हिंदसा

शनिवार, 16 सितंबर 2017

रस का स्वरूप-2

रस का स्वरूप -2
आचार्य विश्वनाथ
उसके बाद रस का विशद विवेचन आचार्य विश्वनाथ ने किया| आचार्य विश्वनाथ से पूर्व ध्वनि वादी आचार्यों ने ध्वनि के अंदर ही रस को सम्मानित कर लिया था| विशेष रूप से अभिनव गुप्त ने |रस की स्वतंत्र सत्ता कम हो गई थी| और  ध्वनि के बीच ही उसको स्वीकार किया जाने लगा था किंतु आचार्य विश्वनाथ ने रस को एक अलग तरह से पुन: स्थापित करने का प्रयास किया और आचार्य विश्वनाथ के अनुसार उनकी रचना साहित्य दर्पण में वे लिखते हैं सहृदयों के ह्रदय में रति  आदि स्थाई भाव विभाव अनुभाव और संचारी भावों द्वारा अभिव्यक्त होकर रस स्वरूप को प्राप्त होते हैं और इसके पश्चात वे रस का स्वरूप कैसा है उसके लिए पूरा एक छंद देते हैं जिसमें वह स्पष्ट करते हैं इस तरह से उन्होंने रस का पूरा स्वरूप चित्रित किया है कि रस   अखंड , वह स्व प्रकाश, आनंद चिन्मय है , ब्रह्मा स्वाद सहोदरा है , लोकोत्तर चमत्कार प्राण है इसमें रस का पूरा स्वरूप स्पष्ट कर दिया गया है|

 सबसे पहले  रस सत्व का उद्रेक है  सांख्य दर्शन के अनुसार मनुष्य के सन्दर्भ में तीन गुण माने जाते हैं| प्रत्येक व्यक्ति में ये तीनों गुण
(सतोगुण, तमोगुण, रजोगुण|)कम या ज्यादा मात्रा में रहते हैं | किसी में सतोगुण की प्रधानता रहती है किसी में रजोगुण की प्रधानता होती है तो किसी में तमोगुण की प्रधानता होती है| पर जब काव्य रस या रसानुभूति की स्थिति होती है तो उस समय रजोगुण और तमोगुण तिरोहित हो जाते हैं अथवा वे पीछे हो जाते हैं और ऐसा होने पर सत्व गुण का उदय हो जाता है, जब वह अपने चरम पर पहुंच जाता है तभी रसअनुभूति होती है| तो रस को एक सात्विक अनुभूति माना है उसके बाद सहृदय साधारणीकरण की स्थिति में आ जाता है, साधारणीकरण के परिणाम स्वरुप ही रस की अनुभूति होती है, साधारणीकरण की स्थिति में सहृदय सभी प्रकार की राग द्वेषों से, मैत्री शत्रु भाव से, अपने पराए के भाव से मुक्त हो जाता है वह इन सब का अतिक्रमण कर जाता है और वह पूरी तरह से सत्व की स्थिति रहती है इसलिए विश्वनाथ कहते हैं कि सत्व का उद्रेक होने पर ही रस की प्राप्ति होती है तो इसलिए रस को स्त्वोद्रेक की स्थिति माना है
आचार्य विश्वनाथ में रस को अखंड माना है| रस में नाना प्रकार के भाव हैं, विभाव भी है, अनुभाव भी है, संचारी भाव भी है, स्थाई भाव भी है तो यहाँ एक प्रश्न यह उठता है कि क्या इन सब भावों की अनुभूति खंड खंड रूप में होती है, अर्थात क्या अलग अलग होती है क्योंकि विभाव, अनुभाव, संचारी और स्थाई भाव, इन सबका अस्तित्व अलग अलग है, उसके लिए आचार्य विश्वनाथ ने कहा है कि यह अनुभूति अखंड रूप में होती है| क्योंकि जब सामाजिक को रसानुभूति होती है तब विभाव, अनुभाव, संचारी और स्थाई भाव, इन सबका अस्तित्व अलग अलग नहीं रहता, अर्थात इन सब भावों की पृथक-पृथक अनुभूति में होकर समवेत रूप में अनुभूति होती है क्योंकि वह रसानुभूति में  परिणत हो जाता है, अर्थात रस में बदल जाता है और वह रसास्वाद एक अखंड अनुभव बन जाता है इसलिए रस को अखंड कहा गया है|
