हिंदसा

रविवार, 5 अप्रैल 2020

प्रमुख छंदों के लक्षण और उदाहरण

'यमाताराजभानसलगा'
प्रमुख छंदों के लक्षण और उदाहरण समझने से पहले हमें गण को समझ लेना चाहिए क्योंकि छंद में गण का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है| गणों को सरलता पूर्वक याद करने और पहचान करने के लिए निम्नलिखित सूत्र को याद कर लेना चाहिए-
'यमाताराजभानसलगा'
बोलने के लिए -यमाता राज भान सलगा
इस सूत्र का कोई अर्थ नहीं होता है | इस सूत्र पंक्ति में 10 वर्ण (य, म,त,र, ज, भ, न, स, ल, ग) हैं | 'ल' और 'ग' को छोड़कर प्रत्येक वर्ण का एक 'गण' है अर्थात 'य' का एक गण 'म' का एक गण 'त' का गण.... .......| कहने का तात्पर्य यह है कि हर एक वर्ण या अक्षर का एक-एक गण कहलाता है और और हर गण में तीन-तीन अक्षरों का समूह रहता है| पहले आठ वर्णों (य, म,त,र, ज, भ, न, स) से आठ गणों ( यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण) का ज्ञान होता है | अंतिम दो से लघु - गुरु का ज्ञान होता है| गण बनाने के लिए एक- एक अक्षर हटाते चले जाएंगे तो हमारे गण बनते चले जाएँगे| जैसे- 'य से -यमाता, म से- मातारा, त से-ताराज,र से- राजभाज से- जभान, भ से- भानस, न से- नसल, स से- सलगा'

  • य से यगण, यगण में (प्रथम लघु दो गुरु वर्ण) यमाता ( ISS)
  • म से मगण, मगण (तीनों गुरु वर्ण) मातारा (SSS)
  • त से तगण, तगण से (प्रथम दो गुरु एक लघु वर्ण) ताराज (SSI)
  • रा से रगण, रगण में (प्रथम गुरु, मध्य लघु, तृतीय गुरु वर्ण) राजभा (SIS)
  • ज से जगण, जगण में (प्रथम लघु, मध्य गुरु,एक लघु वर्ण) जभान (ISI)
  • भा से भगण. भगण में (प्रथम गुरु शेष लघु वर्ण) भानस (SII)
  • न से नगण, नगण में (तीनों लघु वर्ण) नसल (III)
  • स से सगण, सगण में (प्रथम दो वर्ण लघु तृतीय गुरु) सलगा (IIS)
  • ल से लघु (I)
  • गा से गुरु (S)
इस सूत्र में सम्पूर्ण छंद शास्त्र के चिन्ह समाहित हैं |

लघु मात्रा वाले वर्ण-
मात्राएँ - I, I, I, I, I
वर्ण - अ, इ, उ, ऋ, ँ
जैसे - क, कि, कु,कृ, कँँ

गुरु मात्रा वाले वर्ण-

मात्राएँ - S, S, S, S, S, S, S, S, S
वर्ण - आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:
जैसे - ( का, की, कू, के, कै, को, कौ, कं, क:)

संयुक्त वर्ण -
I, I, I, I
क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
क्ष= क्+ ष, त्र= त्+र, ज्ञ= ज्+ञ, श्र= श्+र ।
नोट:
कई बार प्राय: जहाँ उच्चारण में जोर पड़ता है वहां लघु को गुरु मान लिया जाता है | और जहाँ उच्चारण में जोर नहीं पड़ता है वहां प्राय: गुरु को भी लघु मान लिया जाता है |
कहने का अर्थ यह है कि हमें मात्राओं को लगाते समय वर्ण में लगने वाले समय को भी ध्यान में रखना होता है |
वैसे तो संयुक्त वर्ण से पूर्व के अक्षर को गुरु मानने की परम्परा है जैसे 'सत्य' में 'स' के लिए गुरु की मात्रा लगेगी लेकिन हमें उस अक्षर में लगाने वाले समय को भी घ्यान में रखना है इसलिए 'तुम्हारी' में कम समय लगने के कारण 'तु' को लघु ही मान लेते हैं |

