हिंदसा

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

शब्दशक्ति

शब्द-शक्ति

शब्द शक्ति के संदर्भ में शब्द और अर्थ दोनों का महत्त्व है, इन दोनों का संबंध शरीर और आत्मा या सागर और लहरों की तरह से है यानी दोनों अभिन्न दिखते हैं लेकिन दोनों भिन्न-भिन्न हैं और दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं ।
शब्द और अर्थ के संबंध को तुलसीदास ने स्पष्ट करते हुए लिखा है -
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। 

अर्थात शब्द और अर्थ का संबंध जल और बीचि अर्थात तरंगों के समान है जैसे जल और तरंग हैं वैसे ही शब्द और अर्थ एक दूसरे से जुड़े हुए हैं| अर्थ के लिए शब्द का होना आवश्यक है अगर शब्द नहीं है तो अर्थ भी नहीं हो सकता इसलिए शब्द अर्थ की अभिव्यक्ति का मूल उपादान है | संस्कृत काव्यशास्त्र से पहले व्याकरण शास्त्र में भी शब्द का विवेचन मिलता है|
अब प्रश्न उठता है कि शब्दशक्ति क्या है? देखिए प्रत्येक शब्द में एक या अनेक अर्थ छवियाँ हैं, इन अर्थों को बताने वाली या शब्दों में निहित अर्थ को बताने वाली जो शक्ति है, या जो शब्द व्यापार है , उसे हम शब्द शक्ति कहते हैं |
शक्ति के स्थान पर शब्द व्यापार या शब्द वृत्ति का भी काव्यशास्त्र में प्रयोग मिलता है। परंतु अधिकतर भाषा विशेषज्ञों ने शब्द शक्ति ही कहा है| आचार्य विश्वनाथ ने शब्द शक्ति तो आचार्य मम्मट ने इसे शब्द व्यापार कहा है | इस तरह से शब्द शक्ति कहे या शब्द व्यापार, एक ही बात है|
| संस्कृत काव्यशास्त्र में सबसे पहले आचार्य मुकुल भट्ट और उसके बाद आचार्य मम्मट के द्वारा शब्द शक्तियों का व्यवस्थित रूप से वर्णन किया है ।
शब्द शक्तियों की संख्या
शब्द शक्तियों की संख्या को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है आचार्य मुकुल भट्ट ने केवल अभिधा को ही शब्द शक्ति माना और वे अभिधा के दस भेद मानते हैं
कुछ आचार्यों ने शब्द शक्तियों की संख्या दो मानी है - अभिधा और लक्षणा | ध्वनि सिद्धांत की स्थापना करने वाले आचार्य आनंदवर्धन और आचार्य मम्मट अभिधा, लक्षणा, व्यंजना नामक तीन शब्द शक्तियां मानते हैं | कुछ विद्वान ऐसे भी हैं जो व्यंजना के स्थान पर तात्पर्य वृत्ति को मानते हैं | परंतु मम्मट के बाद अधिकतर काव्य शास्त्रियों ने मुख्य रूप से अभिधा, लक्षणा और व्यंजना इन तीन को ही शब्द शक्तियां के रूप में स्वीकार क्या है|
शब्द शक्तियां और शब्द -
जो शब्द शक्तियां हैं उनके जो शब्द है, काव्यशास्त्र में उनको भी अलग अलग नाम से संबोधित किया जाता है| सबसे पहले वाचक शब्द है और इस वाचक शब्द से जो अर्थ आएगा उसे हम वाचार्थ, मुख्यार्थ या संकेतार्थ कहते हैं और अर्थ को प्रकट करने वाली जो शब्द शक्ति है उसे हम अभिधा शब्द शक्ति के नाम से जानते हैं|
इसी प्रकार शब्द है -लक्षण और इससे जो अर्थ निकलता है उसे कहते हैं लक्ष्यार्थ और अर्थ को प्रकट करने वाली जो शब्द शक्ति है उसे हम लक्षणा शब्द शक्ति कहते हैं |
इसी तरह से शब्द है- व्यंजक और इस व्यंजक शब्द से जो अर्थ निकलेगा वह व्यंगार्थ कहा जायेगा और व्यंजना इसकी शब्द शक्ति कही जाएगी |
इस प्रकार अभिधा शब्द शक्ति का मूल शब्द वाचक कहलायेगा और उससे जो अर्थ आएगा वह मुख्यार्थ | इसी तरह से लक्षणा शब्द शक्ति के मूल शब्द को लक्षक और उससे जो अर्थ आएगा उसे लक्षार्थ कहेंगे और व्यंजना शब्द शक्ति का मूल शब्द व्यंजक और और उससे जो अर्थ आएगा उसे व्यंगार्थ कहेंगे |
हमने शब्दों का तीन प्रकार से विभाजन किया गया है- वाचक, लक्षक और व्यंजक | विशेषज्ञों के अनुसार वास्तव में यह शब्द का नहीं शब्दों की उपाधियों का वर्गीकरण है | जैसे एक व्यक्ति कभी पिता के रूप में ,कभी पुत्र के रूप में तो किसी के भाई के रूप में अर्थात वही एक व्यक्ति विभिन्न संबंधों के आधार पर कई उपाधियों से जाना जाता है इसी तरह से यहाँ भी ये शब्द अलग अलग नहीं बल्कि शब्द तो एक ही होता है लेकिन उस शब्द को उपाधि भेद से हम अलग-अलग नामों (वाचक लक्षक और व्यंजक) से जानते हैं | शब्द मूलतः नित्य होते हैं। शब्द की भूमिका बदलती रहती है | कोई वाचक शब्द हमेशा वाचक ही रहेगा ऐसा नहीं होता है, वह वाचक शब्द लक्षक या व्यंजक भी बन सकता है, व्यंजक शब्द वाचक या लक्षक भी बन सकता है | इसी तरह से विभाजन शब्द का न होकर उसकी उपाधि का होता है|
शब्द शक्तियां अभिधा से लक्षणा और लक्षणा से व्यंजना तक क्रमश: स्थूल से सूक्ष्म और उससे अधिक सूक्ष्म होती हैं | अभिधा शब्द शक्ति स्थूल है, लक्षणा सूक्ष्म है और व्यंजना उससे अधिक सूक्ष्म है|
अभिधा शब्द शक्ति पूरी तरह से शब्द पर आश्रित रहती है | इसमें जब हम शब्द का अर्थ लेते हैं तो वह कोशगत, लोक प्रचलित, प्रसिद्ध या जो व्याकरणिक दृष्टि से जो शब्द का अर्थ है, वह ग्रहण किया जायेगा | अभिधा शब्द शक्ति मुखार्थ पर आश्रित रहती है | लक्षणा शब्द शक्ति को अभिधा शब्द शक्ति की पुच्छभूता भी कहा गया है| क्योंकि वह शब्द से पूरी तरह भिन्न भी नहीं होती और बिल्कुल शब्द से जुड़ी हुई भी नहीं होती| इसलिए उसे अभिधा की पुच्छभूता कहा गया है| व्यंजना शब्द शक्ति शब्दार्थ से बहुत दूर हो जाती है उसमें शब्द का जो मूल अर्थ है वह अर्थ ही नहीं रहता उसका कोई और भिन्न अर्थ होता है
इस प्रकार अभिधा को पूरी तरह से शब्द आश्रित माना गया, लक्षणा को अभिधा की पुछभूता माना गया और व्यंजना को अर्थ से पूरी तरह से दूर माना गया है |
शब्द शक्तियों का प्रयोग और इनकी आवश्यकता
शब्द शक्तियों का प्रयोग काव्य में रमणीयता लाने के लिए किया जाता है तथा काव्य के सौंदर्य को बढ़ाने के लिए, रोचकता , मनोहरता और उसमें लोकोत्तर चमत्कार उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए जब हम आम बोलचाल में शब्दों का प्रयोग करते हैं और फिर वही शब्द जब काव्य में प्रयोग होते हैं तो उनमें एक अलग ही रमणीयता आ जाती है|
अभिधा -
अभिधा शब्द शक्ति वह शब्द शक्ति है जिसके द्वारा मुख्यार्थ या सांकेतिक अर्थ का बोध हो | अर्थात जो कहा जाए या जो वक्ता कहना चाहता है उसका बिल्कुल वही अर्थ लिया जाए जो वह कहना चाहता है। जो आचार्य विश्वनाथ ने कहा है कि सांकेतिक अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति अभिधा कहलाती है| उन्होंने अभिधा शब्द शक्ति को अग्रिमा अर्थात पहली शब्द शक्ति के रूप में माना है| और आचार्य मम्मट ने भी कहा है की जो शब्द शक्ति मुख्यार्थ \सांकेतिक अर्थ का बोध कराती है वह अभिधा शब्द शक्ति कहलाती है|
अभिधा शब्द शक्ति को जानने के लिए यह जानना जरुरी है कि शब्द कितने प्रकार के होते हैं - वैसे तो शब्दों को अलग- अलग आधार पर बांटा जा सकता है जैसे विकार के आधार - विकारी और अविकारी, प्रयोग के आधार - संज्ञा,सर्वनाम, विशेषण , क्रिया ,क्रिया विशेषण, समुच्यबोधक, संबंधबोधक, विस्मयादिबोधक, अर्थ के आधार पर- सार्थक और निरर्थक, उत्पति के आधार पर तत्सम ,तद्भव देशज और वेदेशी| इनके अतिरिक्त व्युत्पत्ति के आधार पर भी शब्दों का विभाजन किया जाता है और दृष्टि से शब्द तीन प्रकार के माने जाते हैं - रूढ़ शब्द , यौगिक शब्द और योगरूढ़ शब्द| अभिधा के सन्दर्भ में हमें व्युत्पत्ति के आधार पर जो शब्दों का विभाजन किया गया है उसको समझना है -
पहला रूढ़ शब्द से अभिप्राय है वह शब्द जिनका विभाजन न किया जा सके, जिनको खंडित न किया जा सके, जो लोक व्यवहार में उसी रूप में प्रचलित हैंं उनका कोई दूसरा अर्थ नहीं लिया जाता जैसे- गाय घोड़ा आदि| अब यहाँ गाय कहते ही हमारे सामने एक जानवर का चित्र उपस्थित हो जाता है अर्थात रूढ़ शब्द वह होते हैं जो लोक में प्रचलित और प्रसिद्ध होते हैं, रूढ़ होते हैं।
दूसरा है यौगिक शब्द- यौगिक शब्द वे होते हैं, जो प्रकृति और प्रत्यय के संयोग से बनते हैं । अर्थात उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर शब्द बनाए जाते हैं, ये दो या दो से अधिक तीन या चार शब्दों को जोड़कर बनाये जाते हैं और इनका विभाजन या संधि विच्छेद किया जा सकता है जैसे- रसोईघर, पाठशाला आदि |
तीसरा है योगरूढ़ शब्द- योगरूढ़ शब्द वे शब्द होते हैं जो प्रकृति और प्रत्यय को मिलाकर बनाए जाते हैं और दो या तीन या चार शब्दों का योग भी होता है, उनका विभाजन भी किया जा सकता है। परंतु ये शब्द किसी एक अर्थ विशेष के लिए रुढ़ हो जाते हैं जैसे पंकज शब्द है। पंकज शब्द पंक + ज को मिलाकर बना है, जिसका अर्थ है कमल। जबकि पंक का अर्थ है कीचड़ और ज का अर्थ है- जन्म/ उत्पन्न अर्थात जो कीचड़ में उत्पन्न हुआ हो। लेकिन कीचड़ में तो कमल के अलावा और भी बहुत कुछ उत्पन्न होता है सिंघाड़े और शैवाल भी पैदा होता है और भी जलवनस्पतियां पैदा होती हैं फिर पंकज का अर्थ कमल ही क्यों लिया जाए? इसका कारण यही है कि पंकज शब्द कमल अर्थ के लिए रूढ़ हो गया है। इसलिए पंकज शब्द को हम योगरूढ़ शब्द कहेंगे । ऐसे ही पीताम्बर/ कृष्ण, दसानन/रावण, नीलकंठ/शिवजी आदि शब्द दिए गए अर्थो के लिए रूढ़ हो गए हैं इसलिए इन शब्दों को हम योगरूढ़ शब्द कहेंगे, तो अब हमारे पास जो तीन प्रकार के शब्द हैं अभिधा शब्द शक्ति में इन्हीं शब्दों के माध्यम से शब्द व्यापार होता है। देखिए अभिधा शब्द शक्ति में जहाँ एकार्थी शब्द होते हैं वहां तो कोई समस्या नहीं होती लेकिन जहाँ अनेकार्थी शब्द ( जैसे योगरूढ़ आदि) आ जाते हैं वहां श्रोता या पाठक को ये समस्या होती है अनेक अर्थों वाले शब्द का कौन सा अर्थ ग्रहण करें या वो कौन सा अर्थ है जो कवि का अभीष्ट अर्थ कहा जा सकता है | इसके लिए काव्य शास्त्रियों ने अभिधा के 14 नियामक हेतु माने हैं जिनके आधार पर हम अनेकार्थी शब्दों के किसी एक अर्थ को ग्रहण करने का निर्णय कर सकते हैं , ये नियामक हेतु इस प्रकार हैं-
1सबसे पहला नियामक हेतु है - संयोग- शब्द जो वाक्य में प्रयुक्त हुए हैं उससे जुड़े हुए जो शब्द हैं उनके संयोग के कारण उस शब्द विशेष का अर्थ लिया जाएगा
2 दूसरा है- विप्रयोग - विशेष प्रयोग के आधार पर अर्थ निश्चित किया जाता है जैसे राग का अर्थ संगीत विशेष से जोड़ कर लिया जाएगा।
3 तीसरा है- साहचर्य- सहचर्य के कारण अर्थ लिया जाता है।
4 चौथा है -विरोध- यहाँ विरोध के अर्थ में लेते है।
5 पांचवा है -अर्थ ( प्रयोजन) -यहाँ अर्थ के पीछे प्रयोजन का संदर्भ लिया जाता है|
6 प्रकरण- अर्थात किस संदर्भ में बात हो रही है, यह नियामक हेतु प्रसिद्ध है। शब्द का प्रयोग किस संदर्भ में किया जा रहा है उस प्रकरण विशेष को देखते हुए अर्थ लिया जाता है|
7
लिंग- लिंग शब्द से भी अर्थ निश्चित किया जाता है। लिंग परिवर्तन से भी अर्थ का निश्चय किया जाता है .
8 अन्यपद सन्निधि- यहां पर वाक्य में जो दूसरा शब्द आया है उससे अर्थ निश्चित किया जाता है
9 सामर्थ्य- यहां पर
सामर्थ्य को देखते हुए अर्थ का निर्णय किया जाता है|
10 देश - स्थान विशेष के कारण भी अनेकार्थक शब्द का विशिष्ट अर्थ लिया जाता है|
11औचित्य- क्या उचित होगा उसको देखते हुए भी अनेक अर्थों का एक अर्थ ग्रहण किया जाता है |
12 काल- जैसे चित्रभानु शब्द है अनेकार्थक है अब चित्रभानु का अर्थ सूर्य भी होता है और अग्नि भी अब जब दिन में बात की जाएगी जो चित्रभानु से अर्थ सूर्य लेंगे रात में बात की जाएगी तो उसका अर्थ अग्नि होगा|
13 व्यक्ति - शब्द जो है पुलिंग है या स्त्रीलिंग है उसके आधार पर भी उसका अर्थ निश्चित किया जाता है
14 स्वर - स्वर के लिए जब उच्चारण करते हैं तो उच्चारण में कहां बल दे रहे हैं या बलाघात कहां है उससे भी अर्थ बदल जाता है तुम गए नहीं, अरे तुम गए नहीं में जैसे ही बलाघात बदला कि अर्थ बदल गया
इस तरह से अभिधा के ये 14 नियामक हेतु होते हैं जिनका प्रयोग करके हम अनेकार्थी शब्दों के अर्थ का निश्चय करते हैं। व्यंजना शब्द शक्ति में भी अर्थ ग्रहण करने में ये निमायक हेतु मदद करते हैं |

