हिंदसा

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

नाटक

                                                                    नाटक का विकास

नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में नाट्य साहित्य की बहुत समृद्ध परंपरा मिलती है लेकिन हिंदी भाषा में नाटक का आरंभ 19 में शताब्दी में भारतेंदु युग से ही हुआ है। भारत में लोक परंपरा के रूप में भी नाटक विधा भारतीय लोक साहित्य में हमें मिलती है। हर प्रदेश का अपना लोक रंगमंच है। रासलीला, नौटंकी, स्वांग, रामलीला ,जात्रा यह सब लोक नाट्य परंपरा के ही रूप हैं। किंतु हिंदी नाटक के विकास की जहां तक बात है वह आधुनिक युग से ही आरंभ होता है इससे पहले जो हमें नाटक मिलते हैं वह गद्य में न मिलकर पद्य में मिलते हैं। वास्तव में हिंदी नाटक के आरंभ का श्रेय भी भारतेंदु को ही जाता है जैसे कि गद्य की दूसरी विधाएं निबंध और कहानी आदि का विकास भारतेंदु युग में होता है उसी तरह से नाटक का विकास भी भारतेंदु हरिश्चंद्र के द्वारा आधुनिक काल में ही किया गया।

हिंदी का सबसे पहला मौलिक नाटक नहुष को माना जाता है जो 1857 में भारतेंदु के पिता गोपाल चंद्र गिरधर दास के द्वारा लिखा गया था। हालांकि कुछ विद्वान विश्वनाथ सिंह के आनंद रघुनंदन नाटक को भी हिंदी का पहला मौलिक नाटक मानते हैं जो 1780 के आसपास लिखा गया था। किंतु उसमें एक तो ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है। दूसरा वह रामलीला की पद्धति पर ही लिखा गया है। इसलिए वह उतना आधुनिक नाटक कला के निकट नहीं है जितना कि नहुष नाटक। इस समय संस्कृत के अभिज्ञान शाकुंतलम् का हिंदी अनुवाद जो राजा लक्ष्मण सिंह ने किया जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। जहां तक नाटक के विकास की बात है तो अध्ययन की सुविधा के लिए उसे भी हम तीन युगों में विभाजित कर लेते हैं-

