आधुनिक हिंदी साहित्य
हिंदी साहित्य में आधुनिक काल का आगमन भारतेंदु हरिश्चंद्र से माना जाता है। उनसे पहले जो साहित्य लिखा गया था वह रीति कालीन विशेषताओं से प्रभावित था। रीतिकालीन कविता विलासिता और श्रृंगारिकता की कविता थी। जीवन के विविध रंगों का चित्र उसमें नहीं था। सन 1857 में जब भारत की आजादी के लिए किया गया विद्रोह असफल हो गया तब इस कविता का भी अंत सा हो गया। 1857 की आजादी की जो लड़ाई लड़ी गई उससे देश में एक नई चेतना उत्पन्न हुई। भारतीयों में स्वाभिमान से जीने की इच्छा उत्पन्न हुई। अंग्रेजी शासन और अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार से छुटकारा पाने के लिए भारतीय जनता व्याकुल हो गई। समाज के साथ साथ साहित्य भी बदलता है। परिणाम स्वरूप काव्य की पुरानी रीतियों की अपेक्षा की जाने लगी और साहित्य की नई परिपाटी का विकास हुआ। इस नई परिपाटी का आरम्भ भारतेंदु हरिश्चंद्र से होता है। इसलिए भारतेंदु आधुनिक युग के प्रवर्तक माने जाते हैं।
आधुनिक युग के काव्य को समझने के लिए उसे पांच भागों में बांटा गया है। भारतेंदु युग, द्विवेदी युग , छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता। लेकिन काव्य की धारा यहीं आकर नहीं रुक गई है काव्य धारा के अनेक रूप हमें उससे आगे भी मिलते हैं ।
भारतेंदु युग
भारतेंदु युग आधुनिक कविता का प्रारंभ है। भारतेंदु जी ने आधुनिक कविता को रीति कालीन विलासिता के कीचड़ से निकालकर उसे स्वच्छ और निर्मल रूप प्रदान कर जनता से जोड़ने की चेष्टा की है। इस युग के कुछ प्रमुख कवियों में जिन कवियों के नाम हैं, वह है- भारतेंदु हरिश्चंद्र, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, प्रताप नारायण मिश्र, ठाकुर जगमोहन सिंह आदि। भारतेंदु युग को काव्य का संक्रांति काल कहा जाता है, जिसमें काव्य की प्राचीन और आधुनिक प्रवृत्तियों का समन्वय मिलता है, उसमें भक्ति काल की भक्ति भावना, रीतिकाल की श्रृंगारिकता तथा आधुनिक काल की राष्ट्रीयता, हास्य और व्यंग्य, सामाजिक जागरण, प्रकृति चित्रण आदि आधुनिक काल की प्रवृतियां भी दिखाई देती हैं। इस काल के काव्य का महत्व इसलिए भी है कि इसमें देश और जनता की भावनाओं को पहली बार प्रकट किया गया था। देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दशा पर काव्य की रचना की गई थी, समाज सुधार पर इस काल के कवियों ने अधिक बल दिया। उन्होंने भारत के अतीत गौरव का चित्रण करके भारतीयों में आत्मसम्मान की भावना जगाने का प्रयत्न किया। इन्होंने अपने युग की समस्याओं को भी काव्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। लेकिन काव्य की भाषा ब्रजभाषा ही रही। बाद में खड़ी बोली में भी काव्य लिखा जाने लगा।
द्विवेदी युग
सन 1900 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया और इसके साथ ही द्विवेदी युग का आरंभ माना जाता है। द्विवेदी युग में खड़ी बोली के विकास के लिए द्विवेदी जी ने बहुत प्रयत्न किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्रीधर पाठक, अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' और मैथिलीशरण गुप्त आदि विद्वानों ने ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली का सफलतापूर्वक प्रयोग किया। इस युग के कवियों ने आदर्श को सर्वोपरि स्थान दिया। वस्तुतः भारतेंदु कालीन कविता की विशेषताओं को इस काल में विकास का अवसर मिला। राष्ट्रीयता, समाज