हिंदसा

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

अनमोल पल

अनमोल पल 
                                  (यात्रा वृतांत)
बात अक्टूबर, 2014 की है| सेमस्टर ब्रेक में दो दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण के लिए छात्राओं को कहाँ ले कर जाया जाए, इसको लेकर विभागीय बैठक में सभी अध्यापिकाएं विचार कर रही थी| सभी चाहते थे कि कोई ऐसा स्थान चुना जाये जो सुरक्षित भी हो, दिल्ली से ज्यादा दूर भी न हो और हिंदी (विशेष) की छात्राओं के पाठयक्रम से सम्बंधित होने के साथ-साथ ज्ञानवर्द्धक भी हो। आपसी विचार-विमर्श के बाद वृन्दावन-मथुरा जाने का निर्णय लिया गया। तत्पश्चात कॉलेज प्रशासन ने भी हमारी इस योजना पर अपनी मोहर लगा दी। जब हमने छात्राओं को इस ट्रिप की सूचना दी तो वे फूली नहीं समां रही थी| 
              ट्रिप को लेकर छात्राओं के मन ने अनेक दृश्य आकर लेने लगे। जैसे- नन्द गॉव कैसा होगा ? क्या गोवर्धन पर्वत बहुत बड़ा है? अगर है तो भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर कैसे उठाया होगा? सुना है उसकी परिक्रमा करने से बड़ा पुण्य मिलता है, उसकी परिक्रमा पैदल की जाये या गाड़ी से? आदि आदि। अर्थात मन में अनेक सपनो को संजोकर हम और छात्राएं वृंदावन-यात्रा की तैयारी में जुट गए। ट्रिप के दौरान छात्राओं को क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी हैं? घर से क्या-क्या सामान लेकर आना है? इन सब निर्देशों की सूची तैयार करके हमने कई दिन पहले ही छात्राओं को दे दी थी। तृतीय वर्ष की छात्राएं ट्रिप को लेकर बेहद उत्साहित थी क्योंकि कॉलेज में उनका यह आखिरी साल था, वे अपनी मित्र-मंडली से जुड़ी खट्टी-मिट्ठी यादें अपने साथ ले जाना चाहती थी| डॉ. उषा राकेश मैम ने पहले ही सबको सचेत कर दिया था कि सुबह जो कोई निर्धारित समय पर कॉलेज नहीं आएगा उसको हम छोड़कर चले जाएंगे|
             आख़िरकार वह दिन आ ही गया जिसका हम सब को इंतजार था| एक-दो छात्राओं को छोड़ बाकि सब समय पर पहुँच गए थे| पौ फटने के साथ ही हमारी बस यमुना एक्सप्रेस-वे थी। यमुना एक्सप्रेस-वे हवाई पट्टी की तरह चौड़ा और खुला था। जिसको देखकर हम यही सोच रहे थे कि काश! दिल्ली की सड़कें भी इतनी ही चौड़ी और खुली होती और हम आए दिन लगने वाले जाम से बच जाते। यमुना एक्सप्रेस-वे को लेकर बच्चो में बहुत उत्साह था| जैसे ही बस इस हाईवे पर आई वैसे ही कुछ छात्राएं गाना गाने लगी। तो कुछ बस में नाचने लगी। बच्चों को नाचते-गाते देख हमारी बस के पास से गुजरने वाले दूसरे वाहनो में बैठे लोग भी बच्चों की मस्ती को देखकर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ रहे थे। बस की खिड़की के पास बैठी कुछ छात्राएं ऐसी भी थी जो बस में चल रहे नाच-गाने से दूर चुपचाप खड़की से बाहर के दृश्यों को निहार रही थीं। खिड़की के बाहर दूर-दूर तक पसरे पड़े खेत, उन खेतों की बाड़ों पर लगे बड़े-बड़े पेड़ बस की रफ़्तार के साथ रफ़्तार पकड़ते नज़र आ रहे थे। कुछ ऐसे ही दृश्यों को देखती ये छात्राएं ऐसी लग रही थी जैसे या तो वे अपने अतीत की यादों में खो गई हैं या अपने भावी जीवन को लेकर नए-नए सपने बुन रही हैं।

