हिंदसा

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

आधुनिक हिंदी साहित्य

                   आधुनिक हिंदी साहित्य
 हिंदी साहित्य में आधुनिक काल का आगमन भारतेंदु हरिश्चंद्र  से माना जाता है। उनसे पहले जो साहित्य लिखा गया था वह रीति कालीन विशेषताओं से प्रभावित था। रीतिकालीन कविता विलासिता और श्रृंगारिकता की कविता थी। जीवन के विविध रंगों का चित्र उसमें नहीं था। सन 1857 में जब भारत की आजादी के लिए किया गया विद्रोह असफल हो गया तब इस कविता का भी अंत सा हो गया। 1857 की आजादी की जो लड़ाई लड़ी गई उससे देश में एक नई चेतना उत्पन्न हुई। भारतीयों में स्वाभिमान से जीने की इच्छा उत्पन्न हुई। अंग्रेजी शासन और अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार से छुटकारा पाने के लिए भारतीय जनता व्याकुल हो गई। समाज के साथ साथ साहित्य भी बदलता है। परिणाम स्वरूप काव्य की पुरानी रीतियों की अपेक्षा की जाने लगी और साहित्य की  नई परिपाटी का विकास हुआ।  इस नई परिपाटी का आरम्भ भारतेंदु हरिश्चंद्र से होता है। इसलिए भारतेंदु आधुनिक युग के प्रवर्तक माने जाते हैं।
       आधुनिक युग के काव्य को समझने के लिए उसे पांच भागों में बांटा गया है। भारतेंदु युग, द्विवेदी युग , छायावाद, प्रगतिवाद,  प्रयोगवाद और नई कविता। लेकिन काव्य की धारा यहीं आकर नहीं रुक गई है काव्य धारा के अनेक रूप हमें उससे आगे भी मिलते हैं ।
 भारतेंदु युग
   भारतेंदु युग  आधुनिक कविता का प्रारंभ है। भारतेंदु जी ने आधुनिक कविता को रीति कालीन विलासिता के कीचड़ से निकालकर उसे स्वच्छ और निर्मल रूप प्रदान कर जनता से जोड़ने की चेष्टा की है। इस युग के कुछ प्रमुख कवियों में जिन कवियों के नाम हैं, वह है- भारतेंदु हरिश्चंद्र, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, प्रताप नारायण मिश्र, ठाकुर जगमोहन सिंह आदि। भारतेंदु युग  को काव्य का संक्रांति काल कहा जाता है, जिसमें काव्य की प्राचीन और आधुनिक प्रवृत्तियों का समन्वय मिलता है, उसमें भक्ति काल की भक्ति भावना, रीतिकाल की श्रृंगारिकता तथा आधुनिक काल की राष्ट्रीयता, हास्य और व्यंग्य, सामाजिक जागरण, प्रकृति चित्रण आदि आधुनिक काल की प्रवृतियां भी दिखाई देती हैं। इस काल के काव्य का महत्व इसलिए भी है कि इसमें देश और जनता की भावनाओं को पहली बार प्रकट किया गया था। देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दशा पर काव्य की रचना की गई थी, समाज सुधार पर इस काल के कवियों ने अधिक बल दिया। उन्होंने भारत के अतीत गौरव का चित्रण करके भारतीयों में आत्मसम्मान की भावना जगाने का प्रयत्न किया। इन्होंने अपने युग की समस्याओं को भी काव्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। लेकिन काव्य की भाषा ब्रजभाषा ही रही। बाद में खड़ी बोली में भी काव्य लिखा जाने लगा।
        द्विवेदी युग