सुधार, भारत का गौरव गान तथा नवजागरण को साहित्य में स्थान दिया गया। इस काल के काव्य में उपदेशात्मक, इतिवृत्तात्मक अर्थात वर्णन प्रधान काव्य की रचना की गई। इस काल की धार्मिक तथा देश प्रेम की भावना भारतेंदु काल से अधिक उदार व व्यापक थी। अनेक विधाओं का विकास भी इसी काल में हुआ। महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्त काव्य भी इस काल में भी लिखे गए । साकेत और प्रियप्रवास नामक महाकाव्य इस काल की महत्वपूर्ण रचनाएं हैं।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि नए विषयों, नई भाषा तथा काव्य के विविध रूपों की दृष्टि से द्विवेदी युग का साहित्य में बहुत ही महत्व है।
छायावादी युग
द्विवेदी का काल उपदेशात्मक, नीरसता से युक्त था। वर्णन प्रधानता के कारण कवि की कल्पना सीमित हो गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदी में छायावादी कविता का विकास हुआ। इस काव्य में व्यक्तिकता की प्रधानता थी और प्रकृति सौंदर्य के चित्रण में इन कवियों का आकर्षण व प्रेम प्रकट हुआ। कहीं-कहीं प्रकृति चित्रण में इन कवियों ने विराट परमात्मा की अनुभूति भी की। छायावादी काव्य श्रृंगार प्रधान था। लेकिन इनका श्रंगार भाव रीतिकालीन कवियों से भिन्न था। इनका श्रृंगार स्थूल एवं मांसल न होकर सूक्ष्म और काल्पनिक था। यह काव्य संस्कृतनिष्ट भाषा, मुक्त छंद विधान आदि की दृष्टि से अद्वितीय था। इस काल को आधुनिक कविता में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कामायनी, पल्लव, परिमल, यामा आदि रचनाएं इस काल की प्रतिनिधि रचनाएं हैं।
प्रगतिवादी
छायावादी काव्य की प्रतिक्रिया के रूप में प्रगतिवादी काव्य का आरंभ हुआ। छायावाद का कवि अपनी कल्पना में डूबा हुआ था। समाज के दूसरे वर्गों के लोगों की और उसका ध्यान नहीं था। परिणाम यह हुआ कि समाज का निम्न वर्ग उपेक्षित हो गया। दूसरी ओर साम्यवाद का प्रभाव भारत में भी फैलता जा रहा था। रूस के मार्क्सवाद ने भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों और कवियों को बहुत प्रभावित किया। मार्क्सवाद का लक्ष्य समाज में साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना करना था। अपने लक्ष्य को पाने के लिए यह हिंसात्मक क्रांति को साधन के रूप में प्रयोग कर रहा था। राजनीति में जो मार्क्सवाद है, साहित्य में उसे ही प्रगतिवाद का नाम दिया गया है । कहने का अभिप्राय यह है कि मार्क्सवाद का प्रभाव हमारे साहित्य पर पड़ रहा था। पंत जी, निराला, दिनकर, नरेंद्र शर्मा, नागार्जुन आदि कवियों ने अपनी कविताओं में शासकों के लिए घृणा, शोषित के प्रति सहानुभूति, सामाजिक समानता पर बल, पुरानी रुढियों का विरोध आदि विचारों से परिपूर्ण काव्य की रचना की। इन्होंने भौतिकवाद को अधिक महत्व दिया और आध्यात्मिकता की उपेक्षा की। काव्य की दृष्टि से इस काल के साहित्य का भी अपना विशेष महत्त्व है।
प्रयोगवाद और नई कविता
