हिंदसा

रविवार, 29 सितंबर 2024

नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा 

नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में नाट्य साहित्य की बहुत समृद्ध परंपरा मिलती है लेकिन हिंदी भाषा में नाटक का आरंभ 19 में शताब्दी में भारतेंदु युग से ही हुआ है। भारत में लोक परंपरा के रूप में भी नाटक विधा भारतीय लोक साहित्य में हमें मिलती है। हर प्रदेश का अपना लोक रंगमंच है। रासलीला, नौटंकी, स्वांग, रामलीला ,जात्रा यह सब लोक नाट्य परंपरा के ही रूप हैं। किंतु हिंदी नाटक के विकास की जहां तक बात है वह आधुनिक युग से ही आरंभ होता है इससे पहले जो हमें नाटक मिलते हैं वह गद्य में न मिलकर पद्य में मिलते हैं। वास्तव में हिंदी नाटक के आरंभ का श्रेय भी भारतेंदु को ही जाता है जैसे कि गद्य की दूसरी विधाएं निबंध और कहानी आदि का विकास भारतेंदु युग में होता है उसी तरह से नाटक का विकास भी भारतेंदु हरिश्चंद्र के द्वारा आधुनिक काल में ही किया गया। हिंदी का सबसे पहला मौलिक नाटक नहुष को माना जाता है जो 1857 में भारतेंदु के पिता गोपाल चंद्र गिरधर दास के द्वारा लिखा गया था। हालांकि कुछ विद्वान विश्वनाथ सिंह के आनंद रघुनंदन नाटक को भी हिंदी का पहला मौलिक नाटक मानते हैं जो 1780 के आसपास लिखा गया था। किंतु उसमें एक तो ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है। दूसरा वह रामलीला की पद्धति पर ही लिखा गया है। इसलिए वह उतना आधुनिक नाटक कला के निकट नहीं है जितना कि नहुष नाटक। आधुनिक युग में भी हिंदी नाटक पर पाश्चात्य नाट्य साहित्य का प्रभाव देखा जा सकता है क्योंकि अंग्रेज नाट्य कला और मनोरंजन में अत्यधिक रूचि रखते थे और पाश्चात्य साहित्य में नाटकों की रचना प्रचुर मात्रा में हो चुकी थी। इससे प्रभावित होकर सर विलियम जोंस ने फोर्ट विलियम फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत के अभिज्ञान शाकुंतलम् का हिंदी अनुवाद करने के लिए प्रेरणा दी। इसका हिंदी में अनुवाद राजा लक्ष्मण सिंह ने किया जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। जहां तक नाटक के विकास की बात है तो अध्ययन की सुविधा के लिए उसे भी हम तीन युगों में विभाजित कर लेते हैं-

भारतेंदु युग

प्रसाद युग

प्रसादोत्तर युग

हिंदी में नाटक परंपरा की शुरुआत भारतेंदु हरिश्चंद्र के द्वारा होती है। भारतेंदु युगीन नाटकों का मूल उद्देश्य पाश्चात्य संस्कृति के समक्ष भारतीय संस्कृति का महत्व प्रतिपादित करना, भारतीयों में राष्ट्रीय भावना को जागृत करना तथा सामाजिक बुराइयों से भारतीयों को अवगत करा कर उन बुराइयों को दूर करना रहा है। भारतेंदु ने युगीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ऐसे नाटकों की रचना की। इस युग के नाटककार देश के सामाजिक और धार्मिक तत्व, राजनीतिक और आर्थिक दुर्दशा से भी आहत थे। उन्होंने नाट्य साहित्य के माध्यम से समाज को जागृत करने का संकल्प लिया और उन्होंने देखा

कि समाज को जगाने में नाटक सबसे ज्यादा प्रबल विधा है तो इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस युग के नाटककारों ने नाटक लिखें। इस युग के नाटककारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, श्रीनिवास दास, राधाचरण गोस्वामी, अंबिकादत्त व्यास प्रमुख है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने तो नाटकों की रचना के साथ साथ अभिनय भी किया और निर्देशन भी किया। उन्होंने मौलिक और अनुदित दोनों प्रकार के नाटकों का सृजन किया। अनुदित नाटक मूलतः बंगला, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं के हैं और अनूदित और मौलिक कुल मिलाकर 22 नाटकों की रचना की। जिनमें से प्रमुख है- चंद्रावली, नील देवी, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, विद्या सुंदर, मुद्राराक्षस, सत्य हरिशचंद्र, रत्नावली आदि। भारतेंदु के समकालीन नाटककारों में बालकृष्ण भट्ट का नाम भी प्रमुख है उन्होंने 15 नाटकों की रचना की। रेनू संहार, जैसा काम वैसा परिणाम, दमयंती स्वयंवर उनके मौलिक नाटक है। भट्ट जी ने देश काल संबंधी सामाजिक यथार्थ स्थिति का सजीव चित्र प्रस्तुत किया है उन्होंने सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य करके नैतिकता और मर्यादा को प्रतिष्ठित करना चाहा है अपने नाटकों के माध्यम से इसी कड़ी में लाला श्रीनिवास दास का नाम आता है जिन्होंने तपता संवरण प्रहलाद चरित्र रणधीर प्रेम मोहिनी संयोगिता स्वयंवर नाम के चार नाटक लिखे रणधीर प्रेम मोहिनी उनकी श्रेष्ठ रचना है जिसको हिंदी का प्रथम दुखांत नाटक भी माना जाता है इन्होंने अपनी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य नृत्य शैलियों का समन्वय क्या है राधा कृष्ण दास भी भारतेंदु युग के प्रमुख नाटककार माने जाते हैं इन्होंने दुखिनी बाला महारानी पद्मावती महाराणा प्रताप सिंह आदि नाटक लिखें इनके नाटकों में क्रमिक विकास दिखाई देता है प्रताप नारायण मिश्र ने भी सामाजिक विषयों पर दूध का दूध पानी का पानी हम्मीर उठा आदि नाटकों की रचना की है कहने का तात्पर्य यह है कि संक्रांति किस काल में उत्पन्न युग के समस्याओं का चित्रण इस युग के नाटककार ने बखूबी किया है जैसे पारस्परिक फूट धार्मिक अंधविश्वास पाखंड छुआछूत आर्थिक शोषण बाल विवाह विधवा विवाह वेश्या गमन मध्य पान समाज सुधार राष्ट्रीय गौरव आदि इन नाटकों का मूल उद्देश्य बैंक के द्वारा समाज की कुरीतियों का समापन करना था प्रसाद युग

         नाटक के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद का नाम बड़े गौरव के साथ लिया जाता है। जयशंकर प्रसाद के आगमन से नाटक के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। जहां भारतेंदु युगीन नाटकों में ऐतिहासिक स्थानों को वर्तमान संदर्भ में आदर्शवादी स्वर देने की कोशिश की गई थी वही प्रसाद युग में ऐतिहासिक तथ्यों के माध्यम से वर्तमान समस्याओं को रचना के स्तर पर अभी व्यंजक किया गया है उनमें आदर्श या उपदेश का रोपण नहीं है प्रसाद ने ऐसे चरित्रों को निर्मित किया जो ऐतिहासिक होते हुए भी समस्याओं की दृष्टि से प्रासंगिक थे इन के नाटकों में भारतीयता और पाश्चात्य तत्वों का समुचित समाहार दिखाई देता है भारत के अतीत के प्रति गौरवमई अनुभूति प्रेम की भावुक तथा मानवीय संवेदना अतीत की राष्ट्रीय गरिमा का आधुनिक संदर्भों में चित्रण आदि प्रसाद योग्य नाटकों के प्रमुख विचारक तत्व है जिस हिंदी नाट्य साहित्य को भारतेंदु ने स्थापित किया था उसे जयशंकर प्रसाद ने पल्लवित किया जयशंकर प्रसाद के प्रमुख नाटकों में सज्जन विशाल अजातशत्रु राज्यश्री कामना चंद्रगुप्त ध्रुवस्वामिनी आदि आप शामिल है उन्होंने मुख्य रूप से ऐतिहासिक नाटक लिखें कामना उनका प्रतीक नाटक है प्रसाद के नाटकों में उनके अंतिम नाटक ध्रुवस्वामिनी का भी विशेष स्थान है यह एक ऐतिहासिक नाटक है और समस्या प्रधान नाटक है इस नाटक में प्रसाद ने नारी समस्या को प्रस्तुत किया है पुनर्विवाह का अधिकार हिंदू स्त्री को है और इस समस्या को उन्होंने इस नाटक में बड़ी ही कौशल से रखा है नात ए शरीफ की दृष्टि से प्रसाद जी के नाटक बेजोड़ हैं उनमें भारतीय और पाश्चात्य नाट्यकला का संतुलित समन्वय हुआ है पाश्चात्य नाटकों में पाया जाने वाला संघर्ष अंतर्द्वंद व्यक्ति व चित्र पति नायक की प्रधानता की थी योजना आदि का प्रसाद के नाटकों में समावेश हुआ है प्रसाद जी के नाटक ने तो सुखांत है ना दुकान बल्कि वे प्रसाद दांत है उनके नाटक श्रेष्ठ नाटकों की कोटी में श्रेणी में रखे जाते हैं प्रसाद जी के नाटकों पर आरोप लगाया जाता है कि यह पाठ्य अधिक है अभिनय कम दृश्यों की अधिकता पात्रों की अधिकता का लिस्ट भाषा दार्शनिक था बड़ा आकार उनके नाटकों में के दोष बताए जाते हैं इसके बावजूद कहा जा सकता है कि प्रसाद महान नाटककार माने जाते हैं प्रसाद योगेन अन्य नाटक कारों में हरि कृष्ण प्रेमी लक्ष्मीनारायण मिश्र सेठ गोविंद दास गोविंद बल्लभ पंत उपेंद्रनाथ अश्क वृंदावनलाल वर्मा पांडे बेचन शर्मा उग्र आदि के नाम लिए जा सकते हैं हरि कृष्ण प्रेमी का स्थान भी इस युग में महत्वपूर्ण है उन्होंने भी ऐतिहासिक नाटकों की रचना की है रक्षाबंधन उनका प्रसिद्ध नाटक है इसी तरह से सेठ गोविंद दास ने भी अपने नाटकों में समकालीन सामाजिक समस्याओं जैसे छुआछूत भ्रष्टाचार पाखंड नेताओं की स्वार्थपरता आदि का निरूपण करते हुए से वापस संतोष कहां त्याग और ग्रहण सुख किसने आधी नाटकों की रचना की है उनके नाटक रंगमंच के अनुकूल है इस प्रकार हम देख सकते हैं कि प्रसाद युग नाटक के विकास में एक क्रांतिकारी पड़ाव था एक नवीन चेतना से युक्त था जिसमें राष्ट्रीयता की भावना की मुखर अभिव्यक्ति दिखाई देती है भारत की सांस्कृतिक चेतना और प्राचीन गौरव को जयशंकर प्रसाद के साथ-साथ इस युग के दूसरे नाटककार ने भी अपने नाटकों में चित्रित किया है हां इस युग के नाटक रंगमंच की दृष्टि से थोड़े कमजोर दिखाई पड़ते हैं।

              प्रसादोत्तर युगीन ।नाटक के विकास का एक नया युग में इस युग में उन सभी प्रयोगों का विकसित रूप हम देख सकते हैं जो जयशंकर प्रसाद ने शुरू किए थे साथ ही नाटकों में जीवन के नए अर्थात दूध के कारण नवीन दृष्टि विकसित हुई शिल्प की दृष्टि से भी अनेक रूप में उभरकर आए इस युग के नाटककार ओने पौराणिक विषयों की तुलना में समसामयिक समस्या मूलक विषयों की ओर अधिक ध्यान दिया देश में स्वतंत्रता के बाद एक नई चेतना का विकास हुआ तथा जनमानस ने जो अपेक्षाएं की थी वह भी पूरी नहीं हो सकी इसलिए स्वार्थपरता छल कपट भ्रष्टाचार अवसरवादी ताकि काशी साम्राज्य हर तरफ दिखाई देता है बढ़ती हुई जनसंख्या में बेरोजगारी उससे उत्पन्न तनाव औद्योगिकरण के कारण जीवन में अनेक समस्याओं का जाल फैला महान महानगरों में जीवन का गिरता स्तर मूल्यों में हुए परिवर्तन आदि को इस युग के नाटककार ओ ने अपनी रचनाओं में व्यक्त किया है इस काल के नाटक जीवन के यथार्थ से जुड़े हुए हैं और शिल्प के स्तर पर भी नंदी पाठ भारत वाक्य प्रस्तावना गीत नृत्य आदि कम ही दिखाई देते हैं सूत्रधार के स्थान पर कमेंटेटर का प्रयोग होना शुरू हो गया था दो या तीन अंकों में नाटक की समाप्ति इस युग में मिलती है कुल मिलाकर रंगमंच एवं अभिनेता का विशेष ध्यान इस युग में नाटक कारों ने रखा है जो कि जिसका कि हमें प्रसाद युग में हवा मिलता है इसी के नाटक कारों में विष्णु प्रभाकर जगदीश चंद्र माथुर धर्मवीर भारती मोहन राकेश सुरेंद्र वर्मा लक्ष्मी नारायण लाल रामकुमार वर्मा आदि आते हैं जगदीश चंद्र माथुर इस युग के प्रमुख नाटककार ओं में से एक है इन्होंने अपने नाटकों के द्वारा रंगमंच को नई दिशा प्रदान की कोणार्क पहला राजा आदि इनके प्रसिद्ध नाटक है धर्मवीर भारती और मोहन राकेश विष्णु प्रभाकर भी इस युग के प्रमुख नाटककार ओं में आते हैं धर्मवीर भारती ने अंधा युग विष्णु प्रभाकर ने डॉक्टर युगे युगे क्रांति टूटते परिवेश और मोहन राकेश ने आधे अधूरे आषाढ़ का 1 दिन लहरों के राजहंस नाटक लिखें यह तीनों ही नाटककार इस युग के प्रमुख नाटककार है जिन्होंने उसी युग की समस्याओं के साथ-साथ रंगमंच रंगमंच इयत्ता को दृष्टि में रखते हुए अपने नाटकों की रचना की प्रसाद उत्तर आधुनिक युग के नाटककार ओं में ऐसे बहुत रचनाकार है जिन्होंने इस विधा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है जिसमें दुष्यंत कुमार रमेश बख्शी विनोद रस्तोगी अमृतराय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना भीष्म साहनी ने भी कर कबीरा खड़ा बाजार में मृदुला गर्ग का एक और अजनबी त्रिपुरारी शर्मा मीरा कांत यह सब आधुनिक काल के रचनाकार है और जो अभी नाटक लिखकर नाटक विधा को समृद्ध कर रही है