भारतेंदु युग
प्रसाद युग
प्रसादोत्तर युग
भारतेंदु युग - भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आधुनिक युग में मौलिक और अनुदित नाटको की रचना कर नाटको की प्राचीन परंपरा को आगे बढाया| भारतेंदु ने स्वं म भी नाटक लिखे और दूसरे साहित्यकारों को भी लिखने के लिए प्रोत्साहित किया । भारतेंदु युगीन नाटकों का मूल उद्देश्य पाश्चात्य संस्कृति के समक्ष भारतीय संस्कृति का महत्व प्रतिपादित करना, भारतीयों में राष्ट्रीय भावना को जागृत करना तथा सामाजिक बुराइयों से भारतीयों को अवगत करा कर उन बुराइयों को दूर करना रहा है। भारतेंदु ने युगीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ऐसे नाटकों की रचना की। इस युग के नाटककार देश की सामाजिक और धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक दुर्दशा से भी आहत थे। उन्होंने देखा कि समाज को जगाने में नाटक सबसे ज्यादा प्रबल विधा है तो इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस युग के नाटककारों ने नाटक लिखें। इसलिए उन्होंने नाट्य साहित्य के माध्यम से समाज को जागृत करने का संकल्प लिया| इस युग के नाटककारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, श्रीनिवास दास, राधाचरण गोस्वामी, अंबिकादत्त व्यास प्रमुख है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने तो नाटकों की रचना के साथ साथ अभिनय भी किया और निर्देशन भी किया। उन्होंने मौलिक और अनुदित दोनों प्रकार के नाटकों का सृजन किया। अनुदित नाटक मूलतः बंगला, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं के हैं और अनूदित और मौलिक कुल मिलाकर 22 नाटकों की रचना की। जिनमें से प्रमुख है- चंद्रावली, नील देवी, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, विद्या सुंदर, मुद्राराक्षस, सत्य हरिशचंद्र, रत्नावली आदि।
भारतेंदु के समकालीन नाटककारों में बालकृष्ण भट्ट का नाम भी प्रमुख है उन्होंने 15 नाटकों की रचना की। रेनू संहार, जैसा काम वैसा परिणाम, दमयंती स्वयंवर उनके मौलिक नाटक है। भट्ट जी ने देश काल संबंधी सामाजिक यथार्थ स्थिति का सजीव चित्र प्रस्तुत किया है| उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य करके नैतिकता और मर्यादा को प्रतिष्ठित करना चाहा है| इसी कड़ी में लाला श्रीनिवास दास का नाम आता है जिन्होंने तप्ता संवरण, प्रहलाद चरित्र, रणधीर प्रेम मोहिनी, संयोगिता स्वयंवर नाम के चार नाटक लिखे| रणधीर प्रेम मोहिनी उनकी श्रेष्ठ रचना है जिसको हिंदी का प्रथम दुखांत नाटक भी माना जाता है| इन्होंने अपनी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य नृत्य शैलियों का समन्वय किया है| राधा कृष्ण दास भी भारतेंदु युग के प्रमुख नाटककार माने जाते हैं| इन्होंने दुखिनी बाला, महारानी पद्मावती, महाराणा प्रताप सिंह आदि नाटक लिखें| इनके नाटकों में क्रमिक विकास दिखाई देता है| प्रताप नारायण मिश्र ने भी सामाजिक विषयों पर- दूध का दूध पानी का पानी, हम्मीर हठ आदि नाटकों की रचना की है| कहने का तात्पर्य यह है कि संक्रांति किस काल में उत्पन्न युग के समस्याओं जैसे पारस्परिक फूट, धार्मिक अंधविश्वास, पाखंड छुआछूत, आर्थिक शोषण, बाल विवाह, विधवा विवाह, वेश्या गमन, मधपान, समाज सुधार, राष्ट्रीय गौरव आदि का चित्रण इस युग के नाटककार ने बखूबी किया है| इन नाटकों का मूल उद्देश्य समाज की कुरीतियों का समापन करना था |
प्रसाद युग- नाटक के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद का नाम बड़े गौरव के साथ लिया जाता है। जयशंकर प्रसाद के आगमन से नाटक के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। प्रसाद ने ऐसे चरित्रों को निर्मित किया जो ऐतिहासिक होते हुए भी समस्याओं की दृष्टि से प्रासंगिक थे| इन के नाटकों में भारतीय और पाश्चात्य तत्वों का समुचित समाहार दिखाई देता है| भारत के अतीत के प्रति गौरवमयी अनुभूति, प्रेम की भावुक तथा मानवीय संवेदना, अतीत की राष्ट्रीय गरिमा का आधुनिक संदर्भों में चित्रण आदि प्रसाद युग के नाटकों के प्रमुख विचारक तत्व हैं| जयशंकर प्रसाद के प्रमुख नाटकों में सज्जन, विशाल, अजातशत्रु, राज्यश्री, कामना, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी आदि शामिल हैं|उन्होंने मुख्य रूप से ऐतिहासिक नाटक लिखें, कामना उनका प्रतीक नाटक है, प्रसाद के नाटकों में उनके अंतिम नाटक ध्रुवस्वामिनी का भी विशेष स्थान है, यह एक ऐतिहासिक और समस्या प्रधान नाटक है| इस नाटक में प्रसाद ने नारी समस्या को प्रस्तुत किया है| पुनर्विवाह का अधिकार हिंदू स्त्री को है और इस समस्या को उन्होंने इस नाटक में बड़ी ही कौशल से रखा है| शिल्प की दृष्टि से प्रसाद जी के नाटक बेजोड़ हैं, उनमें भारतीय और पाश्चात्य नाट्यकला का संतुलित समन्वय हुआ है| पाश्चात्य नाटकों में पाया जाने वाला संघर्ष, अंतर्द्वंद, व्आयक्दिति वैचित्र्य का प्रसाद के नाटकों में समावेश हुआ है| प्रसाद जी के नाटक न तो सुखांत है ना दुखांत| बल्कि वे प्रसादांत है| उनके नाटक श्रेष्ठ नाटकों की कोटी में श्रेणी में रखे जाते हैं| प्रसाद जी के नाटकों पर आरोप लगाया जाता है कि ये पाठ्य अधिक है, अभिनेय कम| दृश्यों की अधिकता, पात्रों की अधिकता, कलिष्ट भाषा, दार्शनिकता , बड़ा आकार उनके नाटकों में के दोष बताए जाते हैं| इसके बावजूद कहा जा सकता है कि प्रसाद महान नाटककार हैं प्रसाद युग के अन्य नाटक कारों में हरि कृष्ण प्रेमी, लक्ष्मीनारायण मिश्र, सेठ गोविंद दास, गोविंद बल्लभ पंत उपेंद्रनाथ अश्क, वृंदावनलाल वर्मा, पांडे बेचन शर्मा उग्र आदि के नाम लिए जा सकते हैं | हरि कृष्ण प्रेमी का स्थान भी इस युग में महत्वपूर्ण है| उन्होंने भी ऐतिहासिक नाटकों की रचना की है| रक्षाबंधन उनका प्रसिद्ध नाटक है| इसी तरह से सेठ गोविंद दास ने भी अपने नाटकों में समकालीन सामाजिक समस्याओं जैसे छुआछूत, भ्रष्टाचार, पाखंड, नेताओं की स्वार्थपरता आदि का निरूपण करते हुए संतोष कहां ,त्याग और ग्रहण आधी नाटकों की रचना की है| उनके नाटक रंगमंच के अनुकूल हैं |
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि प्रसाद युग नाटक के विकास में एक क्रांतिकारी पड़ाव था, यह युग एक नवीन चेतना से युक्त था जिसमें राष्ट्रीयता की भावना की मुखर अभिव्यक्ति दिखाई देती है| भारत की सांस्कृतिक चेतना और प्राचीन गौरव को जयशंकर प्रसाद के साथ-साथ इस युग के दूसरे नाटककार ने भी अपने नाटकों में चित्रित किया है| हां इस युग के नाटक रंगमंच की दृष्टि से थोड़े कमजोर दिखाई पड़ते हैं।
प्रसादोत्तर युगीन
यह नाटक के विकास का एक नया युग माना जा सकता है| इस युग नाटकों में उन सभी प्रयोगों का विकसित रूप हम देख सकते हैं जो जयशंकर प्रसाद ने शुरू किए थे | साथ ही नाटकों में जीवन के नए यथार्थ बोध के कारण नवीन दृष्टि विकसित हुई| शिल्प की दृष्टि से भी अनेक रूप में उभरकर आए| इस युग के नाटककारों ने पौराणिक विषयों की तुलना में समसामयिक समस्या मूलक विषयों की ओर अधिक ध्यान दिया| देश में स्वतंत्रता के बाद एक नई चेतना का विकास हुआ तथा जनमानस ने जो अपेक्षाएं की थी वह भी पूरी नहीं हो सकी, इसलिए स्वार्थपरता, छल कपट, भ्रष्टाचार, अवसरवादीता का ही साम्राज्य हर तरफ दिखाई देता है, बढ़ती हुई जनसंख्या में बेरोजगारी, उससे उत्पन्न तनाव, औद्योगिकरण के कारण जीवन में अनेक समस्याओं का जाल फैला|
महानगरों में जीवन का गिरता स्तर, मूल्यों में हुए परिवर्तन आदि को इस युग के नाटककारों ने अपनी रचनाओं में व्यक्त किया है| इस काल के नाटक जीवन के यथार्थ से जुड़े हुए हैं और शिल्प के स्तर पर भी नंदी पाठ, भारत वाक्य, प्रस्तावना, गीत, नृत्य आदि कम ही दिखाई देते हैं| सूत्रधार के स्थान पर कमेंटेटर का प्रयोग होना शुरू हो गया था| दो या तीन अंकों में नाटक की समाप्ति इस युग में मिलती है कुल मिलाकर रंगमंच एवं अभिनेता का विशेष ध्यान, जिसका आभाव हमें प्रसाद युग में मिलता है|
इस युग के नाटक कारों में विष्णु प्रभाकर ,,जगदीश चंद्र माथुर, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, सुरेंद्र वर्मा, लक्ष्मी नारायण लाल, रामकुमार वर्मा आदि आते हैं| जगदीश चंद्र माथुर इस युग के प्रमुख नाटककारों में से एक हैं| इन्होंने अपने नाटकों के द्वारा रंगमंच को नई दिशा प्रदान की| कोणार्क, पहला राजा आदि इनके प्रसिद्ध नाटक हैं| धर्मवीर भारती और मोहन राकेश, विष्णु प्रभाकर भी इस युग के प्रमुख नाटककारों में आते हैं| धर्मवीर भारती ने अंधा युग, विष्णु प्रभाकर ने डॉक्टर, युगे युगे क्रांति, टूटते परिवेश और मोहन राकेश ने आधे अधूरे, आषाढ़ का एक दिन ,लहरों के राजहंस आदि नाटक लिखें| यह तीनों ही नाटककार इस युग के प्रमुख नाटककार हैं जिन्होंने युगीन समस्याओं के साथ-साथ रंगमंच को दृष्टि में रखते हुए अपने नाटकों की रचना की| इन सबके अतिरिक्त उत्तर आधुनिक युग के नाटककारों में ऐसे बहुत रचनाकार हैं जिन्होंने इस विधा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है और दे रहे हैं| जिसमें दुष्यंत कुमार, रमेश बख्शी, विनोद रस्तोगी, अमृतराय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और भीष्म साहनी का कबीरा खड़ा बाजार में, मृदुला गर्ग का एक और अजनबी, त्रिपुरारी शर्मा का बहू, मीरा कांत का नेपथ्यय राग बहुत महत्हत्वपूर्ण नाटक हैं | ये सब नाटक लिखकर नाटक विधा को समृद्ध कर रहे हैं | आज राष्टीय नाट्य विद्यालय के साथ-साथ अस्मिता थियेटर, एकजुट थियेटर आदि अनेक ग्रुप नाटकों के मंचन और प्रस्तुति में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं|

