हिंदसा

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

छायावादी काव्य

छायावादी काव्य 
 रीतिकालीन वासनामय श्रृंगारिक काव्य की प्रतिक्रिया में भारतेंदु तथा द्विवेदी काल का आगमन हुआ। इन दोनों ही युगों में समाज सुधार, देश प्रेम, मर्यादित श्रृंगार, अतीत गौरव आदि का चित्रण होने के साथ साथ  द्विवेदी काल के काव्य में इतिवृत्तात्मक, नैतिकता एवं नीरसता की प्रधानता हमें मिलती है। काव्य में श्रृंगार की कोमल भावनाओं को हेय समझा जाने लगा। इसी के परिणामस्वरूप छायावादी काव्य का जन्म हुआ। इसमें सामूहिकता के विरुद्ध व्यैक्तिकता, बौद्धिकता के विरुद्ध भावुकता और कल्पना, रूढ़ियों के विरुद्ध स्वछंदता का आविर्भाव हुआ। द्विवेदी काल की अभिधात्मक शैली का स्थान छायावाद में लाक्षणिक शैली और व्यंजना प्रधान भाषा शैली ने ले लिया।
      अनेक विद्वानों ने छायावाद को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने छायावाद के विषय में लिखा है- "छायावाद का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए, एक तो रहस्यवाद के अर्थ में जहां उसका संबंध काव्य वस्तु से होता है अर्थात जहां कभी उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर अव्यक्त चित्रमयी भाषा में प्रेम के अनेक प्रकार से व्यंजना करता है। छायावाद का दूसरा प्रयोग काव्य शैली या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है।" डॉक्टर नगेंद्र ने छायावाद को स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह माना है और साथ ही यह भी स्वीकार किया है कि छायावाद एक विशेष प्रकार की भाव पद्धति है। जीवन के प्रति एक विशेष भाव भावात्मक दृष्टिकोण है। छायावाद के आधार स्तंभ श्री जयशंकर प्रसाद  स्वयं छायावाद के संबंध में लिखते हैं-  "छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है। ध्वन्यात्मक, लाक्षणिकता, सौंदर्यात्मक प्रतीक विधान तथा उपचार वक्रता के साथ सहानुभूति की विवृत्ति छायावाद की विशेषताएं हैं।" छायावाद की कोई एक सर्व सम्मत परिभाषा किसी विद्वान ने प्रस्तुत नहीं की है लेकिन इन परिभाषाओं से अनेक विशेषताएं स्पष्ट हो जाती है।
         विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं का निष्कर्ष निकालकर छायावाद की परिभाषा इस प्रकार हो सकती है-  हिंदी कविता में छायावादी कविता कवि की आत्मपरक, अंतर्मुखी प्रवृत्ति का परिणाम है। इसमें अपने पूर्ववर्ती युग अर्थात भारतेंदु और द्विवेदी युग की प्रतिक्रिया प्रकट होती है। छायावाद में प्रकृति का मानवीकरण, प्रेम, सौंदर्य एवं वेदना की अभिव्यक्ति है। इसमें लाक्षणिकता के साथ-साथ प्रतीकात्मक शैली की प्रधानता है।  इसमें जो गीति तत्व है उसने छायावाद को अत्यधिक रुचिकर बना दिया है। छायावाद की प्रमुख प्रवृत्तियां इस प्रकार हैं-
 व्यैक्तिकता
 छायावादी काव्य में कवि की व्यैक्तिकता प्रमुख रूप से दिखाई देती है। इस काव्य में कवि अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों जैसे  हर्ष, शोक, सुख-दुख आदि को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। वह अपने मन के भावों को ही विषय वस्तु के रूप में प्रस्तुत करता है। निराला जी की निम्न पंक्तियों में छायावादी कवि की व्यैक्तिकता की झलक दिखाई देती है
 "मैंने मैं शैली अपनाई
  देखा एक निज दुखी भाई
  दुख की छाया पड़ी ह्रदय में
   झट उमड़ वेदना आई ।।
श्रृंगारिकता
    छायावादी काव्य में श्रृंगार भावना की प्रधानता है लेकिन रीतिकाल से अलग रूप में। रीतिकाल के कवियों के श्रृंगार वर्णन में स्थूल सौंदर्य का चित्रण था जबकि छायावादी काव्य में श्रृंगार- भावना मानसिक, सूक्ष्म और अतींद्रिय है। यह श्रृंगार भावना दो रूपों में प्रकट हुई है, एक नारी का अतीन्द्रिय सौंदर्य चित्रण और दूसरा प्रकृति के रूप में नारी सौंदर्य का चित्रण। पंत व प्रसाद ने नारी के ऐसे अनेक रूपों का चित्रण किया है-
     "तुम्हारे छूने में था प्राण
      संग में पावन गंगा स्नान
       तुम्हारी वाणी में कल्याणी
        त्रिवेणी की लहरों का गान"
