हिंदसा

रविवार, 24 दिसंबर 2017

पुरस्कार (कहानी) की समीक्षा

  •  पुरस्कार कहानी
 श्री जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य की उन विभूतियों में से हैं जिनकी बहुमुखी प्रतिभा ने साहित्य के विविध क्षेत्रों की वृद्धि में समान रूप से योगदान दिया है कवि नाटककार निबंधकार और कहानीकार सभी रूपों में उन्होंने अपने अद्भुत साहित्य कौशल का परिचय दिया है।
 प्रसाद जी ने अधिकांशतः ऐतिहासिक वातावरण प्रधान कहानियों की रचना की है। प्रसाद की प्रथम कहानी ग्राम 1911 में इंदु पत्रिका में प्रकाशित हुई थी ।  उन्होंने लगभग 70 कहानियों की रचना की। पुरस्कार नामक कहानी की गणना उनकी अमर कहानियों में की गई है। जिसमें उन्होंने प्रेम के आदर्श और कर्तव्य भावना का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत कहानी में एक और प्रणय और अनुराग है तो दूसरी ओर कुल गौरव तथा राष्ट्र हित रक्षा। दूसरे शब्दों  में भावना और कर्तव्य के गहने द्वंद की कहानी है।
तात्विक दृष्टि से यदि प्रस्तुत कहानी की समीक्षा करें तो कहा जा सकता है कि इसमें कहानी कला का उच्चतम रूप दिखाई देता है। यह कहानी कौशल प्रदेश की उर्वरा भूमि से संबंधित है। राष्ट्रीय नियम के अनुसार कौशल नरेश ने इस बार मधुलिका के खेत को वार्षिक कृषि उत्सव के लिए चुना और उसमें परंपरा अनुसार हल चलाकर बीज बोए। मधुलिका ने भूमि के मूल्य स्वरूप स्वर्ण मुद्राएं ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया। मगध के राजकुमार अरुण ने इस उत्सव को देखा और मधुलिका के सौंदर्य ने उसे अभिभूत कर दिया उसने मधुलिका से प्रेम निवेदन किया किंतु मधुलिका ने उसे निराश लौटा दिया 3 वर्षों तक मधुलिका दूसरों के खेतों में परिश्रम करती रही और दरिद्र जीवन व्यतीत करती रही अरुण के प्रति उसके हृदय में भी राग आत्मक भाव उत्पन्न हो गया था एक दिन शीतकाल की रात्रि में राजकुमार अरुण पुन: उसकी पर्ण कुटीर में आश्रय मांगने आता है। इस बार वह मगध से विद्रोही होने पर निष्कासित होकर आया था। अरुण की महत्वाकांक्षा जागृत हो गई और मधुलिका को अपनी ओर आकर्षित जान कर उसने योजना भी बना डाली।
 मधुलिका ने अपने खेत के बदले कौशल नरेश से दुर्ग के पास जंगली भूमि प्राप्त कर ली जिससे अरुण के लिए दुर्ग पर आक्रमण करके उसे जीत लेना सरल हो गया किंतु मधुलिका के अंत:मन में प्रेम तथा कर्तव्य में संघर्ष होने लगा कर्तव्य की भावना की विजय हुई और उसने आक्रमण से पूर्व ही सेनापति तथा कौशल नरेश को समस्त सूचना दे दी जिससे अरुण की योजना असफल रही अरुण को प्राण दंड देने की घोषणा हुई मधुलिका से जब पुरस्कार मांगने को कहा गया तब उसने कहा मुझे भी अरुण के साथ मृत्यु दंड मिले
कथानक-
 पुरस्कार कहानी का कथानक संक्षिप्त है। कहानी की सारी घटनाएं तीन या चार वर्ष के अंतराल में सिमटी हुई है प्रत्येक घटना कुतूहल लिए हुई है। कहानी का आरंभ ही पाठक के हृदय में जिज्ञासा उत्पन्न कर देता है कि अब क्या होगा? मधुलिका अपने जीवन में एकाकी है। नियमानुसार उसके खेत पर भी राजा का अधिकार हो जाता है। वह अरुण जैसे समृद्ध और सुंदर युवक की प्रेम याचना को भी ठुकरा देती है । ऐसी स्थिति में पाठक कुतूहल मग्न होकर आगे आने वाली घटनाओं का अनुमान लगाता हुआ आगे बढ़ता है। मधुलिका और अरुण की पुन: भेट कहानी का मध्य भाग है फिर धीरे-धीरे कहानी चरम सीमा की ओर बढ़ती है। कहानी की चरम सीमा वह है जब मधुलिका राजा से पुरस्कार के रूप में अरुण के साथ स्वयं को भी मृत्युदंड दिए जाने की इच्छा प्रकट करती है। इस प्रकार रोचकता आदि से अंत तक बनी हुई है।
 प्रसाद की कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि उनमें घटनाएं काल्पनिक होते हुए भी ऐतिहासिक सी लगती है। पुरस्कार कहानी को भी उन्होंने मगध, कौशल आदि राज्यों के नाम और पुराने समय की परंपराओं का उल्लेख करके कहानी को ऐतिहासिक  रंगत प्रदान की है। इससे कथावस्तु विश्वसनीय और स्वाभाविक बन गई है सभी घटनाएं परस्पर श्रंखला की भांति जुड़ी हुई है इसी कारण सुगठिता का गुण भी विद्यमान है।
 पात्र एवं चरित्र चित्रण-
 किसी भी कहानी की सफलता इसी में है कि पात्र अल्प हों तथा उनका चित्रण सजीव हो। प्रसाद जी ने चरित्र का निर्माण अनुभूति, कल्पना और आदर्श के समन्वय से किया है। प्रस्तुत कहानी के प्रमुख दो पात्र हैं- मधुलिका और अरुण। राजा, मंत्री, सेनापति, सैनिक और नगरवासी आदि अनेक गौण पात्र हैं। इन पात्रों की योजना मधुलिका के चरित्र को अधिक विकसित करने के लिए की गई है। मधुलिका का चरित्र इस कहानी का मूल केंद्र है उसका सौंदर्य अपार है, अप्रतिम है। निर्भीकता, स्पष्टवादिता, भावुकता उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएं हैं। मधुलिका के मन में जो प्रेम और कर्तव्य का अंतर्द्वंद दिखाया है उससे उसका व्यक्तित्व और भी महान और गरिमा युक्त हो उठा है।उसका अंतिम निर्णय उसे पाठक की सहानुभूति और श्रद्धा का पात्र बना देती है। राजकुमार अरुण का व्यक्तित्व भी प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त हुआ है। लेखक ने उसे एक वीर, प्रेमी तथा कूटनीतिज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया है।प्रसाद जी ने विभिन्न घटनाओं और पात्रों के संवादों के अतिरिक्त प्राकृतिक वातावरण द्वारा भी चरित्रों की अभिव्यक्ति की है। मधुलिका के एकाकी जीवन और मानसिक द्वंद्व को स्पष्ट करने के लिए लेखक ने वर्षा की तूफानी रात का वर्णन अत्यंत मर्मस्पर्शी ढंग से किया है।
 कथोकथन-
 संवादों के द्वारा ही कहानी की घटना क्रमश: आगे बढ़ती है। कहानी के संवाद सरल और संक्षिप्त होने चाहिए। प्रसाद जी ने विभिन्न स्थलों पर पात्रों के द्वारा अति संक्षिप्त कथोपकथनों की योजना की है यथा -
"भद्रे! तुम्हीं न कल के उत्सव की संचालिका रही हो?
 उत्सव! हां उत्सव ही तो था।" 
ये छोटे-छोटे संवाद मधुलिका और अरुण के चरित्र को स्पष्ट करने में सहायक हैं  यहाँ आगामी घटनाओं की ओर भी संकेत कर दिया है। मधुलिका और मंत्री का कथोपकथन भी स्वाभाविक और प्रभावशाली है। जैसे-
"मधुलिका ने सविनय कहा- "देव! यह मेरे पितृ पितामह की भूमि है। इसे बेचना अपराध है, इसलिए मूल्य स्वीकार करना मेरी सामर्थ्य के बाहर है।" मंत्री तीखे स्वर में कहता है- "अबोध! क्या बक रही है?  राजकीय अनुग्रह का तिरस्कार!"
 इस प्रकार कहानी में आए सभी कथोपकथन प्रभावशाली और साभिप्राय हैं। प्रसाद जी ने विभिन्न स्थलों पर पात्रों के मुख से अति संक्षिप्त किंतु मर्मपूर्ण कथन कहला कर कहानी को नाटकीयता प्रदान की है।
 देश काल और वातावरण
 पुरस्कार जयशंकर प्रसाद की एक ऐतिहासिक वातावरण प्रधान कहानी है। संकेतों द्वारा ही वातावरण के चित्रण में प्रसाद की कुशलता अभूतपूर्व है। वर्षा ऋतु के प्रारंभ शीतकाल की रजनी, प्रभात की सुषमा आदि का वर्णन चित्र की भांति साकार हो उठा है। जैसे- "प्रभात की हेम किरणों में अनुरंजित नन्ही- नन्ही  बूंदों का एक झोंका स्वर्ण मलिका के समान बरस पड़ा। 
या
शीतकाल की निस्तब्ध रजनी, कुहरे से धुली हुई चांदनी, हांड कँपा देने वाला समीर .....।
इस प्रकार प्रसाद प्राकृतिक वातावरण के चित्रण में अत्यंत सफल रहे हैं। 
प्रस्तुत कहानी में प्राचीन ढंग के राजतंत्र की कूटनीतियों और अन्य गतिविधियां यथार्थ रूप में अंकित हुई हैं। नगर-तोरण , चामरधारी सेवक, पुरोहित वर्ग का स्वस्त्ययन, इंद्रपुजन, रत्नकिरिट आदि अनायास ही भारत के अतीत की झलक हमारे सम्मुख प्रस्तुत कर देते हैं।
 इसके अतिरिक्त कहानी को ऐतिहासिक पुट देने हेतु पात्रों के नाम  तत्कालीन है जैसे मधुलिका अरुण अग्नि से प्रिय मित्र आदि 
भाषा शैली-
 प्रसाद जी केवल कहानीकार ही नहीं अपितु कवि, नाटककार और दार्शनिक भी थे।  उनकी अधिकतर रचनाओं की पृष्ठभूमि भी ऐतिहासिक है इसलिए उनमें संस्कृत तत्सम शब्दावली का प्रयोग भी बहुत मात्रा में मिलता है। प्रस्तुत कहानी में प्राचीन काल के वातावरण को सजीव बनाने के लिए लेखक ने अनायास ही संस्कृत निष्ठ शब्दावली का प्रयोग किया। अनुरंजित, निस्तब्ध, रजनी, ग्राम, पल्लव, निस्पंदन, चामरधारी आदि शब्द प्रसाद जी की संस्कृत म ।।।। के परिचायक हैं। परंतु भाषा की यह जटिलता पाठक को कहीं नहीं खटकती। क्योंकि ऐतिहासिक वातावरण को सजीवता प्रदान करने के लिए ऐसी ही भाषा की आवश्यकता थी। इनकी भाषा में कवित्व का पुट भी विद्यमान है। इसके कारण भी कहीं कहीं जटिलता आ गई है। कहानी का प्रारंभ भी कवित्व पूर्ण शैली से होता है। जैसे - आद्र नक्षत्र आकाश में काले काले बादलों की घुमड़, जिसमें द
दुदुम्भी का गंभीर घोष, विभिन्न अलंकारों के प्रयोग से भी शैली चमत्कारपूर्ण और प्रभावशाली बन पाई है 