बुधवार, 27 जनवरी 2021

रेखाचित्र/संस्मरण

    रेखाचित्र/संस्मरण 

आधुनिक हिंदी साहित्य की अन्य गद्य विधाओं की तरह से ही रेखाचित्र एवं  संस्मरण भी नवीन विधाएं हैं | ये  दोनों ऐसी विधाएं हैं जो अपने रूप में, एक दूसरे में अंतरण करती हुई सी प्रतीत होती हैं | स्मृति के आधार पर घटनाओं का प्रभावशाली शब्दों के माध्यम से अंकन और विवरण-प्रस्तुति ने ही संस्मरण विधा को जन्म दिया| ठीक इसी तरह पाठकों के समक्ष किसी घटना व्यक्ति अथवा प्रसंग की चित्रात्मक अभिव्यक्ति रेखाचित्र कहलाती है,  इसे अंग्रेजी के स्केच का पर्याय कहा गया है| बेनीपुरी जी ने इसके लिए शब्द चित्र का प्रयोग किया है|  डॉ नगेंद्र ने इसे स्मृति चित्र कहकर संस्मरण विधा के गुणों को भी इसके ऊपर परिगणित कर दिया|  

                        वास्तव में रेखाचित्र को संस्मरण का ही विकसित रूप कहा जा सकता है| यह साहित्यिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक घटना प्रधान, व्यक्ति प्रधान आदि हो सकते हैं| अपने आकार में यह छोटे और विवरण प्रधान हो सकते हैं| यह विधा यथार्थ जीवन से जुड़ी होने के कारण इसमें कल्पना का आश्रय कम लिया जाता है| एक कुशल और सफल रेखाचित्रकार  के लिए अनुभूति की गहनता, सत्यता एवं अभिव्यक्ति की कुशलता आवश्यक है|  

                  रेखाचित्र हिंदी गद्य की एक नवीन विधा है | हिंदी की समस्त आधुनिक विधाओं में रेखाचित्र ने भी अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है| जिस प्रकार चित्रकला में बिना रंगों का प्रयोग किए हुए मात्र रेखाओं से रेखाचित्र बनाए जाते हैं उसी प्रकार जब शब्दों के माध्यम से किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को उभारा जाता है तो उसे रेखा चित्र कहते हैं| रेखा चित्र का विषय काल्पनिक ने होकर वास्तविक होता है और उसकी आंतरिक और बाहरी विशेषताएं बड़े कलात्मक ढंग से अभिव्यक्ति पाती है| रेखा चित्र में किसी वस्तु या किसी व्यक्ति का चित्र लेकर तटस्थता  के साथ भरा जाता है| इसमें व्यक्ति का संपूर्ण चित्र अंकित होता है| यह व्यक्ति साधारण असाधारण दोनों तरह का हो सकता है|