      रामकथा : ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक सन्दर्भ 


जन नीति संवाद प्रतिष्ठान के अध्यक्ष जी, आज की परिचर्चा के अध्यक्ष डॉ. अमित राय जी ,संचालक डॉ. कुमार गौरव , छोटे भाई तुल्य डॉ. संतोष कुमार जी एवं कार्यक्रम से जुड़े सभी सुधी गुणी जनों को मेरा नमस्कार |

राम कथा अर्थात  राम के जीवन की कथा|  जिसे हम रामायण कहते हैं, जैसाकि हम सब जानते हैं, भगवान राम की कथा बहुत प्राचीन है लेकिन हमारे लिए आज भी उतनी ही उपयोगी और प्रासंगिक है जितनी पहले थी, दूसरा ये  कथा भारतियों के लिए केवल एक कथा या आख्यान नहीं है बल्कि ये हमारे लिए  एक संकल्प है, एक संस्कार है, एक आदर्श परम्परा है, क्योंकि इस कथा में राम के माध्यम से भारतीय संस्कृति, जीवन दर्शन और मूल्यों और पारिवारिक संबंधों का एक आदर्श रूप प्रस्तुत किया गया है, राम का चरित्र एक पुत्र के रूप में , एक राजा  के रूप में, एक भाई  के रूप में और एक मित्र के रूप में सम्पूर्ण मानव समाज के लिए आदर्श है, आदि युग से लेकर आज तक यह कथा किसी न किसी रूप में चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी क्योंकि यह एक जीवंत कथा है ,हम सबने इसको अनेकोनेक बार पढ़ा है , सुना है और गुना भी है लेकिन आज भी इस अमर कथा को पढ़ने-पढ़ाने, सुनने-सुनाने का हमारा उत्साह कतई कम नहीं हुआ है यही बात इस राम कथा के महात्मय को प्रमाणित करती है| 

                        यहाँ पर मैं अपनी बात, राम कथा से, अपने पहले परिचय से शुरू करना चाहूंगी,  और केवल मेरा ही नहीं बल्कि मुझे लगता है कि अधिकतर का रामकथा से पहला परिचय लोक साहित्य या लोक कलाओं के माध्यम से हुआ होगा, व्यक्तिगत रूप से मुझे तो ऐसा लगता है,  हम सब जानते हैं कि भारत में लोक साहित्य या लोक कलाओं की बहुत ही समृद्ध परंपरा रही है, और अपने अपने क्षेत्र के लोक साहित्य या लोक कलाओं से हमारा विशेष जुडाव होता है, उत्तर भारत का लोक मानस तो अपने बालपन में ही इस पवित्र कथा से परिचय पा लेता है, तो  इसका श्रेय जाता है हमारे अपने अपने क्षेत्र में मंचित हिने वाली  रामलीलाओं को, ये रामलीलाए इसी राम कथा को आधार बनाकर प्रत्येक वर्ष, पुरे भारत में मंचित होती हैं, रामलीलाओं के मंचन की शुरुआत भी प्राचीन काल से ही शुरू हो चुकी थी, कुछ विद्वानों ने इनका आरम्भ 11वीं शताब्दी पूर्व से और कुछ विद्वानों 16वीं सदी से माना है और अनेक शोधो से ये प्रमाणित हो चुका है कि गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस को पूरा करने के पश्चात ही उनके शिष्यों द्वारा वाराणसी में रामलीला का पहली बार मंचन किया गया था। इस प्रकार इन रामलीलाओं का आरम्भ उत्तर भारत से हुआ और यहीं से इसका हर जगह प्रचार-प्रसार हुआ। यहाँ यह कहना भी  गलत नहीं होगा कि राम कथा को जन जन तक पहुँचाने में इन रामलीलाओं का महत्तवपूर्ण योगदान रहा है| क्योंकि पुराने समय में लोग पढ़े- लिखे नहीं होते थे और वाल्मीकि की रामायण का या तुलसी के रामचरित मानस को पढ़ने के लिए शिक्षित होना या संस्कृत, अवधी भाषाओँ का ज्ञान होना ज़रूरी था इसलिए बहुत पहले जब लोग शिक्षित नहीं होते थे तो रामलीलाओं के माध्यम से ही रामकथा से परिचित होते थे, मुझे याद है कि हमारी गली के अंतिम छोर पर रामलीला का मंचन होता था, लोग दूर-दूर से इस लीला को देखने आते थे, रात 9 बजे शुरू होने वाली रामलीला के लिए दर्शक शाम 5 बजे ही सर पर पटरी, मुडे ,छोटी छोटी चारपाई उठाकर इक्कठा होना शुरू कर देते थे| हर साल एक ही राम की कथा होती थी कोई परिवर्तन नहीं लेकिन फिर भी हर साल उतने ही उत्साह के साथ दर्शकों का हुजूम उमड़ता था ,भारत का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने अपने बचपन में रामलीला न देखी हो|  इसलिए जब भी हम अपने घर में अपनी दादी- नानी के सामने जिज्ञासावश राम के जीवन की किसी घटना पर कोई प्रश्न पुछते थे तो उनके उत्तर का आधार उनकी  गली में आयोजित होने वाली रामलीला ही होती थी| लेकिन जैसे जैसे हम बड़े हुए तो पता चला की इस रामलीला का मुख्य आधार आदि कवि महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण’ और गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ हैं  

                      राम कथा की एतिहासिकता हमेशा से ही चर्चा का विषय रहा है, रामकथा किस समय की है ? राम का जन्म कब हुआ ,राम  भगवान् थे या मानव, क्या राम कभी सच में हुए थे या ये सब मिथ है, क्या राम सेतु  का निर्माण राम ने ही किया था, रामकथा में दिए जाने वाने वरदान और शाप के पीछे कितना सच है, आदि अनेक प्रश्न आज भी विद्वानों के बीच बहस का कारण बनते हैं , हालाँकि रामकथा को लेकर पर्याप्त शोध हो चूका है और प्रचुर मात्रा में साहित्यिक , ऐतिहासिक पुरातात्विक प्रमाण  भी उपलब्ध हो चुके हैं लेकिन फिर भी विद्वानों में राम के अस्तित्व और कालक्रम को लेकर बहुत मतभेद है,  

          साहित्य की दृष्टि से देखें तो वैदिक साहित्य भारत का प्राचीनतम साहित्य माना गया है, रामकथा की धारा इसी वैदिक काल की संस्कृत भाषा से प्रवाहित होती हुई पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और आगे हिंदी के साथ साथ अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओँ में बहुत आदर एवं निष्ठां के साथ निरंतर प्रवाहित हो रही है,| कुछ विद्वान् रामकथा का आरम्भ यहीं से हुआ मानते हैं क्योंकि वेदों में कहीं कहीं रामायण के पात्रों जैसे राम, दशरथ आदि नामशब्दों का प्रयोग हुआ है| लेकिन उनके पारस्परिक संबंधों का कहीं कोई वर्णन नहीं हैं इसलिए वहाँ राम का अर्थ दशरथ पुत्र राम से है या किसी अन्य व्यक्ति से इसके बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा सकता , रामकथा को लेकर कामिल बुल्के का शोध पत्र ‘ राम कथा की उत्पत्ति और विकास’ इस दृष्टि से  बहुत महत्तवपूर्ण माना गया है, इसमे उन्होंने लिखा है- ‘वैदिक काल में रामायण की रचना हुई थी अथवा रामकथा सम्बन्धी गाथाएं प्रसिद्ध हो चुकी थी, इसकी समस्त वैदिक साहित्य में कोई भी सूचना नहीं हैं|” इसलिए वेदों में दशरथ पुत्र राम की कथा का वर्णन है, कामिल बुल्के के अनुसार तो यह बात सही नहीं मानी जा सकती, इसके साथ साथ वाल्मीकि और अन्य राम कथाओं में यह भी उल्लेख है कि राम ने अपने विद्या अध्ययन के दौरान वेदों का अध्ययन किया था तो जब स्वयं राम ने वेदों का अध्ययन किया है तो उनका उल्लेख वेदों में कैसे हो सकता हैं?  लेकिन इतना जरुर कह सकते हैं कि इन नामो के प्राप्त होने पर ये तो कहा जा सकता है कि उस समय के लोग इन नामों से अवश्य परिचित थे 

                  भारतीय साहित्य में राम के सम्पूर्ण जीवन को लेकर जो सबसे पहला और प्रामाणिक ग्रन्थ है वो संस्कृत भाषा में लिखा आदि कवि महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण’ है| अत: यह बात तो निश्चित है कि वाल्मीकि कृत रामायण ही सबसे पुरानी राम कथा  है|  समस्त राम साहित्य का मूल स्रोत भी वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण ही है| लेकिन सभी ग्रंथकारों ने रामायण की सभी घटनाओं का अपने -अपने ढंग से उल्लेख किया है, इसलिए रामकथा का वह स्वरूप किसी भी ग्रन्थ में नहीं मिलता जो वाल्मीकि की रामायण में है | इस  ग्रन्थ के रचनाकाल को लेकर सभी विद्वानों का अलग अलग मत हैं-  कोई  ई.पू. ग्याहरवी शताब्दी, कुछ विद्वान छठी और आठवीं शताब्दी ई.पू. के बीच की कृति स्वीकार करते हैं ,  डॉ. कीथ  इसे चौथी शताब्दी ई.पू. की रचना मानते हैं, कुछ विद्वान् इसे बुद्ध के बाद रची हुई मानते हैं, परन्तु वाल्मीकि रामायण में कहीं भी बुद्ध जैसे महापुरुष का उल्लेख नहीं है| अगर  बुद्ध  रामायण काल से पहले होते तो रामायण में बुद्ध जैसे महापुरुष का जरुर उल्लेख मिलता | इसलिए रामायण का रचनाकाल बुद्ध से पहले का माना जा सकता है , फिर रामायण को आदि काव्य भी कहा गया है तो इसकी रचना बुद्ध से पहले ही हुई होगी |  

                       माना कि रामकथा को लेकर महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण’ ही पहला और प्रामाणिक ग्रन्थ है, लेकिन ये भी हो सकता है कि रामकथा का अस्तित्व उससे पहले भी रहा हो, क्योंकि वाल्मीकि की रामायण के प्रारभ में यह उल्लेख है कि राम कथा को पहले नारद मुनि ने महर्षि वाल्मिकी को सुनाया, उसके बाद  ब्रह्मा जी ने वाल्मीकि से कहा कि हे मुनिश्रेष्ठ तुम लोको में धर्मात्मा , गुणवान, और बुद्धिमान हो  इसलिए श्री रामचंद्र जी  के छिपे हुए अथवा प्रकट चरित्रों का वर्णन तुम वैसे ही करो जैसे कि तुम नारद जी के मुख से सुन चुके हो| वे आगे कहते हैं कि श्री रामचंद्र , श्री लक्ष्मण  और श्री जानकी जी के तथा राक्षसों  के प्रकट अथवा गुप्त जो कुछ वृत्तांत हैं वे तुमको प्रत्यक्ष दिख पड़ेंगे और इस काव्य में कहीं भी तुम्हारी कही हुई कोई बात मिथ्या न होगी, अब तुम रामचंद्र जी की मनोहर और पवित्र कथा को  श्लोक बंध बनाओ, जब तक इस धराधाम पर पहाड़ और नदियां रहेगी , तब तक इस लोक में श्री रामचंद्र जी की कथा का प्रचार रहेगा और यह कहकर ब्रह्मा जी वही अंतर्ध्यान हो गए, ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा ने ही श्री वाल्मीकि जी को राम कथा लिखने के लिए प्रोत्साहित किया, उसके बाद वाल्मीकि जी ने रामायण की कथा को लव-कुश को पढाया और इसका गान करना सिखाया, उसके बाद इस कथा को लव-कुश ने राम के दरबार में जाकर श्री राम को सुनाया, इस प्रसंग के साथ कई जगह यह भी वर्णित है कि राम कथा राम के समय में ही लिखी गई, एक प्रसंग भगवान् शिव और पार्वती का भी है,  इस प्रकार कहने का तात्पर्य यह है कि राम कथा के समय को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं, परन्तु ये तो प्रमाणित है कि आदिकवि वाल्मीकि ने राम को नायक बनाकर अपनी रामायण बनाई और तत्पश्चात  उसका अनुसरण करके विश्व के अनेक कवियों और लेखकों ने अपनी अपनी भाषा में किया और राम की कथा को अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया   


