हिंदसा

मंगलवार, 23 मार्च 2021

चीफ की दावत - भीष्म साहनी

  भीष्म साहनी की कहानी  ‘चीफ की दावत’  


प्रस्तुत कहानी में नगरों-महानगरों में रहने वाले मध्यवर्गियों में परिवारिक मूल्यों के प्रति बढ़ती अनास्था और पनप रही अवसरवादिता का यथार्थ चित्रण किया गया है। 

भीष्म साहनी की ‘चीफ की दावत’ कहानी में मध्यवर्गीय समाज उसके परिवेश और मानसिकता को वास्तविकता के साथ अभिव्यक्त किया है। इसी अभिव्यक्ति में इनकी कहानियों में वैयक्तिक चेतना का किंचित पुट लक्षित होता है। इस वर्ग की कुण्ठाओं, घुटन, बिखराव को यथार्थ के धरातल पर रेखांकित किया है। खोखली मर्यादाओं, बाह्य आडम्बरों और आरोपित नैतिकता के प्रति भीष्म साहनी ने व्यंग्यपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया

भीष्म साहनी की कहानियों में यथार्थ के प्रति आग्रह दिखाई देता है, जिसके पीछे विशेष रूप से आदर्श की स्थापना का हेतु है। नगरों-महानगरों के लोग पारिवारिक मूल्यों की खिल्ली उड़ाते नजर आते है। ऐसे में वे यह भूल जाते है कि जीवन कितना खोखला होता जा रहा है। अपने बड़ों के प्रति असंवेदनशील होने से, ममता, दया, करुणा, सहानुभूति जैसे जीवन के मूलभूत तत्व लुप्त होते जा रही है। इसी प्रकार के यथार्थ को प्रस्तुत कहानी में चित्रित किया है। प्रगतिशील कहानीकार होते हुए भी भीष्म साहनी की कहानियाँ आक्रोशयुक्त राजनीति की शिकार नहीं हुई है। प्रस्तुत कहानी में मध्यवर्गीय के हृदय की थाह ली गई है। व्यंग्य के पुट द्वारा कहानी मार्मिक बनी है।


कहानी के मुख्य बिंदु -


1 मध्यवर्गीय अवसरवादिता और मानवीय मूल्यों का विघटन

2 आधुनिकता, सुसंस्कृति का पाखंड और अवसरवादिता

3 कहानी का निहित उद्देश्य

4 कहानी का कलात्मक पक्ष

5 सारांश

1 मध्यवर्गीय अवसरवादिता और मानवीय मूल्यों का विघटन- 


भीष्म साहनी एक प्रगतिशील कलाकार हैं, इन्होंने कहानियों के साथ ही उपन्यासों और नाटकों की भी रचना की है।भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ की दावत’ का मुख्य उद्देश्य मध्यम वर्गीय व्यक्ति की अवसरवादिता, उसकी महत्वाकांक्षा में पारिवारिक रिश्ते के विघटन को उजागर करना है। मध्यवर्ग के व्यक्ति की यह सामान्य विशेषता है कि वह उच्च वर्ग में शामिल होने के अवसरों की तलाश में रहता है, चाहे वह स्वयं निम्नवर्ग से मध्यवर्ग में पहुँचा हो। . औद्योगीकरण के विकास के साथ भारत में मध्यवर्ग का तेजी से विकास हुआ। शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरी पाकर या आजीविका का अन्य साधन पाकर निम्नवर्ग का व्यक्ति मध्यवर्ग में पहुँच कर उच्चवर्ग की संस्तुति के लिए उच्चवर्ग के मुँह की ओर ताकने लगा। इस कहानी का नायक श्यामनाथ दफ्तर की नौकरी पाकर उच्च पद पाने की महत्वाकांक्षा रखने लगा और उस की पूर्ति के लिए अपने दफ्तर के विदेशी चीफ की खुशामद में लग गया। चीफ की दावत का प्रबन्ध अपने घर में करके वह अपनी बूढी माँ की उपेक्षा करता है। महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए माँ के साथ उस का खून का रिश्ता भी गौण हो जाता है। आधुनिक परिवारों में बूढों की किस प्रकार उपेक्षा होती है और उन की क्या दुर्दशा होती है, यह दिखाना भी इस कहानी का उद्देश्य है।आधुनिक दिखने की चाह में मध्यवर्गीय व्यक्ति प्रदर्शन प्रिय हो गया और बूढ़ी माँ चीफ की दावत के समय प्रदर्शन योग्य वस्तु नहीं, बल्कि कूड़े की तरह कही छिपाने की वस्तु हो गई है। इस झूठी प्रदर्शन प्रियता और छद्म आधुनिकता की कलात्मक व्यंजना इस कहानी में हुई है। समग्रतः ‘चीफ की दावत’ पारिवारिक जीवन मूल्यों के विघटन को स्पष्ट करने के उद्देश्य को लेकर लिखी गई कहानी है। लेकिन माँ की ममता और उसके महत्व की स्थापना के माध्यम से लेखक ने माँ के रूप तथा स्वस्थ पुरानी परम्परा को वरेण्य सिद्ध किया है। श्यामनाथ जिस माँ को उपेक्षित होने लायक वस्तु मान रहे है, उसी के माध्यम से उसकी पदोन्नति होती है। चीफ की दावत कहानी के घटनाक्रम के विकास के आधार पर इसे दो भागों में बाँट कर विश्लेषित किया जा सकता है। यह कृत्रिम विभाजन है, पर अध्ययन की सुविधा के लिए यह विभाजन किया गया है। पहले भाग में चीफ की दावत के लिए की जा रही तैयारी के दृश्य हैं। श्यामनाथ और उस की पत्नी घर की सजावट, विशेषतः ड्राइंग रूम की सजावट, के लिए विशेष चिन्तित हैं। आधुनिक दिखने के लिए और उच्चवर्ग के विदेशी चीफ की नजरों में सुंसस्कृत दिखने के लिए यह प्रदर्शनप्रियता उनके लिए आवश्यक हो गई है। घर को सजाना सामान्यतः सुरुचि का परिचायक है। हर कोई अपने घर को, बैठक को अच्छी दशा में देखना चाहता है। यह सुरुचि सम्पन्नता मानव का विशेष गुण है। बल्कि कहा जा सकता है कि इस आदिम सुरुचि से पशु जगत भी खाली नहीं है! तभी तो कुत्ता जहाँ बैठता है, उस जगह को अपनी पूंछ से साफ कर लेता है। कहानी के प्रारम्भ में ही श्यामनाथ की सुसंस्कृति सम्पन्नता की प्रवृत्ति हास्यास्पद प्रतीत होने लगती