काव्य प्रयोजन या साहित्य का उद्देश्य (संक्षेप में)
साहित्य या काव्य की परिभाषा-
१.केवल शब्द और अर्थ का सामंजस्य ही काव्य नहीं है, भावों की अभिव्यक्ति के साथ लोकहित की भावना का होना भी काव्य के लिए आवश्यक है |
२.भारत में निष्काम कर्म की भावना पर बल दिया जाता है, लेकिन संसार का प्रत्येक कार्य किसी ने किसी उद्देश्य से किया जाता है, वह किसी न किसी कर्म से संबंधित होता है, इसलिए काव्य की रचना भी निष्प्रयोजन नहीं होनी चाहिए। इसी कर्म को महत्त्व देते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है-
"केवल मनोरंजन ही न कवि का कर्म होना चाहिए,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए|"
३.विभिन्न साहित्य विधाओं के माध्यम से साहित्यकार अपने भावों, उद्देश्यों को संप्रेषित करता है| काव्य का एक यह भी प्रयोजन होता है|
४. काव्य का मूल उद्देश्य क्या है? इस संबंध में संस्कृत आचार्य, हिंदी के कवि, हिंदी के आलोचक और पाश्चात्य समीक्षकों ने काव्य प्रयोजन के संबंध में अपने मत व्यक्त किए हैं|
सबसे पहले हम संस्कृत आचार्यों के मतों को देखते हैं, जिसमें भामह ,भरत, रूद्रट,वामन, कुंतक, मम्मट आदि आचार्य आते हैं | देखा जाए तो इन सब ने काव्य का प्रयोजन- यश, अर्थ, व्यवहार ज्ञान, लोकमंगल की भावना, कांता सम्मित उपदेश और आनंद प्राप्ति को माना है |
अब हम इन पर बारी-बारी से बात करते हैं-
यश-
हर व्यक्ति को कीर्ति या यश की अभिलाषा होती है| सूर ,तुलसी, मीरा, जायसी इसके उदाहरण हैं|
अर्थ-
जीवन जीने के लिए अर्थ का बहुत महत्त्व होता है | बिहारी को प्रति दोहा एक अशर्फी मिलती थी| प्रसिद्ध उपन्यासकार स्कॉट ने ऋण चुकाने के लिए उपन्यासों की रचना की| प्रत्येक वर्ष साहित्यकारों को अनेक अकादमिक और गैर अकादमिक संस्थाओं द्वारा मंगला पारितोषिक पुरस्कार या डालमिया पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कार या सम्मान राशि दी जाती है , पुरस्कार या सम्मान राशि आदि यह सब योजनाएं इसी मूल प्रयोजन की ओर संकेत करती हैं|
व्यवहार ज्ञान-
व्यवहार ज्ञान अर्थात अच्छा आचरण भी काव्य का प्रयोजन माना गया है| संस्कृत आचार्यों के अनुसार महान पुस्तकों से ही सदाचरण की प्रेरणा मिलती है|
शिव की भावना अर्थात जनकल्याण की भावना-
यह भी काव्य का एक उद्देश्य है| प्राचीन कवि रोगों से मुक्ति के लिए काव्य रचना करते थे| समाज कल्याण हेतु भी कवि साहित्य रचना करता है|
कांता सम्मित उपदेश -
काव्य पढ़ने से हृदय पर जो प्रभाव-विशेष पड़ता है, इससे हृदय को शांति मिलती है| जैसे जीवन सहचरी उचित समय पर अपने तर्क सम्मत उपदेश देकर जीवन को सही दिशा देती है |
अलौकिक आनंद की प्राप्ति-
काव्य के इस प्रयोजन का समर्थन सभी आचार्यों ने किया है|
मूलतः काव्य के ये छ: उद्देश्य या प्रयोजन हैं जिसमें से कुछ बाह्य प्रयोजन हैं और कुछ आंतरिक | जैसे - यश और अर्थ बाहरी प्रयोजन है| जबकि कांता सम्मित उपदेश और अलौकिक आनंद की प्राप्ति आंतरिक प्रयोजन हैं| इसके अतिरिक्त व्यवहार ज्ञान व शिव की भावना समन्वयात्मक प्रयोजन हैं , अर्थात ये बाहरी और आंतरिक दोनों का समन्वित रूप हैं |
हिंदी कवियों के विचार-
'तुलसी- कीर्ति मनीति भली सोई
सुरसरि सम सब हितकर होई |'
कहने का तात्पर्य यह है कि तुलसीदास ने रामचरितमानस में सुखांत सुखाय को काव्य का प्रयोजन माना है| अर्थात आनंद और लोकमंगल उनका काव्य प्रयोजन रहा है। जबकि केशव ने अर्थ -प्राप्ति को काव्य का प्रयोजन स्वीकार किया है |
भिखारीदास के अनुसार - सूर और तुलसी की भांति कुछ कवि यश कमाने के लिए काव्य की रचना करते है, कुछ केशव और बिहारी की भांति धन कमाने के उद्देश्य से काव्य रचना करते हैं|
मैथिलीशरण गुप्त ने मनोरंजन और उपेदश-ज्ञान को महत्व दिया है।
दिनकर ने लिखा है - वसंत का गुलाब और कवि के स्वप्न किसी और के लिए नहीं होते | अत: इन्होंने भी आत्मिक आनंद पर प्रकाश डाला है|
