हिंदसा

बुधवार, 14 सितंबर 2016

छंद के अंग / तत्त्व

छंद के लक्षण में मुख्य रूप से मात्रा, वर्ण/अक्षर/स्वर ध्वनि, यति, गति,लय, तुक या ताल, पाद/चरण एवं गण आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए छंद के भेदों को समझने से पहले इन शब्दों का अर्थ या स्वरूप जान देना आवश्यक है। इन शब्दों का अर्थ जाने बिना हम छंद को नहीं समझ सकते। अतः: ये शब्द और उनका अर्थ/ स्वरूप इस प्रकार है-
1. मात्रा- (लघु और गुरु)
किसी भी अक्षर के बोलने में लगने वाला समय मात्रा कहलाता है। मात्रा दो होती हैं - एक लघु और दूसरी गुरु। मात्राएं स्वरों की लगती हैं । जो ह्रस्व स्वर होते हैं उन की एक मात्रा लगती है और उनका चिन्ह इस प्रकार है -(।), जो स्वर दीर्घ होते हैं उन की दो मात्राएं लगती हैं और उसका चिन्ह इस प्रकार है-(S)

लघु के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें ध्यान देने योग्य हैं -
  • संयुक्त अक्षर स्वयं लघु होते हैं
  • अनुनासिक युक्त अर्थात चंद्रबिंदु वाले ह्रस्व स्वर भी लघु माने जाते हैं |
  • स्वर की लघुता अथवा गुरुता का प्रमुख आधार उसके उच्चारण में लगने वाला समय है अत: यदि किसी छंद में दीर्घ स्वर का उच्चारण भी ह्रस्व स्वर की भांति अल्प समय में होता है तो उसे लघु ही माना जायेगा
  • ह्रस्व मात्राओं से युक्त सभी वर्ण लघु होते हैं|
  • हलन्त व्यंजन भी लघु माने जायेंगे |
  • लघु का चिन्ह (I) है | अर्थात एक मात्रा की गिनती की जाती है।
गुरु- दीर्घ स्वर गुरु कहलाते हैं -आ ई , ऐ आदि ,
गुरु के संबंध में कुछ अनिवार्य बातें-

  • इसका चिन्ह (S) है | अर्थात दो मात्राओं की गिनती की जाती है।
  • दीर्घ स्वर - आ,ई ,ऊ ऐ, ओ अं, अ: , ओं ,औ और अनुस्वार के मेल से बने व्यंजन (का ,की ) भी गुरु हो जाते हैं |
  • अनुस्वार युक्त वर्ण गुरु हो जाते हैं
  • विसर्ग युक्त वर्ण भी गुरु हो जाते हैं
  • संयुक्त अक्षर से पूर्व के वर्ण गुरु हो जाते हैं |
  • जिस ह्रस्व स्वर के आगे दो व्यंजनों का संयोग होगा, उसे गुरु माना जायेगा| जैसे -बुद्धि सत्य आदि |
  • जहाँ जहाँ अनुस्वार होगा और विसर्ग से युक्त लघु वर्ण भी गुरु माना जाता है जैसे- हंस, बंदी, षष्ठ: |
  • अनुनासिक से युक्त ह्रस्व स्वर भी लघु ही माना जायेगा|
  • कभी-कभी ऐसा भी होता है कि चरण के अंत में आवश्यकता के अनुसार लघु को गुरु और गुरु को लघु मान लिया जाता है, जैसे- 'लीला तुम्हारी अति ही विचित्र' यहां पर त्र लघु है पर इसे गुरु माना जाएगा|
    2 . वर्ण/अक्षर/स्वरध्वनि - मुख से नि:सृत हर उस छोटी से छोटी ध्वनि को वर्ण या अक्षर कहते हैं , जिसके और खंड नहीं किए जा सकते या कहें तो जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते| जैसे- अ, इ, उ, ऋ आदि| छंद शास्त्र में स्वर अथवा स्वर युक्त व्यंजन को वर्ण माना जाता है। स्वर रहित व्यंजनों को वर्ण स्वीकार नहीं किया जाता। जैसे मोहन शब्द में व्याकरण की दृष्टि से म,ओ, ह,अ,न,अ ये छः अक्षर हैं , किंतु छंद शास्त्र की दृष्टि से इसमें केवल ओ,अ,अ तीन ही अक्षर हैं । अर्थात छंद शास्त्र स्वर ध्वनियों पर आधारित है, इसमें स्वर ध्वनियों की गणना दो प्रकार से की जाती है- मात्राओं अर्थात स्वर की इकाइयों को गिन कर तथा दूसरा वर्णों और उनके क्रम को गिनकर|