प्रमुख छंदों के लक्षण और उदाहरण


भुजंगप्रयात ( य चारों बनाओ भुजंगप्रयाता)
भुजंगप्रयात छंद चार यगण (ISS) के योग से बनता है| इस छंद के प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं, जिनका क्रम है- यगण(ISS) यगण (ISS)यगण(ISS) यगण (ISS)अर्थात कुल 4 बार यगण पहले दो चरणों की तुक में और अगले दो चरणों की तुक में समानता रहती है| उदाहरण के लिए-
ISS ISS ISS ISS
बनाती रसोई सभी को खिलाती |
IS S I S S I S S I SS
इसी काम में आज मैं तृप्ति पाती|
IS S I SS IS SI SS
रहा किंतु मेरे लिए एक रोना
I SS IS S IS S IS S
खिलाऊं किसे मैं अलोना सलोना||

- मैथिलीशरण गुप्त साकेत
इस छंद की प्रत्येक पंक्ति में यहां चार बार यगण आया है और इस क्रम से 12 वर्ण हैं| पहले-दूसरे चरण में (खिलाती व पाती) और तीसरे-चौथे चरण में (अलोना व सलोना) शब्दों की तुक में समानता है, इसलिए यह भुजंगप्रयात छंद है| एक और उदाहरण-
ISS ISS ISS ISS ISS ISS ISS ISS
कभी आंख से आंख तेरी लड़ेगी, कभी कंठ में ब्याह माला पड़ेगी |
IS SI S SI S S I SS IS SI SS IS SI SS
कभी चित्त की ग्रंथि को खोज कोई, तुझे स्थान देगी, मुझे मान देगी ||
- अनूप शर्मा

द्रुत विलंबित छंद (द्रुत विलंबित होत न भ भ र)
यह समवर्णिक छंद है| इसके प्रत्येक चरण में एक नगण, दो भगण और एक रगण (न भ भ र) का योग रहता है | इस प्रकार प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं| इसे सुंदरी तथा हरिणीप्लुता नाम भी दिया गया है| उदाहरण-
I I I S I I S I I S I S I I I S I I S I I S I S
दिवस का अव सान स मीप था | गगन था कुछ लोहित हो चला||
तरुशि खा पर थी अब राजती | कमलि नी-कुल वल्लभ की प्रभा||
I I I S I I S I I S I S I I I S I I S I I S I S - हरिऔध

शिखरिणी (कवीन्द्रों को मौहै य म न स भ ला गा 'शिखरिणी')
शिखरिणी छंद यगण(ISS), मगण(SSS), नगण( III), सगण( IIS), भगण(SII), लघु और गुरु( IS ) के योग से बनता है| इस प्रकार इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं| 6 वें और 17 वें वर्ण पर यति होती है| उदाहरण-
मात्राएँ -
ISS SS S III IIS S II I S
अनूठी आभा से, सरस सुषमा से सुरस से|
IS S SS S II II I S S I I I S
बना जो देती थी, वह गुणमयी भू विपिन को ||
ISS S S S I I I II S S I I I S
निराले फूलों की, विविध दल वाली अनुपमा |
IS SS S S II I I I S S I I I S
जड़ी-बूटी हो हो, बहु फलवती थी विलसती ||
- हरिऔध
जहां प्रत्येक पंक्ति में 17 वर्ण हैं और दिखाई गई मात्राओं के अनुसार गणों का क्रम है| इसमें 6 व 17 वर्णों के बाद यति है, इसलिए यह शिखरिणी वर्णिक व्रत है|

शार्दूलविक्रीडित छंद (जामें हों म स जा स ता त ग वही शार्दूलविक्रीडिता)
इसमें मगण (SSS), सगण(IIS), जगण(ISI), सगण(IIS), तगण(SSI), तगण(SSI) और एक गुरु(S) के योग से बनता है| इस प्रकार प्रत्येक चरण में 19 वर्ण होते हैं| पहली यति 7 या 12 वर्ण पर होती है| या चरणान्त में ।उदाहरण के लिए-