यथा चील गाड़ी शिशु जैसे ब्राह्मण की संख्या में को पकड़ने के लिए हाथ लगाता है वैसे ही मन ही मन कह रही थी अभी वह निकल गया।
 प्रसाद जी के पास समर्थ शब्दों का विपुल भंडार है और थोड़े ही शब्दों द्वारा बहुत सा भाव प्रकट करने की उनमें
 अपूर्व शक्ति है
 उद्देश्य
पुरस्कार कहानी ऐसे समय मे  लिखी गई जब देश में राष्ट्रीय पुनर्जागरण की लहर तीव्र वेग से बह रही थी। ऐसे अवसर पर देश के अतीत का गौरव गान करना और राष्ट्रप्रेम की भावना जगाना प्रत्येक साहित्यकार अपना कर्तव्य समझता था। इस कहानी की रचना के मूल में भी प्रसाद जी का यही अभीष्ट था। प्राचीन भारतीय नरेशों का कृषि प्रेम, सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति उनकी आस्था, इस कहानी में स्पष्ट की गई है। कन्या का स्वाभिमान और  जमीन न बेचने का आदर्श भारत जैसे कृषि प्रधान देश के निवासियों के लिए प्रेरणा देने वाला है। इस कहानी का प्रधान उद्देश्य प्रेम और कर्तव्य के द्वंद्व को स्पष्ट करना है प्रसाद जी ने मधुलिका के चरित्र के माध्यम से नारी के कोमल , प्रेममय और बलिदानी व्यक्तित्व का चित्र प्रस्तुत किया है। इसी चरित्र के द्वारा राष्ट्र रक्षा के आदर्श की अभिव्यक्ति भी प्रभावशाली ढंग से हुई है। मधुलिका अपने जीवन के सर्वस्व, अरुण का त्याग कर सकती है, किंतु उसके द्वारा अपने राष्ट्र को परतंत्र बनाया जाना सहन नहीं कर सकती। उसके लिए देश प्रेम सर्वोपरि है, उसके बाद निजी प्रेम का स्थान है, यही इस कहानी का मूल उद्देश्य है।
नामकरण
 पुरस्कार कहानी का नामकरण भी सार्थक है। कहानी की नायिका मधुलिका को अंततः क्या पुरस्कार मिलता है इसी हेतु कहानी की रचना की गई है। सभी घटनाएं इसी से संबंधित हैं। अतः कहानी का नाम भी सार्थक है। वास्तव में पुरस्कार कहानी में प्रसाद जी की कहानी कला का उत्तम रूप दिखाई देता है। प्रसाद जी की कहानियों की सारी भक्ति और सुंदरता इसमें लक्षित है, भाषा का सौंदर्य, अलंकृत रूप, दृश्य विधान, सुकोमल, संस्कृत परियोजना की छटा भी इस कहानी में दर्शनीय है। कहानी का अंत भी प्रभावशाली और मार्मिक है। निसंदेह यह कहानी प्रसाद जी की ही नहीं अपितु हिंदी साहित्य जगत की एक श्रेष्ठ कहानी है।

शनिवार, 16 सितंबर 2017

रस का स्वरूप-2

रस का स्वरूप -2
आचार्य विश्वनाथ
उसके बाद रस का विशद विवेचन आचार्य विश्वनाथ ने किया| आचार्य विश्वनाथ से पूर्व ध्वनि वादी आचार्यों ने ध्वनि के अंदर ही रस को सम्मानित कर लिया था| विशेष रूप से अभिनव गुप्त ने |रस की स्वतंत्र सत्ता कम हो गई थी| और  ध्वनि के बीच ही उसको स्वीकार किया जाने लगा था किंतु आचार्य विश्वनाथ ने रस को एक अलग तरह से पुन: स्थापित करने का प्रयास किया और आचार्य विश्वनाथ के अनुसार उनकी रचना साहित्य दर्पण में वे लिखते हैं सहृदयों के ह्रदय में रति  आदि स्थाई भाव विभाव अनुभाव और संचारी भावों द्वारा अभिव्यक्त होकर रस स्वरूप को प्राप्त होते हैं और इसके पश्चात वे रस का स्वरूप कैसा है उसके लिए पूरा एक छंद देते हैं जिसमें वह स्पष्ट करते हैं इस तरह से उन्होंने रस का पूरा स्वरूप चित्रित किया है कि रस   अखंड , वह स्व प्रकाश, आनंद चिन्मय है , ब्रह्मा स्वाद सहोदरा है , लोकोत्तर चमत्कार प्राण है इसमें रस का पूरा स्वरूप स्पष्ट कर दिया गया है|