छायावादी काव्य की प्रतिक्रिया के रूप में 1943 में एक और विचारधारा प्रकट हुई। इस काव्य धारा का नाम था- प्रयोगवाद। इसमें व्यक्तिकता को हृदय के धरातल पर स्वीकार न करके भौतिकता के रूप में ग्रहण किया गया। इस कार्य में उत्पन्न भावनाओं को अस्वीकार करके भौतिकता पोस्टर के माध्यम से यथार्थ किया गया। प्रयोगवाद के संस्थापक अज्ञेय ने 1943 में तार सप्तक के नाम से एक काव्य संग्रह प्रकाशित किया। उसमें सात कवियों की कविताएं संकलित थी। जिनमें अज्ञेय, मुक्तिबोध, नेमीचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे , गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा के नाम आते हैं। उसके पश्चात 1951 में दूसरा तार सप्तक प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त कुछ पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रयोगवादी कविताएं प्रकाशित हुई। 1953 के बाद प्रयोगवादी कविता नई कविता के नाम से विकसित हुई। इस काव्य की प्रमुख विशेषताएं थी - निराशा, वेदना, नास्तिकता, हास्य-व्यंग्य, यथार्थ चित्रण, वीभत्स वर्णन, व्यक्तिवाद तथा विरोधाभासी प्रतीत होने वाली आस्था, विश्वास और समष्टि भावना की विशेषताएं थी।
शिल्प कला के पक्ष में नए उपमान, नए प्रतीक, नए विविध विषय, मुक्त छंद आदि की ओर कवि की ज्यादा रुची थी। इस प्रकार आधुनिक काव्य का निरंतर विकास होता रहा। भारतेंदु और द्विवेदी युग के कवियों ने समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए समाज की तीखी आलोचना की तथा स्वदेश प्रेम की भावना को भी जागृत किया। छायावादी काव्य अंतर्मुखी है। महाकवि अपनी ही भावनाओं और कल्पनाओं में डूबे रहते थे। जबकि प्रगतिवादी कवियों ने समाज की और ध्यान दिया। सामाजिक समता लाने के लिए क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किए। प्रयोगवादी काव्य में शिल्प कला की दृष्टि से नए प्रयोग हुए । इस प्रकार आधुनिक काल के काव्य ने अपने लिए विस्तृत क्षेत्र का निर्माण किया। आगे भी नए-नए विचार तथा वादों से युक्त कविताएं लिखी गई और इस तरह कविताओं का विकास निरंतर होता रहा। आधुनिक कालीन कविता विविधमुखी है और आधुनिक काल के लिए सौभाग्य की बात है।
हिंदी साहित्य में आधुनिक काल का आगमन भारतेंदु हरिश्चंद्र से माना जाता है। उनसे पहले जो साहित्य लिखा गया था वह रीति कालीन विशेषताओं से प्रभावित था। रीतिकालीन कविता विलासिता और श्रृंगारिकता की कविता थी। जीवन के विविध रंगों का चित्र उसमें नहीं था। सन 1857 में जब भारत की आजादी के लिए किया गया विद्रोह असफल हो गया तब इस कविता का भी अंत सा हो गया। 1857 की आजादी की जो लड़ाई लड़ी गई उससे देश में एक नई चेतना उत्पन्न हुई। भारतीयों में स्वाभिमान से जीने की इच्छा उत्पन्न हुई। अंग्रेजी शासन और अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार से छुटकारा पाने के लिए भारतीय जनता व्याकुल हो गई। समाज के साथ साथ साहित्य भी बदलता है। परिणाम स्वरूप काव्य की पुरानी रीतियों की अपेक्षा की जाने लगी और साहित्य की नई परिपाटी का विकास हुआ। इस नई परिपाटी का आरम्भ भारतेंदु हरिश्चंद्र से होता है। इसलिए भारतेंदु आधुनिक युग के प्रवर्तक माने जाते हैं।
आधुनिक युग के काव्य को समझने के लिए उसे पांच भागों में बांटा गया है। भारतेंदु युग, द्विवेदी युग , छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता। लेकिन काव्य की धारा यहीं आकर नहीं रुक गई है काव्य धारा के अनेक रूप हमें उससे आगे भी मिलते हैं ।
भारतेंदु युग
