‘आंचलिकता का पर्याय: फणीश्वर नाथ रेणु’
(सन्दर्भ : ‘ठेस’ और ‘पुरानी कहानी नया पाठ’)
प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यास ‘मैला आंचल’ के रचयिता फणीश्वर नाथ रेणु हिंदी के जाने-माने साहित्यकार हैं| उन्होंने उपन्यास, कहानी, संस्मरण, रिपोर्ताज लिखने के साथ-साथ नेपाली भाषा की अनेक कहानियों का अनुवाद भी किया है| मैला आंचल के साथ-साथ परती परी कथा, ठुमरी ,पंचलाइट, ठेस, लाल पान की बेगम, रसप्रिया, तीसरी कसम आदि अनेक आंचलिक रचनाएँ उनके साहित्य की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं | बिहार के मैथिल ग्रामीण अंचल में जन्मे फणीश्वर नाथ रेणु किसानों के संघर्षमय और कठिन कृषि जीवन की सभी चुनौतियों से भली-भांति परिचित हैं| रेणु के बारे में निर्मल वर्मा लिखते हैं- “बिहार के छोटे भूखंड की हथेली पर उन्होंने समूचे उत्तर भारत के किसान की नियति रेखा को उजागर किया है|”154 सन 1954 में रेणु का प्रथम और बहुचर्चित आंचलिक उपन्यास मैला आंचल प्रकाश में आया| यह उपन्यास ग्रामीण अंचल का अद्वितीय और सुन्दरतम उदाहरण है, मैथिल जीवन की भाषा, समाज, व्रत, तीज-त्योहार, परिवेश आदि का सूक्ष्मता से अंकन हुआ है| उपन्यास की तरह ही रेणु की कहानियों में भी ग्रामांचलों के विशद और सजीव चित्र देखने को मिलते हैं| गाँव की मिटटी की भीनी-भीनी महक इनकी कहानियों को एक विशेष श्रेणी में लाकर रख देती है| शायद इसलिए अज्ञेय ने रेणु जी को “धरती का धनी” कहा है| प्रेमचंद की ही तरह रेणु भी एक ऐसे कथाकार के रूप में हमारे सामने आते हैं जिन्होंने ग्रामीण जीवन एवं संस्कृति का सजीव वर्णन किया है | “प्रेमचंद और रेणु दोनों के पात्र निम्नवर्गीय हरिजन, किसान, लोहार, बढ़ई, चर्मकार, कर्मकार आदि हैं|”154 वे साहित्य में एक नई लेखन शैली लेकर आये जिसे आंचलिक शैली का नाम दिया गया| आंचलिकता शब्द आते ही रेणु का नाम सहज ही स्मरण हो आता है| फणीश्वर नाथ रेणु ने ठुमरी, रसप्रिया, अच्छे आदमी. लाल पान की बेगम, पंचलाइट, ठेस और पुरानी कहानी और नया पाठ नामक अनेक कहानियां लिखी हैं|
रेणु की दूसरी कहानियों की तरह ‘ठेस’ और ‘पुरानी कहानी नया पाठ’ में भी ग्रामीण आंचल की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक समस्याओं, परिवेश और मूल्यों का चित्रण हुआ है| ‘ठेस’ एक चरित्र प्रधान कहानी है| कहानी के कथानक का ताना-बाना एक कुशल कारीगर के मान-सम्मान, कला के प्रति उसका समर्पण, सामाजिक सम्बन्धों का दबाव, आर्थिक स्थिति आदि को लेकर बुना गया है जबकि “पुरानी कहानी नया पाठ” रिपोर्ताज में रेणु ने बिहार की कोसी नदी में आई बाढ़ का मार्मिक दृश्य प्रस्तुत किया है| ‘ठेस’ कहानी के केंद्र में बिना मजदूरी के पेट भात पर तन्मयता से अपना काम करने वाला कारीगर ‘सिरचन’ और उच्च घराने का एक संयुक्त परिवार है| कहानी के आरम्भ में लेखक ने जिस तरह से सिरचन के चरित्र का वर्णन है उससे लगता है कि वह बेकार, बेगार, मुफ्तखोर, चटोर, कामचोर, आरामपरस्त व्यक्ति है| लगता है जैसे उसकी काम में कोई दिलचस्पी नहीं