हिंदसा

शुक्रवार, 7 मई 2021

गंगा स्नान करने चलोगे? संस्मरण 2.

  हिंदी साहित्य में संस्मरण की गणना दूसरी अन्य गद्य विधाओं की तरह ही  होती है अर्थात जैसे रेखाचित्र रिपोर्ताज आत्मकथा जीवनी एवं पत्र साहित्य आदि की होती है वैसे ही  संस्मरण विधा होती है। संस्मरण साहित्य में कथावाचक जिन घटनाओं, पात्रों एवं शब्द चित्र प्रस्तुत करता है, उसकी प्रामाणिकता संदिग्ध नहीं होती है।संस्मरण में कथाकार अपनी स्मृतियों के आधार पर कथा का निर्माण करता है। संस्मरण का शाब्दिक अर्थ - सम्यक संस्मरण होता है। यह संस्मरण व्यक्ति, घटना, दृश्य और किसी से भी संबंधित हो सकता है। संस्मरण में कथानक का विकास एक रेखीय रूप अर्थात आदि से अंत तक  एक लय में नहीं होता है बल्कि कथानक की लड़ियां विशृंखलित होती हैं । लेखक समय की आवाजाही कथानक में अपनी स्मृतियों के आधार पर करता है। संस्मरण में यह संभव है कि कोई कथाकार वृद्धा अवस्था की घटना का जिक्र कर रहा है और उसके तुरंत बाद युवा अवस्था के विवरणों को देने लगे। कुल मिलाकर संस्मरण में स्मृति स मुख्य होती है| कथाकार को घटनाएं या पात्र या दृश्य जैसे जैसे याद आते हैं वह वैसे वैसे उनका जिक्र करता चलता है गंगा स्नान करने चलोगे पाठ भी  विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखा गया एक संस्मरण है

गंगा स्नान करने चलोगे? संस्मरण विश्वनाथ त्रिपाठी जी के द्वारा लिखा गया है।  इसमें उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के साथ बिताए गए दिनों  को याद करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के चरित्र की अनेक विशेषताओं को ओर इंगित किया है। विश्वनाथ त्रिपाठी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जब काशी में साथ- साथ रहते थे तो गर्मियों में कई बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी जी को गंगा स्नान करने के लिए कभी-कभी लेकर जाते थे। जब वह गंगा स्नान करने के लिए जाते थे तो रास्ते में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी को अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों के बारे में बताते थे- कि कौन- सी पुस्तक पढ़नी चाहिए और वह पुस्तक कहां मिलेगी? वह पुस्तक किस लाइब्रेरी में मिलेगी? आदि-आदि। एक रात जाड़े के दिनों में लगभग रात के 7:00 बजे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी जी से  कहते हैं कि गंगा स्नान करने चलोगे? आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कहने पर विश्वनाथ त्रिपाठी उनके साथ चल पड़े।  जाड़े की  रात में, वह भी 7:00 बजे, गंगा स्नान करने जाने की बात सुनकर विश्वनाथ त्रिपाठी जी हैरान थे बावजूद इसके वे बिना कुछ कहे ही हजारी प्रसाद जी के साथ चल पड़े। उस दिन हजारी प्रसाद द्विवेदी गंगा के तट पर जाने की बजाय वे विश्वनाथ त्रिपाठी जी को विश्वविद्यालय के बहुत बड़े विद्वान पंडित सुखलाल जी के यहां लेकर गए और उनसे विश्वनाथ त्रिपाठी जी का परिचय कराया पंडित सुखलाल जी ने भी विश्वनाथ त्रिपाठी जी को संस्कृत पढ़ने की बात कहते हुए अनेक महत्वपूर्ण बात बताई इस तरह से वापस लौटते हुए पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने विश्वनाथ त्रिपाठी को कहा कि हो गया न गंगा स्नान क्योंकि सुखलाल जी उस समय के बहुत बड़े विद्वान थे और उनसे मिलना या उनसे परिचय होना वास्तव में किसी भी गंगा स्नान से कम नहीं था। इसके अतिरिक्त इस संस्मरण के माध्यम से हमें पता चलता है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बहुत बड़े विद्वान थे जिस उम्र में लोग गंभीरता पूर्वक पढ़ना शुरू करते हैं उस उम्र में द्विवेदी जी बहुत बड़े विद्वान बन चुके थे लगभग 30 वर्ष की आयु में हजारी प्रसाद द्विवेदी को आचार्य कहकर पुकारा जाता जाने लगा था।

 एक अध्यापक के रूप में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी जी लिखते हैं कि क्लास में कोई विद्यार्थी नए अर्थ का संकेत करता था तो वे उसकी बहुत तारीफ करते थे पहली बार तारीफ करने से मन नहीं भरता थोड़ी-थोड़ी देर पर पीरियड में तीन चार बार तारीफ करते-  बहुत ठीक मैंने नहीं सोचा था... मैं तो खींच खांचकर अर्थ कर रहा था ..प्रसन्न होकर वह शिष्यों से कहते-  पुस्तकें भी पढ़ो, पुस्तकालय भी पढ़ो, किताबों की दुकान पढ़ो,  किताबों की दुकान पर जाकर पता चलता है कि कितना कम पढ़ा है पढ़ने को कितना है आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी विद्वानों के लिए संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं का आना भी जरूरी मानते थे आचार्य द्विवेदी जी विद्वान होने से ज्यादा अच्छा मनुष्य बनना मानते थे वह कहते थे कि विद्वान होने से क्या है 50 किताबें पढ़ने से तो कोई भी व्यक्ति विद्वान हो सकता है। मनुष्य बनने की साधना करना बड़ी बात है।

  विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का क्लास में पाठ्यक्रम कभी समाप्त नहीं होता था क्योंकि वह पंक्तियों की व्याख्या बहुत विस्तार से करते थे कबीर के 11 दोहे का अर्थ बताने में वे तीन चार घंटे लगाते थे इस तरह से कोर्स खत्म नहीं होता था और परीक्षाएं सिर पर आ जाती थी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने विद्यार्थियों को घर पर बुलाकर भी पढ़ाते थे इसके साथ साथ वे लिखने में उनकी विशेष रूचि रखते थे, तुलसीदास जी पर लिखना चाहते थे, उत्तरमेघ लिखना चाहते थे। हमेशा वह कुछ न कुछ लिखने के लिए सोचते रहते थे । स्वास्थ्य खराब होने पर भी  उनकी इच्छा लिखने की रहती थी। इसलिए वे अपने शिष्यों को घर बुलाकर, बोलकर कुछ लिखवाने का प्रयास करते थे । विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने इस संस्मरण में उस घटना का उल्लेख भी किया है जब 1960 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थी। इस घटना का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। यह उनके साथ गलत हुआ था और इस बात का उन्हें ताउम्र मलाल  रहा भी और इस जैसी कुछ और घटनाओं के कारण ही उनका सत्य और मानवीयता से एक तरह से भरोसा उठ गया था क्योंकि उनको लगता था कि इस संसार में असत्य और अमानवीयता सत्य और मानवीयता से ज्यादा शक्तिशाली है।

   आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तीन बातों से हमेशा नाराज हो जाते थे- अगर कोई व्यक्ति किसी महिला के चरित्र की निंदा करता था जब या फिर दोपहर के भोजन के बाद  सोते में उन्हें जगा दे या फिर रविंद्र नाथ ठाकुर, मदन मोहन मालवीय, गांधी जी और जवाहरलाल नेहरू के बारे में हल्की बात करने पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी नाराज हो जाते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कालिदास से बड़ा किसी अन्य कवि को नहीं मानते थे। आधुनिक साहित्यकार भी हजारी प्रसाद द्विवेदी से अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस करते थे। इसलिए उनकी शव यात्रा में आधुनिक साहित्यकारों की संख्या पुराने साहित्यकारों से भी ज्यादा थी। वे नई पीढ़ी का सम्मान करते थे। उनका मानना था कि काल की वस्तुगत सत्ता नहीं होती। वह केवल बोझ या मनोविकार है। काल घटनाओं से झलकता है । वह केवल घटनाओं को नापने का बोध माध्यम मात्र है इसलिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कोई घटना कब घटी, किसी व्यक्ति की उम्र क्या है? वह बूढ़ा है या किशोर। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी सोच या उसका दृष्टिकोण होता है। नयापन आधुनिकता का पर्याय नहीं है। नया पुरातन पंथी भी हो सकता है। प्राचीन साहित्य को भी आधुनिक दृष्टि से देखा जा सकता है। इसलिए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को आधुनिक साहित्यकार भी बहुत सम्मान देते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी किसी को दुख नहीं पहुंचाना चाहते थे अनुचित के प्रति विरोध करना जानते थे लेकिन संघर्ष करना उनके वश में नहीं था। वे प्रत्येक व्यक्ति में गुण देख लेते थे और मनुष्य के गुणों का ही बखान करते थे उनका मानना था कि तारीफ कर देने से क्या बिगड़ जाता है मनुष्य कोई रचना थोड़ा ना है कि उसकी समीक्षा की जाए। विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखी एक हस्तलिखित नोटबुक का भी जिक्र किया है। उस नोटबुक के कवर पर हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने हनुमान जी का चित्र बनाया था और उन्होंने एक काव्य पत्र भी लिखा था जो उस समय के प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय जी को भेजा था। उन्होंने इसमें लिखा था कि क्या हो गया? बड़े बड़े कवियों की कविताओं से, क्या दमन, शोषण, अन्याय कुछ भी रुक पाया अर्थात नहीं रुक पाया । इसीलिए द्विवेदी जी के मन में सत्य के प्रति अविश्वास पैदा हुआ और उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ गई। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का पद छोड़ने से पहले और बाद के हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के मनोबल में बहुत अंतर आ गया था। क्योंकि उन्होंने भारतीय व्यवस्था के दो मुंहेपन को देखा था । जिसको वह कभी भुला नहीं पाए। इस तरह से विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने अनेक ऐसे स्मृति चित्रों का उल्लेख इस संस्मरण में किया है जो पाठक के मन मस्तिष्क पर हजारी प्रसाद को लेकर एक अलग ही छाप छोड़ते हैं और वह हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के संघर्षशील जीवन से प्रेरणा पाते हैं और हिंदी के महान साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के चरित्र की  अनेक खूबियों से परिचित या अवगत होते हैं

    गंगा स्नान करने चलोगे नामक संस्मरण खड़ी बोली में लिखा गया है। इसकी भाषा सरल है। विषय के अनुसार भाषा और वाक्य संरचना का चयन किया गया है। शब्दों का प्रयोग भी स्वाभाविक है।  ट्रेन, पीरियड, गाड़ी,क्लास आदि अंग्रेजी  के शब्दों के साथ-साथ तत्सम, तद्भव, देशज शब्दों का भी प्रयोग इस संस्मरण में हुआ है । साहित्यिक भाषा का पुट इस संस्मरण के महत्व को और भी बढ़ा देता है। भाषा मे कहीं भी बनावटी पन नजर नहीं आता । कुल मिलाकर या संस्मरण पाठक को भाव विभोर कर देता है। 

बहादुर कहानी का उद्देश्य और अन्य प्रश्न

 प्रश्न 1

‘बहादुर’ कहानी का सारांश संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए। 

                                या

‘बहादुर’ कहानी की कथावस्तु का उल्लेख कर सिद्ध कीजिए कि यह एक यथार्थवादी कहानी है।