लक्षणा शब्द शक्ति
अब हम बात करते हैं लक्षणा शब्द शक्ति की , यह दूसरी शब्द शक्ति होती है। लक्षणा शब्द शक्ति से अभिप्राय है -मुख्यार्थ के बाधित होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन के कारण जिस शक्ति द्वारा मुख्य अर्थ से संबंधित अन्य अर्थ ग्रहण किया जाता है तब उसे लक्षणा शब्द शक्ति कहा जाता है। लक्षणा शब्द शक्ति में हम तीन बिंदुओं को मुख्य रूप से याद रखते हैं -
1.पहला मुख्य अर्थ का बाध - अभिधा शक्ति में मुख्य अर्थ ही प्रमुख होता था। हमें वाच्यार्थ ही ग्रहण करना होता था लेकिन लक्षणा में जो वक्ता द्वारा वाक्य बोला गया है उसका जो मुख्य अर्थ है उसमें बाधा आएगी ।
2. दूसरा आवश्यक तत्व है मुख्यार्थ से संबद्ध - अर्थात हम जो भी अर्थ लेंगे वह मुख्य अर्थ से जुड़ा हुआ या उससे संबद्ध होता है।
3. तीसरा आवश्यक तत्व है - रूढ़ि अथवा प्रयोजन से और कोई अन्य अर्थ ग्रहण किया जाए। इस तरह से लक्षणा में हमें तीन आवश्यक बातें याद रखनी पड़ती हैं -

