हिंदसा

रविवार, 24 जून 2018

एक वह अजेय (कहानी संग्रह )


                                                                
                                 
(समीक्षा)       

‘एक वह अजेय’ कहानी संग्रह दिल्ली में जन्मे डॉ. वीरेन्द्र कुमार जी का है| डॉ. वीरेन्द्र कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले ईशा ज्ञानदीप प्रकाशन से उनके ‘अन्नदाता’ और ‘अपने-अपने कुरुक्षेत्र’ नामक दो कहानी संग्रह छप चुके हैं| 
यह उनका तीसरा कहानी संग्रह है| पिछली कहानियों की तरह ही डॉ. वीरेन्द्र कुमार की इन कहानियों में भी कल्पना कम यथार्थ ज्यादा है। सरल एवं सहज भाषा में लिखी गई ये कहानियां पठनीय होने के साथ-साथ मध्यम वर्गीय जीवन के एकदम करीब हैं , कहानियों का निर्माण किसी भारी भरकम और सुनियोजित कथ्य से न होकर उन छोटी-छोटी साधारण घटनाओं से हुआ है जो हर घर में, परिवार में और हर समाज में घटित होती हैं| समाज और परिवार में रहते हुए व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में कुछ सामान्य-सी घटनाओं और अपने-परायों के बीच अक्सर जिन छोटी-छोटी समस्याओं से रूबरू होता है, उन्हीं का चित्रण-वर्णन हमें इस संग्रह की कहानियों में देखने-पढ़ने को मिलता है| मनुष्य अपने आस-पास घटित होने वाली ऐसी आदतों-बातों और मुलाकातों को बहुत सहज रूप में लेते हैं जबकि ये घटनाएं किसी भी व्यक्ति के जीवन को सही-गलत दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसी ही कुछ घटनाओं का संग्रह कर लेखक ने इन कहानियों को गुना-बुना है|
प्रकृति से मनुष्य का अटूट रिश्ता है, इसका अहसास कहानियों को पढ़ते हुए बखूबी होता है| लेखक ने भावों की गहराई को समझाने के लिए प्रकृति का ही सहारा लिया है “ मेरे भीतर का वात्सल्य रसायन बनकर रुके हुए जलस्त्रोत के प्रवाह की तरह दुग्ध रूप में फूट पड़ा है” सर्दी-गर्मी-बरसात आदि सभी ऋतुएं, सुबह-शाम-दोपहर-रात-दिन, आदि दिन के पहर, इन सबका किसी भी कहानी के देशकाल और वातावरण के निर्माण में अहम् रोल होता है, इस बात को लेखक अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए प्रत्येक कहानी में कहीं-न-कहीं प्रकृति के उपादानों का चित्रण अवश्य हुआ है| इस कहानी-संग्रह की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि प्रत्येक कहानी में प्रत्येक स्तर पर लेखक की दृष्टि सामाजिक, पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण पर बनी रही है| 
        जीवन का एक और नाम संघर्ष है, कदम कदम पर नई-नई मुसीबतें-समस्याएं और परेशानियाँ मुंह बाए खडी रहती हैं, ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपने सारे निर्णय सोच-समझ कर लेता है| फिर भी कई बार जब समय प्रतिकूल होता है तो सज्जन व्यक्ति भी अपनी बिना किसी भूमिका के ऐसी मुश्किल में पड़ जाता है कि उसकी सारी सूझ-बुझ धरी की धरी रह जाती है, उसकी जीवन-नैया डगमगाने लगती है, ऐसी दुःख की घड़ी में अगर कोई इंसान मदद के लिए आगे आता है तो वही सच्चा इंसान होता है, देखा जाये तो यही इंसान होने की पहचान है, इंसान वह है, जो अपने आसपास के लोगों को दुख से उभारे, उनकी मदद करें|  मगर ये दुनिया इतनी सीधी-साधी नहीं है, होता अक्सर ये है कि जब मनुष्य कष्ट में होता है तो लोग उसका साथ छोड़ देते हैं, उससे दूरी बना लेते हैं, यहाँ तक कि लोग अपने को पराया करने में सेकंड नहीं लगाते। तब ऐसा लगता है जैसे ये धरती रहने लायक जगह नहीं है, इंसान, इंसान नहीं, हैवान है और ये जीवन जीवन न होकर एक सजा है, अगर