काकी सियारामशरण गुप्त की साहित्य साधना बहुमुखी थी श्रेष्ठ कवि होने के साथ-साथ वे सफल उपन्यासकार नाटककार निबंधकार तथा कहानीकार भी थी कवि कथाकार और निबंध लेखक के रूप में हिंदी साहित्य पर अपने अमित व्यक्तित्व की छाप अंकित करने वाले यह सियाराम शरण गुप्त का नाम उल्लेखनीय है कहानीकार के रूप में उन्हें मानवीय करुणा का कथाकार माना जाता है मानव के व्यवहार जगत से संबंधित विविध क्रियाकलापों का कहानियों में इन्होंने सजीव तथा मार्मिक वर्णन किया है काकी भी उनकी एक उत्कृष्ट पारिवारिक कहानी है जिसमें उन्होंने एक नन्ही अबोध और नीर है बालक की मेरी ही बालक की मौत मनो वेदना को वेदना का बड़ा मर्मस्पर्शी चित्र प्रस्तुत किया है कहानी के सभी तत्वों का निर्वाह प्रस्तुत कहानी में सफलतापूर्वक हुआ है नंबर 1 का कथानक काकी नामक कहानी का कथानक अत्यंत संक्षिप्त है पूरी कहानी केवल ढाई पृष्ठ में समाप्त हो गई है कहानीकार ने कहीं भी आवश्यक विस्तार नहीं किया है इसलिए लेखक ने घटनाओं का उतार-चढ़ाव बहुत ज्यादा नहीं दिखाया है घरेलू जीवन में नित्य प्रति होने वाली सामान्य बात को लेकर ही गुप्तजी ने इस कहानी की रचना की है मां के वियोग से बालक श्याम श्यामू के ह्रदय पर अवसाद की छाया आ जाती है छा जाती है यही कहानी का आरंभ है कुछ दिन तक वह मां की मां को मामा के घर गया समझता है और फिर वास्तविकता का पता लगने पर रोज रो कर चुप हो जाता है इसी को कथानक के विकास की अवस्था माना जा सकता है इसके उपरांत कथावस्तु उस समय अचानक एक नाटकीय मोड़ ले लेती है जब श्यामू आकाश में पतंग उड़ती देख कर उसके द्वारा मां को राम के यहां से नीचे बुलाने का विचार करता है पतंग और रस्सी प्राप्त करने के लिए श्यामू का भोलेपन से चोरी करना संघर्ष की अवस्था है चरम सीमा वह है जब श्यामू की चोरी पकड़ी जाती है उसकी पिटाई होती है और काका पर उसके ममता वहीं हृदय की पीड़ा का रहस्य खुलता है इस प्रकार कहानी का अंत अपनी नाक की यथा के कारण अत्यंत मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी है पाठक की संवेदना को एक ऐसे धरातल पर पहुंचा कर शांति और वेदना के वातावरण में कहानी की समाप्ति होती है जिससे पाठक प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता पात्र एवं चरित्र चित्रण चरित्र चित्रण इस कहानी का प्रमुख उद्देश्य नहीं है वास्तव में चरित्र घटना और वर्णन आदि सभी तत्व कहानी में किसी साथी की पूर्ति के लिए होते हैं और यह आवश्यक नहीं कि उस संघर्ष की सिद्धि के लिए इन सभी को एक ही कहानी में प्रस्तुत किया जाए इसलिए सियारामशरण गुप्त ने श्यामू भोला और विश्वंभर काका के चरित्रों को बहुत कम रेखाओं में प्रस्तुत किया है किंतु कहानी का केंद्र बिंदु श्यामू का ही चरित्र है श्यामू एक अबोध शिशु है जिसके मन में अपनी काकी के प्रति असाधारण प्यार है और यह भोला-भाला नन्हा सा बालक अपनी सरलता और बाल सुलभ मधुर कल्पना से पाठकों को