हिंदसा

बुधवार, 25 सितंबर 2019

भारतेंदु काल

भारतेंदु कालीन हिंदी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियां 

भारतेंदु काल को आधुनिक काल का प्रवेश द्वार कहा गया है। रीति काल में हिंदी साहित्य अपनी जिस गरिमा को खो रहा था भारतेंदु युग में उस गरिमा को पुनः पाने की चेष्टा इस काल के कवियों ने की। यह काल विविधता से भरा हुआ है। इस काल में गद्य में ही साहित्य रचना की जाने लगी। नाटक, कहानी, निबंध और आलोचना का जैसा विकास किस काल में हुआ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। गद्य का आरंभ इस काल की महत्वपूर्ण घटना  है। लेकिन कविता के क्षेत्र में भी एक नया मोड़ आया। उसमें भावनात्मक और कलात्मक परिवर्तन पर स्पष्ट दिखाई देता है। यहां से  हिंदी काव्य का नया युग प्रारंभ हुआ। यद्यपि इस काल में रीतिकाल का भी प्रभाव भी देखा जा सकता है। लेकिन अपनी अन्य विशेषताओं के कारण यह काल रीतिकाल से बिल्कुल अलग था। इस काल के कवियों ने वासना प्रधान, श्रृंगार चित्रण  को छोड़कर समाज सुधार , देश भक्ति और भारतीय संस्कृति के गौरव गान को अपने काव्य में प्रस्तुत किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र इस काल के प्रवर्तक माने जाते हैं। भारतेंदु के काव्य की विशेषताओं का अन्य कवियों ने भी अनुसरण किया। इस काव्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-