                    राम की कथा के विभिन्न प्रसंगों पर पुराणों और संहिताओं में भी उल्लेख मिलाता  है|  पौराणिक साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ हरिवंश में संक्षिप्त राम कथा  मिलती  है जिसमें राम का अवतार रूप में  वर्णन हुआ है,  उसके बाद राम के वनवास गमन से लेकर रावण वध तक की प्रमुख घटनाओं का वर्णन भी किया गया है और अंत में रामराज्य की प्रशंसा भी की गई है, विष्णु पुराण में विशेषकर ताड़का वध , राम और सीता से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख यहां मिलता है| वायु पुराण में भी इसी तरह की कथा का वर्णन है विष्णु पुराण  और वायु पुराण की रामकथा लगभग एक जैसी ही है…..भागवत पुराण में सीता लक्ष्मी का अवतार मानी जाती है सीता स्वयंवर के अवसर पर राम धनुष तोड़ते हैं, राम ही शुर्पणखा को कुरुपित  करते हैं तथा धोबी के कारण सीता त्याग का वर्णन किया गया है, इस पुराण में एक कथा यह भी मिलती है कि समुद्र राम को देखकर तुरंत मार्ग दे देता है, वाराह पुराण में भी  रामचरित का वर्णन है, इस पुराण में पूरी रामकथा तो नहीं मिलती किंतु इस बात का उल्लेख है कि सीता रजा जनक की आत्मजा है और रावण युद्ध के पश्चात, राम द्वारा शिवलिंग की स्थापना की जाती है तथा यह कथा भी इसमे हैं कि दशरथ ने द्वादशी व्रत का पालन किया था जिसके फलस्वरूप उनको राम आदि पुत्र प्राप्त हुए, अग्नि पुराण में राम अवतार की कथा 6 कांडों में वर्णित की गई है, इसमे  रावण वध का उल्लेख किया गया है इसके अनुसार कई वर्षों तक  विश्वामित्र से धनुष विद्या आदि सीखने के बाद  राम, लक्ष्मण ताड़का का वध करते हैं तथा यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षसों का भी अंत  करते हैं , अग्नि पुराण में राम को लोक कल्याणकारी और निष्ठावान शासक के रूप में बताया गया है,  इसमें या भी बताया है राम के वनवास का कारण राम का मंथरा  पर अत्याचार करना था, इसके अतिरिक्त अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी रामकथा की घटनाओं का उल्लेख मिलता है |

                    राम की उपासना को लेकर अनेक संहिताओं का निर्माण हुआ, इन संहिताओं  में राम की महिमा, भक्ति एवं उपासना की पद्धति का पूर्ण विकास उपलब्ध होता है, उनमें राम को ही विश्व की उत्पत्ति और स्थिति के कारण बताया है यहां राम के कृत्यों में उनके ईश्वर होने के संकेत भी स्पष्ट रूप से मिलते हैं, ब्रह्म संहिता में सीताराम की युगलोपासना का उल्लेख भी हमें मिलता है|

                                                         संस्कृत में भी राम की कथा को आधार बनाकर नाटकों की रचना हुई है |कालिदास ने भी रामाश्रित साहित्य रचा, उनके द्वारा रचित रघुवंश नाटक में राजा दिलीप से आरंभ करके पूरे वंश की कथा रची है, दिलीप, रघु, दशरथ आदि का विशेष वर्णन किया गया है,कालिदास ने इसमें राम का विशद वर्णन किया गया और ये सभी पात्र समाज में एक आदर्श स्थापित करने में सफल हुए हैं, उन्होंने इसमे रघुवंशीयों  के जो गुण बताये हैं जैसे- गौ रक्षा करना, अहिंसा धर्म का पालन करना, सत्य  बोलना प्रेम की बजाए कर्तव्य को महत्व देना  ये सब भारतीय संस्कृति के परिचायक हैं,  भास जो संस्कृत के प्रसिद्ध नाटककारों  में गिने जाते हैं उन्होंने  प्रतिमा नाटक, अभिषेकनाटकं की कथावस्तु रामायण से ली है , प्रतिमा नाटक 7 अंकों का है, राम के राज्याभिषेक स्थगित होने, और उनके वनगमन से लेकर रावण वध तक की घटनाओं का वर्णन इस नाटक में किया गया है,  इस नाटक की कथा प्रचलित कथा से थोड़ी भिन्न है,  इसमे दिखाया गया है कि  प्राचीन काल में राजाओं के देवकूल होते थे जिसमें मृत्यु के उपरांत राजाओं की प्रतिमा स्थापित की जाती थी , रघु वंश का भी ऐसा ही देवकुल था जिसमें मृत नरेशों  की मूर्तियां स्थापित की गई थी , जब भरत ननिहाल से अयोध्या लौट रहे थे तो मार्ग में देवकूल में स्थापित दशरथ की प्रतिमा को देखकर ही भरत ने उनकी मृत्यु का अनुमान लगा लिया था, इसी कारण इस नाटक का नाम प्रतिमा नाटक है| प्रतिमाओ के निर्माण की कथा का प्रसंग भास की अपनी कल्पना है , अभिषेक नाटक के 6 अंक हैं,  इसकी कथावस्तु रामायण पर आधारित है नाटक की कथा किष्किंधा पहुंचने से प्रारंभ होती है बाली वध से लेकर रावण वध तक की कथा का वर्णन भास ने इस नाटक में किया  है                    

            भवभूति  भी संस्कृत के महान कवि और सर्वश्रेष्ठ नाटककार हैं  उनके नाटक कालिदास के नाटकों के समतुल्य माने जाते हैं, उनके दो नाटकों -महावीर चरित और उत्तर रामचरित नाटको की कथावस्तु का आधार भी रामायण है, महावीरचरित्र जिसमें राम विवाह से लेकर राज्याभिषेक तक की कथा को लिया गया है कवि ने कथा में रोचकता लाने के लिए कई काल्पनिक परिवर्तन किए हैं ,  

उत्तररामचरित में राम के उत्तर जीवन को जो अभिषेक के बाद प्रारंभ होता है, जिसमें सीता निर्वासन की कथा का वर्णन है, नाटक के अंत में सीता  की निर्दोषता  सिद्ध हो जाती है और  इसके उपरांत राम सीता और लव कुश के साथ अयोध्या वापस आ जाते हैं इसलिए यह नाटक दुखांत नहीं है सुखांत है 

                       संस्कृत के इन  नाटकों में रामकथा के माध्यम से  संपूर्ण भारतीय संस्कृति और सभ्यता अपनी भव्यता के साथ व्यक्त  हुई है , राम के आदर्श  रूप को यहां पर अभिव्यक्ति मिली है राम एक देवता भी है और मानव की है और देवता और मानव दोनों का जो यह समन्वय है वह इतना सुंदर है कि ऐसा समय हमें कहीं और देखने को नहीं मिल सकता, राम के चरित्र ने जिन मूल्यों की स्थापना की है वे प्रय्तेक देश और काल में उपयोगी हैं ,  इसके साथ भारतीय संस्कृति की अगर हम बात करें तो धर्म, अर्थ  काम और  मोक्ष ,  इन चार तत्वो  को महत्व दिया जाता है और जब हम रामायण की बात करते राम कथा की बात करते चाहे वह रामचरितमानस हो चाहे वाल्मीकि का रामायण हो सब में धर्म, अर्थ और  काम को समान महत्व दिया गया है इसके अतिरिक्त तप, संयम, प्रेम, कर्तव्य को भी राम कथा में महत्व दिया गया है 

                    कुछ विद्वान् राम कथा का मूल बौद्ध जातक कथाओं को मानते है, वैसे बौद्ध कथाओं में  रामकथा का ज्यादा विस्तार तो नहीं मिलता लेकिन कुछ रामकथा संबंधी प्राचीन गाथाओं का वर्णन जरूर मिलता है, अश्वघोष ने अपनी रचना बुद्धिचरितं में  सुंदरकांड के अनेक रमणीय उपमाओं को निबंध किया है बौद्ध जातक कथाओं में रामायण का वर्णन है, दशरथ जातक, अनामकं तथा चीनी त्रिपिटक के अंतर्गत दशरथ कथानम है इसमे तो रामायण की पूरी कहानी है लेकिन इन जातको में जो राम कथा मिलती है वह बहुत ही अमर्यादित और विकृत है, राम और सीता संबंध को लेकर जो कहा गया है वह भारतीय परंपरा के अनुसार सही नहीं हो सकता और राम रावण युद्ध का भी इसमें अभाव है यह भी कहा जा सकता है कि बौद्ध दर्शन में अहिंसा को महत्त्व दिया जाता है, और राम ने रावण जैसे राक्षसों का वध किया तो ये बात बौद्धों के अंहिसापरक दृष्टिकोण के विरुद्ध है तो इसलिए इनकी रामकथा राम की लोक प्रसिद्ध उत्तरभारतीय कथा से भिन्न मिलती है| फिर ये भी बात है की बौद्ध धर्म को मानने वाले महात्मा बुद्ध को अपना नायक मानते हैं तो उसके ऊपर किसी और को नायक के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं |

                          इसके विपरीत जैन साहित्य में रामकथा पर अनेक रचनाएं मिलती हैं जैन साहित्य में विश्वास करने  वालों ने रामकथा को अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ ग्रहण किया है, रामकथा के प्रसिद्द अध्ययन कर्ता डॉक्टर कामिल बुल्के ने लिखा है कि- बौद्धों की भांति जैनियों ने भी रामकथा अपनायी है, अंतर यह है कि जैन कथा ग्रंथों में हमें एक अत्यंत विस्तृत कथा साहित्य मिलता है”  लेकिन बौद्ध साहित्य में इस तरह से राम की कथा का विस्तार हमें नहीं मिलता है, जैन साहित्य में रामायण की परंपरा के पीछे जैन धर्म की एक विशिष्ट अवधारणा मुख्य रूप से मिलती रही है जो अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक है, जैन धर्म में ‘ तिरेसठ शलाका पुरुषों का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है, इन तिरेसठ (63)शलाका पुरुषों में 24 तीर्थकर 12 चक्रवर्ती, 9 बलदेव, 9  वासुदेव, तथा 9 प्रति वासुदेव माने गए हैं ,जैन धर्म की मान्यता के अनुसार राम इन 63 शलाका पुरुष परंपरा के अंतर्गत आंठवें  ‘बलदेव ‘ के रूप में पूज्य शलाका पुरुष हैं  और लक्ष्मण आठवें  वासुदेव, रावण आठवें  प्रतिवासुदेव के रूप में माने गए हैं,  इस प्रकार हम देखते हैं कि जैन धर्म में राम को तीर्थकरों तथा चक्रवर्तियों के साथ साथ उच्च स्थान दिया गया है, इसके अतिरिक्त जैन साहित्य में रामकथा संस्कृत की  परंपरानुसार वाल्मीकि ‘रामायण’ या  तुलसीदास की भांति ‘रामचरित’ के नाम से नहीं रखी गई है बल्कि राम का नाम जैन रामकथा काव्यों में पउम अर्थात पद्म {पदम} रखकर पउम चरिउ  कहा गया है,

                              जैन साहित्य में रामकथा की दो धाराएं  हैं - पहली  महाकवि विमल सूरी द्वारा रचित ‘पउम चरियं’ की परंपरा और दूसरी है गुणभद्र आचार्य द्वारा रचित ‘उत्तर पुराण’ की परंपरा| महाकवि विमल सूरी की प्राकृत भाषा में रचित राम कथा परंपरा ही बढ़ती हुई महाकवि स्वयंभू देव कृत  ’पउम चरिउ’ में मिलती है, इस परंपरा की अन्य कृतियों में  हेमचंद्र की जैन रामायण,  जिनदास कृत राम पुराण, सोमसेन कृत रामचरितं प्रमुख हैं |  स्वयंभू को तो अपभ्रंश के वाल्मीकि कहा जाता है और और ये कहा गया है कि महाकवि तुलसीदास के रामचरितमानस पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ा  है क्योंकि साहित्य के महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भी कहा है कि “तुलसी बाबा ने स्वयंभू  की  जैन रामायण जरूर देखी होगी |” यह भी कहा गया है कि दोहा- चौपाई छंद की परंपरा जैन कवियों की ही देन है और जैन साहित्यकार मानस के अनेक प्रसंगों पर जैन रामायण का प्रभाव मानते हैं….. अब जैन रामायण पर मानस का प्रभाव है या मानस का जैन रामायण पर ,ये अलग शोध का विषय है , लेकिन ये जरुर कहा जा सकता है कि रामायण सम्बन्धी इन ग्रंथों में तत्कालीन समाज के सांस्कृतिक व सामाजिक पक्ष की हमें विशेष जानकारी मिलती है , तत्कालीन समाज में बहु विवाह की प्रथा रही थी , रानियों में एक पटरानी भी  होती थी और यह भी बात सच है कि मंथरा और शूर्पनखा जैसी महिलाएं समाज में विघटन और पारिवारिक कलह या क्लेश का भी कारण बनती हैं,  इसके साथ ही समाज में सत्य का पालन करना, वचनों के प्रति निष्ठा, भाइयों की आज्ञा का पालन करना, पिता की आज्ञा का पालन करना, व्यक्ति को अच्छे चरित्र का होना,  ये सब चारित्रिक गुण समझे जाते थे, परस्त्री  से प्रेम करना पाप समझा जाता था , प्रतिज्ञा के लिए अग्नि को साक्षी बनाया जाता था , युद्ध के लिए भी नियम निर्धारित होते थे, इन सबके अतिरिक्त इन ग्रंथों में राम को ईश्वर नहीं बल्कि मानवीय दुर्बलताओं से युक्त  दिखाया गया है|

