हिंदसा

बुधवार, 17 मई 2017

भारतीय कव्य शास्त्र (छंद) 1

छंद

छंद संस्कृत साहित्य से ही काव्यशास्त्र का प्रमुख अंग रहा है। क्या होता है ये छंद ? और काव्य में इसका क्या महत्त्व होता है? आइए जानते हैं-
छंद का लक्षण -
जिस रचना के हर पाद में मात्रा या वर्णों को विशेष क्रम,यति ,एवं गति के अनुसार रखा गया है, उसे छंद कहते हैं |
अथवा
जिस रचना में मात्रा संख्या, वर्ण संख्या तथा उनके विशेष क्रम का एवं यति तथा गति के नियम का पालन करके पाद बनाया जाता है, उसे छंद कहते हैं।
अथवा
जब किसी भी काव्य को लय, विराम आदि में बांधकर तथा वर्णों व मात्राओं के नियमों का पालन करते हुए काव्य रचना करते हैं, तब वह छंद बद्ध रचना कहलाती है।
पहले संस्कृत काव्य में छंद के माध्यम से ही काव्य-रचना होती थी।

किसी भी छंद की रचना में वर्ण/अक्षर/स्वर ध्वनि, मात्रा (लघु व गुरु) यति, गति, लय, ताल, चरण/पाद ,गण आदि का प्रयोग किया जाता है, व छंद वर्णो तथा गुरु- लघु मात्राओं के सहयोग बनता है। क्योंकि गुरु -लघु मात्राओं का समुचित प्रयोग काव्य में लय उत्पन्न करता है इसलिए काव्य को पढ़ते समय हमें संगीत का-सा आनंद मिलता है या आभास होता है। जैसे -
रघुकुल रीति सदा चली आई
प्राण जाई पर वचन न जाई ।
छंद शब्द 'छद' धातु से निष्पन्न हुआ है। छंद धातु के अनेक अर्थ हैं - प्रसन्न करना , फुसलाना , बांधना, आच्छादित करना, ढक देना, ढाँप देना आदि। इन्हीं अर्थों के कारण छंद का अर्थ प्रसन्न करने वाली वस्तु, आच्छादन और बंधन आदि लिया जाता है| जिस प्रकार हम अपने शरीर को कपड़ों से ढकते हैं उसी प्रकार छंद भी शब्दार्थमय काव्य- शरीर को ढक देता है। काव्य का शरीर शब्द-अर्थ से युक्त होता है। छंद काव्य के भाव को बढ़ाते हैं, और भाषा में सुंदरता उत्पन्न करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार से सुंदर पहनावा शरीर के सौंदर्य को बढ़ाता है उसी प्रकार सुंदर छंद भी काव्य में प्रयुक्त होकर उसके सौंदर्य को बढ़ाते हैं उसे सहज, सुंदर और मनोरम बनाते हैं |
काव्य और छंद -
संकृत काव्यशास्त्र में छंद काव्य का महत्वपूर्ण अंग माना गया है , वहां छंद के बिना काव्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन हिंदी साहित्य में विशेष कर आधुनिक काल में छंद की अनिवार्यता को स्वीकार नहीं किया गया , विशेषकर निराला ने कविता को छंदमुक्त अर्थात छंद के बंधन से मुक्त कविता की हिमाकत की है, लेकिन देखा जाये तो वह भी एक छंद ही है| निराला ने कविता में प्रवाह को महत्त्व दिया है| इसके विपरीत आचार्य रामचंद्र शुक्ल और सुमित्रा नंदन पन्त ने कविता के लिए छंद के महत्त्व को स्वीकार किया है | रामचंद्र शुक्ल में कहा है कविता को पढ़ा नहीं जाता बल्कि गाया जाता है और गायन तभी संभव होता है जब कविता छन्दोबद्ध होती है | इसलिए काव्य में छंद की अनिवार्यता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता |
किसी भी साहित्य को रचना की दृष्टि से दो भागों में बांटा जा सकता है एक गद्य और दूसरा पद्य | छन्दोबद्ध साहित्य पद्य कहलाता है; और मात्रा, गण, यति आदि के बंधन से मुक्त साहित्य को गद्य की संज्ञा दी जाती है|
अर्थात छंद गद्य और पद्य में अलगाव का आधार भी हो जाता है | माना जाता है कि गद्य बुद्धि प्रधान होता है तथा पद्य रागात्मक प्रधान होता है | व्याकरण को गद्य का नियामक तत्त्व माना गया है अत: गद्य के लिए व्याकरण महत्वपूर्ण होती है| जब हम कविता या कहानी, उपन्यास लिखते हैं तो हमें व्याकरण के नियमों का ध्यान रखना पड़ता है और पद्य लिखते समय हमे अलंकार और छंद पर ध्यान देने की जरूरत होती है अतः: काव्य के लिए छंद नियामक तत्त्व हैं। ये एक मनोवैज्ञानिक तथ्य भी है कि लय रागात्मक वृत्ति का प्रेरक तत्त्व होता है, और लय की सृष्टि छंद के माध्यम से ही हो सकती है| इसीलिए काव्य में छंद का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है| अंत में कह सकते हैं कि छंद काव्य का अपरिहार्य अंग है| क्योंकि जब कवि छंदों के द्वारा काव्य में ह्रदय की सच्ची अनुभूति को नाद और लय के साथ उतारता है तो उस काव्य का पाठक के हृदय पर अधिक प्रभाव पड़ता है ।
छंद के अंग / तत्त्व