  • मुख्य अर्थ की बाध
  • मुख्य अर्थ से संबद्ध
  • अन्य अर्थ में किसी रूढ़ि या प्रयोजन का होना।
इसको हम एक उदाहरण से समझते हैं- जैसे मोहन गधा है। अब किसी ने कहा कि मोहन गधा है अब मोहन व्यक्ति है, गधा जानवर है तो मोहन गधा तो नहीं हो सकता यहां मुख्य अर्थ की बाधा हो गई। अब यहां कहा गया है कि कि मोहन जो है वह गधे के गुण वाला है यानी जो मोहन में गुण हैं वही गधे में गुण हैं तो इसका मुख्य अर्थ से संबद्ध हो गया और तीसरा यह है कि मोहन को मुर्ख साबित करने का प्रयोजन भी है क्योंकि गधे को हमेशा मूर्ख ही समझा जाता है इसीलिए यहां प्रयोजन के कारण ही हम मुख्यार्थ की जगह अन्य अर्थ अर्थात मूर्खता ले रहे हैं।
इस तरह से यहां जो तीन बातें परिभाषा में बताई गई हैं वे सब यहां पर आ गई हैं
एक और उदाहरण से इसे समझा जा सकता है-
मेरा घर सड़क पर है तो यहां सड़क पर तो घर किसी का हो नहीं सकता लेकिन वह यह कहना चाहता है कि मेरा घर या गांव सड़क के पास है यानी उसका प्रयोजन है कि वह आने वाले को बताना चाहता है कि आपको मेरे घर को खोजने या आने-जाने के साधन को लेकर कोई दिक्कत नहीं होगी। तो यह बताने के लिए वह कह देता कि मेरा घर/गांव सड़क पर है ।
लाक्षणिक अर्थ के आधार पर लक्षणा के दो भेद किए जाते हैं -
एक रूढ़ी लक्षणा और
प्रयोजनवती लक्षणा,
रूढ़ी लक्षणा से अभिप्राय है कि शब्द का जो प्रसिद्ध अर्थ है या जो प्रचलित अर्थ है, जो लोक व्यवहार में प्रचलित हो चुका है वह अर्थ ग्रहण करना ही रूढ़ि लक्षणा है । कभी-कभी किसी शब्द का प्रयोग अपने मूल अर्थ से बाधित होकर सर्वसाधारण में वह अन्य ही अर्थ में इतना अधिक प्रचलित हो जाता है कि उसका वाच्यार्थ के सामान प्रयोग होने लगता है| केवल शब्द शास्त्र के विद्वान ही अनुसंधान के द्वारा उस शब्द के उस मूल आधार तक पहुंच पाते हैं जिसके कारण उस शब्द का किसी विशेष अर्थ में प्रयोग प्रचलित हो गया है| सर्वसाधारण उसका प्रयोग रूढ़ि के रूप में ही किया करते हैं, इसलिए इसे रूढ़ि या रूढा अथवा निरूढा लक्षणा कहते हैं | लक्षणा के विषय में हम हिंदी के प्रयोग के सन्दर्भ में दो रूपों रूपों पर विचार कर सकते हैं
1. संस्कृत की परंपरा में प्रतिष्ठित कुशल इत्यादि शब्द
2 . मुहावरों का प्रयोग
कुशल का शाब्दिक अर्थ है -कुश नामक घास को लाने वाला, कुश एक कटीली घास है, इसे तोड़ते समय सावधानी बरतनी पड़ती है, इसलिए धीरे-धीरे कुशल का अर्थ ही चतुर, होशियार आदि हो गया| इसी प्रकार चौकन्ना शब्द का मूल अर्थ चार कानों वाला है, किंतु अब इसका अर्थ सावधान हो गया है|
यह सभी अर्थ रूढ़ि के कारण प्राप्त हुए हैं, अतः रूढ़ि लक्षणा द्वारा ही इनकी प्रतीति मानी जानी चाहिए|
आचार्य विश्वनाथ ने इसके लिए एक सुंदर उदाहरण दिया है, वे कहते हैं कि कलिंगा साहसी है यानी कलिंग बहुत साहसी है। अब कलिंगा तो देश का नाम है कोई देश कैसे साहसी हो सकता है तो मुख्य अर्थ में बाधा हुई अब कलिंग के लोग बड़े साहसी होते हैं यह प्रसिद्धि है। यह प्रचलित हो चुका है जैसे कहा जाए कि हरियाणा बलवान है क्योंकि हरियाणा के लोग शक्तिशाली होते हैं बलशाली होते हैं इसी तरह कहा जाए कि राजस्थान साहसी है क्योंकि राजस्थान के राजपूत बड़े साहसी और पराक्रमी होते हैं तो यहां पर राजस्थान से नहीं बल्कि राजस्थान में रहने वाले लोग पराक्रमी हैं राजस्थान को साहसी कहना मुख्य अर्थ में बाधा है। यहाँ लाक्षणिक अर्थ निकला है कि राजस्थान के लोग अर्थात राजपूत जो हैं वे पराक्रमी है और यह रूढ़ि लक्षणा कहलाएगी
2. मुहावरे भी रूढ़ि लक्षणा के सुंदर उदाहरण हैं | मुहावरा एक वाक्यांश है जिसका वास्तविक अर्थ सांकेतिक अर्थ से भिन्न होता है| इसी कारण यह रूढ़ि की अपेक्षा लक्षणा में आ जाते हैं, जब हम कहते हैं कि आंख का तारा या सूर्य को चिराग दिखाना आदि एक उदाहरण से इसे समझते हैं- घोड़ा हवा से बातें कर रहा था, अभी जब हम कहते हैं कि घोड़ा हवा से बातें कर रहा था तब हमारा मतलब यह नहीं होता कि घोड़ा और हवा एक दूसरे से बात कर रहे थे, बल्कि हम यह कहना चाहते हैं कि घोड़ा हवा के समान तेज गति से दौड़ रहा था, यह अर्थ इसके मुहावरा बन जाने के कारण रूढ़ हो चुका है और ऐसे प्रयोग भाषा पर पकड़ होने के कारण हम अपने आप ही तुरंत ग्रहण कर लेते हैं | इसलिए इस आधार पर मुहावरे रूढ़ि लक्षणा के अंतर्गत आ जाते हैं लेकिन कुछ विद्वानों के अनुसार मुहावरे के प्रयोग के मूल में प्रयोक्ता का प्रयोजन भी होता है अतः मुहावरे प्रयोजनवती लक्षणा के अंतर्गत भी माने जा सकते हैं | जैसे सिर पर क्यों खड़े हो- वाक्य में सिर पर खड़े होने का लक्षार्थ रूढ़ि होने के साथ साथ इसका मतलब एकदम समीप अर्थात निकटता भी है, यहाँ हमारा प्रयोजन निकट कहने का है लेकिन निकट न कहकर हम सिर पर खड़े कह देते हैं अत: सिर पर कहने का प्रयोजन इसी निकटता को प्रकट करना है| ऐसा कहने पर यह प्रयोजन भी है और रूढ़ अर्थ भी है| इसलिए मुहावरे दोनों प्रकार की लक्षणा के उदाहरण माने जा सकते हैं |
मम्मट ने रूढ़ि लक्षणा के आगे कोई भेद नहीं किए हैं |
प्रयोजनवती लक्षणा
प्रयोजनवती लक्षणा से अभिप्राय है जब किसी विशेष प्रयोजन के लिए लाक्षणिक शब्द का प्रयोग किया जाये या जो अर्थ किसी फल विशेष से जुड़ा हुआ है, या कह सकते हैं कि कोई फल विशेष उसके पीछे है। वह प्रयोजनवती लक्षणा कहलाएगी |
प्रयोजनवती लक्षणा में जैसे हमने उदाहरण दिया कि गांव बिल्कुल सड़क पर है तो यह प्रयोजनवती लक्षणा है क्योंकि यहाँ वक्ता का प्रयोजन है कि मेरे गांव तक आना कठिन नहीं है मेरे गांव तक आना आसान है, आने में दिक्कत नहीं होगी तो यह प्रयोजनवती लक्षणा है| एक उदाहरण से समझते हैं-
आह! कल्पना का सुंदर यह
जगत मधुर कितना होता | (जय शंकर प्रसाद )
यहाँ कवि ने कल्पना के संसार को मधुर कहा है , ऐसा कहने से मुखार्थ बाधित हुआ है क्योंकि मधुर तो वहीं वस्तु हो सकती है जो आस्वाद्य हो अर्थात जिसको खाकर स्वाद लिया जा सके, मिठाई हो सकती है कोई मीठा पदार्थ हो सकता है लेकिन संसार तो खाद्य वस्तु या खाने की चीज नहीं है इसलिए वह मधुर यानी मीठा कैसे हो सकता है अत: उसे मधुर कैसे कहा जा सकता है? किंतु जिस प्रकार मधुर वस्तु प्रिय और आकर्षक होती है उसी प्रकार कल्पना का संसार भी मादक और मधुर होता है और चित्त को आकर्षित करने वाला होता है अतः यहां कल्पना लोक को अत्यंत आकर्षक बताना ही कवि का प्रयोजन है और कल्पना का संसार हमेशा बहुत ही सुंदर होता है इसी को कहने के लिए कवि ने यहां यह प्रयोग किया है|
मम्मट ने प्रयोजनवती लक्षणा के दो भेद किए हैं-
गौणी (गौड़ी) प्रयोजनवती लक्षणा और
शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा
1 गौणी प्रयोजनवती लक्षणा -
जब दो वस्तुओं के रूप गुणों में परस्पर सादृश्य संबंध होने के कारण लक्ष्यार्थ का ग्रहण होने पर गौणी लक्षणा होती है, इसे गौणी लक्षणा लिए कहा गया है क्योंकि इसमें मुखार्थ के गुणों के सदृश्य गुण लक्ष्यार्थ में भी होते हैं जैसे - मोहन गधा है (गुणों की सादृश्यता के कारण और वक्ता का प्रयोजन भी है इसलिए (सारुपा, मोहन और गधा दोनों का वर्णन है) गौणी प्रयोजनवती लक्षणा) मनुष्य मोहन को गधा कहने में मुखार्थ ग्रहण करने में बाधा है क्योंकि मोहन गधा नामक पशु नहीं हो सकता अतः गधे के समान गुण अर्थात मूर्खता संबंधी लक्ष्यार्थ सादृश्य के कारण संभव हुआ है इसलिए यहां गौणी लक्षणा है|
गौणी प्रयोजनवती लक्षणा के आगे दो उपभेद किए जाते हैं
सारुपा गौणी प्रयोजनवती लक्षणा और दूसरी है -सध्यावसाना गौणी प्रयोजनवती लक्षणा |
  • सारुपा गौणी प्रयोजनवती लक्षणा -जैसा नाम से ही पता चल रहा है उसमें रूपक बंधा होता है, इसमें उपमेय और उपमान दोनों का अभेद वर्णन किया जाता है, एक विषयी या आरोपक (जिस वस्तु का आरोप किया जाता है) कहलाता है और दूसरा विषय या आरोप्य (जिस वस्तु पर आरोप किया जाता है ) कहलाता है |
जैसे - उदित उदयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग|
विकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग||
इस दोहे में पूरा एक सॉन्ग रूपक बांधा गया है, सांग रूप किस किस तरह बांधा गया हुआ है? - चित्रकूट में स्वयंवर है यहाँ पर उदयगिरि मंच है , उदित मंच पर रघुवर यानी राम, जो है वह बाल पतंग है अर्थात प्रातः कालीन सूर्य के समान हैं, उनको देखते ही संत कमल के समान खिल जाते हैं, तो प्रातः कालीन सूर्य उदित होता है और राम को मंच पर देखकर संत रूपी कमल खिलते हैं , उनकी आंखें रूपी भैंवरे जो हैं वे हर्ष से युक्त हो जाते हैं तो यह सारूपा गौणी लक्षणा का उदाहरण है | (क अन्य उदाहरण -मोहन गधा है)
  • सध्यावसानागौणी प्रयोजनवती लक्षणा-
जो सध्यावसाना गौणी प्रयोजनवती लक्षणा में वहां पर रूपक नहीं बांधा जाता वहां पर सादृश्य संबंध को आधार मानना होता है | और विषयी और विषय अर्थात उपमेय और उपमान में से प्रथम का वर्णन न करके उपमान द्वारा ही भावाभिव्यक्ति की जाती है वहां सध्यावसाना गौणी प्रयोजनवती लक्षणा होती है |
जब हम कहते हैं कि देखो गधा आ रहा है तब हमारा अभिप्राय मोहन को लक्षित कर के उसे गधे के समान मूर्ख बताना ही प्रयोजन होता है किंतु मोहन में विषय का शब्दों में वर्णन हमने नहीं किया अतः यहां सध्यावसानागौणी प्रयोजनवती लक्षणा है।
2 शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा-
शुद्धा लक्षणा सादृश्य संबंध के अभाव में किसी अन्य संबंध के कारण जैसे समीपता, साहचर्य सम्बन्ध,आधार-आधेय भाव संबंध हो सकता है या अंगागी भाव संबंध होने के कारण लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है , जहाँ इस तरह का प्रयोग होता है वहां पर शुद्धा लक्षणा होती है, एक उदाहरण भी देख सकते हैं, जयशंकर प्रसाद की कामायनी से यह पंक्तियां ली गई हैं-
बढ़ा मन और चले थे पैर ,
शैल मालाओं का श्रृंगार। (जय शंकर प्रसाद )
इन पंक्तियों में मन को बढ़ता हुआ तथा पैरों को चलता हुआ दिखाया गया है किंतु मन और पैर स्वयं तो नहीं चल सकते वरन संपूर्ण शरीर चलता है अतः यहां मुख्यार्थ बाधित हो गया है और यहां लक्षणा निकल रही है अर्थात यह लाक्षणिक अर्थ दे रहा है शरीर के साथ मन और पैर का अंगागी भाव संबंध है, अर्थात अंगागी भाव का संबंध होने के कारण शुद्धा लक्षणा है | एक अन्य उदाहरण है- मेरे सिर पर क्यों बैठ गए | (समीपता)
शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा के दो भेद किए गए-
1.लक्षण (जहत्स्वार्था,जहदस्वार्था) शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा और
2. उपादान (अजहत्स्वार्था या अजहदस्वार्था ) शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा|

