तत्सम
आधुनिक हिंदी कहानीकारों में जैनेंद्र जी का स्थान प्रमुख है| कहानी जगत में उन्होंने एक नवीन युग की स्थापना की, उन्होंने अपनी कहानियों में दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक तथ्यों का उद्घाटन बड़े रोचक कथानकों के माध्यम से किया है| 'तत्सम' एक प्रतीकात्मक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक कहानी है जो जैनेंद्र ने एक रोचक कथा के माध्यम से इस चिरंतन प्रश्न पर विवेचन किया है कि ईश्वर है या नहीं ? है, तो कहां है? इसी शुष्क दार्शनिक प्रश्न को सुलझाने के लिए उन्होंने कहानी के सभी तत्वों का निरूपण सफलतापूर्वक किया है।
कथानक
तत्सम कहानी का कथानक अन्य कहानियों की भांति विभिन्न घटनाओं के ताने-बाने से नहीं बुना गया, इसमें घटना नाम का कोई तत्व है ही नहीं , केवल एक प्रसंग है जिसे रूपक के रूप में ग्रहण किया गया है | इसका कथानक इस प्रकार है -
एक वन में दो शिकारी पहुंचते हैं और बातचीत के मध्य कहते हैं कि ' ओह कैसा भयंकर जंगल है| प्रस्तुत कहानी इसी जंगल शब्द को लेकर उसके परिचय के संबंध में हुए वाद-विवाद के माध्यम से अभीष्ट सिद्धि की ओर बढ़ती है| वन के विभिन्न वृक्ष तथा जीव-जंतु जंगल के विषय में जिज्ञासा और तत्- संबंधी अपनी अज्ञानता प्रकट करते हैं, परंतु समस्या का समाधान किसी प्रकार नहीं हो पाता| जब शिकारी पुन: लौटते हैं तो वटवृक्ष अर्थात (बड़ दादा) उनसे जंगल का परिचय देने को कहता है, आरंभ में उसके दिए समाधान से कोई सहमत नहीं होता, किंतु अंत में वह व्यक्ति वट वृक्ष की चोटी पर चढ़ जाता है, वहां दो नए-नए पत्तों की जोड़ी उसका स्पर्श पाकर नया मंत्र पाती है और बढ़ दादा जान जाते हैं कि वे कुल हैं, खंड नहीं| इस दिव्य अनुभूति के बाद साथियों के पूछने पर वह कहते हैं - "वह है" सब कहीं है"... हम हैं ...हम नहीं हैं ...वह भी है|
इस प्रकार तत्सम कहानी का कथानक अत्यंत संक्षिप्त तो है ही, रोचक और सुगठित भी है| स्वाभाविकता कि दृष्टि से यह आपत्ति हो सकती है कि वन के बे जबान जानवरों या पेड़ पौधों को मनुष्यों की तरह बातें करते दिखाया जाना आज के बौद्धिक युग में कहां तक विश्वसनीय है| इसका उत्तर सहज ही दिया जा सकता है कि इस कहानी की पृष्ठभूमि दार्शनिक है और दर्शन के क्षेत्र में सभी प्राणी और पदार्थ एक समान हैं| वास्तव में कहानी का कथानक प्रतीकात्मक दृष्टांत है।
पात्र एवं चरित्र चित्रण
तत्सम कहानी के सभी पात्र एक विशेष प्रश्न को सुलझाने के लिए प्रतीक रूप में प्रस्तुत किए गए हैं| उन्हें मानवीय पात्रों के समान चरित्र का विश्लेषण करना उपयुक्त नहीं है| दोनों शिकारियों को हम दार्शनिक विचारक का प्रतीक मान सकते हैं और जगत के जानवर और पेड़-पौधे उन भोले-भाले सांसारिक मनुष्यों के प्रतीक हैं जो अपने सीमित जीवन के संकीर्ण दायरे से बाहर जाकर अपने से भिन्न कुछ और सोच ही नहीं सकते| निस्संदेह इस दृष्टि से लेखक ने उनकी स्वाभाविक मनोवृति का सजीव चित्रण किया है|
कथोपकथन या संवाद
तत्सम कहानी का विकास कथनोपकथन के आधार पर ही हुआ है| कथनोपकथनों की सार्थकता उनकी संक्षिप्तता और सरलता में ही है| तत्सत कहानी के संवाद अत्यंत संक्षिप्त हैं | साथ ही रोचक तथा प्रभावशाली भी हैं | बाहरी रूप से छोटे-छोटे वाक्यों में जहां सामान्य हास्य विनोद का पुट दिखाई देता है, वहां उनके भीतर गंभीरता का तत्व भी निहित है| उदाहरणत:
एक ने कहा- 'डरावना, न जाने तुम किसे कहते हो? हमारी तो सबसे प्रीति है| बबूल ने कहा- 'दादा, प्रीति की बात नहीं| मैं तो अपने पास कांटे रखता हूं, पर वे आदमी वन को भयानक बताते थे| जरूर वह शेर- चीतों से बढ़कर होगा | इस प्रकार संवाद सरल और अर्थ गरिमा से युक्त है|
देश काल और वातावरण
तत्सत कहानी का संबंध किसी एक स्थान, एक समय या एक ही स्थिति से नहीं| लेकिन जो इसमें पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के नाम प्रयुक्त हुए हैं वे पूर्णत: भारतीय परिवेश का परिचय देते हैं | प्राचीन ऋषियों ने जंगलों में तपस्या करके ही इस सृष्टि के सत्य को पहचाना था| लेखक ने उसी सत्य की व्याख्या जंगल का दृष्टांत देकर की है| इसलिए स्वाभाविक रूप से इस कहानी में वन का संपूर्ण वातावरण अत्यंत सजीवता से चित्रित हुआ है, शिकारियों की संक्षिप्त सी प्रारंभिक बातचीत ही वन की विशालता, गहनता और भयंकरता का आभास करा देती है, कथावस्तु का विकास उपसंहार भी उसी परिवेश में हुआ है| पाठक को कहानी पढ़ते-पढ़ते अनायास ही वन के विभिन्न जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों का अंतरण परिचय मिल जाता है| बड़ की विशालता, घास की व्यापकता, स्पर्श की गहराई की पहचान, सिंह की भयंकता और बांस की लंबाई आदि का सजीव चित्रण आंखों के समक्ष छा जाता है |
भाषा शैली
तत्सत कहानी एक रूपक शैली में लिखी गई है| कहानी की जो ऊपरी कला है, उसके भीतर अन्य अर्थ का भी निर्वाह होता चलता है| जैनेंद्र जी ने जंगल की कथा के माध्यम से दार्शनिक तथ्य की स्थापना की है| तत्सत कहानी की भाषा सरल और स्वाभाविक है| केवल शीर्षक तत्सत ही एक कनिष्ट तत्सम शब्द है| सर्वत्र सरल शब्दावली का ही प्रयोग हुआ है| जैसे-
बड़ दादा ने कहा- 'बिना जाने फिर तुम इतना तेज क्यों बोलते हो?' बांस ने सन्- सन् की ध्वनि में कहा- 'मेरे अंदर हवा इधर से उधर बहती रहती है, मैं खोखला जो हूं | मैं बोलता नहीं बजता हूं| वही मुझे में से बोलता है|' इन पंक्तियों में कोई भी शब्द कठिन नहीं| प्रचलित मुहावरों और कहावतों का भी इस भाषा में अनायास प्रयोग हो गया है| जैसे- बांस के उपर्युक्त शब्दों- मैं खोखला जो हूं, मैं बोलता नहीं ...बजता हूं में 'थोथा चना बाजे घना' वाली कहावत चरितार्थ हुई है| इस प्रकार व्यावहारिक भाषा के प्रयोग से कहानी दार्शनिक होते हुए भी सर्वसाधारण के लिए ग्राह्य बन गई है|
उद्देश्य
वस्तुतः तत्सत कहानी उदेश्य प्रधान कहानी है| इस कहानी का मूल उद्देश्य तत्सत् शीर्षक में छिपा है, तत्सत् का अर्थ है- 'वह है' इस कहानी के माध्यम से लेखक ने स्पष्ट किया है कि ईश्वर अवश्य है किंतु वह दिखाई नहीं देता| जैसे वृक्ष , लता, तने , प्रभु सर्प आदि के सामूहिक अस्तित्व का नाम ही 'वन' है | वे सब उसी वन के अंग हैं | उसी प्रकार सृष्टि के सब प्राणियों और पदार्थों में विद्यमान सत्ता ही ईश्वर है, यह सभी उसी के अंग हैं, ईश्वर हमें उसी प्रकार प्रथक से दिखाई नहीं देता जैसे वन के जीव जंतु अपने से भिन्न वन को अलग से नहीं देख सकते या देख पाते इसी सत्य का उद्घाटन करना ही लेखक का प्रमुख उद्देश्य है,
नामकरण की सार्थकता
कहानी के उद्देश्य को लक्ष्य करके ही कहानी का नाम तत्सत रखा गया है, जो नितांत उचित है| इसी शीर्षक में ही लेखक का मूल अभीष्ट निहित है| उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि तत्सत एक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक कहानी है| ईश्वर है या नहीं? है, तो उसकी सत्ता कहां विद्यमान है? इसी दार्शनिक प्रश्न को सुलझाने के लिए जनेंद्र ने कहानी के सभी तत्वों का सफल प्रयोग किया|