हिंदसा

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

माखनलाल चतुर्वेदी का साहित्यिक परिचय

                                     माखनलाल चतुर्वेदी का साहित्यिक परिचय



                                                माखनलाल चतुर्वेदी | Kayvashaala
                                               ( माखनलाल चतुर्वेदी )

ख्यातिप्राप्त लेखक, निर्भीक पत्रकार, सच्चे सत्याग्रहियों में से एक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी  के हिंदी के मशहूर कवि हैं | उनका जन्म 4 अप्रैल 1889 में मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले एक गाँव में हुआ था| उनके पिता का नाम नंद लाल चतुर्वेदी था , जो गांव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे| प्राइमरी शिक्षा के बाद इन्होंने घर पर ही संस्कृत, बंगला, अंग्रेजी और गुजराती आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया |
                                         माखनलाल चतुर्वेदी का हिंदी साहित्य जगत में महत्त्वपूर्ण स्थान है | वे  हिंदी के प्रसिद्ध कवि, लेखक और पत्रकार, निबंधकार  थे| उनकी रचनाएं हिंदी साहित्य में अत्यंत लोकप्रिय हुई|  उन्होंने  प्रभा और कर्मवीर जैसे प्रसिद्ध पत्रों का संपादन किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ जोरदार प्रचार किया|  माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने पत्रों के माध्यम से नई पीढ़ी को गुलामी की जंजीरों को तोड़ कर बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया |  स्वाधीनता के बाद उनको मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के लिए भी चुना गया था लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया |
                                        माखनलाल चतुर्वेदी ने बीसवीं सदी के सबसे पहले दशक में ही कविता लिखना शुरु कर दिया था| लेकिन आजादी के संघर्ष में सक्रियता के साथ उनका लेखन परवान चढ़ा| माखनलाल चतुर्वेदी सच्चे देश प्रेमी थे| उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया जेल भी गए |
                                   1924 ईस्वी में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद इन्होंने प्रताप नामक पत्र का संपादन भी किया| माखनलाल चतुर्वेदी जैसा बोलते थे वैसा ही लिखते थे|  उनका कवित्व उनके भाषणों में साफ दिखाई देता था | ऐसे व्यक्ति को कलम के धनी या वाणी के धनी कहने से काम नहीं चलता शायद कोई शब्द उनकी  व्याख्या नहीं कर सकता |
                                 वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, स्वाभिमानी और स्पष्ट वादी होने के साथ-साथ भावुक  भी थे, यही कारण है कि उनकी काव्य रचनाओं में जहां एक और आग है तो दूसरी ओर करुणा की भागीरथी भी बहती दिखाई देती है| कुल मिलाकर माखनलाल चतुर्वेदी ने त्याग, बलिदान, देशभक्ति का अनूठा संगम हिंदी काव्य सरिता को प्रदान किया है| शब्द उनकी भावनाओं का अनुगमन करते प्रतीत होते हैं| आधुनिक  हिंदी साहित्य के इतिहास में माखनलाल चतुर्वेदी का साहित्यिक योगदान उल्लेखनीय है|
                   मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र ने उनका सार्वजनिक सम्मान भी किया था| माखनलाल चतुर्वेदी गांधीवादी थे,  बावजूद इसके वे किसी सीमा में बंदे नहीं थे, वे विद्रोही थे, वैष्णव मधुर साधना और समर्पण आदि तो उनमें था ही इसके साथ-साथ उन पर सूफी प्रभाव भी था | उन्होंने रूस की समाजवादी क्रांति के समर्थन में कर्मवीर में लिखकर एक सामाजिक कार्यकर्त्ता की भूमिका निभाई |
                साहित्य अकादमी पुरस्कार की स्थापना होने पर माखनलाल चतुर्वेदी को हिंदी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार दिया गया |पुष्प की अभिलाषा और अमर राष्ट्र जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता इस महाकवि के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय में सन 1959 में डी.लिट की मानद उपाधि से विभूषित किया| 1963 में भारत सरकार ने पदम भूषण से भी माखनलाल चतुर्वेदी को अलंकृत किया|
                        10 सितंबर 1967 को राष्ट्रभाषा हिंदी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में माखनलाल चतुर्वेदी ने यह अलंकरण लौटा दिया| 1968 ईस्वी में माखनलाल चतुर्वेदी इस दुनिया को छोड़ कर चले गए |


रचनाएँ -

  • हिमकिरीटिनी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूंजे धरा, हिम तरंगिणी आदि इनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ हैं। 
  • कृष्णार्जुन युद्ध, साहित्य के देवता, समय के पांव, अमीर इरादे :गरीब इरादे आदि इनकी  प्रसिद्ध गद्यात्मक रचनाएँ हैं |


                                    

शनिवार, 25 जुलाई 2015

जीवन की डगर

जीवन की डगर 

हमारा जीवन कभी एक जैसा नहीं रह सकता। जीवन में हमेशा अपने मन की चाही हो जाए, यह कदापि नहीं हो सकता।  जीनव में सुख-दुःख या उतार-चढ़ाव के पल तो आसमान में निरंतर आते-जाते रहने वाले बादलों की तरह होते हैं। देखा जाए तो सुख-दुःख  हमारी क्रियाओं की प्रतिक्रियाओं का नाम है।  जीवन में किसी कार्य के करने से हमें सुख मिल जाता है, तो किसी कार्य को करने से दुःख। लेकिन जब हमें सुख मिलता है तो हम उसका ज्यादा हिसाब-किताब नहीं लगाते और अगर लगाते भी हैं तो उसका पूरा श्रेय अपनी सूझ-बुझ को देते हैं या फिर अपनी अच्छी किस्मत को, लेकिन अगर दुःख  मिलता है तो उसका पूरा हिसाब-किताब लगाया जाता है, उसके लिए अक्सर हम अपने-आप को दोषी कम ही ठहराते हैं और उस दुःख के पैदा होने का दोष हम अपनी फूटी किस्मत को देते हैं या फिर हम अपने किसी निकटतम व्यक्ति को उस दुख का कारण  मान लेते हैं, और अगर कोई भी कारण न मिले तो अंत में पूरा ठीकरा भगवान के सिर पर फोड़ देते है और हम कह देते हैं कि शायद भगवान को यही मंजूर था।.... ऐसा करना मनुष्य का स्वभाव है,  क्योंकि शायद ऐसा करके ही व्यक्ति बड़ी से बड़ी मुसीबत को भी झेल जाता है।  लेकिन विज्ञान की माने तो प्रत्येक कार्य (सुख- दुःख) के पीछे कोई न कोई कारण (हमारा कर्म) अवश्य होता है अर्थात हमने कुछ न कुछ ऐसा  कार्य अवश्य किया था जिससे वो सुख या दुःख पैदा हुआ।
              ये भी सत्य है कि सुख-दुःख की कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती। सुख-दुख हमारे मानने से छोटा-बड़ा होता है। अर्थात कौन, किस छोटी-सी बात को, दुःख मान ले और कौन बड़ी बात को भी दुःख न मान, हंसी में टालकर तनावमुक्त हो जाये, कहा नहीं जा सकता। सही भी है क्योंकि ये जीवन बहुत छोटा है इसलिए हमें सकारात्मक सोच के साथ और सुख की कामना के साथ जीने की कोशिश करनी चाहिए। वर्त्तमान में, आज में, बल्कि इसी एक पल में रहिये, जो मिला है, जैसा मिला है, उसी से संतुष्ट हो जाइये, परेशानी में भी धर्य न खो कर अच्छे समय का इंतजार करना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन को यदि हम नदी के सहज प्रवाह या बहाव की तरह जीवन मे भी कुछ ज्यादा गुना-भाग किये बिना ही बस जीवन की सहज  दिशा में, जिधर वो लेकर जाए बस चलते चले जाए तो जीवन सरल बन जाता है, वरना जीवन की डगर बड़ी कठिन है।


बुधवार, 22 जुलाई 2015

काव्य प्रयोजन या साहित्य का उद्देश्य (संक्षेप में)