SS S II SIS I I I S SSI SS I S
जैसे हो रघु वेदना हृदय की, औ दूर होवे व्यथा|
SS S I ISI SI I IS SS I S S I S
पावें शांति समस्त लोग न जलें, मेरी वियोगाग्नि में ||
SS S II SI S I I I S SS ISS I S
ऐसा ही वर -ज्ञान तात ब्रज को देना, बताना क्रिया |
SS S I I SI S I I I S S SI SSI S
माता का सविशेष तोष करना, औ वृद्ध गोपेश का||


सवैया छंद

लक्षण

1. यह वर्णिक सम छंद होता है।
2. इसके प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 तक वर्ण होते हैं।
3. वर्णों की संख्या एवं गणों की प्रकृति के आधार पर इस छंद के ग्यारह भेद किये जाते हैं।
यथा –

सवैया के ग्यारह भेद –

’’मदिरा मालती सुमुखी, चकोर दुर्मिल किरीट।
अरसात अरविन्द सुन्दरी, लवंगलता कुंदल।।’’
ग्यारह भेदों के क्रमानुसार लक्षण
’’सात भगु-दो जलगु में, सात भगुल आठ सभा।
सात भर आठ सलगु में, आठ जल सल एक बढ़ा।।’’

सवैया छंद के भेद व लक्षण

क्र.सं.सवैया का नामलक्षणलक्षण प्रत्येक चरण में वर्णों की सं.सवैया की जाति
1.मदिरा सवैयासात भगण +एक गुरु22 वर्ण  आकृति
2.मालती सवैयासात भगण + दो गुरु23 वर्णविकृति
3.सुमुखी सवैयासात जगण + एक लघु + एक गुरु23 वर्णविकृति
4.चकोर सवैयासात भगण + एक गुरु + एक लघु23 वर्णविकृति
5.दुर्मिल सवैयाआठ सगण24 वर्णसंकृति
6.किरीट सवैयाआठ भगण24 वर्णसंकृति
7.अरसात सवैयासात भगण + एक रगण24 वर्णसंकृति
8.अरविंद सवैयाआठ सगण + एक लघु25 वर्णअतिकृति
9.सुन्दरी सवैयाआठ सगण + एक गुरु24 वर्णअतिकृति
10.लवंगलता सवैयाआठ जगण + एक लघु24 वर्णअतिकृति
11.कुंदलता सवैयाआठ सगण + दो लघु26 वर्णउत्कृति

इस प्रकार
प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 वर्णों तक के छंद को सवैया कहते हैं | चार चरण होते हैं | इसके मत्त गयन्द, मदिरा, चकोर, किरीट ,दुर्मिल आदि कुल 48 भेद-उपभेद किए गए हैं |
मत्त गयन्द सवैया छंद (7 भगण (SII), 2 गुरु , 22-26 तक वर्ण )
(सात भकार गुरु युग हों जब मत्तगयन्द कहैं तब ताको)
मत्तगयन्द छंद सात भगन(SII) और दो गुरुओं के योग से बनता है| इस प्रकार यहाँ प्रत्येक चरण में 23 वर्ण होते हैं इसे मालती और इंदव भी कहा जाता है उदाहरण-
 S II S II SII S II SI I S II S II SS
या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं |
SII SI I S II S II SI I SI I SI I SS
आठहु सिद्धि नवौ निधि को सुख नंद क गाय चराइ विसारौं|
S II S I IS II SII S II S II SI I SS
ए रसखानि जबै इन नैनन तें ब्रज के बन बाग निहारौं|
S I I S II SI I SI I SI I SII SI I SS
कोटिक ये कलधौत के धाम करील क कुंजन ऊपर वारौं|

यहां प्रत्येक पंक्ति में 23 वर्ण हैं | इनका क्रम 7 भगण और अंत में दो गुरु वर्ण हैं| चरणों के अंत में परस्पर तुक की समानता है|
दंडक छंद-
इस छंद के एक ही चरण में 26 से अधिक वर्ण होते हैं । दंडक का शाब्दिक अर्थ होता है-डंडा। इसके पाद दंड के समान लंबे होते हैं। अतः दंडक के समान लंबी पंक्ति वाले छंद दंडक कहलाते हैं।


