हिंदसा

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

छंद शास्त्र की परंपरा

छंद शास्त्र की परंपरा का विकास क्रम
छंद शब्द के अर्थ, छंद के अंग और छंद के भेदों के साथ- साथ छंद शास्त्र की हिंदी साहित्य में आज जो परंपरा हम देख रहे हैं, उसका विकास क्रम कैसे हुआ है? यह भी जान लेना जरूरी है। छंद शास्त्र की परंपरा का आरंभ संस्कृत में लिखित प्राचीन साहित्य से ही हो गया था।
जब हम प्राचीन साहित्य की बात करते हैं तो सबसे पहले संस्कृत साहित्य के अंतर्गत वेद अर्थात हमारा वैदिक साहित्य आता है, वैदिक साहित्य के बाद लौकिक साहित्य, लौकिक साहित्य के बाद प्राकृत, उसके बाद अपभ्रंश साहित्य और उसके बाद हिंदी साहित्य आता है। छंद की परंपरा की शुरुआत हमारे प्राचीन साहित्य 'वैदिक साहित्य' से ही हो जाती है। वैदिक साहित्य में हमें छंद शास्त्र का वर्णन मिलता है। वहां काव्य में वर्ण वृत अर्थात वर्णिक छंदों का प्रयोग अधिक हुआ है। वैदिक साहित्य में हमें मात्राओं का विचार नहीं मिलता। लेकिन स्वरध्वनि अर्थात स्वरों की गति पर विचार जरूर हुआ है। कब स्वर में उतार आना चाहिए, कब स्वर में चढ़ाव आना चाहिए अर्थात स्वरों के आरोह और अवरोह पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था। वैदिक साहित्य में छंद के नियमों का कम पालन होता था। लेकिन लौकिक संस्कृत साहित्य की जब हम बात करते हैं तो वहां पर छंद शास्त्र का विस्तृत विवेचन मिलता है। लौकिक संस्कृत में पिंगल नामक ऋषि हुए जिन्होंने छंदों की शास्त्रीय मीमांसा की। पिंगल ऋषि के द्वारा शास्त्रीय मीमांसा करने के कारण छंद शास्त्र का एक नाम पिंगल शास्त्र भी है। इसलिए छंद शास्त्र को छंद शास्त्र कहें या पिंगल शास्त्र, एक ही बात है। कुछ किताबों में हमें छंद शास्त्र की जगह पिंगल शास्त्र ही लिखा मिलता है। पिंगल ऋषि ने ही छंद शास्त्र में गण शैली अर्थात गण सूत्र का आविष्कार किया था। छंदों के भेद मात्रिक और वर्णिक छंद में गण शैली का ही प्रयोग किया जाता है। अर्थात किसी छंद में या किसी छंद के प्रत्येक चरण में कितने वर्ण या मात्राएँ हैं? इसकी गणना गण शैली के आधार पर ही की जाती है। लौकिक संस्कृत में प्रत्येक कवि के लिए छंदों का प्रयोग करना या छंदों के नियमों का पालन करना अत्यंत अनिवार्य होता था। अगर किसी कवि की रचना में मात्रा संबंधी दोष पाया जाता था अर्थात कहीं मात्रा की कमी हो गई या वर्ण की अधिकता हो गई तो यह बहुत बड़ा काव्य दोष समझा जाता था। उसके बाद हमारा प्राकृत या अपभ्रंश साहित्य आता है इस समय मात्रिक छंदों का ज्यादा प्रयोग किया गया।