आचार्य विश्वनाथ ने तीसरी विशेषता बताते हुए कहा है कि रस स्वप्रकाश है | संसार में दो प्रकार की लौकिक वस्तुएं हैं -  एक जो स्वप्रकाशित हैं अर्जोथात जो वस्तुएं अपने प्रकाश से आप प्रकाशित हैं| जैसे सूर्य या दीपक का प्रकाश है| सूर्य को किसी अन्य प्रकाश की जरूरत नहीं होती है, वह स्वप्रकाश है पर जैसे घड़ा है, कपड़ा है, अर्थात घट- पट है, उनको प्रकाश दिखाने के लिए दीपक के प्रकाश की आवश्यकता है, वह ज्ञाप्य प्रकाश है, स्व प्रकाश नहीं है, क्योंकि दीपक जलाया जाएगा तो घड़ा दिखाई देगा, या सूर्य के प्रकाश में दिखाई देगा |अंधेरे में जो दिख नहीं रही थी वह प्रकाश होने पर दिखने लगती है| परंतु रस स्वप्रकाश है, सूर्य, दीपक आदि जिस प्रकार प्रकाश देते हैं, वैसे ही रस भी स्व प्रकाश है। इस स्थिति के ज्ञान के लिए किसी अन्य ज्ञान के साधन की अपेक्षा नहीं होती यह रसानुभूति बोध स्वरूप ही होती है |
रस आनंदमय है अर्थात आचार्य विश्वनाथ ने रस को पूर्णतया आनंदमय माना है लेकिन रामचंद्र और गुणचंद्र रस को सुख -दुखआत्मक मानते हैं| आचार्य रामचंद्र शुक्ल रस की अनुभूति को सुख-दुखआत्मक मानते हैं क्योंकि जो रस हैं जैसे- वीर रस, रोद्र, हास्य रस आदि, विद्वानों नेे इनमें से कुछ को सुखआत्मक माना है और कुछ को दुुखात्मक । हास्य रस,श्रृंगार रस सुखात्मआत्मक हैं। परंतु भयानक रस, रौद्र रस को सुखात्मक नहीं माना, इस पर आचार्यों ने माना कि जो वस्तु वीभत्स है या जिसको देखने से जूगुप्सा का भाव जागृत हो सकता है, उसको हम सुखआत्मक या आनदमय कैसे मान सकते हैं, वास्तव में जो लौकिक सुख-दुःख हैं अर्थात   जिन वस्तुओं को देखकर लोक में दुःख की अनुभूति होती है लोक में शोक की अनुभूति होती है, वही जब काव्य में आते हैं तब काव्य में एक विभावन (सोचना,अनुभूति ) नामक व्यापार की उत्पत्ति होती है और उसी व्यापार के कारण साधारणीकरण की स्थिति होती है और जो सामाजिक है, जो सहृदय है वह रस को पूरी तरह समर्पित हो जाता है, उसके मन में जो दुख का भाव है, जुगुप्सा या क्रोध आदि का भाव है, वह नहीं रहता | 
जैसेकि जब हम फिल्म देखने जाते हैं, उस दौरान पूरी फिल्म के कारुणिक दृश्यों को देखकर आंखों से आंसू बहने के उपरांत हम कहते हैं कि फिल्म बहुत अच्छी थी, इसका मतलब यह है कि जो काव्य का रस है या रसानुभूति है, वह दुखात्मक नहीं सुखात्मक ही होती है| वह भावों का उद्रेक करती है इसीलिए पाश्चात्य काव्यशास्त्र के विद्वान अरस्तु ने भी कामदी की अपेक्षा त्रासदी को ज्यादा  श्रेष्ठ माना है। यदि काव्य दुखात्मक माना जाता तो तो हमारे बहुत सारे काव्य दुखात्मक हो जाते, रामायण को भी हम दुखआत्म ही कहते क्योंकि रामायण का जन्म ही वाल्मीकि के शौक-श्लोक से हुआ है , भवभूति की रचना उत्तररामचरित  करूण रस परिपूर्ण है, किन्तु उसको पढ़कर कहीं दुःख की अनुभूति नहीं होती| तो इसलिए जब वह काव्य में परिणत हो जाता है तो रसानुभूति आनंदमय हो जाती है 