लक्षण शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा -  जब  किसी शब्द का लाक्षणिक अर्थ ग्रहण करते समय उसका मुख्य अर्थ पूरी तरह लुप्त या  सर्वथा छूट जाए तब  वहां लक्षण लक्षणा होती है जैसे - पेट में आग लगी है, यहाँ आग शब्द  से लक्ष्यार्थ निकल रहा है और आग ने अपना मुख्य अर्थ बिलकुल छोड़ दिया है अर्थात यहाँ अर्थ होगा कि भूख लगी है | इसी तरह यह बालक सिंह है इस वाक्य में सिंह का अर्थ  वीर है और मुख्य अर्थ  हिंसक पशु छूट गया है| इसी प्रकार गंगा पर आश्रम है इस वाक्य में गंगा पद लाक्षणिक है जिसका मुख्य अर्थ जल का प्रवाह है  किंतु गंगा ने अपना जल प्रवाह वाला अर्थ बिलकुल छोड़ दिया है यहाँ लक्ष्यार्थ निकल रहा है|
उपादान शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा- जब वाच्यार्थ सर्वथा बहिष्कृत नहीं होता बल्कि लक्ष्यार्थ  में वाच्यार्थ की  स्थिति भी निहित रहती है तब उपादान लक्षणा  मानी जाती है। इसमें मुख्य अर्थ को  पूरी तरह छोड़ा नहीं जाता बल्कि वो भी कुछ-कुछ बना रहता है |                                          
जैसे- दो बंदूकों ने पूरे गांव को लूट लिया| इस वाक्य में दो बंदूकों का अर्थ है -दो बंदूके धारण कर किए हुए दो व्यक्ति, इन्हीं ने सारे गांव को लूटा है| देखिए यहां बंदूकों में ( बंदूकधारी मनुष्यों )  मुख्य अर्थ भी विद्यमान है, इसलिए उपादान लक्षणा है |
व्यंजना शब्द शक्ति
 व्यंजना शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है प्रकाशित करना या ध्वनित करना
जब अभिधा और लक्षणा अपने-अपने अर्थ का बोध कराने पर भी कवि के अभीष्ट अर्थ को व्यक्त करने  में असमर्थ रहते  हैं  तब जिस शब्द शक्ति द्वारा कवि के अभीष्ट अर्थ की प्रतीति होती है, उसे शब्द की व्यंजना शक्ति कहते हैं| व्यंजना शक्ति द्वारा प्राप्त होने वाले अर्थ को  ही व्यंग्यार्थ, प्रतीयमानार्थ या  ध्वन्यार्थ  कहते हैं|                                 व्यंग्यार्थ की विशेषता है कि यह न तो वाच्यार्थ  की भांति शब्दों द्वारा कथित होता है और न ही  लक्ष्यार्थ  की भांति रूढ़ि अथवा प्रयोजन द्वारा लक्षित होता है ,  इस अर्थ की तो केवल प्रतीति ही की जा सकती है|  व्यंग्यार्थ तक पहुंचने के लिए सहृदय को कल्पना का सहारा भी लेना पड़ता है, व्यंजना द्वारा प्राप्त अर्थ अधिक चमत्कार पूर्ण और आनंददायक होता है,   कल्पना प्रधान रमणीय अर्थ की प्रतीति व्यंजना द्वारा ही संभव होती है व्यंजना शब्द शक्ति प्रसंग और परिस्थिति के आधार पर अनेक अर्थों को व्यक्त करने में समर्थ होती है|          व्यंग्यार्थ की सत्ता शब्द और अर्थ दोनों में संभव होने के कारण इस शब्द शक्ति को दो भागों में बांट सकते हैं -
 1. शाब्दी  व्यंजना
 2. आर्थी व्यंजना 
 शाब्दी व्यंजना-  जब  व्यंग्यार्थ का संपूर्ण सौंदर्य शब्द पर निर्भर रहता है तब उस स्थान पर शाब्दी व्यंजना होती है उस व्यंजक शब्द के स्थान पर समानार्थी शब्द रख देने से व्यंग्यार्थ  की प्रतीति नहीं हो पाती|   शाब्दी व्यंजना संयोग, वियोग, साहचर्य, देशकाल ,व्यक्ति, प्रकरण आदि 14  स्थितियों पर निर्भर करती है| यही नियम भिन्नार्थक शब्दों का एक अर्थ निश्चित करते हैं, जैसा कि हमने अभिधा शब्द शक्ति में देखा था, संयोग आदि से विशेष अर्थ निश्चित हो जाने पर उससे भिन्न जिस व्यंग्यार्थ की प्रतीति होती है वह इसी शाब्दी  व्यंजना  की देन है , एक उदाहरण  देखिए-
 चिर जीवौ जोरी जुरै क्यों न स्नेह गंभीर 
को घटि  ए वृषभानुजा , वे हलधर के वीर              (बिहारी )
यहां वृष भानुजा तथा हलधर के वीर अनेकार्थी शब्द है, इनमें राधा और कृष्ण की पारिवारिक प्रतिष्ठा (राधा वृषभानु की पुत्री तथा बलराम के भाई कृष्ण) का वर्णन करते हुए उनके प्रेम संबंधों की उपयुक्तता सूचित की गई है,  किंतु इन दोनों शब्दों के अन्य अर्थ वृषभ + अनुजा =बैल की बहन गाय, तथा हल + धर= बैल के भाई की ओर भी अनायास ध्यान जाता है | इन अर्थों के कारण जिस परिहास को  व्यंजित  किया गया है वह व्यंजना शक्ति का ही चमत्कार है|  राधा वृषभानु राजा की पुत्री है और कृष्ण नंद के पुत्र बलराम के भाई हैं अतः दोनों की जोड़ी सुंदर है| यह इस दोहे का अभिधा परक अर्थ है, 
किंतु राधा वृषभ (बैल) की अनुजा अर्थात गाय  है और कृष्ण  हल को धारण करने वाले बेल के  वीर (भाई ) हैं , अर्थात वे बैल  हैं | गाय और बैल की यह जोड़ी सुंदर है| तो ऐसा चमत्कार पूर्ण और परिहासपूर्ण अर्थ व्यंजना  द्वारा ही संभव हो पाया है|