उत्तर : - अमरकान्त जी द्वारा लिखी कहानी ‘बहादुर’, एक मध्यमवर्गीय परिवार में नौकर के साथ परिवारजनों द्वारा किये गये अत्यधिक कटु व्यवहार की कहानी है। लेखक ने स्वयं को कहानी का पात्र बनाते हुए कहानी की आत्म-कथात्मक रूप में रचना की है। अपने से सम्पन्न रिश्तेदारों के घर नौकर द्वारा जुटाई सुविधा एवं शान को देखकर लेखक की पत्नी निर्मला स्वयं भी एक नौकर रखना चाहती है। बहादुर नेपाल को 12-13 साल का लड़का है, जो अपनी माँ के दुर्व्यवहार से तंग आकर घर छोड़कर शहर चला आता है और निर्मला के परिवार में नौकर रख लिया जाता है। निर्मला और उसका परिवार बहादुर के प्रति पहले तो अच्छा व्यवहार करते हैं, परन्तु धीरे-धीरे कठोरता बरतने लगते हैं। वह घर का सारा कार्य करता है, इसके बावजूद उसके साथ गाली-गलौज से मारपीट तक की नौबत आ जाती है। झूठी चोरी का इल्जाम लगाकर उसे अपमानित किया जाता है और पीटा जाता है। अन्तत: बहादुर घर छोड़कर चला जाता है। अब परिवार के सभी सदस्य उसे ढूंढ़ते हैं, क्योंकि उसके कारण सब आराम के आदी हो चुके हैं।

बहादुर की उपयोगिता देखकर सभी अब अपना घरेलु कार्य करने से घबराते हैं, वहादुर के घर छोड़ जाने पर वे सभी पश्चात्ताप करते हैं तथा अच्छा व्यवहार करने की सोचते हैं। परन्तु अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत। बहादुर में सहनशीलता और स्वाभिमान की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। उसके इसी चरित्र के कारण यह कहानी हमें प्रिय है।

प्रश्न 2 ‘बहादुर’ कहानी के उद्देश्य का विवेचनात्मक परिचय दीजिए। बहादुर कहानी की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। 

                                  या

‘बहादुर’ कहानी की कथावस्तु का विवेचन कीजिए और कहानी का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। 

                             या

‘बहादुर’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। 

उत्तर:- आधुनिक कथा-जगत् में प्रेमचन्द की कहानी-कला को अक्षुण्ण रखने वाले कलाकारों में अमरकान्त अग्रणी हैं। इनकी कहानियों में मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग की पारिवारिक परिस्थितियों का सजीव, आदर्श तथा यथार्थवादी चित्रण मिलता है। इनकी ‘बहादुर’ कहानी; मध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी करने वाले बहादुर नाम के पहाड़ी लड़के पर आधारित एक समस्यामूलक कहानी है। कहानी-कला के तत्त्वों के आधार पर कहानी की संक्षिप्त समीक्षा आगे प्रस्तुत है–

(1) शीर्षक-प्रस्तुत कहानी का शीर्षक लघु, आकर्षक, सरल तथा सार्थक है। कहानी की कथा इसके प्रमुख पात्र बहादुर के चारों ओर घूमती है; अत: शीर्षक की दृष्टि से ‘बहादुर’ कहानी एक सफल रचना है।

(2) कथानक-प्रस्तुत कहानी में लेखक ने समाज के वर्ग-भेद को उजागर किया है। बहादुर 12-13 वर्ष की उम्र का एक गरीब बालक है। वह एक साधारण परिवार में नौकर है, जिसका मुखिया स्वयं लेखक है। प्रारम्भ में तो उसका परिवार में पालतू पशु-पक्षियों की तरह बड़ा आदर-सत्कार होता है और वह भी बड़ी मेहनत व लगन से काम करता है, किन्तु कुछ दिनों बाद वह लेखक के बड़े लड़के किशोर और उसकी पत्नी निर्मला द्वारा डॉट, मार खाने लगता है। उससे अपनी रोटी स्वयं सेंक लेने को भी कहा जाता है। एक दिन घर में आये कुछ रिश्तेदारों द्वारा बहादुर के ऊपर चोरी करने का आरोप लगाया जाता है और लेखक द्वारा बहादुर को मारा-पीटा भी जाता है। पत्थर की एक सिल के टूट जाने और समस्त परिवारजनों के दुर्व्यवहार से पीड़ित होने के कारण वह उस घर से भाग जाता है। वह अपने साथ घर का और अपना कोई भी सामान नहीं ले जाता। बहादुर के चले जाने के बाद परिवार के लोगों को बहादुर के गुणों की अनुभूति होती है और वे अपने द्वारा उसके प्रति किये गये अमानवीय व्यवहारों पर पश्चात्ताप करते हैं।

कहानी का कथानक रोचक, सुगठित, संक्षिप्त तथा समस्याप्रधान है। इसमें बताया गया है कि मात्र पूँजीपति ही श्रम का शोषण नहीं करते, वरन् सामान्य मध्यम वर्ग भी इस कुकृत्य में पीछे नहीं है। इस प्रकार कथानक-तत्त्व की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

(3) उद्देश्य ( सन्देश)—इस कहानी का उद्देश्य समाज में उत्पन्न वर्ग-संघर्ष को मानवीय सहानुभूति द्वारा समाप्त करने का सन्देश देना है। शोषितों के प्रति मानवता एवं प्रेम का व्यवहार, ऊँच-नीच के भेद के कारण दिलों में पड़ी दरार को भर देता है। बहादुर भी मानवीय स्नेह एवं संवेदनाओं का भूखा है। मालिक द्वारा पीटे जाने और प्रतिक्रिया स्वरूप उसके द्वारा घर छोड़ दिये जाने पर परिवार के सभी लोगों को पश्चात्ताप का अनुभव होता है। वे स्वयं को दोषी महसूस करते हैं। धनी और निर्धन का वर्ग-भेद मानवीय भावनाएँ ही कम कर सकती हैं। लेखक का मुख्य उद्देश्य दोनों के हृदयों का परिवर्तन है और सबके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार बनाये रखने का सन्देश देना है।