दंडक छंद दो प्रकार के होते हैं-

साधारण वर्ण दंडक- जिनमें 26 वर्णों से अधिक वर्ण होने के अतिरिक्त वर्ण -समवृत्तों के समान ही गणों और गुरु-लघु की नियमित व्यवस्था होती है।
मुक्तक दंडक- जिनमें वर्ण तो 26 से अधिक होते हैं परन्तु मुक्तक दंडक में गणों की कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती। केवल कहीं-कहीं लघु -गुरु की व्यवस्था होती है। इस मुक्तक दंडक के एक रूप को ही घनाक्षरी या कवित्त कहते हैं। मुक्तकों में कवित्त और घनाक्षरी हमारी भाषा में अधिक प्रचलित हैं |


 वर्णों और मात्राओं की गिनती

क्र. स.वर्णमात्राएँ
1. क 1 वर्ण, 1 मात्रा
2.क्ल1 वर्ण, 1 मात्रा
3.स्थ्य1 वर्ण, 1 मात्रा
4.र्क1 वर्ण, 1 मात्रा
5.का1 वर्ण, 2 मात्रा
6.क्ला1 वर्ण, 2 मात्रा
7.कल2 वर्ण, 2 मात्रा
8.क्लम2 वर्ण, 2 मात्रा
9.काल2 वर्ण, 3 मात्रा
10.सत्य2 वर्ण, 3 मात्रा
11.स्वास्थ्य2 वर्ण, 3 मात्रा
12.कात्स्नर्य2 वर्ण, 3 मात्रा
13.सिन्धु2 वर्ण, 3 मात्रा
14.सिंधु2 वर्ण, 3 मात्रा
15.हंस2 वर्ण, 3 मात्रा
16.हंसी2 वर्ण, 4 मात्रा
17.हँसी2 वर्ण, 3 मात्रा
18. हाँसी 2 वर्ण, 4 मात्रा
19.दुःख2 वर्ण, 3 मात्रा
 20.कार्य2 वर्ण, 3 मात्रा
21.जगत्2 वर्ण, 3 मात्रा
22. श्रवण3 वर्ण, 3 मात्रा
23.अमृत3 वर्ण, 3 मात्रा
24.अमृत (उच्चारण=अम्मृत)3 वर्ण, 4 मात्रा
25.कर्ता3 वर्ण, 4 मात्रा
26.तुम्हारा3 वर्ण, 5 मात्रा
27.तुम्मारा3 वर्ण, 6 मात्रा
28.कन्हैया3 वर्ण, 5 मात्रा
29.देश-प्रेम (उच्चारण देश प्रेम)4 वर्ण, 6 मात्रा
30.देश-प्रेम (उच्चारण देश प्रेम)4 वर्ण, 7 मात्रा
सवैया, मनहरण कवित्त आदि छन्दों में आवश्यकता हो तो किसी भी गुरु वर्ण को लघु पढ़ा जा सकता है।

कवित्त छंद- कवित्त छंद के प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं| 16 वें और 31 वें वर्ण पर यति होती है| इस छंद के चरण के अंत में गुरु वर्ण (S) होता है| इसे मनहरन छंद भी कहते हैं | घनानंद ने अपने काव्य में कवित्तों का प्रयोग किया है|
उदाहरण -
I I I I I I I I I I I I I I I I
रस के प्रयोगिन के सुखद सुजोगिन के, (16 वर्ण )
I I I I I I I I I I I I I I I
जेते उपचार चारु मंजु सुखदाई है | (15वर्ण )
I I I I I I I I I I I I I I I I
तिनके चलावन की चरचा चलावे कौन , (16 वर्ण )
I I I I I I I I I I I I I I I
देत न सुदर्शन यों सुधि बिसराई है | (15 वर्ण )