    3. पाद/चरण - प्रायः छंद में 4 चरण होते हैं इन्हें पद या पाद भी कहते हैं । चौपाई छंद 4 चरणों वाला होता है , पूरा रामचरित मानस दोहा और चौपाई में ही लिखा गया है | साधारण रूप से हम चरण को छंद की एक पंक्ति कह सकते हैं । कुछ छंदों के दो चरण एक पंक्ति में लिखे जाते हैं जैसे दोहा, सोरठा, बरवै आदि। कुछ छंदों के छह चरण भी होते हैं जैसे- कुंडलियां और छप्पय। जिस छंद के 6 पद होते हैं उसके छठे अंश को एक पाद कहा जाता है।

    4 . यति- जब हम बोलते हैं तो कुछ समय बाद हमें विराम या विश्राम लेना पड़ता है क्योंकि हम ज्यादा देर तक लगातार नहीं बोल सकते अत: हमें कुछ समय के उपरांत कुछ देर के लिए रुकना ही पड़ता है| दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि काव्य में जिस-जिस स्थान पर जिह्वा स्वेच्छा से रुकती है, उसको छंद शास्त्र में यति कहते हैं| यति छंद का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है और काव्य में कहाँ ठहराव आना चाहिए इसका भी नियम होता है| यति का एक दूसरा नाम ही ठहराव है।.. एक छंद में दो या तीन यति हो सकती हैं, ये कवि को तय करना पड़ता है कि उसे कहाँ पर यति रखनी हैं और कहाँ पर नहीं| छंद में गति, प्रवाह और लय का माधुर्य उत्पन्न करने के लिए यति नियम का पालन करना पड़ता है। इसी के कारण पद के चरणों का भी नियमन होता है।
    उदाहरण -
    जो मैं कोई, विहाग उड़ता, देखती व्योम में हूँ |

    यहाँ कोई के बाद (,) और उड़ता के बाद (,) यति है

    5 .तुक, लय एवं ताल
    समान स्वर वाले वर्णों पर चरण की समाप्ति तुक कहलाती है, अर्थात जब दो या चार चरणों के अंत में अक्षरों (स्वर और व्यंजन) की समानता मिलाती है तब उसे तुक कहते हैं | हिंदी के अधिकांश परंपरा युक्त छंद तुकांत हैं। किंतु आजकल कविता में तुक पर कोई ध्यान नहीं ,दिया जाता है। हमें अधिकतर छंदमुक्त और अतुकान्त कविता ही पढ़ने को मिल रही हैं। कहा जा सकता है कि अतुकांत छंदों का प्रयोग बढ़ रहा है। संस्कृत साहित्य तथा उर्दू की शायरी में भी तुकांत छंदों का अभाव मिल रहा है। हिंदी के दोहा, चौपाई, सवैया आदि तथा अंग्रेजी के अधिकांश छंद तुकांत ही होते हैं।
    लय का संगीत शास्त्र में प्रयोग होता है, छंद में लय का आगमन संगीत शास्त्र से हुआ है, गीत को वाद्य को और नृत्य को आपस में जोड़ने वाला तत्त्व लय ही है, कहने का तात्पर्य यह है कि लय ही गायन, संगीत और नृत्य के बीच सामंजस्य स्थापित करती है| काव्य में गेयता का तत्त्व लय और ताल से ही आता है| कविता को जब गाकर सुनाया जाता है तब वह लय से ही संभव हो पाता है|
    लय से जुड़ा हुआ तत्व ही ताल है| ताल प्रवाह को मापने का एक माप है, कहाँ उतार होना है, कहाँ चढ़ाव होना है या आरोह -अवरोह का सारा विधान ताल पर ही निर्भर करता है |

    6 . गति - गति का अर्थ होता है- प्रवाह। निराला ने काव्य में प्रवाह को महत्तवपूर्ण माना है| छंद में मात्रा या वर्णों की नियमित संख्या से ही काम नहीं चलता। उसमें पढ़ते समय एक प्रकार का प्रवाह भी होना चाहिए, जिससे कहीं व्यर्थ रुकना न पड़े इसी प्रवाह को गति कहते हैं। अर्थात काव्य में गति भंग नहीं होनी चाहिए क्योंकि काव्य में गति न होने से उसको पढ़ने में आनंद नहीं आता | इसलिए यह काव्य का अनिवार्य अंग होता है | काव्य में प्रवाह निरंतर अभ्यास से आता है|

