काव्य के भेद/ काव्य रूप
साहित्य शब्द का अर्थ -
जब साहित्य का प्रारंभ हुआ तो उसके लिए वाङ् मय शब्द का प्रयोग किया जाता था | वाङ् मय शब्द वाक् +मय से बना है जिसका अर्थ होता है- वाणी का आलेख , यानि जो -जो वाणी के द्वारा कहा गया है वह सब वाङ् मय है इसलिए वाङ् मय संपूर्ण साहित्य के लिए प्रयोग जाता था और काव्य शब्द भी साहित्य के पर्याय रूप में मिलता हैं, अंग्रेजी में इसके लिए लिटरेचर शब्द प्रसिद्ध है, अगर हिंदी की दूसरी शैली उर्दू की बात करें तो उसमें अदब शब्द प्रयोग होता है|
जहाँ तक आज की बात है तो साहित्य शब्द अधिक प्रचलन में है और काव्य शब्द कहने से केवल पद्य का संकेत मिलता है गद्य का नही। लेकिन जब हम साहित्य कहते हैं तो उसमें गद्य और पद्य दोनों ही सम्मिलित हो जाते हैं इसीलिए आज हम साहित्य शब्द का ही प्रयोग करते हैं। लेकिन अगर हम काव्य रूप की बात करते हैं तो उसमें भी संपूर्ण साहित्य की बात हो जाती है।
सबसे पहले हम देखते हैं कि साहित्य शब्द का अर्थ क्या है साहित्य से हम क्या समझते हैं? व्युत्पत्तिपरक अर्थ की दृष्टि से देखें तो साहित्य शब्द बना है- = सहितस्य भाव: साहित्यम = यहाँ सह का अर्थ है साथ होना अर्थात जहां शब्द और अर्थ, विचार और भाव का परस्पर अनुकूलता के साथ सहभाव का संबंध होता है, उसे हम साहित्य कहते हैं । सहभाव किसका ? अर्थात शब्द और अर्थ का होता है या भाव और विचार में होता है लेकिन सहभाव परस्पर अनुकूलता के साथ होना चाहिए। मूल रूप में कह सकते हैं कि जहां शब्द और अर्थ , मानसिक विचार और मानसिक भाव का परस्पर संबंध हो , वह साहित्य कहलाता है साहित्य शब्द के लिए अंग्रेजी में लिटरेचर शब्द आता है जो लेटर से बना है या अक्षर से बना है |और साहित्य में जो हित शब्द जुड़ा है अर्थात कहा गया है- हितेन सह सहितं = इसका अर्थ है हित के साथ होना ,यानि साहित्य में हित का होना आवश्यक है अर्थात शब्द और अर्थ का स्वभाव तो रहेगा ही लेकिन वह हित से जुड़ा हूं, जिससे हित का संपादन हो, अब प्रश्न उठता है कि किसके हित का संपादन हो? कह सकते हैं कि जब काव्य से रचना करने वाले का भी और पाठक या दर्शक या श्रोता का भी हित का संपादन हो तब वह साहित्य कहलाता है।
साहित्य व्यापक अर्थ-
साहित्य ऐसी शाब्दिक रचना है जिसमें कोई हित या प्रयोजन हो जैसा की संस्कृत साहित्य में साहित्य को वाङ् मय का पर्याय कहा गया है इसका अर्थ है कि जितना भी हमारा शब्द भंडार और वाणी का विस्तार है वह सब साहित्य कहलाता है और जब हम यह कहते हैं कि जितना भी शब्द भंडार है जितना भी वाणी का विस्तार है वह सारा साहित्य है तो यह कह देने पर हमारा सारा ज्ञान विज्ञान का साहित्य और दूसरा साहित्य सब इसके अंतर्गत आ जाएगा। फिर चाहे वह कला है चाहे वह विज्ञान है चाहे वह समाजशास्त्र हो, नीतिशास्त्र हो अर्थात जितना भी साहित्य है वह इसके अंतर्गत आ जाता है।
साहित्य के रूप-
साहित्य के मुख्य रूप से दो रूप मान सकते हैं, पहला सर्जनात्मक साहित्य और दूसरा ज्ञान विज्ञान का साहित्य।
जिस साहित्य में भावना की प्रधानता है, जो रसात्मक साहित्य है अर्थात जो रस से युक्त है जो पाठक और दर्शक का हित लाभ करता है, उसे सृजनात्मक साहित्य कहेंगे। इसके लिए अंग्रेजी में लिटरेचर ऑफ पावर शब्द का प्रयोग मिलता है और उसे ही शक्ति का साहित्य काव्य कहा है, सर्जनात्मक साहित्य वह है जिसमें भावना की प्रधानता हो जिसमें रसात्मकता हो। जैसे महाकाव्य ,खंडकाव्य, कहानी, उपन्यास निबंध आदि.....। तो इसको हम सृजनात्मक साहित्य कहेंगे।
इस तरह से हम साहित्य के दो रूप मानते हैं पहला सर्जनात्मक साहित्य और दूसरा ज्ञान विज्ञान का साहित्य | जिसे अंग्रेजी में लिटरेचर ऑफ नॉलेज कहा जाता है, हिंदी में ज्ञान विज्ञान के साहित्य के अंतर्गत राजनीतिक विज्ञान, समाजशास्त्र, नीति शास्त्र, भूगोल, गणित, ज्योतिषशास्त्र आदि आ जाते हैं।
एक दूसरा साहित्य भी है जिसे हम आलोचनात्मक साहित्य कहते हैं | आलोचनात्मक साहित्य वह होता है, जिसमें शास्त्र सिद्धान्तों, कृतियों की आलोचना और आलोचनात्मक निबंध शामिल हैं। इसके भी दो रूप मिलते हैं - एक सैद्धांतिक/शास्त्रीय आलोचना और दूसरा व्यवहारिक आलोचना | सैद्धांतिक आलोचना को शास्त्रीय आलोचना भी कहते हैं जिसका प्रारंभ भरतमुनि का नाट्यशास्त्र से माना जाता है। उसके बाद दंडी, विश्वनाथ और आगे चलकर यह परंपरा हिंदी साहित्य के मध्यकाल में देखी जा सकती हैं, विशेष रूप से रीतिकाल में केशव, कुलपति मिश्र, चिंतामणि, मतिराम आदि अनेक कवि या आचार्यों ने शास्त्रीय आलोचना की है। आधुनिक काल में हिंदी साहित्य पर बंगला साहित्य और अंग्रेजी साहित्य का प्रभाव जब पड़ा तो साहित्य में सैद्धांतिक आलोचना के साथ-साथ व्यवहारिक आलोचना की भी शुरुआत हुई। इसे समीक्षा शास्त्र कहा जाता है। आधुनिक हिंन्दी साहित्य में रामचंद्र शुक्ल, गुलाब राय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और डॉ नामवर सिंह आदि अनेक आलोचक हुए हैं जिन्होंने आलोचना साहित्य को समृद्ध किया है । आधुनिक काल में डॉ.नगेद्र का नाम भी एक अच्छे आलोचक के रूप में गिना जाता है।
सर्जनात्मक साहित्य-
