हिंदसा

मंगलवार, 8 मई 2018

युवाओं का भविष्य

युवाओं का भविष्य 
प्रत्येक देश अपने युवाओं का भविष्य बेहतर बनाने के लिए समय-समय पर अनेक नीतियाँ और योजनाएँ बनाता है। भारत में भी  ‘राष्ट्रीय युवा नीति’ , स्टार्टअप इंडिया , प्रधानमंत्री युवा योजना आदि अनेक योजनाएं ऐसी हैं जिनके माध्यम से युवा अपना भविष्य संवार सकते हैं | लेकिन सच्चाई तो यह है कि भारत की घनी आबादी को देखते हुए  ये योजनाएं ऊँट के मुंह में जीरा साबित हो रही हैं| ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में लगभग बारह करोड़ बेरोजगार हैं, और सबसे ज्यादा दुखी करने वाली बात ये है कि इनमें पढ़े-लिखे युवाओं की तादाद सबसे ज्यादा है। इनमें 25 फीसदी युवा 20 से 24 की आयुवर्ग के हैं। 17 फीसदी युवा 25 से 29 वर्ष की आयुवर्ग के हैं। 20 साल से ज्यादा की उम्र के 14.30 करोड़ युवा नौकरी की तलाश में हैं। 2011 के आंकड़ो से पता चला है कि नौकरी की तलाश करने वालों में आधी  महिलाएं भी हैं। 10वी या 12 वी तक पढ़े बेरोजगारों की तादाद 2.70 करोड़ है। तकनीकी  शिक्षा की डिग्री हासिल किए हुए 16 फीसदी  युवक बेरोजगारों की कतार में हैं।  यह आंकड़ा देश की नीतियों और व्यवस्थापकों की कार्यप्रणाली पर एक बहुत ही गंभीर सवाल खड़ा करता  है।
                  जब एक युवा उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज में दाखिला लेता है तो जीवन को लेकर अनेक सतरंगी सपने बुनने लगता है | उसी दिन से उसमें, देश का एक अच्छा नागरिक बनकर, ईमानदारी से, अपनी योग्यता के बल पर, रोजगार प्राप्त कर समाज में एक सम्मानित जीवन जीने की इच्छा बलवती होने लगती है। वह अपने बूते पर अपने परिवार की आर्थिक मदद करके देश को उन्नति के पथ पर ले जाना चाहता है, लेकिन जब वह रोजगार के लिए जहाँ भी, जिस भी क्षेत्र में  जाता है, वहाँ एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति पाता है , तब उसका ये सतरंगी सपना टूटने लगता हैं| जो थोड़ी बहुत आशा बची होती है वो व्यवस्था में विद्यमान जातिवाद, भाई भतीजावाद, सिफारिश , सामजिक असमानता, भ्रष्टाचार आदि के चलते ख़त्म हो जाती है। ऐसे सिस्टम में वह करें भी तो क्या करें? जाये भी तो कहाँ जाये ? परिणामस्वरूप वह कुंठा ग्रस्त हो जाता है | अब उसकी उर्जा जो सकारात्मक कार्यों में लगनी चाहिए थी, वह नकारात्मक कार्यों में लगनी शुरू हो जाती है| वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु सारी हदें पारकर कानून को भी अपने हाथ में लेने से नहीं घबराता। परिणामस्वरूप अखबार के पन्ने ऐसी अनेक अपराध की खबरों से पट्टे होते हैं जिनको अंजाम देने वाला यही वर्ग होता है, ये वही युवा वर्ग है जिसके पास अच्छा-खासा दिमाग, ताकत, उर्जा , जोश आदि सब कुछ है लेकिन उचित मार्गदर्शन और रोजगार के अभाव में मजबूर होकर अपनी दिशा से भटककर अपराध की अँधेरी दुनिया में शामिल हो जाता है। यहाँ हाल ही में घटी अनेक दर्दनाक, अमानवीय और समाज में खौफ पैदा करने वाली घटनाओं का उल्लेख किया जा सकता है जिनमें मात्र सोलह-सत्रह  साल के नाबालिग से लेकर पच्चीस-तीस साल की उम्र के पढ़े-लिखे युवा शामिल हैं।
 आकड़ों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि देश में पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं की भीड़ पहले के मुकाबले बढ़ी है। शहरों के युवा रोजगार की तलाश में  विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं, शहरों से बहुत दूर- दराज के गाँव- देहातो के हालात और भी ज्यादा बुरे हैं। युवा गाँव से पलायन करने लगे हैं | 22 दिसम्बर की ही खबर है कि ‘बुन्देलखण्ड के युवाओं ने परिवार की भूख मिटाने के लिए गाँव छोड़ा’ इससे हमारे देश का आर्थिक  नुकसान तो हो ही रहा है, साथ ही मानवीय दृष्टि से भी यह उचित नहीं है, क्योंकि इससे युवा अपने परिवार से दूर चला जाता है, नई जगह पर अपने आपको स्थापित करने में उसकी सारी उम्र निकल जाती है।  