करत न उपाय न सुभाय लखि नारिन कौं, (16 वर्ण )
भाय क्यों अनारिन कौं भरत कन्हाई हैं | (15 वर्ण )
ह्यां तो विषम ज्वर वियोग की चढ़ाई यह, (16 वर्ण )
पाती कौन रोग की पठावत दवाई है |(15वर्ण )


उदाहरण -
II II III III II II II
पात भरी सहरी सकल सुत बारे बारे, (16 वर्ण)
III I II II II I III I
केवट की जाति कछू वेद न पढ़ाइ हौं। (15 वर्ण)
16+15= 31वर्ण
घनाक्षरी
दो भेद -
रूप घनाक्षरी- प्रत्येक चरण में 32 वर्ण होते हैं | 8, 8, 8, 8 पर यति और अंत में गुरु-लघु आते हैं |
उदाहरण -
III I I I I I II I I I I I I (वर्ण)
नगर से दूर कुछ गांव की सी बस्ती एक
I I I I I I I I I I I I I I I I
हरे भरे खेतों के समीप अति अभिराम | (32 वर्ण )
जहां पत्र जाल अंतराल से झलकते हैं,
लाल खपरैल, श्वेत छज्जों के संवारे धाम | (32 वर्ण )
बीचों-बीच वट वृक्ष खड़ा है विशाल एक,
झूलते हैं बाल कभी जिसकी जटाएं थाम| (32 वर्ण )
चढ़ी मंजू मालती लता है जहां छाई हुई,
पत्थर की पट्टियों की चौकियां पड़ी हैं श्याम | (32 वर्ण )
-रामचंद्र शुक्ल

देव घनाक्षरी - प्रत्येक चरण में 33 वर्ण होते हैं। प्राय: 8, 8, 8, 9 पर यति और अंतिम तीन वर्ण लघु होते हैं |
उदाहरण
I I. IIII. II. III. III. II (वर्ण)
झिल्ली झनकारै पिक चातक पुकारै बन ,
III. III. II. III. III. III (वर्ण)
मोरिनि गुहारै उठें जुगनू चमकि चमकि |
घोर घन कारे भारे धरवा धुरारे धाम
घूमनि मचावैं नाचैं दामिनी दमकि दमकि|
झूकनि बयार बहै, लूकनि लगावै अंग,
हूकनी भभूकनि की उर में खमकि खमकि|
कैसे करी राखौं प्राण प्यारे जसवंत बिना,
नान्ही नान्ही बूंद झरैं मेघवा झमकि झमकि|
-जसवंत सिंह


मात्रिक छंद

उल्लाला, चौपाई, रोला, हरिगीतिका,

उल्लाला छंद (विषमनि पंद्रह धारिये कला, सम तेरह 'उल्लाल' कर)
उल्लाला छंद प्रसिद्ध छंद है। इसके विषम चरणों (पहले व तीसरे) में 15 मात्राएं होती हैं तथा सम चरणों में ( दूसरे व चौथे) में 13 मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार इसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं।

उदाहरण 1 -
S III SIS SI S=15, IIS IIS SI S=13
हे शरण दायनी देवि
! तू, करती सबका त्राण है।
हे मातृभूमि ! संतान हम, तू जननी तू प्राण है।
S SI SI SSI II=15, S II S S SI S=13
-मैथिलीशरण गुप्त


उदाहरण 2 -

S    I I I    S I S  S  I I I    I I   I I S   I I S   I S   
यों   किधर जा रहे  हैं बिखर, कुछ बनता इससे कहीं ।         
S I I I SIS SI II SI SI SS IS
 संगठित ऐटमी रूप धर , शक्ति पूर्ण जीतो मही ॥  

चौपाई- (कल सोलह जत अंत न दीजै)
इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएं होती हैं। यह एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं। हरेक चरण के अंत में जगण (ISI)अथवा तगण (SSI)नहीं होना चाहिए, ऐसा करने से छंद का सौंदर्य घट जाता है इसलिए चरण के अंत में या तो दो लघु रखे जाते हैं अथवा दो गुरु रखे जाते हैं। दो चरण मिलकर एक अर्धाली बनते हैं। यह दोनों चरण प्रायः एक ही पंक्ति में लिखे जाते हैं। पहले-दूसरे चरण की तथा तीसरे-चौथे चरण की तुक में समानता मिलती है। उदाहरण-