 सबसे पहले  रस सत्व का उद्रेक है  सांख्य दर्शन के अनुसार मनुष्य के सन्दर्भ में तीन गुण माने जाते हैं| प्रत्येक व्यक्ति में ये तीनों गुण
(सतोगुण, तमोगुण, रजोगुण|)कम या ज्यादा मात्रा में रहते हैं | किसी में सतोगुण की प्रधानता रहती है किसी में रजोगुण की प्रधानता होती है तो किसी में तमोगुण की प्रधानता होती है| पर जब काव्य रस या रसानुभूति की स्थिति होती है तो उस समय रजोगुण और तमोगुण तिरोहित हो जाते हैं अथवा वे पीछे हो जाते हैं और ऐसा होने पर सत्व गुण का उदय हो जाता है, जब वह अपने चरम पर पहुंच जाता है तभी रसअनुभूति होती है| तो रस को एक सात्विक अनुभूति माना है उसके बाद सहृदय साधारणीकरण की स्थिति में आ जाता है, साधारणीकरण के परिणाम स्वरुप ही रस की अनुभूति होती है, साधारणीकरण की स्थिति में सहृदय सभी प्रकार की राग द्वेषों से, मैत्री शत्रु भाव से, अपने पराए के भाव से मुक्त हो जाता है वह इन सब का अतिक्रमण कर जाता है और वह पूरी तरह से सत्व की स्थिति रहती है इसलिए विश्वनाथ कहते हैं कि सत्व का उद्रेक होने पर ही रस की प्राप्ति होती है तो इसलिए रस को स्त्वोद्रेक की स्थिति माना है
आचार्य विश्वनाथ में रस को अखंड माना है| रस में नाना प्रकार के भाव हैं, विभाव भी है, अनुभाव भी है, संचारी भाव भी है, स्थाई भाव भी है तो यहाँ एक प्रश्न यह उठता है कि क्या इन सब भावों की अनुभूति खंड खंड रूप में होती है, अर्थात क्या अलग अलग होती है क्योंकि विभाव, अनुभाव, संचारी और स्थाई भाव, इन सबका अस्तित्व अलग अलग है, उसके लिए आचार्य विश्वनाथ ने कहा है कि यह अनुभूति अखंड रूप में होती है| क्योंकि जब सामाजिक को रसानुभूति होती है तब विभाव, अनुभाव, संचारी और स्थाई भाव, इन सबका अस्तित्व अलग अलग नहीं रहता, अर्थात इन सब भावों की पृथक-पृथक अनुभूति में होकर समवेत रूप में अनुभूति होती है क्योंकि वह रसानुभूति में  परिणत हो जाता है, अर्थात रस में बदल जाता है और वह रसास्वाद एक अखंड अनुभव बन जाता है इसलिए रस को अखंड कहा गया है|
आचार्य विश्वनाथ ने तीसरी विशेषता बताते हुए कहा है कि रस स्वप्रकाश है | संसार में दो प्रकार की लौकिक वस्तुएं हैं -  एक जो स्वप्रकाशित हैं अर्जोथात जो वस्तुएं अपने प्रकाश से आप प्रकाशित हैं| जैसे सूर्य या दीपक का प्रकाश है| सूर्य को किसी अन्य प्रकाश की जरूरत नहीं होती है, वह स्वप्रकाश है पर जैसे घड़ा है, कपड़ा है, अर्थात घट- पट है, उनको प्रकाश दिखाने के लिए दीपक के प्रकाश की आवश्यकता है, वह ज्ञाप्य प्रकाश है, स्व प्रकाश नहीं है, क्योंकि दीपक जलाया जाएगा तो घड़ा दिखाई देगा, या सूर्य के प्रकाश में दिखाई देगा |अंधेरे में जो दिख नहीं रही थी वह प्रकाश होने पर दिखने लगती है| परंतु रस स्वप्रकाश है, सूर्य, दीपक आदि जिस प्रकार प्रकाश देते हैं, वैसे ही रस भी स्व प्रकाश है। इस स्थिति के ज्ञान के लिए किसी अन्य ज्ञान के साधन की अपेक्षा नहीं होती यह रसानुभूति बोध स्वरूप ही होती है |
रस आनंदमय है अर्थात आचार्य विश्वनाथ ने रस को पूर्णतया आनंदमय माना है लेकिन रामचंद्र और गुणचंद्र रस को सुख -दुखआत्मक मानते हैं| आचार्य रामचंद्र शुक्ल रस की अनुभूति को सुख-दुखआत्मक मानते हैं क्योंकि जो रस हैं जैसे- वीर रस, रोद्र, हास्य रस आदि, विद्वानों नेे इनमें से कुछ को सुखआत्मक माना है और कुछ को दुुखात्मक । हास्य रस,श्रृंगार रस सुखात्मआत्मक हैं। परंतु भयानक रस, रौद्र रस को सुखात्मक नहीं माना, इस पर आचार्यों ने माना कि जो वस्तु वीभत्स है या जिसको देखने से जूगुप्सा का भाव जागृत हो सकता है, उसको हम सुखआत्मक या आनदमय कैसे मान सकते हैं, वास्तव में जो लौकिक सुख-दुःख हैं अर्थात   जिन वस्तुओं को देखकर लोक में दुःख की अनुभूति होती है लोक में शोक की अनुभूति होती है, वही जब काव्य में आते हैं तब काव्य में एक विभावन (सोचना,अनुभूति ) नामक व्यापार की उत्पत्ति होती है और उसी व्यापार के कारण साधारणीकरण की स्थिति होती है और जो सामाजिक है, जो सहृदय है वह रस को पूरी तरह समर्पित हो जाता है, उसके मन में जो दुख का भाव है, जुगुप्सा या क्रोध आदि का भाव है, वह नहीं रहता | 
जैसेकि जब हम फिल्म देखने जाते हैं, उस दौरान पूरी फिल्म के कारुणिक दृश्यों को देखकर आंखों से आंसू बहने के उपरांत हम कहते हैं कि फिल्म बहुत अच्छी थी, इसका मतलब यह है कि जो काव्य का रस है या रसानुभूति है, वह दुखात्मक नहीं सुखात्मक ही होती है| वह भावों का उद्रेक करती है इसीलिए पाश्चात्य काव्यशास्त्र के विद्वान अरस्तु ने भी कामदी की अपेक्षा त्रासदी को ज्यादा  श्रेष्ठ माना है। यदि काव्य दुखात्मक माना जाता तो तो हमारे बहुत सारे काव्य दुखात्मक हो जाते, रामायण को भी हम दुखआत्म ही कहते क्योंकि रामायण का जन्म ही वाल्मीकि के शौक-श्लोक से हुआ है , भवभूति की रचना उत्तररामचरित  करूण रस परिपूर्ण है, किन्तु उसको पढ़कर कहीं दुःख की अनुभूति नहीं होती| तो इसलिए जब वह काव्य में परिणत हो जाता है तो रसानुभूति आनंदमय हो जाती है 
रस की अगली विशेषता है कि रस चिन्मय है संसार की सारी वस्तुए या तो जड़ रूप में है या चेतन रूप में है। जो चेतन रूप में हैं या चिन्मय रूप में हैं तो उसमेंं रस को चेतना की अनुभूति माना है। अर्थात वह चैतन्य अनुभूति है |इस चेतना की अनुभूति में इंद्रिय अनुभूति का अभाव होता है और चैतन्य आत्मा स्वाद का सद्भाव का भाव बना रहता है इसलिए रस को चिन्मय कहा गया है क्योंकि रसअनुभूति इंद्रिय जन्य अनुभूति से ऊपर है, इसलिए रस को लोकोत्तर चमत्कार प्राण कहा है।
रस वेद्यांतरस्पर्शशुन्य होता है इसमें वैद्य का अर्थ होता है- ज्ञान। जब सामाजिक सहृदय काव्यानुभूति से जुड़ता है तो उस समय उसे किसी अन्य वस्तु का , अन्य पदार्थ का ध्यान या ज्ञान नहीं रहता है जैसे नाटक देखते हुए सामाजिक पूरी तरह से नाटक से जुड़ जाता है फिल्म देखते हुए भी फिल्म से जुड़ जाता है वे देश काल की सीमा से परे हो जाता है, मित्रता - शत्रुता भाव से परे हो जाता है वह उस समय उसे किसी और ज्ञान की अनुभूति नहीं रहती है इसलिए रस को वेद्यांतरस्पर्शशुन्य कहा गया है |
आचार्य विश्वनाथ रस की एक और विशेषता बताते हुए कहते हैं कि रस ब्रह्मानंद स्वाद सहोदर है, रस के लिए शब्द परमात्मा भी चलता है अर्थात रस को परमात्मा भी कहा गया है और जो साधक ब्रह्म का आस्वादन है या ब्रह्म की अनुभूति को प्राप्त करते हैं या वे जिस अलौकिक आनंद का अनुभव करते हैं तो वहीं आनंद , वैसी ही अनुभूति काव्य रस से प्राप्त होती है| परंतु आचार्य विश्वनाथ ने इस अनुभूति को ब्रह्मानंद स्वाद न कहकर ब्रह्मानंद स्वाद सहोदर कहा है अर्थात उसके जैसी होती है वह उसके सहोदर के रूप में है, क्योंकि जो ब्रह्मास्वाद है, वह लौकिक नहीं है, अलौकिक है, वह नित्य है, हमेशा बना रहने वाला है अर्थात वह समाप्त होने वाला नहीं है, चिर आनंद स्वरूप है |परन्तु जो काव्यास्वाद है , काव्नुयाभूति है वह उस समय विशेष में, जब काव्य का आस्वादन कर रहे हैं, उस समय विशेष के लिए बनी रहती है| उससे पहले नहीं थी ,उसके बाद नहीं रहती, कुछ समय के बाद नहीं रहती, इसलिए नित्य ना होने के कारण उसे ब्रह्मा स्वाद के सहोदर कहा ब्रह्मा स्वाद नहीं | इस तरह से जो ब्रह्मानंद है,वह असंतृप्त रहता है, उसका लौकिक सुख-दुख से कोई मतलब नही रहता , ब्रह्मा स्वाद स्थाई होता है जबकि काव्यास्वाद या रसानुभूति जो है वह लौकिक विषयों से पूर्णतया असंतृप्त नहीं होती है| वह पूरी तरह से स्थाई नहीं होती है इसलिए वह ब्रह्मानंद स्वाद सहोदर है।
रस लोकोत्तर चमत्कार प्राण है- रस अलौकिक आनंद का विषय नहीं है वह लोक से ऊपर का है| यहाँ रस रस की लौकिकताऔर अलौकिकता को लेकर भी विवाद है कि रस लौकिक है या अलौकिक ? आचार्य विश्वनाथ रस को लोकोत्तर चमत्कार प्राण कहते हैं उनका मानना है कि जो काव्य रस की अनुभूति है वो लोक से ऊपर की है| जैसे हम स्वाद इंद्रि से या जीभ से जिन वस्तुओं का स्वाद लेते हैं , वह क्षणिक होती है, कुछ देर के लिए होती हैं| परंतु जो काव्य का रस है वह क्षणिक नहीं होता है| वह न सविकल्पक ज्ञान है न निर्विकल्प ज्ञान है ना प्रत्यक्ष है ना परोक्ष है ना कार्य है न ज्ञाप्य है तो इस तरह से रस को लोकोत्तर माना है|
क्योंकि जो अलौकिक वस्तुएं हैं वे या तो कार्य रूप रहेंगी जैसे घड़ा है उसको कुम्हार ने चाक की सहायता से लागों की सहायता के लिए बनाया है तो उसको बनाने का एक निमित्त है, कारण है वह किसी एक कारण से बना है या ज्ञाप्य रूप में रहेंगी अर्थात ये वस्तु तो है परंतु हमें दिखाई नहीं दे रही, घड़ा अंधेरे में रखा है वह हमें दिखाई नहीं दे रहा परंतु जैसे ही प्रकाश आया वह हमें दिखाई दे गया , यह ज्ञाप्य है और जो कार्य रूप वस्तुएं हैं वह कारण के समाप्त हो जाने पर भी बनी रहती हैं जैसे घड़ा - कुमार की मृत्यु हो जाने या चाक टूट जाने पर भी घड़ा बना रहेगा तो कारण के न रहने पर भी वह कार्य रूप में है| ऐसे ही जो ज्ञापन वस्तुएं हैं प्रकाश के न रहने पर वह दिखाई नहीं रही है लेकिन उनका अस्तित्व है| परंतु काव्य रस जो है वह न कार्य है, न ज्ञाप्य है क्योंकि विभाव अनुभाव संचारी भाव का संयोग जब होता है उससे पहले रस नहीं था काव्य रस की अनुभूति नहीं थी| इसलिए कार्य-कारण भाव भी नहीं कह सकते, इसको ज्ञाप्य भाव भी नहीं कह सकते| इसी तरह से जो संसार की वस्तुएं हैं वह नाम रूप जाति आदि से पहचानी जाती हैं तो वह सविकल्पक है रसानुभूति को हम सविकल्पक भी नहीं कह सकते और ब्रह्मांड की तरह से निर्विकल्पक भी नहीं कह सकते अतः वे न कार्य रूप है और न ज्ञाप्य है और इसी तरह से जो संसार के संबंध है, वह सुख दुख होते हैं किसी से हमारा मित्रता का संबंध है किसी के किसी के साथ शत्रुता का संबंध है किसी के साथ हमारा तटस्थ का संबंध है उदासीन संबंध शत्रुता का भाव है परंतु जब रसानुभूति होती है तब हम इन सभी संबंधों से ऊपर उठ जाते हैं, देश काल की स्थिति से भी ऊपर उठ जाते हैं
जैसे- काव्य का एक प्रसंग देखते हैं - दुष्यंत शकुंतला का प्रेम जब दिखाते हैं तो उसको देखकर या पढ़कर उनका सहृदय के भावों के साथ साधारणीकरण हो जाता है तब रस अनुभूति है इसलिए आचार्य विश्वनाथ ने उसे लोकोत्तर चमत्कार प्राण कहते हैं क्योंकि यहाँ अभिनेता और दर्शक का रति भाव अभिन्न है रसानुभूति में अंतर नहीं रह जाता है| रस अनुभूति के समय सहृदय पूरी तरह से रस के प्रति समर्पित हो जाता है ऐसी स्थिति में उसे अपने पृथक अस्तित्व का बोध ही नहीं रहता है| अर्थात उसका साधारणीकरण हो जाता है जैसे नाटक में या फिल्म में अभिनेता अभिनय कर रहा है तो उस अभिनेता के साथ सहृदय का एक साधारणीकरण हो जाता है उसमें जब सामाजिक अभिनेता के भाव की ही रसानुभूति करता है तब वह पूरी दूनिया को भूल जाता है वह अपने पराए के भेद से दूर हो जाता है , इसे ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लोक सामान्य भाव भूमि कहा है जहां व्यक्ति अपने-पराए का भेद भूल जाता है तथा वह स्वार्थमय संबंधों का अतिक्रमण कर मुक्तावस्था या रस दशा का अनुभव करने करता है, तो हृदय की जो मुक्तावस्था है, जो रस दशा है, जो सहृदय में और अभिनेता में अभिन्नत्व ला देती है, जो भी अभिनेता का सुख दुख है, वह सामाजिक का सुख दुख बन जाता है, वह उसके सुख में सुख का अनुभव करता है और उसके दुख में दुख का अनुभव करता है इस प्रकार से रस का आस्वादन किया जाता है| अत: इस प्रकार आचार्य विश्वनाथ ने रस के स्वरूप को स्पष्ट किया है|

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

मंत्र (कहानी) समीक्षा

                                                                                  मंत्र 
 प्रेमचंद हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों में से एक हैं |  हिंदी साहित्य में प्रेमचंद को कहानी सम्राट के नाम से विभूषित किया जाता है| उन्होंने लगभग 300 कहानियों की रचना की है| प्रेमचंद ने इस क्षेत्र में प्रवेश करते ही एक नए युग का प्रारंभ किया|   प्रेमचंद ने मानव जीवन के अनेक पहलुओं को आधार बनाकर ईदगाह, पंच-परमेश्वर, बूढी काकी, बेटो वाली विधवा, कफ़न आदि  अनेक मार्मिक कहानियों की रचना की है| उनकी 'मंत्र' नामक कहानी भी अत्यंत मार्मिक एवं प्रभावशाली कहानी है, दूसरी कहानियों की भांति इस कहानी में भी उन्होंने मानव स्वभाव का सजीव चित्रण  किया है | इस कहानी में प्रेमचंद बताना चाहते हैं कि ग्राम और नगर तथा स्वार्थ और सेवा में कितना अंतर है?