                            वाल्मीकि की रामायण के बाद  रामकथा को लेकर जो सबसे प्रतिष्ठित ग्रन्थ है वो गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी भाषा में रचित ‘रामचरितमानस’ है| रामचरितमानस हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ है, इसकी लोकप्रियता अद्वितीय है, उत्तर भारत में बहुत से लोगों के द्वारा प्रतिदिन इसका पाठ किया जाता है और सुंदरकांड का पाठ तो पूरे 9 दिन तक किया जाता है मानस का राम हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएं हो फिर जीवन को ख़ुशी ख़ुशी जीना है|  रामचरितमानस की रचना के बाद जितने भी  राम कथा संबंधी ग्रन्थ लिखे गए , सब  पर रामचरितमानस का ही प्रभाव है | तुलसीदास ने इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में  रामचरित मानस को नाना पुराण निगमागम-सम्मत लिखा है, इससे लगता है कि उन्होंने मानस के निर्माण से पहले में अनेक शास्त्रों पुरानों, धार्मिक तथा अन्य काव्य ग्रंथों का अध्ययन किया और अपने पूर्व में लिखे गए समस्त रामचरित सम्बन्धी साहित्य का सार ग्रहण कर उसको रामचरित मानस में संकलित किया है ,परंतु इसके उपरांत भी तुलसी के राम अलग हैं , जब हम पूर्ववर्ती राम साहित्य पर दृष्टि डालते हैं तो लगता है कि तुलसी को मानस के राम का चरित गढ़ने में बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी | मानस का राम का शक्ति, शील और सौन्दर्य से युक्त विविध गुणों से संपन्न , मर्यादा पुरुषोतम  हैं रामकथा सम्बन्धी सारा साहित्य पड़ने के उपरांत भी श्री राम को लेकर वह धारणा नहीं बन पाती जो मानस को पढ़कर बनती है , मानस के अतिरिक्त तुलसीदास ने रामकथा पर आधारित और भी  ग्रन्थ लिखे  जिनमे  रामलला-नहछू , रामाज्ञा प्रश्न , जानकी मंगल आदि प्रमुख हैं| लेकिन सबसे ज्यादा प्रसिद्धि रामचरित मानस को ही मिली, रामानन्द, नाभादास, प्राण चंद चौहान , ह्रदय राम, केशवदास सेनापति आदि कवियों की कृतियाँ भी राम कथा पर आधारित हैं , हिंदी में रामचरित का प्रथम उल्लेख आदिकालीन रचना पृथ्वीराज रासो में प्राप्त हो जाता है, आधुनिक युग में भी राम की कथा को लेकर कुछ रचनाएं हुई है जिनमें रामचरित चिंतामणि (रामचरित उपाध्याय कृत), वैदेही वनवास( हरिओम ) साकेत और पंचवटी (मैथिलीशरण गुप्त ) राम की शक्ति पूजा (निराला )  रचनाएँ विशेष प्रसिद्ध हैं 

                                इस प्रकार वैदिक काल से लेकर आज तक राम के चरित का वर्णन विविध प्रकार से हुआ है, सैकड़ो कवियों, लेखकों ने रामकथा के विभिन्न प्रसंगों पर लिखा है, अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओँ में इस कथा का अनुवाद हो चुका है, अब तक कुल कितने साहित्यकारों ने और कितने प्रकार से लिखा हैं इसकी गिनती करना या इसको बता पाना आसन नहीं है| प्राचीन और समकालीन विभिन्न विषयों के परिप्रेक्ष्य में राम कथा का अनेकोनेक बार विवेचन हो चुका है और हो रहा है| जन नीति प्रतिष्ठान का यह नेक प्रयास भी उसी शृंखला की कड़ी बन कर इतिहास में अंकित होगा| ऐसा मेरा विश्वास है 

           महान कवि तुलसीदास ने भी लिखा है -

                 ‘हरि अनन्त, हरि कथा अनंता| कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता|| 

                  रामचंद्र के चरित सुहाए | कलप कोटि लगि जाहिं न गाए| 

{अर्थात हरि अनंत हैं उनका कोई पार नहीं पा सकता , और उनकी कथा भी अनंत है |सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं | रामचंद्र के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं 

इन्ही शब्दों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देती हूँ 

                                       आप सभी का हार्दिक धन्यवाद और आभार 

संदर्भ सूची -

1 हिंदी रामकाव्य: नए संदर्भ, डॉ.प्रोमिला अवस्थी , चिन्तन प्रकाशन , 22 ए -मछरिया रोड, नौबस्ता, कानपुर 20 8021 ,प्रथम संस्करण 1993 

2. रामचरितमानस, तुलनात्मक अनुशीलन, डॉ. सज्जनराम केणी, पुस्तक संस्थान , नेहरु नगर,कानपुर 



                                

                                                            






गुरुवार, 23 जून 2022


                                                                           कबीरदास


संत कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के प्रमुख संत  कवि हैं,  उन्होंने अपनी वाणी द्वारा आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त धार्मिक आडंबरों पर कुठाराघात किया। वह कर्म प्रधान समाज की पैरवी करते हैं, इसकी  झलक उनकी रचनाओं में साफ़ झलकती है।  मानो लोक कल्याण हेतु ही उन्होंने जन्म लिया था।   

कबीरदास के जन्म के संबंध में मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में हुआ वे लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के  पुष्प के ऊपर प्राप्त हुए। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे, नीरु और नीमा जुलाहे को इनके माता-पिता माना गया है और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। 

कबीर के जन्मस्थान के संबंध में तीन मत हैं : मगहर, काशी और आजमगढ़ में बेलहरा गाँव। मगहर के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि कबीर ने अपनी रचना में वहाँ का उल्लेख किया है : "पहिले दरसन मगहर पायो पुनि कासी बसे आई अर्थात् ..............काशी में रहने से पहले उन्होंने मगहर देखा।..... मगहर आजकल वाराणसी के निकट ही है और वहाँ कबीर का मक़बरा भी है। कबीर का अधिकांश जीवन काशी में व्यतीत हुआ। वे काशी के जुलाहे के रूप में ही जाने जाते हैं। .......... बहुत से लोग आजमगढ़ ज़िले के बेलहरा गाँव को कबीर साहब का जन्मस्थान मानते हैं। वे कहते हैं कि ‘बेलहरा’ ही बदलते-बदलते लहरतारा हो गया। पता लगाने पर न तो बेलहरा गाँव का ठीक पता चला पाता है और न यही मालूम हो पाता है कि बेलहरा का लहरतारा कैसे बन गया और वह आजमगढ़ ज़िले से काशी के पास कैसे आ गया ? वैसे आजमगढ़ ज़िले में कबीर, उनके पंथ या अनुयायियों का कोई स्मारक नहीं है।

कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। उनकी कविता का एक-एक शब्द पाखंडियों के पाखंडवाद और धर्म के नाम पर ढोंग व स्वार्थपूर्ति की निजी दुकानदारियों को ललकारता हुआ आया और असत्य व अन्याय की पोल खोल धज्जियाँ उड़ाता चला गया। कबीर का अनुभूत सत्य के सामने अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियाँ कहीं नहीं ठहर पाती । सत्य भी ऐसा जो आज तक के परिवेश पर सवालिया निशान बन चोट भी करता है और खोट भी निकालता है।

कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में कहलवा लिया– बन गया है तो सीधे–सीधे, नहीं दरेरा देकर। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार–सी नज़र आती है। उसमें मानो ऐसी हिम्मत ही नहीं है कि इस लापरवाह फक्कड़ की किसी फ़रमाइश को नाहीं कर सके।  जैसी ताकत कबीर की भाषा में है वैसी बहुत ही कम लेखकों में पाई जाती है।



कबीर का साहित्य और उसकी कुछ विशेषताएं-

उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाओं में कबीर बीजक, सुखनिधन, होली अगम, शब्द, वसंत, साखी और रक्त शामिल हैं। हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि कबीरदास जी ने अपनी रचनाओं को बेहद सरल और आसान भाषा में लिखा है, उन्होंने अपनी कृतियों में बेबाकी से धर्म, संस्कृति एवं जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखी है

`  विशेषताएं- गुरु का महत्त्व , जाति-पाति का विरोध , सामाजिक समानता , कुरीतियों , धार्मिक  आडम्बरों , पाखंडो का विरोध , रहस्यवाद , करनी-कथनी में अभेद  , नाम स्मरण और ध्यान  को महत्त्व , सत्य पर बल , मूर्ति पूजा और बहु देववाद का विरोध ,  समाज सुधार , जागरण के अग्रदूत , जीवन की क्षण्भंगुर, शुद्ध आचरण पर बल ,अहिंसा, माँसाहार करना माहापाप, अनुशासन, बिना गुरु के दान करना निषेध, व्यभिचार निषेध. छूआछात निषेध

1. करता था तो क्यूँ रह्या, अब करि क्यूँ पछताइ। बोवै पेड़ बबूल का,अम्ब कहाँ तैं खाइ॥

करता था : जब तुमने कर्म किये (बुरे कर्म किये) तो क्यूँ रह्या : तब क्यों नहीं रहे, उसे करते ही क्यों रहे (छोड़ा क्यों नहीं)अब करि क्यूँ पछताइ : अब क्यों पछता रहे हो.बोवै पेड़ बबूल का : तुमने बबूल का पेड़ बोया है. अम्ब कहाँ तैं खाइ : अब तुम आम कहाँ से खाओगे.अम्ब : आमखाइ- खाओगे.खाई-खाओगे. 
कबीर साहेब की वाणी है की जीवात्मा जब बुरे काम करती है तो विचार नहीं करती है. वह बाद में पछतावा करती है लेकिन पछतावा करने से कोई लाभ नहीं होने वाला है. तुमने यदि बबूल के पेड़ को बोया है तो अब तुम आम का फल कहाँ से खाओगे. जो
व्यक्ति जैसे कर्म करता है वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है. जीवन भर व्यक्ति स्वंय की लालसाओं और स्वार्थों की पिछे भागता फिरता है. कबीर साहेब ने कर्म प्रधानता पर बल दिया है, जैसे हमारे कर्म होंगे वैसे ही फल हमें प्राप्त होंगे. इसलिए साधक को चाहिए की वह सद्मार्ग पर चलते हुए नेक कार्य करे और हरी के नाम का सुमिरण करे. बगैर हरी नाम के सुमिरण के इश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है.

2. कबीर इस संसार को, समझाऊँ कै बार। पूँछ जु पकड़ै भेड़ की, उतर्‌या चाहै पार॥
कबीर इस संसार को : इस संसार को समझाऊँ कै बार : कितनी बार समझाऊ. पूँछ जु पकड़ै भेड़ की : जो लोग भेड़ की पूंछ कर. उतर्‌या चाहै पार : वह भव से पार होना चाहता है. कबीर इस संसार को : इस जगत को, समझाऊँ कै बार : कितनी बार समझाऊं, कैसे समझाऊं. पूँछ जु : जो पूंछ पकड़ते हैं.पकड़ै : पकड़ता है. भेड़ की : भेड़ की. उतर्‌या : उतरना चाहता है. चाहै पार : चाहता है.
कबीर साहेब कहते हैं मैं इस जगत को कैसे/कितनी बार समझाऊं ? इस जगत को समझाना कठिन है. यह जगत भेड़ की पूंछ पकड़ कर भव सागर पार करना चाहता है. भेड़ की पूंछ पकड़ लेने से भाव है की वह कर्मकांड और बाह्य जगत की भक्ति के माध्यम से इश्वर को प्राप्त करना चाहता है. सच्ची भक्ति अलग है और दिखावे की भक्ति अलग होती है. लोग देखा देखी में कार्य करते हैं. शास्त्रीय भक्ति, कर्मकांड आदि भेड़ की पूंछ पकड़ने के समान ही है. अतः हृदय से भक्ति करना महत्त्व रखता है, दिखावे की भक्ति से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है.