है। सुसंस्कृत और सुरुचि सम्पन्न होना एक बात है, पर वैसा दिखना दूसरी बात है, अर्थात प्रदर्शन प्रियता है। प्रायः ऐसा होता है कि व्यक्ति में जिस गुण या चीज का अभाव होता है या उसकी कमी होती है, उसका ही वह प्रदर्शन करता है। श्यामनाथ और उस की पत्नी की यह तथाकथित रुचि सम्पन्नता और सांस्कृतिकबोध वहाँ अपने असली रुप में दिखाई देता है, जहाँ श्यामनाथ की बूढी माँ उन दोनों के लिए कूड़े की तरह छिपाने की वस्तु बन जाती है। जब कूडे और माँ में कोई अन्तर नहीं रहता, तब वहाँ सुरुचि सम्पन्नता और आधुनिकता बोध नहीं, व्यक्ति की फूहड़ता प्रकट होती है। कहानी के इस भाग में कहानीकार ने श्यामनाथ के छद्म आधुनिकता बोध, संस्कृति के नाम पर उसकी प्रदर्शन प्रियता की प्रवृति को स्वाभाविक तथा कलात्मक ढंग से प्रस्तुत कर दिया है। कथाक्रम में आगे दिखाया गया कि जब श्यामनाथ को लगा कि घर में माँ को छिपाया नहीं जा सकता और उसे पडोस की विधवा के घर भेजने से भी उसकी नाक कट जाएगी, तब उसे यह चिन्ता सताने लगी कि चीफ के आने पर माँ कहाँ बैठगी, कैसे – बैठेगी, कौन से कपड़े पहनेगी और कौन सा जेवर पहनेगी। दूसरे शब्दों में उसकी चिन्ता यह थी कि प्रदर्शन के अयोग्य माँ को प्रदर्शन की वस्तु (show piece) कैसे बनाया जाए। इस बारे में माँ के साथ उसके संवाद बड़े रोचक और अर्थगर्भित है। “और माँ हम लोग पहले बैठक में बैठेंगे। उतनी देर तुम वहाँ बरामदे में बैठना। फिर जब हम वहाँ आ जाएँ, तो तुम गुसलखाने के रास्ते बैठक में चली जाना।” माँ अवाक् बेटे का चेहेरा देखने लगी। फिर धीरे से बोली – “अच्छा, बेटा।’ (एक दुनिया समानान्तर – पृ. 224) माँ कहाँ बैठेगी, इस बारे में निर्देश देकर श्यामनाथ ने एक समस्या का समाधान तो कर लिया। दूसरी चिन्ता को श्यामनाथ ने कैसे दूर करने की कोशिश की, यह इस उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है| एक कुर्सी को उठा कर बरामदे में कोठरी के बाहर रखते हुए बोले – “आओ माँ, इस पर जरा बैठो तो।” माँ माला सँभालती, पल्ला ठीक करती हुई उठी, और धीरे से कुर्सी पर आकर बैठ गई। “यूँ नहीं, माँ, टाँगे ऊपर चढ़ाकर नहीं बैठते। यह खाट नहीं है। माँ ने टाँगें नीचे उतार लीं।” (एक दुनिया समानान्तर – पृ. 224) तात्पर्य यह कि श्यामनाथ अपनी माँ को उचित स्थान पर उचित ढंग से उसी प्रकार रखने के लिए व्यग्र दिखाया गया है, जैसे वह घर के सामान को सजाने के लिए प्रयत्नशील था। कहानी के इस भाग में श्यामनाथ अपनी माँ को यह निर्देश भी देता है कि वह कैसी साड़ी पहने। वह माँ को कुर्सी पर बैठ कर सोने की मनाही भी कर जाता है, क्योंकि सोते समय माँ जोर के खर्राटे लेती है, जिस से चीफ की दावत में बाधा पड़ सकती है। माँ का उत्तर बड़ा करुण है “क्या करूँ बेटा, मेरे बस की बात नहीं है। जब से बीमारी से उठी हूँ नाक से सांस नहीं ले सकती।” (वही – पृ. 224) श्यामनाथ की एक समस्या यह भी है कि वह अपनी सम्पन्नता का प्रदर्शन कैसे करे| घर के कोने-कोने को सजा कर और विशेष रुप से बैठक को सजा कर वह अपनी सुरुचि के साथ अपनी सम्पन्नता और समृद्धि का प्रदर्शन कर के चीफ के ऊपर अपनी धाक जमाना चाहता है। इस इच्छा से प्रेरित होकर वह माँ को निर्देश देता है कि वह सफेद कमीज और सफेद सलवार पहन ले। माँ नये कपड़े पहन कर आई तो उस से श्यामनाथ का जो संवाद हुआ, वह उस की शूद्र मानसिकता का परिचायक है। “चलो ठीक है। कोई चूड़ियाँ-बूड़ियाँ हों तो वह भी पहन लो। कोई हर्ज नहीं।” “चूड़ियाँ कहाँ से लाऊँ बेटा, तुम तो जानते हो, सब जेवर तुम्हारी पढ़ाई में बिक गए।” यह वाक्य श्यामनाथ को तीर की तरह लगा। तुनक कर बोले “यह कौन सा राग छेड़ दिया माँ, सीधा कह दो, नहीं है जेवर, बस। इसमें पढ़ाई-वढ़ाई का क्या ताल्लुक है?” ऊपर के संवाद से स्पष्ट हो जाता है कि उस की पढ़ाई में माँ ने जेवर बेचकर जो त्याग और वात्सल्य का प्रमाण दिया था, उस के उल्लेख मात्र से वह खिन्न हो गया। उसकी खिन्नता से लगता है कि वह अपने ऊपर किए गए माँ के एहसान को स्वीकार नहीं करता और अपनी माँ के वात्सल्य का अपमान इन शब्दों में करता ‘जितना दिया था उस से दुगना ले लेना।’ क्योंकि माँ की ममता के मूल्य को कभी चुकाया जा सकता है? पर इस कहानी का श्यामनाथ माँ के एहसान को ना ही मानता, बल्कि उस के वात्सल्य का अपमान भी करता है। माँ ने अपनी विपन्नता का केवल संकेत किया था, क्योंकि उसके पास कोई जेवर नहीं बचा था, पर अपनी समृद्धि के प्रदर्शन के नशे में मस्त श्यामनाथ माँ की विपन्नता के उल्लेख मात्र से तिलमिला गया। यह उसकी प्रदर्शनप्रियता के साथ उसकी शूद्रता का सूचक है। इस प्रकार ‘चीफ की दावत’ कहानी के प्रथम भाग में मध्यवर्गीय व्यक्ति के अवसरवादी चरित्र का उद्घाटन हो जाता है। श्यामनाथ के माध्यम से कहानीकार ने पारिवारिक जीवन मूल्यों के विघटन, और . परिवार में बूढ़ों की दुर्दशा का चित्रण किया है। श्यामनाथ के घर में बूढ़ी माँ की जो दुर्दशा है, वह अनेक परिवारों में बूढ़ों की होगी।