कथासार-
 मंत्र कहानी का प्रारंभ अत्यंत मर्मस्पर्शी घटना द्वारा होता है| कहानी का मुख्य पात्र भगत है, उसका सातवां और अंतिम पुत्र मृत्यु शैया पर है, वह स्थानीय डॉक्टर चड्ढा के पास अपने पुत्र के इलाज हेतु आता है लेकिन डॉ. चड्ढा का वह वक्त मरीजों के देखने का नहीं होता बल्कि मनोविनोद का होता है इसलिए वह उस समय  बच्चे को देखने से इंकार कर देता है| भगत डॉक्टर चड्ढा  से बहुत अनुनय-विनय करते हुए कहता है कि वे केवल एक नजर उसके पुत्र को देख भर ले, किंतु डॉ. चड्ढा अपने मनोविनोद  में कोई खलल नहीं डालना चाहता और उसका मनोविनोद एक गरीब के प्राणों से अधिक मूल्यवान है| भगत निराश होकर लौट आता है और उसी रात्रि उसका पुत्र प्राण त्याग देता है। 
                                       कथानक  का विकास डॉ. चड्ढा व उसके परिवार के परिचय द्वारा होता है, उनका पुत्र कैलाश, जो सर्पों के पालने में विशेष रुचि रखता है, अपने जन्मदिवस पर सांपों का प्रदर्शन करते हुए उन में से किसी एक क्रोधित सांप द्वारा डसा जाता है, कथानक की चरम स्थिति अत्यंत हृदयस्पर्शी तब बनती है जब  कैलाश के बचने की आशा टूट जाती है और डॉक्टर के घर में कोहराम मच जाता है| तभी भगत को इसकी सूचना मिलती है, उसके मन में अंतर्द्वंद होता है कि वह डॉक्टर के पुत्र के प्राण की रक्षा करें या उसे देखने से उसी प्रकार इंकार कर दे जैसे कि डॉक्टर ने उसके बेटे को देखने से इंकार किया था| अंततः उसकी कर्तव्य भावना जागृत होती है और वह मंत्र के प्रभाव से कैलाश के प्राण बचाता है। वह धन या सम्मान की तनिक भी इच्छा नहीं रखता और चुपचाप लौट जाता है,  इस प्रकार कहानी एक आदर्शवादी प्रभाव छोड़ती हुई समाप्त हो जाती है|  
                       मंत्र कहानी का कथानक यद्यपि अनेक वर्षों की अवधि में फैला हुआ है,  किंतु इसमें मुख्य घटनाएं दो - तीन हैं,  बूढ़े भगत का डॉक्टर चड्ढा के घर से निराश लौटना, कैलाश का सांप के काटने से मूर्छित होना और भगत द्वारा उसे बचाया जाना, ये घटनाएं भिन्न होते हुए भी एक विशेष भावना के सूत्र  से परस्पर जुड़ी हुई हैं , कथावस्तु में रोचकता आदि से अंत तक बनी रही है| प्रारंभ में बूढ़े भगत के पुत्र की मृत्यु हमारे मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न करती है कि अब क्या होगा? पुनः कैलाश द्वारा सांप का खेल दिखाए जाने पर पाठकों के मन में एक नया कुतूहल जागता है, सांप द्वारा कैलाश के डसे जाने पर कुतूहल और भी तीव्र हो जाता है, अंत में बूढ़े भगत की सह्रदयता सभी शंकाओं का समाधान कर देती है। 
पात्र तथा चरित्र चित्रण-
प्रेमचंद की कहानियां चरित्र प्रधान हैं। उनके पात्र यथार्थ जगत के हैं। वे अति मानव न होकर सामान्य मानव होते हैं। उनके पात्र यथार्थ से आदर्श की ओर बढ़ते हैं, सफल कहानी में पात्रों की संख्या अधिक नहीं होती। यद्यपि इस कहानी में अनेक पात्र जैसे- बूढा भगत, बुढ़िया, डॉ. चड्डा, उसकी पत्नी, कैलाश मृणालिनी, मित्रगण, चौकीदार आदि  हैं लेकिन भगत का चरित्र ही इस कहानी का प्राण है। शेष पात्रों के चरित्र तो बूढ़े के चरित्र को उज्ज्वल बनाने के लिए ही चित्रित किए गए हैं। सभी पात्रों का स्वभाव और व्यक्तित्व अपने आप में विलक्षण है। बूढा भगत सीमा से अधिक भावुक, सहृदय और कर्तव्यशील है। डॉक्टर चड्ढा समय की पाबंदी के सामने मनुष्य को भी भुला देता है। कैलाश एक आधुनिक युग का युवक होते हुए भी सांप पालने का विचित्र शौक रखता है। इस कहानी की यह प्रमुख विशेषता है कि सभी पात्रों का चरित्र विभिन्न घटनाओं, स्थितियों और संवादों द्वारा अपने आप ही स्वस्थ होता चला जाता है।
 कथोपकथन
 लेखक ने पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालने, कथानक को अग्रसर करने तथा एकरसता को मिटाकर उसमें सजीवता उत्पन्न करने के लिए संवादों की योजना की है। आरंभ में ही बूढ़े भगत और डॉक्टर चड्ढा का संवाद दोनों के स्वभाव के अंतर को स्पष्ट कर देता है-
 "डॉक्टर साहब ने चिक के अंदर से गरजकर कहा- "कौन है? क्या चाहता है?
बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा- "हजूर बड़ा गरीब आदमी हूं। मेरा लड़का कई दिन से.....
 डॉक्टर साहब ने सिगार जलाकर कहा-  "कल सवेरे आओ, कल सवेरे,  हम इस वक्त मरीज को नहीं देखते।
     इसी प्रकार मृणालिनी, कैलाश और उसके मित्रों का, बूढ़े और बुढ़िया का, आगंतुक और बूढ़े का, चौकीदार और बूढ़े,  के संवाद भी विशेष प्रभावशाली हैं। इन संवादों की स्वाभाविकता और संक्षिप्तता प्रशसनीय है तथा ये संवाद परिस्थितियों के अनुकूल हैं।
 देश काल और वातावरण 
वातावरण के चित्रण में प्रेमचंद कुशल हैं। 'मंत्र' कहानी हमारे समाज के ग्रामीण और शहरी वर्गों से संबंधित है तथा लेखक ने इन दोनों वर्गों का चित्रण पूरी सजगता से किया है| देहाती जीवन से प्रेमचंद का व्यक्तिगत और अंतरंग परिचय है। अतः वे वहां के यथार्थ जीवन की ऐसी झांकी प्रस्तुत करते हैं जिससे वहां का चित्र साकार होता है। उदाहरण के लिए "शहर से कई मील दूर एक छोटे से घर में एक बुड्ढा और बुढ़िया अंगीठी के सामने बैठे जाड़े की रात काट रहे थे। बूढ़ा नारियल पीता था और बीच-बीच में खाँसता, बुढ़िया दोनों घुटनों में सिर डाले आग की ओर ताक रही थी।"
  इसी प्रकार डॉक्टर चड्ढा के शहरी जीवन का भी यथार्थ वर्णन किया है। जैसे-  "संध्या का समय था। हरी-हरी घास पर कुर्सियां बिछी हुई थी। शहर के रईस और हुक्काम एक तरफ और कालेज के छात्र दूसरी तरफ बैठे भोजन कर रहे थे।"  यहां लेखक ने शहरी ढंग की पार्टी का वर्णन, समय, स्थान और साज-सज्जा सहित कर दिया है।
 भाषा शैली-
 प्रस्तुत कहानी वर्णनात्मक शैली में लिखी गई है। कहानी की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा प्रवाहमयी है। प्रेमचंद ने इसमें पात्रों एवं स्थिति के अनुकूल बोलचाल के व्यवहारिक शब्दों का प्रयोग किया है। गांव और शहर के लोग आपस की बातचीत में, जैसी भाषा बोलते हैं उसे बिना किसी बनावटीपन के इस कहानी में देख सकते हैं| खड़ी बोली के साथ साथ उर्दू-अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग किया गया है जैसे मिनट, मोटर, हजूर, मरज, सिंगार आदि। मुहावरों और लोकोक्तियों के सुरुचिपूर्ण प्रयोग द्वारा कहानी में सजीवता और प्रवाह आ गया है जैसे हजारों रुपए फूक चुकाना, अक्ल पर पत्थर पड़ गया था, नहीं वो ऐसा पागल नही हूँ कि जो मुझे काँटे बोवे उसके लिए फूल बोता फिरूँ। कहीँ कहीं अलंकारों का भी अनायास प्रयोग हो गया है- जैसे उसे मालूम हो रहा था उसकी कोई चीज खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए हैं, या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है आदि।
उद्देश्य-
प्रेमचंद की प्रत्येक कहानी किसी न किसी आदर्श को सामने उपस्थित करती है। इस कहानी के माध्यम से भी लेखक ने स्पष्ट किया है कि मानव की महानता मानव सेवा में है। प्रायः नगरों के गुणी और धनी लोग कठोर हो जाते हैं। वे गरीब और ग्रामीण लोगों की ओर ध्यान ही नहीं देते। उन्हें समय की पाबंदी, समय पर खेलना आदि मानवता से अधिक प्रिय हैं। इसके विपरीत दरिद्र, अभाव ग्रस्त और अनपड़ ग्रामीणों में मनुष्यता का उज्ज्वल प्रकाश सुरक्षित है। किसी मनुष्य के दुःख दर्द को सुनकर वे अनायास ही उसकी सहायता को तत्पर हो जाते हैं ईर्ष्या द्वेष अथवा प्रतिशोध की अग्नि भी उनकी मानवता के शीतल जल से शांत जाती है।
शीर्षक की सार्थकता-
कहानी का शीर्षक मंत्र संक्षिप्त, सार्थक एवं कहानी की मुख्य घटना से संबंधित है। वस्तुतः प्रेमचंद की 'मंत्र' कहानी एक श्रेष्ठ कहानी है। जिसमें मानव स्वभाव का यथार्थ चित्रण है। इस कहानी में प्रेमचंद की कहानी कला का उच्चतम रूप दिखाई देता है। 

सोमवार, 14 अगस्त 2017

रस का स्वरूप-1

  रस का स्वरूप-1
रस सिद्धांत कव्य शस्त्र का प्राचीनतम सिद्धांत है । काव्य शास्त्र में सर्वप्रथम चर्चा रस सिद्धान्त को लेकर ही हुई थी।जो रीतिकाल तक चलती रही। हम देखते हैं  कि भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में जो रस का विशद विवेचन किया है। यह विवेचन दृश्य काव्य के संदर्भ में किया गया है लेकिन आगे के आचार्यों ने विशेष रूप से ध्वनिवादी आचार्य आनंद वर्धन और अभिनव गुप्त ने रस को  दृश्य काव्य के साथ-साथ श्रव्य काव्य के साथ भी रस को जोड़ दिया। और इस तरह से काव्य के संदर्भ में भी रस की चर्चा होने लगी 

 हमें भरतमुनि से लेकर आधुनिक काल तक और यहां तक की पाश्चात्य काव्यशास्त्र में भी रस के स्वरूप  में परिवर्तन के साथ यह परंपरा मिलती है| चाहे वह प्राचीन काव्य शास्त्र हो चाहे आधुनिक कालीन शास्त्र हो,  फिर चाहे वह भावानुभूति की बात करते हो या काव्यानुभूति की बात करते हो तो वह प्रत्यक्ष रूप से या परोक्ष रूप से रस की चर्चा  ही कर रहे होते हैं। भरत मुनि ने पहले ही स्पष्ट रूप में कह दिया था कि रस के बिना काव्य में कुछ भी प्रयोजन संभव नहीं हो सकता।है इसलिए जहां काव्य की चर्चा होती है उसमें  रस का होना जरूरी हो जाता है।

