हिंदसा

शनिवार, 25 जुलाई 2015

जीवन की डगर

जीवन की डगर 

हमारा जीवन कभी एक जैसा नहीं रह सकता। जीवन में हमेशा अपने मन की चाही हो जाए, यह कदापि नहीं हो सकता।  जीनव में सुख-दुःख या उतार-चढ़ाव के पल तो आसमान में निरंतर आते-जाते रहने वाले बादलों की तरह होते हैं। देखा जाए तो सुख-दुःख  हमारी क्रियाओं की प्रतिक्रियाओं का नाम है।  जीवन में किसी कार्य के करने से हमें सुख मिल जाता है, तो किसी कार्य को करने से दुःख। लेकिन जब हमें सुख मिलता है तो हम उसका ज्यादा हिसाब-किताब नहीं लगाते और अगर लगाते भी हैं तो उसका पूरा श्रेय अपनी सूझ-बुझ को देते हैं या फिर अपनी अच्छी किस्मत को, लेकिन अगर दुःख  मिलता है तो उसका पूरा हिसाब-किताब लगाया जाता है, उसके लिए अक्सर हम अपने-आप को दोषी कम ही ठहराते हैं और उस दुःख के पैदा होने का दोष हम अपनी फूटी किस्मत को देते हैं या फिर हम अपने किसी निकटतम व्यक्ति को उस दुख का कारण  मान लेते हैं, और अगर कोई भी कारण न मिले तो अंत में पूरा ठीकरा भगवान के सिर पर फोड़ देते है और हम कह देते हैं कि शायद भगवान को यही मंजूर था।.... ऐसा करना मनुष्य का स्वभाव है,  क्योंकि शायद ऐसा करके ही व्यक्ति बड़ी से बड़ी मुसीबत को भी झेल जाता है।  लेकिन विज्ञान की माने तो प्रत्येक कार्य (सुख- दुःख) के पीछे कोई न कोई कारण (हमारा कर्म) अवश्य होता है अर्थात हमने कुछ न कुछ ऐसा  कार्य अवश्य किया था जिससे वो सुख या दुःख पैदा हुआ।
              ये भी सत्य है कि सुख-दुःख की कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती। सुख-दुख हमारे मानने से छोटा-बड़ा होता है। अर्थात कौन, किस छोटी-सी बात को, दुःख मान ले और कौन बड़ी बात को भी दुःख न मान, हंसी में टालकर तनावमुक्त हो जाये, कहा नहीं जा सकता। सही भी है क्योंकि ये जीवन बहुत छोटा है इसलिए हमें सकारात्मक सोच के साथ और सुख की कामना के साथ जीने की कोशिश करनी चाहिए। वर्त्तमान में, आज में, बल्कि इसी एक पल में रहिये, जो मिला है, जैसा मिला है, उसी से संतुष्ट हो जाइये, परेशानी में भी धर्य न खो कर अच्छे समय का इंतजार करना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन को यदि हम नदी के सहज प्रवाह या बहाव की तरह जीवन मे भी कुछ ज्यादा गुना-भाग किये बिना ही बस जीवन की सहज  दिशा में, जिधर वो लेकर जाए बस चलते चले जाए तो जीवन सरल बन जाता है, वरना जीवन की डगर बड़ी कठिन है।


बुधवार, 22 जुलाई 2015

काव्य प्रयोजन या साहित्य का उद्देश्य (संक्षेप में)

                          काव्य प्रयोजन या साहित्य का उद्देश्य  (संक्षेप में)
साहित्य या काव्य की परिभाषा-
१.केवल शब्द और अर्थ का सामंजस्य ही काव्य नहीं है, भावों की अभिव्यक्ति के साथ लोकहित की भावना का होना भी काव्य के लिए आवश्यक है |