                          काव्य प्रयोजन या साहित्य का उद्देश्य  (संक्षेप में)
साहित्य या काव्य की परिभाषा-
१.केवल शब्द और अर्थ का सामंजस्य ही काव्य नहीं है, भावों की अभिव्यक्ति के साथ लोकहित की भावना का होना भी काव्य के लिए आवश्यक है |
२.भारत में निष्काम कर्म की भावना पर बल दिया जाता है, लेकिन संसार का प्रत्येक कार्य किसी ने किसी उद्देश्य से किया जाता है, वह किसी न किसी कर्म से संबंधित होता है, इसलिए काव्य की रचना भी  निष्प्रयोजन नहीं होनी चाहिए। इसी कर्म को महत्त्व देते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है-
 "केवल मनोरंजन ही न कवि  का कर्म होना चाहिए,
 उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए|"
३.विभिन्न साहित्य विधाओं के माध्यम से साहित्यकार अपने भावों, उद्देश्यों को संप्रेषित करता है|  काव्य का  एक यह भी प्रयोजन होता है|
४. काव्य का मूल उद्देश्य क्या है? इस संबंध में संस्कृत आचार्य, हिंदी के कवि, हिंदी के आलोचक और पाश्चात्य समीक्षकों ने काव्य प्रयोजन के संबंध में अपने मत व्यक्त किए हैं|
सबसे पहले हम संस्कृत आचार्यों के मतों को देखते हैं, जिसमें भामह ,भरत, रूद्रट,वामन, कुंतक, मम्मट आदि आचार्य आते हैं | देखा जाए तो इन सब ने काव्य का प्रयोजन- यश, अर्थ, व्यवहार ज्ञान, लोकमंगल की भावना, कांता सम्मित उपदेश और आनंद प्राप्ति  को  माना है |
अब हम इन पर बारी-बारी से बात करते हैं-
यश- 
हर व्यक्ति को कीर्ति या यश की अभिलाषा  होती है| सूर ,तुलसी, मीरा, जायसी इसके उदाहरण हैं|
अर्थ-
जीवन जीने के लिए  अर्थ का बहुत महत्त्व होता है | बिहारी को प्रति दोहा एक अशर्फी  मिलती थी| प्रसिद्ध उपन्यासकार स्कॉट ने ऋण चुकाने के लिए उपन्यासों की रचना की|  प्रत्येक वर्ष  साहित्यकारों को अनेक अकादमिक और गैर अकादमिक संस्थाओं द्वारा  मंगला पारितोषिक पुरस्कार या डालमिया पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार,  ज्ञानपीठ पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कार या सम्मान राशि दी जाती है , पुरस्कार या सम्मान राशि आदि  यह सब  योजनाएं इसी मूल प्रयोजन की ओर संकेत करती हैं|
व्यवहार ज्ञान-
व्यवहार ज्ञान अर्थात अच्छा आचरण भी काव्य का प्रयोजन माना गया है| संस्कृत आचार्यों के अनुसार  महान पुस्तकों से ही सदाचरण की प्रेरणा मिलती है|
शिव की भावना अर्थात जनकल्याण की भावना-
यह भी काव्य का एक उद्देश्य है| प्राचीन कवि रोगों से मुक्ति के लिए काव्य रचना करते थे| समाज कल्याण हेतु भी कवि साहित्य रचना करता है|
कांता सम्मित उपदेश -
काव्य पढ़ने से हृदय पर जो प्रभाव-विशेष पड़ता है, इससे हृदय को शांति मिलती है| जैसे  जीवन  सहचरी उचित समय पर अपने तर्क सम्मत उपदेश देकर जीवन को सही दिशा देती है |
अलौकिक आनंद की प्राप्ति-
काव्य के इस प्रयोजन  का समर्थन सभी आचार्यों ने किया है|
                         मूलतः काव्य के ये  छ: उद्देश्य या प्रयोजन हैं  जिसमें  से  कुछ  बाह्य प्रयोजन हैं और कुछ आंतरिक | जैसे - यश और अर्थ बाहरी  प्रयोजन है| जबकि  कांता सम्मित उपदेश  और अलौकिक आनंद की प्राप्ति आंतरिक प्रयोजन हैं|  इसके अतिरिक्त  व्यवहार ज्ञान व शिव की भावना समन्वयात्मक प्रयोजन हैं , अर्थात ये बाहरी और आंतरिक दोनों का समन्वित रूप हैं |
 हिंदी कवियों के विचार-
 'तुलसी- कीर्ति मनीति भली सोई
 सुरसरि सम सब हितकर होई |'
कहने का तात्पर्य यह है कि  तुलसीदास ने  रामचरितमानस  में  सुखांत  सुखाय  को काव्य का  प्रयोजन  माना है| अर्थात आनंद और लोकमंगल उनका काव्य प्रयोजन रहा है। जबकि  केशव ने अर्थ -प्राप्ति को काव्य का प्रयोजन स्वीकार किया है |
भिखारीदास के अनुसार - सूर और तुलसी की भांति कुछ कवि यश कमाने के लिए काव्य की रचना करते है,  कुछ  केशव और बिहारी की भांति धन कमाने के उद्देश्य से काव्य रचना करते हैं|
मैथिलीशरण गुप्त  ने  मनोरंजन और उपेदश-ज्ञान को महत्व दिया है।
दिनकर ने लिखा है - वसंत का गुलाब और कवि के स्वप्न किसी और के लिए नहीं होते | अत: इन्होंने भी आत्मिक आनंद पर प्रकाश डाला है|
रविंद्र नाथ ठाकुर- आत्मिक आनंद और उपदेश को महत्व देते हैं |
हिंदी आलोचकों के विचार-
आचार्य  रामचंद्र  शुक्ल ने कला का उद्देश्य मनोरंजन न मानकर आंतरिक आनद माना है|  इसके साथ उन्होंने  साहित्य प्रयोजन के रूप में लोकमंगल की भावना और आनंद तथा रस को भी स्वीकार किया है।
महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने साहित्य का उद्देश्य मानव जगत का कल्याण करना माना है|
डॉ. नगेंद्र ने  आत्माभिव्यक्ति मानते हैं|
नंददलारे वाजपेयी डॉ. नगेन्द्र का समर्थन करते हैं |
बाबू गुलाबराय ने सबका समन्वय करते हुए भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण से काव्य का प्रयोजन आध्यात्मिक आनंद माते हैं |।
पाश्चात्य विचारकों के मत -
 भारतवर्ष में जो काव्य शब्द का प्रयोग किया गया है, पाश्चात्य विचारको ने इसी काव्य को कला की संज्ञा दी है |पाश्चात्य मनीषियों ने काव्य प्रयोजन पर परोक्ष रूप में प्रकाश डाला है|
प्लेटो ने काव्य या कला के  प्रयोजन पर विचार करते हुए कहा है - 'कला का प्रयोजन आदर्श  सृष्टि की रचना करना है और इसके साथ रचनाकार का उद्देश्य पाठक को इतना विभोर कर देना है कि वह पूर्णत: उसमें लीन हो जाए| प्लेटो का मत भारतीय मनीषियों के निकट पहुंचता है अर्थात वह भी कला का प्रयोजन आनंद प्राप्ति को मानता है|
                       अब बात करते हैं अरस्तु की, अरस्तु ने कला का मुख्य उद्देश्य या प्रयोजन  आनंद प्राप्ति और गौण  प्रयोजन ज्ञानार्जन को माना है| वस्तुतः इन शब्दों के द्वारा पाठक और कवि दोनों का प्रयोजन सिद्ध कर दिया गया है|
फिलिप सिडनी ने भी काव्य का प्रयोजन शिक्षा और आनंद को माना है| उन्होंने कहा है with this and to teach and delight.
कॉलरिज और जॉनसन ने  कला का प्रयोजन आनंद प्राप्ति और  सत्य का अनुसंधान माना है |
टालस्टाय  ने कला का प्रयोजन अलौकिक आनंद की प्राप्ति और सत्य की उपलब्धि को माना है|
ब्रेडले ने माना है कि कला कला के लिए  है अर्थात कला का कोई और प्रयोजन नहीं होता
                                           इसका सबसे पहले प्रचार इंग्लैंड में हुआ | कला कला के लिए है अथवा अन्य किसी और के लिए इस बात को लेकर पाश्चात्य विचार ने अनेक मत प्रस्तुत किए हैं-
  • कला कला के लिए|
  • कला आनंद के लिए|
  • कला जीवन के लिए|
  • कला धन प्राप्ति के लिए|
  • कला आवश्यकता पूर्ति के लिए|
  • कला पलायन के लिए| पाश्चात्य आलोचकों के अनुसार कला जीवन को पलायनवादी बनाती है| इस संदर्भ में प्रसाद के काव्य का उदाहरण दिया जा सकता है| वे लिखते हैं- 'ले चल  मुझे भुलावा देकर, मेरे नाविक धीरे-धीरे |' लेकिन इसको  उचित नहीं माना जा सकता  है|
  • कला मनोरंजन के लिए|
  • कला आत्मानुभूति के लिए|
  • भारतीय संस्कृत आचार्यों ने जो मत प्रस्तुत किए हैं उन सब का मूल प्रयोजन आनंद प्राप्ति है| परोक्ष रूप से पाश्चात्य विचारको का भी यही मत है|
  • भारतीय मत गौण रूप से यश व धन  प्राप्ति को  प्रयोजन  मानता है,  पाश्चात्य आलोचकों ने कला जीवन के लिए कह दिया है |
भारतीयों ने  काव्य का प्रयोजन मनोरंजन कहा, पाश्चात्य ने मनोविनोद की संज्ञा दी है| आत्मानुभूति को  पाश्चात्य विचारको आत्माअनुभव माना है|  इस प्रकार  भारतीय आचार्यों और पाश्चात्य विचारकों के मत को देखा जाए तो दोनों में  केवल बाहरी आवरण में अंतर है, दोनों का  मूल प्रयोजन आनंद प्राप्ति ही है|
  • पाठकों का काव्य प्रयोजन क्या हो?  इस विषय में विद्वानों की लेखनी मौन रही है| सम्पूर्ण विवेचन के बात मूल रूप से बात करें तो  पाठक के दो उद्देश्य माने गए हैं -आनंद प्राप्ति और ज्ञान प्राप्ति| भारतीय व पाश्चात्य मनीषियों की परिभाषाओं के समन्वय से यह  ध्यातव्य है कि काव्य का मूल अभीष्ट आनंद प्राप्ति ही  है, यह आनंद प्राप्ति पाठक और कवि  दोनों के लिए ही है| इसी के कलेवर में इतर  प्रयोजनों की झांकी निहित है|  शुक्ल का 'कविता क्या है'  निबंध इस तथ्य का समर्थन करता है, उन्होंने काव्यानंद को ब्रह्मानंद सहोदर की उपाधि दी है।