है- “खेती-बारी के समय, गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते। लोग उसको बेकार ही नहीं, 'बेगार' समझते हैं। इसलिए, खेत-खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को। क्या होगा, उसको बुला कर? दूसरे मजदूर खेत पहुँच कर एक-तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता दिखाई पड़ेगा - पगडंडी पर तौल तौल कर पाँव रखता हुआ, धीरे-धीरे। मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।“ लेकिन जैसे-जैसे कहानी की कथा का विस्तार होता है वैसे-वैसे संवेदनशील पाठक की धारणा सिरचन को लेकर बदलने लगती है, पाठक को सिरचन का भोलापन भाने लगता है, कथा के अंत तक आते-आते पाठक के मन में सिरचन को लेकर गहरी संवेदना पैदा होने लगती है| क्योंकि कला की कद्र करने वाले लोग गाँव में अब नहीं रहे और सिरचन को अपना भरण-पोषण करने के लिए वो काम करना पड़ रहा है जो उसने पहले नहीं किया| वो एक कलाकार है, खेती-बाड़ी के काम में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है|
एक समय ऐसा था, जब सिरचन की गाँव में तूती बोलती थी| चिक, रंगीन शीतलपाटी, मोढ़े आदि बनाने के लिए सिरचन जैसा सधा हुआ कारीगर गाँव में दूसरा नहीं था| आस-पास के बड़े-बड़े घरानों के लोग अपनी लारी लेकर उसको काम के लिए बुलाने आते थे- “...अरे, सिरचन भाई! अब तो तुम्हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गई है सारे इलाके में। एक दिन भी समय निकाल कर चलो।“ जितनी सफाई सिरचन के हाथ में थी वह किसी दूसरे कारीगर के हाथ में नहीं- “मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी-चुन्नी रखने के लिए मूँज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, हलवाहों के लिए ताल के सूखे पत्तों की छतरी-टोपी तथा इसी तरह के बहुत-से काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता।“ उससे अपना काम कराने के लिए लोग उसकी खुशामद करते थे| काम शुरू होने से पहले ही उसके आवभगत का इंतजाम किया जाता था, लेखक बताता है- “मेरी माँ जब कभी सिरचन को बुलाने के लिए कहती, मैं पहले ही पूछ लेता, 'भोग क्या क्या लगेगा?”
सिरचन बहुत स्वाभिमानी कलाकार है, जहाँ उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचती है वहीँ वह काम करना छोड़ देता है और निर्भयता से कह उठता है –‘किसी दुसरे से करवा लीजिये काम’ जो सिरचन के काम की कीमत और उसके उसूलों को जानते हैं, वे सिरचन की कद्र करते है, सिरचन भी ऐसे लोगों की इज्जत करता है और उनके प्रति अपने कर्तव्य-बोध को समझता है| यही कारण है कि सिरचन चाची द्वारा किये गए अपमान का घूँट पी कर भी मानू का दिल न तोड़ सका। अपने दिल को ठेस लगने पर भी उसने बिना कोई दाम लिए वह सब बना कर दिया जिसे वह ससुराल ले जाना चाहती थी। मानू को अपने हाथ से खूबसूरत शीतलपाटी व चिक बनाकर चलती ट्रेन में पहुंचाना सिरचन के कर्तव्य बोध या प्रतिबद्धता को ही दर्शाता है।