 1. देश प्रेम की अभिव्यक्ति
 भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के सर्वप्रथम राष्ट्रकवि कहा जा सकता है। उन्होंने अपने नाटकों और कविताओं के माध्यम से जनता को देश प्रेम का संदेश दिया । उनका यह देश प्रेम कहीं विदेशी शासकों के विरोध में प्रकट हुआ तो कहीं अपने काव्य के माध्यम से देशवासियों में देश प्रेम की भावना उत्पन्न करने का प्रयत्न किया। इस काल के कवि भारत की सभी जातियों और भावनाओं के प्रति उदार थे। कुछ आलोचकों ने भारतेंदु  पर अंग्रेजों का प्रसंशक और राजभक्त होने का आरोप लगाया है। लेकिन भारतेंदु ने अंग्रेजों की वहीं तक प्रशंसा की है जहां उनकी अच्छी बातों को स्वीकार करना चाहिए। भारतेंदु जी ने अपनी कविताओं में अंग्रेजों की नीति की निंदा की है। उन्होंने 'मुकरियां' लिखकर अंग्रेजों की शोषण नीति के खिलाफ आवाज उठाई है।
  भीतर- भीतर सब रस चूसै
   हंसी हंसी के तन मन धन मूसै
   जाहिर बातन में अति तेज
    क्यों सखि! साजन नहीं अंग्रेज
अंग्रेजों की शोषण नीति के खिलाफ भारतेंदु की कविताओं में, नाटकों में अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं।
     2. सामाजिक जागृति
भारतेंदु युग के कवियों ने समाज में जागृति उत्पन्न करने का बहुत प्रयास किया। इन कवियों की रचनाओं में  स्त्री शिक्षा का महत्व वर्ग एवं वर्ण भेद का विरोध किया गया। सामाजिक बुराइयों जैसे अनमेल विवाह, बाल विवाह आदि के निषेध पर बल दिया है। 'भारत दुर्दशा' नाटक में भारतेंदु जी ने तत्कालीन समाज की गिरती हुई दशा और उसके सुधार पर प्रकाश डाला है। उदाहरण -
जाति अनेक न करि,
नीच अरु उच्च बनायो।
खान-पान संबंध सबन,सो
बरची छुडायो
 3. श्रृंगार भावना 
 रीतिकाल की श्रंगार भावना भारतेंदु युग में भी दिखाई देती है। परंतु उसका स्वरूप बहुत अलग है। इनके प्रेम और श्रृंगार का आदर्श पहुंचा है।  इनके प्रेम का यह आदर्श रसखान और घनानंद में देखने को मिलता है।
 4. भक्ति भावना
 भारतेंदु कालीन काव्य की एक विशेषता भक्ति भावना भी थी। इस काल के कवियों के सामने भक्ति युग का आदर्श था। भारतेंदु जी में सूरदास जैसी भक्ति भावना दिखाई देती है। भारतेंदु जी कृष्ण के भक्त थे। उन्होंने स्वयं को राधा-कृष्ण का अनन्य भक्त स्वीकार करते हुए कहा है - "मेरे तो साधन एक ही है, जय नंदलाला वृषभानु कुमारी"
 5. प्रकृति चित्रण
  भारतेंदु जी ने अपने काव्य में प्रकृति का सुंदर वर्णन किया है। उनका गंगा अवतरण, "यमुना वर्णन आदि में प्रकृति के मार्मिक और भावपूर्ण वर्णन उपलब्ध है। प्रेमघन और ठाकुर जगमोहन ने भी प्रकृति का सुंदर वर्णन किया है।
 6. हास्य-व्यंग्य