‘बहादुर’ कहानी अत्यन्त मार्मिक कहानी है। यह आत्म-कथात्मक शैली में प्रस्तुत की गयी है। अमरकान्त जी ने बड़े सटीक और सुन्दर ढंग से कहानी को प्रस्तुत करके पाठकों के मन पर अमिट छाप छोड़ी है। कहानी-कला के तत्त्वों की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

प्रश्न 3 ‘बहादुर’ कहानी में उद्घाटित समाज के शोषक चरित्र पर प्रकाश डालिए।

उत्तर:- अमरकान्त द्वारा रचित ‘बहादुर’ कहानी का नायक ‘दिल बहादुर’ नामक नेपाली लड़का, एक निम्नवर्गीय परिवार का सदस्य है और निर्मला का परिवार मध्यमवर्गीय स्थिति को परिवार है। यह आर्थिक दृष्टि से अधिक सम्पन्न परिवार नहीं है, लेकिन झुठे दिखावे और शान-शौकत के लिए नौकर की आवश्यकता को बनाये हुए है। निर्मला पड़ोसियों को अपनी शान-शौकत से प्रभावित करना चाहती है। निर्मला का पति भी दिखावे और प्रदर्शन को ही अपने जीवन का वास्तविक आधार मानता है। अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद अपने रिश्तेदारों की नकल करते हुए वह अपने यहाँ नौकर रख लेता है। निर्मला का लड़का किशोर, नौकर को हीन दृष्टि से देखता है और बात-बात पर उसे गाली देता है। नौकर रखने का प्रदर्शन, नौकर के प्रति दिखावे का व्यवहार, नौकर पर रोब डालना, नौकर से जी-तोड़ काम लेना, उसको बात-बात पर पीटना-गाली देना आदि क्रिया-कलाप मध्यमवर्गीय परिवारों; जो कि समाज का सबसे बड़ा तबका है; की शोषक मानसिकता को उजागर करते हैं और समाज के शोषक चरित्र पर प्रकाश डालते हैं।

हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ कथाकार अमरकान्त’ द्वारा लिखित कहानी ‘बहादुर’ वस्तुतः एक मध्यवर्गीय परिवार में नौकर के साथ परिवारजनों द्वारा किए जाने वाले अत्यधिक कठोर एवं असभ्य व्यवहार पर आधारित कहानी है। अमरकान्त हिन्दी के उन कहानीकारों में से हैं, जिन्होंने अपनी कहानियों में मध्य एवं निम्न वर्ग के प्रति सामाजिक जीवन की अमानवीय स्थितियों को एक यातनागार के रूप में प्रस्तुत किया है।

पात्र-परिचय-

लेखक- कहानी का वक्ता

निर्मला- लेखक की पत्नी

साले साहब- लेखक के साले साहब

दिलबहादुर- एक नेपाली लड़का तथा लेखक के घर का नौकर, जिसका नाम दिलबहादुर से केवल बहादुर कर दिया जाता है।

किशोर- लेखक का बड़ा लड़का,  बहादुर को देख लेखक के मन में नौकर रखने की आवश्यकता का अनुभव करना

एक दिन लेखक के साले साहब एक नेपाली लड़के को लेकर लेखक के घर आते हैं। उसकी उम्र बारह-तेरह वर्ष के लगभग थी, ठिगना चकइठ शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह। वह सफेद नेकर, आधी बाँह की सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने खड़ा था। उसे देखते ही लेखक को स्मरण हुआ कि उसके सभी भाई और रिश्तेदारों के यहाँ नौकर हैं। दोनों भाभियाँ रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती रहती हैं, जबकि उसकी पत्नी निर्मला सुबह से शाम तक घर के कामों में व्यस्त रहती है। यह सोच लेखक का मन ईर्ष्या से जल उठा तथा निर्मला भी हर वक्त नौकर रखने की रट लगाए रहती थी। यही स्मृति बहादुर को देखकर लेखक को नौकर रखने की आवश्यकता का अनुभव कराती है। साले साहब द्वारा लेखक व उसके परिवार को बहादुर का परिचय देना। साले साहब लेखक व उसके परिवार को बहादुर का परिचय देते हुए कहते हैं कि यह एक नेपाली बालक है, जिसका गाँव नेपाल और बिहार की सीमा पर था तथा इसके पिता युद्ध में मारे जा चुके हैं। घर परिवार का भरण-पोषण इसकी माँ करती थी। वह चाहती थी कि लड़का घर के काम-काज में हाथ बटाए, परन्तु शरारती प्रवृत्ति के कारण इसने एक बार उसी भैंस को बहुत मारा जिसको उसकी माँ बहुत प्यार करती थी। इसलिए माँ ने इसे बहुत मारा, जिसकी वजह से इसका मन माँ से कट गया और एक दिन यह माँ के रखे रुपयों में से दो रुपए निकाल कर वहाँ से भाग आया। लेखक तथा उसकी पत्नी निर्मला द्वारा ‘दिलबहादुर’ को नौकर ‘बहादुर’ बनने की प्रक्रिया समझाना