पाश्चात्य काव्यशास्त्र के प्रभाव के कारण (अंग्रेजी साहित्य ) हमें काव्य रूपों के भिन्न-भिन्न रूप मिलते हैं लेकिन भरतमुनि या विश्वनाथ के आधार पर या संस्कृत के काव्य शास्त्रियों ने जो काव्य का विभाजन किया है अर्थात जिन काव्य रूपों की बात की है या जो काव्य का वर्गीकरण किया है या जो हमारी परंपरा रही है उनकी अगर बात करें तो वह विभाजन इस प्रकार या इस आधार पर किया जा सकता है-
1 सर्जनात्मक साहित्य
सर्जनात्मक साहित्य के अनेक भेद हैं और इन भेदों के पीछे चार प्रमुख आधार हैं-
1. गोचरता ( इंद्रियजन्य )
2. शैलीबंध की दृष्टि से
3. कवि की जीवन दृष्टि
4. कवि मन: प्रवृत्ति
गोचरता के आधार पर साहित्य के मूल रूप से दो भेद किए जाते हैं -
दृश्य काव्य
श्रव्य काव्य
1 दृश्य काव्य - जिसे हम अपनी आंखों से या नेत्र इंद्री से देखते हैं और जिसे हम कानों/ कर्ण से सुनकर जिस का आनंद लेते हैं वह दृश्य काव्य कहलाता है।
दृश्य काव्य = दृश्य काव्य वह है जिसमें हम अपनी नेत्र इंद्रियो से रस की अनुभूति को प्राप्त करते हैं । इसके मूलतः दो भेद हैं= रूपक और उपरूपक।
रूपक
रूपक के 10 भेद है-
1 नाटक 2 प्रकरण 3 भाण 4 व्यायोग 5 वीथि 6 अंक
7 प्रहसन 8 समवकार 9 डिम 10 ईहामृग ।
उप रूपक-
उपरूपक के 18 भेद -
1 नाटिका 2 त्रोटक 3 गोष्टी 4 सट्टक 5 नाट्य रासक 6 प्रस्थानक 7 उल्लाप्य 8 काव्य 9 प्रेङखण 10 रासक 11 संलापक 12 श्रीगदित 13 शिल्पक 14 बिलासिका 15 दुर्मल्लिका 16 प्रकरणिका 17 हल्लीस 18 भणिका
अभी हमने बात की दृश्य काव्य की अब हम बात करते हैं - श्रव्य काव्य की। ये भी इंद्रिय जन्य है।
2 श्रव्य काव्य =
श्रव्य काव्य जिसे हम कानों से यानी कर्ण इंद्रियों से सुनकर आनंद प्राप्त करते हैं क्योंकि हमारा आरम्भिक काव्य मूलतः मौखिक रूप में ही प्रचलित था और कहानी या कविता आदि को सुनाया जाता था और सुनकर के आनंद लिया जाता था तो इसलिए श्रव्य काव्य कहा जाता है। आज इसी श्रव्य काव्य के लिए पठ्य काव्य भी कहा जाता है अर्थात जिसको पढ़ कर आनंद लिया जाए।
इस प्रकार दृश्य काव्य वह है जो मंच पर अभिनीत किया जाए और जिसको देखकर आनंद लिया जाता है और श्रव्य वह है जिसे सुनकर या पढ़कर के आनंद लिया जाए।
दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य में अंतर
नाटक आदि को दृश्य काव्य कहा कहा गया है। दृश्य काव्य समाज से जुड़ा हुआ है, उसको आप एक प्रकार से समाज समूह के साथ बैठकर देखते हो और इसका आनंद शिक्षित, अल्प शिक्षित, अशिक्षित, अर्थात सभी वर्ग के लोग ले सकते हैं इसलिए नाटक को पंचम वेद भी कहा गया है। इन दोनों के बीच यही मूल अंतर है कि जो दृश्य काव्य है वह समाज से जुड़ा हुआ है उसको आप समूह के साथ बैठकर देखते हो अर्थात जब आप नाटक या फ़िल्म देखने जाते हैं तो समाज समुह के बीच बैठकर देखते हैं और उस नाटक का आनंद सामुहिक रूप से उठाते हैं। उसको देखने का की समय सीमा तय होती है, परंतु जो श्रव्य काव्य है उसका आनंद एकांत में बैठकर भी लिया जा सकता है और सामूहिकता में भी। इसमें बैठने की सीमा भी नहीं होती | अगर आपने कोई कहानी पढ़नी शुरू की एक घंटा भी पढ़ कर बाकी अगले दिन पढ़ने के लिए छोड़ सकते हैं। फिर अगले दिन कुछ पढ़ लिया, या एक सप्ताह , एक महीना तक भी उसको पढ़ने में समय लगा सकते हैं , उसमें समय सीमा नहीं है काव्य का आनंद आप अकेले ले सकते हैं या बैठे हुए, सोते हुए भीआप उसका आनंद ले सकते हैं ।
श्रव्य काव्य
श्रव्य काव्य के तीन भेद किए जाते हैं
1 पद्य
2 गद्य
3 चंपू काव्य
अब हम बात करते हैं - श्रव्य काव्य की ये भी इंद्रिय जन्य है
पद्य-
पद्य से अभिप्राय है छंदोंबध रचना, जिसमें छंदों का ध्यान रखा गया है उसे हम पद्य कहते हैं, पद्य अर्थात कविता या पोएट्री, जिसमें भावों को प्रमुखता दी जाती है और गद्य जिसे प्रोज कहा जाता है और जो छंद बद्ध नहीं होती, जिसमें विचारों की प्रधानता रहती है, अर्थात ये रचनाएं विचारात्मक होती हैं और चंपू काव्य वह कहलाता है जो गद्य और पद्य का मिश्रित रूप होता है। उसमें गद्य रहता है और पद्य भी रहता है।
पद्य के भेद-
अब सबसे पहले हम बात करते हैं पद्य के दो भेदों की । इसके दो भेद माने गए हैं-
प्रबंध काव्य और मुक्तक काव्य
प्रबंध काव्य से अभिप्राय है जो बंधा हुआ रहता हो। जिसकी कथा में पूर्वा पर संबंध रहता हो, एक कथा होती है उसमें किसी की पूरी कहानी होती है जिसमें से हम एक घटना को एक कथा को अलग नहीं कर सकते प्रबंध काव्य किसी पात्र के संपूर्ण जीवन का चित्रण होता है
और मुक्तक काव्य होता है वह पूर्वा पर संबंध से रहित रहता है उसमें प्रत्येक क्षण अपने आप में स्वतंत्र होता है अलग-अलग होते हैं चाहे वह कविता के रूप में हो सवैया के रूप में हो दोहे के रूप में हो पदों के रूप में हो पर प्रत्येक क्षण अपने पूर्ववर्ती छंद से या प्रवृत्ति छंद से आश्रित नहीं रहता वह पूर्णत स्वतंत्र रहता है जबकि प्रबंध काव्य में प्रत्येक क्षण एक दूसरे से बंधा होता है और प्रबंध काव्य के 2 मूल भेद किए जाते हैं
1 महाकाव्य
2 खंड काव्य
महाकाव्य इतिहास प्रसिद्ध कथा को लेकर या किसी प्रख्यात आख्यान को लेकर लिखा जाता है और उसका जो नायक या नायिका होता है या होती है, उसके संपूर्ण जीवन का चित्रण किया जाता है। नायक के जन्म से लेकर अंत तक पूर्ण जीवन का चित्रण महाकाव्य में रहता है।