आर्थी व्यंजना 
जब व्यंग्यार्थ अर्थ पर निर्भर हो तब आर्थी व्यंजना होती  है, समानार्थक अर्थात सामान अर्थ वाला  शब्द रख देने पर भी व्यंग्यार्थ नष्ट नहीं होता| वक्ता ,बोधक, काकू, अन्य सन्निधि  आदि के वैशिष्ट्य  से जिस व्यंग्यार्थ की प्रतीति होती है वह आर्थी व्यंजना कहीं जाती है इसके द्वारा प्रतीत होनेवाला अर्थ ही व्यंग्यार्थ  होता है अर्थात यह  किसी शब्द विशेष पर अवलंबित नहीं रहता आर्थी व्यंजना में पहले वाच्यार्थ की प्रतीति होती है उसके बाद व्यंग्यार्थ निकलता है जैसे-
 अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
आंचल में है दूध आंखों में पानी (मैथिलीशरण गुप्त)
एक उदाहरण देखिए -
देखो नीड़ों में विहग युगल,
अपने शिशुओं को रहे चूम 
उनके घर में कोलाहल है
 मेरा सोना है गुफा द्वार (जय शंकर प्रसाद )
 श्रद्धा की इन पंक्तियों द्वारा कवि  यह बताना चाहता है कि अब उसमें मातृत्व प्राप्त करने की लालसा तीव्र हो गई है, यह अभिप्रेत  अर्थ इन पंक्तियों के साक्षात प्रतीत मुख्य अर्थ  से सर्वथा भिन्न है| वक्र उक्ति  वैशिष्ट्य के कारण इस अर्थ की प्रतीति अवश्य हो जाती है और इसी में इन पंक्तियों का सौंदर्य झलकता है, यह श्रद्धा द्वारा मनु से  कही गई हैं , अतः  यहाँ व्यंग्यार्थ निकल रहा है  और यह व्यंग्यार्थ अर्थ पर निर्भर है इसलिए यहाँ  आर्थी व्यंजना  है,  समानार्थक अर्थात सामान अर्थ वाला  शब्द रख देने पर भी व्यंग्यार्थ नष्ट नहीं हो सकता  
इसी प्रकार कहते हैं कि सूर्यास्त हो गया तब इस वाक्य में प्रसंग  के अनुसार अनेक अर्थ  निकल रहे हैं -
अब अंधेरा होने वाला है
दीपक जलाने का समय हो गया है
अब काम समाप्त कर देना चाहिए
प्रकाश कर देना चाहिए इत्यादि 
यहां सूर्यास्त के स्थान पर अन्य शब्द रवि, दिनकर आदि भी रख दें तब भी ये  विभिन्न व्यंग्यार्थ  प्रसंग के अनुकूल  व्यंजित होंगे इसलिए यहां पर  आर्थी व्यंजना  है | 
शाब्दी  व्यंजना और  आर्थी व्यंजना  दोनों ही अभिधा मुला और लक्षणा मूला होती हैं और वक्ता, बोधव्य, काकु, वाच्य आदि के आधार पर आर्थी व्यंजना के फिर से दस भेद या उपभेद किए जाते हैं जैसे -
  1. वक्तऋ वैशिष्ट्य आर्थी व्यंजना- जहां कवि, वक्ता या कवि द्वारा कल्पित पात्र के कथन की विशेषता के कारण व्यंग्यार्थ की प्रतीति होती है
  2. बोधव्य वैशिष्ट्य आर्थी व्यंजना- जहां श्रोता के वैशिष्ट्य के कारण व्यंग्यार्थ की प्रतीति हो 
  3. चेष्टा वैशिष्ट्य आर्थी व्यंजना- जहाँ कोई चेष्टा आदि के वैशिष्ट्य के कारण व्यंगार्थ निकलता हो
  4. काकु वैशिष्ट्यआर्थी व्यंजना- स्वर के आरोह -अवरोह के कारण
  5. अन्य सन्निधि वैशिष्ट्य आर्थी व्यंजना- जहां अन्य लोगों के पास में उपस्थित होने पर  वक्ता श्रोता से कथन करें किंतु तीसरा व्यक्ति व्यंग्यार्थ को न समझे|
  6. प्रकरण वैशिष्ट्य आर्थी व्यंजना -जहां प्रकरण के कारण व्यंग्यार्थ उपस्थित हो- नहीं पराग नहीं मधुर मधु नहिं विकास यहि काल अली कली ही सो बंध्यो आगे कौन हवाल 
  7. वाक्य वैशिष्टयोत्पन्न आर्थी व्यंजना-वाक्य के वैशिष्ट्य के कारण व्यंग्यार्थ की प्रतीति हो 
  8. वाच्य वैशिष्टयोत्पन्न आर्थी व्यंजना- वाच्यार्थ के वैशिष्ट्य के कारण व्यंग्यार्थ की प्रतीति 
  9. देश वैशिष्ट्य आर्थी व्यंजना- जहां देश  के अनुसार  व्यंग्यार्थ प्रकट हो रहा हो 
  10. काल वैशिष्ट्य आर्थी व्यंजना - काल वैशिष्ट्य के कारण व्यंग्यार्थ उत्पन्न हो रहा हो
अत: इन भेदों के आधार पर भी व्यंजना शब्द शक्ति द्वारा निकलने वाले अर्थों को समझा जा सकता है |  इस प्रकार  कुल मिलाकर व्यंजना शब्द शक्ति तीस भेद  हो सकते हैं |




शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

तत्सम (कहानी) समीक्षा

                                                                      तत्सम 
आधुनिक हिंदी कहानीकारों में जैनेंद्र जी का स्थान प्रमुख है| कहानी जगत में उन्होंने एक नवीन युग की स्थापना की, उन्होंने अपनी कहानियों में दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक तथ्यों का उद्घाटन बड़े रोचक  कथानकों  के माध्यम से किया है| 'तत्सम' एक प्रतीकात्मक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक कहानी है जो जैनेंद्र  ने एक रोचक कथा के माध्यम से इस चिरंतन प्रश्न पर विवेचन किया है कि ईश्वर है या नहीं ? है, तो कहां है?  इसी शुष्क दार्शनिक प्रश्न को  सुलझाने के लिए उन्होंने कहानी के सभी तत्वों का निरूपण सफलतापूर्वक किया है।
कथानक 
तत्सम कहानी का कथानक अन्य कहानियों की भांति विभिन्न घटनाओं के ताने-बाने से नहीं बुना गया, इसमें घटना नाम का कोई तत्व है ही नहीं , केवल एक प्रसंग है जिसे रूपक के रूप में ग्रहण किया गया है | इसका कथानक इस प्रकार है - 
                 एक वन में दो शिकारी पहुंचते हैं और बातचीत के मध्य कहते हैं कि ' ओह कैसा भयंकर जंगल है| प्रस्तुत कहानी इसी जंगल शब्द को लेकर उसके परिचय के संबंध में हुए वाद-विवाद के माध्यम से अभीष्ट सिद्धि की ओर बढ़ती है| वन के विभिन्न वृक्ष तथा जीव-जंतु जंगल के विषय में जिज्ञासा और तत्- संबंधी अपनी अज्ञानता प्रकट करते हैं, परंतु समस्या का समाधान किसी प्रकार नहीं हो पाता| जब शिकारी पुन: लौटते हैं तो वटवृक्ष अर्थात (बड़ दादा) उनसे जंगल का परिचय देने को कहता है, आरंभ में उसके दिए समाधान से कोई सहमत नहीं होता, किंतु अंत में वह व्यक्ति वट वृक्ष की चोटी पर चढ़ जाता है, वहां दो नए-नए पत्तों की जोड़ी उसका स्पर्श पाकर नया मंत्र पाती है और बढ़ दादा जान जाते हैं कि वे कुल हैं, खंड नहीं| इस दिव्य अनुभूति के बाद साथियों के पूछने पर वह कहते हैं - "वह है" सब कहीं है"... हम हैं ...हम नहीं हैं ...वह भी है|
                इस प्रकार तत्सम कहानी का कथानक अत्यंत संक्षिप्त तो है ही, रोचक और सुगठित भी है| स्वाभाविकता कि दृष्टि से यह आपत्ति हो सकती है कि वन के बे जबान  जानवरों या पेड़ पौधों को मनुष्यों की तरह बातें करते दिखाया जाना आज के बौद्धिक युग में कहां तक विश्वसनीय है| इसका उत्तर सहज ही दिया जा सकता है कि इस कहानी की पृष्ठभूमि दार्शनिक है और दर्शन के क्षेत्र में सभी प्राणी और पदार्थ एक समान हैं| वास्तव में कहानी का कथानक प्रतीकात्मक दृष्टांत है।
 पात्र एवं चरित्र चित्रण 
तत्सम कहानी के सभी पात्र एक विशेष प्रश्न को सुलझाने के लिए प्रतीक रूप में प्रस्तुत किए गए हैं| उन्हें मानवीय पात्रों के समान चरित्र का विश्लेषण करना उपयुक्त नहीं है| दोनों शिकारियों को हम दार्शनिक विचारक का प्रतीक मान सकते हैं और जगत के जानवर और पेड़-पौधे उन भोले-भाले सांसारिक मनुष्यों के प्रतीक हैं जो अपने सीमित जीवन के संकीर्ण दायरे से बाहर जाकर अपने से भिन्न कुछ और सोच ही नहीं सकते| निस्संदेह इस दृष्टि से लेखक ने उनकी स्वाभाविक मनोवृति का सजीव चित्रण किया है| 
कथोपकथन या संवाद
तत्सम कहानी का विकास कथनोपकथन  के आधार पर ही हुआ है| कथनोपकथनों की सार्थकता उनकी संक्षिप्तता  और सरलता में ही है| तत्सत कहानी के संवाद अत्यंत संक्षिप्त हैं | साथ ही रोचक तथा प्रभावशाली भी हैं | बाहरी रूप से छोटे-छोटे वाक्यों में जहां सामान्य हास्य विनोद का पुट दिखाई देता है, वहां उनके भीतर गंभीरता का तत्व भी निहित है| उदाहरणत: 
   एक ने कहा- 'डरावना, न जाने तुम किसे कहते हो? हमारी तो सबसे प्रीति है| बबूल ने कहा- 'दादा, प्रीति की बात नहीं| मैं तो अपने पास कांटे रखता हूं, पर वे आदमी वन को भयानक बताते थे| जरूर वह शेर- चीतों से बढ़कर होगा | इस प्रकार संवाद सरल और अर्थ गरिमा से युक्त है| 
देश काल और वातावरण 
तत्सत कहानी का संबंध किसी एक स्थान, एक समय या एक ही स्थिति से नहीं| लेकिन जो इसमें  पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के नाम प्रयुक्त हुए हैं वे पूर्णत: भारतीय परिवेश का परिचय देते हैं | प्राचीन ऋषियों ने जंगलों में तपस्या करके ही इस सृष्टि के सत्य को पहचाना था| लेखक ने उसी सत्य की व्याख्या जंगल का दृष्टांत देकर की है| इसलिए स्वाभाविक रूप से इस कहानी में वन का संपूर्ण वातावरण अत्यंत सजीवता से चित्रित हुआ है, शिकारियों की संक्षिप्त सी  प्रारंभिक बातचीत ही वन की विशालता, गहनता और भयंकरता का आभास करा देती है, कथावस्तु का विकास उपसंहार भी उसी परिवेश में हुआ है| पाठक को कहानी पढ़ते-पढ़ते अनायास ही वन के विभिन्न जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों का अंतरण परिचय मिल जाता है| बड़ की विशालता, घास की व्यापकता, स्पर्श की गहराई की पहचान, सिंह की भयंकता और बांस की लंबाई आदि का सजीव चित्रण आंखों के समक्ष छा जाता है |
भाषा शैली 
तत्सत कहानी एक रूपक शैली में लिखी गई है| कहानी की जो ऊपरी कला है, उसके भीतर अन्य अर्थ का भी निर्वाह होता चलता है| जैनेंद्र जी ने जंगल की कथा के माध्यम से दार्शनिक तथ्य की स्थापना की है| तत्सत कहानी की भाषा सरल और स्वाभाविक है| केवल शीर्षक तत्सत ही एक कनिष्ट तत्सम शब्द है| सर्वत्र सरल शब्दावली का ही प्रयोग हुआ है| जैसे-
 बड़ दादा ने कहा- 'बिना जाने फिर तुम इतना तेज क्यों बोलते हो?' बांस ने सन्- सन् की ध्वनि में कहा- 'मेरे अंदर हवा इधर से उधर बहती रहती है, मैं खोखला जो हूं | मैं बोलता नहीं बजता हूं| वही मुझे में से बोलता है|'  इन पंक्तियों में कोई भी शब्द कठिन नहीं|  प्रचलित मुहावरों  और कहावतों  का भी इस भाषा में अनायास प्रयोग हो गया है| जैसे-  बांस के  उपर्युक्त शब्दों- मैं  खोखला जो हूं, मैं बोलता नहीं ...बजता हूं में  'थोथा चना बाजे घना' वाली कहावत चरितार्थ हुई है| इस प्रकार व्यावहारिक भाषा के प्रयोग से कहानी दार्शनिक होते हुए भी सर्वसाधारण के लिए ग्राह्य बन गई है|
 उद्देश्य
 वस्तुतः तत्सत कहानी उदेश्य प्रधान कहानी है|  इस कहानी का मूल उद्देश्य तत्सत् शीर्षक में छिपा है, तत्सत् का अर्थ है- 'वह है'  इस कहानी के माध्यम से लेखक ने स्पष्ट किया है कि ईश्वर अवश्य है किंतु वह दिखाई नहीं देता| जैसे वृक्ष , लता, तने , प्रभु सर्प आदि के सामूहिक अस्तित्व का नाम ही 'वन' है | वे सब उसी वन के अंग हैं | उसी प्रकार सृष्टि के सब प्राणियों और पदार्थों में विद्यमान सत्ता ही ईश्वर है, यह सभी उसी के अंग हैं, ईश्वर हमें उसी प्रकार प्रथक से दिखाई नहीं देता जैसे वन के जीव जंतु अपने से भिन्न वन को अलग से नहीं देख सकते या देख पाते इसी सत्य का उद्घाटन करना ही लेखक का प्रमुख उद्देश्य है,
 नामकरण की सार्थकता
  कहानी के उद्देश्य को लक्ष्य करके ही कहानी का नाम तत्सत रखा गया है, जो नितांत उचित है| इसी शीर्षक में ही लेखक का मूल अभीष्ट निहित है| उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि तत्सत एक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक कहानी है| ईश्वर है या नहीं?  है, तो उसकी सत्ता कहां विद्यमान है?  इसी दार्शनिक प्रश्न को सुलझाने के लिए जनेंद्र ने कहानी के सभी तत्वों का सफल प्रयोग किया|