लेखक द्वारा लड़के का नाम पूछने पर वह अपना नाम ‘दिलबहादुर’ बताता है। लेखक उसे अपने घर में नौकर बनकर रहने के फायदे बताते हुए कहता है कि तुम अपनी सभी शरारतें छोड़कर ढंग से काम करना और इस घर को अपना ही घर समझना। हमारे घर में नौकर-चाकर को बहुत प्यार और इज्जत से रखा जाता है, जो सब खाते-पहनते हैं, वही नौकर-चाकर खाते-पहनते हैं। यदि तुम हमारे घर में रह गए तो सभ्य बन जाओगे, घर के और लड़कों की तरह पढ़-लिख जाओगे और तुम्हारी जिन्दगी सुधर जाएगी। निर्मला भी उसे नौकर बनने से पहले घर के कुछ व्यावहारिक उपदेश देती। हर्ड कहती है कि इस मोहल्ले में बहुत तुच्छ लोग रहते हैं न तो तुम्हें किसी के । घर जाना है और न ही किसी का कोई काम करना है। कोई बाजार से कुछ । लाने को कहे तो ‘अभी आता हूँ’ कहकर खिसक आना। तुम्हें घर के सभी सदस्यों से आदर व सम्मान से बोलना होगा तथा अपनी हिदायतें समाप्त करते हुए बड़ी ही उदारता के साथ वह उस लड़के के नाम में से ‘दिल’ हटा देती है। अब उसका नाम केवल ‘बहादुर’ ही बचता है।

बहादुर का परिश्रमी व हँसमुख स्वभाव

बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है, जो अपनी मेहनत से पूरे घर को न केवल साफ-सुथरा रखता है, बल्कि घर के सभी सदस्यों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है। उसके आने से परिवार के सभी सदस्य बड़े ही आरामतलबी एवं कामचोर व आलसी बन जाते हैं। इतना काम करने के बावजूद वह हमेशा हँसता रहता है। हँसना और हँसाना मानो उसकी आदत बन गई थी। वह रात में सोते समय कोई-न-कोई गीत अवश्य गुनगुनाता है।

बहादुर के प्रति किशोर का दुर्व्यवहार

निर्मला का बड़ा लड़का किशोर एक बिगड़ा हुआ लड़का है, जो शान-शौकत तथा रोब से रहना पसन्द करता है। वह अपने सारे काम बहादर को सौंप देता है। यदि बहादुर उसके काम में थोड़ी-सी भी लापरवाही करता, तो वह बहादुर को गालियाँ देता तथा छोटी-छोटी गलती पर बहादुर को पीटता भी है। बहादुर पिटकर एक कोने में चुपचाप खड़ा हो जाता और कुछ देर बाद फिर घर के

कामों में पूर्ववत् जुट जाता। एक दिन किशोर बहादुर को सुअर का बच्चा’ कह देता है, जिससे उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है और वह किशोर का काम करने से मना कर देता है। उसने लेखक के पूछने पर रोते हुए बताया कि-“बाबूजी, भैया ने मेरे मरे हुए बाप को क्यों लाकर खड़ा किया?” इतना कहकर वह रो पड़ता है।

बहादुर के प्रति निर्मला का बदलता व्यवहार

निर्मला बहुत पतली-पतली रोटियाँ सेंकती है, इसलिए वह रोटी बनाने का। काम बहादुर से न करवाकर स्वयं करती है, परन्तु मोहल्ले की किसी औरत ने उसे भड़का दिया कि परिवार के लिए रोटियाँ बनाने के बाद बहादुर से कहे कि वह अपनी रोटी खुद बना लिया करे। तुम यदि नौकरों को पतली-पतली रोटी बनाकर खिलाओगी तो उनकी आदतें खराब हो जाती हैं। निर्मला के दिमाग में उस औरत की बात घर कर जाती है। अब वह बहादर के लिए रोटियाँ सेंकना बन्द कर देती है, लेकिन बहादुर भी अपने लिए रोटियाँ नहीं सेंकता। निर्मला कई बार उसे रोटियाँ सेंकने के लिए कहती है, परन्तु बहादुर रोटियाँ बनाने के लिए मना कर देता है। निर्मला का गुस्सा बढ़ जाता है और वह लपककर उसके माथे पर तीन थप्पड़ जड़ देती है। निर्मला, बहादुर से चिढ़ जाती है। अब वह हर छोटी गलती पर उसे मारती व गालियाँ देने लगती है। निर्मला के रिश्तेदार द्वारा बहादुर पर चोरी का आरोप लगाना। एक दिन निर्मला के रिश्तेदार अपने पूरे परिवार के साथ उसके घर आते हैं। चाय-नाश्ते के बाद बातचीत के दौरान अचानक रिश्तेदार की पत्नी अपने ग्यारह रुपए खो जाने की बात कहती है। सभी बहादुर पर सन्देह करते हैं। बहादुर लगातार मना करता है कि मैंने रुपए नहीं लिए फिर भी उसे डराया-धमकाया जाता है तथा लेखक द्वारा पीटा भी जाता है। इसके बाद निर्मला भी उसे डराती-धमकाती है तथा दो-चार तमाचे भी जड़ देती है। तब भी बहादुर अपने निर्दोष होने की बात कहता है, परन्तु उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं करता। घर के सभी लोगों का बहादुर के प्रति कटुतापूर्ण व्यवहार, चोरी की घटना के बाद घर के सभी सदस्य बहादुर को घृणा व सन्देह की दृष्टि से देखने लगते हैं और उसे कुत्ते की तरह दुत्कारने लगते हैं। बहादुर भी अब उदास रहने लगता है, अब उसके मन में घरवालों के प्रति कोई अपनापन व लगाव न रहा।बहादुर को अब पहले की अपेक्षा अधिक डाँटा व मारा जाता है। उससे अब गलतियाँ व भूलें भी अधिक होने लगती हैं, जिस कारण अब वह काम में भी लापरवाही करने लगता है।