दूसरी तरफ अपनी औलाद की राह तकते- तकते माता पिता बूढ़े हो जाते हैं। जीवन में बुढ़ापा ऐसी अवस्था होती है जब सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत पड़ती है लेकिन रोजी-रोटी के चक्कर में दूर शहरों या विदेशों में गए युवाओं के माता- पिता बुढ़ापे में अकेले जीवनयापन करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह अलग बात है कि इस  समस्या से अनेक दूसरी सामाजिक-पारिवारिक समस्याएँ भी पैदा होती हैं। 7 अगस्त 2017  की ही खबर है कि मुंबई में जब अमेरिका से बेटा  वापस घर आया तो घर में बेटे को माँ नहीं बल्कि माँ का कंकाल मिला। हमारे आस-पास ऐसे घरों की कमी नहीं है जिनमें बूढ़े माता-पिता अकेले ही रहते  हैं। लुटेरों द्वारा अकेले रह रहे बुजुर्गों की हत्या की खबरें आये दिन अखबारों की सुर्खियों में शामिल रहती हैं पिछले न जानें कितने वर्षों से नई-नई सरकारें इन मुद्दों पर चुनाव लड़ती हैं लेकिन  सत्ता हासिल करते ही घोषणा पत्र के ये मुद्दे छू-मंतर हो जाते हैं। अर्थात कुछ फर्क नहीं पड़ता, फिर वही ढाक के तीन पात । 
मीडिया  भी इस दिशा में कुछ खास प्रयास नहीं कर पा  रहा है| उसके सभी माध्यम इन खबरों को दिखाने मात्र में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। क्या टी.वी. चैनलों को हर रोज किसी नेता द्वारा किसी दूसरी पार्टी के नेता पर किए गए कटाक्षों को सही-गलत साबित करने के लिए डीबेट के नाम पर बहस करा देना ज्यादा जरुरी है? और ये ऐसी बहस होती हैं जो कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती। क्या  मीडिया के द्वारा युवा वर्ग की समस्याओं और उसके भविष्य को लेकर नियमित रूप से किसी बहस या कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया जाना चाहिए? युवा वर्ग को अपराध की दुनिया में जाने से रोकने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? इस पर भी कभी कोई बहस नहीं कराई जाती। देश की विडम्बना देखिये कि 12वीं कक्षा में 92 प्रतिशत से ज्यादा अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी  भी अपनी पसंद की स्ट्रीम और संस्थान में दाखिला नहीं ले पाता है | बी .टेक ,एम.बीए, एम.फिल ,पीएच.डी करने के उपरांत भी रोजगार प्राप्त नहीं हो पाता| युवा वर्ग और देश के लिए यह स्थिति बहुत ही विध्वंशकारी साबित होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का सर्वे बताता है कि भारत में डिप्रेशन के मरीजों में कम आयु के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही हैं। शिक्षा और रोजगार में बढ़ती सिरकाट प्रतियोगिता इसका एक कारण  हो सकता है |
               यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आज का युवा बहुत अधिक महत्त्वाकांक्षी हो गया है। वह अपनी क्षमता को पहचाने बिना ही ऐसे सपने पाल लेता है जिनको पूरा करना उसकी क्षमता से बाहर है। वह कम समय और कम मेहनत में बहुत जल्दी और बहुत  सारा पैसा कमाना चाहता है। युवाओं को थोड़ा रूककर सोचना होगा कि वे किस ओर जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपनी सेल्फी पर आये झूठे कमेंट्स पढ़ने और लाइक्स की संख्या देखने में समय बिताने से जीवन नहीं चलने वाला| अपने देश की संस्कृति को पहचाना और समझना भी जरूरी है। अपने परिवार, समाज और देश के प्रति उनकी जो जिम्मेदारियां हैं, उनको भी जानना होगा। युवाओं को खुद कुछ बनकर  सिस्टम की खामियों को दूर करना होगा | अपनी क्षमताओं को पहचान कर उचित दिशा में ईमानदारी से मेहनत करके अपने आप को सशक्त करना होगा | अपनी सर्जनात्मक शक्ति से रोजगार के नए स्रोत पैदा करने होंगे। विवेकानंद ने युवाओं को कर्मठता का ज्ञान दिया है, जिस पर युवा वर्ग को चलना चाहिये। क्योंकि देश में ऐसे युवाओं की कमी नहीं है जिहोंने अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर ही अपनी पहचान बनाई है और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर देश का नाम रोशन किया है। साथ ही सरकार को भी इस दिशा में विशेष प्रयास करने की जरूरत है, क्योंकि युवा वर्ग के सुनहरे भविष्य के निर्माण में ही देश का असली विकास निहित है |

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