रस की अगली विशेषता है कि रस चिन्मय है संसार की सारी वस्तुए या तो जड़ रूप में है या चेतन रूप में है। जो चेतन रूप में हैं या चिन्मय रूप में हैं तो उसमेंं रस को चेतना की अनुभूति माना है। अर्थात वह चैतन्य अनुभूति है |इस चेतना की अनुभूति में इंद्रिय अनुभूति का अभाव होता है और चैतन्य आत्मा स्वाद का सद्भाव का भाव बना रहता है इसलिए रस को चिन्मय कहा गया है क्योंकि रसअनुभूति इंद्रिय जन्य अनुभूति से ऊपर है, इसलिए रस को लोकोत्तर चमत्कार प्राण कहा है।
रस वेद्यांतरस्पर्शशुन्य होता है इसमें वैद्य का अर्थ होता है- ज्ञान। जब सामाजिक सहृदय काव्यानुभूति से जुड़ता है तो उस समय उसे किसी अन्य वस्तु का , अन्य पदार्थ का ध्यान या ज्ञान नहीं रहता है जैसे नाटक देखते हुए सामाजिक पूरी तरह से नाटक से जुड़ जाता है फिल्म देखते हुए भी फिल्म से जुड़ जाता है वे देश काल की सीमा से परे हो जाता है, मित्रता - शत्रुता भाव से परे हो जाता है वह उस समय उसे किसी और ज्ञान की अनुभूति नहीं रहती है इसलिए रस को वेद्यांतरस्पर्शशुन्य कहा गया है |
आचार्य विश्वनाथ रस की एक और विशेषता बताते हुए कहते हैं कि रस ब्रह्मानंद स्वाद सहोदर है, रस के लिए शब्द परमात्मा भी चलता है अर्थात रस को परमात्मा भी कहा गया है और जो साधक ब्रह्म का आस्वादन है या ब्रह्म की अनुभूति को प्राप्त करते हैं या वे जिस अलौकिक आनंद का अनुभव करते हैं तो वहीं आनंद , वैसी ही अनुभूति काव्य रस से प्राप्त होती है| परंतु आचार्य विश्वनाथ ने इस अनुभूति को ब्रह्मानंद स्वाद न कहकर ब्रह्मानंद स्वाद सहोदर कहा है अर्थात उसके जैसी होती है वह उसके सहोदर के रूप में है, क्योंकि जो ब्रह्मास्वाद है, वह लौकिक नहीं है, अलौकिक है, वह नित्य है, हमेशा बना रहने वाला है अर्थात वह समाप्त होने वाला नहीं है, चिर आनंद स्वरूप है |परन्तु जो काव्यास्वाद है , काव्नुयाभूति है वह उस समय विशेष में, जब काव्य का आस्वादन कर रहे हैं, उस समय विशेष के लिए बनी रहती है| उससे पहले नहीं थी ,उसके बाद नहीं रहती, कुछ समय के बाद नहीं रहती, इसलिए नित्य ना होने के कारण उसे ब्रह्मा स्वाद के सहोदर कहा ब्रह्मा स्वाद नहीं | इस तरह से जो ब्रह्मानंद है,वह असंतृप्त रहता है, उसका लौकिक सुख-दुख से कोई मतलब नही रहता , ब्रह्मा स्वाद स्थाई होता है जबकि काव्यास्वाद या रसानुभूति जो है वह लौकिक विषयों से पूर्णतया असंतृप्त नहीं होती है| वह पूरी तरह से स्थाई नहीं होती है इसलिए वह ब्रह्मानंद स्वाद सहोदर है।
रस लोकोत्तर चमत्कार प्राण है- रस अलौकिक आनंद का विषय नहीं है वह लोक से ऊपर का है| यहाँ रस रस की लौकिकताऔर अलौकिकता को लेकर भी विवाद है कि रस लौकिक है या अलौकिक ? आचार्य विश्वनाथ रस को लोकोत्तर चमत्कार प्राण कहते हैं उनका मानना है कि जो काव्य रस की अनुभूति है वो लोक से ऊपर की है| जैसे हम स्वाद इंद्रि से या जीभ से जिन वस्तुओं का स्वाद लेते हैं , वह क्षणिक होती है, कुछ देर के लिए होती हैं| परंतु जो काव्य का रस है वह क्षणिक नहीं होता है| वह न सविकल्पक ज्ञान है न निर्विकल्प ज्ञान है ना प्रत्यक्ष है ना परोक्ष है ना कार्य है न ज्ञाप्य है तो इस तरह से रस को लोकोत्तर माना है|
