के भी दो भेद है -
    पाठ्य
    प्रगीत काव्य
    पाठ्य के अंतर्गत हम देखते हैं कि रहीम के दोहे, बिहारी के दोहे, कबीर के दोहे और मीरा के पद, सूरदास के पद यह सब पाठ्य के अंतर्गत आते हैं।
    प्रगीत वह होता है जिसमें गेयता होती है। जैसे महादेवी वर्मा के गीत है वह प्रगीत के अंतर्गत आते हैं । जिसको अंग्रेजी में लिरिक कहते हैं। मीरा के कुछ पद भी प्रगीत के अंतर्गत आते हैं । उनको गाया जा सकता है।
    जो मुक्तक हैं, जिसमें दोहा, सोरठा, कवित्त या धनानंद के कवित्त आते हैं। यह अपने आप में स्वतंत्र होते है, पूर्ण होते हैं। उसमें पूर्वा पर संबंध नहीं होता है। उसमें कथा नहीं होती और प्रत्येक छंद में एक पूरा भाव सिमट कर रह जाता है और जो प्रगीत है उसमें गेयता की प्रधानता रहती है। उसमें गीति तत्व की प्रधानता रहती है। आगे चलकर हिंदी साहित्य में नवगीत के रूप में प्रगीत का विकास देख सकते हैं , या प्रगीत के उपभेद के रूप में भी देख सकते हैं ।
    श्रव्य काव्य का दूसरा भेद है गद्य = गद्य वह है जिसमें छंदों बद्धता नहीं रहती है छंद नहीं रहते हैं और प्रारंभ में जब प्रेस नहीं थी और मौखिक साहित्य ही अधिक रहता था तो पद्य काव्य का रूप था। पूरा मध्यकालीन साहित्य पद्य रूप में ही मिलता है।
    गद्य बहुत कम लिखा गया है संस्कृत में भी हमें बाणभट्ट की कादंबरी या हर्षचरित तो मिलते हैं, लेकिन बहुत कम मात्रा में लिखा गया हैं। गद्य का विकास मुख्य रूप से आधुनिक काल में ही हुआ है जब प्रिंटिंग प्रेस आ गई मुद्रित अवस्था में साहित्य उपलब्ध होने लगा तब तब पद्य की अपेक्षा गद्य की नवीन विधाओं का विकास हुआ तो गधे जिसमें हम देखते हैं कि उपन्यास है, कहानी, निबंध ,जीवनी, रेखाचित्र, संस्मरण और रिपोर्ताज, वार्ता, यात्रा वृतांत, पत्र लेखन, डायरी लेखन यह सब गद्य की नवीन विधाएं हैं, जिसमें लेखक अपने भावों को अपने विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
    और तीसरा चंपू काव्य जिसमें पद्य और गद्य दोनों का मिश्रण मिलता है ।
    कवि की जीवन दृष्टि = 1 यथार्थवादी दृष्टि 2, आदर्शवादी दृष्टि
    लेखक की जीवन दृष्टि या विचारधारा जैसी होती है वह उसके अनुरूप ही साहित्य सर्जन करते हैं। अगर लेखक यथार्थवादी दृष्टि से प्रेरित है या फिर वह जो समाज मे घटित हो रहा है उस यथार्थ को प्रस्तुत करने की अभिलाषा रखता है तो वह साहित्य यथार्थवादी साहित्य कहलाता है। जैसे यशपाल के उपन्यास हैं वे यथार्थ परक हैं ।
    और आदर्शवादी दृष्टि जहां लेखक व साहित्यकार समाज में जो घटित हो रहा है, उसको देखते हुए वास्तव मेंं समाज को क्या होना चाहिए? साहित्य समाज को क्या दिशा निर्देश दे सकता है? इस। बातको ध्यान में रख कर रचना करता है तो वह आदर्शवादी साहित्य है। क्योंकि समाज में जो हो रहा है वह तो उसको देख ही रहा है अगर उसी को प्रस्तुत करना साहित्य का साहित्यकार का उद्देश्य नहीं होता। तो जो हो रहा है उसके स्थान पर क्या होना चाहिए? क्या समाज का आदर्श रूप होना चाहिए? यह दृष्टि लेकर जब कोई साहित्यकार रचना करता है तो वह आदर्शवादी दृष्टि कहलाती है। इसका बहुत अच्छा उदाहरण रामचरितमानस है उसको देख लीजिए वह आदर्श से प्रेरित ग्रंथ है। उस समय समाज की जो राजनीतिक स्थिति थी, धार्मिक स्थिति थी, परिवेश था या जिस तरह का व्यवहार समाज में हो रहा था, जो शोषण हो रहा था अंग्रेज शासन या मुगल शासन के द्वारा, जो समाज का या जनता का शोषण किया जा रहा था, उसको देखते हुए तुलसीदास एक रामराज्य की कल्पना करते हैं। यह एक बहुत बड़ी विराट कल्पना थी या कहें कि यह एक आदर्श स्थिति थी कि राजा कैसा होना चाहिए ? राजा का क्या कर्तव्य होना चाहिए? प्रजा का क्या कर्तव्य होना चाहिए? भाई भाई के बीच कैसा संबंध होना चाहिए? माता पुत्र का संबंध, स्वामी और सेवक का संबंध कैसा होना चाहिए? तो यह एक आदर्शवादी दृष्टि है जो हमें रामचरित में मिलती है।। आधुनिक काल में प्रेमचंद का साहित्य की दृष्टि देख सकते हैं, उनके यथार्थ को देख सकते हैं, उनकी कहानी, उनके उपन्यास, उन्होंने जो किसान की दशा का वर्णन किया है, समाज के शोषण का वर्णन, व्यवस्था का, दहेज प्रथा की समस्या की बात करते हैं, बाल विवाह की बात करते हैं, वह समाज के यथार्थ को लेते हैं परंतु उसे आदर की ओर मोड़ देते हैं, उनका जो यथार्थवाद है वह आदर्शउन्मुख यथार्थवाद है। समाज के यथार्थ को प्रस्तुत करते हुए क्या वास्तविकता में समाज को कैसा होना चाहिए यह उस साहित्य का लक्ष्य भी है मूल उद्देश्य भी यही है कि वे समाज को एक दिशा या प्रेरणा देना चाहते हैं तो वह आदर्शनामुखी यथार्थ है । तो इस प्रकार जो साहित्यकार की जीवन दृष्टि या विचारधारा है उसके आधार पर मूलतः काव्य के दो भेद के जाते हैं एक यथार्थवादी दृष्टि और दूसरी आदर्शवादी दृष्टि।