                        हिंदी साहित्य में आधुनिक गद्य की प्रायः प्रत्येक विधा की शुरुआत भारतेंदु युग से ही हुई है| रेखा चित्र  विधा की शुरुआत भी भारतेंदु युग से ही होती है| भारतेंदु युग में पाश्चात्य साहित्य हिंदी साहित्य को प्रभावित किया है| पाश्चात्य साहित्य में भी रेखाचित्र का पर्याप्त विकास हो चुका था| उस समय चार्ल्स डिकेंस, चेखव आदि के रेखा चित्रों को अर्थात स्केच को बहुत प्रसिद्धि मिली थी| इनके प्रभावस्वरूप ही हिंदी में रेखा चित्रों का उदय हुआ है, ऐसा माना जाता है|

                                      वास्तव में हिंदी साहित्य में रेखाचित्र का उद्भव बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में हुआ| उस समय 1929 में प्रकाशित पंडित पदम सिंह शर्मा के पदमपराग निबंधों से इसका आरंभ माना जाता है| इसी आधार पर पदम पदम सिंह शर्मा को रेखाचित्र का जनक भी स्वीकार किया गया है| यद्यपि इनको  आधुनिक रेखाचित्र तो नहीं कहा जा सकता परंतु इनमें वर्तमान रेखाचित्र के पर्याप्त तत्व मिलते हैं और एक तरह से यह रेखा चित्रों की पृष्ठभूमि का कार्य करते हैं|

              सन 1936 ईस्वी से हिंदी रेखाचित्र में विकास की रेखाएं मिलने लगती है और इसका श्रेय पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी को जाता है| बनारसीदास चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक रेखाचित्र में देश विदेश के साहित्यकारों, पत्रकारों, राजनीतिज्ञ, समाज सेवकों के जीवन को अंकित किया है| इनमें राष्ट्रीय भावना के साथ विश्व प्रेम और अंतरराष्ट्रीयता की  झलक भी मिलती है| 

                    पंडित श्रीराम शर्मा का नाम भी हिंदी रेखा चित्रकारों में आदर के साथ लिया जाता है| इनका प्रथम संग्रह बोलती प्रतिमा है| श्रीराम शर्मा ने रेखाचित्र निर्माण में साहित्यकारों का पथ प्रदर्शन किया| उनकी विषय प्रतिपादन क्षमता अत्यंत आकर्षक और रोचक है| उनके रेखा चित्र संग्रह है- प्राणों का सौदा, जंगल के जीव| जंगल के जीव में उन्होंने जंगली जानवरों को रेखा चित्रों का विषय बनाया है|

                                हिंदी रेखाचित्र की विकास यात्रा में रामवृक्ष बेनीपुरी का नाम भी महत्वपूर्ण है| इस विधा में उन्हें अपूर्व सफलता प्राप्त हुई है| बेनीपुरी जी के लाल तारा, माटी की मूरतें, गेहूं और गुलाब, मील के पत्थर रेखा चित्र संग्रह उल्लेखनीय है| बेनीपुरी जी ने सामाजिक और राजनीतिक विषमताओं के प्रति आक्रोश तथा समाज के दीन- दलित वर्ग के प्रति ममता अभिव्यक्त करते हुए बहुत ही मार्मिकता के साथ रेखाचित्र लिखे हैं|                                                                       हिंदी रेखाचित्र के विकास में महादेवी वर्मा का नाम भी अलग ही पहचान रखता है| उनके रेखाचित्र हिंदी साहित्य में सर्वोच्च स्थान रखते हैं| सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी महादेवी की कलम का स्पर्श पाकर अपने समग्र चरित्र के साथ रेखा चित्रों में गरिमा मंडित हो गए हैं|  उन्होंने अपने रेखा चित्रों में ऐसे व्यक्तियों को विषय बनाया है जो सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत साधारण स्तर के हैं |यह सभी पात्र दूसरों की नजर में एक मिट्टी के ढेले के समान है| परंतु इन मिट्टी के ढेरों में से महादेवी वर्मा ने मानवता के विभिन्न रूपों को खोजा है| उनके रेखा चित्रों का मूल विषय करुणा है| ग्रामीण जीवन से संबंधित अनेक पात्र उनके रेखा चित्रों केविषय बने हैं| इस विद्या से संबंधित उनके चार संकलन है- अतीत के चलचित्र,  स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी, मेरा परिवार|  अतीत के चलचित्र उनका पहला संग्रह है और इसी में पहली बार रेखाचित्र की समस्त विशेषताएं सामने आती  हैं|   रामा और घीसा आदि उनके महत्वपूर्ण रेखाचित्र है|  रेखाचित्र विधा को पल्लवित करने का श्रेय प्रकाश चंद्र गुप्त, राधिका रमण प्रसाद सिंह, शिवपूजन सहाय, देवेंद्र सत्यार्थी, विष्णु प्रभाकर, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर आदि का नाम भी आता है | संस्मरण रेखाचित्र में निकट होते हुए भी उससे कुछ भिन्न है इसमें रेखाचित्र की अपेक्षा आत्म निष्ठा की अपेक्षा की जाती है|                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         