गाँव में एक वर्ग ऐसा भी है जो सिरचन जैसे कारीगर को छोटी जात का मानते हुए उसके काम को मुफ्त में कराया जाने वाला काम समझता है, दुःख इस बात का है कि ये लोग बड़ी-बड़ी हवेलियों में रहने वाले हैं| जबकि सिरचन अपना काम पूरी लगन और ईमानदारी से करता था, बदले में उसे अच्छा भोग मिल जाये बस वह यही चाहता है| परन्तु भोजन में किसी तरह की कंजूसी या कोई ओछी बात स्वाभिमानी, ईमानदार, जिद्दी स्वभाव वाले और अपने मान के प्रति सजग सिरचन को बिलकुल पसंद नहीं है| वह मेहनती है लेकिन चुप रहने वाला कारीगर नहीं है- “सिरचन मुँहजोर है, कामचोर नहीं।“ ऐसे लोगों को वह मुंहतोड़ जवाब देता है- 'बड़ी बात ही है बिटिया! बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो-दो पटेर की पटियों का काम सिर्फ खेसारी का सत्तू खिला कर कोई करवाए भला? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है बबुनी!” लेखक कहानी के माध्यम से बताना चाहता है कि एक गरीब और मेहनती कलाकार भी संवेदनशील होता है, उसके भी कुछ मानवीय मूल्य और जीवन सिद्धांत होते हैं, छोटी बात कहने पर उसके दिल, मान-सम्मान को भी ठेस पहुंचती है|
कहानी में प्रयुक्त आंचलिक भाषा कहानी के कथ्य व ग्रामीण परिवेश के सौन्दर्य और रोचकता को बनाये रखने में सहायक सिद्ध हुई है। “रेणु का पाठक कहानी पढ़ता नहीं, देखता है| एक-एक ध्वनि, एक-एक रंग को महज महसूस करता हुआ उसे जीता है…..|”155 कहानी की बुनावट में एक नये तरीके का सौंदर्य हैं। रेणु जी की ‘ठेस’ कहानी को अपने समय का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज माना जा सकता है। औद्योगिकीकरण के कारण कारीगरों की क्या हालत हो गई थी, ये इस कहानी से पता चलता है| पुरानी पारंपरिक कलाओं के मिटते वजूद और इन कलाकारों की आर्थिक स्थिति व कलाकार के एकाकी जीवन की समस्या को रेणु ने इस कहानी में रखा है|
फणीश्वरनाथ रेणु ने ‘पुरानी कहानी : नया पाठ’ रिपोर्ताज के रूप में प्रस्तुत किया है| कोसी नदी में बार-बार बाढ़ आने से आस-पास का क्षेत्र आर्थिक रूप से उभर नहीं पाता है| गांववासियों की दुर्दशा का कारण बाढ़ और स्थानीय नेता जनसेवक शर्मा है| कोसी नदी में बाढ़ आना पुरानी बात है लेकिन आजादी के बाद गाँव वाले सरकारी सहायता की उम्मीद करते हैं लेकिन आजाद भारत में भी गाँव वासियों की वही दुर्दशा होती है जो पहले होती थी- “कहानी का पुरानापन यह है कि शताब्दियों से कोसी की तट भूमि में पड़ने वाला क्षेत्र अतिवृष्टि और बाढ़ से आहत होता आया है| कहानी का नया पाठ शुरू होता है स्वतंत्रता के बाद आयी भयंकर बाढ़ से|”166 अत: कहानी पुरानी है कि इस क्षेत्र में बाढ़े आती रहती हैं और नया पाठ यह है कि आजादी के बाद राजनीति और जनसेवा के नाम पर जैसी लूट-खसोट हो रही है वैसी पहले भी नहीं होती थी| बेचारे गाँव वाले अगर प्रकृति की मार से अपने-आप को बचाते हैं तो ये नेता उनको मरने के लिए मजबूर कर देते हैं| रेणु ने इस कहानी में ऐसे निर्दयी, स्वार्थी और भ्रष्ट नेताओं की पोल खोली है जो चाहते हैं कि बाढ़ से अधिक से अधिक गाँव जलमग्न हो और वे रिलीफ फंड के वितरण में धांधली कर लाभ कमायें, उनको बाढ़ से होने वाले जन-धन के नुक्सान की कोई परवाह नहीं है|