भारतेंदु युग आधुनिक कविता का प्रारंभ है। भारतेंदु जी ने आधुनिक कविता को रीति कालीन विलासिता के कीचड़ से निकालकर उसे स्वच्छ और निर्मल रूप प्रदान कर जनता से जोड़ने की चेष्टा की है। इस युग के कुछ प्रमुख कवियों में जिन कवियों के नाम हैं, वह है- भारतेंदु हरिश्चंद्र, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, प्रताप नारायण मिश्र, ठाकुर जगमोहन सिंह आदि। भारतेंदु युग को काव्य का संक्रांति काल कहा जाता है, जिसमें काव्य की प्राचीन और आधुनिक प्रवृत्तियों का समन्वय मिलता है, उसमें भक्ति काल की भक्ति भावना, रीतिकाल की श्रृंगारिकता तथा आधुनिक काल की राष्ट्रीयता, हास्य और व्यंग्य, सामाजिक जागरण, प्रकृति चित्रण आदि आधुनिक काल की प्रवृतियां भी दिखाई देती हैं। इस काल के काव्य का महत्व इसलिए भी है कि इसमें देश और जनता की भावनाओं को पहली बार प्रकट किया गया था। देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दशा पर काव्य की रचना की गई थी, समाज सुधार पर इस काल के कवियों ने अधिक बल दिया। उन्होंने भारत के अतीत गौरव का चित्रण करके भारतीयों में आत्मसम्मान की भावना जगाने का प्रयत्न किया। इन्होंने अपने युग की समस्याओं को भी काव्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। लेकिन काव्य की भाषा ब्रजभाषा ही रही। बाद में खड़ी बोली में भी काव्य लिखा जाने लगा।
द्विवेदी युग
सन 1900 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया और इसके साथ ही द्विवेदी युग का आरंभ माना जाता है। द्विवेदी युग में खड़ी बोली के विकास के लिए द्विवेदी जी ने बहुत प्रयत्न किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्रीधर पाठक, अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' और मैथिलीशरण गुप्त आदि विद्वानों ने ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली का सफलतापूर्वक प्रयोग किया। इस युग के कवियों ने आदर्श को सर्वोपरि स्थान दिया। वस्तुतः भारतेंदु कालीन कविता की विशेषताओं को इस काल में विकास का अवसर मिला। राष्ट्रीयता, समाज सुधार, भारत का गौरव गान तथा नवजागरण को साहित्य में स्थान दिया गया। इस काल के काव्य में उपदेशात्मक, इतिवृत्तात्मक अर्थात वर्णन प्रधान काव्य की रचना की गई। इस काल की धार्मिक तथा देश प्रेम की भावना भारतेंदु काल से अधिक उदार व व्यापक थी। अनेक विधाओं का विकास भी इसी काल में हुआ। महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्त काव्य भी इस काल में भी लिखे गए । साकेत और प्रियप्रवास नामक महाकाव्य इस काल की महत्वपूर्ण रचनाएं हैं।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि नए विषयों, नई भाषा तथा काव्य के विविध रूपों की दृष्टि से द्विवेदी युग का साहित्य में बहुत ही महत्व है।
छायावादी युग
द्विवेदी का काल उपदेशात्मक, नीरसता से युक्त था। वर्णन प्रधानता के कारण कवि की कल्पना सीमित हो गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदी में छायावादी कविता का विकास हुआ। इस काव्य में व्यक्तिकता की प्रधानता थी और प्रकृति सौंदर्य के चित्रण में इन कवियों का आकर्षण व प्रेम प्रकट हुआ। कहीं-कहीं प्रकृति चित्रण में इन कवियों ने विराट परमात्मा की अनुभूति भी की। छायावादी काव्य श्रृंगार प्रधान था। लेकिन इनका श्रंगार भाव रीतिकालीन कवियों से भिन्न था। इनका श्रृंगार स्थूल एवं मांसल न होकर सूक्ष्म और काल्पनिक था। यह काव्य संस्कृतनिष्ट भाषा, मुक्त छंद विधान आदि की दृष्टि से अद्वितीय था। इस काल को आधुनिक कविता में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कामायनी, पल्लव, परिमल, यामा आदि रचनाएं इस काल की प्रतिनिधि रचनाएं हैं।
प्रगतिवादी