रस के अर्थ, अभिप्राय और  रस का स्वरूप -

सबसे पहले  हम रस के अर्थ  पर बात करते हैं -सामान्य बोलचाल के अर्थ में भी और विशिष्ठ अर्थ में भी।   जब हम रस शब्द के अर्थ को आम बोलचाल में देखते हैं तो वैदिक काल से ही हमें रस शब्द मिलता है, यहाँ  जल के अर्थ में, द्रव के अर्थ में, वीर्य के अर्थ में मिलता है या सार, स्वाद, विष, मधुर, तिक्त आदि षडरस  सोमरस सुरा, शोणित,आयुर्वेद में पारद और परमात्मा के अर्थ में मिलता है। इसी तरह से वहाँ परमात्मा के पर्याय के रूप में भी रस शब्द का प्रचलन रहा है। 

तैत्तिरीयोपनिषद में  कहा गया है - रसो वै स:  अर्थात वह जो परमात्मा है वह रस रूप  है। 

 इस तरह से हम देखते हैं कि वैदिक काल से ही विभिन्न अर्थों में, विभिन्न प्रयोगों में रस शब्द प्रचलित रहा है। 
रस शब्द का प्रयोग हमें मुख्य रूप से दो रूपों में दिखाई देता है- 
 वस्तु रूप में
 जैसे जल है, कोई भी द्रव्य ,तरल पदार्थ हैं  उसके अर्थ में, पेय पदार्थ के लिए रस शब्द का प्रयोग मिलता है ,जैसे कह देते हैं गन्ने का रस, फलों का रस तो किसी का भी रस आदि 
 आस्वाद के रूप में- 
रसनेंद्रिय  के स्वाद के रूप में अर्थात  मुख से जो आस्वाद , आनंद लिया जाता है या  जिसका रसग्रहण किया जाता है उस रूप में, जैसे  मिठाई खाकर, , तीखा पदार्थ खाकर जो दिव्य रसास्वाद  प्राप्त हुआ उस रूप में। और विशेष रूप से मधुर रस के लिए, सोमरस के लिए रस शब्द का प्रयोग मिलता है। और आस्वाद के रूप में जो रस शब्द है वो तो मिलता ही है साथ में भौतिक आनंद के रूप में भी रस शब्द का प्रयोग मिलता है। जैसे भौतिक आनन्द के लिए हम शतरंज , ताश खेल रहे हैं,  उसको खेलते समय कहें कि बड़ा आनंद आ रहा है। संगीत सुनने में बड़ा आनंद आ रहा है कोई नाटक देखने में बड़ा आनंद आ रहा है, कहते हैं बड़ा रस आ रहा है। इस तरह से जो भौतिक और अलौकिक आनंद है उसके लिए भी रस शब्द का प्रयोग आम बोलचाल की भाषा में मिलता है। और केवल रसेंद्रियों  के संदर्भ में नही रस शब्द का प्रयोग नहीं मिलता, बल्कि अन्य इंद्रियों के आनंद के लिए भी रस शब्द का प्रयोग मिलता है। जैसे  श्रवनेद्रियों   के संदर्भ में - कानों से कोई मधुर संगीत सुनते हुए, गीत सुनते हैं कहते हैं कि बड़ा आनंद आ रहा है। इसी तरह से नाक से खुशबु,  अर्थात घ्राण इन्द्रियों,
 नेत्र  या चक्षु इन्द्रियों -आंखों से फूल  को देखकर कहते हैं कि बहुत सुंदर है, बड़ा अच्छा लग रहा है आंखों को आनंद मिल रहा है। त्वचा के  स्पर्श से - कोमल त्वचा को स्पर्श करते हैं तो कहते  हैं कि बड़ा रस मिल रहा है, बड़ा आनंद मिल रहा है,  इस तरह पंच इंद्रियों से जो रस का आस्वादन मिलता है उसको भी रस कहा जाता है।  

काव्य रस
काव्य रस की जब हम बात करते हैं तो काव्य रस और जो इंद्रिय जन्य रस है, उसमें अंतर है। जब काव्य रस की बात कही जाती है अर्थात जब हम किसी  कहानी, नाटक आदि विधाओं में रस की बात करते हैं तो वह उस लौकिक रस या आनंद से भिन्न होता है। यहाँ लौकिक और भौतिक वस्तुओं से प्राप्त इंद्रिय जन्य आनंद से भिन्न अनुभूति की बात की जाती है अर्थात इसको मानसिक आनंद के रूप में कहा गया है, यह जो मानसिक आनंद है, यह मानसिक आनंद लौकिक अनुभूति से भिन्न होता है ,और इस मानसिक आनंद के रूप में काव्य रस का सामान्य स्वरूप वैदिक काल में ही निर्मित हो गया था। और यह जो मानसिक आनंद है जिसे काव्य रस कहा गया है, इस मानसिक आनंद को लेकर या यह जो रसानुभूति होती है , यह आनंदानुभूति होती है, इसका स्वरूप कैसा माने ? यह लौकिक है या अलौकिक है, लोकोत्तर है या रसानुभूति है , वस्तु है या आत्म रूप है, इन सभी बिंदुओं पर काव्य शास्त्रियों ने अपने-अपने विचारों के अनुसार चिंतन किया हैऔर अपने ढंग से इस काव्य रस को परिभाषित करने का प्रयास किया है | सबसे पहला प्रयास भरतमुनि का मिलता है। 
नाट्यशास्त्र में उन्होंने लिखा है-   “विभावानु भाव व्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पति” आगे चलकर भरतमुनि के इसी  रस सूत्र को सभी काव्यशास्त्रियों ने अपने रस के विवेचन का   आधार बनाया है
भरतमुनि कहते हैं कि  विभाव् अनुभाव् और व्यभिचारी, इन के सहयोग से रस की निष्पत्ति होती है|  यहां पर शब्द आया है -विभाव अर्थात कारण , अनुभाव अर्थात कार्य, चेष्टा या व्यापार|  नायक या नायिका जो आश्रय हैं, उस रसाअनुभूति के बाद, कैसे उनकी चेष्टाएँ होती हैं, उनका  क्या कार्य व्यापार होता है, वह अनुभाव होगा और व्यभिचारी अर्थात संचारी भाव जो रसानुभूति  में सहायक कारण बनते हैं अर्थात उसको तेज करने में, उसको बढ़ाने में सहायक होते हैं | यहां स्थाई भाव की बात भरतमुनि नहीं कर रहे हैं|  यहाँ स्थाई भाव शब्द नहीं आया है| उन्होंने बस यहां पर इतना कहा कि विभाव् अनुभाव और व्यभिचारी के सहयोग से रस निष्पत्ति होती है| अब इस रस निष्पत्ति को लेकर आगे आने वाले आचार्य शंकुक , भट्ट  लोलट, भट्ट नायक और अभिनव गुप्त आदि ने विस्तार से चर्चा की है| भरत मुनि ने निम्न दो श्लोक से रस को समझाया  है
                         यथा हि नाना व्यंजनौषधिद्रव्यसंयोगादरसनिष्पत्ति