2. आधुनिकता, सुसंस्कृति का पाखंड और अवसरवादिता


‘चीफ की दावत’ कहानी के दूसरे भाग में दावत के समय की स्थितियों, श्यामनाथ और उसकी पत्नी के खुशामदपूर्ण व्यवहार, चीफ के सामने पड़ने पर माँ की विचित्र स्थिति आदि का वर्णन है। दावत के समय भोजन से पहले शराब का दौर रात के लगभग साढ़े दस बजे तक चला। यह पश्चिमी सभ्यता का सूचक है। इस कहानी का चीफ तो विदेशी है, पर अतिथियों में अन्य कई हिन्दुस्तानी हैं। पर सब पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे दिखाए गए हैं। दावत में उपस्थित सभी पुरुष और महिलाएँ बेहिचक शराब पीती हैं और वह भी कई घंटों तक। चीफ की पत्नी हिन्दुस्तानी औरतों की दृष्टि का केन्द्र बनी हुई है। शराब के नशे के बीच खुशामद, हँसी, कहकहों की लहरें उठती गई, पर श्यामनाथ की माँ बरामदे में कुर्सी पर बैठी रही और थक कर सो गई तो खर्राटों की आवाज आने लगी। कहानी के इस भाग में माँ की विचित्र स्थिति, और उसकी विवशता को बड़ी कुशलता से दिखाया गया है। बरामदे में कुर्सी पर बैठी, सोती हुई और खर्राटे लेती हुई माँ आखिर चीफ और अतिथियों के सामने पड़ ही गई। वही स्थिति सामने आ गई, जिसे श्यामनाथ टालना चाहता था। माँ हड़बड़ा कर उठी। श्यामनाथ ने चीफ द्वारा माँ को नमस्ते कहने के जवाब में माँ को हाथ मिलाने का आदेश दिया। माँ ने अपना बायाँ हाथ आगे कर दिया तो सब कहकहे लगाने लगे। हाथ मिला कर अभिवादन करना पश्चिमी ढंग है. पर माँ को इसके लिए विवश किया गया। पर ऐसा करते हए वह सब के उपहास का पात्र बन गई। श्यामनाथ इतने पर संतुष्ट नहीं हुआ। चीफ ने माँ से पूछा “How do you do?” तो श्यामनाथ ने अनपढ़ माँ से अंग्रेजी शब्दों को दुहराने का आदेश दिया। पर जब माँ “हौ डू डू’ ही कह सकी तो फिर कहकहे की आवाज गूंज उठी। माँ बेटे के आदेश का पालन करने और सब के उपहास के केन्द्र बनने के लिए विवश थी। माँ की विवशता के कई करुण चित्र कहानी के इस भाग में देखे जा सकते हैं। श्यामनाथ चीफ की खुशामद में इतना सक्रिय है कि उसे खुश करने के प्रयत्न में वह अपनी माँ का उपयोग करना आवश्यक मानता है। चीफ की इच्छा जान कर वह माँ से गाने की फरमाइश भी कर बैठा। यहाँ भी माँ की विवशता बड़ी करुण हो उठी। मना करते करते भी उसे पंजाबी लोकगीत गाना पड़ा और उसके गाने पर भी हँसी और कहकहों के स्वर तेज हो गए। उस दृश्य को कहानीकार ने यो प्रस्तुत किया है “बरामदा तालियों से गूंज उठा। साहब तालियाँ पीटना बन्द ही न करते थे। श्यामनाथ की खीज प्रसन्नता और गर्व में बदल उठी थी। माँ ने पार्टी में नया रंग भर दिया था।” (एक दुनिया समानान्तर – पृ. 228) माँ की विवशता श्यामनाथ के लिए ‘प्रसन्नता और गर्व’ का कारण थी। यह प्रसन्नता कितनी झूठी है और गर्व कितना खोखला है, कहानी के पिछले भाग पर ध्यान देने से स्पष्ट हो जाता है, जहाँ श्यामनाथ की मुख्य चिन्ता यह थी कि माँ को चीफ की नजरों से कैसे दूर रखा जाए और उसे घर के कूड़े की तरह कहाँ छिपाया जाए। कहानी के दूसरे भाग में एक और प्रसंग है, जिससे स्थिति का विद्रूप और स्पष्ट हो जाता है। चीफ के सामने फुलकारी का उल्लेख हुआ तो श्यामनाथ ने माँ को फुलकारी दिखाने का आदेश दे डाला। वह बिचारी अपनी पुरानी फटी फुलकारी ले आई। माँ की विपन्नता का हाल फटी हुई फुलकारी बता रही थी। इस स्थिति को कहानीकार ने यों प्रस्तुत किया .“साहब बड़ी रुचि से फुलकारी देखने लगे। पुरानी फुलकारी थी, जगह जगह से उसके तागे टूट रहे थे और कपड़ा फटने लगा था। साहब की रुचि देखकर श्यामनाथ बोले – ‘यह फटी हुई है, साहब, मैं आपको नयी बनवा दूंगा। माँ बना देंगी। क्यों माँ, साहब को फुलकारी बहुत पसन्द है, इन्हें ऐसी ही एक फुलकारी बना दोगी न?” माँ चुप रही। फिर डरते-डरते धीरे से बोली “अब मेरी नजर कहाँ है, बेटा! बूढ़ी आँखें क्या देखेंगी।” मगर माँ का वाक्य बीच में ही तोड़ते हुए श्यामनाथ साहब से बोले “वह जरूर बना देंगी। आप उसे देख कर खुश होंगे।” (वही पृ. 228) ऊपर के उद्धरण से स्पष्ट है कि श्यामनाथ माँ को नई फुलकारी लाकर नहीं दे सका, पर साहब के लिए वह नई फुलकारी बनवाने के लिए चिन्तित है। साहब को फुलकारी पसन्द है, यह बात उसके लिए अधिक महत्वपूर्ण है। माँ की नजर कमजोर है और नई फुलकारी बनाने के योग्य नहीं, यह बात उपेक्षणीय है। इसलिए माँ की असमर्थता और उसकी मनाही की उपेक्षा करके वह उसे साहब के लिए नई फुलकारी बनाने का आदेश देता है, क्योंकि साहब ‘उसे देखकर खुश होंगे।’ माँ की असमर्थता और विवशता के बावजूद श्यामनाथ को साहब की खुशी चाहिए। साहब खुश होंगे तो उसकी तरक्की होगी। ‘चीफ की दावत’ कहानी का अन्त बड़ा करुण और स्वाभाविक है। दावत के अंत में कहानीकार ने माँ की दयनीय अवस्था का जो चित्र खींचा है, वह बड़ा करुण तथा मार्मिक है। दावत के बाद माँ अपनी कोठरी में चली गई ओर अश्रु की नदी में डूब गई। आधी रात के बाद बेटे ने कोठरी का दरवाजा खटकाया तो माँ का दिल बैठ गया। वह अनेक आशंकाओं से भर उठी। वह सोचने लगी कि उस से फिर कोई भूल हो गई, जिसके लिए उसके बेटे ने उसे क्षमा नहीं किया। इस से अनुमान लगाया जा सकता है कि बूढ़ी माँ बेटे के घर में घुट-घुट कर जी रही थी। इस घुटन भरे वातावरण से मुक्ति पाने के लिए उसने बेटे के सामने प्रस्ताव रखा कि उसे हरिद्वार भेज दे, जिसे श्यामनाथ ने अपनी बदनामी के डर से स्वीकार नहीं किया। फिर उसने दूसरी चिन्ता यह प्रकट की- ‘तुम चली जाओगी तो फुलकारी कौन बनाएगा? साहब से तुम्हारे सामने ही फुलकारी देने का इकरार किया है।’ “मेरी आँखें नहीं हैं, बेटा, जो फुलकारी बना सकूँ। तुम कहीं और से बनवा लो। बनी बनाई ले लो।”“माँ, तुम मुझे धोखा देकर यूँ चली जाओगी? मेरा बनता काम बिगाड़ोगी? जानती नहीं, साहब खुश होगा तो मुझे तरक्की मिलेगी। (वही, पृ. 229) बेटे की तरक्की की आशा देख कर माँ ने फुलकारी बनाने का वादा कर लिया। बेटे को माँ की लाचारी का ध्यान नहीं आया, पर माँ बेटे की तरक्की की आशा देखकर अपनी लाचारी भूल गई और फुलकारी बनाने को तैयार हो गई। पुत्र के दुर्व्यवहार के बाद भी माँ बेटे की तरक्की की आशा मात्र से अपना दुख भूल गई। श्यामनाथ की माँ वात्सल्य की प्रतिमा के रूप में चित्रित हुई है और श्यामनाथ मध्यवर्ग के एक दुनियादार, महत्वाकांक्षी, खुशामदी, प्रदर्शन-प्रिय, अवसरवादी व्यक्ति के रूप में ही दिखाया गया है। कहानीकार ने उसे ‘मिस्टर शामनाथ’ के रूप में प्रस्तुत किया है। यहाँ ‘मिस्टर’ शब्द मनमाने ढंग से ‘श्री’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त नहीं हुआ है, बल्कि पश्चिमी सभ्यता के रंग में डूबे उसके आधुनिक चरित्र का सूचक है।


3. कहानी का निहित उद्देश्य


चीफ की दावत कहानी नयी कहानी के दौर की एक विशिष्ट कहानी है। इसमें भी मध्यवर्गीय मानसिकता और पारिवारिक संबंध बड़ी कुशलता से समाविष्ट हुए हैं। लेकिन भीष्म साहनी, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर आदि भाववादी-व्यक्तिवादी कहानीकारों से भिन्न यथार्थवादी प्रगतिवादी कहानीकार हैं। इन्होंने स्वस्थ परम्परा और पारिवारिक संबंधों के महत्व को स्वीकार किया है। अन्य नए कहानीकार जहाँ माँ-बाप और सगे संबंधियों को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं, वहाँ भीष्म साहनी ने संबंधों के महत्व को स्वीकार किया है। अतः इस कहानी में लेखक ने माँ को पुरानी परंपरा का . एक प्रतीक भी माना है। पार्टी के दौरान श्यामनाथ की महत्वाकांक्षा पर पानी फिर चुका था, क्योंकि पदोन्नति के संबंध में कोई बात नहीं हो पाई थी। माँ की वजह से श्यामनाथ का चीफ के साथ एक पारिवारिक रिश्ता कायम होता है, जिससे चीफ फिर घर पर आने और फुलकारी ले जाने का वादा करता है। इस तरह माँ रूपी परंपरा के कारण ही श्यामनाथ को पदोन्नति की आशा बंधती है और उसके साथ हार्दिक रूप से जुड़ पाता है। इन सभी तथ्यों को भीष्म साहनी ने माँ के माध्यम से अत्यंत बारीकी से संकेतित कर दिया है। गंदे कूड़े की तरह छिपाने की वस्तु बनने वाली माँ श्यामनाथ के लिए पदोन्नति का सार्थक दरवाजा बनकर प्रतिष्ठित हुई है। इस प्रकार भीष्म साहनी ने मध्यवर्गीय यथार्थ के टुच्चेपन पर एक प्रगतिशील परिप्रेक्ष्य अपनाया है। माँ के रूप में पुरानी किंतु स्वस्थ परंपरा त्याज्य नहीं, वरन् वरेण्य बनकर प्रस्तुत हुई है।


