द्विवेदी युग के काव्य और उसकी विशेषताएं
भारतेंदु युग आधुनिक काल के साहित्य का प्रवेश द्वार है और द्विवेदी युग हिंदी साहित्य के विकास का मार्ग है। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस युग के प्रमुख साहित्यकार हैं। इस युग में जो नई चेतना जागृत हुई उसका श्रेय महावीरप्रसाद द्विवेदी को जाता है। द्विवेदी जी ने निबंध, कविता, आलोचना के क्षेत्र में साहित्यकारों का मार्गदर्शन किया। भाषा की दृष्टि से भी इस युग में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। इसका श्रेय भी महावीरप्रसादद्विवेदी को ही जाता है। अब काव्य खड़ी बोली में लिखा जाने लगा । इस प्रकार कविता, निबंध, आलोचना, नाटक, कहानी, उपन्यास आदि सभी विधाओं में खड़ी बोली का प्रयोग किया जाने लगा। भाव, भाषण और विषय की दृष्टि से इस युग के साहित्य में विविधता दिखाई देती है । इसकी प्रमुख काव्य प्रवृत्तियां इस प्रकार है - राष्ट्रीय भावना, आदर्शवादिता, इतिवृत्तात्मकता, सामाजिक सुधार का प्रयत्न, धार्मिक रूढ़ियों का विरोध तथा धर्म के प्रति नए विचार उत्पन्न करना, प्रकृति चित्रण, स्वच्छंदता, भाषा सुधार, काव्य के विविध रूप आदि।
राष्ट्रीय भावना
भारतेंदुकालीन साहित्य में जो राष्ट्रीय भाव धारा उत्पन्न हुई थी वह द्विवेदी युग में और अधिक प्रवाहित होने लगी। भारतेंदु युग के कवियों की राष्ट्रीय भावना वेशभूषा और भोजन तक सीमित थी, उसमें निराशा का भाव अधिक था। लेकिन द्विवेदी युग के कवियों की राष्ट्रीय भावना और देश प्रेम को भारत के अतीत गौरव से अधिक बल मिला। इन कवियों के विचार में भारतीय संस्कृति महान है। उन्होंने भारत के अतीत को गौरव मानकर देश प्रेम की भावना को जागृत किया। जातीय आदर्शों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय आदर्शों को ग्रहण कर भारत की अखंडता और उसकी स्वतंत्रता को पाने और सुरक्षित रखने के लिए इन कवियों ने भारत की जनता में अपने काव्य के द्वारा साहस और उत्साह का संचार किया। इस युग के कवियों में गिरधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, गोपाल शरण सिंह, मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय, सियारामशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी आदि शामिल हैं। इस युग के प्रायः सभी कवियों ने मातृभूमि के प्रति हृदय का सच्चा प्रेम प्रकट किया। इन्होंने देश की वर्तमान दुर्दशा तथा स्वर्णिम अतीत को अपने काव्य में चित्रित करके देश की उन्नति के प्रति अपना दृढ़ विश्वास प्रकट किया।
आदर्शवादिता
द्विवेदी युग का साहित्य प्राचीन आदर्शों से युक्त है। सुधार और आदर्श की भावना के कारण ही इस युग के कवियों ने श्रंगार भावना को भी संयम के साथ चित्रित किया है। ये कवि सौंदर्य को अधिक महत्व नहीं देते। इनका उद्देश्य तो समाज का उत्थान करना ही है। इन्होंने सत्यम शिवम सुंदरम में से सत्यम और शिवम को अधिक महत्व दिया। यह काव्य नैतिक उत्थान का संदेश देता है और इसलिए कहीं कहीं इस काल का काव्य नीरस तथा शुष्क प्रतीत होता है।
इतिवृत्तात्मकता
