‘रीतिकालीन कवि मतिराम का काव्य सौष्ठव’
मतिराम रीतिकाल की रीति बद्ध काव्य धारा के अंतर्गत आते हैं इस काव्य धारा के यह प्रमुख कवियों में से एक हैं मतिराम के जन्म के विषय में ठीक-ठीक पता नहीं चलता क्योंकि मतिराम ने किसी भी ग्रंथ में अपना परिचय नहीं दिया है| मतिराम ग्रंथावली में इस तथ्य का विवेचन किया गया है कि मतिराम, भूषण और चिंतामणि एक ही गांव के निवासी थे| इसीलिए यह आपस में भाई भी हो सकते हैं| भूषण ने शिवराज भूषण में इनके बारे में जो लिखा है उसी के आधार पर यह सिद्ध होता है कि इनका जन्म 1603 में कानपुर जिले के टिकमापुर में हुआ था और यह बहुत दिनों तक जीवित रहे थे| बताया जाता है कि यह बुंदी के महाराज भावसिंह के यहां बहुत समय तक रहे और उनके आश्रय में ही अपना ‘ललितललाम’ नामक अलंकार ग्रंथ लिखा| मतिराम ने रस और अलंकार दोनों पर रीतिग्रंथ लिखे इनका छंदसार पिंगल ग्रन्थ शंभूनाथ सोलंकी को समर्पित है| मतिराम ने निम्नलिखित ग्रंथ लिखे- ललित ललाम, लक्षण ग्रंथ, रसराज, फूलमंजरी, सतसई, साहित्य सार, छंदपिंगल आदि । इन सभी में ललित ललाम और रसराज सबसे अधिक प्रसिद्ध ग्रंथ हैं | ललित ललाम अलंकार ग्रंथ है और रसराज श्रृंगार तथा…नायिका भेद का ग्रंथ है रसराज जैसा की नाम से ही प्रतीत होता है रस को लेकर लिखा गया ग्रंथ है| इसमें इन्होंने श्रंगार रस को रसों का राजा माना है तथा नायिका के भेदों का उल्लेख भी अत्यंत मनोहर शैली में किया है| ललित ललाम’ और अलंकार पंचाशिका अलंकार विषय पर लिखी गई रचना है| ‘ललित ललाम’ में ललाम का अर्थ है- सुंदर और ‘ललित’ शब्द का अर्थ है सुकुमार योगी। इस प्रकार ललित ललाम का अर्थ है ऐसा अलंकार ग्रंथ जो सुकुमार बुद्धि पाठकों के लिए उपयोगी हो| इस ग्रंथ में सौ अलंकारों व उसके भेदों का वर्णन किया गया है| इसमें केवल अर्थालंकारों का वर्णन है सभी अलंकारों के लक्षण दोहों में दिए गए हैं
बिहारी सतसई के ढंग पर इन्होंने मतिराम सतसई की भी रचना की है| लेकिन इसके दोहे सरसता में बिहारी के दोहों के समान नहीं है, मतिराम की फूलमंजरी को लेकर डॉक्टर महेंद्र कुमार जी का मत है “इनकी रचनाओं में सबसे अधिक अप्रौढ़ फूलमंजरी है, जिसके भाव स्पष्टत: हमारे कवि की किशोरावस्था की ओर संकेत करते हैं। इस कृशकाय पुस्तिका की रचना सम्राट जहाँगीर की आज्ञा से हुई। ऐसा इसके अंतिम दोहे में लिखा है। इधर जहांगीर की अपनी पुस्तक तुजक-ए-जहांगीरी फारसी में मिलती है। इसके अंतर्गत यद्यपि मतिराम के विषय में कोई चर्चा नहीं पर गुल-ए-आफशां नामक शाही उद्यान की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि उसने इसकी यात्रा संवत 1606 वि. में की थी। जिन पुष्पों की प्रशंसा मुगल सम्राट ने की है फूल मंजरी में भी वे दृष्टिगोचर होते हैं। अतः संभव है कि मतिराम को उक्त यात्रा के अवसर पर आदर्श मिला हो। उस समय इस किशोर की अवस्था 15 16 वर्ष की रही हो, तो उसका जन्म संवत 1661 वि. के लगभग पड़ेगा। रसराज की प्रौढता से भी यही विदित होता है कि इसकी रचना के समय हमारा कवि प्रौढावस्था में पदार्पण कर चुका होगा।
मतिराम की कविता के मुख्यतः दो ही विषय हैं- श्रंगार और राज प्रशस्ति। श्रृंगार के अंतर्गत मतिराम ने नायक और नायिका के रूप और चेष्टाओं का चित्रण किया है तथा राज प्रशस्ति के अंतर्गत अपने आश्रय दाताओं की वीरता और राजवैभव का चित्रण किया है। इस चित्रण में मतिराम का उद्देश्य इस चित्र में चित्रण में वस्तु वर्णन की अपेक्षा भावों को स्पष्ट करने का अधिक रहा है। वस्तु वर्णन तो प्रायः भाव व्यंजना को तीव्र करने के लिए ही किया गया है। मतिराम के काव्य की एक विशेषता जो उन्हें अन्य रीतिकालीन कवियों से अलग करती है, वह है- उनकी सरलता और अत्यंत स्वाभाविक था उसमें ना तो