गुरुवार, 21 जनवरी 2021

हिंदी उपन्यास का विकास

                                                        हिंदी उपन्यास का विकास 

उपन्यास शब्द का प्रयोग हिंदी में सबसे पहले डॉक्टर माता प्रसाद गुप्त ने 1971 में एक कथा पुस्तक में किया था| किसी व्यक्ति के द्वारा समाज के संपूर्ण जीवन की कथा को प्रस्तुत करने वाली विधा का नाम उपन्यास है| उपन्यास भी कहानी, नाटक की तरह ही आधुनिक काल की गद्य विधा है| इसमें मनुष्य के जीवन के किसी एक पक्ष को नहीं बल्कि विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्त किया जाता है| उपन्यास का शाब्दिक अर्थ होता है - वह वस्तु जो निकट रखी हो | उपन्यास में भी व्यक्ति के जीवन के बहुत निकट होता है उसको पढ़कर पाठक उससे अपना तादात्मय स्थापित करता है और उसे लगता है कि यह कृति उनके जीवन की कहानी को प्रस्तुत करती है| उपन्यास आदर्शवादी भी हो सकता है, ऐतिहासिक भी हो सकता है और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर लिखा गया भी हो सकता है

 उपन्यास विधा पर भी अनेक विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं-

 डॉक्टर श्यामसुंदर दास उपन्यास को लेकर कहते हैं कि उपन्यास मनुष्य के वास्तविक जीवन की काल्पनिक कथा है काल्पनिक कथा का अर्थ होता है उस कथा से है जो कल्पना की सहायता से अधिक मार्मिक बना दी गई हो , जिसमें सुंदर शब्दों का चयन किया गया हो और ऐसे शब्द या भाषा जो लेखक की अभिव्यक्ति को व्यक्त कर सकें|

आचार्य नंददुलारे वाजपेई संबंध में लिखते हैं कि उपन्यास आधुनिक युग का महाकाव्य है इसमें मानव जीवन का चित्र उपस्थित किया जाता है| वह मनुष्य के जीवन और चरित्र की व्याख्या करता है|

इन सारी परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि उपन्यास जीवन की वह कथा है जिसमें कल्पना का भी समावेश होता है और कल्पना के साथ-साथ इसमें सत्य को रखने का प्रयास भी किया जाता है |

हिंदी उपन्यास का विकास भी अंग्रेजी के प्रभाव से हुआ है | अंग्रेजी में उपन्यास को नोवल कहा जाता है| इससे मिलता जुलता शब्द 'नवलकथा' गुजराती और मराठी भाषा में भी लिखा जाता है यह शब्द एक तरह से नवीनता का बोध कराता है

सबसे पहले जब हिंदी उपन्यास का आरंभ हुआ था तो मौलिक उपन्यास कम लिखे गए थे ज्यादातर उपन्यास अनुदित थे अर्थात् दूसरी भाषाओं से अनुवाद किया गया था हिंदी भाषा का प्रथम मौलिक उपन्यास कौन सा है? इस पर भी विद्वानों में मतभेद है| जो विवाद है- वह दो उपन्यासों को लेकर है, एक श्रद्धा राम फिल्लौरी का भाग्यवती और दूसरा लाला श्रीनिवास दास का परीक्षा गुरु1882 में प्रकाशित हुआ था और अधिकतर विद्वानों ने इसे ही हिंदी का मौलिक उपन्यास माना है |भाग्यवती उपन्यास की रचना 1877 में हुई थी किंतु उसका प्रकाशन 10 वर्ष के पश्चात 1887 में हुआ था| फिर भी कुछ आलोचक भाग्यवती के रचना समय को आधार बनाकर उसे ही हिंदी का प्रथम उपन्यास मानने के पक्ष में है| इसके अतिरिक्त एक और उपन्यास है जो इस समय लिखा गया वह है गौरी दत्त का 'देवरानी जेठानी की कहानी' कुछ विद्वान इसे भी मौलिकता के आधार हिंदी के पहले उपन्यास का दर्जा देते हैं |अब अंत में कह सकते हैं कि जो अधिकतर विद्वानों का मत है वह यह है कि परीक्षा गुरु ही हिंदी भाषा का सबसे पहला उपन्यास है क्योंकि यह आधुनिक ढंग का लिख गया उपन्यास है और जो उपन्यास के महत्वपूर्ण तत्व होते हैं वह हमें इस उपन्यास में मिलते हैं| उपन्यास की भूमिका में स्वयं लेखक में नई चाल की पुस्तक कहते हुए यह उल्लेख किया है कि इसकी रचना में कहीं ना कहीं अंग्रेजी लेखकों का प्रभाव उन पर पड़ा है| आचार्य रामचंद्र शुक्ल जो हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक हैं उन्होंने भी परीक्षा गुरु को अंग्रेजी ढंग का मौलिक उपन्यास कहा है|

परीक्षा गुरु में विलासी, स्वार्थी व चरित्रहीन मित्रों की संगति के कारण दिवालिया हुए मदन मोहन नामक रईस की कहानी है | संकट के समय उसकी पत्नी और एक मित्र साथ देते हैं जो संकट का समय गुरु बनकर उसमें विवेक को जागृत करते है| दूसरा उपन्यास भाग्यवती में पति के द्वारा त्याग दिए जाने पर अपने संस्कार एवं शिक्षा के बल पर जीवन निर्वाह करती विदुषी नारी का चित्रण किया गया है| उपन्यास के अंत में पति का भ्रम टूटता है और वह शिक्षित समझदार पत्नी का मूल्य समझ उसे अपना लेता है|

हिंदी उपन्यास के विकास को जब हम देखते हैं तो इसको भी हम तीन चरणों में बांट सकते हैं

सबसे पहला चरण है- प्रेमचंद पूर्व हिंदी उपन्यास

प्रेमचंद युग और

तीसरा प्रेमचंदोत्तर हिंदी उपन्यास

प्रेमचंद से पहले जो उपन्यास लिखे गए उनमें सामाजिक एयारी -तिलिस्मी , जासूसी , ऐतिहासिक और भावप्रधान विषयों को लेकर उपन्यास लिखे गए हैं|