आदर्श की स्थापना को लक्ष्य बनाने वाले इन कवियों में काव्य में इतिवृत्तात्मक शैली के दर्शन होते हैं। यह काव्य वर्णन प्रधान है। यह शैली नैतिकता और आदर्श की प्रतिष्ठा के लिए अत्यंत उपयुक्त भी है। इस काल में अनेक पौराणिक कथाओं को लेकर काव्य की रचना की गई। इसलिए इतिवृत्तात्मक शैली को इस युग में प्रधानता मिली। इस काव्य में कल्पना और अनुभूति की गहराई कम है। इस काल की रचनाओं में रचनात्मकता तथा कोमल कांत पदावली का अभाव है जिसके परिणाम स्वरूप छायावादी काव्य का जन्म हुआ।
सामाजिक सुधार का प्रयत्न
संत कवियों के समान भारतेंदु व द्विवेदी काल के कवियों ने भी समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए अपनी रचनाएं लिखी। अनमेल विवाह, बाल विवाह, विधवा विवाह, दहेज प्रथा, अंधविश्वास, धार्मिक रूढ़ियाँ आदि का इन कवियों ने काव्य के माध्यम से विरोध भी किया है। इन कवियों ने समाज की सर्वांग उन्नति को लक्ष्य बनाकर अपने विचार प्रकट किए। धार्मिक रूढ़ियों का विरोध
द्विवेदी युग के कवियों की धार्मिक चेतना भी पर्याप्त उदार और व्यापक है। इन्होंने केवल ईश्वर का गुणगान ही नहीं किया बल्कि अपने आराध्य राम व कृष्ण में मानवता के आदर्शों की प्रतिष्ठा भी की। विश्व प्रेम तथा जनसेवा इस युग की धार्मिक भावना का मुख्य अंग है। गोपाल शरण सिंह नेपाली कहते हैं- जग की सेवा करना ही बस है सब सारों का सार
विश्व प्रेम के बंधन ही में मुझको मिला मुक्ति का द्वार
प्रकृति चित्रण
द्विवेदी युग के कवियों ने अपने काव्य में प्रकृति चित्रण भी किया है। इनकी रचनाओं में प्रकृति को आलंबन, मानवीकरण तथा उद्दीपन आदि रूप में चित्रित किया गया है। श्रीधर पाठक कश्मीर के प्रकृति सौंदर्य का चित्रण करते हुए कहते हैं
प्राचीन रूढ़ियों को तोड़कर नई शैली में, नए काव्य विषय को साथ लेकर जो साहित्य रचना की गई उसे स्वच्छंदतावाद कहा जा सकता है। यद्यपि छायावादी युग में स्वच्छंदतावाद का पूर्ण स्वरूप दिखाई देता है। फिर भी इस युग के श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी में स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। भाषा सुधार
खड़ी बोली को काव्य भाषा के रूप में स्वीकार किए जाने के बाद द्विवेदी युग के कवियों ने खड़ी बोली में सुधार और परिष्कार करके उसे काव्य के योग्य बनाया। द्विवेदी जी ने सरस्वती नामक पत्रिका का संपादन करके अपने समय के कवियों का ध्यान भाषा की व्याकरण की ओर खींचा। द्विवेदी जी के अथक प्रयासों से काव्य भाषा में सजीवता उत्पन्न हुई तथा सरसता, मधुरता और प्रौढ़ता लाने का पूरा प्रयत्न किया गया। मैथिलीशरण गुप्त ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है।
काव्य के विविध रूप
इस युग में प्रबंध और मुक्तक दोनों ही प्रकार के काव्य लिखे गए । लेकिन प्रबंध काव्य की रचनाओं में इन कवियों को अधिक सफलता मिली। प्रियप्रवास, वैदेही वनवास, साकेत, रामचरित चिंतामणि इस काल के प्रसिद्ध महाकाव्य हैं। तथा जयद्रथ वध, पंचवटी, पथिक, स्वप्न आदि खंडकाव्य भी इसी काल में लिखे गए। मुक्तक रचनाएं भी लिखी गई। उपरोक्त सभी विशेषताओं के कारण द्विवेदी युग का आधुनिक हिंदी साहित्य में अपना विशेष महत्व है। कवियों ने इस युग के काव्य में आदर्शवाद की स्थापना करके एक महान कार्य किया है।