4. कहानी का कलात्मक पक्ष


यह कहानी यथार्थवादी शिल्प में लिखी गई है। इस प्रकार यह यथार्थवादी कहानी कही जा सकती है। मध्यवर्गीय परिवार की यथार्थ स्थिति का इसमें अंकन है। यथार्थ स्थिति के कई पक्ष इस में उद्घाटित हुए हैं, जैसे मध्यवर्गीय व्यक्ति की अवसरवादिता, आधुनिकता का आडम्बर, प्रदर्शन प्रियता, पारिवारिक रिश्तों के प्रति उपेक्षा श्यामनाथ के  व्यवहारों से प्रकट हुई है। साथ ही मध्यवर्गीय व्यक्ति की मानसिकता उसके व्यवहारों, शब्दों के माध्यम से भी व्यक्त हुई है, जिससे यथार्थ चित्रण में मनोवैज्ञानिकता का समावेश भी हो गया है। कहा जा सकता है कि कहानी में यथार्थ का चित्रण मनोविज्ञान के आलोक में किया गया है। भीष्म साहनी यथार्थवाद का जो अर्थ लेते हैं, उस पर ध्यान दें तो यथार्थवादी शिल्प पर भी प्रकाश पड़ेगा। ‘हिन्दी कहानी संग्रह (प्रकाशक – साहित्य अकादमी, दिल्ली, पृ. 14, तृतीय संस्करण सन् 1994) की भूमिका में भीष्म साहनी ने यथार्थवाद के बारे में लिखा ‘किसी घटना का यथावत् चित्रण ही यथार्थ नहीं कहलाता, उसकी तह में काम करने वाले तत्वों और अन्तर्विरोधों की पकड़ रचना को यथार्थवादी बनाती है। प्रस्तुत कहानी में चित्रित श्यामनाथ और उसकी पत्नी के व्यवहारों के पीछे छिपे स्वार्थों, और अन्तर्विरोधों को लेखक ने कुशलता से सूचित किया है। विभिन्न पात्रों के संवादों में उनकी मनःस्थितियाँ ध्वनित हो जाती हैं। उपेक्षित माँ की घुटन उसके संक्षिप्त संवादों और विभिन्न क्रियाकलापों से स्पष्ट हो जाती है। समग्रतः कहा जा सकता है कि जीवन के यथार्थ और पात्रों के मनोविज्ञान का कुशल समन्वय इस कहानी में हुआ है। ‘चीफ की दावत’ कहानी में शहरी व्यक्ति की बोलचाल की भाषा प्रयुक्त हुई है, जिसमें संस्कृत शब्दों के बजाए उर्दू शब्दों, तद्भव शब्दों के प्रति लेखक की अधिक रूचि प्रकट होती है। भीष्म साहनी मिली जुली भाषा के प्रयोग में सिद्धहस्त हैं। भाषा के बारे में उनका दृष्टिकोण शुद्धतावादी नहीं है। भाव स्थितियों के मूर्तीकरण के लिए उन्हें जिस किसी स्रोत से शब्द मिले वे ले लेते हैं। इस कहानी में आधुनिकता के सूचक कुछ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी हुआ है, जैसे ड्रैसिंग गाउन, पाउडर, मिस्टर, नैपकिन, ड्रिंक, डिनर, चीफ, साइज़ आदि। श्यामनाथ संज्ञा के पहले कहानीकार ने ‘मिस्टर’ शब्द जानबूझ कर लगाया है, जो श्यामनाथ के व्यक्तित्व के अंग्रेजीकरण का सूचक है। कहानीकार ने श्यामनाथ को कई जगह “मिस्टर श्यामनाथ’ लिखा है। फिर मुख्य अतिथि के लिए भी ‘चीफं’ शब्द का प्रयोग किया है। कहानी का शीर्षक ‘चीफ की दावत’ कहानी की मुख्य कथा वस्तु, उसके मुख्य घटना स्थल, और उसकी मुख्य संवेदना के अनुकूल है। ‘चीफ’ कोई भी हो सकता है, इसलिए उसका नाम नहीं बताया गया, पर प्रत्येक ‘ चीफ’ को खुश करने के लिए उसे दावत देना जरूरी है। आधुनिक संस्कृति दिखावे की संस्कृति है, पर इस संस्कृति में माँ के लिए कोई स्थान नहीं है। इसीलिए दावत के समय माँ को कूड़े की तरह छिपाने की आवश्यकता महसूस होती है। कहानी का शीर्षक कहानीकार की भाषागत रुचि की ओर भी संकेत करता है। शीर्षक कहानी से अलग नहीं होता। उसे उसका आवश्यक भाग ही मानना चाहिए। इसलिए प्रत्येक कहानी का कोई सधा हुआ शीर्षक होता है। यह शीर्षक भी सधा हुआ और सोच-समयकर बनाया गया है।


5. सारांश

प्रस्तुत कहानी के प्रथम भाग में ‘चीफ की दावत’ के लिए की जा रही तैयारी का वर्णन है। इसमें श्यामनाथ और उसकी पत्नी लगी है। उन्हें विदेशी चीफ की नजरों में आधुनिक तथा सुसंस्कृत दिखने की अधिक चिंता है। इस चिंता के कारण से सामान्यतः पूरे घर की सजावट और विशेषतः ड्राइंग रूम की सजावट पर विशेष ध्यान देते हैं। प्रत्यक वस्तु को उसके उचित स्थान पर रखने और घर के कूड़े को कहीं छिपाने के लिए दोनों प्रयत्नशील है। वह ड्राइंगरूम को एक प्रदर्शनी बनाना चाहते हैं। आधुनिकता और संस्कृति के प्रदर्शन की तैयारी में एक बाधा तब उपस्थित हो गई जब श्यामनाथ का ध्यान अपनी बूढ़ी माँ की ओर गया, जो उसकी नजरों में प्रदर्शन के योग्य नहीं है और इसलिए वह चीफ से मिलाने के योग्य नहीं है। तब बूढी माँ उसके लिए एक फालतु सामान या कूड़े में रुपांतरित हो जाती है। कूड़ा और उसकी माँ में कोई अंतर नहीं रहता। श्यामनाथ अपनी माँ से दुर्व्यवहार करता है। इससे उसके सुसंस्कृत होने का पता नहीं चलता, बल्कि उसका टुच्चापन, उसकी अवसरवादिता और शूद्रता ही उजागर होती है। कहानी में शुरू में यह भी दिखाया गया है कि जब श्यामनाथ का ध्यान अपनी माँ की ओर गया और उसे लगा कि उसे चीफ की नज़रों से ओझल नहीं किया जा सकता तो उसने माँ को प्रदर्शन योग्य बनाने का निश्चय कर लिया। पहले माँ को छिपाने की चिन्ता सता रही थी, अब वह माँ को प्रदर्शन की वस्तु बनाने में लग गया। उसने माँ को बताया कि कैसे कुर्सी पर बैठा जाए और वह कैसे कपड़े पहने। जैसे उसने ड्राइंग रूप और बरामदे में प्रत्येक वस्तु को उचित स्थान पर उचित ढंग से सजा दिया था, वैसे माँ को भी सजावट के सामान की तरह उचित स्थान पर उचित ढंग से बिठाने की कोशिश करने लगा। जब चीफ और अन्य अतिथि ड्राइंग रूम में हों तो माँ के लिए उचित स्थान बरामदे में कुर्सी निर्धारित की गई और उसे यह भी बता दिया गया कि वह कुर्सी पर पाँव लटका कर बैठे और सोये नहीं, क्योंकि सोने पर उसके खर्राटे दावत में बाधा डाल सकते हैं। श्यामनाथ की एक चारित्रिक विशेषता अपनी झूठी सम्पन्नता के प्रदर्शन की भी है। आधुनिकता और सुसंस्कृति के प्रदर्शन की तरह वह अपनी समृद्धि का भी प्रदर्शन करना चाहता है। तभी उसने माँ से पूछा कि सोने की चूड़ियाँ कहाँ हैं और वह उन्हें पहन ले, ताकि अतिथियों को पता लग जाए कि उसकी बूढ़ी माँ हाथों में सोने की चूड़ियाँ पहने है। माँ द्वारा यह सूचना पाकर कि सारे जेवर उसकी पढ़ाई में बिक गए, श्यामनाथ तिलमिला जाता है। उसकी तीखी प्रतिक्रिया से माँ के प्रति अवमानना, कृतघ्नता तथा उसकी शुद्रता का पता चलता है। वह माँ की ममता का मूल्य चुकाने की बात कह कर उसके वात्सल्य का भी अपमान करता है। यहाँ मध्यवर्गीय व्यक्ति की प्रदर्शन प्रियता, आधुनिकता और सुसंस्कृति का पाखंड, पारिवारिक जीवन मूल्यों का विघटन, बूढ़ों की दुर्दशा आदि समस्याएँ श्यामनाथ के क्रियाकलापों के माध्यम से सफलतापूर्वक उद्घाटित हो जाती हैं। कहानी के दूसरे भाग में चीफ की दावत के समय के वातावरण का कुशल अंकन है। भोजन से पहले शराब का लम्बा दौर रात के साढ़े दस बजे तक चला। श्यामनाथ और उसकी पत्नी का खुशामदपूर्ण व्यवहार परिस्थिति के अनुकूल है। दावत में विदेशी अफसर सब की दृष्टियों का केंद्र है और उसकी पत्नी सब महिला अतिथियों की आँखों की पुतली बनी हुई है। दावत में सभी स्त्री पुरुष शराब पीते हुए दिखाए गए हैं। यह पश्चिमी सभ्यता का सूचक है। इस रंगीन वातावरण से अलग श्यामनाथ की बूढ़ी माँ बरामदे में कुर्सी पर बैठी-बैठी थक कर सो गई और खर्राटों की आवाज वातावरण में गूंजने लगी। कहानी के इस भाग में माँ की विचित्र स्थिति और उसकी विवशता का कुशल वर्णन है। मदिरापान के लम्बे सत्र की समाप्ति के बाद चीफ और अन्य अतिथि भोजन के लिए बरामदे में आए तो चीफ के सामने खर्राटे लेती माँ पड़ गई। श्यामनाथ ने माँ को चीफ का स्वागत करने के लिए कहा तो माँ ने हाथ जोड़ दिए, पर चीफ ने अपना हाथ बढ़ाया तो माँ को आदेश मिला कि वह साहब से हाथ मिलाए। उसने बायाँ हाथ आगे कर दिया, पर सबके उपहास और कहकहों का केन्द्र बन गई। चीफ द्वारा ‘how do you do’ कहने पर श्यामनाथ ने अनपढ़ माँ को अंग्रेजी शब्दों को दोहराने के लिए विवश किया और उससे जब ‘हौ ड्रडू’ कहते नहीं बना तो वह फिर सब के उपहास का पात्र बन गई। माँ की विवशता के कई करुण चित्र इस कहानी में बिखरे पड़े हैं। चीफ की इच्छा जान कर श्यामनाथ अपनी माँ से गाने की फरमाइश कर बैठा। मना । करते करते भी उसे एक पंजाबी लोक गीत की कुछ पंक्तियाँ गानी पड़ी। यह श्यामनाथ के लिए प्रसन्नता और गर्व की बात थी, क्योंकि माँ ने पार्टी में नया रंग भर दिया था। कहानी के उस मोड़ पर बूढ़ी माँ की स्थिति तब और भी निरीह हो गई जब उसके बेटे ने आदेश दिया कि चीफ को अपनी फुलकारी दिखा दे। उसने पुरानी फटी हुई फुलकारी आगे कर दी। साहब ने फुलकारी में थोड़ी रुचि दिखाई तो श्यामनाथ ने तुरंत वादा कर लिया कि उसकी माँ उसके लिए नई फुलकारी बना देगी। उसकी सबसे बड़ी चिन्ता साहब को खुश करने की थी। साहब की खुशी पर उस ने अपनी बूढी लाचार माँ की विवशता ओर कमजोर आँखों को न्योछावर कर दिया। माँ की असमर्थता के बावजूद उसे साहब की खुशी चाहिए। मध्यवर्गीय परिवार का आधुनिक व्यक्ति अपने बुजुर्गो की कितनी उपेक्षा करता है, वह बूढ़ी माँ के प्रति श्यामनाथ के व्यवहार से स्पष्ट है। दावत के बाद माँ अपनी कोठरी में जा कर आँसुओं की नदी में डूब गई। आशंकाओं के बीच जब उसने कोठरी का दरवाजा खोला तो उसने घुटन भरे वातावरण से मुक्ति पाने के लिए श्यामनाथ से कहा कि वह उसे हरिद्वार छोड़ आए। माँ की घुटन और विषाद को अनदेखा कर श्यामनाथ क्रुद्ध होकर बोला – “तुम चली जाओगी तो फुलकारी कौन बनाएगा?” अपनी तरक्की का सपना दिखा कर उसने माँ को साहब के लिए फुलकारी बनाने के लिए राजी कर लिया। बेटे की कृतघ्नता के आगे माँ का वात्सल्य विजयी हुआ। बेटे की तरक्की की आशा में माँ अपना दुःख भूल गई। कहानी का अंत करुण है, पर माँ की ममता को गौरवान्वित कर जाता है।