         नंदगाँव के रास्ते में चारों तरफ धान की फसल लहलहा रही थी। हवा एकदम शुद्ध थी। नन्द बाबा का मंदिर मुख्य सड़क से लगभग एक किलोमीटर दूर गॉव के बीचों-बीच एक पहाड़ी पर स्थित था। हम पैदल ही गॉव की संकरी गलियो से होते हुए जा रहे थे। गॉव की महिलाएं खेत-खलियान का काम निपटाकर अपने घरों के बाहर बैठी सुस्ता रही थी। वहां कोई भी घर, गली-कूचा ऐसा नहीं था जहाँ मंदिर ना बना हो, अगर वृंदावन को मंदिरों की नगरी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। तीन-चार छोटी-बड़ी गली पार करने के उपरांत खड़ी सीढ़ियों की एक संकरी गली शुरू हो गई थी| नन्द बाबा के जयकारों की गूंज यहाँ तक सुनाई दे रही थी| कुछ सीढ़ियाँ चढने के उपरांत डॉ. उषा राकेश, डॉ. मोहिनी और डॉ पद्मिनी मैम ने वहीं एक घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठना ही उचित समझा| यह बहुत प्राचीन मंदिर था तथा मंदिर का गृहभाग भगतों से सटासट भरा हुआ था। हम बहुत पीछे खड़े थे जहाँ से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था इसलिए हम सब नन्द बाबा के दर्शन किये बिना ही वापिस आ गए। 
            उसके बाद हम बरसाना स्थित ‘राधारानी मंदिर’ के दर्शन करने के लिए रवाना हुए। यह मंदिर भी पहाड़ी पर था जहाँ पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई थी। सूर्य भी आकाश में अपना रूप दिखाने लगा था। ड्राइवर ने हमें एक चौक में उतारा जहाँ बहुत सारे छायादार वृक्ष थे| यहाँ से मंदिर लगभग एक किलोमीटर दूर था| मैंने और कुछ लड़कियों ने गाड़ी में ही अपने जूते-चप्पल उतारे और राधारानी के दर्शन करने के लिए चल पड़े। चौक से मंदिर तक जाने वाली सड़क तारकोल से बनी थी जो तेज धूप के कारण गर्म हो गई थी। सड़क के दोनों ओर रेत पड़ा था, सड़क पर कुछ दूर चलने के उपरांत हमारे नंगे पैर जलने लगे। हमारे तलवो में से आग निकल रही थी, लेकिन हम जहाँ थे वहां से न वापिस जा सकते थे और न तपती सड़क पर चला जा रहा था| सड़क के किनारों पर पड़े रेत पर पैर रखें तो वो भी गर्म थी। हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? तभी हमने देखा कि थोड़ी दूरी पर सड़क के किनारे एक छोटा-सा पेड़ है जहाँ हमारे कुछ विद्यार्थी खड़े हैं, एक अच्छी बात यह थी कि उन्होंने स्लिपर पहन रखे थे, हम भागकर वहां पहुंचे। उन बच्चों ने हमें अपने स्लिपर पहनने के लिए कहा, हम चाह कर भी मना नहीं कर पाए। लेकिन समस्या यह थी कि अब वे कैसे चल पाएंगे, अब उनके पैर जल रहे थे। फिर हमने तय किया कि कुछ दूर हम स्लिपर पहने और कुछ दूर वो। इस प्रकार हम जलते-भूनते पैरों से मंदिर पहुंचे। वहाँ जाते ही हमने सबसे पहले अपने पैरों को मिटटी के एक बर्तन में भरे पानी में डूबो दिया और ये सीख ली कि आगे की यात्रा में कहीं भी चलने से पहले सड़क के तापमान की जाँच-पड़ताल जरुर करेंगे क्योंकि ये पाँच -छः मिनट का सफर तय करना हमारे लिए कितना मुश्किल हो गया था, ये हम ही जानते है। राधारानी मंदिर में भीड़ ज्यादा नहीं थी, हमने आराम-से राधारानी के दर्शन किये, प्रसाद लिया ठंडी-ठंडी लस्सी पी, लस्सी पीकर सब अपने-आप को तरोताजा महसूस कर रहे थे। तीन बज चुके थे और हमें हर हालत में पांच बजे तक यमुना आरती में शामिल होने के लिए वृन्दावन पहुँचना था| खैर हम यमुना आरती में समय से पहुंच गए। आरती का दृश्य वाकई बहुत सुन्दर था। आरती