 भारतेंदु युग में शिष्ट हास्य भी मिलता है। उनका यह हास्य उद्देश्य पूर्ण है।  बंदर सभा उर्दू का स्यापा नामक रचना में निम्न कोटि के नाटकों का मजाक उड़ाया गया है। इन की मुकरियों  में व्यंग्य भाव बहुत सशक्त रूप में उभरा है। हास्य-व्यंग्य की प्रवृत्ति का पूर्ण विकास तत्कालीन नाटकों में उपलब्ध होता है। 7.भाषा प्रेम
  भारतेंदु  और उनके समकालीन कवियों ने अपनी भाषा में उन्नति और विकास के लिए बहुत प्रयत्न किया है। इन कवियों ने हिंदी में उच्च कोटि के साहित्य की रचना की है और उसे जनता में लोकप्रिय बनाने की चेष्टा भी की है। भारतेंदु  का भाषा प्रेम इन पंक्तियों में प्रकट होता है-
  " निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल
   बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल"
  भारतेंदु ने ब्रजभाषा के साथ साथ खड़ी बोली के लिए भी प्रयास किया। लेकिन काव्य रचना के लिए इस काल के कवियों ने ज्यादातर ब्रजभाषा का ही प्रयोग किया है।
 8.जनसाधारण का काव्य-
 भारतेंदु कालीन कवि रीतिकालीन कवियों के समान राजाश्रित   नहीं थे, उन्होंने जो कुछ भी लिखा जनता के लिए लिखा और जनसाधारण की भाषा में लिखा। इसलिए हिंदी साहित्य में इस काल के कवियों का अपना विशिष्ट महत्व है। काव्य को  राज दरबारों से निकालकर जनता के समक्ष प्रस्तुत कर लोकप्रिय बनाने का काम इन कवियों ने किया। इसलिए यह काव्य जनता में बहुत लोकप्रिय हुआ।
 9. कला पक्ष 
 भारतेंदु कालीन कवियों की  भाषा काव्य के लिए ब्रजभाषा थी। लेकिन इन कवियों ने गद्य के विकास के लिए भी बहुत योगदान दिया है और खड़ी बोली में गद्य की रचनाएं की है। इस काल के छंद कजरी, ठुमरी, लावणी आदि हैं। अलंकारों को भी इन्होंने सहज रूप में प्रस्तुत किया है।
          संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यह काल संक्रांति काल था, जिसमें भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल का मिलाजुला रूप देखा जा सकता है। उनकी कविताओं में प्राचीन और आधुनिक काव्य प्रवृत्तियों का समन्वय है। भक्ति, श्रृंगार, देश प्रेम, समाज सुधार, हास्य-व्यंग्य आदि इस काल की प्रमुख विशेषताएं थीं। इन कवियों ने जनता में अध्ययन करने या पढ़ने की इच्छा जागृत की। भारतेंदु  के प्रयत्नों से अनेक लेखक तैयार हुए। उन कवियों ने भारतेंदु के आदर्श को अपनाया। इसलिए उनके काव्य में भी भारतेंदु के काव्य की प्रवृत्तियां दिखाई देती है। इस काल के साहित्यकारों का तथा साहित्य का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि इन्होंने जीवन और साहित्य में निकट का संबंध स्थापित किया। इसलिए भारतेंदु युग प्रवर्तक और जनजागृति के अग्रदूत के रूप में जाने जाते हैं  