जीवन, दुनिया या इस समाज को लेकर आप भी ऐसा सोचते हैं तो आपको  ‘एक वह अजेय’ कहानी संग्रह ज़रूर पढ़ना चाहिए| क्योंकि इन कहानियों के सदपात्र जीवन में हारे हुए कुछ ऐसे ही लोगों का सहारा बनने के लिए पैदा हुए हैं| लेखक ने ‘अपनी बात’ में  इस ओर संकेत भी किया है, वे लिखते हैं- “प्रस्तुत कहानी संग्रह ‘एक वह अजेय’ में जीवन संघर्ष से जूझते हुए कुछ ऐसे सदपात्र हैं जो जगह-जगह अपनी स्वर्णिम किरणों की आभा से प्रकाश फैला रहे हैं| स्वयं को होम करने वाले यह पात्र स्वयं कष्टों को झेलते हुए किसी दूसरे को बनाकर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं और यह विश्वास दृढ़ बना देते हैं कि दुनिया अभी जीने लायक है और ‘मनुष्यता मरी नहीं है’  लेखक ने अपना उद्देश्य स्पष्ट करने के लिए जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कृति कामायनी से कुछ पंक्तियाँ भी उद्रित की हैं - 'औरो को हंसते देखो मनु, हँसों और सुख पाओ। अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ।'
                           इस संग्रह में कुल आठ कहानियां संकलित हैं| प्रत्येक कहानी की रचना में लेखक का अपना अनुभव, स्मृतियां, सोच और दृष्टि का अहम् रोल रहा हैं| लेखक समाज में बदलाव चाहता है| वह चाहता है कि समाज प्रगतिशील तो बने और समाज की परंपरागत सोच में भी सकारात्मक परिवर्तन आए, लेकिन ये बदलाव पारिवारिक मूल्यों की बलि देकर नहीं होना चाहिए, शुरू से लेकर आखिर तक लेखक की यही मंसा दिखाई देती है| अगर परम्पराओं में बदलाव लाने से व्यक्ति का जीवन सुखी होता है तो इसके लिए लेखक रूढ़ हो चुकी परम्पराओं को ख़त्म कर नई परम्पराओं की स्थापना करने के लिए तैयार है, ऐसी सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने में लेखक इस बात की भी परवाह नहीं करता कि समाज के ‘चार लोग क्या कहेंगे’, लेकिन जहाँ फ़र्ज या जिम्मेदारियों को निभाने की बात आती है तो वहां लेखक  इस बात की फिक्र करता है कि 'कौन क्या कहेगा' | ‘चिकनगुनिया’ कहानी में अरुण अपने पिता को कहता है-“पापा आप हमेशा कहते हो, लोग क्या कहेंगे ? लोग क्या सोचेंगे ?……कौन हैं वे लोग जो आपके बारे में सोचते हैं; चिंता करते हैं आपकी, मुझे बताइए किसने आपको क्या दिया ?.......|” इसी तरह  ‘क्या करे अनुज’ कहानी का पात्र ‘अनुज’ अपने परिवार, अपने खानदान और समाज के प्रति अपने फ़र्ज और अपनी जिम्मेदारियों को समझता है और उनको निभाना चाहता है। उसे इस बात का खेद है कि जिनकी वो मदद करता है वो उसके प्रति कृतज्ञता भी प्रकट नहीं करते। बावजूद इसके वह अपने बीमार भाई की तन-धन-मन से मदद करता है| जबकि हम सब जानते हैं कि इस महंगाई के ज़माने में ऐसा करने वाले विरले ही मिलेंगे क्योंकि इतनी महंगाई में आज का दंपति सिर्फ अपनी पत्नी और बच्चों की खुशहाली तक ही सोच पाता है, सच्चाई तो यह है कि अपने परिवार के दूसरे सदस्यों अर्थात अपनी बहन या भाई की मदद करने के लिए ना तो उनके पास पैसा होता है और ना ही समय| कहानी पढ़कर दिमाग में यही आता है कि  हमें केवल अपने बारे में ही नहीं, अपने परिवार के दूसरे सदस्यों के बारे में भी सोचना चाहिए। ऐसा करके लेखक ने समाज और परिवार को तोड़ने की नहीं जोड़ने की बात की है|                                      