वे  कहते हैं कि जैसे अनेक प्रकार के व्यंजनों, औषधियों, द्रव्यों  के संयोग से एक रस की निष्पत्ति होती है| जब हम कोई पकवान बनाते है या  कोई भोज्य पदार्थ बनाते हैं तो उसमें हम अनेक व्यंजनों का संयोग करते हैं तो वह सारे पदार्थ मिलकर जो एक व्यंजन बनाते हैं, उससे हमें जो आस्वादन मिलता है, बस उसी प्रकार से नाना भावों के उपगम से अर्थात  नाना भावों के संयोग से काव्य रस की निष्पत्ति होती है| फिर इसी को आगे स्पष्ट करते हुए कहते हैं 
“यथा ही  गुड़आदिभिद्रव्यैव्यंजननैरोषधिभिश्च षाड़वादयो रसा   
निर्वत्यरन्ते, तथा   नाना भावोपगता अपि स्थायिनो भावा 
रसत्व माप्नुवन्तीती|” 
जो पहला  रस सूत्र था उसमें हमने कहा था कि वहां पर भरतमुनि  स्थाई भाव की चर्चा नहीं करते हैं ,अब इसमें स्थाई भाव की बात कर रहे हैं| वे कहते हैं कि स्थाई भाव ही रसत्व को प्राप्त करते हैं, इस बात को वे एक लौकिक दृष्टांत से समझाते हैं ….जैसे गुड़ आदि द्रव्यों से, व्यंजनों से, औषधियों से, षडरस  बनाते हैं, कटु, तिक्त, मधुर, लवन, कसाय आदि जो छ: प्रकार के रस जो बनते है या गुड़ आदि मिलाने से विभिन्न प्रकार के मसाले मिलाने से, जो छ:  रस बनते हैं, उसी प्रकार से नानाभावों के उपगत होने पर , भावों के उत्पन्न होने से जो हमारे स्थाई भाव हैं जैसे रति, हास, शोक आदि, जो हमारे मन के भीतर वासना के रूप में सुप्त अवस्था में रहते हैं,  वे ही इन भावों का संयोग पाकर रस रूप में परिणत होते हैं, अर्थात रसत्व को प्राप्त होते हैं | फिर भरतमुनि कहते हैं-
  रस इति क: पदार्थ: ? 
अर्थात रस् से  किस पदार्थ का कथन  किया जाता है ?       
 उच्यते --  आस्वाद्यत्वात
 अर्थात  आस्वाद्य  होने के कारण रस कहा जाता है|
भरतमुनि ने यहां पर जो  रस को आस्वाद्यत्वात कहा  तो परवर्ती काल में रस को आस्वाद्य रूप माना जाये या आस्वाद्यत्व  है, वह वस्तु रूप है या आत्म रूप है, तो यह भी काव्यशास्त्रियों के बीच  विवाद का विषय बना कि रस आस्वाद्य है या आस्वाद्यत्वात |
कथामास्वाद्यते रस: अर्थात रस का आस्वादन किस प्रकार किया जाये ?
इस पर भरत मुनि कहते है-
“यथा हि नानाव्यन्जन्संस्कृतमन्नं भुंजाना रसानास्वाद्यन्ति सुमनस पुरुषा हर्षादीश्चाधि गच्छन्ति, तथा नाना भावाभिनय व्यनिज्तान वागंगसत्वोपेतान स्थायिभावानास्वादयन्ति सुमनस: प्रेक्षका: हर्षादीश्चाधिगच्छन्ति|” 
अर्थात नाना  अर्थात अनेक प्रकार के  व्यंजनों से पकाए गए, तैयार किए गए भोजन या अन्न  का भोग करते हुए अन्न का आस्वादन करते हुए या अन्न  को खाते हुए, जो रस का आस्वादन प्राप्त करते हैं, और ऐसा आनंद कौन प्राप्त करते हैं- सुमनसा अर्थात अच्छे मन वाला या  स्वस्थ पुरुष, क्योंकि रोगी व्यक्ति के सामने कितना भी स्वादिष्ट भोजन रख दिया जाए वह उसका स्वाद नहीं दे सकता, इसलिए भरतमुनि ने कहा है कि जिस व्यक्ति की मानसिक और  शारीरिक अवस्था ठीक होगी या वह सुमन वाला स्वस्थ पुरुष यदि है तो वह अनेक व्यंजनों से पकाए गए व्यंजन का आस्वादन करके रसास्वादन कर सकता है या रस ले सकता है| स्वस्थ व्यक्ति ही  सुख की, हर्ष की और आनंद की अनुभूति कर सकता है| 
तथा उसी प्रकार से नाना भावों से  और अभिनयों से (यहां नाटक के संदर्भ में उन्होंने रस की विवेचना की है तो इसलिए वे अभिनय की बातें कर रहे हैं|) जो व्यंजित हुआ है | व्यंजित क्या हुआ है? वाक् से यानि मुख से आंगिक चेष्टाएँ और सात्विक चेष्टाओं से युक्त जो स्थाई भाव 
 है उनका आस्वादन करते हैं| कौन  करते हैं - सुमनसा माने स्वस्थ, दर्शकों के लिए प्रेक्षक  कहा है| जो संवेदनशील है, अर्थात जो रसास्वादन को करने में सक्षम है, तो ऐसे प्रेक्षक, ऐसे सामाजिक हैं वे ही   स्थई भावो से रस का आस्वादन करते हैं और उनको क्या प्राप्त होता है? हर्ष आदि को प्राप्त करते हैं| अब जब भरतमुनि ने हर्षादि  शब्द कहा तो हर्ष तो ख़ुशी के लिये आ गया और जो आदि कहा , आदि कहने से प्रवृत्ति काल के काव्य शास्त्रियों में यह चर्चा होने लगी कि रस सुख-दुखआत्मक है रस  की जो अनुभूति है वह सुख में भी होती है और दुख में भी होती है अतः यहां पर फिर 2 बिंदु विचार बिंदु उभर कर आते हैं कि रस पूर्णत: आनंदमय है या सुख दुख आत्मक है|  इस तरह से भरतमुनि में रस निष्पत्ति को लेकर विशद विवेचन किया है |
              भरतमुनि के बाद अभिनव गुप्त आए और उन्होंने रस को परिभाषित किया तो उनके अनुसार लोक व्यवहार में रति आदि भावों के जो कारण, कार्य और सहकार्य होते हैं, वे ही नाटय अथवा  काव्य में विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव कहे जाते हैं. जिनके लिए भरतमुनि ने भावा अनुभव व्यभिचारी कहा था उन्हीं को उसी को परिभाषित करते हुए अभिनव गुप्त ने कहा कि लोक व्यवहार में जिन्हें हम कारण कहते हैं, वही नाटय अथवा  काव्य में विभाव् कहलाते हैं| लोक व्यवहार में जिसे हम कार्य कहते हैं वहीं काव्यशास्त्र में अनुभव के नाम से जाने जाते हैं और जो सहकारी कारण है जो उस आनंद को बढ़ाने वाले हैं, वह सहकारी कारण ही काव्यशास्त्र में व्यभिचारी भाव कहे जाते हैं ,तो काव्य में निबध होने पर इनका  लौकिक स्वरूप नष्ट हो जाता है और वे अलौकिक रूप धारण कर लेते हैं| सामाजिक इन विभाव अनुभाव संचारी भावों का समवेत रूप से प्रत्यक्षीकरण करता है और यह प्रत्यक्षीकरण या चरवाना ही रस है| अब देखिए अभिनव और भरतमुनि के रस की परिभाषा में जो मूल अंतर आया है वह हम देखते हैं कि भरत मुनि ने कहा कि जो स्थाई भाव हैं  वे रसतत्व को प्राप्त करते हैं अभिनव गुप्त यहाँ परिवर्तन के साथ बात कर रहे हैं अभिनवगुप्त ने कहा कि जो विभाव अनुभाव और संचारी भावों का जो एक समवेत रूप है, उन तीनों के मिलने के बाद जो प्रत्यक्षीकरण होता है और वो प्रत्यक्षीकरण जो प्रेक्षक करता है, जो सामाजिक करता है उसको जो रसअनुभूति होती है जिस रस की अनुभूति को वे प्राप्त करते हैं वह अनुभूति या चरवाना  ही रस है , भरत मुनि की जो स्थाई भाव रसत्व को प्राप्त करते हैं उसके स्थान पर अभिनव गुप्त कह रहे हैं कि प्रेक्षक द्वारा जो प्रत्यक्षीकरण किया जाता है वह रस है और वे विभाव अनुभाव और संचारी भाव इनका समवेत रूप है तो अभिनव गुप्त के अनुसार स्थाई भाव आस्वाद का विषय होने से रस न होकर , उसकी प्राप्ति का साधन है| रस , स्मृति , अनुमान, प्रत्यक्ष, अनुभव आदि से भि,न्न अलौकिक होता है ,रस न कार्य है, न  ज्ञाप्य, न सविकल्पक ज्ञान है और न निर्विकल्पक ज्ञान है | रस चरवाना काल में सामाजिक का चित्, देश काल, निज, पर आदि सीमाओं से मुक्त हो जाता है तो रस पूर्णत: आत्म विश्रांति रूप होता है तो अभिनव गुप्त के अनुसार भावों की भूमिका में आत्म परामर्श होने से जो सम्मिलित विश्रांति होती है वही रस है| जो इस तरह से भरतमुनि के अनुसार और अभिनव गुप्त के अनुसार रस के अभिप्राय को लेकर हमने बात की 
अब हम बात करते हैं मम्मट की | मम्मट ने काव्य प्रकाश की रचना की और  भरतमुनि को देखते हुए रस का संक्षिप्त विवेचन किया है उनके अनुसार लोक में रति आदि रूप  स्थाई भावों के जो कारण, कार्य और सहकार्य होते हैं वे यदि काव्य, या नाटक में प्रयुक्त होते हैं तो क्रमशः विभाव अनुभाव और व्यभिचारी भाव कहलाते हैं तथा उन विभावादी से व्यक्त जो रति आदि  स्थाई भाव ही रस कहलाता है तो जो भरतमुनि मान रहे थे कि स्थाई भाव रस त्व को प्राप्त होता हैं तो वही बात मम्मट भी कहते हैं कि रति आदि स्थाई भाव ही रस कहलाता है पर आगे चलकर मम्मट ने अभिनव गुप्त की विचारधारा का ही  पल्लवन किया है| मम्मट का यह विवेचन अत्यंत प्रभावपूर्ण है|  
→ रस 2

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

सूरदास

सूरदास

सूरदास भक्ति काल की कृष्ण काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। अन्य भक्त कवियों की तरह ही सूरदास के जीवन के बारे में भी विद्वानों के अनेक मत हैं। अनेक विद्वानों ने सूरदास का जन्म संवत 1540 तथा देहावसान संवत् 1620 के आसपास माना है। सूर के जन्म स्थान को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉक्टर श्यामसुंदर दास सूरदास का जन्म स्थान आगरा के निकट 'रूनकता' गांव को मानते हैं| जबकि गोस्वामी हरिराय और डॉक्टर हरवंस लाल शर्मा सूरदास का जन्म स्थान पलवल के निकट 'सीही' नामक ग्राम को मानते हैं। सूर को कुछ विद्वानों ने ब्राह्मण माना है तो कुछ ने किसी और दूसरी जाति का बताया है। लेकिन जाति-पाति में विश्वास न रखने वाले सूर के भक्तों के सामने यह बात अधिक मायने नहीं रखती। सूरदास के अंधे होने को लेकर भी अनेक मत हैं। कुछ लोग सूरदास को जन्म से अंधा मानते हैं तो कुछ का मानना है कि सूरदास जन्म से अंधे नहीं थे बल्कि बाद में अंधे हो गए थे। सूरदास जिस पुष्टिमार्ग की परंपरा से आते हैं वह उन्हें जन्म से अंधा ही मानती है। सूरदास आरंभ में भगवत भक्ति में लीन रहा करते थे। चौरासी वैष्णव की वार्ता के अनुसार आचार्य वल्लभाचार्य ब्रज यात्रा के दौरान गौ घाट पर ठहरे थे, जहां सूरदास ने उनसे मुलाकात की और उनके सामने हरि के पद गाए, माना गया है कि तब वल्लभाचार्य ने उन्हें दीक्षा दी और सूरदास को भगवत लीला का गान करने को कहा। तब से सूरदास ने कृष्ण की लीला का गान करना आरंभ कर दिया।
सूरदास की रचनाओं की संख्या को लेकर भी विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। कुछ विद्वानों ने उनकी रचनाओं की संख्या 25 बताई है, परंतु सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी, उनकी इन तीन रचनाओं को प्रामाणिक रूप से सब ने स्वीकार किया है| इन तीन रचनाओं को उनके यश और गौरव का आधार माना गया है। सूरदास सबसे पहले भक्त कवि हैं बाद में कुछ और। उन्होंने भगवत लीला का गान करते हुए नवधा भक्ति के विभिन्न रूपों जैसे श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, वंदन इत्यादि का वर्णन किया है। सत्य और माधुर्य भाव की भक्ति का रूप भी हमें सूरदास में देखने को मिलता है। राधा और गोपियों का कृष्ण के प्रति एक निष्ठ अनुराग तो सूरसागर की एक मजबूत कड़ी है, सुर का वात्सल्य वर्णन हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। बालमन की अभिरुचियों, शिशु के सौंदर्य और एक माता के हृदय का जो मर्मस्पर्शी चित्र सूरदास ने बाल लीला में खींचा है वह हिंदी साहित्य में ही नहीं बल्कि अन्यत्र भी दुर्लभ है | सूर के वात्सल्य वर्णन में बाल सुलभ चेष्टाओं का अद्भुत चित्रण है एवं बाल मनोविज्ञान के दुर्लभ चित्र मौजूद हैं। जसोदा हरि पालनै झुलावै, मैया, कबहिं बढ़ेगी चोटी आदि पद सूरदास के प्रसिद्ध पद हैं। सूर का श्रृंगार वर्णन भी अत्यंत मनोहारी है।
सूरदास के काव्य में जितनी मधुरता और भावुकता है उतनी ही विविधता भी है। उनके विनय संबंधी पद ,बाल-लीला, और श्रृंगार के पद, वात्सल्य वर्णन कृष्ण काव्य धारा के साथ-साथ हिंदी साहित्य भी की अनमोल निधि है| सूरदास का भ्रमरगीत बेजोड़ है। सूर का काव्य भाव पक्ष के साथ-साथ कला पक्ष की दृष्टि से भी विशिष्ट है| उन्होंने अपने काव्य के लिए ब्रज भाषा को अपनाया। सूरसागर की भाषा ब्रजभाषा है। उन्होंने ब्रजभाषा की तद्भव शब्दावली का अधिक प्रयोग किया है| छंद और संगीत का अद्भुत समन्वय सूरदास के काव्य की अन्यतम विशेषता है| उन्होंने चौपाई, रोला, रूपमाला, हरिगीतिका आदि छंदों का भी अपने काव्य में प्रयोग किया है | चित्रण कला में इतने प्रवीण है कि उन्होंने कृष्ण की बाल लीलाओं, रूप छवि, मुरली माधुरी आदि के अनेक मनोहारी चित्र प्रस्तुत किए हैं| ऐसा चित्रण हिंदी साहित्य में विरल है|