२.भारत में निष्काम कर्म की भावना पर बल दिया जाता है, लेकिन संसार का प्रत्येक कार्य किसी ने किसी उद्देश्य से किया जाता है, वह किसी न किसी कर्म से संबंधित होता है, इसलिए काव्य की रचना भी  निष्प्रयोजन नहीं होनी चाहिए। इसी कर्म को महत्त्व देते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है-
 "केवल मनोरंजन ही न कवि  का कर्म होना चाहिए,
 उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए|"
३.विभिन्न साहित्य विधाओं के माध्यम से साहित्यकार अपने भावों, उद्देश्यों को संप्रेषित करता है|  काव्य का  एक यह भी प्रयोजन होता है|
४. काव्य का मूल उद्देश्य क्या है? इस संबंध में संस्कृत आचार्य, हिंदी के कवि, हिंदी के आलोचक और पाश्चात्य समीक्षकों ने काव्य प्रयोजन के संबंध में अपने मत व्यक्त किए हैं|
सबसे पहले हम संस्कृत आचार्यों के मतों को देखते हैं, जिसमें भामह ,भरत, रूद्रट,वामन, कुंतक, मम्मट आदि आचार्य आते हैं | देखा जाए तो इन सब ने काव्य का प्रयोजन- यश, अर्थ, व्यवहार ज्ञान, लोकमंगल की भावना, कांता सम्मित उपदेश और आनंद प्राप्ति  को  माना है |
अब हम इन पर बारी-बारी से बात करते हैं-
यश- 
हर व्यक्ति को कीर्ति या यश की अभिलाषा  होती है| सूर ,तुलसी, मीरा, जायसी इसके उदाहरण हैं|
अर्थ-
जीवन जीने के लिए  अर्थ का बहुत महत्त्व होता है | बिहारी को प्रति दोहा एक अशर्फी  मिलती थी| प्रसिद्ध उपन्यासकार स्कॉट ने ऋण चुकाने के लिए उपन्यासों की रचना की|  प्रत्येक वर्ष  साहित्यकारों को अनेक अकादमिक और गैर अकादमिक संस्थाओं द्वारा  मंगला पारितोषिक पुरस्कार या डालमिया पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार,  ज्ञानपीठ पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कार या सम्मान राशि दी जाती है , पुरस्कार या सम्मान राशि आदि  यह सब  योजनाएं इसी मूल प्रयोजन की ओर संकेत करती हैं|
व्यवहार ज्ञान-
व्यवहार ज्ञान अर्थात अच्छा आचरण भी काव्य का प्रयोजन माना गया है| संस्कृत आचार्यों के अनुसार  महान पुस्तकों से ही सदाचरण की प्रेरणा मिलती है|
शिव की भावना अर्थात जनकल्याण की भावना-
यह भी काव्य का एक उद्देश्य है| प्राचीन कवि रोगों से मुक्ति के लिए काव्य रचना करते थे| समाज कल्याण हेतु भी कवि साहित्य रचना करता है|
कांता सम्मित उपदेश -
काव्य पढ़ने से हृदय पर जो प्रभाव-विशेष पड़ता है, इससे हृदय को शांति मिलती है| जैसे  जीवन  सहचरी उचित समय पर अपने तर्क सम्मत उपदेश देकर जीवन को सही दिशा देती है |
अलौकिक आनंद की प्राप्ति-
काव्य के इस प्रयोजन  का समर्थन सभी आचार्यों ने किया है|