S I I I I I I S I I SS I I I SI II S I I SS
तात जनक तनया यह सोई। धनुष जग्य जहि कारन होई। (दो चरण)
पूजन गौरी सखीं ल आईं। करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं।
(दो चरण)
SII SS IS I SS III ISI III IISS
- तुलसीदास: रामचरितमानस
यहां प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएं हैं और पहले और दूसरे चरण तथा तीसरे और चौथे चरण के अंतिम वर्ण में तुक की समानता है। चारों चरणों के अंत में गुरु वर्ण है। इसलिए यह चौपाई छंद का उदाहरण है।
रोला-
यह चार पंक्तियों में लिखा जाने वाला सममात्रिक छंद है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में प्राय: 11 और 13 पर यति होती है, उसी के क्रम से 24 मात्राएं होती है। पहली- दूसरी तथा तीसरी- चौथी पंक्तियों की तुक की समानता मिलती है।
उदाहरण-

SS SS IS I S S S II SS
जीती जाती हुई जिन्होंने भारत- बाजी
 II     II   S  II    SI   ISS     III      ISS
निज बल से मल मेट विधर्मीं  मुगल कुराजी
 IIS       SS   III    IS    SS  I  I SS
जिनके आगे ठहर सके जंगी न जहाजी
S  S  IS    ISI      SIII      SI   I SS
हैं ये वही प्रसिद्ध छत्रपति भूप  शिवाजी

प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएं हैं और पहले-दूसरे चरण की तथा तीसरे-चौथे चरण की तुक मिल रही है।
हरिगीतिका-
यह चार पंक्तियों में लिखा जाने वाला छंद है और प्रत्येक पंक्ति में प्राय: 16 व 12 मात्राओं पर यति और इसी क्रम से कुल 28 मात्राएं होती हैं। प्रत्येक पंक्ति के अंत में लघु व गुरु मात्रा होती है। तथा पहली और दूसरी तथा तीसरी और चौथी पंक्ति में तुक समानता भी होती है।
उदाहरण के लिए-

II SI SS S IS II, II IS SS IS
खग-वृन्द सोता है अतः कल कल नहीं होता वहां

II SI SII S III S, SI SS S IS
बस मंद मारुत का गमन ही मौन होता है जहां

II SI SS S ISII, II IIIS S IS
इस भांति धीरे से परस्पर कह सजगता की कथा

S SIS S SI S S, SI S I IS IS
यों दीखते हैं वृक्ष ये हों विश्व के प्रहरी यथा
अर्द्ध सममात्रिक छंद
जिसमें छंद के पहले और तीसरे अर्थात (विषम) तथा दूसरे में चौथे अर्थात (सम) चरणों में मात्राओं की समानता पाई जाती है वह अर्द्ध सममात्रिक छंद कहलाते हैं।
बरवै, दोहा, सोरठा, इसी वर्ग के छंद हैं।
बरवै छंद-

यह एक अर्द्ध सममात्रिक छंद है। इसके विषम चरणों में 12-12 तथा सम चरणों में 7-7 मात्राएं होती हैं। चरणों के अंत में जगण
(ISI)होता है। इस प्रकार इसकी प्रत्येक पंक्ति में 19 मात्राएं और 12 व 7 मात्राओं पर यति होती है। इस छंद के अंत में अधिकतर लघु वर्ण आता है। और सम चरणों की तुक मिलती है। जैसे-
III IS S II II S II SI
अवधि शिला का उर पर, था गुरु भार
तिल तिल काट रही थी, दृग- जलधार