दूसरा खंडकाव्य में नायक के पूर्ण जीवन का चित्रण न होकर उसके जीवन की किसी एक घटना पर आधारित रहता है। जैसे रामचरितमानस एक महाकाव्य है जिसमें राम के जन्म से लेकर उनके वनवास और उनके वापस अयोध्या आने तक का पूरी कथा रहती है और अगर उसमें से केवल केवट प्रसंग को आधार बनाकर लिखा जाए तो वह खंडकाव्य है। जैसे दिनकर कर्ण के जीवन को लेकर रश्मि बंध लिखा और तुलसीदास ने पार्वती मंगल की रचना की है। खंडकाव्य में नायक के जीवन की किसी एक विशेष घटना, प्रसंग को लेकर उस को आधार बनाकर काव्य की रचना की जाती है। महाकाव्य और खंडकाव्य के आकार में भी विभिन्नता होती है ।महाकाव्य विशाल आकार का होता है और खंडकाव्य लघु आकार का होता है। महाकाव्य का नायक धीरोदात्त होता है , इतिहास प्रसिद्ध होता है, खंडकाव्य में ऐसा आवश्यक नहीं होता। उसका नायक कोई उदात्त चरित्र वाला भी हो सकता है। उसका नायक कोई सामान्य पात्र भी हो सकता है। महाकाव्य अनेक वर्गों में विभक्त होता है। महाकाव्य में अनेक प्रासंगिक कथाएं होती हैं और वे प्रासंगिक कथाएं आधिकारिक कथा को आगे बढ़ाने में सहायक रहती है महाकाव्य में प्रत्येक छंद के अंत में छंद परिवर्तन हो जाता है। रामचरित मानस में इस विधान को देख सकते हैं। महाकाव्य में प्रकृति का चित्रण होगा, नायक के चरित्र का विस्तार से वर्णन होगा, वस्तु वर्णन अधिक होता है जैसे- आखेट वर्णन, नगर वर्णन आदि मिलते हैं इस प्रकार महाकाव्य का आकार विस्तृत होता है और खंडकाव्य का आकर सीमित होता है। महाकाव्य संस्कृत में अनेक मिलते हैं जैसे कालिदास का रघुवंश। इसी तरह से हिंदी साहित्य में भी महाकाव्य और खंंडकाव्य गए हैं संस्कृत में रामायण बहुत बड़ा महाकाव्य है। हिंदी में तुलसीदास का रामचरितमानस है या सूफी काव्य जैसे जायसी का पद्मावत है। आधुनिक काल में हम देखते हैं मैथिलीशरण गुप्त का साकेत है, हरिऔध का प्रियप्रवास है और इसी तरह से खंडकाव्य की रचना भी हिंदी साहित्य में हुई है। हिंदी में अनेक खंडकाव्य मिलते हैं जैसे पंचवटी है, मिलन है तो इस प्रकार अनेक खंडकाव्य लिखे गए हैं।
पद्य का दूसरा भेद है मुक्तक काव्य
मुक्तक काव्य के भी दो भेद है -
पाठ्य
प्रगीत काव्य
पाठ्य के अंतर्गत हम देखते हैं कि रहीम के दोहे, बिहारी के दोहे, कबीर के दोहे और मीरा के पद, सूरदास के पद यह सब पाठ्य के अंतर्गत आते हैं।
प्रगीत वह होता है जिसमें गेयता होती है। जैसे महादेवी वर्मा के गीत है वह प्रगीत के अंतर्गत आते हैं । जिसको अंग्रेजी में लिरिक कहते हैं। मीरा के कुछ पद भी प्रगीत के अंतर्गत आते हैं । उनको गाया जा सकता है।
जो मुक्तक हैं, जिसमें दोहा, सोरठा, कवित्त या धनानंद के कवित्त आते हैं। यह अपने आप में स्वतंत्र होते है, पूर्ण होते हैं। उसमें पूर्वा पर संबंध नहीं होता है। उसमें कथा नहीं होती और प्रत्येक छंद में एक पूरा भाव सिमट कर रह जाता है और जो प्रगीत है उसमें गेयता की प्रधानता रहती है। उसमें गीति तत्व की प्रधानता रहती है। आगे चलकर हिंदी साहित्य में नवगीत के रूप में प्रगीत का विकास देख सकते हैं , या प्रगीत के उपभेद के रूप में भी देख सकते हैं ।
श्रव्य काव्य का दूसरा भेद है गद्य = गद्य वह है जिसमें छंदों बद्धता नहीं रहती है छंद नहीं रहते हैं और प्रारंभ में जब प्रेस नहीं थी और मौखिक साहित्य ही अधिक रहता था तो पद्य काव्य का रूप था। पूरा मध्यकालीन साहित्य पद्य रूप में ही मिलता है।
गद्य बहुत कम लिखा गया है संस्कृत में भी हमें बाणभट्ट की कादंबरी या हर्षचरित तो मिलते हैं, लेकिन बहुत कम मात्रा में लिखा गया हैं। गद्य का विकास मुख्य रूप से आधुनिक काल में ही हुआ है जब प्रिंटिंग प्रेस आ गई मुद्रित अवस्था में साहित्य उपलब्ध होने लगा तब तब पद्य की अपेक्षा गद्य की नवीन विधाओं का विकास हुआ तो गधे जिसमें हम देखते हैं कि उपन्यास है, कहानी, निबंध ,जीवनी, रेखाचित्र, संस्मरण और रिपोर्ताज, वार्ता, यात्रा वृतांत, पत्र लेखन, डायरी लेखन यह सब गद्य की नवीन विधाएं हैं, जिसमें लेखक अपने भावों को अपने विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
और तीसरा चंपू काव्य जिसमें पद्य और गद्य दोनों का मिश्रण मिलता है ।
कवि की जीवन दृष्टि = 1 यथार्थवादी दृष्टि 2, आदर्शवादी दृष्टि
लेखक की जीवन दृष्टि या विचारधारा जैसी होती है वह उसके अनुरूप ही साहित्य सर्जन करते हैं। अगर लेखक यथार्थवादी दृष्टि से प्रेरित है या फिर वह जो समाज मे घटित हो रहा है उस यथार्थ को प्रस्तुत करने की अभिलाषा रखता है तो वह साहित्य यथार्थवादी साहित्य कहलाता है। जैसे यशपाल के उपन्यास हैं वे यथार्थ परक हैं ।