    कवि की मन: प्रवृत्ति-
    1 विषयीगत साहित्य
    2 विषयगत साहित्य
    इसी तरह से एक और काव्य के वर्गीकरण का आधार है कवि की प्रवृत्ति के आधार पर कभी की जो मन प्रवृत्ति है उसकी जो सोच है उसके आधार पर भी दृष्टि से काव्य के दो भेद हैं एक विषय गत साहित्य और दूसरा विषय गत साहित्य विषय गत साहित्य सब्जेक्टिव लिटरेचर कहा जाता है सब्जेक्ट इन लिटरेचर ऐसा होता है जिसमें कभी अपने निजी सुख-दुख की अभिव्यक्ति करता है जो कभी के अपने मन के भाव है आत्मा भी व्यक्ति है उसको वे प्रस्तुत करते हैं तो निजी सुख-दुख को जब कभी प्रस्तुत करता है तो वह कभी कहता है कि मैंने मैं शैली अपनाई तो यह मैं शैली में जो कविता प्रस्तुत की गई वह विषई गत है महादेवी के गीत देख लीजिए उनमें नीचे सुख-दुख की अभिव्यक्ति है उनके वेदना परख गीत जो है वह विषयीगत साहित्य के अंतर्गत आ जाते हैं
    और दूसरा है विषयगत साहित्य है जिसे ऑब्जेक्टिव स्ट्रेचर कहा जाता है जिसमें कभी अपनी अनुभूति को निजी अनुभूति को किसी पात्र के माध्यम से किसी पात्र की कल्पना करके जीवन का जो सामान्य वर्णन करता है जो सामान्य जीवन की अनुभूतियां है उसको वह चित्रित करता है अपने मेरे साथ यह वह अपने यह मेरे साथ ही हुआ उसको वह किसी पात्र के माध्यम से किसी पात्र की कल्पना करके जीवन का सामान्य विवरण करता है नीचे अनुभूति को करके वह जीवन का सामान्य वर्णन करता है अपने मेरे साथ यह हुआ मैंने यह किया अपनी वेदना को अभिव्यक्त ना करके वह अपने अनुभव को पात्रों के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान करता है तो विषय गत साहित्य कहलाता है एक्टिव लिटरेचर कहलाता है कहलाता है
    तो इस तरह से हमने जो काव्य की जो भेद थे उसका एक जो आधार था, एक और वर्गीकरण है- शैली बद्ध के आधार पर। इस दृष्टि से काव्य के वही दो भेद हैं जो हमने पद्य के किए थे- एक प्रबंध और मुक्तक। शैली बद्ध की दृष्टि से भी काव्य के यही दो भेद माने जाते हैं- प्रबंध काव्य और मुक्तक काव्य प्रबंध जिसमें एक कथा होती है कहानी होती है जो प्रारंभ से लेकर अंत तक चलती है जिसके किसी भी एक अंश को निकाला नहीं जा सकता और यह प्रबंधआत्मा केवल पद्य में नहीं बल्कि गद्य में भी होती है जैसे उपन्यास कहानी है। उपन्यास या कहानी का पूूर्वआपर संबंध होता है उपन्यास जुड़ा हुआ या बंधा हुआ होता है और उस में से किसी एक अंश को निकाल कर उसको अलग नहीं कर सकते। कहानी अलग विधा है। कहानी एक स्वतंत्र विधा है। उपन्यास भी एक स्वतंत्र विधा है। उपन्यास में जो भी विषय लिया गया है उस विषय का विस्तार से वर्णन रहता है और उसकी कोई सीमा नहीं होती वह 500 पृष्ठ का भी सकता है , 800 का भी हो सकता है सो पृष्ठ का भी हो सकता है, कितने पृष्ठ हो सकते हैं तो शैली बंध की दृष्टि से गद्य में उपन्यास कहानी और निबंध आदि आते हैं और पद्य की दृष्टि से देखें तो प्रबंध में महाकाव्य और खंडकाव्य आ जाते हैं और दूसरा उसका भेद है मुक्तक और इसी तरह से आधुनिक कविता में हम देखते हैं कि गीत, नव गीत कविता यह भी मुक्तक भेद कहलाते हैं। इसमें प्रत्येक गीत स्वतंत्र होता है प्रत्येक गीत में किसी एक भाव विशेष को लिया जाता है और उसका विशेष की एक मार्मिक अभिव्यंजना प्रस्तुत की जाती है कभी की जो अनुभूति है उस पूरे गीत में सिमट कर रह जाते गीत अपने आप में स्वतंत्र होता है महादेव के गीत देख लीजिए बालकृष्ण शर्मा नवीन के, दिनकर ने स्वतंत्र रूप से लिखें , रश्मिरथी खंड काव्य की रचना की। इस तरह से हम काव्य रूपो का विभाजन कर सकते हैं।

    नाट्य साहित्य की परम्परा

     नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...