रविंद्र नाथ ठाकुर- आत्मिक आनंद और उपदेश को महत्व देते हैं |
हिंदी आलोचकों के विचार-
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कला का उद्देश्य मनोरंजन न मानकर आंतरिक आनद माना है| इसके साथ उन्होंने साहित्य प्रयोजन के रूप में लोकमंगल की भावना और आनंद तथा रस को भी स्वीकार किया है।
महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने साहित्य का उद्देश्य मानव जगत का कल्याण करना माना है|
डॉ. नगेंद्र ने आत्माभिव्यक्ति मानते हैं|
नंददलारे वाजपेयी डॉ. नगेन्द्र का समर्थन करते हैं |
बाबू गुलाबराय ने सबका समन्वय करते हुए भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण से काव्य का प्रयोजन आध्यात्मिक आनंद माते हैं |।
पाश्चात्य विचारकों के मत -
भारतवर्ष में जो काव्य शब्द का प्रयोग किया गया है, पाश्चात्य विचारको ने इसी काव्य को कला की संज्ञा दी है |पाश्चात्य मनीषियों ने काव्य प्रयोजन पर परोक्ष रूप में प्रकाश डाला है|
प्लेटो ने काव्य या कला के प्रयोजन पर विचार करते हुए कहा है - 'कला का प्रयोजन आदर्श सृष्टि की रचना करना है और इसके साथ रचनाकार का उद्देश्य पाठक को इतना विभोर कर देना है कि वह पूर्णत: उसमें लीन हो जाए| प्लेटो का मत भारतीय मनीषियों के निकट पहुंचता है अर्थात वह भी कला का प्रयोजन आनंद प्राप्ति को मानता है|
अब बात करते हैं अरस्तु की, अरस्तु ने कला का मुख्य उद्देश्य या प्रयोजन आनंद प्राप्ति और गौण प्रयोजन ज्ञानार्जन को माना है| वस्तुतः इन शब्दों के द्वारा पाठक और कवि दोनों का प्रयोजन सिद्ध कर दिया गया है|
फिलिप सिडनी ने भी काव्य का प्रयोजन शिक्षा और आनंद को माना है| उन्होंने कहा है with this and to teach and delight.
कॉलरिज और जॉनसन ने कला का प्रयोजन आनंद प्राप्ति और सत्य का अनुसंधान माना है |
टालस्टाय ने कला का प्रयोजन अलौकिक आनंद की प्राप्ति और सत्य की उपलब्धि को माना है|
ब्रेडले ने माना है कि कला कला के लिए है अर्थात कला का कोई और प्रयोजन नहीं होता
इसका सबसे पहले प्रचार इंग्लैंड में हुआ | कला कला के लिए है अथवा अन्य किसी और के लिए इस बात को लेकर पाश्चात्य विचार ने अनेक मत प्रस्तुत किए हैं-
- कला कला के लिए|
- कला आनंद के लिए|
- कला जीवन के लिए|
- कला धन प्राप्ति के लिए|
- कला आवश्यकता पूर्ति के लिए|
- कला पलायन के लिए| पाश्चात्य आलोचकों के अनुसार कला जीवन को पलायनवादी बनाती है| इस संदर्भ में प्रसाद के काव्य का उदाहरण दिया जा सकता है| वे लिखते हैं- 'ले चल मुझे भुलावा देकर, मेरे नाविक धीरे-धीरे |' लेकिन इसको उचित नहीं माना जा सकता है|
- कला मनोरंजन के लिए|
- कला आत्मानुभूति के लिए|
- भारतीय संस्कृत आचार्यों ने जो मत प्रस्तुत किए हैं उन सब का मूल प्रयोजन आनंद प्राप्ति है| परोक्ष रूप से पाश्चात्य विचारको का भी यही मत है|
- भारतीय मत गौण रूप से यश व धन प्राप्ति को प्रयोजन मानता है, पाश्चात्य आलोचकों ने कला जीवन के लिए कह दिया है |
भारतीयों ने काव्य का प्रयोजन मनोरंजन कहा, पाश्चात्य ने मनोविनोद की संज्ञा दी है| आत्मानुभूति को पाश्चात्य विचारको आत्माअनुभव माना है| इस प्रकार भारतीय आचार्यों और पाश्चात्य विचारकों के मत को देखा जाए तो दोनों में
केवल बाहरी आवरण में अंतर है, दोनों का मूल प्रयोजन आनंद प्राप्ति ही है|
- पाठकों का काव्य प्रयोजन क्या हो? इस विषय में विद्वानों की लेखनी मौन रही है| सम्पूर्ण विवेचन के बात मूल रूप से बात करें तो पाठक के दो उद्देश्य माने गए हैं -आनंद प्राप्ति और ज्ञान प्राप्ति| भारतीय व पाश्चात्य मनीषियों की परिभाषाओं के समन्वय से यह ध्यातव्य है कि काव्य का मूल अभीष्ट आनंद प्राप्ति ही है, यह आनंद प्राप्ति पाठक और कवि दोनों के लिए ही है| इसी के कलेवर में इतर प्रयोजनों की झांकी निहित है| शुक्ल का 'कविता क्या है' निबंध इस तथ्य का समर्थन करता है, उन्होंने काव्यानंद को ब्रह्मानंद सहोदर की उपाधि दी है।