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

बहादुर (पाठ)

 अमरकांत की कहानी 'बहादुर' का पाठ 

सहसा मैं काफी गंभीर था, जैसा कि उस व्यक्ति को हो जाना चाहिए, जिस पर एक भारी दायित्व आ गया हो। वह सामने खड़ा था और आँखों को बुरी तरह मटका रहा था। बारह-तेरह वर्ष की उम्र। ठिगना शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह। वह सफेद नेकर, आधी बाँह की ही सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने था। उसके गले में स्काउटों की तरह एक रूमाल बँधा था। उसको घेरकर परिवार के अन्य लोग खड़े थे। निर्मला चमकती दृष्टि से कभी लड़के को देखती और कभी मुझको और अपने भाई को। निश्चय ही वह पंच बराबर हो गई थी।
उसको लेकर मेरे साले साहब आए थे। नौकर रखना कई कारणों से बहुत जरूरी हो गया था। मेरे सभी भाई और रिश्तेदार अच्छे ओहदों पर थे और उन सभी के यहाँ नौकर थे। मैं जब बहन की शादी में घर गया तो वहाँ नौकरों का सुख देखा। मेरी दोनों भाभियाँ रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती थीं, जबकि निर्मला को सबेरे से लेकर रात तक खटना पड़ता था। मैं ईर्ष्या से जल गया। इसके बाद नौकरी पर वापस आया तो निर्मला दोनों जून ‘नौकर-चाकर’ की माला जपने लगी। उसकी तरह अभागिन और दुखिया स्त्री और भी कोई इस दुनिया में होगी? वे लोग दूसरे होते हैं, जिनके भाग्य में नौकर का सुख होता है…
पहले साले साहब से असाधारण विस्तार से उसका किस्सा सुनना पड़ा। वह एक नेपाली था, जिसका गाँव नेपाल और बिहार की सीमा पर था। उसका बाप युद्ध में मारा गया था और उसकी माँ सारे परिवार का भरण-पोषण करती थी। माँ उसकी बड़ी गुस्सैल थी और उसको बहुत मारती थी। माँ चाहती थी कि लड़का घर के काम-धाम में हाथ बटाए, जब कि वह पहाड़ या जंगलों में निकल जाता और पेड़ों पर चढ़कर चिड़ियों के घोंसलों में हाथ डालकर उनके बच्चे पकड़ता या फल तोड़-तोड़कर खाता। कभी-कभी वह पशुओं को चराने के लिए ले जाता था। उसने एक बार उस भैंस को बहुत मारा, जिसको उसकी माँ बहुत प्यार करती थी, और इसीलिए उससे वह बहुत चिढ़ता था। मार खाकर भैंस भागी-भागी उसकी माँ के पास चली गई, जो कुछ दूरी पर एक खेत में काम कर रही थी। माँ का माथा ठनका। बेचारा बेजबान जानवर चरना छोड़कर यहाँ क्यों आएगा? जरूर लौंडे ने उसको काफी मारा है। वह गुस्से-से पागल हो गई। जब लड़का आया तो माँ ने भैंस की मार का काल्पनिक अनुमान करके एक डंडे से उसकी दुगुनी पिटाई की और उसको वहीं कराहता हुआ छोड़कर घर लौट आई। लड़के का मन माँ से फट गया और वह रात भर जंगल में छिपा रहा। जब सबेरा होने को आया तो वह घर पहुँचा और किसी तरह अंदर चोरी-चुपके घुस गया। फिर उसने घी की हंडिया में हाथ डाल कर माँ के रखे रुपयों में से दो रुपये निकाल लिए। अंत में नौ-दो ग्यारह हो गया। वहाँ से छह मील की दूरी पर बस स्टेशन था, जहाँ गोरखपुर जाने वाली बस मिलती थी।
‘तुम्हारा नाम क्या है, जी?’ मैंने पूछा।

‘दिल बहादुर, साहब।’