मंगलवार, 17 सितंबर 2019

अखबारी हिंदी

अखबारी हिंदी


अखबारी हिंदी कोई और भाषा नहीं, बल्कि हिंदी भाषा में छपने वाले अखबारों की भाषा होती है। फर्क इतना है कि अखबार के लिए हम साहित्यिक हिंदी का प्रयोग न करके हिंदी के सरल रूप का प्रयोग करते हैं । अर्थात जिस हिंदी का प्रयोग हम अपने दैनिक जीवन में करते हैं और जिसे हम हिंदी का प्रचलित रूप भी कहते हैं, संपादक उसी हिंदी को अखबार की भाषा बनाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि अखबार का पाठक शिक्षित , अर्धशिक्षित, बालक, युवा और वृद्ध भी हो सकता है| संपादक अपने अखबार के लिए भाषा का चुनाव पाठक को दृष्टि में रखकर करता है। अखबार का पाठक दूरदराज के गांव देहात में रहने वाला कम पढ़ा-लिखा भी हो सकता है और शहर में रहने वाला अधिक पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी हो सकता है अतः संपादक अपने हर वर्ग के पाठक को ध्यान में रखता है। लेकिन अखबार की भाषा का जितना सरल और सहज होना आवश्यक है उतना ही भाषा का आकर्षक, संप्रेषणीय और प्रवाहमयी होना भी जरुरी है|
अखबार में जितने प्रकार की खबरें छपती हैं भाषा भी उतने ही प्रकार ही हो जाती है| एक ही अखबार में भाषा के अनेक रूप देखने को मिलते हैं जैसे - सम्पादकीय लेखों की भाषा, वाणिज्य समाचारों की भाषा, खेलकूद के समाचारों की भाषा आदि |
अखबार का संवाददाता हर रोज घटित होने वाली देश-विदेश की हर प्रकार की छोटी-बड़ी घटनाओं को अपने अखबार के माध्यम से सामान्य लोगों तक पहुंचाता है। अत: वह सभी समाचारों के लिए एक विशेष प्रकार की भाषा का प्रयोग करता है | अखबारी हिंदी की सामान्य विशेषताएं इस प्रकार हैं--
  • अखबारी हिंदी में संयुक्त वर्णों के स्थान पर सरल शब्दों या अक्षरों का प्रयोग होना चाहिए।
  • अखबार में लंबे और जटिल वाक्यों का प्रयोग न करके छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए
  • बड़े-बड़े अनुच्छेदों के स्थान पर छोटे-छोटे अनुच्छेदों में लिखा जाए तो ज्यादा अच्छा रहता है।
  • छोटे छोटे अनुच्छेद और वे भी सरल भाषा में लिखे गए हो तो पाठक अखबार को बड़ी तल्लीनता से पढ़ता है और उसमें उदासीनता नहीं आती ।
  • लाक्षणिक भाषा का प्रयोग अखबार में नहीं करना चाहिए ऐसा करने से समाचार का उद्देश्य या सम्प्रेषणीयता खत्म हो जाती है।
  • समाचार लिखते समय यदि प्रातः घटित होने वाली घटना का उल्लेख करना हो तो पौ फटना जैसे शब्दों के स्थान पर आज सवेरे या प्रातः काल जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। अखबारी हिंदी में अर्थ की स्पष्टता होनी चाहिए ।
  • अनेकार्थी ( जिनके अनेक अर्थ निकलते हो ) ऐसे शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए नहीं तो पाठक अर्थ का अनर्थ कर सकता है कहने का अर्थ यह है कि वह अर्थ नहीं लेगा जो संवाददाता देना चाहता है।
  • संकेत अक्षरों के स्थान पर पूर्ण नाम लिखे जाने चाहिए।
  • लेकिन जो संकेत अक्षर रूढ़ हो गए हैं उनका प्रयोग किया जा सकता है जैसे भारतीय जनता पार्टी के लिए भाजपा समाजवादी पार्टी के लिए सपा आदि
  • अखबारी हिंदी में संख्याएं अंकों में न लिखकर शब्दों में लिखी जानी चाहिए
  • अखबारी हिंदी में प्रायः अन्य पुरुष का प्रयोग होता है जैसे उसने कहा था आदि
  • अखबारी हिंदी में दोहरी तेहरी क्रियाओं जैसे- बंद कर दिया गया, खरीद लिया गया के स्थान पर एकहरी क्रिया का ही प्रयोग करना चाहिए जैसे बंद किया, खरीद लिया आदि
  • स्थान का अभाव अखबार में रहता है इसलिए संक्षिप्त शब्दों का प्रयोग अधिक किया जाना चाहिए।
  • पहले वाक्य में पूरे शब्द लिखकर बाद में संक्षिप्त शब्दों का लिखा जाना सही रहता है । जैसे शुरू में लिखना है तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उसके बाद केवल प्रधानमंत्री जी शब्द का प्रयोग किया जा सकता है ।
  • अखबारी हिंदी में पारिभाषिक शब्दावली का भी अभाव रहता है परंतु आर्थिक जगत, वाणिज्य, खेलकूद आदि के संबंध में पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग अनुचित नहीं माना जाता।
  • पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग अगर किया जाए तो सावधानीपूर्वक ही करना चाहिए
  • साथ-साथ वर्तनी तथा विराम आदि की दृष्टि से भी अखबारी हिंदी में एकरूपता होनी चाहिए । यदि किसी समाचार पत्र में विराम (।) के स्थान पर फुलस्टॉप(.) लगाए जाने की नीति को अपनाया गया है तो शुरू से लेकर आखिर तक एक ही नीति का प्रयोग होना चाहिए ।
  • समाचारों में शीर्षक का बहुत अधिक महत्व होता है। अतः समाचारों के शीर्षक भी सीधे-सरल, आकर्षक और उपयुक्त होने चाहिए ।
अभ्यास के लिए-
  • अखबारी हिंदी को समझने के लिए हर रोज अखबार पढ़िए और अखबार की संपादकीय हिंदी, वाणिज्य हिंदी और खेलकूद की हिंदी में पाए जाने वाले अंतर को समझिए।
  • अखबारी हिंदी के अलग अलग रूपो का उदाहरण दीजिए।