सन 1900 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया और इसके साथ ही द्विवेदी युग का आरंभ माना जाता है। द्विवेदी युग में खड़ी बोली के विकास के लिए द्विवेदी जी ने बहुत प्रयत्न किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्रीधर पाठक, अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' और मैथिलीशरण गुप्त आदि विद्वानों ने ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली का सफलतापूर्वक प्रयोग किया। इस युग के कवियों ने आदर्श को सर्वोपरि स्थान दिया। वस्तुतः भारतेंदु कालीन कविता की विशेषताओं को इस काल में विकास का अवसर मिला। राष्ट्रीयता, समाज सुधार, भारत का गौरव गान तथा नवजागरण को साहित्य में स्थान दिया गया। इस काल के काव्य में उपदेशात्मक, इतिवृत्तात्मक अर्थात वर्णन प्रधान काव्य की रचना की गई। इस काल की धार्मिक तथा देश प्रेम की भावना भारतेंदु काल से अधिक उदार व व्यापक थी। अनेक विधाओं का विकास भी इसी काल में हुआ। महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्त काव्य भी इस काल में भी लिखे गए । साकेत और प्रियप्रवास नामक महाकाव्य इस काल की महत्वपूर्ण रचनाएं हैं।
          संक्षेप में कहा जा सकता है कि नए विषयों, नई भाषा तथा काव्य के विविध रूपों की दृष्टि से द्विवेदी युग का साहित्य में बहुत ही महत्व है।
छायावादी युग
 द्विवेदी का काल उपदेशात्मक, नीरसता से युक्त था। वर्णन प्रधानता के कारण कवि की कल्पना सीमित हो गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदी में छायावादी कविता का विकास हुआ। इस काव्य में व्यक्तिकता की प्रधानता थी और प्रकृति सौंदर्य के चित्रण  में इन कवियों का आकर्षण व प्रेम प्रकट हुआ। कहीं-कहीं प्रकृति चित्रण में इन कवियों ने विराट परमात्मा की अनुभूति भी की। छायावादी काव्य श्रृंगार प्रधान था।  लेकिन इनका श्रंगार भाव रीतिकालीन कवियों से भिन्न था। इनका  श्रृंगार स्थूल एवं मांसल न होकर सूक्ष्म और काल्पनिक था। यह काव्य संस्कृतनिष्ट भाषा, मुक्त छंद विधान आदि की दृष्टि से अद्वितीय था। इस काल को आधुनिक कविता में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कामायनी, पल्लव, परिमल, यामा आदि रचनाएं इस काल की प्रतिनिधि रचनाएं हैं।
प्रगतिवादी
छायावादी काव्य की प्रतिक्रिया के रूप में प्रगतिवादी काव्य का आरंभ हुआ। छायावाद का कवि अपनी कल्पना में डूबा हुआ था। समाज के दूसरे वर्गों के लोगों की और उसका ध्यान नहीं था। परिणाम यह हुआ कि समाज का निम्न वर्ग उपेक्षित हो गया। दूसरी ओर साम्यवाद का प्रभाव भारत में भी फैलता जा रहा था। रूस के मार्क्सवाद ने भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों और कवियों को बहुत प्रभावित किया। मार्क्सवाद का लक्ष्य समाज में साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना करना था। अपने लक्ष्य को पाने के लिए यह हिंसात्मक क्रांति को साधन के रूप में प्रयोग कर रहा था। राजनीति में जो मार्क्सवाद है, साहित्य में उसे ही प्रगतिवाद का नाम दिया गया है । कहने का अभिप्राय यह है कि मार्क्सवाद का प्रभाव हमारे साहित्य पर पड़ रहा था। पंत जी, निराला, दिनकर, नरेंद्र शर्मा, नागार्जुन आदि कवियों ने अपनी कविताओं में  शासकों के लिए घृणा, शोषित के प्रति सहानुभूति, सामाजिक समानता पर बल, पुरानी रुढियों का विरोध आदि विचारों से परिपूर्ण काव्य की रचना की। इन्होंने भौतिकवाद को अधिक महत्व दिया और आध्यात्मिकता की उपेक्षा की। काव्य की दृष्टि से इस काल के साहित्य का भी अपना विशेष महत्त्व है।
प्रयोगवाद और नई कविता