उसके स्वर में एक मीठी झनझनाहट थी। मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने उसको क्या हिदायतें दी थीं। शायद यह कि शरारतें छोड़कर ढंग से काम करे और उस घर को अपना घर समझे। इस घर में नौकर-चाकर को बहुत प्यार और इज्जत से रखा जाता है। अगर वह वहाँ रह गया तो ढंग-शऊर सीख जाएगा, घर के और लड़कों की तरह पढ़-लिख जाएगा और उसकी जिंदगी सुधर जाएगी। निर्मला ने उसी समय कुछ व्यावहारिक उपदेश दे डाले थे। इस मुहल्ले में बहुत तुच्छ लोग रहते हैं, वह न किसी के यहाँ जाए और न किसी का काम करे। कोई बाजार से कुछ लाने को कहे तो वह ‘अभी आता हूँ’, कहकर अंदर खिसक जाए। उसको घर के सभी लोगों से सम्मान और तमीज से बोलना चाहिए। और भी बहुत-सी बातें। अंत में निर्मला ने बहुत ही उदारतापूर्वक लड़के के नाम में से ‘दिल’ शब्द उड़ा दिया।
परंतु बहादुर बहुत ही हँसमुख और मेहनती निकला। उसकी वजह से कुछ दिनों तक हमारे घर में वैसा ही उत्साहपूर्ण वातावरण छाया रहा, जैसा कि प्रथम बार तोता-मैना या पिल्ला पालने पर होता है। सबेरे-सबेरे ही मुहल्ले के छोटे-छोटे लड़के घर के अंदर आकर खड़े हो जाते और उसको देखकर हँसते या तरह-तरह के प्रश्न करते। ‘ऐ, तुम लोग छिपकली को क्या कहते हो?’ ‘ऐ, तुमने शेर देखा है?’ ऐसी ही बातें। उससे पहाड़ी गाने की फरमाइशें की जातीं। घर के लोग भी उससे इसी प्रकार की छेड़खानियाँ करते थे। वह जितना उत्तर देता था उससे अधिक हँसता था। सबको उसके खाने और नाश्ते की बड़ी फिक्र रहती।
निर्मला आँगन में खड़ी होकर पड़ोसियों को सुनाते हुए कहती थी – ‘बहादुर आकर नाश्ता क्यों नहीं कर लेते? मैं दूसरी औरतों की तरह नहीं हूँ, जो नौकर-चाकर को तलती-भूनती हैं। मैं तो नौकर-चाकर को अपने बच्चे की तरह रखती हूँ। उन्होंने तो साफ-साफ कह दिया है कि सौ-डेढ़ सौ महीनाबारी उस पर भले ही खर्च हो जाय, पर तकलीफ, उसको जरा भी नहीं होनी चाहिए। एक नेकर-कमीज तो उसी रोज लाए थे… और भी कपड़े बन रहे हैं…’
धीरे-धीरे वह घर के सारे काम करने लगा। सबेरे ही उठकर वह बाहर नीम के पेड़ से दातून तोड़ लाता था। वह हाथ का सहारा लिए बिना कुछ दूर तक तने पर दौड़ते हुए चढ़ जाता। मिनट भर में वह पेड़ की पुलई पर नजर आता। निर्मला छाती पीटकर कहती थी – अरे रीछ-बंदर की जात, कहीं गिर गया तो बड़ा बुरा होगा। वह घर की सफाई करता, कमरों में पोंछा लगाता, अँगीठी जलाता, चाय बनाता और पिलाता। दोपहर में कपड़े धोता और बर्तन मलता। वह रसोई बनाने की भी ज़िद्द करता, पर निर्मला स्वयं सब्जी और रोटी बनाती। निर्मला की उसको बहुत फिक्र रहती थी। उसकी उन दिनों तबीयत ठीक नहीं रहती थी, इसलिए वह कुछ दवा ले रही थी। बहादुर उसको कोई काम करते देखकर कहता था – ‘माता जी, मेहनत न करो, तकलीफ बड़ जाएगा।’ वह कोई भी काम करता होता, समय होने पर हाथ धोकर भालू की तरह दौड़ता हुआ कमरे में जाता और दवाई का डिब्बा निर्मला के सामने-लाकर रख देता।
जब मैं शाम को दफ्तर से आता तो घर के सभी लोग मेरे पास आकर दिन भर के अपने अनुभव सुनाते थे। बाद में वह भी आता था। वह एक बार मेरी ओर देखकर सिर झुका लेता और धीरे-धीरे मुस्कराने लगता। वह कोई बहुत ही मामूली घटना की रिपोर्ट देता – ‘बाबू जी, बहिन जी का एक सहेली आया था।’ या ‘बाबू जी, भैया सिनेमा गया था।’ इसके बाद वह इस तरह हँसने लगता था, गोया बहुत ही मजेदार बात कह दी हो। उसकी हँसी बड़ी कोमल और मीठी थी, जैसे फूल की पंखुड़ियाँ बिखर गई हों। मैं उससे बातचीत करना चाहता था, पर ऐसी इच्छा रहते हुए भी मैं जान-बूझकर बहुत गंभीर हो जाता था और दूसरी ओर देखने लगता था।
निर्मला कभी-कभी उससे पूछती थी – बहादुर, तुमको अपनी माँ की याद आती है?

‘नहीं।’

‘क्यों?’

‘वह मारता क्यों था?’ इतना कहकर वह खूब हँसता था, जैसे मार खाना खुशी की बात हो।
‘तब तुम अपना पैसा माँ के पास कैसे भेजने को कहते हो?’
‘माँ-बाप का कर्जा तो जन्म भर भरा जाता है’ वह और भी हँसता था।
निर्मला ने उसको एक फटी-पुरानी दरी दे दी थी। घर से वह एक चादर भी ले आया था। रात को काम-धाम करने के बाद वह भीतर के बरामदे में एक टूटी हुई बँसखट पर अपना बिस्तर बिछाता था। वह बिस्तरे पर बैठ जाता और अपनी जेब में से कपड़े की एक गोल-सी नेपाली टोपी निकालकर पहन लेता, जो बाईं ओर काफी झुकी रहती थी। फिर वह एक छोटा-सा आईना निकालकर बंदर की तरह उसमें अपना मुँह देखता था। वह बहुत ही प्रसन्न नजर आता था। इसके बाद कुछ और भी चीजें उसकी जेब से निकलकर उसके बिस्तरे पर सज जाती थीं – कुछ गोलियाँ, पुराने ताश की एक गड्डी, कुछ खूबसूरत पत्थर के टुकड़े, ब्लेड, कागज की नावें। वह कुछ देर तक उनसे खेलता था। उसके बाद वह धीमे-धीमे स्वर में गुनगुनाने लगता था। उन पहाड़ी गानों का अर्थ हम समझ नहीं पाते थे, पर उनकी मीठी उदासी सारे घर में फैल जाती, जैसे कोई पहाड़ की निर्जनता में अपने किसी बिछुड़े हुए साथी को बुला रहा हो।
दिन मजे में बीतने लगे। बरसात आ गई थी। पानी रुकता था और बरसता था। मैं अपने को बहुत ऊँचा महसूस करने लगा था। अपने परिवार और संबंधियों के बड़प्पन तथा शान-बान पर मुझे सदा गर्व रहा है। अब मैं मुहल्ले के लोगों को पहले से भी तुच्छ समझने लगा। मैं किसी से सीधे मुँह बात नहीं करता। किसी की ओर ठीक से देखता भी नहीं था। दूसरे के बच्चों को मामूली-सी शरारत पर डाँट-डपट देता। कई बार पड़ोसियों को सुना चुका था – जिसके पास कलेजा है, वही आजकल नौकर रख सकता है। घर के सवांग की तरह रहता है। निर्मला भी सारे मुहल्ले में शुभ सूचना दे आई थी – आधी तनखाह तो नौकर पर ही खर्च हो रही है, पर रुपया-पैसा कमाया किसलिए जाता है? ये तो कई बार कह ही चुके थे कि तुम्हारे लिए दुनिया के किसी कोने से नौकर जरूर लाऊँगा… वही हुआ।
निस्संदेह बहादुर की वजह से सबको खूब आराम मिल रहा था। घर खूब साफ और चिकना रहता। कपड़े चमाचम सफेद। निर्मला की तबीयत भी काफी सुधर गई। अब कोई एक खर भी न टकसाता था। किसी को मामूली-से-मामूली काम करना होता तो वह बहादुर को आवाज देता। ‘बहादुर, एक गिलास पानी।’ ‘बहादुर पेन्सिल नीचे गिरी है, उठाना।’ इसी तरह की फरमाइशें! बहादुर घर में फिरकी की तरह नाचता रहता। सभी रात में पहले ही सो जाते थे और सबेरे आठ बजे के पहले न उठते थे।
मेरा बड़ा लड़का किशोर काफी शान-शौकत और रोब-दाब से रहने का कायल था और उसने बहादुर को अपने कड़े अनुशासन में रखने की आवश्यकता महसूस कर ली थी। फलतः उसने अपने सभी काम बहादुर को सौंप दिए। सबेरे उसके जूते में पालिश लगनी चाहिए। कालेज जाने के ठीक पहले साइकिल की सफाई जरूरी थी। रोज ही उसके कपड़ों की धुलाई और इत्री होनी चाहिए। और रात में सोते समय वह नित्य बहादुर से अपने शरीर की मालिश कराता और मुक्की भी लगवाता। पर इतनी सारी फरमाइशों की पूर्ति में कभी-कभी कोई गड़बड़ी भी हो जाती। जब ऐसा होता, किशोर गर्जन-तर्जन करने लगता, उसको बुरी-बुरी गालियाँ देता और उस पर हाथ छोड़ देता। मार खाकर बहादुर एक कोने में खड़ा हो जाता – चुपचाप।
‘देख बे’, किशोर चेतावनी देता – ‘मेरा काम सबसे पहले होना चाहिए। अगर एक काम भी छूटा तो मारते-मारते हुलिया टाइट कर दूँगा। साला, कामचोर, करता क्या है तू? बैठा-बैठा खाता है।’
रोज ही कोई-कोई ऐसी बात होने लगी, जिसकी रिपोर्ट पत्नी मुझे देती थी। मैंने किशोर को मना किया, पर वह नहीं माना तो मैंने यह सोचकर छोड़ दिया कि थोड़ा-बहुत तो यह चलता ही रहता है। फिर एक हाथ से ताली कहाँ बजती है? बहादुर भी बदमाशी करता होगा। पर एक दिन जब मैं दफ्तर से आया तो मैंने किशोर को एक डंडे से बहादुर की पिटाई करते हुए देखा। निर्मला कुछ दूरी पर खड़ी होकर ‘हाँ-हाँ’ कहती हुई मना कर रही थी।
मैंने किशोर को डाँट कर अलग किया। कारण यह था कि शाम को साइकिल की सफाई करना बहादुर भूल गया था। किशोर ने उसको मारा तथा गालियाँ दीं तो उसने उसका काम करने से ही इनकार कर दिया।