                         मूलतः काव्य के ये  छ: उद्देश्य या प्रयोजन हैं  जिसमें  से  कुछ  बाह्य प्रयोजन हैं और कुछ आंतरिक | जैसे - यश और अर्थ बाहरी  प्रयोजन है| जबकि  कांता सम्मित उपदेश  और अलौकिक आनंद की प्राप्ति आंतरिक प्रयोजन हैं|  इसके अतिरिक्त  व्यवहार ज्ञान व शिव की भावना समन्वयात्मक प्रयोजन हैं , अर्थात ये बाहरी और आंतरिक दोनों का समन्वित रूप हैं |
 हिंदी कवियों के विचार-
 'तुलसी- कीर्ति मनीति भली सोई
 सुरसरि सम सब हितकर होई |'
कहने का तात्पर्य यह है कि  तुलसीदास ने  रामचरितमानस  में  सुखांत  सुखाय  को काव्य का  प्रयोजन  माना है| अर्थात आनंद और लोकमंगल उनका काव्य प्रयोजन रहा है। जबकि  केशव ने अर्थ -प्राप्ति को काव्य का प्रयोजन स्वीकार किया है |
भिखारीदास के अनुसार - सूर और तुलसी की भांति कुछ कवि यश कमाने के लिए काव्य की रचना करते है,  कुछ  केशव और बिहारी की भांति धन कमाने के उद्देश्य से काव्य रचना करते हैं|
मैथिलीशरण गुप्त  ने  मनोरंजन और उपेदश-ज्ञान को महत्व दिया है।
दिनकर ने लिखा है - वसंत का गुलाब और कवि के स्वप्न किसी और के लिए नहीं होते | अत: इन्होंने भी आत्मिक आनंद पर प्रकाश डाला है|
रविंद्र नाथ ठाकुर- आत्मिक आनंद और उपदेश को महत्व देते हैं |
हिंदी आलोचकों के विचार-
आचार्य  रामचंद्र  शुक्ल ने कला का उद्देश्य मनोरंजन न मानकर आंतरिक आनद माना है|  इसके साथ उन्होंने  साहित्य प्रयोजन के रूप में लोकमंगल की भावना और आनंद तथा रस को भी स्वीकार किया है।
महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने साहित्य का उद्देश्य मानव जगत का कल्याण करना माना है|
डॉ. नगेंद्र ने  आत्माभिव्यक्ति मानते हैं|
नंददलारे वाजपेयी डॉ. नगेन्द्र का समर्थन करते हैं |
बाबू गुलाबराय ने सबका समन्वय करते हुए भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण से काव्य का प्रयोजन आध्यात्मिक आनंद माते हैं |।
पाश्चात्य विचारकों के मत -
 भारतवर्ष में जो काव्य शब्द का प्रयोग किया गया है, पाश्चात्य विचारको ने इसी काव्य को कला की संज्ञा दी है |पाश्चात्य मनीषियों ने काव्य प्रयोजन पर परोक्ष रूप में प्रकाश डाला है|
प्लेटो ने काव्य या कला के  प्रयोजन पर विचार करते हुए कहा है - 'कला का प्रयोजन आदर्श  सृष्टि की रचना करना है और इसके साथ रचनाकार का उद्देश्य पाठक को इतना विभोर कर देना है कि वह पूर्णत: उसमें लीन हो जाए| प्लेटो का मत भारतीय मनीषियों के निकट पहुंचता है अर्थात वह भी कला का प्रयोजन आनंद प्राप्ति को मानता है|
                       अब बात करते हैं अरस्तु की, अरस्तु ने कला का मुख्य उद्देश्य या प्रयोजन  आनंद प्राप्ति और गौण  प्रयोजन ज्ञानार्जन को माना है| वस्तुतः इन शब्दों के द्वारा पाठक और कवि दोनों का प्रयोजन सिद्ध कर दिया गया है|
फिलिप सिडनी ने भी काव्य का प्रयोजन शिक्षा और आनंद को माना है| उन्होंने कहा है with this and to teach and delight.