II II SI IS S II IISI
-मैथिलीशरण गुप्त: साकेत
इसमें विषम चरणों में 12-12 चरणों में तथा सम चरणों में 7-7 मात्राएं हैं और चरणों में अंतिम अक्षर (भार,धार) में तुक साम्य है। इसलिए यह बरवै छंद है। बरवै छंद का एक और देखते हैं-
सब से मिलकर रह मन, वैर बिसार
दुर्लभ नर तन पाकर, कर उपकार
दोहा छंद-
दोहा छंद के विषय में कहा गया है- जान विषम तेरह कला सम शिव दोहा मूल।
दोहा छंद के विषम चरणों में 13 मात्राएं और सम चरणों में 11 मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती है। चरण के अंत में लघु होना आवश्यक है। जैसे-

SI IS SSIS SISI II SI
रामकथा मंदाकिनी, चित्रकूट चित चारु ।
तुलसी सुभग सनेह बन, सिय रघुबीर बिहारु।।

IIS III ISI II II IISI ISI

दोहा दो पंक्तियों में लिखा जाने वाला एक मात्रिक छंद है। इसका प्रयोग हिंदी साहित्य में बहुत हुआ है। इसके विषम चरणों में 13-13 तथा सम चरणों में 11-11 मात्राएं होती है। इस प्रकार पंक्ति में 13 व 11 के क्रम से यति होती है और दोनों पंक्तियों में 24 + 24 अर्थात कुल 48 मात्राएं होती है। विषम चरणों के शुरू में जगण
(ISI) नहीं आता और सम चरणों के अंत में लघु मात्रा आती है। इसके सम चरणों की तुक मिलती है। उदाहरण-
II S S SS III IS I SS SI
जब माला छापा तिलक, सरै न एकौ काम।
II SS SS IS SS SS SI
मन काँचे नाचै वृथा, साँचै राचै राम।।
- तुलसीदास

इन पंक्तियों के विषम चरणों में 13-13 व सम चरणों में 11-11 मात्राएं हैं और सम चरणों में 'काम' व 'राम' शब्दों में तुक मिलती है। इसलिए यह दोहा छंद है।

सोरठा छंद- (तेरह सम विषमेश, दोहा उलटा सोरठा)
सोरठा छंद के विषम चरणों में 11 और सम चरणों में 13 मात्राएं होती हैं। इस प्रकार इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं। इसके सम चरणों में जगण नहीं होता। यह छंद दोहा छंद का उलटा होता है। अर्थात- दोहा छंद के पहले -तीसरे चरण सोरठा के दूसरे और चौथे चरण तथा दोहा के दूसरे और चौथे चरण सोरठा के पहले और तीसरे चरण होते हैं। कहीं-कहीं सोरठा के दूसरे और चौथे चरण में तुक भी मिल जाती है, पर सर्वत्र ऐसा नहीं होता है। जैसा कि पहले ही कह दिया गया गया है कि यह छंद लक्षण की दृष्टि से दोहा का उल्टा होता है। इस बात को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे-

II II SII SI SI IS S II IS
लिख कर लोहित लेख, डूब गया है दिन अहा!
व्योम- सिंधु सखि देख, तारक बुद बुद दे रहा!!

SI SI II SI SII II II S IS
- मैथिलीशरण गुप्त: साकेत
यहां पर विषम चरणों में 11-11व सम चरणों में 13 मात्राएं हैं। विषम चरणों में अंतिम अक्षर(लेख,देख) में तुक है। यहाँ अपवाद स्वरूप सम चरणों में भी तुक मिल रही है।


विषम मात्रिक छंद


कुंडलिया (दोहा(24
मात्राएं) रोला (24 मात्राएं)कुंडलिया होय)
[दोहा + रोला]= कुंडलियां छंद
कुण्डलिया छंद 6 पंक्तियों का होता है।
इसमें प्रथम दो चरण दोहा के होते हैं और अंतिम चार चरण रोला के। इस प्रकार कुंडलिया के प्रत्येक चरण में 24, 24 मात्राएँ होती हैं।
दोहे के चौथे पाद को रोला के प्रथम पाद में दोहराया जाता है। और दोहा का प्रथम पाद जिस शब्द से आरंभ होगा वही शब्द रोला के चतुर्थ पाद के अंत में दोहराया जाता है। जैसे-
IS ISS S IS S SS IISI
बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय।