बहादुर का घर से भाग जाना

एक दिन उसके हाथ से सिल छूटकर गिर गई और उसके दो टुकड़े हो गए। पिटाई के डर तथा लोगों के क्रूर एवं असभ्य व्यवहार से तंग आकर वह अपना सारा सामान घर में ही छोड़कर कहीं चला जाता है। निर्मला, उसके पति एवं किशोर को उसकी ईमानदारी पर विश्वास हो गया था। वे जानते थे कि रिश्तेदार के रुपए उसने नहीं चराए थे। अन्त में सभी बहादुर पर स्वयं द्वारा किए गए अत्याचारों के लिए। पश्चाताप करने लगते हैं।

प्रश्न:- कहानी के तत्त्वों के आधार पर ‘बहादुर’ कहानी की समीक्षा कीजिए। अथवा ‘बहादुर’ कहानी की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अथवा ‘बहादुर’ कहानी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। 'अथवा' बहादुर’ कहानी का कथानक अपने शब्दों में लिखिए।


उत्तर:-  प्रसिद्ध नए कहानीकार अमरकान्त रचित ‘बहादुर’ कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर आधारित कहानी है। इसमें एक बेसहारा पहाड़ी लड़के की मार्मिक कथा का वर्णन है। कहानी के तत्त्वों के आधार पर प्रस्तुत कहानी की समीक्षा इस प्रकार है-

(i) कथावस्तु / कथानक

कथावस्तु की दृष्टि से अमरकान्त की सभी कहानियाँ जीवन के अन्तर्विरोधों को वास्तविक रूप में चित्रित करती हैं। उन्हें दलित, निम्न व पिछड़े वर्ग से विशेष सहानुभूति है। ‘बहादुर’ कहानी का प्रधान चरित्र उसी पिछड़े बेसहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। बहादुर बारह-तेरह वर्ष का लड़का है, जो पिता की मृत्यु के बाद, माँ की उपेक्षा व मार से खीझकर शहर भाग आता है। उसे एक मध्यम परिवार द्वारा नौकर के रूप में अपने घर में रख लिया जाता है। वह घर के सभी काम ईमानदारी व लगन से करता है। घरवालों द्वारा डाँट-फटकार तथा मार खाकर भी वह यथास्थिति काम करता रहता है। घरवालों द्वारा चोरी का आरोप लगाना उसे सबसे अधिक आघात पहुँचाता है, जिसके कारण वह एक दिन बिना किसी को बताए घर से चला जाता है। आरम्भ से अन्त तक सम्पूर्ण कहानी बहादुर के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। सहजता, स्वाभाविकता, मनोवैज्ञानिकता व यथार्थता की पृष्ठभूमि पर सुसंगठित कथावस्तु की दृष्टि से यह सफल कहानी है।

(ii) पात्र और चरित्र-चित्रण

‘बहादुर’ कहानी में मुख्य पात्र बहादुर है तथा लेखक, निर्मला, किशोर, रिश्तेदार, साले साहब, बहादुर के माता-पिता गौण पात्र हैं। कहानी की सम्पूर्ण कथावस्तु बहादुर के चरित्र पर टिकी हुई है तथा कहानी का शीर्षक भी चरित्र प्रधान है। कहानीकार ने निम्न वर्ग व मध्यम वर्ग की आन्तरिक वास्तविकताओं को उनके स्वभावगत रूप में पात्रों का चरित्र-चित्रण किया है। सभी पात्र कहानी की कथावस्तु के अनुरूप दृष्टिगत होकर अपनी-अपनी मनोवैज्ञानिकता को प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं।

(iii) कथोपकथन संवाद

प्रस्तुत कहानी का आरम्भ लेखक द्वारा आत्मकथात्मक शैली से होता है, परन्तु कहानी के मध्य में कथोपकथन/संवादों का सटीक प्रयोग हुआ है। कहानीकार ने सरल संक्षिप्त रोचक व गतिशील संवादों का सटीक प्रयोग कर कहानी के विकास को निरन्तर गति दी है; जैसे

“चल बना रोटी”

“नहीं बनाऊँगा”

“जी नहीं बाबूजी!”

अतः कहा जा सकता है, कहानी के कथोपकथन/संवाद पात्रानुकूल व स्थिति के अनुकूल सजीव बन पड़े हैं।

(iv) भाषा-शैली

प्रस्तुत कहानी में अमरकान्त ने सरल, स्वाभाविक और सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है तथा साथ ही चित्रात्मक शैली का भी प्रयोग किया है। भाषा कथा के अनुरूप है, जिसमें अन्य भाषाओं के शब्द भी लिए गए हैं; जैसे-शरारत, ओहदा, किस्सा, इज्जत आदि उर्दू शब्द हैं। लोकोक्तियों तथा मुहावरों का भी प्रयोग हुआ है; जैसे-माथा ठनकना, नौ दो ग्यारह होना, पंच बराबर होना आदि। इसके अतिरिक्त इसमें वर्णनात्मक, काव्यात्मक और आलंकारिक शैली का प्रयोग किया गया है।

(v) देशकाल और वातावरण

कहानी में देशकाल और वातावरण का भी ध्यान रखा गया है। कहानी में निम्न तथा मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सजीव तथा स्वाभाविक वातावरण का चित्रण किया गया है। अपनी आर्थिक तंगी के बावजूद समाज का मध्यम वर्ग अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करना चाहता है। नौकर पर रोब जमाना, उससे जी तोड़ काम कराना, उसे बात-बात पर बार-बार पीटना, गाली देना आदि घटनाओं तथा घर की अव्यवस्थित स्थिति ने पारिवारिक वातावरण को मार्मिक बना दिया है।