छायावादी काव्य की प्रतिक्रिया के रूप में प्रगतिवादी काव्य का आरंभ हुआ। छायावाद का कवि अपनी कल्पना में डूबा हुआ था। समाज के दूसरे वर्गों के लोगों की और उसका ध्यान नहीं था। परिणाम यह हुआ कि समाज का निम्न वर्ग उपेक्षित हो गया। दूसरी ओर साम्यवाद का प्रभाव भारत में भी फैलता जा रहा था। रूस के मार्क्सवाद ने भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों और कवियों को बहुत प्रभावित किया। मार्क्सवाद का लक्ष्य समाज में साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना करना था। अपने लक्ष्य को पाने के लिए यह हिंसात्मक क्रांति को साधन के रूप में प्रयोग कर रहा था। राजनीति में जो मार्क्सवाद है, साहित्य में उसे ही प्रगतिवाद का नाम दिया गया है । कहने का अभिप्राय यह है कि मार्क्सवाद का प्रभाव हमारे साहित्य पर पड़ रहा था। पंत जी, निराला, दिनकर, नरेंद्र शर्मा, नागार्जुन आदि कवियों ने अपनी कविताओं में शासकों के लिए घृणा, शोषित के प्रति सहानुभूति, सामाजिक समानता पर बल, पुरानी रुढियों का विरोध आदि विचारों से परिपूर्ण काव्य की रचना की। इन्होंने भौतिकवाद को अधिक महत्व दिया और आध्यात्मिकता की उपेक्षा की। काव्य की दृष्टि से इस काल के साहित्य का भी अपना विशेष महत्त्व है।
प्रयोगवाद और नई कविता
छायावादी काव्य की प्रतिक्रिया के रूप में 1943 में एक और विचारधारा प्रकट हुई। इस काव्य धारा का नाम था- प्रयोगवाद। इसमें व्यक्तिकता को हृदय के धरातल पर स्वीकार न करके भौतिकता के रूप में ग्रहण किया गया। इस कार्य में उत्पन्न भावनाओं को अस्वीकार करके भौतिकता पोस्टर के माध्यम से यथार्थ किया गया। प्रयोगवाद के संस्थापक अज्ञेय ने 1943 में तार सप्तक के नाम से एक काव्य संग्रह प्रकाशित किया। उसमें सात कवियों की कविताएं संकलित थी। जिनमें अज्ञेय, मुक्तिबोध, नेमीचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे , गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा के नाम आते हैं। उसके पश्चात 1951 में दूसरा तार सप्तक प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त कुछ पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रयोगवादी कविताएं प्रकाशित हुई। 1953 के बाद प्रयोगवादी कविता नई कविता के नाम से विकसित हुई। इस काव्य की प्रमुख विशेषताएं थी - निराशा, वेदना, नास्तिकता, हास्य-व्यंग्य, यथार्थ चित्रण, वीभत्स वर्णन, व्यक्तिवाद तथा विरोधाभासी प्रतीत होने वाली आस्था, विश्वास और समष्टि भावना की विशेषताएं थी।
शिल्प कला के पक्ष में नए उपमान, नए प्रतीक, नए विविध विषय, मुक्त छंद आदि की ओर कवि की ज्यादा रुची थी। इस प्रकार आधुनिक काव्य का निरंतर विकास होता रहा। भारतेंदु और द्विवेदी युग के कवियों ने समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए समाज की तीखी आलोचना की तथा स्वदेश प्रेम की भावना को भी जागृत किया। छायावादी काव्य अंतर्मुखी है। महाकवि अपनी ही भावनाओं और कल्पनाओं में डूबे रहते थे। जबकि प्रगतिवादी कवियों ने समाज की और ध्यान दिया। सामाजिक समता लाने के लिए क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किए। प्रयोगवादी काव्य में शिल्प कला की दृष्टि से नए प्रयोग हुए । इस प्रकार आधुनिक काल के काव्य ने अपने लिए विस्तृत क्षेत्र का निर्माण किया। आगे भी नए-नए विचार तथा वादों से युक्त कविताएं लिखी गई और इस तरह कविताओं का विकास निरंतर होता रहा। आधुनिक कालीन कविता विविधमुखी है और आधुनिक काल के लिए सौभाग्य की बात है।