इस समय के उपन्यासों को प्रवृत्तियों के आधार पर हम दो भागों में बांट सकते हैं-

समाज सुधार संबंधी उपन्यास और मनोरंजन प्रधान उपन्यास

उससे पहले का जो युग है उस युग में उपन्यास विधा का एक तरह से विकास हो रहा था और इस समय लिखे गए उपन्यासों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने उपन्यास के लिए एक पाठक वर्ग तैयार किया| इनका उद्देश्य पाठक वर्ग का मनोरंजन करना था और यही वह तत्व था जिसने पाठक के एक बड़े वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया और कईयों को तो हिंदी सीखने के लिए भी विवश कर दिया|

समाज सुधार संबंधी विषयों पर भी इस समय उपन्यास लिखे गए| इस युग के उपन्यास कारों में बालकृष्ण भट्ट श्रीनिवास दास राधा कृष्ण गोस्वामी किशोरी लाल गोस्वामी  आदि है| देवकीनंदन खत्री का उपन्यास चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति इस समय लिखे गए बहुत ही महत्वपूर्ण उपन्यास माने जाते हैं | किशोरी लाल गोस्वामी ने इस समय 65 उपन्यास लिखें राधा कृष्ण दास ने निस्सहाय हिंदू उपन्यास गोवध की समस्या के निवारण को लेकर लिखा

    देवकीनंदन खत्री इस समय के बहुत महत्वपूर्ण उपन्यासकार माने जाते हैं| गोपाल राम गहमरी ने लगभग 150 उपन्यास लिखे| इन के उपन्यासों को जासूसी उपन्यासों की श्रेणी में रखा जाता है|
वास्तव में देखा जाए तो हिंदी उपन्यास में नए युग की शुरुआत प्रेमचंद के साहित्य में आने से होती है| उत्तर भारत के  सामाजिक जीवन की समस्याओं को उपन्यास में जितने मार्मिक ढंग से प्रेमचंद ने रखा है उतना शायद ही किसी दूसरे उपन्यासकार ने रखा हो| उन्होंने मानव जीवन को जाना, समझा और उसके बाद उपन्यासों की रचना की| उनके द्वारा लिखित उपन्यासों में निर्मला, गबन, रंगभूमि, कर्म भूमि, गोदान, सेवा सदन, आदि उच्च कोटि के उपन्यास लिखे |
प्रेमचंद के अतिरिक्त इस समय जयशंकर प्रसाद भी उपन्यास लिख रहे थे उन्होंने तितली इरावती और कंकाल जैसे उपन्यास लिखे कंकाल यथार्थवादी उपन्यास है| इसके अलावा बेचन शर्मा उग्र ने , माँ ,भिखारी विशंभर नाथ शर्मा कौशिक ने , वृंदा लाल वर्मा ने लगन, निराला ने अलका , अप्सरा आदि उपन्यास लिखे| अन्य उपन्यासकारों में जिनका नाम लिया जा सकता है वह है - चतुरसेन शास्त्री, उपेंद्रनाथ अश्क अमृतलाल नागर राखी यशपाल (झूठा-सच,दादा कामरेड ,दिव्या ) उन्होंने भारत की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में आए बदलाव पर अपनी लेखनी चलाई| यशपाल ने कहानियां भी लिखी और उपन्यास भी लिखे मार्क्सवादी विचारधारा को मानने वाले लेखक थे|
आंचलिक उपन्यास कारों में फणीश्वर नाथ रेणु का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है| इनका मैला आंचल उपन्यास हिंदी साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है इन्होंने भी कहानी भी लिखी और उपन्यास भी लिखे| जैनेंद्र ने सुनीता , त्यागपत्र, सुखदा उपन्यासों की रचना की| सन्यासी, पर्दे की रानी इलाचंद्र जोशी ने लिखे |शेखर एक जीवनी, नदी के द्वीप अज्ञेय द्वारा लिखित उपन्यास है, उन्होंने अपने उपन्यासों में मानव मन की जटिलता को खोलने का प्रयास किया है| अज्ञेय ने न केवल सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बल्कि वस्तु और शिल्प के स्तर पर भी एक नए तरह के उपन्यास लिखें| इसी समय मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर आदि ने भी महत्वपूर्ण उपन्यास लिखे | काली आंधी,सारा आकाश राजेंद्र यादव के प्रमुख उपन्यास है| इस समय लिखे गए अन्य महत्वपूर्ण उपन्यासों में है- रुकोगी नहीं राधिका, पचपन खंबे लाल दीवारे , उषा प्रियंवदा का, डूबते मस्तूर नरेश मेहता का, बड़ी चंपा लक्ष्मी नारायण लाल का सोया हुआ जल सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का और सूरज का सातवां घोड़ा धर्मवीर भारती का प्रसिद्ध उपन्यास है| गुनाहों का देवता भी धर्मवीर भारती के द्वारा लिखा गया महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध उपन्यास है| हिंदी साहित्य में समकालीन उपन्यासकारों में कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, ममता कालिया, मृदुला गर्ग, नासिरा शर्मा , राजी सेठ आदि का नाम लिया जा सकता है| उन्होंने उपन्यास कला को संवेदना और शिल्प के स्तर पर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है|

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

हिंदी निबंध का विकास

                                                             हिंदी  निबंध का विकास

 निबंध विधा भी हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में ही  प्रकाश में आई| यह विधा साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विधा है इसमें लेखक किसी भी विषय पर खुलकर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होता है इसमें भावों की अभिव्यक्ति के साथ-साथ निबंधकार के स्वयं के व्यक्तिगत गुण भी प्रकाशित हो जाते हैं| निबंध शब्द अंग्रेजी के 'एस्से' शब्द का पर्याय है जिसका अर्थ होता है किसी भी विषय पर स्वतंत्र रूप से विचारों को सूत्र बद्ध तरीके से या संगठित तरीके से व्यक्त करना| 