बुधवार, 15 जुलाई 2015

एकांकी

एकांकी सामान्य परिचय
 एकांकी साधारणतया नाटक के उस रूप को कहते हैं जिसमें केवल एक ही अंक में संपूर्ण नाटक समाप्त हो जाता है या जो नाटक एक अंक का होता है उसे एकांकी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे वन एक्ट प्ले कहा गया है।
एकांकी का  उद्भव-
एकांकी के उद्भव को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं।कुछ का मानना है कि एकांकी पश्चिम या वैज्ञानिक युग की देन है तो कुछ का मानना है कि एकांकी का उद्भव संस्कृत नाट्य साहित्य से हुआ है। संस्कृत नाट्य साहित्य से एकांकी का उद्भव मानने वाले विद्वानों का तर्क है कि एक अंक का नाटक लिखने की परंपरा संस्कृत साहित्य में भी मिलती है। इनका मत है कि भास और भरत मुनि ने इसका आरंभ इससे बहुत पहले ही कर दिया था। संस्कृत साहित्य में भरतमुनि ने जो नाटक और उप नाटक के भेद बताए हैं उनमें सत्रह रूप (व्यायोग, प्रहसन, भाण, वीथि, नाटिका,  नाट्य रासक, प्रक्षेपण, उल्लाप्य,  काव्य, गोष्टी, सट्टक, श्रीगदित, विलासिता और अंक आदि ऐसे हैं जिनमें एक ही अंक है| इन सभी एकांकी रूपों का प्राचीन काल में अभिनय होता था। इससे सिद्ध होता है कि संस्कृत साहित्य में एकांकी की समृद्ध परंपरा थी। इस संबंध में डॉ राम चरण महेंद्र का मानना है, "संस्कृत एकांकियों की शिल्प विधि पर्याप्त जटिल थी और नाटककारों ने उपभेदों का अंतर स्पष्ट किया था। आधुनिक हिंदी एकांकी की सभी शैलियां थोड़े से परिवर्तन के साथ इन्हीं में समा सकती हैं।" इसी प्रकार सीताराम चतुर्वेदी एकांकी का उद्भव संस्कृत नाट्य साहित्य से तो मानते ही हैं इसके साथ ही उनका मानना है कि प्राचीन यूनान में भी छोटे प्रहसन लिखे गए थे। वे लिखते हैं, "भारतीय साहित्य में बोलपट के आविष्कार की प्रतिक्रिया के रूप में एकांकी नाटक की सृष्टि हुई। जिन्होंने संस्कृत साहित्य का अध्ययन नहीं किया है उनका यही विश्वास है कि एकांकी नाटक भी वैज्ञानिक आविष्कारों के समान ही बीसवीं शताब्दी की देन है, किंतु एकांकी नाटकों का आरंभ ईसा से बहुत पहले भास ने कर दिया था। जिसके मध्यम-व्यायोग को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। यूरोप में भी छोटे संबद्ध तथा कलात्मक नाटक कोई नए नहीं हैं। प्राचीन यूनान और इतालिया में छोटे प्रहसन पंद्रहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी तक कीमीदियादे लारते के नाम से इतालिया में तथा दूसरे यूरोपीय देशों में प्रचलित थे।"
भारतीय संस्कृत साहित्य में एकांकी के आरंभिक रूप की बात करने के बाद यह देखना भी आवश्यक है कि पाश्चात्य साहित्य में एकांकी का स्वरूप कैसा था? पश्चिम में एकांकियों का उद्भव कर्टेन रेजर (curtain Raiser) या आफ्टर पीसेज़(after Piecess) के रूप में हुआ था। इन रूपों की तुलना संस्कृत के एकांकी रूपों से नहीं की जा सकती, क्योंकि कर्टेन रेजर या आफ्टर पीसेज 18वीं और 19वीं शताब्दी में इंग्लैंड के प्रेक्षागृह में मुख्य एकांकी नाटक के आरंभ होने से पहले जल्दी या समय पर आ जाने वाले दर्शकों का समय बिताने के लिए खेले जाते थे। इनका मूल उद्देश्य मनोरंजन के द्वारा दर्शकों को कुछ समय तक बिठाए रखना मात्र था, पहले इन्हें साहित्य में स्थान नहीं मिला था। इनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना जाता था और यह अधिकतर संस्कृत के भाण और प्रसहन से मिलते जुलते होते थे। आगे चलकर इन एकांकियों को दर्शकों ने इतना अधिक पसंद किया कि एकांकी कला ने अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व बना लिया और एक अंक वाले इन नाटकों को एक अंक का होने के कारण वन एक्ट प्ले कहा जाने लगा।
       इसके अतिरिक्त एकांकी के संदर्भ में कहा जाता है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में लंदन के एक प्रसिद्ध प्रेक्षागृह में एक मनोरंजक घटना घटी। माना जाता है कि इस घटना से ही एकांकी विधा के स्वतंत्र अस्तित्व का आरंभ हुआ। हुआ यह कि वहां कर्टन रेजर के रूप में भी द मंकीज पां (बंदर का पंजा) का अभिनय किया गया। यह इतना प्रभावशाली सिद्ध हुआ कि दर्शक मुख्य नाटक को बिना देखे ही उठकर चले गए। इसके प्रभावफलस्वरूप एकांकी नाटक जनता में इतने लोकप्रिय हो गए कि उसके बाद उन्हें साहित्य की एक स्वतंत्र विधा मान लिया गया। इन सभी बातों से यह सिद्ध होता है की पूर्व और पश्चिम दोनों नाट्य साहित्य में एकांकी के निकटतम रूप मिलते हैं। बावजूद इसके बीसवीं शताब्दी में एकांकी का जो स्वरूप, विषय, उद्देश्य, या शिल्प मिलता है, उसमें पहले से अर्थात आरम्भिक एकांकी से देखा जाए तो बहुत परिवर्तन आया है।  और इस दृष्टि से वह परंपरागत एकांकी  भिन्न है। इस परिवर्तन को देखते हुए ही उस पर पश्चिम के प्रभाव की बात की जाती है।
एकांकी  की परिभाषाएं-
एकांकी के स्वरूप को लेकर भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने अपने अपने मत के अनुसार एकांकी की परिभाषा दी हैं।
भारतीय विद्वानों की परिभाषाएं-