SI ISS SIS II S SI ISI
काम बिगारे आपनो जग में होत हँसा
य।। (दोहा)
II S SI ISI SI S SI I SS
जग में होत
हँसाय चित्त में चैन न पावै।
SI SI ISI SI SI III ISS
खान पान समान, राग-रंग मनहि मनावै

II III IISI SI II III I SS
कह गिरधर कविराय दु:ख कछु टरत न टारे ।

I I I I S II SI IS S IS ISS
खटखत है जिय माँहि कियो जो बिना विचारे।। (रोला)


इस प्रकार दोहा और रोला छंद को मिलाकर कुंडलियां छंद बनता है। इसमें 6 चरण हैं। दोहा के प्रथम और द्वितीय चरण को मिलाकर कुंडलियां का प्रथम चरण बना है और दोहा के तृतीय और चौथे चरण को मिलाकर इसका दूसरा चरण बना है। इसके बाद रोला के चार चरण रखे गए हैं। अतः यहाँ एक दोहा और एक रोला छंद मिलाकर कुंडलियां छंद बन गया है।
कुंडलियां छंद के प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होने से इसमें कुल 144 मात्राएं होती है।
इसके अतिरिक्त कुंडलियां छंद में दो बातें हमेशा याद रखनी है- पहली बात यह है कि इसके शुरू और अंत में एक ही शब्द का प्रयोग होता है। जिस शब्द से छंद का आरंभ होता है उसी शब्द से छंद का अंत होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि अंत में उसी शब्द को दोहराया जाता है जिस शब्द से कुंडलियां शब्द का आरंभ होता है। दूसरी बात यह है कि दोहा छंद के अंतिम चरण को रोला छंद के प्रारंभ में दोहराया जाता है। अर्थात कुंडलियां की तीसरी पंक्ति के प्रारंभ में वही वाक्यांश आता है जो दूसरी पंक्ति के अंत में होता है।


छप्पय- (छप्पय षट पद-छंद, मिलि रोला उल्लाल)
[रोला (24
मात्राएं)+ उल्लाला (28मात्राएं) ]
यह एक विषम मात्रिक छंद है। छप्पय छंद रोला और उल्लाला छंद के मेल से बनता है। इसमें कुल 6 चरण होते हैं। छंद के प्रथम चार चरण रोला के और अंतिम दो चरण उल्लाला के होते हैं। प्रथम चार चरण रोला के 24-24 मात्राओं के (11 और 13 की यति से) होते हैं और अंतिम दो चरण उल्लाला के (26-26 पर यति से) या 28-28 मात्राओं (13 पर यति) के होते हैं।
जैसे-

I I S II S SI SI II IS IS S (24 मात्राएं )
जिसकी रज में लोट-लोट कर बड़े हुए हैं।

IIS S II III II II IS IS S
घुटनों के बल सरक- सरक कर खड़े हुए हैं।

IIISI II SISI S II II SS
परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाए।

IIS SII SI IS SS IISS
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाए।। ( यहाँ तक रोला)

II SS SS SI II I I S SS SI S (28 मात्राएं )
हम खेले-कूदे हर्षयुत जिसकी प्यारी गोद में। (अंतिम दो चरण
उल्लाला के जिसमें 28 मात्राएं होती हैं )
S SI SI IIS III SI S I S SI S
हे मातृ-भूमि तुझकों निरख, मग्न क्यों न हों मोद में। (28 मात्राएं ) (उल्लाला)
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दूसरा उदाहरण-
SSII IISI III II II SII S
नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर है।

SI SI II III SIS SSII S
सूर्य चंद्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है।

IIS SI ISI SI SS SII S
नदियां प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।

SS II IISI SI II SSII S
वंदी जन खगवृंद, शेष-फन सिंहासन है।

IIS IISI ISI S IISS II SI S
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस देश की।

II SI SI S SI S III SI SSI S
जय मातृभूमि, तू सत्य ही, सगुन मूर्ति सर्वेश की।


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