क्योंकि जो अलौकिक वस्तुएं हैं वे या तो कार्य रूप रहेंगी जैसे घड़ा है उसको कुम्हार ने चाक की सहायता से लागों की सहायता के लिए बनाया है तो उसको बनाने का एक निमित्त है, कारण है वह किसी एक कारण से बना है या ज्ञाप्य रूप में रहेंगी अर्थात ये वस्तु तो है परंतु हमें दिखाई नहीं दे रही, घड़ा अंधेरे में रखा है वह हमें दिखाई नहीं दे रहा परंतु जैसे ही प्रकाश आया वह हमें दिखाई दे गया , यह ज्ञाप्य है और जो कार्य रूप वस्तुएं हैं वह कारण के समाप्त हो जाने पर भी बनी रहती हैं जैसे घड़ा - कुमार की मृत्यु हो जाने या चाक टूट जाने पर भी घड़ा बना रहेगा तो कारण के न रहने पर भी वह कार्य रूप में है| ऐसे ही जो ज्ञापन वस्तुएं हैं प्रकाश के न रहने पर वह दिखाई नहीं रही है लेकिन उनका अस्तित्व है| परंतु काव्य रस जो है वह न कार्य है, न ज्ञाप्य है क्योंकि विभाव अनुभाव संचारी भाव का संयोग जब होता है उससे पहले रस नहीं था काव्य रस की अनुभूति नहीं थी| इसलिए कार्य-कारण भाव भी नहीं कह सकते, इसको ज्ञाप्य भाव भी नहीं कह सकते| इसी तरह से जो संसार की वस्तुएं हैं वह नाम रूप जाति आदि से पहचानी जाती हैं तो वह सविकल्पक है रसानुभूति को हम सविकल्पक भी नहीं कह सकते और ब्रह्मांड की तरह से निर्विकल्पक भी नहीं कह सकते अतः वे न कार्य रूप है और न ज्ञाप्य है और इसी तरह से जो संसार के संबंध है, वह सुख दुख होते हैं किसी से हमारा मित्रता का संबंध है किसी के किसी के साथ शत्रुता का संबंध है किसी के साथ हमारा तटस्थ का संबंध है उदासीन संबंध शत्रुता का भाव है परंतु जब रसानुभूति होती है तब हम इन सभी संबंधों से ऊपर उठ जाते हैं, देश काल की स्थिति से भी ऊपर उठ जाते हैं
जैसे- काव्य का एक प्रसंग देखते हैं - दुष्यंत शकुंतला का प्रेम जब दिखाते हैं तो उसको देखकर या पढ़कर उनका सहृदय के भावों के साथ साधारणीकरण हो जाता है तब रस अनुभूति है इसलिए आचार्य विश्वनाथ ने उसे लोकोत्तर चमत्कार प्राण कहते हैं क्योंकि यहाँ अभिनेता और दर्शक का रति भाव अभिन्न है रसानुभूति में अंतर नहीं रह जाता है| रस अनुभूति के समय सहृदय पूरी तरह से रस के प्रति समर्पित हो जाता है ऐसी स्थिति में उसे अपने पृथक अस्तित्व का बोध ही नहीं रहता है| अर्थात उसका साधारणीकरण हो जाता है जैसे नाटक में या फिल्म में अभिनेता अभिनय कर रहा है तो उस अभिनेता के साथ सहृदय का एक साधारणीकरण हो जाता है उसमें जब सामाजिक अभिनेता के भाव की ही रसानुभूति करता है तब वह पूरी दूनिया को भूल जाता है वह अपने पराए के भेद से दूर हो जाता है , इसे ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लोक सामान्य भाव भूमि कहा है जहां व्यक्ति अपने-पराए का भेद भूल जाता है तथा वह स्वार्थमय संबंधों का अतिक्रमण कर मुक्तावस्था या रस दशा का अनुभव करने करता है, तो हृदय की जो मुक्तावस्था है, जो रस दशा है, जो सहृदय में और अभिनेता में अभिन्नत्व ला देती है, जो भी अभिनेता का सुख दुख है, वह सामाजिक का सुख दुख बन जाता है, वह उसके सुख में सुख का अनुभव करता है और उसके दुख में दुख का अनुभव करता है इस प्रकार से रस का आस्वादन किया जाता है| अत: इस प्रकार आचार्य विश्वनाथ ने रस के स्वरूप को स्पष्ट किया है|

नाट्य साहित्य की परम्परा

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