के साथ बजने वाली घंटियों की आवाज बहुत ही मनमोहक थी। वहां के पुजारियों ने हम सब को पूजा सामग्री से सजी एक थाली दी। खास बात यह रही कि इसके लिए पुजारियों की ओर से किसी प्रकार की दक्षिणा की मांग नहीं की गई, उनका निस्वार्थ भाव से एक स्टिक के माध्यम से भक्तो द्वारा दियो को यमुना में बह रहे पानी में रखवाना, आटे की गोलियों को यमुना के पानी में मछलियो के लिए फैंकवाना, वाकई मन को संतोष देने वाला था। यमुना आरती में शामिल हो कर हम अपने आप को भाग्यशाली समझ रहे थे। लगभग एक घंटा बिताने के बाद जब हम यमुना नदी के किनारे बने पुराने घाटो से होते हुए वापिस आ रहे थे तो रास्ते में बहुत बन्दर थे। बन्दर जिस चालाकी से लोगों के हाथों से सामान छीन ले जाते थे ,सिर से चश्मे को बड़े प्यार से उतार कर ले जाते थे,वह सब देखकर हम हैरान थे। रास्ता भी टूटा-फूटा था। अचानक रेत से भरा हुआ हवा का एक झोंका आया और हमारे बीच में से निकल गया। 
        
हम वहां से सीधे प्रेम मंदिर गए| यह बहुत विशाल और भव्य था, सफ़ेद संगमरमर से बना यह मंदिर दिन में सफ़ेद दिखता है लेकिन रात को रंग- बिरंगी लाईटों के कारण ऐसा लग रहा था मानो मंदिर रंग- बिरंगी प्रकाश की किरणों से नहाया हुआ हो। म्यूजिकल फाउंटेन एवं लाईटों से उत्पन्न सौंदर्य को देख कर हम आश्चर्यचकित थे| मंदिर के भीतरी भाग को फूलों से सजाया हुआ था, भगवान कृष्ण के जन्म से जुडी अनेक घटनाओ को सजीव झांकियों के रूप में संयोजित किया हुआ था, मुख्य गोवर्धन पर्वत और रासलीला वाली झांकी सबके लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी| मंदिर इतना अद्भुत है कि वहां से जाने का मन ही नहीं कर रहा था। इस्कॉन मंदिर भी पास में ही था, जहाँ कृष्ण-भगत विदेशी युवतियों का देसी भजनों पर नृत्य करना बहुत मनभावन था। मंदिर में ही उपहारों की एक दूकान थी जहाँ से हमने अपने प्रियजनों के लिए छोटे-मोटे उपहार और प्रसाद ख़रीदा। उस दिन का अंतिम दर्शनीय स्थल बाँके बिहारी मंदिर था। रात का समय होने के कारण भीड़ नहीं थी, हमने बाँके बिहारी के दर्शन किए और वहां से पैदल ही शांति कुञ्ज के लिए चल दिए।  पैदल चलकर आने में हमें जो आनद आया वह अवर्णीय था। सब इतने थक चुके थे कि कब नींद आई पता ही नहीं चला।
      अगले दिन हमारा सबसे पहला दर्शनीय स्थल मथुरा का द्वारिकाधीश मंदिर था। हम सब  बहुत उत्साहित थे। कुछ ही देर में हम द्वारिकाधीश मंदिर के विशालकाय दरवाजे के पास खड़े थे, लेकिन ये दरवाजा तो बंद था! पूछने पर पता चला कि आज सुबह में मंदिर बंद रहेगा और दोपहर दो बजकर तीस मिनट पर खुलेगा। यह सुनकर सब बहुत उदास हो गए। वहीँ दक्षिण भारत से दर्शन करने आए कुछ परिवार भी खड़े थे। वे इतनी दूर से इस मंदिर को देखने आये थे और ढाई बजे तक रुकना ना उनके लिए संभव था और ना हमारे लिए। खैर हम मन मारकर वहां से चल पड़े और घाट पर जाकर नौका विहार करने का निर्णय लिया। नौका विहार के दौरान नाविक ने हमें कंस के किले को बाहर से दिखाते हुए वहां के घाटो की भी जानकारी दी, हमें वो घाट भी दिखाया जहाँ से वासुकि ने जनम् के बाद कृष्ण को लेकर यमुना पार की थी। नौका विहार के दौरान बच्चो ने कृष्ण के जीवन से जुड़े अनेक सवाल किये। हम सभी अध्यापिकाओ ने अपनी-अपनी जानकारी के अनुसार उन सभी सवालो