भारतीय विद्वान डॉ उदय शंकर भट्ट लिखते हैं- "एकांकी नाटक में जीवन का एक अंश, परिवर्तन का एक क्षण,  सभी प्रकार के वातावरण से प्रेरित लेखकों का,  दिन में एक घंटे की तरह, मेघ में बिजली की तरह, बसंत में फूल के हास की तरह होती है।" दशरथ ओझा ने एकांकी के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखा है- "जो नाटक एक ही अंक में समाप्त होने वाला, एक सुनिश्चित लक्ष्य वाला, एक ही घटना, एक ही परिस्थिति और  एक ही समस्या वाला हो, जिसके कथानक में कौतूहल और वेग, गति में विद्युत-सी वक्रता और तेजी, विकास में एकाग्रता और आकस्मिकता के साथ चरम सीमा तक पहुंचाने की व्यग्रता हो और जिसका पर्यवसान चरम सीमा पर ही प्रभाव की तीव्रता के साथ हो जाता हो, जिसमें प्रासंगिक कथाओं का प्रायः निषेध, घटनाओं की विविधता का निवारण तथा चारित्रिक प्रस्फुटन में आदि, मध्य और अवसान का वर्जन हो, उसे एकांकी कहना चाहिए।"
पाश्चात्य विद्वानों की परिभाषाएं-
       पाश्चात्य विद्वान सिडनी बॉक्स ने 'टेक्निक ऑफ वन एक्ट प्ले' में लिखा है-  "एकांकी का स्वरूप ऐसा नहीं होता जिसमें चरित्र चित्रण की सूक्ष्मताओं को महत्व दिया जा सके। एकांकी साहित्य की वह नियंत्रित और संयमित विधा है जिससे एक ही घटना को इस प्रकार अभिव्यक्त किया जाता है कि उनके प्रभाव एक्य से पाठकों और दर्शकों का मन आकृष्ट और आक्रांत हो उठता है।"  पश्चिम के अन्य विद्वानों ने नाटक की ही भांति एकांकी में भी संघर्ष को भी महत्व दिया है। वह एकांकी में संघर्ष की प्रधानता को स्थान देते हैं। क्योंकि संघर्ष उनकी दृष्टि में सभी नाटकों का प्राण है।
           उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि एकांकी का नाटक से संबंध है। लेकिन वह एक सर्वथा स्वतंत्र विधा भी है। वह समाज के एक खंड का प्रभावशाली चित्र अंकित करती है। एकांकी का निर्माण एक निश्चित लक्ष्य, विचार या समस्या का विवेचन करने के निमित्त, एक ही महत्वपूर्ण घटना या परिस्थिति द्वारा किया जाता है। यह उसी घटना, परिस्थिति या विषय से आरंभ होकर पूर्ण विकास को प्राप्त होती है। इसमें एक ही घटना विस्तार पाकर दर्शकों को प्रभावित करती है।  एकांकी का उद्देश्य गंभीर, हास्यजनक, करूण आदि किसी भी प्रकार का हो सकता है। वह चरित्र प्रधान भी हो सकती है और विषय प्रधान भी हो सकती है। विषय का चयन करते समय लेखक को संक्षिप्तता का अवश्य ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि एकांकीकार के पास समय की कमी होती है। इसलिए इसमें कथा का अनावश्यक विस्तार नहीं किया जाता।
एकांकी के तत्त्व-
नाटक की तरह एकांकी के भी मूल रूप से सात तत्व होते हैं। कथानक, पात्र एवं चरित्र चित्रण, संवाद, उद्देश्य, देश काल और वातावरण, भाषा शैली और रंग संकेत या अभिनय। देखा जाए तो कथा, संवाद और दृश्य विधान के अंतर्गत सभी तत्व आ जाते हैं। डॉक्टर रामगोपाल चौहान ने इन तत्वों का निर्धारण निम्न प्रकार से किया है- पहला है- कथा। कथा के अंतर्गत वे तीन तत्व को शामिल करते हैं- कथा, चरित्र चित्रण और तीसरा उद्देश्य। इसी तरह दूसरा है- संवाद। संवाद में वे संवाद और भाषा शैली दोनों को शामिल करते हैं। और तीसरा है- दृश्य विधान। इसमें वे अर्थात दृश्य विधान में वातावरण सृजन, देशकाल और रंग निर्देश को शामिल करते हैं।
एकांकी की विशेषताएं-
अन्य साहित्यिक विधाओं की तरह एकांकी की भी अपनी विशेषताएं होती हैं। उन विशेषताओं के कारण ही उसका स्वतंत्र अस्तित्व माना जाता है या होता है।  एकांकी की भी अपनी कुछ विशेषताएं हैं जैसे-
1. एकांकी में केवल आधार रूप से एक ही अंक होना चाहिए।2. एक ही मुख्य घटना या जीवन की एक मुख्य संवेदना होनी चाहिए जिसका विकास कोतुहल और जिज्ञासा पूर्ण नाटकीय शैली में होना चाहिए।
3. चरम सीमा पर पहुंचकर एकांकी का अंत होना चाहिए।
4. एकांकी में घटनाओं का चुनाव दैनिक जीवन से हो तथा उसमें यथार्थवाद एवं मनोरंजन के तत्वों का उचित समावेश होना चाहिए।
5. संघर्ष एकांकी का प्राण होता है इसकी अभिव्यंजना का आधार मनोविज्ञान रहना चाहिए।
6. स्वाभाविक यथार्थवादी चित्रण होना चाहिए।
7. संवाद संक्षिप्त, प्रभावी और प्रवाहमय होने चाहिए।
8. एकांकी रंगमंच के गुणों से युक्त होनी चाहिए।
9. एकांकी के कथानक में कौतूहल तथा जिज्ञासा अंत तक बनी रहनी चाहिए।
10. कला पक्ष में एकांकी की स्वाभाविकता और जीवन से निकटता बनाए रखने के लिए संकलनत्रय (थ्री यूनिट्स) का कठोरता से पालन होना चाहिए। एकांकी का आकार छोटा रहे, और अवधि कम रहे, यही अच्छा माना जाता है। उसमें पात्रों के चरित्र अथवा घटना को संक्षेप में प्रकट कर देने की क्षमता होनी चाहिए।
एकांकी के भेद-
रचना- प्रकार या तकनीक के आधार पर- मोनोड्रामा, रेडियो प्ले, फीचर, गीतिनाट्य, ओपेरा, झांकी आदि एकांकी के भेद माने जा सकते हैं।
मूल प्रवृत्ति के आधार पर- समस्या एकांकी, व्याख्यामूलक एकांकी,
विषय वस्तु के आधार पर- सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक, पौराणिक एकांकी आदि एकांकी के अनेक भेद किए जा सकते हैं।
संदेश की दृष्टि से- आदर्शवादी, यथार्थवादी, मनोरंजनवादी, और प्रकृतिवादी एकांकी भी मानी गई है।
रंगमंच है या अभिनेता की दृष्टि से- एकांकी को पठनीय एकांकी और रंगमंचीय एकांकी नामक दो भागों में बांटा जा सकता है।