कॉलरिज और जॉनसन ने  कला का प्रयोजन आनंद प्राप्ति और  सत्य का अनुसंधान माना है |
टालस्टाय  ने कला का प्रयोजन अलौकिक आनंद की प्राप्ति और सत्य की उपलब्धि को माना है|
ब्रेडले ने माना है कि कला कला के लिए  है अर्थात कला का कोई और प्रयोजन नहीं होता
                                           इसका सबसे पहले प्रचार इंग्लैंड में हुआ | कला कला के लिए है अथवा अन्य किसी और के लिए इस बात को लेकर पाश्चात्य विचार ने अनेक मत प्रस्तुत किए हैं-
  • कला कला के लिए|
  • कला आनंद के लिए|
  • कला जीवन के लिए|
  • कला धन प्राप्ति के लिए|
  • कला आवश्यकता पूर्ति के लिए|
  • कला पलायन के लिए| पाश्चात्य आलोचकों के अनुसार कला जीवन को पलायनवादी बनाती है| इस संदर्भ में प्रसाद के काव्य का उदाहरण दिया जा सकता है| वे लिखते हैं- 'ले चल  मुझे भुलावा देकर, मेरे नाविक धीरे-धीरे |' लेकिन इसको  उचित नहीं माना जा सकता  है|
  • कला मनोरंजन के लिए|
  • कला आत्मानुभूति के लिए|
  • भारतीय संस्कृत आचार्यों ने जो मत प्रस्तुत किए हैं उन सब का मूल प्रयोजन आनंद प्राप्ति है| परोक्ष रूप से पाश्चात्य विचारको का भी यही मत है|
  • भारतीय मत गौण रूप से यश व धन  प्राप्ति को  प्रयोजन  मानता है,  पाश्चात्य आलोचकों ने कला जीवन के लिए कह दिया है |
भारतीयों ने  काव्य का प्रयोजन मनोरंजन कहा, पाश्चात्य ने मनोविनोद की संज्ञा दी है| आत्मानुभूति को  पाश्चात्य विचारको आत्माअनुभव माना है|  इस प्रकार  भारतीय आचार्यों और पाश्चात्य विचारकों के मत को देखा जाए तो दोनों में  केवल बाहरी आवरण में अंतर है, दोनों का  मूल प्रयोजन आनंद प्राप्ति ही है|
  • पाठकों का काव्य प्रयोजन क्या हो?  इस विषय में विद्वानों की लेखनी मौन रही है| सम्पूर्ण विवेचन के बात मूल रूप से बात करें तो  पाठक के दो उद्देश्य माने गए हैं -आनंद प्राप्ति और ज्ञान प्राप्ति| भारतीय व पाश्चात्य मनीषियों की परिभाषाओं के समन्वय से यह  ध्यातव्य है कि काव्य का मूल अभीष्ट आनंद प्राप्ति ही  है, यह आनंद प्राप्ति पाठक और कवि  दोनों के लिए ही है| इसी के कलेवर में इतर  प्रयोजनों की झांकी निहित है|  शुक्ल का 'कविता क्या है'  निबंध इस तथ्य का समर्थन करता है, उन्होंने काव्यानंद को ब्रह्मानंद सहोदर की उपाधि दी है।


बुधवार, 15 जुलाई 2015

एकांकी

एकांकी सामान्य परिचय
 एकांकी साधारणतया नाटक के उस रूप को कहते हैं जिसमें केवल एक ही अंक में संपूर्ण नाटक समाप्त हो जाता है या जो नाटक एक अंक का होता है उसे एकांकी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे वन एक्ट प्ले कहा गया है।
एकांकी का  उद्भव-
एकांकी के उद्भव को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं।कुछ का मानना है कि एकांकी पश्चिम या वैज्ञानिक युग की देन है तो कुछ का मानना है कि एकांकी का उद्भव संस्कृत नाट्य साहित्य से हुआ है। संस्कृत नाट्य साहित्य से एकांकी का उद्भव मानने वाले विद्वानों का तर्क है कि एक अंक का नाटक लिखने की परंपरा संस्कृत साहित्य में भी मिलती है। इनका मत है कि भास और भरत मुनि ने इसका आरंभ इससे बहुत पहले ही कर दिया था। संस्कृत साहित्य में भरतमुनि ने जो नाटक और उप नाटक के भेद बताए हैं उनमें सत्रह रूप (व्यायोग, प्रहसन, भाण, वीथि, नाटिका,  नाट्य रासक, प्रक्षेपण, उल्लाप्य,  काव्य, गोष्टी, सट्टक, श्रीगदित, विलासिता और अंक आदि ऐसे हैं जिनमें एक ही अंक है| इन सभी एकांकी रूपों का प्राचीन काल में अभिनय होता था। इससे सिद्ध होता है कि संस्कृत साहित्य में एकांकी की समृद्ध परंपरा थी। इस संबंध में डॉ राम चरण महेंद्र का मानना है, "संस्कृत एकांकियों की शिल्प विधि पर्याप्त जटिल थी और नाटककारों ने उपभेदों का अंतर स्पष्ट किया था। आधुनिक हिंदी एकांकी की सभी शैलियां थोड़े से परिवर्तन के साथ इन्हीं में समा सकती हैं।" इसी प्रकार सीताराम चतुर्वेदी एकांकी का उद्भव संस्कृत नाट्य साहित्य से तो मानते ही हैं इसके साथ ही उनका मानना है कि प्राचीन यूनान में भी छोटे प्रहसन लिखे गए थे। वे लिखते हैं, "भारतीय साहित्य में बोलपट के आविष्कार की प्रतिक्रिया के रूप में एकांकी नाटक की सृष्टि हुई। जिन्होंने संस्कृत साहित्य का अध्ययन नहीं किया है उनका यही विश्वास है कि एकांकी नाटक भी वैज्ञानिक आविष्कारों के समान ही बीसवीं शताब्दी की देन है, किंतु एकांकी नाटकों का आरंभ ईसा से बहुत पहले भास ने कर दिया था। जिसके मध्यम-व्यायोग को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। यूरोप में भी छोटे संबद्ध तथा कलात्मक नाटक कोई नए नहीं हैं। प्राचीन यूनान और इतालिया में छोटे प्रहसन पंद्रहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी तक कीमीदियादे लारते के नाम से इतालिया में तथा दूसरे यूरोपीय देशों में प्रचलित थे।"
भारतीय संस्कृत साहित्य में एकांकी के आरंभिक रूप की बात करने के बाद यह देखना भी आवश्यक है कि पाश्चात्य साहित्य में एकांकी का स्वरूप कैसा था? पश्चिम में एकांकियों का उद्भव कर्टेन रेजर (curtain Raiser) या आफ्टर पीसेज़(after Piecess) के रूप में हुआ था। इन रूपों की तुलना संस्कृत के एकांकी रूपों से नहीं की जा सकती, क्योंकि कर्टेन रेजर या आफ्टर पीसेज 18वीं और 19वीं शताब्दी में इंग्लैंड के प्रेक्षागृह में मुख्य एकांकी नाटक के आरंभ होने से पहले जल्दी या समय पर आ जाने वाले दर्शकों का समय बिताने के लिए खेले जाते थे। इनका मूल उद्देश्य मनोरंजन के द्वारा दर्शकों को कुछ समय तक बिठाए रखना मात्र था, पहले इन्हें साहित्य में स्थान नहीं मिला था। इनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना जाता था और यह अधिकतर संस्कृत के भाण और प्रसहन से मिलते जुलते होते थे। आगे चलकर इन एकांकियों को दर्शकों ने इतना अधिक पसंद किया कि एकांकी कला ने अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व बना लिया और एक अंक वाले इन नाटकों को एक अंक का होने के कारण वन एक्ट प्ले कहा जाने लगा।