3. जैसी मुष तें नीकसै, तैसी चालै नाहिं। मानिष नहीं ते स्वान गति, बाँध्या जमपुर जाँहिं॥
जैसी मुष तें नीकसै : जैसा व्यक्ति कहता है (जो आदर्श हैं)
तैसी चालै नाहिं : वैसा करता नहीं है (आचरण में नहीं है)
मानिष नहीं ते स्वान गति : वह मनुष्य नहीं है, वह तो कुत्ता है, कुत्ते की भाँती से है.
बाँध्या जमपुर जाँहिं : बंधकर यमलोक/यमपुर जाता है.
जैसी : जिस प्रकार की, जैसी.
मुष तें : मुख से.
नीकसै : निकलती है, बोलता है. तैसी चालै नाहिं : वैसा चलता नहीं है. 
कबीर साहेब की वाणी है की जो व्यक्ति अपनी कथनी और करनी में भेद रखता है, जैसा कहता है वैसा करता नहीं है वह मनुष्य नहीं अपितु स्वान (कुत्ता) होता है. जैसे कुत्ते को हेय माना जाता है, इसी प्रकार से ऐसा व्यक्ति दुत्कार के काबिल होता है जो कहे कुछ और करे कुछ. ऐसे व्यक्ति को यमराज बांधकर अपने साथ लेकर जाता है.
भक्ति मार्ग में आगे बढ़ने के लिए सर्वप्रथम हमें अपनी कथनी और करनी का भेद समाप्त करना होगा. जो आदर्श हम कहते हैं, उसे अपने आचरण में उतारना आवश्यक होता है. आचरण में भिन्नता होने पर कल्याण संभव नहीं है.

4.पद गाए मन हरषियां, साँखी कह्यां अनंद।
सो तत नांव न जाणियां, गल में पड़िया फंद॥
जैसे भगवा पहन कर दिखावा करना, पाखण्ड करना लाभदाई नहीं है वैसे ही पद और साखी को मात्र गा देने से भी कोई लाभ प्राप्त नहीं होने वाला है, लाभ तो तभी होगा जब उसे जीवन में उतार लिया जाय,
5. 
जप तप दीसैं थोथरा, तीरथ व्रत वेसास ।
सूवै सैंवल सेविया यौ, जग चल्या निरास ॥
जप तप तीर्थ, वर्त एंव विभिन्न देवताओं में विश्वास रखने वाला व्यक्ति थोथा होता है ऐसे व्यक्ति को सदा ही निराशा ही हाथ लगती है जैसे सेमल  के फुल में चोंच मारने पर तोते को निराशा ही हाथ लगती हैं। भाव है की जीव को सच्चे मन से ईश्वर का सुमिरण किया जाना चाहिए।
जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह ।
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ।
 जो जानबूझ कर सत्य का साथ छोड़ देते हैं झूठ से प्रेम करते हैं हे भगवान् ऐसे लोगों की संगति हमें स्वप्न में भी न देना।

बुधवार, 12 जनवरी 2022

                                                     उसने कहा था 

                                'चंद्रधर शर्मा गुलेरी' हिंदी जगत के उन कहानीकारों में से एक हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के वास्तविक स्वरूप को गढ़ा है। हिंदी कहानी के विकास में यह कहानी आधारशिला का काम करती है। इस कहानी का प्रकाशन वर्ष सन् 1915 है । यह कहानी अपने समय प्रसिद्ध हिंदी पत्रिका 'सरस्वती' में प्रकाशित हुई थी। गुलरी जी संस्कृत भाषा के प्रकांड पंडित अथवा विद्वान थे, किंतु जिस समय उन्होंने यह कहानी लिखी वह समय भारत में खड़ी बोली के विकास का समय था, गुलेरी जी ने खड़ी बोली के श्रेष्ठ रूप का वर्णन किया है। कहानी के केंद्र में प्रेम का पवित्र भाव है| यह प्रेम अपने कर्तव्य, अपने राज्य और अपनी कौम के लिए है तथा दूसरी ओर कहानी में  मानवीय प्रेम का उदात्त स्वरूप दिखाया गया है| इसके अतिरिक्त लेखक ने बड़ी ही रोचकता के साथ भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को दिखाने का प्रयास भी किया है। 

                कहानी की शुरुआत अमृतसर के बंबूकाट बाजार से होती है जहां लहना सिंह अपने मामा के लिए दही लेने गया था। वहां उसकी मुलाकात एक लड़की से होती है, जिसकी ओर आकर्षित होकर वह पूछता है कि 'तेरी कुड़माई हो गई'  और लड़की कहती है- धत्त।  यह कई बार घटित होता है। परन्तु एक बार लडके की संभावना के विपरीत लड़की की और से  धत्त की जगह 'हां' जवाब आता है और लड़का जिसका नाम लहना सिंह है, बहुत व्याकुल हो जाता है,  इस व्याकुलता के कारण वह रास्ते में किसी से टकराकर अंधे की उपाधि पाता हुआ तथा किसी के ठेले  टकराकर उसका दूध गिरा कर अर्थात ठोकर खाता एवं मारता हुआ  विक्षिप्त अवस्था में घर की तरफ चल देता है। दो युवाओं के अनायास मिलन, आकर्षण, क्षणिक संवाद और तत्पश्चात एक लंबे अंतराल तक पुनः ना मिलने का दृश्य उपस्थित कर कहानी आगे बढ़ती है। एकाएक यह कहानी उस समय नया मोड़ लेती है जब युवा लहना सिंह मिलिट्री में सिपाही है और वह लड़की उसी सेना के सूबेदार की पत्नी है।  सूबेदार के घर पर्दे की ओट में लहना सिंह से सूबेदारनी का पुनः संवाद होता है। इस घटना के 25 वर्षों के बाद अब लहना सिंह नंबर 77 राइफल्स में जमादार है। वह यह सारी घटना को भूल चुका है। प्रथम विश्व युद्ध के लिए छुट्टियों से लौटते वक्त सूबेदार लहना सिंह के घर से होकर जाते हुए सूबेदारनी से भेंट वाली वह  स्मृति ताजी हो जाती है और वहां वह अपने बचपन के सात्विक प्रेम के लिए सूबेदारनी से वादा करता है कि वह सूबेदार व बोधा सिंह (जो उसका एकमात्र लड़का है) उसके प्राणों की रक्षा करेगा।

     कहानी पंजाब के सिख परिवार के एक युवक और युवती की है। इन दोनों के माध्यम से रचनाकार ने न केवल अमृतसर की माधुर्यमयी वाणी का दर्पण प्रस्तुत किया है, अपितु पंजाबी भाषा, खानपान की संस्कृति,  बाजार की गहमागहमी, युवक-युवतियों के विचारों में खुलापन तथा संबंधों की गरिमा को सहज रूप में प्रस्तुत कर दिया है। युवक- युवतियों के प्रेम संबंध, को दर्शाते समय देश, पारिवारिक मर्यादाओं, सीमाओं को भी ध्यान में रखते हुए प्रेम को यह कहकर परिभाषित किया है "देखते नहीं यह मेरा नया सालू," .. इतनी बात सुनते ही युवक की प्रतिक्रिया समाज के गली के  पूरे ताने-बाने को प्रस्तुत कर देती है। पंजाबी संस्कृति का एक दूसरा रूप जिसमें युवक की कर्तव्य परायणता का समावेश है, उसकी प्रस्तुति भी कहानी में सहज वर्णन प्रक्रिया के तहत चित्रण हुआ है। प्रथम विश्वयुद्ध में लहना सिंह अंग्रेजों की ओर से जर्मन सेनाओं के खिलाफ लड़ता है| वह अपनी समझदारी, कर्तव्य निष्ठा एवं साहस से अपने साथियों तथा सूबेदार हजारा सिंह एवं बोधा सिंह की रक्षा करता है। वह खुद भी घायल है, गोली का जख्म बहुत गहरा है लेकिन किसी को अपने गहरे घाव की खबर नहीं होने देता|  घायलों को के जाने के लिए शिविर में  गाड़ी आती है| सभी को गाड़ी में बिठाते हुए लहना सिंह सूबेदार से कहता है जब घर जाओ तो यह कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया। गाड़ी के जाते ही लहना सिंह लेट जाता है, मृत्यु के पहले उसे सभी घटनाओं की स्मृति आती है, यह स्मृतियां ही  25 वर्ष के अंतराल को खत्म कर एक दूसरे से संबंधित करती हैं, इस तरह कहानीकार में कथानक में आदि, मध्य और अंत का सुंदर नियोजन किया है। इस कहानी के सुंदर नियोजन के संबंध में डॉ नगेंद्र का मत है कि - उसने कहा था कहानी का आदि चंचल, मधुर है पर अंत में जैसे सारी ही कहानी रस में डूब जाती है। 8  साल की उस छोटी सी घटना से माधुर्य और लहना सिंह के पुरुषार्थी व्यक्तित्व से शक्ति प्राप्त कर अंत में उसके बलिदान की करुणा अधिक गंभीर हो जाती है। लहना सिंह सूबेदारनी के एक कथन की रक्षा करने के लिए या कहें कि अपने प्रेम की समर्पण शीलता हेतु जीते जी आन बान के साथ निभाना चाहता है। सूबेदार और उसके पुत्र दोनों की रक्षा करता है| सूबेदार के गाड़ी पर बैठने के समय लहना सिंह का यह कहना कि 'उसने कहा था' का संदेश प्रेषित कर देना ही इस कहानी की आत्मा है। 

कहानी के अंत में पंजाब की संस्कृति का एक और आनंदमय रूप दिखाई पड़ता है पसली के घाव से रक्त बह कर जम चुका है उसका अंत समय बिल्कुल नजदीक है। प्राण शरीर से निकलना ही चाहते हैं,  लहना सिंह के मस्तिष्क में जीवन के बीते हुए क्षण एक-एक करके सामने आते हैं। यह भारतीय संस्कृति की ऐसी चेतना है जिसका कोई तार्किक जवाब नहीं है किंतु यह माना जाता है कि व्यक्ति के अंतिम समय में उसके भले- बुरे कर्म उसे एक- एक कर याद आ रहे होते हैं। लहना सिंह इसी स्थिति में है। सूबेदारनी का प्रश्न और वह उसके नेत्रों से जा चुका है अब उसे कुछ याद है तो वह है अपने भाई की बातें, अपने घर का आंगन जहां आम का वृक्ष लगा हुआ था, उस अमराई की छांव में दोनों भाई बैठे हैं। लहना सिंह जानता है कि अब उसके प्राण निकलने वाले हैं इसलिए वह अपने  बड़े भाई कीरत सिंह की गोद में है और वह अपने बड़े भाई से कुछ कह रहा है लहना का सिर अपनी गोद में रखकर वजीरा सिंह बैठा है जब वह पानी मांगता है तब वजीरा सिंह पानी पिला देता है|  आधे घंटे तक लहना सिंह चुप रहा फिर बोला 'कौन? कीरत सिंह! वजीरा सब कुछ समझ गया था इसलिए उसने 'हाँ' कहा था| लहना सिंह उसको कह   कहा था - 'भैया मुझे और ऊंचा कर ले, अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले। वजीरा सिंह ने वैसा ही किया जबकि उसके आंसू टप- टप  टपक रहे थे। कहानी का अंत इस खबर के साथ होता है कि 68 वीं सूची मैदान में घावों से मरा- नंबर 77 सिख राइफल्स जमादार लहना सिंह।  इस प्रकार इस कहानी का अंत बेहद मार्मिक बन पड़ा है|

शुक्रवार, 7 मई 2021

गंगा स्नान करने चलोगे? संस्मरण 2.

  हिंदी साहित्य में संस्मरण की गणना दूसरी अन्य गद्य विधाओं की तरह ही  होती है अर्थात जैसे रेखाचित्र रिपोर्ताज आत्मकथा जीवनी एवं पत्र साहित्य आदि की होती है वैसे ही  संस्मरण विधा होती है। संस्मरण साहित्य में कथावाचक जिन घटनाओं, पात्रों एवं शब्द चित्र प्रस्तुत करता है, उसकी प्रामाणिकता संदिग्ध नहीं होती है।संस्मरण में कथाकार अपनी स्मृतियों के आधार पर कथा का निर्माण करता है। संस्मरण का शाब्दिक अर्थ - सम्यक संस्मरण होता है। यह संस्मरण व्यक्ति, घटना, दृश्य और किसी से भी संबंधित हो सकता है। संस्मरण में कथानक का विकास एक रेखीय रूप अर्थात आदि से अंत तक  एक लय में नहीं होता है बल्कि कथानक की लड़ियां विशृंखलित होती हैं । लेखक समय की आवाजाही कथानक में अपनी स्मृतियों के आधार पर करता है। संस्मरण में यह संभव है कि कोई कथाकार वृद्धा अवस्था की घटना का जिक्र कर रहा है और उसके तुरंत बाद युवा अवस्था के विवरणों को देने लगे। कुल मिलाकर संस्मरण में स्मृति स मुख्य होती है| कथाकार को घटनाएं या पात्र या दृश्य जैसे जैसे याद आते हैं वह वैसे वैसे उनका जिक्र करता चलता है गंगा स्नान करने चलोगे पाठ भी  विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखा गया एक संस्मरण है