(vi) उद्देश्य

‘बहादुर’ कहानी उद्देश्य प्रधान कहानी है, यह कहानी निम्न एवं मध्यमवर्गीय समाज के मनोविज्ञान के वास्तविक चित्र को प्रदर्शित करती है। इस कहानी के माध्यम से वर्ग भेद मिटाने को प्रोत्साहन दिया गया है, जो मानवीय सहानुभूति के आधार पर ही मिट सकता है। कहानीकार ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि वर्तमान समाज झूठे प्रदर्शन व मान प्रतिष्ठा में स्वयं को इतना फँसा चुका है कि वह अपनी मनुष्यता व संवेदना को नष्ट करता जा रहा है।

(vii) शीर्षक

कहानी का ‘बहादुर’ शीर्षक आकर्षक व मुख्य पात्राधारित है। अमरकान्त जी की कहानी के शीर्षक व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित हैं। सम्पूर्ण कहानी की कथावस्तु घटनाएँ ‘बहादुर’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं बहादुर’ कहानी का शीर्षक अत्यन्त सरल, संक्षिप्त एवं रोचक है, जो पाठक के मन में कौतूहलता उत्पन्न करता है। अतः शीर्षक की दृष्टि स ‘बहादुर’ कहानी सफल व सार्थक है।

2 बहादुर’ कहानी के आधार पर बहादुर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

अथवा बहादुर’ कहानी के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर:-  बहादुर कहानी का मुख्य पात्र व नायक है। वह एक नेपाली किशोर है, जो अपने गाँव से शहर भाग आता है। बहादुर की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) छल-कपट रहित भोला बालक बारह-तेरह वर्ष का नेपाली बालक बहादुर’ बहुत ही भोला है और छल-कपट से कोसों दूर है। उसमें न तो किसी प्रकार की कृत्रिमता या बनावटीपन है और न ही किसी बात को छिपाने की कला। वह किसी भी बात का बिल्कुल सच एवं स्पष्ट उत्तर देता है।

(ii) परिश्रमी बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है। वह घर के सभी सदस्यों के अधिकांश कार्यों को करता है और उन्हें करते हुए न कोई आलस्य दिखाता है और न कोई अनमनापन। वह बड़े ही प्यार एवं जिम्मेदारी के साथ अपने कार्यों को सम्पन्न करता है।

(iii) हँसमुख एवं मृदुभाषी बहादुर हर समय हँसते रहने वाला लड़का है। वह । किसी भी बात को कहकर अपनी नैसर्गिक, स्वाभाविक हँसी जरूर हँसता है, जो सामने देखने-सुनने वालों के हृदय को झंकृत कर देती है। वह सभी लोगों के प्रश्नों का उत्तर बड़े ही मीठे स्वर में हँसकर देता है।

(iv) व्यवहार कुशल बहादुर बहुत व्यवहार कुशल बालक है। इसी व्यवहार कुशलता के कारण वह घर के सभी सदस्यों को अत्यधिक प्रभावित कर देता है। मोहल्ले के बच्चों को भी वह अपने गाने सुनाकर मोहित कर लेता है।

(v) स्नेही, सहनशील एवं स्वाभिमानी बालक वह निर्मला के अन्दर अपनी माँ की छवि देखता है। वह स्नेह का भूखा है। जब निर्मला उसका ध्यान रखती है, तो वह भी बीमार निर्मला का बहुत ख्याल रखता है। । बहादुर बड़ा सहनशील बालक है। वह घर के सारे काम करने के बावजूद निर्मला की डाँट खाता रहता है। किशोर भी बहादुर के साथ कई बार दुर्व्यवहार करता था। जिन्हें थोड़ी देर में ही वह भूल जाता है और अपने काम में पूर्ववत् लग जाता है। एक बार किशोर द्वारा उसके पिता से सम्बन्धित गाली देने पर उसका स्वाभिमान जाग जाता है। वह किशोर का काम करने से इनकार कर देता है।

(vi) मातृ-पितृभक्त बालक बहादुर का हृदय मातृभक्ति एवं पितभक्ति की भावना से ओत-प्रोत है। माँ द्वारा पीटे जाने के कारण घर से भागा बहादुर माँ के पास जाना नहीं चाहता, लेकिन माता-पिता के प्रति अपने फर्ज को वह अच्छी तरह समझता है। इसलिए वह अपने कमाए पैसों को माँ को ही देना चाहता है। अपने पिता के प्रति प्रेम ने ही उसे किशोर का काम करने से मना करने हेतु प्रेरित किया। ।

(vii) ईमानदार एवं सच्चा व्यक्तित्व गरीब होने के बावजूद भी बहादुर अत्यधिक ईमानदार बालक है, जिसे बेईमानी छु तक नहीं पाई है। उसके मन में कोई लालच नहीं है। वह घर छोड़कर जाते समय भी अपना सामान तक नहीं ले जाता है। इस प्रकार, बहादुर पाठकों के हृदय पटल पर अपना अमिट चित्र अंकित कर देता है। पाठक उसे लम्बे समय तक याद रखते हैं।

3 बहादुर कहानी के उददेश्य पर प्रकाश डालिए।

उत्तर :- अमरकान्त जी ने बहादुर कहानी में सामाजिक ढाँचे के भीतर आर्थिक विषमताओं के बीच जीवन जीने वाले दो भिन्न वर्गों के यथार्थ को चित्रित करने के साथ-साथ बाधित बचपन की कहानी को भी गति प्रदान की है।

बारह-तेरह वर्ष की उम्र के बहादुर का बचपन जीवन में लगातार आने वाली बाधाओं से रीता (खाली) ही रह गया। पहले माँ की ओर फिर। निर्मला की हृदयहीनता उसके बचपन व किशोरावस्था के सन्धिकाल के स्वाभाविक विकास में बाधा बनती है। जानवरों की भाँति क्रियाकलाप करते हुए, उसका अलमस्त रहना और हर पीड़ा के बाद सकारात्मक दृष्टिकोण से अपने लिए खुशी ढूँढ लेना बहादुर द्वारा बचपन को बचाए रखने का प्रमाण है। इसके साथ ही कहानीकार ने उस विसंगति को उजागर क्रिया है, जहाँ मध्य वर्ग की मानसिकता अपने ही वर्ग के विरोध में खड़े होकर उच्च वर्ग में शामिल होने की आकांक्षा को दिखाकर, मानवीय संवेदना को जागृत करना ही कहानी का मुख्य उद्देश्य है।