वर्ण/अक्षर/ स्वर ध्वनि - मुख से नि:सृत हर उस छोटी से छोटी ध्वनि को वर्ण या अक्षर कहते हैं , जिसके खंड नहीं किए जा सकते या कहें तो जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते |जैसे- अ, इ, उ, ऋ आदि
मात्रा (लघु और गुरु )- प्रत्येक वर्ण के उच्चारण में कुुुछ समय लगता है, जितना समय लगता है, उसे ही छंद के संदर्भ में मात्रा कहते हैं| इस दृष्टि से वर्ण दो प्रकार के माने जाते हैं - ह्रस्व और दीर्घ , इन्हीं को छंद शास्त्र में क्रमश: लघु और गुरु कहा जाता है | ह्रस्व स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसकी एक मात्रा मानी जाती है, और दीर्घ स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसके लिए दो मात्रा मानी जाती हैं। वैदिक संस्कृत में प्लुत स्वर भी होता था जिसके उच्चारण में ह्रस्व स्वर की अपेक्षा तीन गुना समय लगता था। किंतु हिंदी में अब प्लुत स्वर का लगभग लोप हो चुका है। मात्राओं को लगाने के नियम तय हैं जैसे-

  • अ,इ,उ,ऋ, चंद्रबिंदु (ँ) की एक मात्रा लगती है। उसे ह्रस्व या लघु कहते हैं।
  • आ,ई, ऊ, ए,ऐ,ओ,औ, अनुस्वार (ं) विसर्ग (ः) की दो मात्राएं लगती हैं उन्हें दीर्घ या गुरु कहते हैं।
  • अर्थात विसर्ग से युक्त वर्ण भी गुरु माना जाता है |
  • संयुक्त वर्णों से पहला स्वर दीर्घ हो जाता है जैसे - सत्य, धर्म तथा रक्षा में स,ध तथा र गुरु वर्ण हैं।
  • कहीं-कहीं बोलते समय ह्रस्व स्वर पर बल नहीं पड़ता तो संयुक्त वर्णों से पहले होने पर भी वह दीर्घ नहीं होता । जैसे कन्हैया में क ह्रस्व ही रहेगा न और ह के संयुक्त होने से दीर्घ नहीं होगा।



चरण या पाद 
प्रत्येक छंद कुछ पंक्तियों का समूह होता है।  उदाहरण के लिए जैसे सवैया छंद में 4 पंक्तियां होती हैं, छंद की इन पंक्तियों को चरण या पाद कहते हैं। एक पंक्ति एक चरण कहलाती है। हिंदी के अधिकतर छंद चार चरणों के होते हैं परंतु कुंडलियां, छप्पय आदि में 4 से अधिक चरण या पाद भी होते हैं,  दोहा, सोरठा बरवै आदि छंद केवल दो चरणों के ही होते हैं।
  • यति
  • गति
  • तुक
  • लय
  • ताल
  • गण




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