सूरदास के पद

मैया मैं नहीं माखन ...............................................सिव बिरंची नहिं पायौ ||
शब्दार्थ:
सबै =सब, लपटायौ =लपेट देना, भजन=बर्तन, डारि=छोड़कर, सांटी =छड़ी, सिव=शिव , विरंचि=ब्रह्मा
प्रसंग :
प्रस्तुत पद महाकवि सूरदास के द्वारा रचित है। यह पद श्री कृष्ण की बाल-लीला से सम्बंधित है| श्री कृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की लीला सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है| माखन चोरी पर कृष्ण और यशोदा के आपसी संवाद से जुड़ा यह पद बाल मन का बेहद मार्मिक चित्र खींचता है| कान्हा को अपने ही घर में माखन चोरी करते यशोदा मैया ने देख लिया है ,लेकिन श्री कृष्ण बाल सुलभ बहाने बनाकर यह साबित करते हैं कि उन्होंने माखन चोरी नहीं की है| सूरदास जी ने श्री कृष्ण के वाक चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्य कहीं नहीं मिलता |
व्याख्या
गोविन्द यशोदा मैया ने कहते हैं कि हे माता! मैंने माखन नहीं खाया है, ये सब मेरे सखा हैं न ये मेरा मजाक उड़ाना चाहते हैं,और इन ग्वाल बालों ने जबरदस्ती मेरे मुख पर माखन लगा दिया है| कन्हैया फिर कहते हैं कि मैया तू ही देख , तूने यह माखन का मटका छींके पर रखकर कितना ऊंचा लटका रखा है? मेरे छोटे-छोटे हाथ भला उस छींके तक कैसे पहुंच सकते हैं? अर्थात मेरे छोटे-छोटे हाथ उस छींके पर रखे मटके को नहीं उतार सकते| यह कहकर कन्हैया ने मुख से लगा माखन पोंछा और एक दोना जिसमें माखन भरा था, बुद्धिमानी दिखाते हुए उसे अपने पीछे छिपा लिया| कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन में मुस्कुराने लगती है और संटी को एक तरफ फेंककर कन्हैया को अपने ह्रदय से लगा लेती हैं | गोविन्द ने अपने बाल-विनोद के आनंद से मैया यसोदा को मोहित कर लिया और अपनी भक्ति का प्रताप दिखा दिया| सूरदास जी कहते हैं कि यशोदा मैया को जिस सुख की प्राप्ति हुई है वह सुख शिव और ब्रह्मा को भी नसीब नहीं होता|
विशेष :
कृष्ण की बाल मन का सुन्दर चित्रण है
ब्रज भाषा का प्रयोग है
राग रामकली में बद्ध है
मैया मैं , बाल-बिनोद, मोद मन .....अनुप्रास अलंकार
2
उधो, मन ..................................................नहीं जगदीस |

शब्दार्थ:
हुतो = हुआ करता था, भए =हुए , अवराधै = आराधना करना, ईस= निर्गुण ब्रह्म, देही= शरीरधारी, बरिस = वर्ष, सखा= मित्र, जोग के ईस= योग के ज्ञाता |
प्रसंग:
प्रस्तुत पद भ्रमर- गीत प्रसंग का अंश है| श्री कृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियां अत्यधिक व्याकुल हो जाती हैं श्री कृष्ण उद्धव को गोपियों को समझाने के लिए मथुरा भेजते हैं| उद्धव जी गोपियों को योग अर्थात निर्गुण ब्रह्म का संदेश देने मथुरा से गोकुल आए हैं | उद्धव अनेक तरह से गोपियों को समझाते हैं लेकिन भोली-भाली गोपियां सहज भाव से अपने मन की विवशता बताती हैं और उद्धव के सामने श्री कृष्ण के प्रति अपने प्रेम- अनन्यता को प्रकट कर देती हैं |
व्याख्या:
गोपियां उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव हमारे मन दस -बीस तो नहीं है, हमारे पास भी एक ही मन है | दस-बीस मन होते तो हम तुम्हारी बात मान लेते अर्थात एक दूसरे मन से तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म का भी भजन कर लेते, किंतु हमारे पास तो एक ही मन था और वह भी मथुरा जाते हुए कृष्ण के साथ ही चला गया| अब तुम्हारे ईश्वर की आराधना हम किस मन से करें ? कृष्ण के बिना हमारी इंद्रियां भी उसी तरह से शिथिल हो गए हैं जैसे कि सिर के बिना धड़, अर्थात ऐसी स्थिति में शरीर मृत प्राय हो जाता है| गोपियों का विरह प्रतिक्षा जन्य है अभी उसमें निराशा नहीं आई है| जीवन के लक्षण के रूप में हमारी सांस केवल इस आशा में चल रही हैं कि श्री कृष्ण कभी तो मथुरा से अवश्य लौटेंगे और हमें उनके दर्शन हो जाएंगे| शरीर में चलती सांसो से मिलने की आशा लगी हुई है और इस आशा में हम करोड़ों वर्ष तक भी जीवित रह सकती है| हे उद्धव तुम तो मनमोहन श्याम सुंदर की मित्र हो तथा समस्त योग के स्वामी हो, फिर भी इतना नहीं समझते हो कि श्रीकृष्ण के बिना हमारा जगदीश अर्थात ईश्वर दूसरा नहीं है| सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां उससे कह रही है कि हम तुम्हें यह स्पष्ट बता देना चाहते हैं कि नंद जी के पुत्र श्री कृष्ण को छोड़कर हमारा कोई आराध्यम नहीं है हम तो उन्हीं की उपासिका हैं|
गोपियों की अनन्य मना स्थिति अनुकरणीय है जब तक सांस तब तक आज की कहावत चौथी पंक्ति में स्पष्ट है राग धनाश्री में निबंध पद अपनी खेता में अनुपम है व्यक्ति हतप्रभ करने वाली है


विशेष:
प्रस्तुत पद में गोपियों की विरह दशा और श्री कृष्ण के प्रति उनके एक निष्ठ प्रेम का मार्मिक वर्णन है
भाषा सरल सरल और मधुर ब्रज है
श्रृंगार रस है (वियोग)
'सखा श्याम सुंदर के' में अनुप्रास अलंकार है, 'जोग' श्लेष अलंकार है, 'ज्यौं देहि में' उपमा अलंकार है|
गुण माधुर्य है|
शब्द शक्ति व्यंजना है|
जब तक सांस तब तक आज की कहावत चौथी पंक्ति में स्पष्ट है |
राग धनाश्री|
संभावित प्रश्न =
1.सूरदास के काव्य की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए|
2. सूरदास की भक्ति भावना के बारे में लिखिए|
3. सूरदास के वात्सल्य वर्णन पर प्रकाश डालिए|
4. सूरदास के पदों का भावार्थ लिखिए|
5. सूरदास की काव्य भाषा पर प्रकाश डालिए|

बुधवार, 17 मई 2017

शत्रु (कहानी) अज्ञेय

                                                               शत्रु 
अज्ञेय हिंदी साहित्य में एक मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक कहानीकार भी माने जाते हैं| उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा मानव मन का गहन विश्लेषण किया है, इनकी शत्रु नामक कहानी भी विचार प्रधान, मनोवैज्ञानिक कहानी है | प्रस्तुत कहानी एक नवीन एवं विशिष्ट शैली में लिखी गई है, इसमें उन्होंने बताया है कि मनुष्य का वास्तविक शत्रु उसका अहंकार ही है, किंतु वह  भ्रमवश  अन्य बातों को अपना विरोधी मान बैठता है| कहानी कला की दृष्टि से शत्रु कहानी अत्यंत सफल व उत्कृष्ट कहानी है।
 कथानक 
इस कहानी का कथानक यद्यपि फैला हुआ है लेकिन फिर भी उसमें सुगठिता  तथा एकसूत्रता का गुण है, ज्ञान के जीवन की अनेक घटनाएं- एक ही मूल उद्देश्य से गुथी हुई हैं, ज्ञान का स्वप्न कहानी की आरंभिक अवस्था है, ज्ञान की एक विधवा स्त्री से भेंट, जेल यात्रा, विदेशी से मुलाकात आदि- कथावस्तु को  विकास की ओर अग्रसर करती हैं , किले में बंद हो जाने के बाद उसका अंतर्मंथन और आत्महत्या का निश्चय संघर्ष की अवस्था है, दीवार पर से नीचे खाई में अपनी परछाई देखना और यह समझना कि उसकी पलायन वृत्ति अर्थात हर कठिनाई से मुंह मोड़ना ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है| यही कहानी की चरम सीमा है| इस तरह कहानी के संपूर्ण कथानक में एक सूत्रता है लेखक कथानक में पाठक की जिज्ञासा अंत तक बनाए रखने में सफल रहा है| हर बार ज्ञान का बदला हुआ निश्चय पाठक के मन में यह प्रश्न उत्पन्न करता है कि अब क्या होगा? कहानी का अंत अत्यंत नाटकीय ढंग से किया गया है।
 पात्र एवं चरित्र चित्रण
 इस कहानी का मुख्य और एकमात्र पात्र ज्ञान ही है जो वास्तविक न  होकर प्रतीकात्मक है, उसके चरित्र का अंकन फ्राइड के मनोविश्लेषण के आधार पर किया गया है, ज्ञान के माध्यम से अज्ञेय ने मानव जीवन के एक वैचारिक पहलु पर प्रकाश डाला है| प्रत्येक मनुष्य जीवन में कोई न कोई उलझन आने पर उसी प्रकार किसी एक या दूसरे वर्ग को अपना शत्रु समझने लगता है जिस तरह ज्ञान ने  क्रमशः धर्म, समाज, विदेशी सरकार और भूख को अपना शत्रु समझ लिया| आदिकाल से मनुष्य का की  जीवन से  पलायन की प्रवृत्ति रही है अर्थात जीवन के विभीषिकाओं  से भागता रहा है- इसी तथ्य का उद्घाटन अज्ञेय जी ने ज्ञान की माध्यम से किया  है| गौण  पात्रों में विधवा तथा विदेशी को लिया जा सकता है, इनका चरित्र भी प्रतीकात्मक है | स्त्री  के माध्यम से समाज की विभिन्न रुढियों  का शिकार बनने वाली नारियों की दुर्दशा की ओर संकेत किया है, विदेशी के द्वारा बताया है कि मूलतः सभी मानव एक हैं, परंतु यह एकरूपता  विपत्ति के समय ही स्पष्ट होती है, वास्तव में इस कहानी के पात्र व्यक्तिगत न होकर वर्ग गत है और वास्तविक न  होकर प्रतीकात्मक है| 
कथोपकथन 
 शत्रु कहानी में कथोप कथन का स्थान  नहीं है क्योंकि अन्य पात्रों की प्रत्यक्ष अवधारणा ही नहीं की गई है| संपूर्ण कहानी लेखक के वर्णन पर आधारित है| कहीं-कहीं ज्ञान अथवा अथवा लोगों की कोई बात कथन के रूप में प्रस्तुत कर दी गई है| जैसे- "उसने कहा- धर्म झूठा बंधन है|" या कहने लगा- मैं मसीह हूं पैगंबर हूं |" अथवा किसी ने कहा- जो व्यक्ति पराई और बहिष्कृत औरत को अपने साथ रखता है , उसकी बात हम क्यों सुने? वह समाज से पतित  है ,  नीच है |"
देश काल और वातावरण
 इस दृष्टि से प्रस्तुत कहानी सफल है| अज्ञेय  वातावरण निर्माण में कुशल हैं| इस कहानी में यद्यपि लेखक ने प्रत्यक्ष रूप से यह उल्लेख नहीं किया है कि इसका संबंध किसी स्थान विशेष या किस युग से है, लेकिन ज्ञान को जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है उनसे स्पष्ट है कि इस कहानी में पराधीन भारत की दशा की ओर संकेत किया गया है| उन दिनों विदेशियों के विरुद्ध विद्रोह की भावना थी, भूख और गरीबी के विरुद्ध संघर्ष चल रहा था, धर्म और समाज के नाम पर प्रचलित रूढ़ियों का भी खंडन किया जा रहा था, इन सब बातों का इस कहानी में यथार्थ चित्रण हुआ है।
 भाषा शैली
 अज्ञेय जी ने एक गूढ़ तत्व को स्पष्ट करने के लिए सरल शब्दावली का प्रयोग किया है| भाषा में सर्वत्र प्रवाह  और लचक है, इस कहानी की भाषा परिमार्जित और परिनिष्ठित खड़ी बोली है, यथा - "वह ईश्वर का प्रतिनिधि है तो उसे मानव जाति को पथ  पर लाना होगा|  अंधकार से बाहर खींचना होगा , उसका नेता बनकर उसके शत्रु से युद्ध करना होगा, कहानी की शैली आदि से अंत तक वर्णनात्मक है ,पात्रों को बोलने का अवसर बहुत कम दिया गया है| सर्वत्र लेखक ही बात कहता चला है |
उद्देश्य 
शत्रु एक विचार -प्रधान मनोवैज्ञानिक कहानी है| इस कहानी का लक्ष्य यह स्पष्ट करता  है कि मनुष्य भ्रमवश  धर्म, समाज भूख  आदि को अपना शत्रु समझ लेता है, किंतु इन शत्रुओं से सच्चे अर्थों में संघर्ष न करके वह अपनी सरलता के लिए नित्य नया रास्ता अपना लेता है| इसी कारण उसे किसी भी लक्ष्य में सफलता नहीं मिलती| मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं को पहचाने, उसे  कठिनाइयों से संघर्ष करने की क्षमता अपने आप में पैदा करनी चाहिए| यही इस कहानी का मूल अभीष्ट है | कहानी के अंत में भी ज्ञान को उसके सच्चे स्वरूप का ज्ञान कराकर इसी लक्ष्य की ओर संकेत किया गया है| 
शीर्षक की सार्थकता
 कहानी के उद्देश्य को ही लक्षित करके कहानी का नाम शत्रु रखा गया है| इसी शीर्षक में लेखक का मूल अभीष्ट  निहित है| यह नामकरण प्रतीकात्मक है| उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शत्रु कहानी एक विचार प्रधान और मनोवैज्ञानिक कहानी है|  मनुष्य का वास्तविक शत्रु उसका अहंकार है , किंतु वह भ्रमवश  अन्य बातों को अपना विरोधी मान  लेता है , इसी तथ्य को पाठक से अवगत कराने के लिए अज्ञेय  ने इस  कहानी की रचना की है कहानी  के तत्वों का भी सफल निरूपण प्रस्तुत कहानी में किया गया  है|