गांववासी हर छोटी-बड़ी नदी को कोसी कहते हैं और कोसी में बाढ़ आना कोई नई बात नहीं है| शताब्दियों से इस क्षेत्र में कभी अकाल तो कभी बाढ़ आती रहती हैं, प्रत्येक वर्ष गाँव वालों को इस बाढ़ रूपी दानव से लड़ना पड़ता है अर्थात यह पुरानी कहानी है| जब बंगाल की खाड़ी में तूफान उठता है और बाढ़ का खतरा एक नहीं सैकड़ों गाँवों के वासियों के सिर पर मंडराने लगता है, तब उस खतरनाक समय को गाँव के मनुष्य ही नहीं छोटे-बड़े पशु-पक्षी भी भांप लेते हैं| गाँव का पूरा जन-जीवन भयातुर और आतंकित है, रेणु ने इसे डिप्रेशन की स्थिति कहा है- “बंगाल की खाड़ी में डिप्रेशन - तूफान - उठा! हिमालय की किसी चोटी का बर्फ पिघला और तराई के घनघोर जंगलों के ऊपर काले-काले बादल मँडराने लगे। दिशाएँ साँस रोके मौन-स्तब्ध! कारी-कोसी के कछार पर चरते हुए पशु-गाय,बैल-भैंस- नदी में पानी पीते समय कुछ सूँघ कर, आतंकित हुए। एक बूढ़ी गाय पूँछ उठा कर आर्तनाद करती हुई भागी। बूढ़े चरवाहे ने नदी के जल को गौर से देखा। चुल्लू में लिया - कनकन ठंडा! सूँघा - सचमुच, गेरुआ पानी!” गेरुआ पानी अर्थात पहाड़ का पानी - बाढ़ का पानी?”
परन्तु अब देश आजाद हो गया है| अब सरकार अपनी है| लोगों को उम्मीद है स्थानीय नेता उनकी मदद करेंगे, सरकार पर दबाव बनाकर बाँध बनवाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, स्थानीय नेता जन सेवक शर्मा गाँव वासियों के दुःख-दर्द को बिल्कुल नहीं समझता| वह भ्रष्टाचारी है और बाढ़ जैसी भयंकर आपदा का आना उसके लिए सपना सच होने जैसा है- “बाढ़ आने से इस क्षेत्र के पराजित उम्मीदवार, पुराने जनसेवक जी का सपना सच हुआ।“ यह जनसेवक जो अपने आपको जनता का सेवक मानता है, सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने के लिए बाढ़ को अपनी सीडी बनाता है- “कोसका मैया ने उन्हें फिर जनसेवा का 'औसर' दिया है। ...जै हो, जै हो! इस बार भगवान ने चाहा तो वे विरोधी को पछाड़ कर दम लेंगे।“ “सुनो। मैंने कितने बाढ़ग्रस्त गाँवों के बारे में लिखा था? पचास? उसको डेढ़ सौ कर दो। ...ज्यादा गाँव बाढ़ग्रस्त होगा तो रिलीफ भी ज्यादा-ज्यादा मिलेगा, इस इलाके को।“
बाढ़ से पहले और बाढ़ के बाद के समय को जिस तरह से लेखक ने संस्मरण-रूप में सुनाया है वह अविस्मरणीय है| पाठक की आँखों के सामने बाढ़ के बाद का दृश्य सजीव हो उठा है- “अब मृदंग-झाँझ नहीं, गीत नहीं-सिर्फ हाहाकार! किंतु नौजवान लोग जीवट के साथ जुटे हुए हैं, मचान बाँध रहे हैं, केले के पौधों को काट कर 'बेड़ा' बना रहे हैं। ...जब तक साँस, तब तक आस!
'ओसरे पर पानी आ गया!'
'बछरू बहा जा रहा है। धरो - पकड़ो-पकड़ो!'
'किसका घर गिरा?'
'मड़ैया में कमर-भर पानी!'
'ताड़ के पेड़ पर कौन चढ़ रहा है?'
'घर में पानी घुस गया है। अरे बाप!'
'छप्पर पर चढ़ जा!”
'ओसरे पर पानी आ गया!'
'बछरू बहा जा रहा है। धरो - पकड़ो-पकड़ो!'
'किसका घर गिरा?'
'मड़ैया में कमर-भर पानी!'
'ताड़ के पेड़ पर कौन चढ़ रहा है?'
'घर में पानी घुस गया है। अरे बाप!'
'छप्पर पर चढ़ जा!”