    7. गण- मात्राओं या अक्षरों के समूह को छंद शास्त्र में गण कहते हैं। गण दो प्रकार के होते हैं। एक वर्ण-गण दूसरा मात्रा-गण। तीन-तीन अक्षरों के समूह को वर्ण-गण कहते हैं। अक्षरों के लघु और गुरु के विचार से गणों के आठ भेद हैं। गणों को सरलता पूर्वक याद करने और पहचान करने के लिए निम्नलिखित सूत्र को याद करना चाहिए-
    'यमाताराजभानसलगा'
    इस सूत्र का कोई अर्थ नहीं होता है | इस सूत्र पंक्ति में 10 वर्ण (य, म,त,र, ज, भ, न, स, ल, ग) हैं | 'ल' और 'ग' को छोड़कर प्रत्येक वर्ण का एक 'गण' है अर्थात 'य' का एक गण 'म' का एक गण 'त' का गण.... .......| कहने का तात्पर्य यह है कि हर एक वर्ण या अक्षर का एक-एक गण कहलाता है और और हर गण में तीन-तीन अक्षरों का समूह रहता है| पहले आठ वर्णों (य, म,त,र, ज, भ, न, स) से आठ गणों ( यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण) का ज्ञान होता है | अंतिम दो से लघु - गुरु का ज्ञान होता है| गण बनाने के लिए एक- एक अक्षर हटाते चले जाएंगे तो हमारे गण बनते चले जाएँगे| जैसे- 'य से -यमाता, म से- मातारा, त से-ताराज,र से- राजभाज से- जभान, भ से- भानस, न से- नसल, स से- सलगा'

    • य से यगण, यगण में (प्रथम लघु दो गुरु वर्ण) यमाता ( ISS)
    • म से मगण, मगण (तीनों गुरु वर्ण) मातारा (SSS)
    • त से तगण, तगण से (प्रथम दो गुरु एक लघु वर्ण) ताराज (SSI)
    • रा से रगण, रगण में (प्रथम गुरु, मध्य लघु, तृतीय गुरु वर्ण) राजभा (SIS)
    • ज से जगण, जगण में (प्रथम लघु, मध्य गुरु,एक लघु वर्ण) जभान (ISI)
    • भा से भगण. भगण में (प्रथम गुरु शेष लघु वर्ण) भानस (SII)
    • न से नगण, नगण में (तीनों लघु वर्ण) नसल (III)
    • स से सगण, सगण में (प्रथम दो वर्ण लघु तृतीय गुरु) सलगा (IIS)
    • ल से लघु (I)
    • गा से गुरु (S)

    इस सूत्र में सम्पूर्ण छंद शास्त्र के चिन्ह समाहित हैं |



    छंद के भेद

    छंद के मुख्य रूप से दो भेद होते हैं - एक मात्रिक और दूसरा वर्णिक। लेकिन आजकल उभय छंद और मुक्त या स्वच्छंद छंद को भी छन्दों में शामिल किया जाता है , इस दृष्टि से कुल 4 छंद माने जा सकते हैं - वर्णिक, मात्रिक, उभय, मुक्त या स्वच्छंद।
    मात्रिक छंद
    जिन छन्दों में मात्राओं की निश्चित और नियमित संख्या रहती है। उन छन्दों में वर्णों की संख्या पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता ,.... दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मात्रिक छंद वे होते हैं जिनकी रचना मात्राओं की गणना के आधार पर होती है।
    उदाहरण -

    शशि मुख पर घूंघट डाले मात्रा -14 वर्ण - 11
    अंचल में दीप छिपाएं मात्रा -14 वर्ण - 9
    जीवन की गोधूलि में मात्रा -14 वर्ण - 8
    कौतूहल से तुम आए मात्रा -14 वर्ण - 9

    इस छंद के प्रत्येक चरण में मात्राओं की संख्या निश्चित और नियमित है| कहने का मतलब है कि प्रत्येक चरण में 14 -14 मात्राएं हैं; किंतु वर्णों की संख्या निश्चित नहीं है, वह पूरी तरह से अनियमित है, इसलिए यह मात्रिक छंद का उदाहरण है