के उत्तर दिए। रास्ते में हमने रंग-बिरगी चूड़ियाँ, टी-शर्त खरीदी और उनको वहीँ पहनकर पूरी तरह से वृंदावन के रंग में रंग गए। अंत में हमने कृष्ण-जन्म-स्थली मंदिर को देखा। हालांकि देखने के लिए यहाँ सुरक्षा के अनेक इंतजाम किये गए थे फिर भी हम यहाँ सुरक्षा में अनेक खामियों का शिकार बने। मंदिर की एक दीवार मस्जिद की दीवार से जुडी हुई थी, जब हमने वहां के एक पुजारी से पूछा, उसने बताया कि प्राचीन समय में यहाँ मंदिर और मस्जिद के बीच में कोई दीवार नहीं थी, हिन्दू और मुसलमान दोनों यहाँ पूजा करने आते थे लेकिन अंग्रेजो के आने के बाद जब हिन्दू-   मुश्लिम दंगे हुए तो इनके बीच में ये दीवार खींच दी गई| उसके बाद हमने मंदिर में बना कारावास देखा और अपनी यात्रा के अगले पड़ाव के निकल पड़े। 
दोपहर के भोजन की व्यवस्था डॉ. उषा राकेश मैम ने रास्ते में पड़ने वाले जैनमन्दिर में की थी। यहाँ का खाना शुद्ध होने के साथ-साथ बहुत ही लज़ीज़ था। गर्मा-गर्म और फूली-फूली पूरियों की खुशबू, छोले और चावल का स्वाद याद आने पर आज भी मुहँ में पानी आ जाता है। खाना तो स्वादिष्ट था ही साथ ही रसोई-घर की स्वच्छ्ता, और बड़े आदर और प्यार के साथ खाना परोसने का अंदाज देख हम गद्गद् हो गए। वहां हमने छायादार पेड़ के नीचे बैठ कर चाय की चुश्कियों का मज़ा लिया। निकलते समय जब हमारी छात्राओं ने आंवलों से लदे पेड़ों को देखा तो उनसे रहा नहीं गया और वे सभी आंवले तोड़ने के लिए पेड़ों की शाखाओं से लटकने लगीं। तभी हमने उनको उनके द्वारा पेड़ों को होने वाले नुकसान के बारे में समझाया और पेड़ों को किसी भी प्रकार से हानि न पहुचाने की बात कही। छात्राओं ने हमारा कहना माना और पेड़ों से दूर हो गई। उसके बाद हम दिल्ली के लिए रवाना हो गए। अब हम अपनी -अपनी सीटों पर बैठकर आपस में वृंदावन- मथुरा के मंदिरो, गलियारों की बात करने लगे। जैसे- किसको कौन-सा मंदिर सबसे अच्छा लगा और क्यों ? यहाँ के प्रशासन को पर्यटकों की खातिर क्या करना चाहिए? यहाँ की साफ-सफाई और विकास को लेकर भी बहुत काम करने की जरुरत है…. आदि आदि| इन सभी बातों पर चर्चा करते हुए हम दिल्ली की और बढ़ रहे थे। हम पांच बजे से पहले दिल्ली पहुंचना चाहते थे। लेकिन गाड़ी की गति बहुत धीमी थी। ड्राइवर अंकल को डॉ. उषा राकेश मैम ने कई बार बस को थोड़ा तेज चलने का अनुरोध किया। लेकिन ऐसा लगता था जैसे गाड़ी और ड्राइवर दोनों ही ये निश्चय करके आये थे कि ना मैं तेज चलाउंगा और ना मैं तेज चलूंगी, क्योंकि जब-जब ड्राइवर ने गति तेज की तब-तब गाड़ी को रोकना पड़ा। अंत में वही हुआ जिसका हमें डर था, दिल्ली पहुँचते पहुँचते ६ बज गए और हम जगह-जगह जाम में फंसते चले गए। कुल मिलाकर हम नौ बजकर तीस मिनट पर कॉलेज पहुंचे। प्रेम मंदिर की भव्यता, बांके बिहारी मंदिर की प्राचीनता, इस्कॉन मंदिर के प्रति विदेशियो की आस्था तथा ऐसी ही कुछ ट्रिप की खट्टी-मीठी यादें जिंदगी भर के लिए हमारी स्मृति में कैद हो गई थी। विभाग की जो अध्यापिकाएं किसी कारणवश ट्रिप पर  नहीं जा पाई थी हमने उन सबको बहुत मिस किया। काश वे भी हमारे साथ जाती और इन खट्टी -मीठी यादों की साक्षी बन हमारे साथ अपनी जिंदगी के कुछ अनमोल पल बिता पाती।  
         

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