भारतीय कव्य शास्त्र (छंद) 1

छंद

छंद संस्कृत साहित्य से ही काव्यशास्त्र का प्रमुख अंग रहा है। क्या होता है ये छंद ? और काव्य में इसका क्या महत्त्व होता है? आइए जानते हैं-
छंद का लक्षण -
जिस रचना के हर पाद में मात्रा या वर्णों को विशेष क्रम,यति ,एवं गति के अनुसार रखा गया है, उसे छंद कहते हैं |
अथवा
जिस रचना में मात्रा संख्या, वर्ण संख्या तथा उनके विशेष क्रम का एवं यति तथा गति के नियम का पालन करके पाद बनाया जाता है, उसे छंद कहते हैं।
अथवा
जब किसी भी काव्य को लय, विराम आदि में बांधकर तथा वर्णों व मात्राओं के नियमों का पालन करते हुए काव्य रचना करते हैं, तब वह छंद बद्ध रचना कहलाती है।
पहले संस्कृत काव्य में छंद के माध्यम से ही काव्य-रचना होती थी।

किसी भी छंद की रचना में वर्ण/अक्षर/स्वर ध्वनि, मात्रा (लघु व गुरु) यति, गति, लय, ताल, चरण/पाद ,गण आदि का प्रयोग किया जाता है, व छंद वर्णो तथा गुरु- लघु मात्राओं के सहयोग बनता है। क्योंकि गुरु -लघु मात्राओं का समुचित प्रयोग काव्य में लय उत्पन्न करता है इसलिए काव्य को पढ़ते समय हमें संगीत का-सा आनंद मिलता है या आभास होता है। जैसे -
रघुकुल रीति सदा चली आई
प्राण जाई पर वचन न जाई ।
छंद शब्द 'छद' धातु से निष्पन्न हुआ है। छंद धातु के अनेक अर्थ हैं - प्रसन्न करना , फुसलाना , बांधना, आच्छादित करना, ढक देना, ढाँप देना आदि। इन्हीं अर्थों के कारण छंद का अर्थ प्रसन्न करने वाली वस्तु, आच्छादन और बंधन आदि लिया जाता है| जिस प्रकार हम अपने शरीर को कपड़ों से ढकते हैं उसी प्रकार छंद भी शब्दार्थमय काव्य- शरीर को ढक देता है। काव्य का शरीर शब्द-अर्थ से युक्त होता है। छंद काव्य के भाव को बढ़ाते हैं, और भाषा में सुंदरता उत्पन्न करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार से सुंदर पहनावा शरीर के सौंदर्य को बढ़ाता है उसी प्रकार सुंदर छंद भी काव्य में प्रयुक्त होकर उसके सौंदर्य को बढ़ाते हैं उसे सहज, सुंदर और मनोरम बनाते हैं |
काव्य और छंद -
संकृत काव्यशास्त्र में छंद काव्य का महत्वपूर्ण अंग माना गया है , वहां छंद के बिना काव्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन हिंदी साहित्य में विशेष कर आधुनिक काल में छंद की अनिवार्यता को स्वीकार नहीं किया गया , विशेषकर निराला ने कविता को छंदमुक्त अर्थात छंद के बंधन से मुक्त कविता की हिमाकत की है, लेकिन देखा जाये तो वह भी एक छंद ही है| निराला ने कविता में प्रवाह को महत्त्व दिया है| इसके विपरीत आचार्य रामचंद्र शुक्ल और सुमित्रा नंदन पन्त ने कविता के लिए छंद के महत्त्व को स्वीकार किया है | रामचंद्र शुक्ल में कहा है कविता को पढ़ा नहीं जाता बल्कि गाया जाता है और गायन तभी संभव होता है जब कविता छन्दोबद्ध होती है | इसलिए काव्य में छंद की अनिवार्यता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता |
किसी भी साहित्य को रचना की दृष्टि से दो भागों में बांटा जा सकता है एक गद्य और दूसरा पद्य | छन्दोबद्ध साहित्य पद्य कहलाता है; और मात्रा, गण, यति आदि के बंधन से मुक्त साहित्य को गद्य की संज्ञा दी जाती है|
अर्थात छंद गद्य और पद्य में अलगाव का आधार भी हो जाता है | माना जाता है कि गद्य बुद्धि प्रधान होता है तथा पद्य रागात्मक प्रधान होता है | व्याकरण को गद्य का नियामक तत्त्व माना गया है अत: गद्य के लिए व्याकरण महत्वपूर्ण होती है| जब हम कविता या कहानी, उपन्यास लिखते हैं तो हमें व्याकरण के नियमों का ध्यान रखना पड़ता है और पद्य लिखते समय हमे अलंकार और छंद पर ध्यान देने की जरूरत होती है अतः: काव्य के लिए छंद नियामक तत्त्व हैं। ये एक मनोवैज्ञानिक तथ्य भी है कि लय रागात्मक वृत्ति का प्रेरक तत्त्व होता है, और लय की सृष्टि छंद के माध्यम से ही हो सकती है| इसीलिए काव्य में छंद का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है| अंत में कह सकते हैं कि छंद काव्य का अपरिहार्य अंग है| क्योंकि जब कवि छंदों के द्वारा काव्य में ह्रदय की सच्ची अनुभूति को नाद और लय के साथ उतारता है तो उस काव्य का पाठक के हृदय पर अधिक प्रभाव पड़ता है ।
छंद के अंग / तत्त्व

वर्ण/अक्षर/ स्वर ध्वनि - मुख से नि:सृत हर उस छोटी से छोटी ध्वनि को वर्ण या अक्षर कहते हैं , जिसके खंड नहीं किए जा सकते या कहें तो जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते |जैसे- अ, इ, उ, ऋ आदि
मात्रा (लघु और गुरु )- प्रत्येक वर्ण के उच्चारण में कुुुछ समय लगता है, जितना समय लगता है, उसे ही छंद के संदर्भ में मात्रा कहते हैं| इस दृष्टि से वर्ण दो प्रकार के माने जाते हैं - ह्रस्व और दीर्घ , इन्हीं को छंद शास्त्र में क्रमश: लघु और गुरु कहा जाता है | ह्रस्व स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसकी एक मात्रा मानी जाती है, और दीर्घ स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसके लिए दो मात्रा मानी जाती हैं। वैदिक संस्कृत में प्लुत स्वर भी होता था जिसके उच्चारण में ह्रस्व स्वर की अपेक्षा तीन गुना समय लगता था। किंतु हिंदी में अब प्लुत स्वर का लगभग लोप हो चुका है। मात्राओं को लगाने के नियम तय हैं जैसे-

  • अ,इ,उ,ऋ, चंद्रबिंदु (ँ) की एक मात्रा लगती है। उसे ह्रस्व या लघु कहते हैं।
  • आ,ई, ऊ, ए,ऐ,ओ,औ, अनुस्वार (ं) विसर्ग (ः) की दो मात्राएं लगती हैं उन्हें दीर्घ या गुरु कहते हैं।
  • अर्थात विसर्ग से युक्त वर्ण भी गुरु माना जाता है |
  • संयुक्त वर्णों से पहला स्वर दीर्घ हो जाता है जैसे - सत्य, धर्म तथा रक्षा में स,ध तथा र गुरु वर्ण हैं।
  • कहीं-कहीं बोलते समय ह्रस्व स्वर पर बल नहीं पड़ता तो संयुक्त वर्णों से पहले होने पर भी वह दीर्घ नहीं होता । जैसे कन्हैया में क ह्रस्व ही रहेगा न और ह के संयुक्त होने से दीर्घ नहीं होगा।



चरण या पाद 
प्रत्येक छंद कुछ पंक्तियों का समूह होता है।  उदाहरण के लिए जैसे सवैया छंद में 4 पंक्तियां होती हैं, छंद की इन पंक्तियों को चरण या पाद कहते हैं। एक पंक्ति एक चरण कहलाती है। हिंदी के अधिकतर छंद चार चरणों के होते हैं परंतु कुंडलियां, छप्पय आदि में 4 से अधिक चरण या पाद भी होते हैं,  दोहा, सोरठा बरवै आदि छंद केवल दो चरणों के ही होते हैं।
  • यति
  • गति
  • तुक
  • लय
  • ताल
  • गण




नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...