    मात्रिक छंद को हम तीन भागों में बांट सकते हैं -
    1. सममात्रिक छंद - सममात्रिक छंद वे छंद होते हैं जिनके चारों चरणों में मात्राओं की संख्या समान होती है |
    2. अर्धसममात्रिक छंद - ये वो छंद होते हैं जिनके पहले और तीसरे (विषम ) तथा दूसरे और चौथे (चरणों की मात्राएं समान होती हैं|
    3. विषममात्रिक छंद- इनके चरणों में मात्राएं संख्या में समान नहीं होती हैं, परंतु उनमें गति और लय होती है |
    वर्णिक छंद -
    वर्णिक छंद में मात्राओं पर ध्यान न देकर वर्णों की संख्या तथा वर्णों से बनने वाले गणों पर ध्यान दिया दिया जाता है । कह सकते हैं कि वर्णिक छंद वे होते हैं जिनकी रचना वर्णों की गणना के आधार पर होती है।
    उदाहरण 
    कैसे मैं फिरुँगा मुझे कौन बताएगा?                              मात्रा-15 ,  वर्ण - 15
    कैसे मैं फिरूँगा हाय?शुन्य लंका धाम में?                      मात्रा-15 ,  वर्ण - 15
     दूंगा सांत्वना क्या मैं तुम्हारी उस माता को।                   मात्रा-17 ,  वर्ण - 15
     कौन बतलाएगा, मुझे है वत्स पूछेगी मात्रा-                     मात्रा-15 ,  वर्ण - 15
     इस छंद में मात्राओं की संख्या पर ध्यान न रखकर वर्ण- विधान पर ध्यान रखा गया है। प्रत्येक चरण में 15- 15 वर्ण हैं, जबकि मात्राओं की संख्या भिन्न भिन्न है। वर्णों  के इसी नियमित विधान के कारण यह वर्णिक छंद है।
    वर्णिक छंद के भी तीन प्रकार होते हैं -
    1. समवर्णिक छंद-समवर्णिक छंद वे छंद होते हैं जिनके चारों चरणों में वर्णों की संख्या समान होती है |
    2. अर्धसमवर्णिक छंद- ये वो छंद होते हैं जिनके पहले और तीसरे (विषम ) तथा दूसरे और चौथे (चरणों में वर्णों की संख्या समान होती है|
    3. विषमवर्णिक छंद- विषम छंद वे छंद कहलाते हैं जो सम और अर्द्ध सम न होकर चारों चरणों में वैषम्य रखते हैं |

    उभय छंद-

    इस छंद में वर्णों तथा मात्राओं, दोनों की ही संख्या निश्चित और नियमित होती है|
    उदाहरण के लिए देख सकते हैं -
    ऊपर को जल सूख, सूखकर उड़ जाता है |   मात्रा-24  ,  वर्ण - 17
    सर्दी से सकूचाय, जलद पदवी पाता है |  मात्रा-24  ,  वर्ण - 17
    पिंघलावै रविताप, धरातल पै गिरता है| मात्रा-24  ,  वर्ण - 17 
    बार-बार इस भांति, सदा हिरता- फिरता है |                   मात्रा-24  ,  वर्ण - 17

    इस छंद के प्रत्येक चरण में नियम के अनुसार 24-24 मात्राएं और 17-17 वर्ण हैं | साथ ही 11 और 13 मात्राओं पर तथा 8 और 9 वर्णो पर यति है|
    मुक्त या स्वच्छंद छंद-

    यह वे छंद होते हैं जिनमें परम्परित परिपाटी से या प्राचीन परंपरा से हटकर रचना की जाती है | इस तरह की कविता में मात्राओं और वर्णों का कुछ खास घ्यान नहीं रखा जाता| वे छंदमुक्त या मुक्त छंद में लिखी कविता कहलाती हैं| इन छंदों में प्रवाह या लय पर तो ध्यान रहता है किंतु मात्राओं तथा वर्णों की गिनती या नियमों की कोई चिंता नहीं की जाती है|
    इस प्रकार के छंदों को हम दो भागों में रख सकते हैं- पहला वर्ग वह है जिसमें वे छंद आते हैं, जिनमें परंपरा से ग्रहण किए गए चार चरणों के स्थान पर 5, 6 या अधिक चरण रखे जाते हैं | दूसरे वर्ग के अंतर्गत वे छंद होते हैं या आते हैं जो अंग्रेजी की पद्धति पर रचे जाते हैं | इस प्रकार के छंदों में यदि पहले चरण में 8 अक्षर हैं तो दूसरे में 13, तीसरे में 2 , और चौथे में 15 |
    कहने का आशय यह है कि दूसरे प्रकार के मुक्त छंदों में अक्षरों का कोई नियमित विधान नहीं रहता है|

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