‘तुम साइकिल साफ क्यों नहीं करते?’ मैंने उससे कड़ाई से पूछा।

‘बाबूजी, भैया ने मेरे बाप को क्यों लाकर खड़ा किया?’ वह रोते हुए बोला।
मैं जानता था कि किशोर उसको और भी भद्दी गालियाँ देता था, लेकिन आज उसने ‘सूअर का बच्चा’ कहा था, जो उसे बरदाश्त न हुआ। निस्संदेह वह गाली उसके बाप पर पड़ती थी। मुझे कुछ हँसी आ गई। खैर, किशोर के व्यवहार को अच्छा नहीं कहा जा सकता, पर गृहस्वामी होने के कारण मुझ पर कुछ और गंभीर दायित्व भी थे।
मैंने उसे समझाया – ‘बहादुर, ये आदतें ठीक नहीं। तुम ठीक से काम करोगे तो तुमको कोई कुछ भी नहीं कहेगा। मेहनत बहुत अच्छी चीज है, जो उससे बचने की कोशिश करता है, वह कुछ भी नहीं कर सकता। रूठना-फूलना मुझे सख्त नापसंद है। तुम तो घर के लड़के की तरह हो। घर के लड़के मार नहीं खाते? हम तुमको जिस सुख-आराम से रखते हैं, वह कोई क्या रखेगा? जाकर दूसरे घरों में देखो तो पता लगे। नौकर-चाकर भर पेट भोजन के लिए तरसते रहते हैं। चलो, सब खत्म हुआ, अब काम-धाम करो…’
वह चुपचाप सुनता रहा। फिर हाथ-मुँह धोकर काम करने लगा। जल्दी वह प्रसन्न भी हो गया। रात में सोते समय वह अपनी टोपी पहन कर देर तक गाता रहा।
लेकिन कुछ दिनों बाद एक और भी गड़बड़ी शुरू हुई। निर्मला बहुत पतली-पतली रोटियाँ सेंकती थी, इसलिए वह रोटी बनाने का काम कभी बहादुर से नहीं लेती थी, लेकिन मुहल्ले की किसी औरत ने उसे यह सिखा दिया कि परिवार के लिए रोटियाँ बनाने के बाद वह बहादुर से कहे कि वह अपनी रोटी खुद बना लिया करे, नहीं तो नौकर-चाकर की आदत खराब हो जाती है, महीन खाने से उनकी आदत बिगड़ जाती है।
यह बात निर्मला को जँच गई थी और रात में उसने ऐसा ही प्रयोग किया। वह अपनी रोटियाँ बनाकर चौके में से उठ गई। बहादुर का मुँह उतर गया। वह चूल्हे के पास सिर झुकाकर चुपचाप खड़ा रहा।
‘क्या हो गया, रे?’ निर्मला ने पूछा।

वह कुछ नहीं बोला।

‘चल, चुपचाप बना अपनी रोटियाँ। तू सोचता है कि मैं तुझे पतली-पतली, नरम-नरम रोटियाँ सेंककर खिलाऊँगी? तू कोई घर का लड़का है? नौकर-चाकर तो अपना बनाकर खाते ही रहते हैं। तीता तो इनको इसलिए लग रहा है कि सारे घर के लिए मैंने रोटियाँ बनाईं, इनको अलग करके इनके साथ भेद क्यों किया? वाह रे, इसके पेट में तो लंबी दाढ़ी है! समझ जा, रोटियाँ नहीं सेंकेगा तो भूखा रहेगा।’
पर बहादुर उसी तरह खड़ा रहा तो निर्मला का गुस्से से बुरा हाल हो गया। उसने लपककर उसके गाल पर दो-तीन थप्पड़ जड़ दिए – ‘सूअर कहीं के! इसीलिए तुझे किशोर मारता है। इसी वजह से तेरी माँ भी मारती होगी। चल, बना रोटी…’
‘मैं नहीं बनाऊँगा… मेरी माँ भी सारे घर की रोटियाँ बनाकर मुझसे रोटी सेंकवाती थी।’ वह रोने लगा था।
‘तो क्या मैं तेरी माँ हूँ कि तू मुझसे जिद कर रहा है? घर के लड़कों के बराबर बन रहा है? मारते-मारते मुँह रँग दूँगी।’
पर उसने अपने लिए रोटी नहीं बनाई। मुझे भी बड़ा गुस्सा आया। मैंने उसको डाँटा और समझाया। पर वह नहीं माना। रात भर वह भूखा ही रहा।
पर सबेरे उठकर वह पहले की तरह ही हँसने लगा। उसने अँगीठी जला कर अपने लिए रोटियाँ सेंकी। अपनी बनाई मोटी और भद्दी रोटियों को देखकर वह खिलखिलाने लगा। फिर रात की बची हुई सब्जी से उसने खाना खा लिया।
लेकिन निर्मला का भी हाथ खुल गया था। वह उससे कुछ चिढ़ भी गई थी। अब बहादुर से कोई भी गलती होती तो वह उस पर हाथ चला देती। उसको मारने वाले अब घर में दो व्यक्ति हो गए थे और कभी-कभी एक गलती के लिए उसको दोनों मारते।
बरसात बीत गई थी। आकाश दर्पण की तरह स्वच्छ दिखाई देता। मैंने बहादुर की माँ के पास चिट्ठी लिखी थी कि उसका लड़का मेरे पास मजे में है और मैं उसकी तनख्वाह के पैसे उसके पास भेज दिया करूँगा, लेकिन कई महीने के बाद भी उधर से कोई जवाब नहीं आया था। मैंने बहादुर से कह दिया था कि उसका पैसा यहाँ जमा रहेगा, जब वह घर जाएगा तो लेता जाएगा।

पर अब बहादुर से भूल-गलतियाँ अधिक होने लगी थीं। शायद इसका कारण मारपीट और गाली-गलौज हो। मैं कभी-कभी इसको रोकना चाहता, फिर यह सोचकर चुप लगा जाता कि नौकर-चाकर तो मार-पीट खाते ही रहते हैं।

एक दिन रविवार को मेरी पत्नी के एक रिश्तेदार आए। वह बीवी-बच्चों के साथ थे। वह अपने किसी खास संबंधी के यहाँ आए थे तो यहाँ भी भेंट-मुलाकात करने के लिए चले आए थे। घर में बड़ी चहल-पहल मच गई। मैं बाजार से रोहू मछली और देहरादूनी चावल ले आया। नाश्ता-पानी के बाद बातों की जलेबी छनने लगी। पर इसी समय एक घटना हो गई।
अचानक उस रिश्तेदार की पत्नी नीचे फर्श पर झुककर देखने लगी। फिर उन्होंने चारपाई के अंदर झाँककर देखा। अंत में कमरे के अंदर गईं और फर्श पर पड़े हुए कागजों को उठाकर जाँच-पड़ताल करने लगीं।