रेणु ने इन पंक्तियों में सटीक आंचलिक शब्दों का प्रयोग किया है| यही रेणु की भाषा की विशेषता है| जनसेवक सरकार की ओर से मिली मदद राशि में से भी अपनी कमाई करना चाहता है- “चीनी आक्रमण के समय भी भाषण देने और फंड वसूलने में वह पीछे रह गए। और, इस बार भी?” इतना ही नहीं वह बाँध कटवाकर लोगों की समस्या को और गंभीर बना देता है| -“'यह जो बरदाहा-बाँध बना है पिछले साल, इसके कारण इस कस्बा रामपुर पर भी इस बार खतरा है। पानी को निकास नहीं मिला तो कल सुबह तक ही-हो सकता है - पानी यहाँ के गाड़ीवान टोला तक ठेल दे!' गाड़ीवान टोले के कर्मठ कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे की ओर देखा। आँखों-ही-आँखों में गुप्त कार्रवाई करने का प्रस्ताव पास हो गया। दूसरे ही दिन सुबह को संवाददाता ने संवाद भेजा - 'आज रात बरदाहा-बाँध टूट जाने के कारण करीब डेढ़ सौ गाँव फिर डूबे...।“
विडम्बना यह है कि बाढ़ के कारण जिनके घर बह गए, जिन लोगों का नुकसान हुआ, उसकी भरपाई करने की बजाय बाढ़-पीड़ितों को हिरासत में लिया जाता है| अखबारों में घांघली की खबरें छपती हैं, बाढ़ के कारणों की पड़ताल भी की जाती है, कोई पी.डब्ल्यू. डी. के इंजीनियरों को, कोई सरकार के अकर्मण्य कर्मचारियों को, कोई पड़ोसी राज्य के अधिकारियों को बाढ़ का असली कारण मानते हैं| एक अखबार बाढ़ को 'मैनमेड' बताते हैं- 'पड़ोसी राज्य नहीं, पड़ोसी राष्ट्र के कर्णधारों ने ही हमें डुबाया है।' बरदाहा-बाँध टूटने की जिम्मेदारी चूहों पर पड़ी। चूहों ने बाँध में असंख्य 'माँद' खोल कर जर्जर कर दिया था - एक ही साल में। “स्वार्थी नेताओं को गाँव वासियों के दुःख-दर्द को समझना चाहिए था लेकिन नहीं समझा| जनसेवा के नाम पर देश को लूटने वाले ये नेता बस सत्ता हथियाने और अपनी तिजोरी भरना जानते है| देश से इनको कोई लेना-देना नहीं हैं| यही है आज के नेताओं का पाक-साफ़ चरित्र| स्वतंत्रता के बाद आयी इस भंयकर बाढ़ ने समसायिक राजनीति की स्वार्थन्धता और बाढ़ के कारण जनता की दुर्दशा की पोल खोल दी है|- “सुभ-लाभ' का ऐसा अवसर बार-बार नहीं आता। चीनी आक्रमण के समय वे हाथ मल कर रह गए।...यह अकाल का हल्ला चल ही रहा था कि भगवान ने बाढ़ भेज दिया। दरवाजे के पास तक आई हुई गंगा में कौन नहीं हाथ धोएगा भला! उनके गोदाम खाली हो गए, रातों-रात बही-खाते दुरुस्त!” यही से कहानी का नया पाठ शुरू होता है| रेणु ने इस रिपोर्ताज को ‘पुरानी कहानी : नया पाठ’ जो नाम दिया है वह उचित और सार्थक है| इस प्रकार कहा जा सकता है रेणु की कहानियों में ग्रामीण अंचल का जीवन साकार हो उठा है| उनके साहित्य को आंचलिकता का पर्याय कहना अतिश्योक्ति नहीं है|
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:
1 ठेस, फणीश्वर नाथ रेणु
2 पुरानी कहानी: नया पाठ, फणीश्वरनाथ रेणु
3 फणीश्वरनाथ रेणु की श्रेष्ठ कहानियाँ, भारत यायावर
4. रेणु रचना संचयन : , सं. भारत यायावर
5 रेणु की कहानियों में चरित्र-चित्रण , https://www.google.com/search
5 हिंदी के आंचलिक उपन्यास , डॉ. विमल शंकर नागर
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