बुधवार, 24 जून 2015

सुख-दुःख

                                     सुख-दुःख

हमारे जीवन में सुख-दुःख आसमान में निरंतर आते-जाते रहने वाले बादलों की तरह होते हैं| एक तरह से देखा जाए तो सुख-दुःख  हमारी क्रियाओं की प्रतिक्रियाओं का नाम है|  जीवन में किसी कार्य के करने से हमें सुख मिल जाता है, तो किसी कार्य को करने से दुःख |  लेकिन जब हमें सुख मिलता है  तो हम उसका ज्यादा हिसाब-किताब नहीं लगाते और अगर लगाते भी हैं तो उसका पूरा श्रेय अपनी सूझ-बुझ को देते हैं या फिर अपनी अच्छी किस्मत को, और हाँ, अगर दुःख  मिलता है तो उसका पूरा हिसाब-किताब लगाया जाता है, उसके लिए कभी हम अपने-आप को दोषी नहीं ठहराते हैं|  कभी उस दुःख के पैदा होने का दोष  हम अपनी फूटी किस्मत को देते हैं या फिर हम अपने किसी निकटतम व्यक्ति को उस  दुख का कारण  मानते हैं, और अगर कोई भी  कारण न मिले तो  अंत में पूरा ठीकरा भगवान के सिर पर फोड़ देते है और हम कह देते हैं कि शायद भगवान को यही मंजूर था|...... ऐसा करना मनुष्य का स्वभाव है, यह सही भी है, क्योंकि शायद ऐसा करके ही व्यक्ति बड़ी से बड़ी मुसीबत को भी झेल जाता है|  लेकिन विज्ञान की माने तो प्रत्येक कार्य (सुख- दुःख) के पीछे कोई न कोई कारण (हमारा कर्म) होता है| अर्थात हमने कुछ न कुछ ऐसा अवश्य किया था जिससे वो सुख या दुःख पैदा हुआ| ये भी सत्य है कि सबके लिए सुख-दुःख की कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती | कोई मामूली से सिर-दर्द को ही दुःख मान कर अपने जीवन को दुखमय बना लेता है और कोई बड़े साहस से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जंग लड़कर अपने जीवन को सुखमय बना लेता है |कहने का तात्पर्य यह है कि कौन, किस छोटी-सी बात को, दुःख मान ले और कौन बड़ी बात को भी दुःख न मान, हंसी में टालकर तनावमुक्त हो जाये, कहा नहीं जा सकता| ये जीवन बहुत छोटा है इसलिए सकारात्मक सोच के साथ और सुख की कामना के साथ जीने की कोशिश कीजिये| वर्त्तमान में, आज में, बल्कि इसी एक पल में रहिये, जो मिला है, जैसा मिला है, उसी से संतुष्ट हो जाइये, धैर्य न खो कर अच्छे समय का इंतजार करना चाहिए| कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन को यदि हम नदी के बहाव की तरह समझ कर कुछ ज्यादा गुना-भाग किये बिना ही उसकी दिशा में चलते चले जाए तो जीवन सरल बन जाता है, वरना जीवन की डगर बड़ी कठिन है| 


सोमवार, 15 जून 2015

कहानी और उपन्यास में अंतर

  'उपन्यास और कहानी के अंतर'

कहानी और उपन्यास में सबसे बड़ा अंतर आकार का है।  उपन्यास जीवन की संपूर्ण वृत्ति को लेकर चलता है जबकि कहानी में आंशिक वृत्ति को ही चित्रित किया जाता है। उपन्यास में मानव जीवन की अनेक संवेदनाओं का वर्णन होता है और उनकी एक योजना होती है। जबकि कहानी में एक ही संवेदना छलकती है वह एक अंग की झांकी मात्र है। उपन्यासकार जीवन के नाना प्रकार के पक्षों से संबंधित व्यापक कथा सामग्री का चयन करता है, किंतु कहानीकार जीवन के किसी एक ही मार्मिक पहलू की प्रस्तुत करता है।  उपन्यासकार की भांति वह अपनी कथा को ना तो जटिल रूप दे सकता है और ना ही प्रासंगिक कथाओं में घुमा सकता है। कहानीकार सीधा एक ही कथा को लेकर लक्ष्य की ओर बढ़ता है। उपन्यासकार विभिन्न प्रासंगिक कथाओं से होता हुआ मुख्य कथा को मंथर गति से अंत की ओर ले जाता है। जबकि कहानीकार को यह छूट नहीं होती। उपन्यास में जहां कथा विकास के पांच सोपान होते हैं- आरंभ, विकास ,चरम सीमा ), निगति और अंत होते हैं, वहीं कहानी में केवल तीन तत्व ही मुख्य  रहते हैं। उपन्यास की तरह कहानी में निगति के लिए स्थान नहीं होता।

      कथावस्तु कहानी का अनिवार्य तत्व है। किंतु उपन्यास की भांति इस में कथा सूत्रों का विकास अनिवार्य नहीं है । अनेक आधुनिक चरित्र प्रधान कहानियों में कथावस्तु अत्यंत महत्वपूर्ण होती है जैसे प्रेमचंद की पूस की रात । 

        चरित्र चित्रण की दृष्टि से भी कहानी और उपन्यास में अंतर है। कहानी में पात्रों की संख्या कम होती है, प्रायः एक मुख्य पात्र और एक या दो अन्य पात्र होते हैं। उसमें उपन्यास की तरह अधिक पात्र नहीं होते। उपन्यास में पात्रों के चरित्र को विकसित होने का पूर्ण अवसर मिलता है, जबकि कहानी में पात्रों के चरित्र की रूपरेखा बनाने के लिए पाठकों को कल्पना का आश्रय लेना पड़ता है, कहानीकार उपन्यासकार के समान पात्रों का चरित्रविकास पूरे विस्तार से नहीं दिखा सकता, अपने पात्रों को सजीवता प्रदान करने के लिए उसे कला लाघव से काम लेना पड़ता है।

        उपन्यास में जीवन का सर्वांगीण चित्रण होता है , जबकि कहानी में जीवन के एक पक्ष की झलक या एक क्षण का घनीभूत जीवनदृश्य दिखाया जाता है, यदि उपन्यास जीवन का चक्र है तो कहानी किसी विशेष क्षण में चलते हुए चक्र का दिखावा है। कहानी में उपन्यास की सी अनेकरूपता नहीं होती, उसमें ना ही प्रासंगिक कथाएं होती हैं और ना ही वातावरण और देश काल की परिस्थितियों का विस्तार होता है।

         उपन्यास पढ़कर संपूर्ण जीवन चक्र का परिचय प्राप्त कर एक संतुष्टि का अनुभव होता है, परंतु कहानी एक प्रेरणा देती है, एक चेतना जगाती है, एक शंका उत्पन्न करती है तथा पाठक की जिज्ञासा वृत्ति को अतृप्त छोड़ देती है। देश काल और वातावरण के विस्तार की उपन्यास में अधिक संभावना होती है इसके विपरीत कहानी में इसके लिए कम अवकाश होता है। फिर भी अपनी संक्षिप्त परिधि में ही देश काल की स्पष्टता और   कार्य से परिस्थिति की अनुकूलता व्यंजित करने के लिए यह तत्व आवश्यक है। वातावरण प्रधान तथा ऐतिहासिक कहानियों में इस तत्व की विशेषता रहती है। 

         कहानी में उपन्यास की अपेक्षा भाव तीव्रता की प्रमुखता  होती है। उपन्यास में विस्तार होता है। कहानी एकाग्र दृष्टि को लेकर चलती है तो उपन्यास समग्र दृष्टि लेकर चलता है। उपन्यास में चरित्र का विकास होता है जबकि कहानी में चरित्र के किसी एक पक्ष या व्यक्तित्व की झलक दिखाई जाती है। कहानी में कथानक चरित्र -चित्रण और देशकाल -वातावरण तीनों तत्व होते हैं , किंतु इनमें से किसी एक को प्रधानता प्राप्त हो सकती है। उपन्यास में सभी तत्वों का विस्तीर्ण समावेश हो सकता है और उपन्यास की सफलता सभी तत्वों के यथोचित मिश्रण और प्रसार में है। कहानी एक ही बैठक में पढ़ी जाने वाली रचना होती है जबकि उपन्यास महीनों में समाप्त किया जा सकता है तथा कहानी का प्रभाव उसकी कथन शैली पर निर्भर होता है। कहानी की शैली अपनी संक्षिप्तता के कारण अधिक व्यंजनामयी होती है जबकि उपन्यास की शैली कम व्यंजनामयी में होती है।