सोमवार, 9 सितंबर 2019

प्रगतिवाद


प्रगतिवाद

 राजनीति में जो विचारधारा साम्यवाद कहलाती है, दर्शनशास्त्र में वही विचारधारा द्वंद्वात्मक के नाम से जानी जाती है। इसके साथ ही साहित्य में उसे ही प्रगतिवाद कहा जाता है। प्रेमचंद के सभापति में  लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन हुआ था। यह अधिवेशन 1936 में हुआ था। उस अधिवेशन में प्रेमचंद जी ने साहित्य का लक्ष्य केवल मनोरंजन न  मानकर  समाज हित को साहित्य का लक्ष्य स्वीकार किया था। सन 1936 का अधिवेशन हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी क्योंकि यहीं से साहित्य में प्रगतिवाद का जन्म माना जाता है।
     छायावादी काव्य की व्यैक्तिवादता,  पलायनवादिता, निराशा की भावना तथा कल्पना लोक में कवि का विचरण छायावादी कविता की समाप्ति का कारण बन गई। उनकी व्यंजना, ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, तथा प्रतीकात्मकता के कारण छायावादी काव्य सामान्य जनता के लिए दुर्बोध था। इसलिए प्रगतिवाद का आरंभ हुआ।
        पंत, शिवमंगल सिंह 'सुमन', नरेंद्र शर्मा, नागार्जुन डॉ रामविलास शर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, केदारनाथ अग्रवाल, दिनकर आदि प्रगतिवाद के प्रमुख कवि माने जाते हैं। प्रगतिवादी काव्य की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-
शोषित वर्ग की दयनीय स्थिति का चित्रण-
प्रगतिवादी काव्य शोषित वर्ग पर केंद्रित है। इसमें शोषण से पीड़ित मजदूरों और किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण किया गया है। शोषक और शोषित वर्ग की विषमताओं का उद्घाटन किया गया है। दिनकर जी इस विषमताता प्रकट करते हुए कहते हैं-
 "श्वानों  को मिलता वस्त्र, दूध,
 भूखे बालक अकुलाते  हैं।
 मां की हड्डी से ठिठुर चिपक
 जाड़ों की रात बिताते हैं।"
शोषक वर्ग के प्रति घृणा
प्रगतिवादी कवि मानता है कि शोषक वर्ग स्वार्थी, निर्दयी तथा कपटी है। व्यापारी, उद्योगपति और जमीदार आदि उचित अनुचित तरीके अपनाकर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बनाए रखना चाहते हैं। परंतु प्रगतिवादी कवि का मानना है कि जब तक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का विनाश नहीं होता तब तक सामाजिक विषमता भी समाप्त नहीं हो सकती। अतः प्रगतिवादी कवियों में पूंजीपतियों के प्रति आक्रोश तथा घृणा का भाव है। पंत जी अपने इस आक्रोश को प्रकट करते हुए कहते हैं-
 "जन जीवन का दुरुपयोग है 
उनका जीना, अब न प्रयोजन इनका
अंतिम है इनके  क्षण"

