हिंदसा

सोमवार, 30 मार्च 2020

पुष्प की अभिलाषा

   
                                     'पुष्प की अभिलाषा'
  
कमल राष्ट्रीय पुष्प क्यों है ...
चाह नहीं मैं सुरबाला के,
 गहनों में गूंथा जाऊं
चाह नहीं प्रेमी माला में,
 बिंद प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं सम्राटों के,
 शव पर हे हरि डाला जाऊं
 चाह नहीं देवों के सिर पर,
 चढ़ भाग्य पर इतराऊँ
 मुझे तोड़ लेना वनमाली,
    उस पथ पर तुम देना फेंक
                                                                            मातृभूमि पर शीश चढ़ाने ,
                                                                         जिस पथ पर जाएं वीर अनेक

                                                                                                                                  -माखनलाल चतुर्वेदी 

शब्दार्थ:            
चाह- चाहत या इच्छा , सुरबाला- सुंदर स्त्री ,अप्सरा |गूंथा- गूंथना या पिरोना |बिंध- बिंध कर या गूंथा जाकर|| सम्राट- राजा, महाराजा| शव -मृत शरीर, देव - देवता या भगवान या ईश्वर| वनमाली- बागची या फुलवारी की देखरेख करने वाला | पथ-रास्ता या मार्ग|   वीर- स्वाधीनता सेनानी|


                                 माखनलाल चतुर्वेदी की कविताओं का प्रतिपाद्य


माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय चेतना के कवि है , उनकी  रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना का स्वर प्रमुख रूप से मुखरित हुआ है| माखनलाल चतुर्वेदी की  रचनाओं ने क्रांति-कार्यकर्ताओं  और भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के मन में देशभक्ति का रंग भर दिया| इसी के चलते उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा|  उनकी  प्रसिद्ध 'पुष्प की अभिलाषा'  कविता देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत  कविता है जिसकी  पूरे भारतवर्ष के लोगों ने सराहना की है| पुष्प की अभिलाषा कविता उनकी अब तक की सबसे प्रसिद्ध रचना है| इस कविता का रचनाकाल इसके महत्व को उजागर करता है| ऐसे समय में जब हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों से भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ रहे थे, तब उन्होंने  भारत की जनता को लड़ाई में सहयोग देने के लिए इस कविता की रचना की गई थी| पुष्प की अभिलाषा कविता के माध्यम से कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने यह बताने की कोशिश की है कि कोई माली जब अपने बगीचे से फूल तोड़ने जाता है तो वह फूल से पूछता है कि तुम कहां जाना चाहते हो ? माला बनना चाहते हो या भगवान के चरणों में चढ़ाया जाना चाहते हो? तो फूल जवाब देता है कि मेरी इच्छा यह नहीं है कि मैं किसी सुंदर स्त्री के बालों का गजरा बन जाऊं, मुझे यह चाह  भी नहीं है कि मैं दो प्रेमियों के लिए माला बनूँ , मुझे यह भी चाह नहीं है कि किसी राजा के पार्थिव शरीर पर मुझे चढ़ाया जाए, मुझे यह भी इच्छा नहीं है कि भगवान पर मुझे चढ़ाया जाए और मैं अपने आप को भाग्यशाली समझू......  हे ! वनमाली तुम मुझे तोड़ कर उस राह में फेंक  देना जहां शूरवीर मातृभाषा की रक्षा के लिए अपना शीश चढ़ाने जा रहे हो| मैं उन वीरों के पैरों के नीचे आकर खुद पर  गर्व महसूस करूंगा|
 संभावित प्रश्न
 1 .माखनलाल चतुर्वेदी का साहित्यिक परिचय लिखिए |
2. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय चेतना के कवि है इस कथन पर विचार कीजिए या प्रकाश डालिए|
3.  पुष्प की अभिलाषा कविता का भावार्थ लिखिए |
4. पुष्प की अभिलाषा कविता में व्यक्त कवि के विचारों को व्यक्त कीजिए |
5.पुष्प की अभिलाषा कविता में फूलों की चाहत के माध्यम से कवि ने क्या संदेश दिया है?