अनायास ही अपना बना लेता है अंत में पिता से फिट कर भी उसका चुप रहना उसकी वेदना में डूबी मुंह आत्मा का परिचायक है पतंग पर लिखा केवल एक शब्द का की ही उसके ह्रदय की संपूर्ण संवेदना को साकार कर देता है भोला सा मुंह से कुछ अधिक समझदार है और इसलिए वह श्यामू की मौलिक योजना में कुछ संबोधन करता है सुखिया तो सामने आई ही नहीं और वहां हो भैया की सिर्फ झलक ही देखने को मिलती है वस्तुतः कहानीकार में इस छोटी सी कहानी में किसी पात्र के संबंध में कुछ ना कहकर भी सब कुछ कह दिया है और यही उसकी कहानी कला की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कथाकथन या संवाद प्रस्तुत कहानी में संवादों की योजना अधिक नहीं है लेकिन जो भी कथाकथन आए हैं वह संक्षिप्त व पाठक पर अधिक अमिट छाप या प्रभाव डालने वाले हैं श्यामू और भोला का कथाकथन अत्यंत अर्थ पूर्ण एवं प्रभावोत्पादक है श्यामू ने धीरे से कहा भोला किसी से ना कहो तो मैं एक बात कहूं भोला ने सिर हिलाकर कहा नहीं किसी से ना कहूंगा इस प्रकार भोला और श्यामू का संवाद संक्षिप्त तो है ही साथ ही उसमें अबोध था और सरलता भी है देश काल और वातावरण इस कहानी में एक भारतीय परिवार की हल्की सी झलक दिखलाइए उसके अनछुए उसके अनुकूल इसमें घरेलू वातावरण का सजीव चित्रण हुआ है शाम के घर में मृत्यु की छाया छाई हुई है अतः कहानी में सर्वत्र विषाद के वातावरण की छाप है बाह्य वातावरण के साथ पात्रों की मानसिक स्थिति का भी प्रभावशाली चित्रण किया गया है वस्तुतः सियारामशरण गुप्त ने बाल मनोविज्ञान का मार्मिक पक्ष प्रस्तुत किया है भाषा शैली काकी नामक कहानी की भाषा अत्यंत सरल और स्वाभाविक है बोलचाल के व्यवहारिक शब्दों का प्रयोग किया है कहानी की शैली वर्णनात्मक है कहीं-कहीं सूखती शैली का प्रयोग भी किया गया है वर्षा की अनंतर एक ही 2 दिन में पृथ्वी के ऊपर का पानी अगोचर हो जाता है पर भीतर ही भीतर उसकी आद्रता जैसे बहुत दिन तक बनी रहती है उद्देश्य प्रस्तुत कहानी जितने संक्षिप्त है उसका उद्देश्य उतना ही महान है बाल मनोविज्ञान की सुंदर झांकी इस कहानी में दृश्य है शिशुओं के हृदय में सरलता और अबोध ताका सागर लहराता है सांसारिक बुराइयों से वे नितांत अपरिचित होते हैं परंतु वातावरण धीरे-धीरे उन्हें सांसारिक छल कपट की ओर अग्रसर कर देती है वस्तुतः वस्तुतः लेखक ने प्रोड़ता पर शिशु ताकि विजय दिलाने में लेखक पूर्णतया सफल हुआ है इस कहानी के द्वारा लेखक या गुप्त जो यह भी गुप्तजी यह भी संकेत करना चाहते हैं कि अभिभावकों को बच्चों के प्रति सोच समझकर व्यवहार करना चाहिए किसी बात की गहराई तक गए बिना केवल डांट फटकार और मारपीट को ही एक मात्र साधन बना लेना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से असंगत है किस प्रकार कहानी कला की दृष्टि से प्रस्तुत कहानी एक उत्कृष्ट कहानी है
हिंदसा
गुरुवार, 15 अगस्त 2019
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