छायावादी काव्य की प्रतिक्रिया के रूप में 1943 में एक और विचारधारा प्रकट हुई। इस काव्य धारा का नाम था- प्रयोगवाद। इसमें व्यक्तिकता को हृदय के धरातल पर स्वीकार न करके भौतिकता के रूप में ग्रहण किया गया। इस कार्य में उत्पन्न भावनाओं को अस्वीकार करके भौतिकता पोस्टर के माध्यम से यथार्थ किया गया। प्रयोगवाद के संस्थापक अज्ञेय ने  1943 में तार सप्तक के नाम से एक काव्य संग्रह प्रकाशित किया। उसमें सात कवियों की कविताएं संकलित थी। जिनमें अज्ञेय, मुक्तिबोध,  नेमीचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे , गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा के नाम आते हैं।  उसके पश्चात 1951 में दूसरा तार सप्तक प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त कुछ पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रयोगवादी कविताएं प्रकाशित हुई। 1953 के बाद प्रयोगवादी कविता नई कविता के नाम से विकसित हुई। इस काव्य की प्रमुख विशेषताएं थी - निराशा, वेदना, नास्तिकता, हास्य-व्यंग्य, यथार्थ चित्रण, वीभत्स वर्णन, व्यक्तिवाद तथा विरोधाभासी प्रतीत होने वाली आस्था, विश्वास और समष्टि भावना की विशेषताएं थी।
       शिल्प कला के पक्ष में नए उपमान, नए प्रतीक, नए विविध विषय, मुक्त छंद आदि की ओर कवि की ज्यादा रुची थी। इस प्रकार आधुनिक काव्य का निरंतर विकास होता रहा। भारतेंदु और द्विवेदी युग के कवियों ने समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए समाज की तीखी आलोचना की तथा स्वदेश प्रेम की भावना को भी जागृत किया। छायावादी काव्य अंतर्मुखी है। महाकवि अपनी ही भावनाओं और कल्पनाओं में डूबे रहते थे। जबकि प्रगतिवादी कवियों ने समाज की और ध्यान दिया। सामाजिक समता लाने के लिए क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किए। प्रयोगवादी काव्य में शिल्प कला की दृष्टि से नए प्रयोग हुए । इस प्रकार आधुनिक काल के काव्य ने अपने लिए विस्तृत क्षेत्र का निर्माण किया।  आगे भी नए-नए विचार तथा वादों से युक्त कविताएं लिखी गई और इस तरह कविताओं का विकास निरंतर होता रहा। आधुनिक कालीन कविता विविधमुखी है और  आधुनिक काल के लिए सौभाग्य की बात है।

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

हिंदी कहानी का विकास

हिंदी कहानी का विकास
कहानी साहित्य की रोचक और सशक्त विधा है कहानी का प्रचलन मानव के विकास के साथ ही हुआ है प्रारंभ में कहानियों को कहने सुनने की प्रथा प्रचलित थी परंतु आज की कहानी प्राचीन भारतीय परंपरा से होती हुई पाश्चात्य कहानी के आधार पर विकसित हुई है। हिंदी में आधुनिक कहानी का जन्म 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से माना जाता है 19वीं शताब्दी के आरंभ में ईशा अल्लाह खान ने रानी केतकी की कहानी लिखी थी। कुछ लोग इसे ही हिंदी की पहली कहानी मानते हैं। इनके पश्चात शिवप्रसाद सितारे हिंद ने राजा भोज का सपना नामक कहानी लिखी और भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अद्भुत अपूर्व स्वप्न लिखी लेकिन यह सारी कहानियां आधुनिक हिंदी कहानी की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। 1900 से 1910 के बीच में किशोरी लाल गोस्वामी ने इंदुमती, रामचंद्र शुक्ल ने ग्यारह वर्ष का समय बंग महिला ने दुलाईवाली नामक कहानी लिखी। वृंदावनलाल वर्मा ने राखी बंद भाई, मैथिलीशरण गुप्त कौन की नकली किला नामक कहानियां प्रकाशित हुई।