प्रसाद ने कामायनी में सौंदर्य की चेतना को  उज्जवल वरदान माना है  इस प्रकार छायावादी श्रृंगार भावना में नारी सौंदर्य और प्रेम का उदात्त और सूक्ष्म चित्रण हुआ है। उसमें वासना की गंध का अभाव है।
 रहस्यानुभूति
छायावादी कवि जीवन व जगत को रहस्यमय दृष्टि से देखता है। इन कवियों की रहस्य भावना जिज्ञासा से परिपूर्ण है। प्रसाद जी कहते हैं
"हे अनंत रमणीय कौन तुम!
यह मैं कैसे कह सकता
कैसे हो? क्या हो? इसका तो ,
भाव-विचार न सह सकता"
वेदना और करुणा की भावना
वेदना और करुणा की अभिव्यक्ति छायावाद की एक प्रमुख विशेषता है। दुख का चित्रण छायावाद का प्रमुख तत्व है। परंतु यह दुख मानवतावाद पर आधारित है। इसमें निराशा से भरा आत्म पीड़ा का चित्रण नहीं है। वस्तुतः हृदयगत भावों की अभिव्यक्ति की अपूर्णता, अभिलाषाओं की विफलता, सौंदर्य की नश्वरता तथा मानवीय दुर्बलताओं के प्रति सहानुभूति इस वेदना के कारण हैं। पंत जी कहते हैं-
 "वियोगी होगा पहला कवि
  आह से उपजा होगा गान
   उमड़ कर आंखों से चुपचाप
    बही होगी कविता अनजान।"
महादेवी तो पीड़ा की कवियत्री कहलाती हैं। वे कहती हैं
 "तुमको पीड़ा में ढूंढा
  तुममें ढूंढूंगी पीड़ा।"
 प्रिय के वियोग में जलन में उन्हें सुख की अनुभूति होती है और वह कह उठती है -
 "मधुर मधुर मेरे दीपक जल,
  चल -जल प्रतिपल प्रति क्षण तू
   प्रियतम का पथ आलोकित कर।"
प्रकृति -सौंदर्य
 प्रकृति की सुंदरता के अनुपम चित्र अंकित करना छायावादी कविता की एक ऐसी विशेषता है, जिसके कारण छायावादी काव्य में प्रकृति सजीव हो उठी है। प्रकृति सौंदर्य की अत्यधिक अभिव्यंजना के कारण कुछ कवियों ने छायावादी काव्य को प्रकृति काव्य भी कहा है। आलंबन, उद्दीपन, मानवीकरण, नारी रूप में प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन, प्रकृति का अलंकारी चित्रण, प्रकृति का वातावरण व पृष्ठभूमि के रूप में चित्रण तथा ईश्वर की रहस्यमयता की अभिव्यक्ति के साधन के रूप में प्रकृति के चित्रण इन कवियों ने अपनी कविता में किया है।
 राष्ट्रीय जागरण
 छायावादी कवि अंतर्मुखी प्रवृति के हैं फिर भी ये कवि राष्ट्रीय जागरण के प्रति सचेत हैं।  वे स्वतंत्रता के आह्वान से अपने आप को दूर नहीं रख सकते। माखनलाल चतुर्वेदी, निराला, प्रसाद आदि ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाओं में राष्ट्रीय भावनाओं का सुंदर निरूपण हुआ है। प्रसाद जी के चंद्रगुप्त नाटक का यह गीत उल्लेखनीय है - "अरुण मधुमय देश हमारा" यह गीत राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत है।
मानवतावाद
अंतर्मुखी प्रकृति का होते हुए भी छायावादी काव्य मानवतावाद का समर्थक है। मानव की पीड़ा कवि को व्याकुल कर देती है। इस प्रकार वह कहीं-कहीं ब्रह्म से भी जुड़ जाता है। उसके हृदय में मानवीय दुर्बलताओं के प्रति पूर्ण सहानुभूति है तथा जगत के सौंदर्य को नष्ट होता देखकर उसका मन पीड़ा से भर जाता है। अतः छायावादी काव्य में पीड़ा की अभिव्यक्ति बहुत गहराई से हुई है।
अभिव्यक्ति में परिवर्तन
छायावादी कवियों ने इतिवृत्तात्मकता के प्रति विरोध प्रकट करते हुए अपनी अभिव्यंजना शैली को भी बदला। इन कवियों ने अभिधात्मक शैली को न अपनाकर लाक्षणिक, प्रतीकात्मक शैली को अपनाया है। इनकी अभिव्यंजना शैली के कुछ प्रमुख अंग है जैसे - प्रतीकात्मकता चित्रात्मकता, मुक्तक गीति शैली, भारतीय  एवं पाश्चात्य अलंकारों का प्रयोग, कोमलकांत पदावली तथा परंपरागत छंदों का निषेध आदि।
                         इस प्रकार छायावाद भाव- विचार तथा शैली सभी दृष्टियों से समृद्ध काव्य है। डॉक्टर नगेंद्र कहते हैं कि इस कविता का गौरव  अक्षय है, उसकी समता केवल भक्ति काव्य ही कर सकता है, लेकिन इस काव्य में कुछ त्रुटियां भी है जैसे कल्पना की अधिकता कल्पना कि क्लिष्टता, अस्पष्टता आदि के कारण यह काव्य लोकप्रिय न हो सका। प्रतीक योजना की अत्यधिक बौद्धिकता के कारण इस काव्य की संप्रेषण शक्ति में बाधा पहुंचती है। लेकिन यदि हम गंभीरता से विचार करें तो छायावादी काव्य आधुनिक कालीन साहित्य में बहुत उच्चा स्थान प्राप्त करता है। छायावादी काव्य  बुद्धिजीवी वर्ग के लिए अमूल्य काव्य  है।


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