हिंदी निबंध का प्रारंभ सन 1872 में माना गया है| गद्य विधाओं में यह विधा सबसे अधिक आधुनिकतम मानी गई है|

हिंदी में आधुनिक ढंग से साहित्यिक निबंध लिखने की परंपरा का आरंभ भी भारतेंदु युग से हुआ है | इससे पहले जो भी निबंध लिखे गए वह धर्म और नीति पर केवल विचार व्यक्त करने के रूप में हमारे सामने आते हैं| उनमें निबंध के तत्व कम मिलते हैं | जैसा कि हम सब जानते हैं भारतेंदु काल नवजागरण का काल था| यह काल भारतेंदु हरिश्चंद्र एवं उनकी मंडली के अन्य साहित्यकारों से बहुत प्रभावित था। इस समय ये सब साहित्यकार नई सांस्कृतिक और राजनैतिक चेतना पर लिख रहे थे| प्रेस की स्थापना के कारण भारतेंदु युग में अनेक हिंदी पत्र-पत्रिकाएं निकल रही थी | इस युग की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में भारतेंदु द्वारा प्रकाशित हरिश्चंद्र चंद्रिका, कवि वचन सुधा, बाला बोधिनी हैं| बालकृष्ण भट्ट के द्वारा हिंदी प्रदीप, प्रताप नारायण मिश्र के द्वारा ब्राह्मण आदि प्रमुख पत्र-पत्रिकाएं थी। ऐसी स्थिति में निबंध विधा तेजी से उभर कर आई। इन पत्र-पत्रिकाओं में जो विचार व्यक्त किए जाते थे उन्हें ही हिंदी निबंध का प्रारंभिक रूप कहा जा सकता है| भारतेंदु हरिश्चंद्र , प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', श्रीनिवास दास ,काशीनाथ खत्री आदि यह सब ऐसे साहित्यकार थे जो तत्कालीन समस्याओं का यथार्थ चित्रण निबंध विधा के माध्यम से कर रहे थे और इनके निबंध उस समय निकलने वाली पत्रिकाओं में लगातार छप रहे थे | इन निबंधकारों ने सामाजिक सुधार , राष्ट्रीय भावना का विकास, सांस्कृतिक चेतना , नारी शिक्षा संबंधी विषयों पर निबंध लिखें , इनके निबंधों में हमें समाज की तत्कालीन समस्याओं का प्रतिबिंब और लेखा-जोखा दिखाई देता है| इसके पीछे मूल कारण इस समय के निबंधकारों का पत्रकार होना भी था| यह सब पहले पत्रकार थे और बाद में निबंधकार थे इसलिए निबंध लिखते समय इन्होंने पाठकों की रूचि और तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखा | राष्ट्रीय समस्याएं इनके मस्तिष्क में हरदम ऐसे उग्र रूप में घुमती रहती थी कि प्रत्येक निबंध में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनका जिक्र आ ही जाता था | विदेशी अनुकरण तथा सामाजिक कुरीतियों पर भी निबंधकारों ने तीखा व्यंग्य किया है| यह भी सच है कि इस युग के लेखक अपने व्यक्तित्व को अधिक महत्व देते थे |

भारतेंदु इस युग के सर्वश्रेष्ठ निबंधकार माने गए हैं| उन्होंने विविध विषयों पर कुशलतापूर्वक निबंध लिख कर हिंदी निबंध के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनके निबंधों में निबंध कला की विभिन्न विशेषताएं देखी जा सकती है| इतिहास, समाज, धर्म, राजनीति यात्रा, प्रकृति वर्णन जैसे अनेक विषयों पर भारतेंदु ने निबंधों की रचना की। इनके प्रमुख निबंधों में स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन, लेवी प्राण लेवी, पांचवें पैगंबर, बादशाह दर्पण, काश्मीर कुसुम, सरयू पार की यात्रा आदि प्रमुख हैं। भारतेंदु ने अपने सामाजिक निबंधों में जहां समाज की कुरीतियों पर प्रहार किया वहीं दूसरी ओर राजनीतिक निबंधों में अंग्रेजी राज पर तीखे व्यंग्य किए। | इस समय पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने भी बहुत अच्छे और मनोरंजक निबंध लिखें जैसे- पेट, दांत ,नाक, वृद्धि आदि| इन्होंने अपने निबंधों में घरेलू बोलचाल की शब्दावली तथा पूर्वीपन के साथ ही कहावतें और मुहावरे का प्रयोग किया है |

बालकृष्ण भट्ट भी इस युग के प्रतिनिधि निबंधकार माने जाते हैं| वे एक ऐसे निबंधकार हैं जिन्होंने हिंदी की आत्मा को अच्छी तरह से पहचाना| भट्ट जी को संस्कृत बहुत अच्छी तरह आती थी इसलिए उनके निबंधों में संस्कृत भाषा का पुट मिलता है| वैसे इन्होंने अपने निबंधों में अंग्रेजी और फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया है और विषय की आवश्यकता के अनुसार आंचलिक शब्दों का प्रयोग भी हमें इनके निबंधों में मिलता है| इन्होंने 1000 से भी अधिक निबंधों की रचना की। इस युग के अन्य निबंध कारों में बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, ठाकुर जगमोहन सिंह, राधाचरण गोस्वामी और बालमुकुंद गुप्त का नाम भी आता है।