‘क्या बात है?’ मैंने पूछा।
रिश्तेदार की पत्नी जबरदस्ती मुस्कराकर मजबूरी में सिर हिलाते हुए बोली – ‘क्या बताएँ… ग्यारह रुपये साड़ी के खूँट से निकालकर यहीं चारपाई पर रखे… पर वे मिल नहीं रहे हैं…’
‘आपको ठीक याद है न…’
‘हाँ-हाँ खूब अच्छी तरह याद है। ये रुपये मैंने खूँट में बाँधकर रखे थे… रिक्शेवाले को देने के लिए खूँट खोला ही था, फिर वे रुपये चारपाई पर रख दिए थे कि चार रुपये की मिठाई मँगा लूँगी और कुछ बच्चों के हाथ पर रख दूँगी। रास्ते में कोई ढंग की दुकान नहीं मिली थी, नहीं तो उधर से ही लाती। किसी के यहाँ खाली-हाथ जाने में अच्छा भी नहीं लगता। बताइए, अब तो मैं कहीं की न रही – फिर मेरी ओर झुककर धीमे स्वर में कहा था – जरा उससे पूछिए न! वह इधर आया था। कुछ देर तक वह यहाँ खड़ा रहा, फिर तेजी से बाहर चला गया था।
‘अरे नहीं, वो ऐसा नहीं है’, मैंने कहा।

‘यू डू नाट नो दीज पीपुल आर एक्सपर्ट इन दिस आर्ट’ रिश्तेदार ने कहा। मैंने बहादुर की ओर तिरछी दृष्टि से देखा। वह सिर झुका कर आटा गूँथ रहा था। उसके चेहरे पर संतुष्टि एवं प्रफुल्लता थी। उसने ऐसा काम तो कभी नहीं किया, बल्कि जब कभी उसने दो-चार आने इधर-उधर पड़े देखे तो उठाकर निर्मला के हाथ में दे दिए थे। पर किसी के दिल की बात कोई कैसे जान सकता है? न मालूम अचानक मुझे क्या हो गया और मैं गुस्से में आ गया।
‘बहादुर!’ – मैंने कड़े स्वर में कहा।

‘जी, बाबू जी।’

‘इधर आओ।’

वह आकर खड़ा हो गया।

‘तुमने यहाँ से रुपये उठाए थे?’

‘जी नहीं, बाबूजी’, उसने निर्भय उत्तर दिया।

‘ठीक बताओ… मैं बुरा नहीं मानूँगा।’

‘नहीं बाबूजी। मैं लेता तो बता देता।’

‘तुम यहाँ खड़े नहीं थे?’ – रिश्तेदार की पत्नी ने कहा ‘फिर तेजी से बाहर चले गए थे। देखो भैया, सच-सच बता दो। मिठाई खरीदने और बच्चों को देने के लिए ये रुपये रखे थे। मैं तो बुरी फँसी। अब वापस जाने के लिए रिक्शे के भी पैसे नहीं।’

‘मैं तो बाहर नमक लेने गया था।’

‘सच-सच बता बहादुर! अगर नहीं बताएगा तो बहुत पीटूँगा और पुलिस के सुपुर्द कर दूँगा।’ मैं चिल्ला पड़ा।

‘मैंने नहीं लिया, बाबूजी।’ – बहादुर का मुँह काला पड़ गया था।
पता नहीं मुझे क्या हो गया। मैंने सहसा उछलकर उसके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया। मैं आशा कर रहा था कि ऐसा करने से वह बता देगा। तमाचा खाकर वह गिरते-गिरते बचा। उसकी आँखों से आँसू गिरने लगा।
‘मैंने नहीं लिया…’
इसी समय रिश्तेदार साहब ने एक अजीब हरकत की – ‘अच्छा छोड़िए, इसको पुलिस के पास ले जाता हूँ।’ इतना कहकर उन्होंने बहादुर का हाथ पकड़ लिया और उसको दरवाजे की ओर घसीटकर ले गए। पर दरवाजे के पास उससे धीरे-से बोले – ‘देखो, तुम मुझे बता दो… मैं कुछ नहीं करूँगा, बल्कि तुमको इनाम में दो रुपये दे दूँगा।’
पर बहादुर ने इनकार कर दिया। इसके बाद रिश्तेदार साहब दो-तीन बार उसको दरवाजे की ओर खींचकर ले गए, जैसे पुलिस को देने ही जा रहे हैं। लेकिन आगे बढ़कर वह रुक जाते और उससे धीमे-धीमे शब्दों में पूछ-ताछ करने लगते।
अंत में हारकर उन्होंने उसको छोड़ दिया और वापस आकर चारपाई पर बैठते हुए हँसकर बोले – ‘जाने दीजिए… ये सब बड़े घाघ होते हैं। किसी झाड़ी-वाड़ी में छिपा आया होगा या जमीन में गाड़ आया होगा। मैं तो इन सबों को खूब जानता हूँ। भालू-बंदर से कम थोड़े होते हैं ये। चलिए, इतना नुकसान लिखा था।’

इसके बाद निर्मला ने भी उसको डराया-धमकाया और दो-चार तमाचे जड़ दिए, पर वह ‘नहीं-नहीं’ करता रहा।
इस घटना के बाद बहादुर काफी डाँट-मार खाने लगा। घर के सभी लोग उसको कुत्ते की तरह दुरदुराया करते। किशोर तो जैसे उसकी जान के पीछे पड़ गया था। वह उदास रहने लगा और काम में लापरवाही करने लगा।
एक दिन मैं दफ्तर से विलंब से आया। निर्मला आँगन में चुपचाप सिर पर हाथ रखकर बैठी थी। अन्य लड़कों का पता नहीं था, लेकिन लड़की अपनी माँ के पास खड़ी थी। अँगीठी अभी नहीं जली थी। आँगन गंदा पड़ा था। बर्तन बिना मले हुए रखे थे। सारा घर जैसे काट रहा था।

‘क्या बात है?’ मैंने पूछा।

‘बहादुर भाग गया।’

‘भाग गया। क्यों?’

‘पता नहीं। आज तो कुछ हुआ भी नहीं था। सबेरे से ही बड़ा प्रसन्न था। हमेशा माताजी माताजी, किए रहा। दोपहर में खाना खाया। उसके बाद आँगन से सिल-बट्टा लेकर बरामदे में रखने जा रहा था कि सिल हाथ से छूटकर गिर गई और दो टुकड़े हो गई। शायद इसी डर से वह भाग गया कि लोग मारेंगे। पर मैं इसके लिए उसको थोड़े कुछ कहती? क्या बताऊँ, मेरी किस्मत में आराम ही नहीं…’
‘कुछ ले गया?’
‘यही तो अफसोस है। कोई भी सामान नहीं ले गया है। उसके कपड़े, उसका बिस्तर, उसके जूते – सभी छोड़ गया है। पता नहीं उसने हमें क्या समझा? अगर वह कहता तो मैं उसे रोकती थोड़े? बल्कि उसको खूब अच्छी तरह पहना-ओढ़ाकर भेजती, हाथ में उसकी तनख्वाह के रुपये रख देती। दो-चार रुपये और अधिक दे देती। पर वह तो कुछ ले ही नहीं गया…’
‘और वे ग्यारह रुपये?’
‘अरे वह सब झूठ है। मैं तो पहले ही जानती थी कि वे लोग बच्चों को कुछ देना नहीं चाहते, इसलिए अपनी गलती और लाज छिपाने के लिए यह प्रपंच रच रहे हैं। उन लोगों को क्या मैं जानती नहीं? कभी उनके रुपये रास्ते में गुम हो जाते हैं… कभी वे गलती से घर ही छोड़ आते हैं। मेरे कलेजे में तो जैसे कुछ हौड़ रहा है। किशोर को भी बड़ा अफसोस है। उसने सारा शहर छान मारा, पर बहादुर नहीं मिला। किशोर आकर कहने लगा – ‘अम्माँ, एक बार भी अगर बहादुर आ जाता तो मैं उसको पकड़ लेता और कभी जाने न देता। उससे माफी माँग लेता और कभी नहीं मारता। सच, अब ऐसा नौकर कभी नहीं मिलेगा। कितना आराम दे गया है वह। अगर वह कुछ चुराकर ले गया होता तो संतोष हो जाता…’
निर्मला आँखों पर आँचल रखकर रोने लगी। मुझे बड़ा क्रोध आया। मैं चिल्लाना चाहता था पर भीतर-ही-भीतर मेरा कलेजा जैसे बैठ रहा हो। मैं वहीं चारपाई पर सिर झुका कर बैठ गया। मुझे एक अजीब-सी लघुता का अनुभव हो रहा था। यदि मैं न मारता तो शायद वह न जाता।
मैंने आँगन में नजर दौड़ाई। एक ओर स्टूल पर उसका बिस्तर रखा था। अलगनी पर उसके कुछ कपड़े टँगे थे। स्टूल के नीचे वह भूरा जूता था, जो मेरे साले साहब के लड़के का था। मैं उठकर अलगनी के पास गया और उसके नेकर की जेब में हाथ डालकर उसके सामान निकालने लगा – वही गोलियाँ, पुराने ताश की गड्डी, खूबसूरत पत्थर, ब्लेड, कागज की नावें…

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