प्रसाद व प्रेमचंद जी को आधुनिक कहानी का सूत्रधार होने का गौरव प्राप्त हुआ। प्रसाद जी की ग्राम नामक कहानी 1911 में तथा प्रेमचंद जी की कहानी पंच परमेश्वर 1916 में प्रकाशित हुई। यहीं से आधुनिक कहानी का विकास माना गया। कहानी के विकास को अच्छी प्रकार से जानने के लिए पुरे विकास को प्रसाद युग, प्रेमचंद युग तथा जैनेंद्र युग आदि के रूप में विभाजित कर सकते हैं।
जयशंकर प्रसाद मूलतः कवि थे लेकिन उन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी में भी अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित किया है। प्रसाद जी ने भावना मूलक कहानियां लिखी है, इन्होंने धार्मिक सामाजिक ऐतिहासिक तथा राजनैतिक कहानियां लिखी। इनकी कहानियों में काव्य का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इनकी भाषा संस्कृतनिष्ट है। चरित्र-चित्रण में प्रसाद जी की कोई बराबरी नहीं कर सकता। वातावरण के चित्रण में प्रसाद जी सिद्धहस्त हैं। छाया, आंधी, प्रतिध्वनि, इंद्रजाल, आकाशदीप उनके कहानी संग्रह हैं। उनकी गुंडा कहानी बहुत प्रसिद्ध है प्रसाद युग के अन्य लेखकों में राधा कृष्ण दास, चंडी प्रसाद हरदेश, विनोद शंकर व्यास आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
मुंशी प्रेमचंद हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कहानीकार हैं। उन्होंने लगभग 300 कहानियां लिखी हैं। इनमें सामाजिक राजनैतिक ऐतिहासिक सभी प्रकार की कहानियां है। बड़े घर की बेटी, पूस की रात, रानी शारदा, शतरंज के खिलाड़ी, बूढ़ी काकी, बेटों वाली विधवा, गुल्ली डंडा आदि प्रसिद्ध कहानियां हैं। इनकी कहानियां मानसरोवर खंड में भी प्रकाशित हैं । इनकी कहानियों में पीड़ित, दलित जनता का मार्मिक चित्रण है। उनके प्रति सहानुभूति का भाव पाठकों के हृदय में उत्पन्न होता है। इसी प्रकार ये भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले कहानीकार हैं। इनकी कहानियों की भाषा सरल, सहज, बोलचाल की भाषा है। पात्रों के अनुकूल है। और मुहावरों का सटीक प्रयोग हमें प्रेमचंद की कहानियों में मिलता है। इस समय के कहानीकारों में पंडित गुलेरी जी का नाम आता है | इनकी मार्मिक और स्वाभाविक शैली के कारण 'उसने कहा था' नामक कहानी विश्व की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में गिनी जाती है। यह एक प्रसिद्ध कहानी है। इस कहानी में युद्ध के सजीव वातावरण के भीतर सरल और निश्छल प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है। विशंभर नाथ शर्मा कोशिश इसी तरह के दूसरे कहानीकार हैं। जिन्होंने अपनी कहानियों में सामाजिक समस्याओं को उठाया है। ताई उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी है। सुदर्शन प्रेमचंद के समय के विशिष्ट कहानीकार हैं। जिनकी कहानी में जीवन का सच्चा चित्र व हृदय स्पर्शी वर्णन मिलता है। उनकी कहानियों के लगभग 10 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पांडे बेचन शर्मा उग्र यथार्थवादी कहानीकार हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक रूढ़ियों व परंपराओं के प्रति विद्रोह का स्वर उभर कर आया है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने भी अपनी कहानियों में सामाजिक कुरीतियों को विषय बनाया है। उन्होंने ऐतिहासिक कहानियां भी लिखी है। दुखवा मैं कासे कहूं मोरी सजनी इनका कहानी संग्रह है।