भारतेंदु युग आधुनिक काल के साहित्य का प्रवेश द्वार है और द्विवेदी युग हिंदी साहित्य के विकास का मार्ग है। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस युग के प्रमुख साहित्यकार हैं। इस युग में जो नई चेतना जागृत हुई उसका श्रेय महावीरप्रसाद द्विवेदी को जाता है। द्विवेदी जी ने निबंध, कविता, आलोचना के क्षेत्र में साहित्यकारों का मार्गदर्शन किया। भाषा की दृष्टि से भी इस युग में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। इसका श्रेय भी महावीरप्रसादद्विवेदी को ही जाता है। अब काव्य खड़ी बोली में लिखा जाने लगा । इस प्रकार कविता, निबंध, आलोचना, नाटक, कहानी, उपन्यास आदि सभी विधाओं में खड़ी बोली का प्रयोग किया जाने लगा। भाव, भाषण और विषय की दृष्टि से इस युग के साहित्य में विविधता दिखाई देती है । इसकी प्रमुख काव्य प्रवृत्तियां इस प्रकार है - राष्ट्रीय भावना, आदर्शवादिता, इतिवृत्तात्मकता, सामाजिक सुधार का प्रयत्न, धार्मिक रूढ़ियों का विरोध तथा धर्म के प्रति नए विचार उत्पन्न करना, प्रकृति चित्रण, स्वच्छंदता, भाषा सुधार, काव्य के विविध रूप आदि।
राष्ट्रीय भावना
भारतेंदुकालीन साहित्य में जो राष्ट्रीय भाव धारा उत्पन्न हुई थी वह द्विवेदी युग में और अधिक प्रवाहित होने लगी। भारतेंदु युग के कवियों की राष्ट्रीय भावना वेशभूषा और भोजन तक सीमित थी, उसमें निराशा का भाव अधिक था। लेकिन द्विवेदी युग के कवियों की राष्ट्रीय भावना और देश प्रेम को भारत के अतीत गौरव से अधिक बल मिला। इन कवियों के विचार में भारतीय संस्कृति महान है। उन्होंने भारत के अतीत को गौरव मानकर देश प्रेम की भावना को जागृत किया। जातीय आदर्शों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय आदर्शों को ग्रहण कर भारत की अखंडता और उसकी स्वतंत्रता को पाने और सुरक्षित रखने के लिए इन कवियों ने भारत की जनता में अपने काव्य के द्वारा साहस और उत्साह का संचार किया। इस युग के कवियों में गिरधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, गोपाल शरण सिंह, मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय, सियारामशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी आदि शामिल हैं। इस युग के प्रायः सभी कवियों ने मातृभूमि के प्रति हृदय का सच्चा प्रेम प्रकट किया। इन्होंने देश की वर्तमान दुर्दशा तथा स्वर्णिम अतीत को अपने काव्य में चित्रित करके देश की उन्नति के प्रति अपना दृढ़ विश्वास प्रकट किया।
आदर्शवादिता
द्विवेदी युग का साहित्य प्राचीन आदर्शों से युक्त है। सुधार और आदर्श की भावना के कारण ही इस युग के कवियों ने श्रंगार भावना को भी संयम के साथ चित्रित किया है। ये कवि सौंदर्य को अधिक महत्व नहीं देते। इनका उद्देश्य तो समाज का उत्थान करना ही है। इन्होंने सत्यम शिवम सुंदरम में से सत्यम और शिवम को अधिक महत्व दिया। यह काव्य नैतिक उत्थान का संदेश देता है और इसलिए कहीं कहीं इस काल का काव्य नीरस तथा शुष्क प्रतीत होता है।
इतिवृत्तात्मकता
आदर्श की स्थापना को लक्ष्य बनाने वाले इन कवियों में काव्य में इतिवृत्तात्मक शैली के दर्शन होते हैं। यह काव्य वर्णन प्रधान है। यह शैली नैतिकता और आदर्श की प्रतिष्ठा के लिए अत्यंत उपयुक्त भी है। इस काल में अनेक पौराणिक कथाओं को लेकर काव्य की रचना की गई। इसलिए इतिवृत्तात्मक शैली को इस युग में प्रधानता मिली। इस काव्य में कल्पना और अनुभूति की गहराई कम है। इस काल की रचनाओं में रचनात्मकता तथा कोमल कांत पदावली का अभाव है जिसके परिणाम स्वरूप छायावादी काव्य का जन्म हुआ।