       इसके अतिरिक्त एकांकी के संदर्भ में कहा जाता है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में लंदन के एक प्रसिद्ध प्रेक्षागृह में एक मनोरंजक घटना घटी। माना जाता है कि इस घटना से ही एकांकी विधा के स्वतंत्र अस्तित्व का आरंभ हुआ। हुआ यह कि वहां कर्टन रेजर के रूप में भी द मंकीज पां (बंदर का पंजा) का अभिनय किया गया। यह इतना प्रभावशाली सिद्ध हुआ कि दर्शक मुख्य नाटक को बिना देखे ही उठकर चले गए। इसके प्रभावफलस्वरूप एकांकी नाटक जनता में इतने लोकप्रिय हो गए कि उसके बाद उन्हें साहित्य की एक स्वतंत्र विधा मान लिया गया। इन सभी बातों से यह सिद्ध होता है की पूर्व और पश्चिम दोनों नाट्य साहित्य में एकांकी के निकटतम रूप मिलते हैं। बावजूद इसके बीसवीं शताब्दी में एकांकी का जो स्वरूप, विषय, उद्देश्य, या शिल्प मिलता है, उसमें पहले से अर्थात आरम्भिक एकांकी से देखा जाए तो बहुत परिवर्तन आया है।  और इस दृष्टि से वह परंपरागत एकांकी  भिन्न है। इस परिवर्तन को देखते हुए ही उस पर पश्चिम के प्रभाव की बात की जाती है।
एकांकी  की परिभाषाएं-
एकांकी के स्वरूप को लेकर भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने अपने अपने मत के अनुसार एकांकी की परिभाषा दी हैं।
भारतीय विद्वानों की परिभाषाएं-
भारतीय विद्वान डॉ उदय शंकर भट्ट लिखते हैं- "एकांकी नाटक में जीवन का एक अंश, परिवर्तन का एक क्षण,  सभी प्रकार के वातावरण से प्रेरित लेखकों का,  दिन में एक घंटे की तरह, मेघ में बिजली की तरह, बसंत में फूल के हास की तरह होती है।" दशरथ ओझा ने एकांकी के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखा है- "जो नाटक एक ही अंक में समाप्त होने वाला, एक सुनिश्चित लक्ष्य वाला, एक ही घटना, एक ही परिस्थिति और  एक ही समस्या वाला हो, जिसके कथानक में कौतूहल और वेग, गति में विद्युत-सी वक्रता और तेजी, विकास में एकाग्रता और आकस्मिकता के साथ चरम सीमा तक पहुंचाने की व्यग्रता हो और जिसका पर्यवसान चरम सीमा पर ही प्रभाव की तीव्रता के साथ हो जाता हो, जिसमें प्रासंगिक कथाओं का प्रायः निषेध, घटनाओं की विविधता का निवारण तथा चारित्रिक प्रस्फुटन में आदि, मध्य और अवसान का वर्जन हो, उसे एकांकी कहना चाहिए।"
पाश्चात्य विद्वानों की परिभाषाएं-
       पाश्चात्य विद्वान सिडनी बॉक्स ने 'टेक्निक ऑफ वन एक्ट प्ले' में लिखा है-  "एकांकी का स्वरूप ऐसा नहीं होता जिसमें चरित्र चित्रण की सूक्ष्मताओं को महत्व दिया जा सके। एकांकी साहित्य की वह नियंत्रित और संयमित विधा है जिससे एक ही घटना को इस प्रकार अभिव्यक्त किया जाता है कि उनके प्रभाव एक्य से पाठकों और दर्शकों का मन आकृष्ट और आक्रांत हो उठता है।"  पश्चिम के अन्य विद्वानों ने नाटक की ही भांति एकांकी में भी संघर्ष को भी महत्व दिया है। वह एकांकी में संघर्ष की प्रधानता को स्थान देते हैं। क्योंकि संघर्ष उनकी दृष्टि में सभी नाटकों का प्राण है।
           उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि एकांकी का नाटक से संबंध है। लेकिन वह एक सर्वथा स्वतंत्र विधा भी है। वह समाज के एक खंड का प्रभावशाली चित्र अंकित करती है। एकांकी का निर्माण एक निश्चित लक्ष्य, विचार या समस्या का विवेचन करने के निमित्त, एक ही महत्वपूर्ण घटना या परिस्थिति द्वारा किया जाता है। यह उसी घटना, परिस्थिति या विषय से आरंभ होकर पूर्ण विकास को प्राप्त होती है। इसमें एक ही घटना विस्तार पाकर दर्शकों को प्रभावित करती है।  एकांकी का उद्देश्य गंभीर, हास्यजनक, करूण आदि किसी भी प्रकार का हो सकता है। वह चरित्र प्रधान भी हो सकती है और विषय प्रधान भी हो सकती है। विषय का चयन करते समय लेखक को संक्षिप्तता का अवश्य ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि एकांकीकार के पास समय की कमी होती है। इसलिए इसमें कथा का अनावश्यक विस्तार नहीं किया जाता।