और आदर्शवादी दृष्टि जहां लेखक व साहित्यकार समाज में जो घटित हो रहा है, उसको देखते हुए वास्तव मेंं समाज को क्या होना चाहिए? साहित्य समाज को क्या दिशा निर्देश दे सकता है? इस। बातको ध्यान में रख कर रचना करता है तो वह आदर्शवादी साहित्य है। क्योंकि समाज में जो हो रहा है वह तो उसको देख ही रहा है अगर उसी को प्रस्तुत करना साहित्य का साहित्यकार का उद्देश्य नहीं होता। तो जो हो रहा है उसके स्थान पर क्या होना चाहिए? क्या समाज का आदर्श रूप होना चाहिए? यह दृष्टि लेकर जब कोई साहित्यकार रचना करता है तो वह आदर्शवादी दृष्टि कहलाती है। इसका बहुत अच्छा उदाहरण रामचरितमानस है उसको देख लीजिए वह आदर्श से प्रेरित ग्रंथ है। उस समय समाज की जो राजनीतिक स्थिति थी, धार्मिक स्थिति थी, परिवेश था या जिस तरह का व्यवहार समाज में हो रहा था, जो शोषण हो रहा था अंग्रेज शासन या मुगल शासन के द्वारा, जो समाज का या जनता का शोषण किया जा रहा था, उसको देखते हुए तुलसीदास एक रामराज्य की कल्पना करते हैं। यह एक बहुत बड़ी विराट कल्पना थी या कहें कि यह एक आदर्श स्थिति थी कि राजा कैसा होना चाहिए ? राजा का क्या कर्तव्य होना चाहिए? प्रजा का क्या कर्तव्य होना चाहिए? भाई भाई के बीच कैसा संबंध होना चाहिए? माता पुत्र का संबंध, स्वामी और सेवक का संबंध कैसा होना चाहिए? तो यह एक आदर्शवादी दृष्टि है जो हमें रामचरित में मिलती है।। आधुनिक काल में प्रेमचंद का साहित्य की दृष्टि देख सकते हैं, उनके यथार्थ को देख सकते हैं, उनकी कहानी, उनके उपन्यास, उन्होंने जो किसान की दशा का वर्णन किया है, समाज के शोषण का वर्णन, व्यवस्था का, दहेज प्रथा की समस्या की बात करते हैं, बाल विवाह की बात करते हैं, वह समाज के यथार्थ को लेते हैं परंतु उसे आदर की ओर मोड़ देते हैं, उनका जो यथार्थवाद है वह आदर्शउन्मुख यथार्थवाद है। समाज के यथार्थ को प्रस्तुत करते हुए क्या वास्तविकता में समाज को कैसा होना चाहिए यह उस साहित्य का लक्ष्य भी है मूल उद्देश्य भी यही है कि वे समाज को एक दिशा या प्रेरणा देना चाहते हैं तो वह आदर्शनामुखी यथार्थ है । तो इस प्रकार जो साहित्यकार की जीवन दृष्टि या विचारधारा है उसके आधार पर मूलतः काव्य के दो भेद के जाते हैं एक यथार्थवादी दृष्टि और दूसरी आदर्शवादी दृष्टि।
कवि की मन: प्रवृत्ति-
1 विषयीगत साहित्य
2 विषयगत साहित्य
इसी तरह से एक और काव्य के वर्गीकरण का आधार है कवि की प्रवृत्ति के आधार पर कभी की जो मन प्रवृत्ति है उसकी जो सोच है उसके आधार पर भी दृष्टि से काव्य के दो भेद हैं एक विषय गत साहित्य और दूसरा विषय गत साहित्य विषय गत साहित्य सब्जेक्टिव लिटरेचर कहा जाता है सब्जेक्ट इन लिटरेचर ऐसा होता है जिसमें कभी अपने निजी सुख-दुख की अभिव्यक्ति करता है जो कभी के अपने मन के भाव है आत्मा भी व्यक्ति है उसको वे प्रस्तुत करते हैं तो निजी सुख-दुख को जब कभी प्रस्तुत करता है तो वह कभी कहता है कि मैंने मैं शैली अपनाई तो यह मैं शैली में जो कविता प्रस्तुत की गई वह विषई गत है महादेवी के गीत देख लीजिए उनमें नीचे सुख-दुख की अभिव्यक्ति है उनके वेदना परख गीत जो है वह विषयीगत साहित्य के अंतर्गत आ जाते हैं
और दूसरा है विषयगत साहित्य है जिसे ऑब्जेक्टिव स्ट्रेचर कहा जाता है जिसमें कभी अपनी अनुभूति को निजी अनुभूति को किसी पात्र के माध्यम से किसी पात्र की कल्पना करके जीवन का जो सामान्य वर्णन करता है जो सामान्य जीवन की अनुभूतियां है उसको वह चित्रित करता है अपने मेरे साथ यह वह अपने यह मेरे साथ ही हुआ उसको वह किसी पात्र के माध्यम से किसी पात्र की कल्पना करके जीवन का सामान्य विवरण करता है नीचे अनुभूति को करके वह जीवन का सामान्य वर्णन करता है अपने मेरे साथ यह हुआ मैंने यह किया अपनी वेदना को अभिव्यक्त ना करके वह अपने अनुभव को पात्रों के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान करता है तो विषय गत साहित्य कहलाता है एक्टिव लिटरेचर कहलाता है कहलाता है
तो इस तरह से हमने जो काव्य की जो भेद थे उसका एक जो आधार था, एक और वर्गीकरण है- शैली बद्ध के आधार पर। इस दृष्टि से काव्य के वही दो भेद हैं जो हमने पद्य के किए थे- एक प्रबंध और मुक्तक। शैली बद्ध की दृष्टि से भी काव्य के यही दो भेद माने जाते हैं- प्रबंध काव्य और मुक्तक काव्य प्रबंध जिसमें एक कथा होती है कहानी होती है जो प्रारंभ से लेकर अंत तक चलती है जिसके किसी भी एक अंश को निकाला नहीं जा सकता और यह प्रबंधआत्मा केवल पद्य में नहीं बल्कि गद्य में भी होती है जैसे उपन्यास कहानी है। उपन्यास या कहानी का पूूर्वआपर संबंध होता है उपन्यास जुड़ा हुआ या बंधा हुआ होता है और उस में से किसी एक अंश को निकाल कर उसको अलग नहीं कर सकते। कहानी अलग विधा है। कहानी एक स्वतंत्र विधा है। उपन्यास भी एक स्वतंत्र विधा है। उपन्यास में जो भी विषय लिया गया है उस विषय का विस्तार से वर्णन रहता है और उसकी कोई सीमा नहीं होती वह 500 पृष्ठ का भी सकता है , 800 का भी हो सकता है सो पृष्ठ का भी हो सकता है, कितने पृष्ठ हो सकते हैं तो शैली बंध की दृष्टि से गद्य में उपन्यास कहानी और निबंध आदि आते हैं और पद्य की दृष्टि से देखें तो प्रबंध में महाकाव्य और खंडकाव्य आ जाते हैं और दूसरा उसका भेद है मुक्तक और इसी तरह से आधुनिक कविता में हम देखते हैं कि गीत, नव गीत कविता यह भी मुक्तक भेद कहलाते हैं। इसमें प्रत्येक गीत स्वतंत्र होता है प्रत्येक गीत में किसी एक भाव विशेष को लिया जाता है और उसका विशेष की एक मार्मिक अभिव्यंजना प्रस्तुत की जाती है कभी की जो अनुभूति है उस पूरे गीत में सिमट कर रह जाते गीत अपने आप में स्वतंत्र होता है महादेव के गीत देख लीजिए बालकृष्ण शर्मा नवीन के, दिनकर ने स्वतंत्र रूप से लिखें , रश्मिरथी खंड काव्य की रचना की। इस तरह से हम काव्य रूपो का विभाजन कर सकते हैं।