        साहित्य समाज का दर्पण होता है| समाज के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों को दिखाना किसी भी अच्छे लेखक का धर्म ही नहीं कर्तव्य भी होता है| कहानी-संग्रह का लेखक अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति सचेत है और इसी का पालन करते हुए लेखक ने दो कहानियों के माध्यम से जिम्मेदार और गैरजिम्मेदार युवा वर्ग पर प्रकाश डाला है| ‘अनाथ संसार का एक वह बालक’ और  ‘एक वह अजेय’ नामक दोनों कहानियों का निर्माण लेखक की इसी दृष्टि को रेखांकित करता है|  ‘अनाथ संसार का एक वह बालक’ कहानी आज के समय में प्रासंगिक है क्योंकि आज की नई पीढ़ी को मेहनत कम, रुपया ज्यादा चाहिए| इलेक्ट्रोनिक गैजेट और आभासी दुनिया को ही अपना सब कुछ मानने वाली  यह पीढ़ी अपने बूते पर नहीं बल्कि माता-पिता की कमाई के बूते पर बहुत-कुछ और बहुत बड़ा आदमी बनने का सपना देखती है| ऐसे में माता-पिता उन्हें पैसे देने वाली एटीएम मशीन लगने लगते हैं, एक ऐसी मशीन जिसका अपना कोई शौक या जरूरत शेष नहीं बची| यह पीढ़ी माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने से भी कतराती है।|  ‘अनाथ संसार का एक वह बालक’ कहानी का एकांत कुछ इसी तरह का बालक है| दूसरी तरफ  ‘एक वह अजेय’ कहानी में राधिका है जो ऐसे युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो समाज और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझाता है| राधिका जो कम उम्र में ही परिवार की मुखिया की भूमिका का निर्वाह करती है, अपने पिता को जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ देखकर अपनी छोटी बहनों की शादी की जिम्मेदारी वह खुद अपने कंधों पर लेती है ....राधिका अपने पिता को कहती है कि आप चिंता क्यों करते हैं? मैं हूँ न ..आप अपना ध्यान रखिए। कहानी, समाज की उस परंपरावादी सोच को खारिज करती हुई आगे बढती है कि लड़कियां लड़कों वाले काम नहीं कर सकती या लड़के ही माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा होते हैं, जो लोग लड़कियों को कमतर मानते हैं उनको यह कहानी यह संदेश देती है कि आज के समय में लड़कियां भी अपने माता-पिता और परिवार की उसी तरह से मदद करती हैं जिस तरह से एक लड़का मदद करता है। अतः माता पिता को लड़के लड़कियों की परवरिश में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए। दोनों कहानियों  का आदि, मध्य और अंत सही दिशा में विकास करता नजर आता है और कहानी के तत्वों के आधार पर भी मूल्यांकन करें तो भी ये बहुत ही अच्छी कहानी साबित होती हैं|
                   ‘चिकनगुनिया कहानी’ बुजुर्गों के अकेले जीवनयापन को लेकर लिखी गई है, अरुण और करुणा अपने-अपने माता-पिता के नए संबंध का समर्थन करते हैं| उनका यह निर्णय उनकी आधुनिक सोच का परिचायक है|  आज रोजी-रोटी के चक्कर में नई पीढ़ी माता-पिता को छोड़ विदेशों में जाकर बस रही है, माता- पिता बुढ़ापे में अकेले जीवनयापन करने  को मजबूर हो रहे हैं| ऐसे समय में पारिवारिक संबंधों की परिधि, सीमाएं बढ़ रही हैं,  उनकी परिभाषाएं बदल रही हैं, लेखक ने सांकेतिक रूप से जाहिर कर दिया है कि अब हमें पारिवारिक संबंधों को लेकर अपनी पारंपरिक सोच को त्याग कर समयानुसार नई सोच को अपनाना पड़ेगा| देखा जाये तो पाठक भी यही चाहता है इसलिए मौसी का अरुण के साथ जाना पाठक को शुकून देता है क्योंकि जीवन केवल जवानी का नाम नहीं है, उसमें बुढ़ापा भी आता है और जवानी में हमें शायद सहारे की उतनी जरूरत नहीं होती जितनी बुढ़ापे में होती है| ‘उनके अपने फूफा जी’ कहानी समाज के यथार्थ रूप को उजागर करती है। समाज में कुछ लोग दोहरे चरित्र के व्यक्ति होते हैं जो देखने में बहुत ही सीधे-साधे और सामाजिक लगते हैं लेकिन बहुत ही कुटिल कुलषित हृदय वाले होते हैं। अपनी चौधराहट बनी रहे बस, भलाई से इन लोगों का कोई लेना-देना नहीं होता। अपने स्वार्थ के सिवा इनको कुछ नहीं दिखाई देता। इस कहानी में लेखक ने ऐसे लोगों के चरित्र पर पड़ी परतें उतार उनके चरित्र का वास्तविक रूप दिखाया है।