कहानीकार जैनेंद्र हिंदी में मनोवैज्ञानिक आधार को लेकर कहानियां लिखते रहे। उनके ऊपर फ्राइड का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। शिल्प और भाव की दृष्टि से इनकी कहानियां उच्च कोटि की है। पारिवारिक जीवन का चित्रण और समस्याओं का उद्घाटन करना इनकी कहानियों की विषय वस्तु है। इन्होंने अपनी कहानियों के पात्रों का चरित्र चित्रण मनोविज्ञान के आधार पर किया है | इनकी कहानियों में पाज़ेब और पत्नी प्रसिद्ध कहानियां है। इलाचंद्र जोशी भी मनोवैज्ञानिक कहानीकार हैं। फ्रॉयड से प्रभावित इनकी कहानियों में भी मानव चित्रण का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। जोशी जी की कहानियां निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत संकलित हैं- आहुति, दिवाली व होली, रोमांटिक छाया आदि |
अज्ञेय भी श्रेष्ठ, प्रतिभा संपन्न कहानीकार हैं। उनकी कहानियों में उनके हृदय की विरोधी भावना स्पष्ट दिखाई देती है। परंपरा, कोठरी की बात इनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह है ।रोज इन की सर्वश्रेष्ठ कहानी है। भगवतीचरण वर्मा की कहानियों में वर्तमान युग की संघर्ष भावना, हलचल और अशांति की झलक विद्यमान है। आज के शहरी जीवन के खोखलेपन और पतन की ओर बढ़ते मध्यवर्गीय समाज का चित्रण की कहानियों में मिलता है। खिलते फूल, दो बांके इंस्टॉलमेंट नामक इनके कहानी संग्रह हैं।
जिस प्रकार प्रेमचंद और अज्ञेय ने हिंदी कहानी की दिशा को मोड़ दिया था। उसी प्रकार यशपाल भी हिंदी कहानी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कहानीकार हैं। उन्होंने समकालीन हिंदी कहानीकारों को बहुत प्रभावित किया। इनकी कहानियों पर मार्क्सवाद का प्रभाव है। उनकी यथार्थवादी कहानियों की कथावस्तु व भाषा शैली गंभीर है। फूलों का कुर्ता, वह दुनिया, पिंजरे की उड़ान आदि इनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।उपेंद्र नाथ अश्क ने भी अपनी सामाजिक कहानियों के द्वारा समाज की रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर चोट की है। पिंजरा काजी साहब, बैंगन का पौधा इनके प्रसिद्ध हैं। कहानी विधा को वृंदावनलाल वृंदावनलाल वर्मा, राहुल सांकृत्यायन, अमृतलाल नागर, चंद्रगुप्त विद्यालंकार ने अपनी अमूल्य कहानियां देकर समृद्ध किया है। फणीश्वर नाथ रेणु की ठेठ, पुरानी कहानी नया पाठ आदि प्रसिद्ध कहानियों में शामिल हैं | स्वतंत्रता के बाद बहुत से लेखक कहानी क्षेत्र में आए जिनमें प्रमुख कहानीकारों का नाम इस प्रकार हैं- मोहन राकेश, भारती, हरिशंकर देसाई , लक्ष्मीनारायण लाल, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, फणीश्वर नाथ रेणु, निर्मल वर्मा, विष्णु प्रभाकर, भीष्म साहनी, दीप्ति खंडेलवाल, शिवानी, अमरकांत, मैत्रेयी पुष्पा, कमलेश्वर आदि के नाम प्रमुख हैं। इन्होंने कहानी के क्षेत्र में नए नए प्रयोग किए हैं। पत्र-पत्रिकाओं का भी हिंदी कहानी के विकास में बहुत योगदान है। बहुत सी वार्षिक, मासिक, साप्ताहिक ऐसी पत्रिकाएं हैं जिनमें सिर्फ कहानियां प्रकाशित होती है। आज के व्यस्त जीवन में कहानी मनुष्य के तन मन को शांति व प्रसन्नता प्रदान करने वाला एक ऐसा साधन है जिसे पढ़कर मनुष्य सुख का अनुभव करता है। आज के पाठकों का लगाओ कहानी लेखकों को निरंतर प्रोत्साहित कर रहा है। हंस, सरिता, सारिका, तद्भव, कथादेश ऐसी पत्रिकाएं हैं जो हिंदी कहानी के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।

नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...