साहित्य शब्द का अर्थ -
जब साहित्य का प्रारंभ हुआ तो उसके लिए वाङ् मय शब्द का प्रयोग किया जाता था | वाङ् मय शब्द वाक् +मय से बना है जिसका अर्थ होता है- वाणी का आलेख , यानि जो -जो वाणी के द्वारा कहा गया है वह सब वाङ् मय है इसलिए वाङ् मय संपूर्ण साहित्य के लिए प्रयोग जाता था और काव्य शब्द भी साहित्य के पर्याय रूप में मिलता हैं, अंग्रेजी में इसके लिए लिटरेचर शब्द प्रसिद्ध है, अगर हिंदी की दूसरी शैली उर्दू की बात करें तो उसमें अदब शब्द प्रयोग होता है|
जहाँ तक आज की बात है तो साहित्य शब्द अधिक प्रचलन में है और काव्य शब्द कहने से केवल पद्य का संकेत मिलता है गद्य का नही। लेकिन जब हम साहित्य कहते हैं तो उसमें गद्य और पद्य दोनों ही सम्मिलित हो जाते हैं इसीलिए आज हम साहित्य शब्द का ही प्रयोग करते हैं। लेकिन अगर हम काव्य रूप की बात करते हैं तो उसमें भी संपूर्ण साहित्य की बात हो जाती है।
सबसे पहले हम देखते हैं कि साहित्य शब्द का अर्थ क्या है साहित्य से हम क्या समझते हैं? व्युत्पत्तिपरक अर्थ की दृष्टि से देखें तो साहित्य शब्द बना है- = सहितस्य भाव: साहित्यम = यहाँ सह का अर्थ है साथ होना अर्थात जहां शब्द और अर्थ, विचार और भाव का परस्पर अनुकूलता के साथ सहभाव का संबंध होता है, उसे हम साहित्य कहते हैं । सहभाव किसका ? अर्थात शब्द और अर्थ का होता है या भाव और विचार में होता है लेकिन सहभाव परस्पर अनुकूलता के साथ होना चाहिए। मूल रूप में कह सकते हैं कि जहां शब्द और अर्थ , मानसिक विचार और मानसिक भाव का परस्पर संबंध हो , वह साहित्य कहलाता है साहित्य शब्द के लिए अंग्रेजी में लिटरेचर शब्द आता है जो लेटर से बना है या अक्षर से बना है |और साहित्य में जो हित शब्द जुड़ा है अर्थात कहा गया है- हितेन सह सहितं = इसका अर्थ है हित के साथ होना ,यानि साहित्य में हित का होना आवश्यक है अर्थात शब्द और अर्थ का स्वभाव तो रहेगा ही लेकिन वह हित से जुड़ा हूं, जिससे हित का संपादन हो, अब प्रश्न उठता है कि किसके हित का संपादन हो? कह सकते हैं कि जब काव्य से रचना करने वाले का भी और पाठक या दर्शक या श्रोता का भी हित का संपादन हो तब वह साहित्य कहलाता है।
साहित्य व्यापक अर्थ-
साहित्य ऐसी शाब्दिक रचना है जिसमें कोई हित या प्रयोजन हो जैसा की संस्कृत साहित्य में साहित्य को वाङ् मय का पर्याय कहा गया है इसका अर्थ है कि जितना भी हमारा शब्द भंडार और वाणी का विस्तार है वह सब साहित्य कहलाता है और जब हम यह कहते हैं कि जितना भी शब्द भंडार है जितना भी वाणी का विस्तार है वह सारा साहित्य है तो यह कह देने पर हमारा सारा ज्ञान विज्ञान का साहित्य और दूसरा साहित्य सब इसके अंतर्गत आ जाएगा। फिर चाहे वह कला है चाहे वह विज्ञान है चाहे वह समाजशास्त्र हो, नीतिशास्त्र हो अर्थात जितना भी साहित्य है वह इसके अंतर्गत आ जाता है।
साहित्य के रूप-
साहित्य के मुख्य रूप से दो रूप मान सकते हैं, पहला सर्जनात्मक साहित्य और दूसरा ज्ञान विज्ञान का साहित्य।
जिस साहित्य में भावना की प्रधानता है, जो रसात्मक साहित्य है अर्थात जो रस से युक्त है जो पाठक और दर्शक का हित लाभ करता है, उसे सृजनात्मक साहित्य कहेंगे। इसके लिए अंग्रेजी में लिटरेचर ऑफ पावर शब्द का प्रयोग मिलता है और उसे ही शक्ति का साहित्य काव्य कहा है, सर्जनात्मक साहित्य वह है जिसमें भावना की प्रधानता हो जिसमें रसात्मकता हो। जैसे महाकाव्य ,खंडकाव्य, कहानी, उपन्यास निबंध आदि.....। तो इसको हम सृजनात्मक साहित्य कहेंगे।
इस तरह से हम साहित्य के दो रूप मानते हैं पहला सर्जनात्मक साहित्य और दूसरा ज्ञान विज्ञान का साहित्य | जिसे अंग्रेजी में लिटरेचर ऑफ नॉलेज कहा जाता है, हिंदी में ज्ञान विज्ञान के साहित्य के अंतर्गत राजनीतिक विज्ञान, समाजशास्त्र, नीति शास्त्र, भूगोल, गणित, ज्योतिषशास्त्र आदि आ जाते हैं।
एक दूसरा साहित्य भी है जिसे हम आलोचनात्मक साहित्य कहते हैं | आलोचनात्मक साहित्य वह होता है, जिसमें शास्त्र सिद्धान्तों, कृतियों की आलोचना और आलोचनात्मक निबंध शामिल हैं। इसके भी दो रूप मिलते हैं - एक सैद्धांतिक/शास्त्रीय आलोचना और दूसरा व्यवहारिक आलोचना | सैद्धांतिक आलोचना को शास्त्रीय आलोचना भी कहते हैं जिसका प्रारंभ भरतमुनि का नाट्यशास्त्र से माना जाता है। उसके बाद दंडी, विश्वनाथ और आगे चलकर यह परंपरा हिंदी साहित्य के मध्यकाल में देखी जा सकती हैं, विशेष रूप से रीतिकाल में केशव, कुलपति मिश्र, चिंतामणि, मतिराम आदि अनेक कवि या आचार्यों ने शास्त्रीय आलोचना की है। आधुनिक काल में हिंदी साहित्य पर बंगला साहित्य और अंग्रेजी साहित्य का प्रभाव जब पड़ा तो साहित्य में सैद्धांतिक आलोचना के साथ-साथ व्यवहारिक आलोचना की भी शुरुआत हुई। इसे समीक्षा शास्त्र कहा जाता है। आधुनिक हिंन्दी साहित्य में रामचंद्र शुक्ल, गुलाब राय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और डॉ नामवर सिंह आदि अनेक आलोचक हुए हैं जिन्होंने आलोचना साहित्य को समृद्ध किया है । आधुनिक काल में डॉ.नगेद्र का नाम भी एक अच्छे आलोचक के रूप में गिना जाता है।
सर्जनात्मक साहित्य-