पदद्डंडियों तथा दत्ता देने की परम्परा का विकास भी इसी समय हुआ| प्राकृत और अपभ्रंश के समय में पदद्डंडियों का प्रयोग कवियों ने खूब प्रयोग किया है| आगे चलकर इस शैली का प्रयोग हमें रामचरितमानस और सूफी कवि जायसी की पद्मावत एवं दुसरे सूफी कवियों की रचनाओं में भी मिलता है। हम रामचरितमानस में देखते हैं कि तुलसीदास एक चौपाई देकर उसके बाद एक दत्ता देते हैं। दत्ता देने की यह परंपरा प्राकृत से होती हुई अपभ्रंश तक आई और उसके बाद हिंदी साहित्य में भी हम इस परंपरा का विकास देखा जा सकता है। मध्ययुगीन साहित्य में दोहा, चौपाई, रोला, बरवै छंद आदि कुछ नए छंदों का प्रयोग मिलता हैं। कवित्त और सवैया का प्रयोग रीतिकाल में बहुत मिलता है।
अब हम हिंदी साहित्य के आधुनिक काल की बात करते हैं। आधुनिक काल में हिंदी साहित्य की भाषा ब्रजभाषा से खड़ी बोली हो गई थी। विज्ञान के आविष्कार के कारण और देश में यातायात-साधनों के विकास के कारण आधुनिक कालीन में हिंदी साहित्य पर अंग्रेजी भाषा और बांग्ला भाषा का प्रभाव पड़ा है। परिणाम स्वरूप इस कारण से तुकांत- अतुकांत और प्रवाहमयी शैली का प्रयोग ज्यादा मिलता है।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आधुनिक काल में हिंदी भाषा के सुधार को लेकर बहुत काम किया। उन्होंने कविता में वर्णिक छंदों को अपनाने पर बल भी दिया। घनाक्षरी छंद का प्रयोग भी इसी समय शुरू हुआ। उसके बाद छंद शास्त्र की परम्परा के विकास में छायावाद के आधारस्तंभ कवि निराला का नाम आता है। निराला छंद की शास्त्रीय परंपरा का विरोध करते नजर आते हैं। वह छंदों को कविता के लिए बंधन मानते हैं। उनका मानना था कि जब कोई कविता छंद के नियमों में बंध जाती है तो उसका भाव प्रवाह रुक जाता है। कवि कविता के बाहरी कलेवर को ही सजाने में लगा रहता है, कविता का आंतरिक पक्ष कहीं पीछे छूट जाता है, इसलिए उन्होंने कविता को छंदों के बंधन से मुक्त करने की बात कही है। निराला ने कविता में छंद के मुकाबले प्रवाहमयता, गतिशीलता को ज्यादा महत्व दिया है। लेकिन एक दृष्टि से देखा जाए तो यह भी एक प्रकार का छंद ही था। कहा जा सकता है कि निराला ने परंपरागत छंदों के स्थान पर मुक्त छंद की स्थापना की।
हिंदी में अपभ्रंश और प्राकृत से प्रभावित होकर हमें एक और परंपरा मिलती है और वह परंपरा है- मिस्र छंदों की परम्परा। इस परम्परा में दो छंदों को मिलाकर एक नया छंद बनाया जाता था। जैसे- उल्लाला और रोला छंद को मिलाकर छप्पय छंद का निर्माण, दोहा और रोला छंद को मिलाकर कुंडलियां छंद का निर्माण किया गया। हिंदी साहित्य के आदिकाल में चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो में छप्पय छंद का बहुत प्रयोग किया है। इस कारण से चंदबरदाई को छप्पय राज भी कहा जाता है। इसी तरह सुमित्रानंदन पंत को रोला छंद (24मात्रा) बहुत पसंद था। उन्होंने रोला छंद का बहुत प्रयोग किया है।
अतः छंद की परंपरा कोई नई परंपरा नहीं है बल्कि यह बहुत पुरानी परंपरा है। इस परम्परा का विकास हमारे सबसे प्राचीन संस्कृत साहित्य से आरंभ होकर मध्य काल से होते हुए हिंदी साहित्य तक देखा जा सकता है। परंपरा के विकास क्रम को देखते हुए माना जा सकता है कि छंद कविता के लिए बहुत ही अनिवार्य तत्व है।

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