 धर्म और ईश्वर का विरोध
 प्रगतिवादी कवि का मानना है कि उच्च वर्ग धर्म व ईश्वर का नाम लेकर शोषित पर अत्याचार करता है। शोषक वर्ग अपने भाग्य को ईश्वर का वरदान मान्यता है तथा शोषित वर्ग अपनी दीनता व सहायता को अपना भाग्य मान कर स्वीकार कर लेता है। प्रगतिवादी कवियों ने भाग्य का विरोध करते हुए कहा है कि "भाग्य व दुर्भाग्य ईश्वर का दिया हुआ नहीं है। मानव अपने हाथों से ही अपने भाग्य का निर्माता होता है।" अतः  कवि ईश्वर तथा धर्म में आस्था नहीं रखता , वह ईश्वर को सृष्टा नहीं मानता था। उसकी दृष्टि में मंदिर, मस्जिद, गीता तथा कुरान का मनुष्य के भाग्य से कोई संबंध नहीं है। अतः ये कवि अंधविश्वासी और मिथ्या परंपराओं तथा सामाजिक कुरीतियों पर तीव्र प्रहार  करता है।
 'विप्लव गायन कविता' में नवीन जी का आक्रोश इन पंक्तियों में प्रकट होता है -
"नियम और उपनियमों के ये बंधन,
 टुकटुक हो जाए,
 विश्वंभर की पोषक वीणा की तार मूक हो जाए।"
क्रांति की भावना
प्रगतिवादी कवियों ने शोषित तथा शोषक वर्ग में समानता उत्पन्न करने के लिए तथा प्राचीन रूढ़ियों और अंधविश्वासों को दूर करने के लिए अपने काव्य में क्रांति का आह्वान किया है। कवि जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों का विरोधी है। पन्त अपने काव्य में कोकिल को पावक कण बरसाकर संसार की बुराइयों को दूर करने के लिए आमंत्रित करते हुए कहते हैं-
" गा कोकिल बरसा पावक कण
 नष्ट भ्रष्ट हो जीर्ण पुरातन।"
 नारी संबंधी दृष्टिकोण
 प्रगतिवादी कवि ने नारी के स्थूल शारीरिक सौंदर्य का वर्णन किया है। कवि किसी रूपसी का चित्रण न करके कृषक वाला और मजदूर स्त्रियों का चित्रण करता है। प्रगतिवादी कवि प्रेम की स्वतंत्रता के पक्ष में है। नारी को मजदूर और किसान के समान ही शोषित और दलित मानकर उसकी मुक्ति तथा उसकी स्थिति में सुधार के लिए आवाज उठाता है। प्रगतिवादी कवि कहता है-
 "योनि नहीं है रे नारी! वह भी मानवी प्रतिष्ठित
 उसे पूर्ण स्वाधीन करो वह रहे न पर अवस्थित।"
 सामाजिक जीवन का यथार्थ चित्रण
 प्रगतिवादी कवियों ने यथार्थवाद का समर्थन किया है। वह कल्पना लोक में विश्वास नहीं करता  अध्यात्म में भी उसकी रुचि नहीं है। उसके विचार में दृश्य जगत ही सत्य है। पंत छायावादी कवियों का विरोध करते हुए कहते हैं-
 "ताक रहे हो गगन ? मृत्यु नीलिमा गहन गगन
 देखो  भू को जीव परसु को"
 मार्क्सवाद में आस्था
 प्रगतिवादी कवि मार्क्सवाद से बहुत प्रभावित हैं। मार्क्स के प्रति अपने विचारों को प्रकट करते हुए पंत जी ने मार्क्स को पुलन्यकर  शिव का तीसरा नेत्र बताया है। प्रगतिवादी कवियों के विचार में जिस प्रकार संसार में बुराइयों के बढ़ जाने पर  भगवान शिव अपना तीसरा नेत्र अशुभ, आशक्त और अशिव  को नष्ट कर देते हैं। उसी प्रकार मार्क्स के प्रभाव से समाज में मानवता का उद्धार हो सकता है। कवि कहता है-
"साम्यवाद के साथ स्वर्ण युग करता मधुर पदार्पण
 मुक्त निखिल मानवता करी मानव का अभिवादन"
भाषा शैली
प्रगतिवादी कवि भाषा में सरलता, स्पष्टता और सहजता को ही गुण मानता है। वह किसी भी प्रकार के आडंबर का विरोधी है। प्रगतिवादी साहित्य क्योंकि जनसाधारण का काव्य है अतः वह सीधी और सरल स्वाभाविक भाषा शैली को अपनाने के पक्ष में है। इनकी भाषा में अलंकारों का व्यर्थ का बोझ नहीं है। भाषा के विषय में प्रगतिवादी कवियों का विचार है-
 तुम वहन कर सको, जन-जन में मेरे विचार।
 वाणी मेरी चाहिए, तुम्हें क्या अलंकार।।
 छंद
प्रगतिवादी कवियों ने छंद के बंधन को कभी नहीं स्वीकारा। छंद युक्त काव्य का विरोध करते हुए पंत कहते हैं-
 "खुल गए छंद के बंद प्रातः के रजत पास नए उपमान प्रतीक आदि का प्रयोग प्रगतिवादी कवियों ने पुराने मानो उपनाम और प्रतीकों का प्रयोग किया है जिनका संबंध जनजीवन से है कोयले की खाल की मजदूरी नीसी रात वह ज्योति तिमिर का विश्रांत से अवतार प्रगतिवादी कवि का कला संबंधी दृष्टिकोण भाषा छंद अलंकार प्रतीकों तथा वर्णित भाव से स्पष्ट हो जाता है कि वे कला को जीवन के लिए मानते हैं ना की कला को कला के लिए प्रगतिवादी काव्य का हिंदी साहित्य में अपना एक विशेष स्थान है लेकिन इसमें कुछ त्रुटियां भी हैं यह कभी भौतिकता के पक्षधर है तथा इनमें नास्तिकता की भावना बहुत प्रबल है यह शोषित वर्ग का ही चित्रण करते हैं तथा सामाजिक समानता के लिए हिंसा को भी को ही एकमात्र रास्ता स्वीकार करते हैं यथार्थ के नाम पर इस साहित्य में नग्नता और अश्लीलता का चित्रण किया गया है प्रगतिवादी काव्य दृश्य की गहराइयों को छू नहीं पाता लेकिन सामाजिक विषमताओं को दूर करने का इन कवियों का प्रयास शहर सराहनीय है इन्होंने ही कल्पना लोक में खोए हुए कवि को धरातल पर लाने का प्रयास किया है

नाट्य साहित्य की परम्परा

 नाट्य साहित्य की परम्परा  नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में ना...