एकांकी के तत्त्व-
नाटक की तरह एकांकी के भी मूल रूप से सात तत्व होते हैं। कथानक, पात्र एवं चरित्र चित्रण, संवाद, उद्देश्य, देश काल और वातावरण, भाषा शैली और रंग संकेत या अभिनय। देखा जाए तो कथा, संवाद और दृश्य विधान के अंतर्गत सभी तत्व आ जाते हैं। डॉक्टर रामगोपाल चौहान ने इन तत्वों का निर्धारण निम्न प्रकार से किया है- पहला है- कथा। कथा के अंतर्गत वे तीन तत्व को शामिल करते हैं- कथा, चरित्र चित्रण और तीसरा उद्देश्य। इसी तरह दूसरा है- संवाद। संवाद में वे संवाद और भाषा शैली दोनों को शामिल करते हैं। और तीसरा है- दृश्य विधान। इसमें वे अर्थात दृश्य विधान में वातावरण सृजन, देशकाल और रंग निर्देश को शामिल करते हैं।
एकांकी की विशेषताएं-
अन्य साहित्यिक विधाओं की तरह एकांकी की भी अपनी विशेषताएं होती हैं। उन विशेषताओं के कारण ही उसका स्वतंत्र अस्तित्व माना जाता है या होता है।  एकांकी की भी अपनी कुछ विशेषताएं हैं जैसे-
1. एकांकी में केवल आधार रूप से एक ही अंक होना चाहिए।2. एक ही मुख्य घटना या जीवन की एक मुख्य संवेदना होनी चाहिए जिसका विकास कोतुहल और जिज्ञासा पूर्ण नाटकीय शैली में होना चाहिए।
3. चरम सीमा पर पहुंचकर एकांकी का अंत होना चाहिए।
4. एकांकी में घटनाओं का चुनाव दैनिक जीवन से हो तथा उसमें यथार्थवाद एवं मनोरंजन के तत्वों का उचित समावेश होना चाहिए।
5. संघर्ष एकांकी का प्राण होता है इसकी अभिव्यंजना का आधार मनोविज्ञान रहना चाहिए।
6. स्वाभाविक यथार्थवादी चित्रण होना चाहिए।
7. संवाद संक्षिप्त, प्रभावी और प्रवाहमय होने चाहिए।
8. एकांकी रंगमंच के गुणों से युक्त होनी चाहिए।
9. एकांकी के कथानक में कौतूहल तथा जिज्ञासा अंत तक बनी रहनी चाहिए।
10. कला पक्ष में एकांकी की स्वाभाविकता और जीवन से निकटता बनाए रखने के लिए संकलनत्रय (थ्री यूनिट्स) का कठोरता से पालन होना चाहिए। एकांकी का आकार छोटा रहे, और अवधि कम रहे, यही अच्छा माना जाता है। उसमें पात्रों के चरित्र अथवा घटना को संक्षेप में प्रकट कर देने की क्षमता होनी चाहिए।
एकांकी के भेद-
रचना- प्रकार या तकनीक के आधार पर- मोनोड्रामा, रेडियो प्ले, फीचर, गीतिनाट्य, ओपेरा, झांकी आदि एकांकी के भेद माने जा सकते हैं।
मूल प्रवृत्ति के आधार पर- समस्या एकांकी, व्याख्यामूलक एकांकी,
विषय वस्तु के आधार पर- सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक, पौराणिक एकांकी आदि एकांकी के अनेक भेद किए जा सकते हैं।
संदेश की दृष्टि से- आदर्शवादी, यथार्थवादी, मनोरंजनवादी, और प्रकृतिवादी एकांकी भी मानी गई है।
रंगमंच है या अभिनेता की दृष्टि से- एकांकी को पठनीय एकांकी और रंगमंचीय एकांकी नामक दो भागों में बांटा जा सकता है।

नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...