रविवार, 24 जून 2018

एक वह अजेय (कहानी संग्रह )


                                                                
                                 
(समीक्षा)       

‘एक वह अजेय’ कहानी संग्रह दिल्ली में जन्मे डॉ. वीरेन्द्र कुमार जी का है| डॉ. वीरेन्द्र कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले ईशा ज्ञानदीप प्रकाशन से उनके ‘अन्नदाता’ और ‘अपने-अपने कुरुक्षेत्र’ नामक दो कहानी संग्रह छप चुके हैं| 
यह उनका तीसरा कहानी संग्रह है| पिछली कहानियों की तरह ही डॉ. वीरेन्द्र कुमार की इन कहानियों में भी कल्पना कम यथार्थ ज्यादा है। सरल एवं सहज भाषा में लिखी गई ये कहानियां पठनीय होने के साथ-साथ मध्यम वर्गीय जीवन के एकदम करीब हैं , कहानियों का निर्माण किसी भारी भरकम और सुनियोजित कथ्य से न होकर उन छोटी-छोटी साधारण घटनाओं से हुआ है जो हर घर में, परिवार में और हर समाज में घटित होती हैं| समाज और परिवार में रहते हुए व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में कुछ सामान्य-सी घटनाओं और अपने-परायों के बीच अक्सर जिन छोटी-छोटी समस्याओं से रूबरू होता है, उन्हीं का चित्रण-वर्णन हमें इस संग्रह की कहानियों में देखने-पढ़ने को मिलता है| मनुष्य अपने आस-पास घटित होने वाली ऐसी आदतों-बातों और मुलाकातों को बहुत सहज रूप में लेते हैं जबकि ये घटनाएं किसी भी व्यक्ति के जीवन को सही-गलत दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसी ही कुछ घटनाओं का संग्रह कर लेखक ने इन कहानियों को गुना-बुना है|
प्रकृति से मनुष्य का अटूट रिश्ता है, इसका अहसास कहानियों को पढ़ते हुए बखूबी होता है| लेखक ने भावों की गहराई को समझाने के लिए प्रकृति का ही सहारा लिया है “ मेरे भीतर का वात्सल्य रसायन बनकर रुके हुए जलस्त्रोत के प्रवाह की तरह दुग्ध रूप में फूट पड़ा है” सर्दी-गर्मी-बरसात आदि सभी ऋतुएं, सुबह-शाम-दोपहर-रात-दिन, आदि दिन के पहर, इन सबका किसी भी कहानी के देशकाल और वातावरण के निर्माण में अहम् रोल होता है, इस बात को लेखक अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए प्रत्येक कहानी में कहीं-न-कहीं प्रकृति के उपादानों का चित्रण अवश्य हुआ है| इस कहानी-संग्रह की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि प्रत्येक कहानी में प्रत्येक स्तर पर लेखक की दृष्टि सामाजिक, पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण पर बनी रही है| 
        जीवन का एक और नाम संघर्ष है, कदम कदम पर नई-नई मुसीबतें-समस्याएं और परेशानियाँ मुंह बाए खडी रहती हैं, ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपने सारे निर्णय सोच-समझ कर लेता है| फिर भी कई बार जब समय प्रतिकूल होता है तो सज्जन व्यक्ति भी अपनी बिना किसी भूमिका के ऐसी मुश्किल में पड़ जाता है कि उसकी सारी सूझ-बुझ धरी की धरी रह जाती है, उसकी जीवन-नैया डगमगाने लगती है, ऐसी दुःख की घड़ी में अगर कोई इंसान मदद के लिए आगे आता है तो वही सच्चा इंसान होता है, देखा जाये तो यही इंसान होने की पहचान है, इंसान वह है, जो अपने आसपास के लोगों को दुख से उभारे, उनकी मदद करें|  मगर ये दुनिया इतनी सीधी-साधी नहीं है, होता अक्सर ये है कि जब मनुष्य कष्ट में होता है तो लोग उसका साथ छोड़ देते हैं, उससे दूरी बना लेते हैं, यहाँ तक कि लोग अपने को पराया करने में सेकंड नहीं लगाते। तब ऐसा लगता है जैसे ये धरती रहने लायक जगह नहीं है, इंसान, इंसान नहीं, हैवान है और ये जीवन जीवन न होकर एक सजा है, अगर जीवन, दुनिया या इस समाज को लेकर आप भी ऐसा सोचते हैं तो आपको  ‘एक वह अजेय’ कहानी संग्रह ज़रूर पढ़ना चाहिए| क्योंकि इन कहानियों के सदपात्र जीवन में हारे हुए कुछ ऐसे ही लोगों का सहारा बनने के लिए पैदा हुए हैं| लेखक ने ‘अपनी बात’ में  इस ओर संकेत भी किया है, वे लिखते हैं- “प्रस्तुत कहानी संग्रह ‘एक वह अजेय’ में जीवन संघर्ष से जूझते हुए कुछ ऐसे सदपात्र हैं जो जगह-जगह अपनी स्वर्णिम किरणों की आभा से प्रकाश फैला रहे हैं| स्वयं को होम करने वाले यह पात्र स्वयं कष्टों को झेलते हुए किसी दूसरे को बनाकर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं और यह विश्वास दृढ़ बना देते हैं कि दुनिया अभी जीने लायक है और ‘मनुष्यता मरी नहीं है’  लेखक ने अपना उद्देश्य स्पष्ट करने के लिए जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कृति कामायनी से कुछ पंक्तियाँ भी उद्रित की हैं - 'औरो को हंसते देखो मनु, हँसों और सुख पाओ। अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ।'
                           इस संग्रह में कुल आठ कहानियां संकलित हैं| प्रत्येक कहानी की रचना में लेखक का अपना अनुभव, स्मृतियां, सोच और दृष्टि का अहम् रोल रहा हैं| लेखक समाज में बदलाव चाहता है| वह चाहता है कि समाज प्रगतिशील तो बने और समाज की परंपरागत सोच में भी सकारात्मक परिवर्तन आए, लेकिन ये बदलाव पारिवारिक मूल्यों की बलि देकर नहीं होना चाहिए, शुरू से लेकर आखिर तक लेखक की यही मंसा दिखाई देती है| अगर परम्पराओं में बदलाव लाने से व्यक्ति का जीवन सुखी होता है तो इसके लिए लेखक रूढ़ हो चुकी परम्पराओं को ख़त्म कर नई परम्पराओं की स्थापना करने के लिए तैयार है, ऐसी सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने में लेखक इस बात की भी परवाह नहीं करता कि समाज के ‘चार लोग क्या कहेंगे’, लेकिन जहाँ फ़र्ज या जिम्मेदारियों को निभाने की बात आती है तो वहां लेखक  इस बात की फिक्र करता है कि 'कौन क्या कहेगा' | ‘चिकनगुनिया’ कहानी में अरुण अपने पिता को कहता है-“पापा आप हमेशा कहते हो, लोग क्या कहेंगे ? लोग क्या सोचेंगे ?……कौन हैं वे लोग जो आपके बारे में सोचते हैं; चिंता करते हैं आपकी, मुझे बताइए किसने आपको क्या दिया ?.......|” इसी तरह  ‘क्या करे अनुज’ कहानी का पात्र ‘अनुज’ अपने परिवार, अपने खानदान और समाज के प्रति अपने फ़र्ज और अपनी जिम्मेदारियों को समझता है और उनको निभाना चाहता है। उसे इस बात का खेद है कि जिनकी वो मदद करता है वो उसके प्रति कृतज्ञता भी प्रकट नहीं करते। बावजूद इसके वह अपने बीमार भाई की तन-धन-मन से मदद करता है| जबकि हम सब जानते हैं कि इस महंगाई के ज़माने में ऐसा करने वाले विरले ही मिलेंगे क्योंकि इतनी महंगाई में आज का दंपति सिर्फ अपनी पत्नी और बच्चों की खुशहाली तक ही सोच पाता है, सच्चाई तो यह है कि अपने परिवार के दूसरे सदस्यों अर्थात अपनी बहन या भाई की मदद करने के लिए ना तो उनके पास पैसा होता है और ना ही समय| कहानी पढ़कर दिमाग में यही आता है कि  हमें केवल अपने बारे में ही नहीं, अपने परिवार के दूसरे सदस्यों के बारे में भी सोचना चाहिए। ऐसा करके लेखक ने समाज और परिवार को तोड़ने की नहीं जोड़ने की बात की है|                                      