पाश्चात्य काव्यशास्त्र के प्रभाव के कारण (अंग्रेजी साहित्य ) हमें काव्य रूपों के भिन्न-भिन्न रूप मिलते हैं लेकिन भरतमुनि या विश्वनाथ के आधार पर या संस्कृत के काव्य शास्त्रियों ने जो काव्य का विभाजन किया है अर्थात जिन काव्य रूपों की बात की है या जो काव्य का वर्गीकरण किया है या जो हमारी परंपरा रही है उनकी अगर बात करें तो वह विभाजन इस प्रकार या इस आधार पर किया जा सकता है-
1 सर्जनात्मक साहित्य
सर्जनात्मक साहित्य के अनेक भेद हैं और इन भेदों के पीछे चार प्रमुख आधार हैं-
1. गोचरता ( इंद्रियजन्य )
2. शैलीबंध की दृष्टि से
3. कवि की जीवन दृष्टि
4. कवि मन: प्रवृत्ति
गोचरता के आधार पर साहित्य के मूल रूप से दो भेद किए जाते हैं -
दृश्य काव्य
श्रव्य काव्य
1 दृश्य काव्य - जिसे हम अपनी आंखों से या नेत्र इंद्री से देखते हैं और जिसे हम कानों/ कर्ण से सुनकर जिस का आनंद लेते हैं वह दृश्य काव्य कहलाता है।
दृश्य काव्य = दृश्य काव्य वह है जिसमें हम अपनी नेत्र इंद्रियो से रस की अनुभूति को प्राप्त करते हैं । इसके मूलतः दो भेद हैं= रूपक और उपरूपक।
रूपक
रूपक के 10 भेद है-
1 नाटक 2 प्रकरण 3 भाण 4 व्यायोग 5 वीथि 6 अंक
7 प्रहसन 8 समवकार 9 डिम 10 ईहामृग ।
उप रूपक-
उपरूपक के 18 भेद -
1 नाटिका 2 त्रोटक 3 गोष्टी 4 सट्टक 5 नाट्य रासक 6 प्रस्थानक 7 उल्लाप्य 8 काव्य 9 प्रेङखण 10 रासक 11 संलापक 12 श्रीगदित 13 शिल्पक 14 बिलासिका 15 दुर्मल्लिका 16 प्रकरणिका 17 हल्लीस 18 भणिका
अभी हमने बात की दृश्य काव्य की अब हम बात करते हैं - श्रव्य काव्य की। ये भी इंद्रिय जन्य है।
2 श्रव्य काव्य =
श्रव्य काव्य जिसे हम कानों से यानी कर्ण इंद्रियों से सुनकर आनंद प्राप्त करते हैं क्योंकि हमारा आरम्भिक काव्य मूलतः मौखिक रूप में ही प्रचलित था और कहानी या कविता आदि को सुनाया जाता था और सुनकर के आनंद लिया जाता था तो इसलिए श्रव्य काव्य कहा जाता है। आज इसी श्रव्य काव्य के लिए पठ्य काव्य भी कहा जाता है अर्थात जिसको पढ़ कर आनंद लिया जाए।
इस प्रकार दृश्य काव्य वह है जो मंच पर अभिनीत किया जाए और जिसको देखकर आनंद लिया जाता है और श्रव्य वह है जिसे सुनकर या पढ़कर के आनंद लिया जाए।
दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य में अंतर
नाटक आदि को दृश्य काव्य कहा कहा गया है। दृश्य काव्य समाज से जुड़ा हुआ है, उसको आप एक प्रकार से समाज समूह के साथ बैठकर देखते हो और इसका आनंद शिक्षित, अल्प शिक्षित, अशिक्षित, अर्थात सभी वर्ग के लोग ले सकते हैं इसलिए नाटक को पंचम वेद भी कहा गया है। इन दोनों के बीच यही मूल अंतर है कि जो दृश्य काव्य है वह समाज से जुड़ा हुआ है उसको आप समूह के साथ बैठकर देखते हो अर्थात जब आप नाटक या फ़िल्म देखने जाते हैं तो समाज समुह के बीच बैठकर देखते हैं और उस नाटक का आनंद सामुहिक रूप से उठाते हैं। उसको देखने का की समय सीमा तय होती है, परंतु जो श्रव्य काव्य है उसका आनंद एकांत में बैठकर भी लिया जा सकता है और सामूहिकता में भी। इसमें बैठने की सीमा भी नहीं होती | अगर आपने कोई कहानी पढ़नी शुरू की एक घंटा भी पढ़ कर बाकी अगले दिन पढ़ने के लिए छोड़ सकते हैं। फिर अगले दिन कुछ पढ़ लिया, या एक सप्ताह , एक महीना तक भी उसको पढ़ने में समय लगा सकते हैं , उसमें समय सीमा नहीं है काव्य का आनंद आप अकेले ले सकते हैं या बैठे हुए, सोते हुए भीआप उसका आनंद ले सकते हैं ।
श्रव्य काव्य
श्रव्य काव्य के तीन भेद किए जाते हैं
1 पद्य
2 गद्य
3 चंपू काव्य
अब हम बात करते हैं - श्रव्य काव्य की ये भी इंद्रिय जन्य है
पद्य-
पद्य से अभिप्राय है छंदोंबध रचना, जिसमें छंदों का ध्यान रखा गया है उसे हम पद्य कहते हैं, पद्य अर्थात कविता या पोएट्री, जिसमें भावों को प्रमुखता दी जाती है और गद्य जिसे प्रोज कहा जाता है और जो छंद बद्ध नहीं होती, जिसमें विचारों की प्रधानता रहती है, अर्थात ये रचनाएं विचारात्मक होती हैं और चंपू काव्य वह कहलाता है जो गद्य और पद्य का मिश्रित रूप होता है। उसमें गद्य रहता है और पद्य भी रहता है।
पद्य के भेद-
अब सबसे पहले हम बात करते हैं पद्य के दो भेदों की । इसके दो भेद माने गए हैं-
प्रबंध काव्य और मुक्तक काव्य
प्रबंध काव्य से अभिप्राय है जो बंधा हुआ रहता हो। जिसकी कथा में पूर्वा पर संबंध रहता हो, एक कथा होती है उसमें किसी की पूरी कहानी होती है जिसमें से हम एक घटना को एक कथा को अलग नहीं कर सकते प्रबंध काव्य किसी पात्र के संपूर्ण जीवन का चित्रण होता है
और मुक्तक काव्य होता है वह पूर्वा पर संबंध से रहित रहता है उसमें प्रत्येक क्षण अपने आप में स्वतंत्र होता है अलग-अलग होते हैं चाहे वह कविता के रूप में हो सवैया के रूप में हो दोहे के रूप में हो पदों के रूप में हो पर प्रत्येक क्षण अपने पूर्ववर्ती छंद से या प्रवृत्ति छंद से आश्रित नहीं रहता वह पूर्णत स्वतंत्र रहता है जबकि प्रबंध काव्य में प्रत्येक क्षण एक दूसरे से बंधा होता है और प्रबंध काव्य के 2 मूल भेद किए जाते हैं
1 महाकाव्य
2 खंड काव्य
महाकाव्य इतिहास प्रसिद्ध कथा को लेकर या किसी प्रख्यात आख्यान को लेकर लिखा जाता है और उसका जो नायक या नायिका होता है या होती है, उसके संपूर्ण जीवन का चित्रण किया जाता है। नायक के जन्म से लेकर अंत तक पूर्ण जीवन का चित्रण महाकाव्य में रहता है।