            ‘अपना अपना गणित’ कहानी में लेखक ने घरेलु कामों को लेकर एक दम्पति के बीच हुए वार्तालाप को आधार बनाया है| घरेलु काम महिला और पुरुष किसके कर्मक्षेत्र में आते हैं ? यही प्रश्न वार्तालाप का मुख्य केंद्र बिंदु है| आजकल महिला और पुरुष दोनों ही काम करते हैं। प्राय: सभी घरों में घरेलू काम महिला के सर पर मंड दिए जाते हैं, पुरुष अगर किसी काम को करता है तो वह ये कह कर महिला पर अहसान जताता है कि उसने ये सारे काम उसके बांटे के किये हैं| जबकि आज महिला पुरुष के बराबर कमाती है| ऐसे में घर के काम भी दोनों के हुए, लेकिन महिला के हिस्से में कुछ ज्यादा ही काम रहता है, उस पर कार्यक्षेत्र और घरेलू दोनों जगहों के कामों को करने की जिम्मेदारी आ जाती है| या यूँ कहे कि नाते-रिश्ते निभाने की जिम्मेदारी महिलाओं की ज्यादा होती है| इसलिए वह अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को छोड़ नहीं पाती और ना ही वह अपने निजी कार्य क्षेत्र में किसी तरह की लापरवाही दिखाना चाहती, इसलिए वह इन दोनों के बीच में अंततः संघर्ष में करती रहती है जिसका कहीं ना कहीं उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है| कह सकते हैं कि महिलाओं के  पक्ष को इस कहानी में बड़े अच्छे से रखा गया है और वो भी एक पुरूष पात्र के द्वारा, यह तभी संभव हो पाता है जब उस अहसास को उस पुरूष पात्र ने महसूस किया हो| 
                   ‘एक बेरोजगार’ कहानी में यह बहुत ही अच्छी तरह दर्शाया है कि एक व्यक्ति अपने अस्थाई रोजगार को बनाए रखने के लिए क्या-क्या नहीं करता?, कुछ चापलूस और अत्यधिक महत्वाकांक्षी लोग सत्ताधारी को ऐसा चश्मा पहनाते है कि उसको फिर वही दीखता है जो वे दिखाना चाहते हैं, लेकिन कहते हैं न कि जिसको लागे वही जाने, शायद इस पीड़ा का तनिक भी अहसास न तो सरकार को है और न ही किसी संस्थान के सर्वेसर्वा को| इसलिए यह कोई नहीं जानता कि अस्थाई होने का दंश झेलते-झेलते व्यक्ति हरे-भरे पेड़ से सूखी लकड़ी-सा हो जाता है, हमारा प्रशासन, हमारी व्यवस्था, संस्थान का सर्वेसर्वा इस अस्थाई या बेरोजगार को सुखी लकड़ी बनाकर अपने ओछे स्वार्थ के चुल्हे में जलाकर किस प्रकार अपनी रोटियाँ सकते हैं, यह ‘एक बेरोजगार’ कहानी से पता चलता है, लेकिन बेरोजगारों को नाकामियों से घबराकर आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए|
         कहानी संग्रह की अंतिम कहानी माधवी है| माधवी कहानी की मुख्य पात्र है जो एक लडके से प्रेम करती है| वह जानती है कि सच्चे प्रेम में भोग-वासना का कोई स्थान नहीं है| जो ‘प्रेम’ जैसे पवित्र शब्द को भी यूज एंड थ्रो की तर्ज पर प्रयोग करते हैं ऐसे प्रेमियों को माधवी ने बड़े सटीक शब्दों में प्रेम के पवित्र भाव को समझाने की कोशिश की है| अंत में कहा जा सकता है कि एक दो जगह लेखक भाव में बहकर कहानीकार के बदले उपदेशक की भूमिका में ज़रूर आ गए हैं, थोड़ी लेखनी भी डगमगाई है, जिसके कारण बीच-बीच में संवादों में थोडा-सा विरोधाभास उत्त्पन्न होता है लेकिन कथा के प्रवाह में, गति में, कहीं कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती| कुल मिलाकर सभी कहानियां पाठक को सामाजिक सरोकारों से जोड़ती हैं|
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