4 अमरकान्त की कहानियों का वातावरण पात्रों की मानसिक स्थिति का प्रतिबिम्बन है।” कथन के आधार पर ‘बहादुर’ कहानी की मूल संवेदना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर अमरकान्त ने ‘बहादुर’ कहानी में बहादुर के जीवन की निरन्तर तीव्र होती त्रासदी को एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए अत्यन्त सशक्त रूप में चित्रित किया है। जीवन तथा समाज के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण रखने वाले कथाकार अमरकान्त की कहानी ‘बहादुर’ के सभी चरित्र यथार्थवादी भूमि पर ही खड़े हैं। निर्मला, किशोर और गृहस्वामी जैसे पात्र केवल निर्मला के घर तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे मध्यवर्ग के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं। ये सभी पात्र परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव के कारण मानवीयता और संवेदनहीनता के अन्तर्द्वन्द्व में निरन्तर झूलते रहते हैं। अपने घर में मातृप्रेम को तरसता बहादुर,। निर्मला में माँ की और गृहस्वामी में पिता की छवि देखता है, परन्तु काँच की इन छवियों के टूटकर बिखरने और इनकी पीड़ा अनुभव करने वाला बहादुर, अन्ततः अपने भीतर के बच्चे को निर्मला के घर ही छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के पश्चात् घर में एक अजीब-सी उदासी छा जाती है; जैसे-अँगीठी न जलना, आँगन का गन्दा होना, बर्तन गन्दे होना , कहानी का त्रासद वातावरण समूचे घर की निष्क्रियता का प्रतीक बनकर सामने आता है। बहादुर की उपस्थिति जहाँ कहानी के भीतर घर के वातावरण को ऊर्जा से भर देती थी तथा व्यवस्था बनाए रखती थी, वहीं उसकी अनुपस्थिति में सुखमय घर की तस्वीर के स्थान पर घर काटने लगता है। अतः कहा जा सकता है कि बहादुर इस घर को और इस घर में रहने वालों को अपना मानता था लेकिन लगता है नौकर तो नहीं होता है फिर चाहे वो कितनी ही ईमानदारी से काम क्यों न करें।

Shubhakamana sandesh

तृतीय वर्ष, 2021 की छात्राओं के लिए विशेष संदेश

 नमस्कार 

आज  का दिन तृतीय वर्ष की छात्राओं के लिए बहुत विशेष है। उनका विदाई समारोह है, बेशक आप कॉलेज से चली जाएंगी लेकिन आप सब के साथ बिताया गया समय , आप सबका व्यवहार, काम, आप सब की बातें, आपकी यादें हमेशा हमारे साथ रहेंगी । वास्तव में देखा जाए तो ये खुशी का दिन है क्योंकि आप सब अपने मुकाम या मंजिल की और बढ़ रही हैं। 

आज मुझे पुराने विदाई समारोह भी याद आ रहे हैं, जब  लड़कियां नई साड़ियां पहन कर, सज-धज कर, बड़े जोश के साथ आती थीं, गले मिलती थीं,आंखों में आंसू होते थे, यादें होती थी... इसके साथ ही मुझे इस बात पर खेद भी है कि पिछले वर्ष हमारी बच्चियों ने ये सोचकर फेयरवेल लेने से मना कर दिया था कि शायद अगले वर्ष तक महामारी खत्म  हो जाएंगी  लेकिन हालात पिछले साल से भी ज्यादा खराब हैं,  आज परिस्थितियां बहुत ही चिंताजनक हैं, समय बहुत भयभीत करने वाला है। खैर... हिम्मत और धैर्य रखेंगे तो ये समय भी बीत ही जाएगा। कहते हैं -

"सूरज शाम को ढल ही जाता है

 फूल बसंत में खिल ही जाता है 

 मुसीबत में हिम्मत न हारना मेरे दोस्त 

 समय कैसा भी हो गुजर ही जाता है। 

 तो ये समय भी चला ही आएगा"

मैं आपको कहना चाहुंगी कि आप तो हिंदी विभाग की बेटियां हैं जिस तरह से मायके वाले अपनी बेटियों के साथ हमेशा खड़े रहते हैं हर संभव उनकी मदद करते हैं उनके अच्छे भविष्य की कामना करते हैं, उसी प्रकार  हिंदी विभाग भी आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है। आपको खुले आसमान में उड़ान भरते हुए, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है।  इस सफर में कभी भी आपको जरूरत पड़े हम हमेशा आपकी मदद के लिए तैयार हैं   

अंत में मैं 2 पंक्तियों से अपनी बात खत्म करना चाहूंगी-

सोचा!!! बहुत सोचा,

 क्या दूं मैं तुमको आज , 

बहुत ही खासमखास, 

जो रहे हमेशा तुम्हारे साथ ,

 तभी दिल पर रखा अपना हाथ ,

 हुआ मुझे एक प्यारा सा अहसास, 

और मन किया दे दूं तुम्हें आज , 

जीभकर दुआएं और आशीर्वाद  ..

अत: सभी प्यारी बालिकाओं के लिए ढेर सारी दुआएं, प्यार और आशीर्वाद। आप अपनी शिक्षा और संस्कार से भविष्य में मैत्रेयी कुटुंब का नाम रोशन करें,यही हम सब की कामना है, इसके लिए तुम्हें ढेर सारी शुभकामनाएं।

 धन्यवाद


नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...