रविवार, 1 मार्च 2015

साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम'

                                                    'साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम'
किसी  विद्वान् के द्वारा  कहा गया  है-
बन जाते सिद्धांत प्रथम,
फिर पुष्ट  हुआ करती है|
अर्थात सिद्धांतों का निर्माण तो पहले हो जाता है और उनकी व्याख्या आलोचकों के लिए छोड़ दी जाती है। यह उक्ति सत्यम शिवम और सुंदरम  सिद्धांत पर भी लागू होती है। इसका इतिहास बहुत पुराना है। लेकिन भारत में इसका प्रचलन आधुनिक युग में हुआ। कुछ बहुत पुराने आस्थावादी या भाग्यवादी विचारकों का कहना है कि तीन की संख्या शुभ मानी गई हैऔर यह सूत्र भी तीन शब्दों का ही है, अतः तीन शब्दों के इस सूत्र का निर्माण बहुत पहले हुआ है ।
       आधुनिक युग में बाबू गुलाब राय ने इसको The  Truth, The Good, The Beautiful  का अनुवाद माना और बताया कि भारतीय साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम का प्रयोग बंगला भाषा से लिया है। वैसे भी बंगला से बहुत कुछ मिला है फिर चाहे राष्ट्र गीत हो या राष्ट्र गान हो, माना गया है कि  सबसे पहले इस उक्ति का प्रयोग रविंद्र नाथ टैगोर के पिता महर्षि देवेंद्रनाथ में प्रयोग किया था और इस प्रकार बाद में  बंगला से हिंदी साहित्य में यह सूत्र आया। क्योंकि यह उक्ति भारतीय विचारकों के अनुकूल थी, अतः हिंदी में घुलमिल गई और मौलिक रूप में प्रतीत होने लगी।  रविंद्र का कथन है- सत्य और सौंदर्य का घनिष्ठ संबंध है। सत्य में सौंदर्य का होना और सौंदर्य में शिव का होना अनिवार्य है।
साहित्य में सत्यम-
                               साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम से क्या अभिप्राय है?  इस पर विचार करना जरूरी है। दार्शनिक सत्य और वैज्ञानिक सत्य का संबंध बुद्धि और आत्मा से है। जबकि काव्य या साहित्य के सत्य का संबंध व्यक्ति की भावना से है। वस्तुतः काव्य दार्शनिक, वैज्ञानिक सत्य को ही प्रस्तुत करेगा पर उसे कल्पना का आवरण पहनाकर। वैज्ञानिक सत्य यथार्थवादी है जबकि काव्य सत्य आदर्शवादी है। अरस्तु का कहना है कि इतिहास घटित घटनाओं का तथा काव्य संभव घटनाओं का चित्रण करता है। इसलिए काव्य में इतिहास और कल्पना का समन्वय रहता है। इसलिए नीरस इतिहास को सरस रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय काव्य को जाता है।
साहित्य में  शिवम-                   
                                इस धारणा (साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम) से कतिपय आलोचक  सहमत नहीं हैं कि साहित्य लोक कल्याण के लिए लिखा जाए। क्योंकि जीवन आशा निराशा सापेक्ष है। जीवन में किसी कृति की उपयोगिता शिव में निहित है तो किसी की  सुंदरम में।  आचार्य शुक्ल का निबंध 'काव्य में लोकमंगल की साधना अवस्था' में इसी पर बल दिया गया है।
साहित्य में सुंदरम-
                               सौंदर्य मानव की मूलभूत वृति है। यही कारण है कि सृष्टि का मानव  कण-कण में सौंदर्य की सत्ता खोजने का प्रयास करता है। काव्य में सौंदर्य को ही चित्रित करने का प्रयास किया जाता है। कवि कुरूपता को भी सुंदर रूप में प्रस्तुत करता है। निराला की 'विधवा' नामक कविता में मानव जीवन के अत्यंत दयनीय प्रसंग को लिया गया है पर फिर भी पाठक उससे साधारणीकृत होता है क्योंकि कवि ने जीवन के कुरुप पक्ष को सुंदर रूप प्रदान किया।
                                   काव्य सौंदर्य केवल जगत के बाह्य सौंदर्य से संबंधित नहीं है।आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- सौंदर्य बाहर की वस्तु नहीं मन के भीतर की वस्तु है। महादेवी वर्मा ने 'रामा' नामक संस्मरण में इसी तथ्य की ओर संकेत किया है-  "वास्तव में जीवन सौंदर्य की आत्मा है|" रामा का बाह्य व्यक्तित्व कुरुप होते हुए भी उसकी अंतरात्मा अत्यंत स्वच्छ थी, निर्मल थी।
                                   विभिन्न आलोचकों के विचारों को देंखे तो अनेक मनीषी, कवि और उपन्यासकार इससे सहमत हैं कि साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम का समन्वय हो। इसी कड़ी में गुलाब राय का मानना है कि श्रेय और प्रेय का समन्वय ही सच्ची कला है।  प्रेमचंद ने माना है कि साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और सुंदर बनाता है।  गंगा प्रसाद पांडे के अनुसार साहित्य विचारशील आत्माओं की अमर अभिव्यक्ति है, इसमें जीवन संबंधी विशेष विचारों का संकलन होता है जो हमारे यथार्थ जीवन की प्रगति करता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल लोक में फैली दुख की छाया को हटाने में  ही काव्य या कला  ब्रह्मानंद  और शक्तिमय  रूप धारण करती है| उसकी भीषणता  में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचंडता में भी गहरी आद्रता साथ लगी रहती है, विरोधों का यही सामंजस्य कर्मक्षेत्र का सौंदर्य है। भीषणता और सरसता, कोमलता और कठोरता, कटुता और मधुरता, प्रसन्नता और मृदुता  का सामंजस्य ही लोक धर्म का सौंदर्य है।
     महात्मा गांधी ने कहा है  "यदि कला जीवन को सुमार्ग पर न ला सके तो वह कला क्या होगी?"  सुमित्रानंदन पंत ने माना है कि "सत्य शिव में स्वयं निहित है| जिस प्रकार फूल में रूप, रंग है, फल में जीवन उपयोगी रस और फूल की परिणति फल में सत्य के नियमों द्वारा ही होती है उसी प्रकार सुन्दरम् की परिणति शिवम में सत्य द्वारा ही हो सकती है।"
                   यदि हम हिंदी साहित्य पर विहंगम दृष्टि डालें तो कहा जा सकता है कि जितने भी साहित्यकार हुए उन्होंने साहित्य में तीनों भावनाओं का ही चित्रण किया है।
संस्कृत के आचार्य मम्मट ने काव्य के प्रयोजन में शिव की भावना पर बल दिया है।
तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है-
"बुद्धि विवेक नहीं कुछे मोरे,
सत्य कहुँ लिखि कागद कोरे |"  (सत्य)
इसी तरह एक जगह और तुलसीदास लिखते हैं-
                                                         कीर्ति मनीति भूति भली सोई
सुरसरि सम सब हितकर होई |  (शिव)
जहाँ तक रीतिकाल के साहित्य  की बात है, इसमें सत्यम शिवम सुंदरम का अभाव मिलता है। लेकिन बिहारी में तीनों तत्वों (सत्यम शिवम सुंदरम) का समन्वय मिलता है-
"लिखन बैठी जाकी सवी गहि गहि गरब गरूर
 भए न केते जगत के चतुर चितेरे कूर।"   (सुंदर)
(उस नायिका के रूप का क्या कहना) जिसके चित्र को अत्यंत गर्व और अभिमान के साथ बनाने के लिए बैठकर संसार के कितने चतुर चित्रकार बेवकूफ बन गए -उनसे छत्र नहीं बन सका |
इसी तरह से उनके काव्य में शिव के दर्शन भी होते हैं - "नहीं पराग नहीं मधुर मधु नहिं विकास यहि काल अली कली ही सो बंध्यो आगे कौन हवाल|"  (शिव)
इसी तरह से प्रसाद ने कामायनी में लिखा है- 
"ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की, एक दूसरे से न मिल सके, यह विडंबना है जीवन की।"
इसी तरह पंत ने रश्मिबंध में की  'परिवर्तन' कविता  में 
"मुक्त करो नारी को|" 
लिखा है। पंत ने  सत्यम शिवम सुंदरम का साहित्य में समावेश करते हुए लिखा है-
 "इस धरती के रोम रोम में भरी सहज सुंदरता, 
 इसकी रज को छू प्रकाश, बन मधुर विनम्र निखरता|"   युगवाणी (पंत)
साहित्य में सत्यम शिवम सुंदरम का समावेश किसी भी  कवि को रससिद्ध  कवि बना देता है और वे रस सिद्ध कवि प्रसिद्ध होकर सदा के लिए अमर हो जाते हैं।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