दूसरा खंडकाव्य में नायक के पूर्ण जीवन का चित्रण न होकर उसके जीवन की किसी एक घटना पर आधारित रहता है। जैसे रामचरितमानस एक महाकाव्य है जिसमें राम के जन्म से लेकर उनके वनवास और उनके वापस अयोध्या आने तक का पूरी कथा रहती है और अगर उसमें से केवल केवट प्रसंग को आधार बनाकर लिखा जाए तो वह खंडकाव्य है। जैसे दिनकर कर्ण के जीवन को लेकर रश्मि बंध लिखा और तुलसीदास ने पार्वती मंगल की रचना की है। खंडकाव्य में नायक के जीवन की किसी एक विशेष घटना, प्रसंग को लेकर उस को आधार बनाकर काव्य की रचना की जाती है। महाकाव्य और खंडकाव्य के आकार में भी विभिन्नता होती है ।महाकाव्य विशाल आकार का होता है और खंडकाव्य लघु आकार का होता है। महाकाव्य का नायक धीरोदात्त होता है , इतिहास प्रसिद्ध होता है, खंडकाव्य में ऐसा आवश्यक नहीं होता। उसका नायक कोई उदात्त चरित्र वाला भी हो सकता है। उसका नायक कोई सामान्य पात्र भी हो सकता है। महाकाव्य अनेक वर्गों में विभक्त होता है। महाकाव्य में अनेक प्रासंगिक कथाएं होती हैं और वे प्रासंगिक कथाएं आधिकारिक कथा को आगे बढ़ाने में सहायक रहती है महाकाव्य में प्रत्येक छंद के अंत में छंद परिवर्तन हो जाता है। रामचरित मानस में इस विधान को देख सकते हैं। महाकाव्य में प्रकृति का चित्रण होगा, नायक के चरित्र का विस्तार से वर्णन होगा, वस्तु वर्णन अधिक होता है जैसे- आखेट वर्णन, नगर वर्णन आदि मिलते हैं इस प्रकार महाकाव्य का आकार विस्तृत होता है और खंडकाव्य का आकर सीमित होता है। महाकाव्य संस्कृत में अनेक मिलते हैं जैसे कालिदास का रघुवंश। इसी तरह से हिंदी साहित्य में भी महाकाव्य और खंंडकाव्य गए हैं संस्कृत में रामायण बहुत बड़ा महाकाव्य है। हिंदी में तुलसीदास का रामचरितमानस है या सूफी काव्य जैसे जायसी का पद्मावत है। आधुनिक काल में हम देखते हैं मैथिलीशरण गुप्त का साकेत है, हरिऔध का प्रियप्रवास है और इसी तरह से खंडकाव्य की रचना भी हिंदी साहित्य में हुई है। हिंदी में अनेक खंडकाव्य मिलते हैं जैसे पंचवटी है, मिलन है तो इस प्रकार अनेक खंडकाव्य लिखे गए हैं।
पद्य का दूसरा भेद है मुक्तक काव्य
मुक्तक काव्य के भी दो भेद है -
पाठ्य
प्रगीत काव्य
पाठ्य के अंतर्गत हम देखते हैं कि रहीम के दोहे, बिहारी के दोहे, कबीर के दोहे और मीरा के पद, सूरदास के पद यह सब पाठ्य के अंतर्गत आते हैं।
प्रगीत वह होता है जिसमें गेयता होती है। जैसे महादेवी वर्मा के गीत है वह प्रगीत के अंतर्गत आते हैं । जिसको अंग्रेजी में लिरिक कहते हैं। मीरा के कुछ पद भी प्रगीत के अंतर्गत आते हैं । उनको गाया जा सकता है।
जो मुक्तक हैं, जिसमें दोहा, सोरठा, कवित्त या धनानंद के कवित्त आते हैं। यह अपने आप में स्वतंत्र होते है, पूर्ण होते हैं। उसमें पूर्वा पर संबंध नहीं होता है। उसमें कथा नहीं होती और प्रत्येक छंद में एक पूरा भाव सिमट कर रह जाता है और जो प्रगीत है उसमें गेयता की प्रधानता रहती है। उसमें गीति तत्व की प्रधानता रहती है। आगे चलकर हिंदी साहित्य में नवगीत के रूप में प्रगीत का विकास देख सकते हैं , या प्रगीत के उपभेद के रूप में भी देख सकते हैं ।
श्रव्य काव्य का दूसरा भेद है गद्य = गद्य वह है जिसमें छंदों बद्धता नहीं रहती है छंद नहीं रहते हैं और प्रारंभ में जब प्रेस नहीं थी और मौखिक साहित्य ही अधिक रहता था तो पद्य काव्य का रूप था। पूरा मध्यकालीन साहित्य पद्य रूप में ही मिलता है।
गद्य बहुत कम लिखा गया है संस्कृत में भी हमें बाणभट्ट की कादंबरी या हर्षचरित तो मिलते हैं, लेकिन बहुत कम मात्रा में लिखा गया हैं। गद्य का विकास मुख्य रूप से आधुनिक काल में ही हुआ है जब प्रिंटिंग प्रेस आ गई मुद्रित अवस्था में साहित्य उपलब्ध होने लगा तब तब पद्य की अपेक्षा गद्य की नवीन विधाओं का विकास हुआ तो गधे जिसमें हम देखते हैं कि उपन्यास है, कहानी, निबंध ,जीवनी, रेखाचित्र, संस्मरण और रिपोर्ताज, वार्ता, यात्रा वृतांत, पत्र लेखन, डायरी लेखन यह सब गद्य की नवीन विधाएं हैं, जिसमें लेखक अपने भावों को अपने विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
और तीसरा चंपू काव्य जिसमें पद्य और गद्य दोनों का मिश्रण मिलता है ।
कवि की जीवन दृष्टि = 1 यथार्थवादी दृष्टि 2, आदर्शवादी दृष्टि
लेखक की जीवन दृष्टि या विचारधारा जैसी होती है वह उसके अनुरूप ही साहित्य सर्जन करते हैं। अगर लेखक यथार्थवादी दृष्टि से प्रेरित है या फिर वह जो समाज मे घटित हो रहा है उस यथार्थ को प्रस्तुत करने की अभिलाषा रखता है तो वह साहित्य यथार्थवादी साहित्य कहलाता है। जैसे यशपाल के उपन्यास हैं वे यथार्थ परक हैं ।