गंगा स्नान करने चलोगे? संस्मरण विश्वनाथ त्रिपाठी जी के द्वारा लिखा गया है।  इसमें उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के साथ बिताए गए दिनों  को याद करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के चरित्र की अनेक विशेषताओं को ओर इंगित किया है। विश्वनाथ त्रिपाठी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जब काशी में साथ- साथ रहते थे तो गर्मियों में कई बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी जी को गंगा स्नान करने के लिए कभी-कभी लेकर जाते थे। जब वह गंगा स्नान करने के लिए जाते थे तो रास्ते में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी को अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों के बारे में बताते थे- कि कौन- सी पुस्तक पढ़नी चाहिए और वह पुस्तक कहां मिलेगी? वह पुस्तक किस लाइब्रेरी में मिलेगी? आदि-आदि। एक रात जाड़े के दिनों में लगभग रात के 7:00 बजे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी जी से  कहते हैं कि गंगा स्नान करने चलोगे? आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कहने पर विश्वनाथ त्रिपाठी उनके साथ चल पड़े।  जाड़े की  रात में, वह भी 7:00 बजे, गंगा स्नान करने जाने की बात सुनकर विश्वनाथ त्रिपाठी जी हैरान थे बावजूद इसके वे बिना कुछ कहे ही हजारी प्रसाद जी के साथ चल पड़े। उस दिन हजारी प्रसाद द्विवेदी गंगा के तट पर जाने की बजाय वे विश्वनाथ त्रिपाठी जी को विश्वविद्यालय के बहुत बड़े विद्वान पंडित सुखलाल जी के यहां लेकर गए और उनसे विश्वनाथ त्रिपाठी जी का परिचय कराया पंडित सुखलाल जी ने भी विश्वनाथ त्रिपाठी जी को संस्कृत पढ़ने की बात कहते हुए अनेक महत्वपूर्ण बात बताई इस तरह से वापस लौटते हुए पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने विश्वनाथ त्रिपाठी को कहा कि हो गया न गंगा स्नान क्योंकि सुखलाल जी उस समय के बहुत बड़े विद्वान थे और उनसे मिलना या उनसे परिचय होना वास्तव में किसी भी गंगा स्नान से कम नहीं था। इसके अतिरिक्त इस संस्मरण के माध्यम से हमें पता चलता है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बहुत बड़े विद्वान थे जिस उम्र में लोग गंभीरता पूर्वक पढ़ना शुरू करते हैं उस उम्र में द्विवेदी जी बहुत बड़े विद्वान बन चुके थे लगभग 30 वर्ष की आयु में हजारी प्रसाद द्विवेदी को आचार्य कहकर पुकारा जाता जाने लगा था।

 एक अध्यापक के रूप में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी जी लिखते हैं कि क्लास में कोई विद्यार्थी नए अर्थ का संकेत करता था तो वे उसकी बहुत तारीफ करते थे पहली बार तारीफ करने से मन नहीं भरता थोड़ी-थोड़ी देर पर पीरियड में तीन चार बार तारीफ करते-  बहुत ठीक मैंने नहीं सोचा था... मैं तो खींच खांचकर अर्थ कर रहा था ..प्रसन्न होकर वह शिष्यों से कहते-  पुस्तकें भी पढ़ो, पुस्तकालय भी पढ़ो, किताबों की दुकान पढ़ो,  किताबों की दुकान पर जाकर पता चलता है कि कितना कम पढ़ा है पढ़ने को कितना है आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी विद्वानों के लिए संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं का आना भी जरूरी मानते थे आचार्य द्विवेदी जी विद्वान होने से ज्यादा अच्छा मनुष्य बनना मानते थे वह कहते थे कि विद्वान होने से क्या है 50 किताबें पढ़ने से तो कोई भी व्यक्ति विद्वान हो सकता है। मनुष्य बनने की साधना करना बड़ी बात है।

  विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का क्लास में पाठ्यक्रम कभी समाप्त नहीं होता था क्योंकि वह पंक्तियों की व्याख्या बहुत विस्तार से करते थे कबीर के 11 दोहे का अर्थ बताने में वे तीन चार घंटे लगाते थे इस तरह से कोर्स खत्म नहीं होता था और परीक्षाएं सिर पर आ जाती थी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने विद्यार्थियों को घर पर बुलाकर भी पढ़ाते थे इसके साथ साथ वे लिखने में उनकी विशेष रूचि रखते थे, तुलसीदास जी पर लिखना चाहते थे, उत्तरमेघ लिखना चाहते थे। हमेशा वह कुछ न कुछ लिखने के लिए सोचते रहते थे । स्वास्थ्य खराब होने पर भी  उनकी इच्छा लिखने की रहती थी। इसलिए वे अपने शिष्यों को घर बुलाकर, बोलकर कुछ लिखवाने का प्रयास करते थे । विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने इस संस्मरण में उस घटना का उल्लेख भी किया है जब 1960 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थी। इस घटना का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। यह उनके साथ गलत हुआ था और इस बात का उन्हें ताउम्र मलाल  रहा भी और इस जैसी कुछ और घटनाओं के कारण ही उनका सत्य और मानवीयता से एक तरह से भरोसा उठ गया था क्योंकि उनको लगता था कि इस संसार में असत्य और अमानवीयता सत्य और मानवीयता से ज्यादा शक्तिशाली है।

   आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तीन बातों से हमेशा नाराज हो जाते थे- अगर कोई व्यक्ति किसी महिला के चरित्र की निंदा करता था जब या फिर दोपहर के भोजन के बाद  सोते में उन्हें जगा दे या फिर रविंद्र नाथ ठाकुर, मदन मोहन मालवीय, गांधी जी और जवाहरलाल नेहरू के बारे में हल्की बात करने पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी नाराज हो जाते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कालिदास से बड़ा किसी अन्य कवि को नहीं मानते थे। आधुनिक साहित्यकार भी हजारी प्रसाद द्विवेदी से अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस करते थे। इसलिए उनकी शव यात्रा में आधुनिक साहित्यकारों की संख्या पुराने साहित्यकारों से भी ज्यादा थी। वे नई पीढ़ी का सम्मान करते थे। उनका मानना था कि काल की वस्तुगत सत्ता नहीं होती। वह केवल बोझ या मनोविकार है। काल घटनाओं से झलकता है । वह केवल घटनाओं को नापने का बोध माध्यम मात्र है इसलिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कोई घटना कब घटी, किसी व्यक्ति की उम्र क्या है? वह बूढ़ा है या किशोर। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी सोच या उसका दृष्टिकोण होता है। नयापन आधुनिकता का पर्याय नहीं है। नया पुरातन पंथी भी हो सकता है। प्राचीन साहित्य को भी आधुनिक दृष्टि से देखा जा सकता है। इसलिए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को आधुनिक साहित्यकार भी बहुत सम्मान देते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी किसी को दुख नहीं पहुंचाना चाहते थे अनुचित के प्रति विरोध करना जानते थे लेकिन संघर्ष करना उनके वश में नहीं था। वे प्रत्येक व्यक्ति में गुण देख लेते थे और मनुष्य के गुणों का ही बखान करते थे उनका मानना था कि तारीफ कर देने से क्या बिगड़ जाता है मनुष्य कोई रचना थोड़ा ना है कि उसकी समीक्षा की जाए। विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखी एक हस्तलिखित नोटबुक का भी जिक्र किया है। उस नोटबुक के कवर पर हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने हनुमान जी का चित्र बनाया था और उन्होंने एक काव्य पत्र भी लिखा था जो उस समय के प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय जी को भेजा था। उन्होंने इसमें लिखा था कि क्या हो गया? बड़े बड़े कवियों की कविताओं से, क्या दमन, शोषण, अन्याय कुछ भी रुक पाया अर्थात नहीं रुक पाया । इसीलिए द्विवेदी जी के मन में सत्य के प्रति अविश्वास पैदा हुआ और उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ गई। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का पद छोड़ने से पहले और बाद के हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के मनोबल में बहुत अंतर आ गया था। क्योंकि उन्होंने भारतीय व्यवस्था के दो मुंहेपन को देखा था । जिसको वह कभी भुला नहीं पाए। इस तरह से विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने अनेक ऐसे स्मृति चित्रों का उल्लेख इस संस्मरण में किया है जो पाठक के मन मस्तिष्क पर हजारी प्रसाद को लेकर एक अलग ही छाप छोड़ते हैं और वह हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के संघर्षशील जीवन से प्रेरणा पाते हैं और हिंदी के महान साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के चरित्र की  अनेक खूबियों से परिचित या अवगत होते हैं

    गंगा स्नान करने चलोगे नामक संस्मरण खड़ी बोली में लिखा गया है। इसकी भाषा सरल है। विषय के अनुसार भाषा और वाक्य संरचना का चयन किया गया है। शब्दों का प्रयोग भी स्वाभाविक है।  ट्रेन, पीरियड, गाड़ी,क्लास आदि अंग्रेजी  के शब्दों के साथ-साथ तत्सम, तद्भव, देशज शब्दों का भी प्रयोग इस संस्मरण में हुआ है । साहित्यिक भाषा का पुट इस संस्मरण के महत्व को और भी बढ़ा देता है। भाषा मे कहीं भी बनावटी पन नजर नहीं आता । कुल मिलाकर या संस्मरण पाठक को भाव विभोर कर देता है। 

बहादुर कहानी का उद्देश्य और अन्य प्रश्न

 प्रश्न 1

‘बहादुर’ कहानी का सारांश संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए। 

                                या

‘बहादुर’ कहानी की कथावस्तु का उल्लेख कर सिद्ध कीजिए कि यह एक यथार्थवादी कहानी है।

उत्तर : - अमरकान्त जी द्वारा लिखी कहानी ‘बहादुर’, एक मध्यमवर्गीय परिवार में नौकर के साथ परिवारजनों द्वारा किये गये अत्यधिक कटु व्यवहार की कहानी है। लेखक ने स्वयं को कहानी का पात्र बनाते हुए कहानी की आत्म-कथात्मक रूप में रचना की है। अपने से सम्पन्न रिश्तेदारों के घर नौकर द्वारा जुटाई सुविधा एवं शान को देखकर लेखक की पत्नी निर्मला स्वयं भी एक नौकर रखना चाहती है। बहादुर नेपाल को 12-13 साल का लड़का है, जो अपनी माँ के दुर्व्यवहार से तंग आकर घर छोड़कर शहर चला आता है और निर्मला के परिवार में नौकर रख लिया जाता है। निर्मला और उसका परिवार बहादुर के प्रति पहले तो अच्छा व्यवहार करते हैं, परन्तु धीरे-धीरे कठोरता बरतने लगते हैं। वह घर का सारा कार्य करता है, इसके बावजूद उसके साथ गाली-गलौज से मारपीट तक की नौबत आ जाती है। झूठी चोरी का इल्जाम लगाकर उसे अपमानित किया जाता है और पीटा जाता है। अन्तत: बहादुर घर छोड़कर चला जाता है। अब परिवार के सभी सदस्य उसे ढूंढ़ते हैं, क्योंकि उसके कारण सब आराम के आदी हो चुके हैं।

बहादुर की उपयोगिता देखकर सभी अब अपना घरेलु कार्य करने से घबराते हैं, वहादुर के घर छोड़ जाने पर वे सभी पश्चात्ताप करते हैं तथा अच्छा व्यवहार करने की सोचते हैं। परन्तु अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत। बहादुर में सहनशीलता और स्वाभिमान की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। उसके इसी चरित्र के कारण यह कहानी हमें प्रिय है।

प्रश्न 2 ‘बहादुर’ कहानी के उद्देश्य का विवेचनात्मक परिचय दीजिए। बहादुर कहानी की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। 

                                  या

‘बहादुर’ कहानी की कथावस्तु का विवेचन कीजिए और कहानी का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। 

                             या

‘बहादुर’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। 

उत्तर:- आधुनिक कथा-जगत् में प्रेमचन्द की कहानी-कला को अक्षुण्ण रखने वाले कलाकारों में अमरकान्त अग्रणी हैं। इनकी कहानियों में मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग की पारिवारिक परिस्थितियों का सजीव, आदर्श तथा यथार्थवादी चित्रण मिलता है। इनकी ‘बहादुर’ कहानी; मध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी करने वाले बहादुर नाम के पहाड़ी लड़के पर आधारित एक समस्यामूलक कहानी है। कहानी-कला के तत्त्वों के आधार पर कहानी की संक्षिप्त समीक्षा आगे प्रस्तुत है–

(1) शीर्षक-प्रस्तुत कहानी का शीर्षक लघु, आकर्षक, सरल तथा सार्थक है। कहानी की कथा इसके प्रमुख पात्र बहादुर के चारों ओर घूमती है; अत: शीर्षक की दृष्टि से ‘बहादुर’ कहानी एक सफल रचना है।

(2) कथानक-प्रस्तुत कहानी में लेखक ने समाज के वर्ग-भेद को उजागर किया है। बहादुर 12-13 वर्ष की उम्र का एक गरीब बालक है। वह एक साधारण परिवार में नौकर है, जिसका मुखिया स्वयं लेखक है। प्रारम्भ में तो उसका परिवार में पालतू पशु-पक्षियों की तरह बड़ा आदर-सत्कार होता है और वह भी बड़ी मेहनत व लगन से काम करता है, किन्तु कुछ दिनों बाद वह लेखक के बड़े लड़के किशोर और उसकी पत्नी निर्मला द्वारा डॉट, मार खाने लगता है। उससे अपनी रोटी स्वयं सेंक लेने को भी कहा जाता है। एक दिन घर में आये कुछ रिश्तेदारों द्वारा बहादुर के ऊपर चोरी करने का आरोप लगाया जाता है और लेखक द्वारा बहादुर को मारा-पीटा भी जाता है। पत्थर की एक सिल के टूट जाने और समस्त परिवारजनों के दुर्व्यवहार से पीड़ित होने के कारण वह उस घर से भाग जाता है। वह अपने साथ घर का और अपना कोई भी सामान नहीं ले जाता। बहादुर के चले जाने के बाद परिवार के लोगों को बहादुर के गुणों की अनुभूति होती है और वे अपने द्वारा उसके प्रति किये गये अमानवीय व्यवहारों पर पश्चात्ताप करते हैं।