रीतिकालीन कवि मतिराम का काव्य सौष्ठव

 ‘रीतिकालीन कवि मतिराम का काव्य सौष्ठव’ 
मतिराम रीतिकाल की रीति बद्ध काव्य धारा के अंतर्गत आते हैं इस काव्य धारा के यह प्रमुख कवियों में से एक हैं मतिराम के जन्म के विषय में ठीक-ठीक पता नहीं चलता क्योंकि मतिराम ने किसी भी ग्रंथ में अपना परिचय नहीं दिया है| मतिराम ग्रंथावली में इस तथ्य का विवेचन किया गया है कि मतिराम, भूषण और चिंतामणि एक ही गांव के निवासी थे| इसीलिए यह आपस में भाई भी हो सकते हैं| भूषण ने शिवराज भूषण में इनके बारे में जो लिखा है उसी के आधार पर यह सिद्ध होता है कि इनका जन्म 1603 में कानपुर जिले के टिकमापुर में हुआ था और यह बहुत दिनों तक जीवित रहे थे| बताया जाता है कि यह बुंदी के महाराज भावसिंह के यहां बहुत समय तक रहे और उनके आश्रय में ही अपना ‘ललितललाम’ नामक अलंकार ग्रंथ लिखा| मतिराम ने  रस और अलंकार दोनों पर रीतिग्रंथ लिखे इनका छंदसार पिंगल ग्रन्थ शंभूनाथ सोलंकी को समर्पित है| मतिराम ने निम्नलिखित ग्रंथ लिखे- ललित ललाम, लक्षण ग्रंथ, रसराज, फूलमंजरी, सतसई, साहित्य सार, छंदपिंगल आदि । इन सभी में ललित ललाम और रसराज सबसे अधिक प्रसिद्ध ग्रंथ हैं | ललित ललाम अलंकार ग्रंथ है और रसराज श्रृंगार तथा…नायिका भेद का ग्रंथ है रसराज जैसा की नाम से ही प्रतीत होता है रस को लेकर लिखा गया ग्रंथ है| इसमें इन्होंने श्रंगार रस को रसों का राजा माना है तथा नायिका के भेदों का उल्लेख भी अत्यंत मनोहर शैली में किया है|  ललित ललाम’ और अलंकार पंचाशिका अलंकार विषय पर लिखी गई रचना है| ‘ललित ललाम’ में ललाम का अर्थ है- सुंदर और ‘ललित’ शब्द का अर्थ है सुकुमार योगी। इस प्रकार ललित ललाम का अर्थ है ऐसा अलंकार ग्रंथ जो सुकुमार बुद्धि पाठकों के लिए उपयोगी हो| इस ग्रंथ में सौ अलंकारों व उसके भेदों का वर्णन किया गया है| इसमें केवल अर्थालंकारों का वर्णन है सभी अलंकारों के लक्षण दोहों  में दिए गए हैं 
                      बिहारी सतसई के ढंग पर इन्होंने मतिराम सतसई की भी रचना की है| लेकिन इसके दोहे सरसता में बिहारी के दोहों  के समान नहीं है, मतिराम की फूलमंजरी को लेकर डॉक्टर महेंद्र कुमार जी का मत है “इनकी रचनाओं में सबसे अधिक अप्रौढ़ फूलमंजरी है, जिसके भाव स्पष्टत: हमारे कवि की किशोरावस्था की ओर संकेत करते हैं। इस कृशकाय पुस्तिका की रचना सम्राट जहाँगीर की आज्ञा से हुई। ऐसा इसके अंतिम दोहे में लिखा है। इधर जहांगीर की अपनी पुस्तक तुजक-ए-जहांगीरी फारसी में मिलती है। इसके अंतर्गत यद्यपि मतिराम के विषय में कोई चर्चा नहीं पर गुल-ए-आफशां नामक शाही उद्यान की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि उसने इसकी यात्रा संवत 1606 वि. में की थी। जिन पुष्पों की प्रशंसा मुगल सम्राट ने की है फूल मंजरी में भी वे दृष्टिगोचर होते हैं। अतः संभव है कि मतिराम को उक्त यात्रा के अवसर पर आदर्श मिला हो। उस समय इस किशोर की अवस्था 15 16 वर्ष की रही हो, तो उसका जन्म संवत 1661 वि. के लगभग पड़ेगा। रसराज की प्रौढता से भी यही विदित होता है कि इसकी रचना के समय हमारा कवि प्रौढावस्था में पदार्पण कर चुका होगा।
              मतिराम की कविता के मुख्यतः दो ही विषय हैं- श्रंगार और राज प्रशस्ति। श्रृंगार के अंतर्गत मतिराम ने नायक और नायिका के रूप और चेष्टाओं का चित्रण किया है तथा राज प्रशस्ति के अंतर्गत अपने आश्रय दाताओं की वीरता और राजवैभव का चित्रण किया है। इस चित्रण में मतिराम का उद्देश्य इस चित्र में चित्रण में वस्तु वर्णन की अपेक्षा भावों को स्पष्ट करने का अधिक रहा है। वस्तु वर्णन तो प्रायः भाव व्यंजना को तीव्र करने के लिए ही किया गया है। मतिराम के काव्य की एक विशेषता जो उन्हें अन्य रीतिकालीन कवियों से अलग करती है, वह है- उनकी सरलता और अत्यंत स्वाभाविक था उसमें ना तो भावों की कृत्रिम आता है और ना ही भाषा की रीतिकालीन कवियों में इस प्रकार की सरलता और अत्यंत स्वाभाविकता। उनमें न तो भावों की कृत्रिमता है। और ना ही भाषा की। रीतिकालीन कवियों में इस प्रकार की सरलता और स्वभाविकता कम ही देखने को मिलती है। भावों के वर्णन में कहीं भी कृत्रिमता दिखाई नहीं देती और न ही इन्होंने दूसरे रीतिकालीन कवियों की भांति नायिका के विरह -ताप को लेकर अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन किया। बल्कि मतिराम ने नायिका की मानसिक अवस्था का बड़े ही सहज रूप में उल्लेख किया है। जैसे-
सकल सिंगार साज संग लै सहेलिन कों,
सुंदरी मिलन चली आनंद के कंद को।
कवि मतिराम मग करती मनोरथि,
पेख्यो परजंक पै न नंद नंद कों।
नेह ले लगी है देह दाहन दहत गेह,
बाग को बिलोकि द्रुम बेलिन के वृंद कों।
चंद को हँसत तब आयो मुख चंद अब,
चंद लाग्यो हँसन तिया के मुखचंद को 
             यहां संपूर्ण साज श्रृंगार कर मिलन की प्रबल इच्छा से अपनी सखियों के साथ यमुना निकुंज में आई नायिका की मानसिक अवस्था का कवि ने सहज रूप में उल्लेख किया है। इसलिए मतिराम को मानुषी प्रकृति के चितेरे कहा जा सकता है। साथ ही अंतिम पंक्तियों में प्रकृति का सहयोग प्राप्त कर उसकी वेदना और अधिक बलवती हो उठी है। विशेष बात यह है कि यह सब कवि ने बड़ी ही सरल भाषा में कहा है। इनके काव्य ग्रंथों में सरलता ही वह गुण है जो उन्हें कृत्रिमता से भिन्न कर देता है। मतिराम के काव्य में मनोवैज्ञानिक स्थितियों का निरूपण अधिक हुआ है। प्रिय से बिछुड़ने मात्र का भय नायिका को परेशान कर देता है। प्रेमी के विदेश चले जाने की चर्चा भर से ही नायिका की जो दशा होती है या उसकी विरह की अवस्था या नायिका की वियोगावस्था की कथा का वर्णन मतिराम ने बड़े ही मार्मिक ढंग से किया है।