हिंदी निबंध के विकास का दूसरा चरण द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है| इस युग का नामकरण प्रसिद्ध आलोचक एवं युग प्रवर्तक निबंधकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर हुआ है| प्रसिद्ध पत्रिका सरस्वती के प्रकाशन से इस युग का आरंभ माना गया है| महावीर प्रसाद द्विवेदी कुशल संपादक के साथ-साथ श्रेष्ठ निबंधकार भी थे| भाषा तथा साहित्य का उच्च आदर्श प्रस्तुत करके उन्होंने समकालीन निबंध लेखकों का नेतृत्व किया| सबसे पहले उन्होंने भाषा की शुद्धि और परिष्कार पर बल दिया और शुद्ध व्याकरण सम्मत भाषा में निबंध लिखने के लिए लेखकों को प्रोत्साहित किया| द्विवेदी जी के प्रसिद्ध निबंधों में कवि और कविता, कवि कर्तव्य ,साहित्य की महत्ता आदि प्रमुख है| इसी समय अध्यापक पूर्ण सिंह भी प्रभावशाली निबंधकार माने जाते हैं | उनके निबंधों में आचरण की सभ्यता, मजदूरी और प्रेम, सच्ची वीरता , कन्यादान आदि निबंध है | उनकी भाषा में प्रभाव के साथ-साथ एक खास अंदाज है जिससे भाव व्यंजना निराले ढंग से व्यक्त की गई है| इसके साथ ही इनकी भाषा में सहज प्रवाह और मृदुलता का अनुभव पाठक को होता है ,जिससे पाठक निबंध में तल्लीन हो जाते हैं |

बाबू श्यामसुंदर दास जी द्विवेदी युग के श्रेष्ठ निबंध कारों में से एक है| यह निबंधकार होने के साथ-साथ विख्यात आलोचक भी थे | इसलिए इनके निबंधों में आलोचनात्मकता का गुण भी पाया जाता है, लेकिन उस रूप में नहीं हुआ जिस रूप में होना चाहिए था | महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खुद भी निबंध लिखे थे और बालमुकुंद गुप्त ,सरदार पूर्ण सिंह ने भी रोचक और जीवंत निबंध लिखें | सरदार पूर्ण सिंह ने नैतिक और सामाजिक विषयों पर भावपूर्ण निबंध लिखें | कोहिनूर, भारत मित्र ,पत्रों के माध्यम से उन्होंने व्यंग्यात्मक , हास परिहास शैली के निबंधों की झड़ी लगा दी | बालमुकुंद गुप्त ने शिवशंभू के चिट्ठे संग्रह निबंध साहित्य में अपना उच्च कोटि का स्थान रखता है| लेकिन जिस तेजी से भारतेंदु युग में इस विधा की शुरुआत हुई थी उस तेजी से द्विवेदी युग में इसका विकास हमें देखने को नहीं मिलता|

  निबंध  के इतिहास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का योगदान भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है| उन्होंने निबंध विधा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया| भारतीय और पाश्चात्य शैली का समन्वय करते हुए उन्होंने अनेक विचारात्मक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक निबंध लिखें| उनके समकालीन निबंध कारों में बाबू गुलाब राय, जैनेंद्र ,रामवृक्ष बेनीपुरी, बनारसीदास चतुर्वेदी, डॉ नगेंद्र आदि का नाम आता है | शुक्ल गंभीर, विचारवान और विनोदप्रिय स्वभाव के व्यक्ति थे, वे उच्च कोटि के निबंधकार थे| उनके निबंधों में मौलिकता, नवीनता और गंभीर चिंतन तथा हास परिहास के दर्शन होते हैं | उनके अधिकतर निबंध विचारप्रधान है| चिंतामणि भाग- 1,2,3 उनके निबंध संग्रह है| इसके साथ-साथ उन्होंने साहित्यिक समीक्षा संबंधी निबंध भी लिखे और मनोविकार संबंधी निबंध भी | साहित्य समीक्षा संबंधी निबंधों में तुलसी का भक्ति मार्ग, काव्य में रहस्यवाद, काव्य में लोकमंगल की साधना अवस्था, मानस की धर्म भूमि आदि प्रमुख है| मनोविज्ञान और मनोविकार संबंधी निबंधों में उत्साह, लज्जा और ग्लानि, श्रद्धा और भक्ति, क्रोध, करुणा आदि निबंध प्रमुख हैं|

बाबू गुलाब राय भी इस युग के महत्वपूर्ण निबंधकार है | उन्होंने दार्शनिक, साहित्यिक ,विनोदात्मक निबंधों की रचना की| मेरी असफलताएं ,फिर निराशा क्यों , उनके प्रमुख निबंध हैं | इस काल में प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी वर्मा आदि रचनाकारों ने भी निबंध के विकास में योगदान दिया हैं | जयशंकर प्रसाद ने 'काव्य कला तथा अन्य निबंध' संग्रह में महत्वपूर्ण विषयों को आधार बनाकर निबंध लिखें | इसी तरह से सुमित्रानंदन पंत का निबंध 'पल्लव की भूमिका' निबंध लेखन के क्षेत्र में अपना योगदान दिया|

शुक्ल के बाद वाले युग में भी निबंध लिखे गए| इन निबंधकारों में जयशंकर प्रसाद ,सुमित्रानंदन पंत, निराला, माखनलाल चतुर्वेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामकुमार वर्मा आदि का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है| हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध उच्च कोटि के निबंध माने गए हैं | इनके प्रकाशित निबंधों में अशोक के फूल, कुटज ,विचार और वितर्क, आम बोरा गए आदि प्रमुख हैं |समकालीन युवा निबंधकारों में प्रभाकर श्रोत्रिय, चंद्रकांत, नंदकिशोर, प्रकाश चंद्र गुप्त जैसे निबंधकार हैं जिन्होंने सांस्कृतिक और सामाजिक विषय पर निबंध लिखें और वर्तमान समय में भी निबंध लेखन की परंपरा निरंतर जारी है|

        


नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...