कहानी का कथानक रोचक, सुगठित, संक्षिप्त तथा समस्याप्रधान है। इसमें बताया गया है कि मात्र पूँजीपति ही श्रम का शोषण नहीं करते, वरन् सामान्य मध्यम वर्ग भी इस कुकृत्य में पीछे नहीं है। इस प्रकार कथानक-तत्त्व की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

(3) उद्देश्य ( सन्देश)—इस कहानी का उद्देश्य समाज में उत्पन्न वर्ग-संघर्ष को मानवीय सहानुभूति द्वारा समाप्त करने का सन्देश देना है। शोषितों के प्रति मानवता एवं प्रेम का व्यवहार, ऊँच-नीच के भेद के कारण दिलों में पड़ी दरार को भर देता है। बहादुर भी मानवीय स्नेह एवं संवेदनाओं का भूखा है। मालिक द्वारा पीटे जाने और प्रतिक्रिया स्वरूप उसके द्वारा घर छोड़ दिये जाने पर परिवार के सभी लोगों को पश्चात्ताप का अनुभव होता है। वे स्वयं को दोषी महसूस करते हैं। धनी और निर्धन का वर्ग-भेद मानवीय भावनाएँ ही कम कर सकती हैं। लेखक का मुख्य उद्देश्य दोनों के हृदयों का परिवर्तन है और सबके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार बनाये रखने का सन्देश देना है।

‘बहादुर’ कहानी अत्यन्त मार्मिक कहानी है। यह आत्म-कथात्मक शैली में प्रस्तुत की गयी है। अमरकान्त जी ने बड़े सटीक और सुन्दर ढंग से कहानी को प्रस्तुत करके पाठकों के मन पर अमिट छाप छोड़ी है। कहानी-कला के तत्त्वों की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

प्रश्न 3 ‘बहादुर’ कहानी में उद्घाटित समाज के शोषक चरित्र पर प्रकाश डालिए।

उत्तर:- अमरकान्त द्वारा रचित ‘बहादुर’ कहानी का नायक ‘दिल बहादुर’ नामक नेपाली लड़का, एक निम्नवर्गीय परिवार का सदस्य है और निर्मला का परिवार मध्यमवर्गीय स्थिति को परिवार है। यह आर्थिक दृष्टि से अधिक सम्पन्न परिवार नहीं है, लेकिन झुठे दिखावे और शान-शौकत के लिए नौकर की आवश्यकता को बनाये हुए है। निर्मला पड़ोसियों को अपनी शान-शौकत से प्रभावित करना चाहती है। निर्मला का पति भी दिखावे और प्रदर्शन को ही अपने जीवन का वास्तविक आधार मानता है। अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद अपने रिश्तेदारों की नकल करते हुए वह अपने यहाँ नौकर रख लेता है। निर्मला का लड़का किशोर, नौकर को हीन दृष्टि से देखता है और बात-बात पर उसे गाली देता है। नौकर रखने का प्रदर्शन, नौकर के प्रति दिखावे का व्यवहार, नौकर पर रोब डालना, नौकर से जी-तोड़ काम लेना, उसको बात-बात पर पीटना-गाली देना आदि क्रिया-कलाप मध्यमवर्गीय परिवारों; जो कि समाज का सबसे बड़ा तबका है; की शोषक मानसिकता को उजागर करते हैं और समाज के शोषक चरित्र पर प्रकाश डालते हैं।

हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ कथाकार अमरकान्त’ द्वारा लिखित कहानी ‘बहादुर’ वस्तुतः एक मध्यवर्गीय परिवार में नौकर के साथ परिवारजनों द्वारा किए जाने वाले अत्यधिक कठोर एवं असभ्य व्यवहार पर आधारित कहानी है। अमरकान्त हिन्दी के उन कहानीकारों में से हैं, जिन्होंने अपनी कहानियों में मध्य एवं निम्न वर्ग के प्रति सामाजिक जीवन की अमानवीय स्थितियों को एक यातनागार के रूप में प्रस्तुत किया है।

पात्र-परिचय-

लेखक- कहानी का वक्ता

निर्मला- लेखक की पत्नी

साले साहब- लेखक के साले साहब

दिलबहादुर- एक नेपाली लड़का तथा लेखक के घर का नौकर, जिसका नाम दिलबहादुर से केवल बहादुर कर दिया जाता है।

किशोर- लेखक का बड़ा लड़का,  बहादुर को देख लेखक के मन में नौकर रखने की आवश्यकता का अनुभव करना

एक दिन लेखक के साले साहब एक नेपाली लड़के को लेकर लेखक के घर आते हैं। उसकी उम्र बारह-तेरह वर्ष के लगभग थी, ठिगना चकइठ शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह। वह सफेद नेकर, आधी बाँह की सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने खड़ा था। उसे देखते ही लेखक को स्मरण हुआ कि उसके सभी भाई और रिश्तेदारों के यहाँ नौकर हैं। दोनों भाभियाँ रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती रहती हैं, जबकि उसकी पत्नी निर्मला सुबह से शाम तक घर के कामों में व्यस्त रहती है। यह सोच लेखक का मन ईर्ष्या से जल उठा तथा निर्मला भी हर वक्त नौकर रखने की रट लगाए रहती थी। यही स्मृति बहादुर को देखकर लेखक को नौकर रखने की आवश्यकता का अनुभव कराती है। साले साहब द्वारा लेखक व उसके परिवार को बहादुर का परिचय देना। साले साहब लेखक व उसके परिवार को बहादुर का परिचय देते हुए कहते हैं कि यह एक नेपाली बालक है, जिसका गाँव नेपाल और बिहार की सीमा पर था तथा इसके पिता युद्ध में मारे जा चुके हैं। घर परिवार का भरण-पोषण इसकी माँ करती थी। वह चाहती थी कि लड़का घर के काम-काज में हाथ बटाए, परन्तु शरारती प्रवृत्ति के कारण इसने एक बार उसी भैंस को बहुत मारा जिसको उसकी माँ बहुत प्यार करती थी। इसलिए माँ ने इसे बहुत मारा, जिसकी वजह से इसका मन माँ से कट गया और एक दिन यह माँ के रखे रुपयों में से दो रुपए निकाल कर वहाँ से भाग आया। लेखक तथा उसकी पत्नी निर्मला द्वारा ‘दिलबहादुर’ को नौकर ‘बहादुर’ बनने की प्रक्रिया समझाना

लेखक द्वारा लड़के का नाम पूछने पर वह अपना नाम ‘दिलबहादुर’ बताता है। लेखक उसे अपने घर में नौकर बनकर रहने के फायदे बताते हुए कहता है कि तुम अपनी सभी शरारतें छोड़कर ढंग से काम करना और इस घर को अपना ही घर समझना। हमारे घर में नौकर-चाकर को बहुत प्यार और इज्जत से रखा जाता है, जो सब खाते-पहनते हैं, वही नौकर-चाकर खाते-पहनते हैं। यदि तुम हमारे घर में रह गए तो सभ्य बन जाओगे, घर के और लड़कों की तरह पढ़-लिख जाओगे और तुम्हारी जिन्दगी सुधर जाएगी। निर्मला भी उसे नौकर बनने से पहले घर के कुछ व्यावहारिक उपदेश देती। हर्ड कहती है कि इस मोहल्ले में बहुत तुच्छ लोग रहते हैं न तो तुम्हें किसी के । घर जाना है और न ही किसी का कोई काम करना है। कोई बाजार से कुछ । लाने को कहे तो ‘अभी आता हूँ’ कहकर खिसक आना। तुम्हें घर के सभी सदस्यों से आदर व सम्मान से बोलना होगा तथा अपनी हिदायतें समाप्त करते हुए बड़ी ही उदारता के साथ वह उस लड़के के नाम में से ‘दिल’ हटा देती है। अब उसका नाम केवल ‘बहादुर’ ही बचता है।

बहादुर का परिश्रमी व हँसमुख स्वभाव

बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है, जो अपनी मेहनत से पूरे घर को न केवल साफ-सुथरा रखता है, बल्कि घर के सभी सदस्यों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है। उसके आने से परिवार के सभी सदस्य बड़े ही आरामतलबी एवं कामचोर व आलसी बन जाते हैं। इतना काम करने के बावजूद वह हमेशा हँसता रहता है। हँसना और हँसाना मानो उसकी आदत बन गई थी। वह रात में सोते समय कोई-न-कोई गीत अवश्य गुनगुनाता है।

बहादुर के प्रति किशोर का दुर्व्यवहार

निर्मला का बड़ा लड़का किशोर एक बिगड़ा हुआ लड़का है, जो शान-शौकत तथा रोब से रहना पसन्द करता है। वह अपने सारे काम बहादर को सौंप देता है। यदि बहादुर उसके काम में थोड़ी-सी भी लापरवाही करता, तो वह बहादुर को गालियाँ देता तथा छोटी-छोटी गलती पर बहादुर को पीटता भी है। बहादुर पिटकर एक कोने में चुपचाप खड़ा हो जाता और कुछ देर बाद फिर घर के

कामों में पूर्ववत् जुट जाता। एक दिन किशोर बहादुर को सुअर का बच्चा’ कह देता है, जिससे उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है और वह किशोर का काम करने से मना कर देता है। उसने लेखक के पूछने पर रोते हुए बताया कि-“बाबूजी, भैया ने मेरे मरे हुए बाप को क्यों लाकर खड़ा किया?” इतना कहकर वह रो पड़ता है।

बहादुर के प्रति निर्मला का बदलता व्यवहार

निर्मला बहुत पतली-पतली रोटियाँ सेंकती है, इसलिए वह रोटी बनाने का। काम बहादुर से न करवाकर स्वयं करती है, परन्तु मोहल्ले की किसी औरत ने उसे भड़का दिया कि परिवार के लिए रोटियाँ बनाने के बाद बहादुर से कहे कि वह अपनी रोटी खुद बना लिया करे। तुम यदि नौकरों को पतली-पतली रोटी बनाकर खिलाओगी तो उनकी आदतें खराब हो जाती हैं। निर्मला के दिमाग में उस औरत की बात घर कर जाती है। अब वह बहादर के लिए रोटियाँ सेंकना बन्द कर देती है, लेकिन बहादुर भी अपने लिए रोटियाँ नहीं सेंकता। निर्मला कई बार उसे रोटियाँ सेंकने के लिए कहती है, परन्तु बहादुर रोटियाँ बनाने के लिए मना कर देता है। निर्मला का गुस्सा बढ़ जाता है और वह लपककर उसके माथे पर तीन थप्पड़ जड़ देती है। निर्मला, बहादुर से चिढ़ जाती है। अब वह हर छोटी गलती पर उसे मारती व गालियाँ देने लगती है। निर्मला के रिश्तेदार द्वारा बहादुर पर चोरी का आरोप लगाना। एक दिन निर्मला के रिश्तेदार अपने पूरे परिवार के साथ उसके घर आते हैं। चाय-नाश्ते के बाद बातचीत के दौरान अचानक रिश्तेदार की पत्नी अपने ग्यारह रुपए खो जाने की बात कहती है। सभी बहादुर पर सन्देह करते हैं। बहादुर लगातार मना करता है कि मैंने रुपए नहीं लिए फिर भी उसे डराया-धमकाया जाता है तथा लेखक द्वारा पीटा भी जाता है। इसके बाद निर्मला भी उसे डराती-धमकाती है तथा दो-चार तमाचे भी जड़ देती है। तब भी बहादुर अपने निर्दोष होने की बात कहता है, परन्तु उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं करता। घर के सभी लोगों का बहादुर के प्रति कटुतापूर्ण व्यवहार, चोरी की घटना के बाद घर के सभी सदस्य बहादुर को घृणा व सन्देह की दृष्टि से देखने लगते हैं और उसे कुत्ते की तरह दुत्कारने लगते हैं। बहादुर भी अब उदास रहने लगता है, अब उसके मन में घरवालों के प्रति कोई अपनापन व लगाव न रहा।बहादुर को अब पहले की अपेक्षा अधिक डाँटा व मारा जाता है। उससे अब गलतियाँ व भूलें भी अधिक होने लगती हैं, जिस कारण अब वह काम में भी लापरवाही करने लगता है।

बहादुर का घर से भाग जाना

एक दिन उसके हाथ से सिल छूटकर गिर गई और उसके दो टुकड़े हो गए। पिटाई के डर तथा लोगों के क्रूर एवं असभ्य व्यवहार से तंग आकर वह अपना सारा सामान घर में ही छोड़कर कहीं चला जाता है। निर्मला, उसके पति एवं किशोर को उसकी ईमानदारी पर विश्वास हो गया था। वे जानते थे कि रिश्तेदार के रुपए उसने नहीं चराए थे। अन्त में सभी बहादुर पर स्वयं द्वारा किए गए अत्याचारों के लिए। पश्चाताप करने लगते हैं।