मतिराम ने श्रृंगार वर्णन के अंतर्गत नायिका की अनेक छोटी-छोटी क्रियाओं का वर्णन किया है। जैसे नायिका का नेत्र बंद करके ध्यान मग्न होना, तनिक से आहट पाकर चौक कर आंखें खोलना, अंगड़ाई लेना आदि क्रियाएं अपनी स्वाभाविकता के कारण अत्यंत रमणीय है। मतिराम के काव्य में श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का वर्णन मिलता है। संयोग श्रृंगार के अंतर्गत मुख, कपोल, नेत्र, अधर केश, हाथ आदि शरीर के अवयवों के सौंदर्य का वर्णन किया है। श्रंगार के अंतर्गत संयोग श्रृंगार के विभाव, अनुभाव और मिलन यह तीन अंग ही ऐसे हैं, जिनका प्रत्यक्ष वर्णन हुआ करता है ।इनमें भी विभाव के अंतर्गत आलंबन के रूप और उद्दीपन- सामग्री तथा मिलन में परिहास वर्णन का विशेष महत्व है। इस प्रकार संयोग श्रृंगार के पाँच वर्ण्य विषय कहे जा सकते हैं- रूप, उद्दीपन, अनुभाव, मिलन और परिहास। मतिराम ने इन सब का वर्णन वस्तुपरक और भावपरक दोनों की प्रकार से किया है। नायिका के मुख, रूप, कपोल, नेत्र केश आदि शरीरावयवों के सौंदर्य का वर्णन मतिराम ने किया है। परिहास वर्णन संयोग श्रृंगार का महत्वपूर्ण अंग होने पर भी मतिराम की रचनाओं में उतना स्थान नहीं प्राप्त कर सका, जो रुपाधिक के वर्णन को प्राप्त हुआ है। लेकिन फिर भी कुछ छंदों की रचना अवश्य हुई है और इन छन्दों की मुख्य विशेषता यह है कि इनसे नायक- नायिका के आपस के हंसी मजाक का केवल बाहरी रूप ही प्रकट नहीं होता बल्कि इनके मूल में विद्यमान वह मधुर और गंभीर विनोद भी व्यक्त हो जाता है जिसका उद्देश्य पारस्परिक प्रेम को अक्षुण्ण बनाए रखना होता है। जैसे-
देखत और तिय हि छबीले की मान छबीली के नैनन छायौ।
प्रीतम यों चतुराई करि मतिराम कछु परिहास बढ़ायौ
रीति रची विपरीति जु प्रीति सौं ताको कवित्त बनाए सुनायौ।
भूलि गई रिस लाजन तै मुस्काय पिया मुख नीचे कौं नायौ।
  -रसराज
 मतिराम के काव्य में रंग वैभव देखते ही बनता है । उन्होंने वस्तु- चित्रण में रेखाओं के साथ-साथ रंगों का भी सहारा लिया है। लेकिन किसी रंग विशेष के प्रति उनका मोह नहीं , बल्कि उन्होंने सभी प्रकार के रंगों का प्रयोग किया है। मतिराम इस प्रकार का वर्णन करने में बहुत ही कुशल है। अमावस्या की काली रात, उस पर घुमड़ते काले मेघों ने उसकी कालिमा को और अधिक बढ़ा दिया है मतिराम नायिका के रूप सौंदर्य को दर्शाने के लिए अन्य वस्तुओं के रंग को हल्का कर देते हैं परंतु जहां पर कभी सजावट लाने का प्रयत्न करता है वहां उसके चित्र एक साथ भडक़ीले हो उठते हैं।
 मतिराम की भाषा-
कवि अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति काव्य में भाषा के माध्यम से ही करता है। रीतिकाल ने काव्य भाषा ब्रजभाषा थी। पूरे रीतिकाल में ब्रजभाषा का ही बोलबाला था। मतिराम ने भी अपने ग्रंथों की रचना ब्रजभाषा में ही की है। 
मतिराम की भाषा शैली का अध्ययन करते समय सबसे पहले उसके शब्द समूह पर विचार कर सकते हैं। मतिराम का शब्द भंडार काफी समृद्ध है। क्योंकि ब्रजभाषा एक ऐसी भाषा थी जिसको आधुनिक भारतीय भाषाओं के साथ-साथ संस्कृत का विशाल शब्द समूह में मिला हुआ था। जिसको मतिराम ने तत्सम और तद्भव दोनों रूपों में ग्रहण किया। इसके अतिरिक्त अरबी- फारसी आदि विदेशी भाषाओं के जनसाधारण में प्रचलित शब्द भी इन्होंने ग्रहण किए हैं। इस प्रकार ब्रजभाषा की शब्दावली अनेक भाषाओं और बोलियों के शब्दों के योग से शब्द भाषा बन गई थी। हालांकि ब्रज भाषा स्वयं में भी संपन्न भाषा थी। लेकिन इस भाषा ने दूसरी भाषा के शब्दों को भी बिना किसी संकोच के अपनाया। मतिराम ने अपनी अभिव्यक्ति को अधिक मार्मिक और सरस बनाने हेतु ब्रजभाषा के अपने शब्दों का प्रयोग किया है। लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने उन शब्दों का भी प्रयोग किया जो तत्कालीन साहित्यिक ब्रजभाषा ने दूसरी भाषाओं से किए थे। मतिराम का जन्म बुंदेलखंड के प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। 
इन्होंने संस्कृत के रीति ग्रंथों का भी गंभीर अध्ययन किया था, अतएव संस्कार और अर्जन के फलस्वरूप इनकी भाषा में संस्कृत, अरबी फारसी जैसी समृद्ध भाषाओं के शब्द भी आ गए थे। वैसे संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग उनकी रचनाओं में अधिक हुआ है। जैसे-
"कोकिल कपोतन की सरसाती है।"
इसके साथ साथ अपभ्रंश और प्राकृत भाषा के साथ भी इनका निकट का संबंध है यही कारण है कि इन भाषाओं के अनेक शब्द अपने विकसित और मूल दोनों रूपों में ब्रजभाषा में इतने घुल मिल गए हैं कि लगता ही नहीं है कि यह शब्द इस भाषा के नहीं है मतिराम ने भी अपनी रचनाओं में ब्रजभाषा के अंतर्गत इस प्रकार के जैसे- गोवै, सामुहैँ, लौन, हियरा आदि अनेक शब्दों का प्रयोग किया है, चाहे वह तत्सम या तद्भव शब्द हो चाहे अरबी या फारसी के, चाहे प्राकृत या अपभ्रंश के, मतिराम ने अनेक शब्दों को ब्रजभाषा में ढालकर प्रयोग किया है। इसमें संदेह नहीं है कि उन्होंने अनेक शब्दों को गढ़ा था और उनका अपनी रचनाओं में संयत के साथ प्रयोग किया था शब्दों के समान ही व्याकरण की दृष्टि से भी मतिराम की भाषा स्वच्छ है। इसके वाक्य विन्यास में सामान्यतः इस प्रकार का कोई व्यतिक्रम दृष्टिगोचर नहीं होता जिससे अर्थ तक पहुंचने में किसी प्रकार की बाधा पड़ती हो। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि मतिराम की भाषा सर्वथा दोषों से मुक्त हो। उसने व्याकरण संबंधी दोष मिल ही जाते हैं, परंतु इन दोनों पर ध्यान देने से पूर्व यह नहीं भूलना चाहिए कि वह काव्य की भाषा है गद्य के नियमों पर इसे कसना उचित नहीं बल्कि इन्होंने सरल और स्वाभाविक भाषा का प्रयोग किया है।
संदर्भ ग्रंथसूची-
हिंदी साहित्य का समग्र इतिहास रामकिशोर शर्मा पृष्ठ संख्या 190 हिंदी साहित्य का इतिहास लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय पृष्ठ संख्या 204 205 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास डॉ बच्चन सिंह पृष्ठ संख्या 179 180 हिंदी साहित्य का इतिहास डॉ नगेंद्र पृष्ठ संख्या 280-281



नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...