शनिवार, 28 मार्च 2020

घनानंद पद 2


                                                                           घनानंद




प्रेम की पीर के कवि घनान्द

 रीतिमुक्त काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि हैं। इनकी कविता प्रेम और सौंदर्य की विरल कविताओं में से एक है। दरबारी कवि होते हुए भी घनानंद के प्रेम की असाधारणता और एकनिष्ठता चकित  कर देने वाली है। इसलिए इन्हें प्रेम की पीर का कवि कहा जाता है। अपने जीवन में इन्होंने जिस लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम और भक्ति को जीया था, उसकी अद्भुत छठा  इनकी कविता में देखी जा सकती है। रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें साक्षात रस मूर्ति कहां है । सुजान हित से लिया गए इस सवैया में यह अद्भुत छटा देखी जा सकती है-
रावरी रूप की रीति अनूप नयो नयो लागत ...................बावरी रीझ के हाथनि हारियै।
शब्दार्थ :
रावरे- तुम्हारे, आपके। अनूप- अनुपम, अनोखी। निहारियै- देखने पर। बानी -आदत । अघानि- तृप्ति, संतोष। आन- शपथ। जीव- प्राण। हुतौ- था। वारयौ- न्योछावर कर दिया। सहारियै- सहारा , आश्रय दीजिए । दहै- जलती रहती है। बावरी- विवेक हीन, पगली। रीझ- इच्छा, प्रेम। हाथिनी- हाथों में पड़कर, हारियै- स्वयं को हार बैठे।
प्रसंग
कवि घनानंद रचित सुजान हित से उद्धृत इस सवैये में कवि ने प्रेमी के धैर्य दृढ़ संकल्प शक्ति और प्रेमी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की भावना का वर्णन किया है। 
व्याख्या:
हे प्राण प्रिय ! तुम्हारे रूप लावण्य की रीति अनोखी है। ज्यों ज्यों उसे निकट से देखते हैं और जब जब उस रूप को देखते हैं उसे और अधिक देखने की चाह मन में उमड़ती है। मन तृप्त ही नहीं होता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह(रूप) प्रत्येक क्षण बदलता रहता है।वह पहले से अधिक आकर्षक होता जाता है ।प्रिय का आकर्षण आयु के साथ घटता नहीं अपितु नया-नया होकर बढ़ता जाता है। रूप निरंतर निखर रहा है । उधर मेरे नेत्रों को  भी अजीब आदत पड़ गई है । तुम्हारी शपथ लेकर मैं सच कहता हूं कि यह नेत्र तुम्हारे रूप का पान कर कभी तृप्त नहीं होते । अतः वह किसी और की ओर देखते तक नहीं। मेरे पास तो मेरा एक प्राण था, वह मैंने तुम पर न्योछावर कर दिया है। अब मेरे पास अपना कुछ नहीं है, आप ही मेरे सर्वस्व हैं , मेरे स्वामी हैं , मेरे रक्षक हैं , संरक्षक हैं । अतः आप से मेरी प्रार्थना है कि संकोच त्याग करके मेरे चिंता कुल मन को सहारा दो। आपकी कृपा से ही मैं जीवित रह सकता हूं । प्रेम का कड़वा फल  मैं जानता हूँ इसलिए मैं अपने नेत्रों को तुम्हारी ओर जाने से रोकता हूं कि कहीं रूप जाल में फंसकर अपना सब कुछ न गंवा दें और शेष जीवन विरह- यातना में बीते । पर यह आंखें मेरा कहना नहीं मानती और फिर वही होता है जिसकी आशंका थी। मैं रीझ अर्थात अपनी इच्छा के हाथ बिक जाता हूं। वह भी मुझसे मेरा अधिकार छीन लेती है। मैं उसके हाथों पराजित होकर सब कुछ खो बैठता हूं , मैं विवश होकर तुम्हारे प्रेम में पागल हो गया हूं।  
विशेष :
 1 सच्चे प्रेमी के ह्रदय की विवशता का चित्रण
 2 रीझ का मानवीकरण करने से उक्ति में तीखापन आ गया है 3 मुहावरों का प्रयोग कथन को धार धार बनाता है।
   हाथों -हारना - यह मुहावरा है।
ब्रज भाषा का सुंदर प्रयोग किया है । 

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