और आदर्शवादी दृष्टि जहां लेखक व साहित्यकार समाज में जो घटित हो रहा है, उसको देखते हुए वास्तव मेंं समाज को क्या होना चाहिए? साहित्य समाज को क्या दिशा निर्देश दे सकता है? इस। बातको ध्यान में रख कर रचना करता है तो वह आदर्शवादी साहित्य है। क्योंकि समाज में जो हो रहा है वह तो उसको देख ही रहा है अगर उसी को प्रस्तुत करना साहित्य का साहित्यकार का उद्देश्य नहीं होता। तो जो हो रहा है उसके स्थान पर क्या होना चाहिए? क्या समाज का आदर्श रूप होना चाहिए? यह दृष्टि लेकर जब कोई साहित्यकार रचना करता है तो वह आदर्शवादी दृष्टि कहलाती है। इसका बहुत अच्छा उदाहरण रामचरितमानस है उसको देख लीजिए वह आदर्श से प्रेरित ग्रंथ है। उस समय समाज की जो राजनीतिक स्थिति थी, धार्मिक स्थिति थी, परिवेश था या जिस तरह का व्यवहार समाज में हो रहा था, जो शोषण हो रहा था अंग्रेज शासन या मुगल शासन के द्वारा, जो समाज का या जनता का शोषण किया जा रहा था, उसको देखते हुए तुलसीदास एक रामराज्य की कल्पना करते हैं। यह एक बहुत बड़ी विराट कल्पना थी या कहें कि यह एक आदर्श स्थिति थी कि राजा कैसा होना चाहिए ? राजा का क्या कर्तव्य होना चाहिए? प्रजा का क्या कर्तव्य होना चाहिए? भाई भाई के बीच कैसा संबंध होना चाहिए? माता पुत्र का संबंध, स्वामी और सेवक का संबंध कैसा होना चाहिए? तो यह एक आदर्शवादी दृष्टि है जो हमें रामचरित में मिलती है।। आधुनिक काल में प्रेमचंद का साहित्य की दृष्टि देख सकते हैं, उनके यथार्थ को देख सकते हैं, उनकी कहानी, उनके उपन्यास, उन्होंने जो किसान की दशा का वर्णन किया है, समाज के शोषण का वर्णन, व्यवस्था का, दहेज प्रथा की समस्या की बात करते हैं, बाल विवाह की बात करते हैं, वह समाज के यथार्थ को लेते हैं परंतु उसे आदर की ओर मोड़ देते हैं, उनका जो यथार्थवाद है वह आदर्शउन्मुख यथार्थवाद है। समाज के यथार्थ को प्रस्तुत करते हुए क्या वास्तविकता में समाज को कैसा होना चाहिए यह उस साहित्य का लक्ष्य भी है मूल उद्देश्य भी यही है कि वे समाज को एक दिशा या प्रेरणा देना चाहते हैं तो वह आदर्शनामुखी यथार्थ है । तो इस प्रकार जो साहित्यकार की जीवन दृष्टि या विचारधारा है उसके आधार पर मूलतः काव्य के दो भेद के जाते हैं एक यथार्थवादी दृष्टि और दूसरी आदर्शवादी दृष्टि।
कवि की मन: प्रवृत्ति-
1 विषयीगत साहित्य
2 विषयगत साहित्य
इसी तरह से एक और काव्य के वर्गीकरण का आधार है कवि की प्रवृत्ति के आधार पर कभी की जो मन प्रवृत्ति है उसकी जो सोच है उसके आधार पर भी दृष्टि से काव्य के दो भेद हैं एक विषय गत साहित्य और दूसरा विषय गत साहित्य विषय गत साहित्य सब्जेक्टिव लिटरेचर कहा जाता है सब्जेक्ट इन लिटरेचर ऐसा होता है जिसमें कभी अपने निजी सुख-दुख की अभिव्यक्ति करता है जो कभी के अपने मन के भाव है आत्मा भी व्यक्ति है उसको वे प्रस्तुत करते हैं तो निजी सुख-दुख को जब कभी प्रस्तुत करता है तो वह कभी कहता है कि मैंने मैं शैली अपनाई तो यह मैं शैली में जो कविता प्रस्तुत की गई वह विषई गत है महादेवी के गीत देख लीजिए उनमें नीचे सुख-दुख की अभिव्यक्ति है उनके वेदना परख गीत जो है वह विषयीगत साहित्य के अंतर्गत आ जाते हैं
और दूसरा है विषयगत साहित्य है जिसे ऑब्जेक्टिव स्ट्रेचर कहा जाता है जिसमें कभी अपनी अनुभूति को निजी अनुभूति को किसी पात्र के माध्यम से किसी पात्र की कल्पना करके जीवन का जो सामान्य वर्णन करता है जो सामान्य जीवन की अनुभूतियां है उसको वह चित्रित करता है अपने मेरे साथ यह वह अपने यह मेरे साथ ही हुआ उसको वह किसी पात्र के माध्यम से किसी पात्र की कल्पना करके जीवन का सामान्य विवरण करता है नीचे अनुभूति को करके वह जीवन का सामान्य वर्णन करता है अपने मेरे साथ यह हुआ मैंने यह किया अपनी वेदना को अभिव्यक्त ना करके वह अपने अनुभव को पात्रों के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान करता है तो विषय गत साहित्य कहलाता है एक्टिव लिटरेचर कहलाता है कहलाता है
तो इस तरह से हमने जो काव्य की जो भेद थे उसका एक जो आधार था, एक और वर्गीकरण है- शैली बद्ध के आधार पर। इस दृष्टि से काव्य के वही दो भेद हैं जो हमने पद्य के किए थे- एक प्रबंध और मुक्तक। शैली बद्ध की दृष्टि से भी काव्य के यही दो भेद माने जाते हैं- प्रबंध काव्य और मुक्तक काव्य प्रबंध जिसमें एक कथा होती है कहानी होती है जो प्रारंभ से लेकर अंत तक चलती है जिसके किसी भी एक अंश को निकाला नहीं जा सकता और यह प्रबंधआत्मा केवल पद्य में नहीं बल्कि गद्य में भी होती है जैसे उपन्यास कहानी है। उपन्यास या कहानी का पूूर्वआपर संबंध होता है उपन्यास जुड़ा हुआ या बंधा हुआ होता है और उस में से किसी एक अंश को निकाल कर उसको अलग नहीं कर सकते। कहानी अलग विधा है। कहानी एक स्वतंत्र विधा है। उपन्यास भी एक स्वतंत्र विधा है। उपन्यास में जो भी विषय लिया गया है उस विषय का विस्तार से वर्णन रहता है और उसकी कोई सीमा नहीं होती वह 500 पृष्ठ का भी सकता है , 800 का भी हो सकता है सो पृष्ठ का भी हो सकता है, कितने पृष्ठ हो सकते हैं तो शैली बंध की दृष्टि से गद्य में उपन्यास कहानी और निबंध आदि आते हैं और पद्य की दृष्टि से देखें तो प्रबंध में महाकाव्य और खंडकाव्य आ जाते हैं और दूसरा उसका भेद है मुक्तक और इसी तरह से आधुनिक कविता में हम देखते हैं कि गीत, नव गीत कविता यह भी मुक्तक भेद कहलाते हैं। इसमें प्रत्येक गीत स्वतंत्र होता है प्रत्येक गीत में किसी एक भाव विशेष को लिया जाता है और उसका विशेष की एक मार्मिक अभिव्यंजना प्रस्तुत की जाती है कभी की जो अनुभूति है उस पूरे गीत में सिमट कर रह जाते गीत अपने आप में स्वतंत्र होता है महादेव के गीत देख लीजिए बालकृष्ण शर्मा नवीन के, दिनकर ने स्वतंत्र रूप से लिखें , रश्मिरथी खंड काव्य की रचना की। इस तरह से हम काव्य रूपो का विभाजन कर सकते हैं।