प्रश्न:- कहानी के तत्त्वों के आधार पर ‘बहादुर’ कहानी की समीक्षा कीजिए। अथवा ‘बहादुर’ कहानी की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अथवा ‘बहादुर’ कहानी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। 'अथवा' बहादुर’ कहानी का कथानक अपने शब्दों में लिखिए।


उत्तर:-  प्रसिद्ध नए कहानीकार अमरकान्त रचित ‘बहादुर’ कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर आधारित कहानी है। इसमें एक बेसहारा पहाड़ी लड़के की मार्मिक कथा का वर्णन है। कहानी के तत्त्वों के आधार पर प्रस्तुत कहानी की समीक्षा इस प्रकार है-

(i) कथावस्तु / कथानक

कथावस्तु की दृष्टि से अमरकान्त की सभी कहानियाँ जीवन के अन्तर्विरोधों को वास्तविक रूप में चित्रित करती हैं। उन्हें दलित, निम्न व पिछड़े वर्ग से विशेष सहानुभूति है। ‘बहादुर’ कहानी का प्रधान चरित्र उसी पिछड़े बेसहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। बहादुर बारह-तेरह वर्ष का लड़का है, जो पिता की मृत्यु के बाद, माँ की उपेक्षा व मार से खीझकर शहर भाग आता है। उसे एक मध्यम परिवार द्वारा नौकर के रूप में अपने घर में रख लिया जाता है। वह घर के सभी काम ईमानदारी व लगन से करता है। घरवालों द्वारा डाँट-फटकार तथा मार खाकर भी वह यथास्थिति काम करता रहता है। घरवालों द्वारा चोरी का आरोप लगाना उसे सबसे अधिक आघात पहुँचाता है, जिसके कारण वह एक दिन बिना किसी को बताए घर से चला जाता है। आरम्भ से अन्त तक सम्पूर्ण कहानी बहादुर के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। सहजता, स्वाभाविकता, मनोवैज्ञानिकता व यथार्थता की पृष्ठभूमि पर सुसंगठित कथावस्तु की दृष्टि से यह सफल कहानी है।

(ii) पात्र और चरित्र-चित्रण

‘बहादुर’ कहानी में मुख्य पात्र बहादुर है तथा लेखक, निर्मला, किशोर, रिश्तेदार, साले साहब, बहादुर के माता-पिता गौण पात्र हैं। कहानी की सम्पूर्ण कथावस्तु बहादुर के चरित्र पर टिकी हुई है तथा कहानी का शीर्षक भी चरित्र प्रधान है। कहानीकार ने निम्न वर्ग व मध्यम वर्ग की आन्तरिक वास्तविकताओं को उनके स्वभावगत रूप में पात्रों का चरित्र-चित्रण किया है। सभी पात्र कहानी की कथावस्तु के अनुरूप दृष्टिगत होकर अपनी-अपनी मनोवैज्ञानिकता को प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं।

(iii) कथोपकथन संवाद

प्रस्तुत कहानी का आरम्भ लेखक द्वारा आत्मकथात्मक शैली से होता है, परन्तु कहानी के मध्य में कथोपकथन/संवादों का सटीक प्रयोग हुआ है। कहानीकार ने सरल संक्षिप्त रोचक व गतिशील संवादों का सटीक प्रयोग कर कहानी के विकास को निरन्तर गति दी है; जैसे

“चल बना रोटी”

“नहीं बनाऊँगा”

“जी नहीं बाबूजी!”

अतः कहा जा सकता है, कहानी के कथोपकथन/संवाद पात्रानुकूल व स्थिति के अनुकूल सजीव बन पड़े हैं।

(iv) भाषा-शैली

प्रस्तुत कहानी में अमरकान्त ने सरल, स्वाभाविक और सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है तथा साथ ही चित्रात्मक शैली का भी प्रयोग किया है। भाषा कथा के अनुरूप है, जिसमें अन्य भाषाओं के शब्द भी लिए गए हैं; जैसे-शरारत, ओहदा, किस्सा, इज्जत आदि उर्दू शब्द हैं। लोकोक्तियों तथा मुहावरों का भी प्रयोग हुआ है; जैसे-माथा ठनकना, नौ दो ग्यारह होना, पंच बराबर होना आदि। इसके अतिरिक्त इसमें वर्णनात्मक, काव्यात्मक और आलंकारिक शैली का प्रयोग किया गया है।

(v) देशकाल और वातावरण

कहानी में देशकाल और वातावरण का भी ध्यान रखा गया है। कहानी में निम्न तथा मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सजीव तथा स्वाभाविक वातावरण का चित्रण किया गया है। अपनी आर्थिक तंगी के बावजूद समाज का मध्यम वर्ग अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करना चाहता है। नौकर पर रोब जमाना, उससे जी तोड़ काम कराना, उसे बात-बात पर बार-बार पीटना, गाली देना आदि घटनाओं तथा घर की अव्यवस्थित स्थिति ने पारिवारिक वातावरण को मार्मिक बना दिया है।

(vi) उद्देश्य

‘बहादुर’ कहानी उद्देश्य प्रधान कहानी है, यह कहानी निम्न एवं मध्यमवर्गीय समाज के मनोविज्ञान के वास्तविक चित्र को प्रदर्शित करती है। इस कहानी के माध्यम से वर्ग भेद मिटाने को प्रोत्साहन दिया गया है, जो मानवीय सहानुभूति के आधार पर ही मिट सकता है। कहानीकार ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि वर्तमान समाज झूठे प्रदर्शन व मान प्रतिष्ठा में स्वयं को इतना फँसा चुका है कि वह अपनी मनुष्यता व संवेदना को नष्ट करता जा रहा है।

(vii) शीर्षक

कहानी का ‘बहादुर’ शीर्षक आकर्षक व मुख्य पात्राधारित है। अमरकान्त जी की कहानी के शीर्षक व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित हैं। सम्पूर्ण कहानी की कथावस्तु घटनाएँ ‘बहादुर’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं बहादुर’ कहानी का शीर्षक अत्यन्त सरल, संक्षिप्त एवं रोचक है, जो पाठक के मन में कौतूहलता उत्पन्न करता है। अतः शीर्षक की दृष्टि स ‘बहादुर’ कहानी सफल व सार्थक है।

2 बहादुर’ कहानी के आधार पर बहादुर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

अथवा बहादुर’ कहानी के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर:-  बहादुर कहानी का मुख्य पात्र व नायक है। वह एक नेपाली किशोर है, जो अपने गाँव से शहर भाग आता है। बहादुर की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) छल-कपट रहित भोला बालक बारह-तेरह वर्ष का नेपाली बालक बहादुर’ बहुत ही भोला है और छल-कपट से कोसों दूर है। उसमें न तो किसी प्रकार की कृत्रिमता या बनावटीपन है और न ही किसी बात को छिपाने की कला। वह किसी भी बात का बिल्कुल सच एवं स्पष्ट उत्तर देता है।

(ii) परिश्रमी बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है। वह घर के सभी सदस्यों के अधिकांश कार्यों को करता है और उन्हें करते हुए न कोई आलस्य दिखाता है और न कोई अनमनापन। वह बड़े ही प्यार एवं जिम्मेदारी के साथ अपने कार्यों को सम्पन्न करता है।

(iii) हँसमुख एवं मृदुभाषी बहादुर हर समय हँसते रहने वाला लड़का है। वह । किसी भी बात को कहकर अपनी नैसर्गिक, स्वाभाविक हँसी जरूर हँसता है, जो सामने देखने-सुनने वालों के हृदय को झंकृत कर देती है। वह सभी लोगों के प्रश्नों का उत्तर बड़े ही मीठे स्वर में हँसकर देता है।

(iv) व्यवहार कुशल बहादुर बहुत व्यवहार कुशल बालक है। इसी व्यवहार कुशलता के कारण वह घर के सभी सदस्यों को अत्यधिक प्रभावित कर देता है। मोहल्ले के बच्चों को भी वह अपने गाने सुनाकर मोहित कर लेता है।

(v) स्नेही, सहनशील एवं स्वाभिमानी बालक वह निर्मला के अन्दर अपनी माँ की छवि देखता है। वह स्नेह का भूखा है। जब निर्मला उसका ध्यान रखती है, तो वह भी बीमार निर्मला का बहुत ख्याल रखता है। । बहादुर बड़ा सहनशील बालक है। वह घर के सारे काम करने के बावजूद निर्मला की डाँट खाता रहता है। किशोर भी बहादुर के साथ कई बार दुर्व्यवहार करता था। जिन्हें थोड़ी देर में ही वह भूल जाता है और अपने काम में पूर्ववत् लग जाता है। एक बार किशोर द्वारा उसके पिता से सम्बन्धित गाली देने पर उसका स्वाभिमान जाग जाता है। वह किशोर का काम करने से इनकार कर देता है।

(vi) मातृ-पितृभक्त बालक बहादुर का हृदय मातृभक्ति एवं पितभक्ति की भावना से ओत-प्रोत है। माँ द्वारा पीटे जाने के कारण घर से भागा बहादुर माँ के पास जाना नहीं चाहता, लेकिन माता-पिता के प्रति अपने फर्ज को वह अच्छी तरह समझता है। इसलिए वह अपने कमाए पैसों को माँ को ही देना चाहता है। अपने पिता के प्रति प्रेम ने ही उसे किशोर का काम करने से मना करने हेतु प्रेरित किया। ।

(vii) ईमानदार एवं सच्चा व्यक्तित्व गरीब होने के बावजूद भी बहादुर अत्यधिक ईमानदार बालक है, जिसे बेईमानी छु तक नहीं पाई है। उसके मन में कोई लालच नहीं है। वह घर छोड़कर जाते समय भी अपना सामान तक नहीं ले जाता है। इस प्रकार, बहादुर पाठकों के हृदय पटल पर अपना अमिट चित्र अंकित कर देता है। पाठक उसे लम्बे समय तक याद रखते हैं।

3 बहादुर कहानी के उददेश्य पर प्रकाश डालिए।

उत्तर :- अमरकान्त जी ने बहादुर कहानी में सामाजिक ढाँचे के भीतर आर्थिक विषमताओं के बीच जीवन जीने वाले दो भिन्न वर्गों के यथार्थ को चित्रित करने के साथ-साथ बाधित बचपन की कहानी को भी गति प्रदान की है।

बारह-तेरह वर्ष की उम्र के बहादुर का बचपन जीवन में लगातार आने वाली बाधाओं से रीता (खाली) ही रह गया। पहले माँ की ओर फिर। निर्मला की हृदयहीनता उसके बचपन व किशोरावस्था के सन्धिकाल के स्वाभाविक विकास में बाधा बनती है। जानवरों की भाँति क्रियाकलाप करते हुए, उसका अलमस्त रहना और हर पीड़ा के बाद सकारात्मक दृष्टिकोण से अपने लिए खुशी ढूँढ लेना बहादुर द्वारा बचपन को बचाए रखने का प्रमाण है। इसके साथ ही कहानीकार ने उस विसंगति को उजागर क्रिया है, जहाँ मध्य वर्ग की मानसिकता अपने ही वर्ग के विरोध में खड़े होकर उच्च वर्ग में शामिल होने की आकांक्षा को दिखाकर, मानवीय संवेदना को जागृत करना ही कहानी का मुख्य उद्देश्य है।

4 अमरकान्त की कहानियों का वातावरण पात्रों की मानसिक स्थिति का प्रतिबिम्बन है।” कथन के आधार पर ‘बहादुर’ कहानी की मूल संवेदना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर अमरकान्त ने ‘बहादुर’ कहानी में बहादुर के जीवन की निरन्तर तीव्र होती त्रासदी को एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए अत्यन्त सशक्त रूप में चित्रित किया है। जीवन तथा समाज के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण रखने वाले कथाकार अमरकान्त की कहानी ‘बहादुर’ के सभी चरित्र यथार्थवादी भूमि पर ही खड़े हैं। निर्मला, किशोर और गृहस्वामी जैसे पात्र केवल निर्मला के घर तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे मध्यवर्ग के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं। ये सभी पात्र परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव के कारण मानवीयता और संवेदनहीनता के अन्तर्द्वन्द्व में निरन्तर झूलते रहते हैं। अपने घर में मातृप्रेम को तरसता बहादुर,। निर्मला में माँ की और गृहस्वामी में पिता की छवि देखता है, परन्तु काँच की इन छवियों के टूटकर बिखरने और इनकी पीड़ा अनुभव करने वाला बहादुर, अन्ततः अपने भीतर के बच्चे को निर्मला के घर ही छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के पश्चात् घर में एक अजीब-सी उदासी छा जाती है; जैसे-अँगीठी न जलना, आँगन का गन्दा होना, बर्तन गन्दे होना , कहानी का त्रासद वातावरण समूचे घर की निष्क्रियता का प्रतीक बनकर सामने आता है। बहादुर की उपस्थिति जहाँ कहानी के भीतर घर के वातावरण को ऊर्जा से भर देती थी तथा व्यवस्था बनाए रखती थी, वहीं उसकी अनुपस्थिति में सुखमय घर की तस्वीर के स्थान पर घर काटने लगता है। अतः कहा जा सकता है कि बहादुर इस घर को और इस घर में रहने वालों को अपना मानता था लेकिन लगता है नौकर तो नहीं होता है फिर चाहे वो कितनी ही ईमानदारी से काम क्यों न करें।

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