सामाजिक सुधार का प्रयत्न
संत कवियों के समान भारतेंदु व द्विवेदी काल के कवियों ने भी समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए अपनी रचनाएं लिखी। अनमेल विवाह, बाल विवाह, विधवा विवाह, दहेज प्रथा, अंधविश्वास, धार्मिक रूढ़ियाँ आदि का इन कवियों ने काव्य के माध्यम से विरोध भी किया है। इन कवियों ने समाज की सर्वांग उन्नति को लक्ष्य बनाकर अपने विचार प्रकट किए। धार्मिक रूढ़ियों का विरोध
द्विवेदी युग के कवियों की धार्मिक चेतना भी पर्याप्त उदार और व्यापक है। इन्होंने केवल ईश्वर का गुणगान ही नहीं किया बल्कि अपने आराध्य राम व कृष्ण में मानवता के आदर्शों की प्रतिष्ठा भी की। विश्व प्रेम तथा जनसेवा इस युग की धार्मिक भावना का मुख्य अंग है। गोपाल शरण सिंह नेपाली कहते हैं- जग की सेवा करना ही बस है सब सारों का सार
विश्व प्रेम के बंधन ही में मुझको मिला मुक्ति का द्वार
प्रकृति चित्रण
द्विवेदी युग के कवियों ने अपने काव्य में प्रकृति चित्रण भी किया है। इनकी रचनाओं में प्रकृति को आलंबन, मानवीकरण तथा उद्दीपन आदि रूप में चित्रित किया गया है। श्रीधर पाठक कश्मीर के प्रकृति सौंदर्य का चित्रण करते हुए कहते हैं
प्रकृति जहां एकांत बैठी बिन रूप संवारती,
पल-पल पलटती भेष क्षणिक छवि दिन-दिन धारती।
श्री रामनरेश त्रिपाठी के पथिक और स्वप्न तथा हरिऔध के प्रियप्रवास में तथा मैथिलीशरण गुप्त के साकेत व पंचवटी में भी प्रकृति के विविध चित्र अंकित किए गए हैं।
स्वच्छंदतावादप्राचीन रूढ़ियों को तोड़कर नई शैली में, नए काव्य विषय को साथ लेकर जो साहित्य रचना की गई उसे स्वच्छंदतावाद कहा जा सकता है। यद्यपि छायावादी युग में स्वच्छंदतावाद का पूर्ण स्वरूप दिखाई देता है। फिर भी इस युग के श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी में स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। भाषा सुधार
खड़ी बोली को काव्य भाषा के रूप में स्वीकार किए जाने के बाद द्विवेदी युग के कवियों ने खड़ी बोली में सुधार और परिष्कार करके उसे काव्य के योग्य बनाया। द्विवेदी जी ने सरस्वती नामक पत्रिका का संपादन करके अपने समय के कवियों का ध्यान भाषा की व्याकरण की ओर खींचा। द्विवेदी जी के अथक प्रयासों से काव्य भाषा में सजीवता उत्पन्न हुई तथा सरसता, मधुरता और प्रौढ़ता लाने का पूरा प्रयत्न किया गया। मैथिलीशरण गुप्त ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है।
काव्य के विविध रूप
इस युग में प्रबंध और मुक्तक दोनों ही प्रकार के काव्य लिखे गए । लेकिन प्रबंध काव्य की रचनाओं में इन कवियों को अधिक सफलता मिली। प्रियप्रवास, वैदेही वनवास, साकेत, रामचरित चिंतामणि इस काल के प्रसिद्ध महाकाव्य हैं। तथा जयद्रथ वध, पंचवटी, पथिक, स्वप्न आदि खंडकाव्य भी इसी काल में लिखे गए। मुक्तक रचनाएं भी लिखी गई। उपरोक्त सभी विशेषताओं के कारण द्विवेदी युग का आधुनिक हिंदी साहित्य में अपना विशेष महत्व है। कवियों ने इस युग के काव्य में आदर्शवाद की स्थापना करके एक महान कार्य किया है।