        साहित्य समाज का दर्पण होता है| समाज के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों को दिखाना किसी भी अच्छे लेखक का धर्म ही नहीं कर्तव्य भी होता है| कहानी-संग्रह का लेखक अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति सचेत है और इसी का पालन करते हुए लेखक ने दो कहानियों के माध्यम से जिम्मेदार और गैरजिम्मेदार युवा वर्ग पर प्रकाश डाला है| ‘अनाथ संसार का एक वह बालक’ और  ‘एक वह अजेय’ नामक दोनों कहानियों का निर्माण लेखक की इसी दृष्टि को रेखांकित करता है|  ‘अनाथ संसार का एक वह बालक’ कहानी आज के समय में प्रासंगिक है क्योंकि आज की नई पीढ़ी को मेहनत कम, रुपया ज्यादा चाहिए| इलेक्ट्रोनिक गैजेट और आभासी दुनिया को ही अपना सब कुछ मानने वाली  यह पीढ़ी अपने बूते पर नहीं बल्कि माता-पिता की कमाई के बूते पर बहुत-कुछ और बहुत बड़ा आदमी बनने का सपना देखती है| ऐसे में माता-पिता उन्हें पैसे देने वाली एटीएम मशीन लगने लगते हैं, एक ऐसी मशीन जिसका अपना कोई शौक या जरूरत शेष नहीं बची| यह पीढ़ी माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने से भी कतराती है।|  ‘अनाथ संसार का एक वह बालक’ कहानी का एकांत कुछ इसी तरह का बालक है| दूसरी तरफ  ‘एक वह अजेय’ कहानी में राधिका है जो ऐसे युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो समाज और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझाता है| राधिका जो कम उम्र में ही परिवार की मुखिया की भूमिका का निर्वाह करती है, अपने पिता को जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ देखकर अपनी छोटी बहनों की शादी की जिम्मेदारी वह खुद अपने कंधों पर लेती है ....राधिका अपने पिता को कहती है कि आप चिंता क्यों करते हैं? मैं हूँ न ..आप अपना ध्यान रखिए। कहानी, समाज की उस परंपरावादी सोच को खारिज करती हुई आगे बढती है कि लड़कियां लड़कों वाले काम नहीं कर सकती या लड़के ही माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा होते हैं, जो लोग लड़कियों को कमतर मानते हैं उनको यह कहानी यह संदेश देती है कि आज के समय में लड़कियां भी अपने माता-पिता और परिवार की उसी तरह से मदद करती हैं जिस तरह से एक लड़का मदद करता है। अतः माता पिता को लड़के लड़कियों की परवरिश में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए। दोनों कहानियों  का आदि, मध्य और अंत सही दिशा में विकास करता नजर आता है और कहानी के तत्वों के आधार पर भी मूल्यांकन करें तो भी ये बहुत ही अच्छी कहानी साबित होती हैं|
                   ‘चिकनगुनिया कहानी’ बुजुर्गों के अकेले जीवनयापन को लेकर लिखी गई है, अरुण और करुणा अपने-अपने माता-पिता के नए संबंध का समर्थन करते हैं| उनका यह निर्णय उनकी आधुनिक सोच का परिचायक है|  आज रोजी-रोटी के चक्कर में नई पीढ़ी माता-पिता को छोड़ विदेशों में जाकर बस रही है, माता- पिता बुढ़ापे में अकेले जीवनयापन करने  को मजबूर हो रहे हैं| ऐसे समय में पारिवारिक संबंधों की परिधि, सीमाएं बढ़ रही हैं,  उनकी परिभाषाएं बदल रही हैं, लेखक ने सांकेतिक रूप से जाहिर कर दिया है कि अब हमें पारिवारिक संबंधों को लेकर अपनी पारंपरिक सोच को त्याग कर समयानुसार नई सोच को अपनाना पड़ेगा| देखा जाये तो पाठक भी यही चाहता है इसलिए मौसी का अरुण के साथ जाना पाठक को शुकून देता है क्योंकि जीवन केवल जवानी का नाम नहीं है, उसमें बुढ़ापा भी आता है और जवानी में हमें शायद सहारे की उतनी जरूरत नहीं होती जितनी बुढ़ापे में होती है| ‘उनके अपने फूफा जी’ कहानी समाज के यथार्थ रूप को उजागर करती है। समाज में कुछ लोग दोहरे चरित्र के व्यक्ति होते हैं जो देखने में बहुत ही सीधे-साधे और सामाजिक लगते हैं लेकिन बहुत ही कुटिल कुलषित हृदय वाले होते हैं। अपनी चौधराहट बनी रहे बस, भलाई से इन लोगों का कोई लेना-देना नहीं होता। अपने स्वार्थ के सिवा इनको कुछ नहीं दिखाई देता। इस कहानी में लेखक ने ऐसे लोगों के चरित्र पर पड़ी परतें उतार उनके चरित्र का वास्तविक रूप दिखाया है।
            ‘अपना अपना गणित’ कहानी में लेखक ने घरेलु कामों को लेकर एक दम्पति के बीच हुए वार्तालाप को आधार बनाया है| घरेलु काम महिला और पुरुष किसके कर्मक्षेत्र में आते हैं ? यही प्रश्न वार्तालाप का मुख्य केंद्र बिंदु है| आजकल महिला और पुरुष दोनों ही काम करते हैं। प्राय: सभी घरों में घरेलू काम महिला के सर पर मंड दिए जाते हैं, पुरुष अगर किसी काम को करता है तो वह ये कह कर महिला पर अहसान जताता है कि उसने ये सारे काम उसके बांटे के किये हैं| जबकि आज महिला पुरुष के बराबर कमाती है| ऐसे में घर के काम भी दोनों के हुए, लेकिन महिला के हिस्से में कुछ ज्यादा ही काम रहता है, उस पर कार्यक्षेत्र और घरेलू दोनों जगहों के कामों को करने की जिम्मेदारी आ जाती है| या यूँ कहे कि नाते-रिश्ते निभाने की जिम्मेदारी महिलाओं की ज्यादा होती है| इसलिए वह अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को छोड़ नहीं पाती और ना ही वह अपने निजी कार्य क्षेत्र में किसी तरह की लापरवाही दिखाना चाहती, इसलिए वह इन दोनों के बीच में अंततः संघर्ष में करती रहती है जिसका कहीं ना कहीं उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है| कह सकते हैं कि महिलाओं के  पक्ष को इस कहानी में बड़े अच्छे से रखा गया है और वो भी एक पुरूष पात्र के द्वारा, यह तभी संभव हो पाता है जब उस अहसास को उस पुरूष पात्र ने महसूस किया हो| 
                   ‘एक बेरोजगार’ कहानी में यह बहुत ही अच्छी तरह दर्शाया है कि एक व्यक्ति अपने अस्थाई रोजगार को बनाए रखने के लिए क्या-क्या नहीं करता?, कुछ चापलूस और अत्यधिक महत्वाकांक्षी लोग सत्ताधारी को ऐसा चश्मा पहनाते है कि उसको फिर वही दीखता है जो वे दिखाना चाहते हैं, लेकिन कहते हैं न कि जिसको लागे वही जाने, शायद इस पीड़ा का तनिक भी अहसास न तो सरकार को है और न ही किसी संस्थान के सर्वेसर्वा को| इसलिए यह कोई नहीं जानता कि अस्थाई होने का दंश झेलते-झेलते व्यक्ति हरे-भरे पेड़ से सूखी लकड़ी-सा हो जाता है, हमारा प्रशासन, हमारी व्यवस्था, संस्थान का सर्वेसर्वा इस अस्थाई या बेरोजगार को सुखी लकड़ी बनाकर अपने ओछे स्वार्थ के चुल्हे में जलाकर किस प्रकार अपनी रोटियाँ सकते हैं, यह ‘एक बेरोजगार’ कहानी से पता चलता है, लेकिन बेरोजगारों को नाकामियों से घबराकर आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए|
         कहानी संग्रह की अंतिम कहानी माधवी है| माधवी कहानी की मुख्य पात्र है जो एक लडके से प्रेम करती है| वह जानती है कि सच्चे प्रेम में भोग-वासना का कोई स्थान नहीं है| जो ‘प्रेम’ जैसे पवित्र शब्द को भी यूज एंड थ्रो की तर्ज पर प्रयोग करते हैं ऐसे प्रेमियों को माधवी ने बड़े सटीक शब्दों में प्रेम के पवित्र भाव को समझाने की कोशिश की है| अंत में कहा जा सकता है कि एक दो जगह लेखक भाव में बहकर कहानीकार के बदले उपदेशक की भूमिका में ज़रूर आ गए हैं, थोड़ी लेखनी भी डगमगाई है, जिसके कारण बीच-बीच में संवादों में थोडा-सा विरोधाभास उत्त्पन्न होता है लेकिन कथा के प्रवाह में, गति में, कहीं कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती| कुल मिलाकर सभी कहानियां पाठक को सामाजिक सरोकारों से जोड़ती हैं|
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नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...