भावों की कृत्रिम आता है और ना ही भाषा की रीतिकालीन कवियों में इस प्रकार की सरलता और अत्यंत स्वाभाविकता। उनमें न तो भावों की कृत्रिमता है। और ना ही भाषा की। रीतिकालीन कवियों में इस प्रकार की सरलता और स्वभाविकता कम ही देखने को मिलती है। भावों के वर्णन में कहीं भी कृत्रिमता दिखाई नहीं देती और न ही इन्होंने दूसरे रीतिकालीन कवियों की भांति नायिका के विरह -ताप को लेकर अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन किया। बल्कि मतिराम ने नायिका की मानसिक अवस्था का बड़े ही सहज रूप में उल्लेख किया है। जैसे-
सकल सिंगार साज संग लै सहेलिन कों,
सुंदरी मिलन चली आनंद के कंद को।
कवि मतिराम मग करती मनोरथि,
पेख्यो परजंक पै न नंद नंद कों।
नेह ले लगी है देह दाहन दहत गेह,
बाग को बिलोकि द्रुम बेलिन के वृंद कों।
चंद को हँसत तब आयो मुख चंद अब,
चंद लाग्यो हँसन तिया के मुखचंद को
सकल सिंगार साज संग लै सहेलिन कों,
सुंदरी मिलन चली आनंद के कंद को।
कवि मतिराम मग करती मनोरथि,
पेख्यो परजंक पै न नंद नंद कों।
नेह ले लगी है देह दाहन दहत गेह,
बाग को बिलोकि द्रुम बेलिन के वृंद कों।
चंद को हँसत तब आयो मुख चंद अब,
चंद लाग्यो हँसन तिया के मुखचंद को
यहां संपूर्ण साज श्रृंगार कर मिलन की प्रबल इच्छा से अपनी सखियों के साथ यमुना निकुंज में आई नायिका की मानसिक अवस्था का कवि ने सहज रूप में उल्लेख किया है। इसलिए मतिराम को मानुषी प्रकृति के चितेरे कहा जा सकता है। साथ ही अंतिम पंक्तियों में प्रकृति का सहयोग प्राप्त कर उसकी वेदना और अधिक बलवती हो उठी है। विशेष बात यह है कि यह सब कवि ने बड़ी ही सरल भाषा में कहा है। इनके काव्य ग्रंथों में सरलता ही वह गुण है जो उन्हें कृत्रिमता से भिन्न कर देता है। मतिराम के काव्य में मनोवैज्ञानिक स्थितियों का निरूपण अधिक हुआ है। प्रिय से बिछुड़ने मात्र का भय नायिका को परेशान कर देता है। प्रेमी के विदेश चले जाने की चर्चा भर से ही नायिका की जो दशा होती है या उसकी विरह की अवस्था या नायिका की वियोगावस्था की कथा का वर्णन मतिराम ने बड़े ही मार्मिक ढंग से किया है।
मतिराम ने श्रृंगार वर्णन के अंतर्गत नायिका की अनेक छोटी-छोटी क्रियाओं का वर्णन किया है। जैसे नायिका का नेत्र बंद करके ध्यान मग्न होना, तनिक से आहट पाकर चौक कर आंखें खोलना, अंगड़ाई लेना आदि क्रियाएं अपनी स्वाभाविकता के कारण अत्यंत रमणीय है। मतिराम के काव्य में श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का वर्णन मिलता है। संयोग श्रृंगार के अंतर्गत मुख, कपोल, नेत्र, अधर केश, हाथ आदि शरीर के अवयवों के सौंदर्य का वर्णन किया है। श्रंगार के अंतर्गत संयोग श्रृंगार के विभाव, अनुभाव और मिलन यह तीन अंग ही ऐसे हैं, जिनका प्रत्यक्ष वर्णन हुआ करता है ।इनमें भी विभाव के अंतर्गत आलंबन के रूप और उद्दीपन- सामग्री तथा मिलन में परिहास वर्णन का विशेष महत्व है। इस प्रकार संयोग श्रृंगार के पाँच वर्ण्य विषय कहे जा सकते हैं- रूप, उद्दीपन, अनुभाव, मिलन और परिहास। मतिराम ने इन सब का वर्णन वस्तुपरक और भावपरक दोनों की प्रकार से किया है। नायिका के मुख, रूप, कपोल, नेत्र केश आदि शरीरावयवों के सौंदर्य का वर्णन मतिराम ने किया है। परिहास वर्णन संयोग श्रृंगार का महत्वपूर्ण अंग होने पर भी मतिराम की रचनाओं में उतना स्थान नहीं प्राप्त कर सका, जो रुपाधिक के वर्णन को प्राप्त हुआ है। लेकिन फिर भी कुछ छंदों की रचना अवश्य हुई है और इन छन्दों की मुख्य विशेषता यह है कि इनसे नायक- नायिका के आपस के हंसी मजाक का केवल बाहरी रूप ही प्रकट नहीं होता बल्कि इनके मूल में विद्यमान वह मधुर और गंभीर विनोद भी व्यक्त हो जाता है जिसका उद्देश्य पारस्परिक प्रेम को अक्षुण्ण बनाए रखना होता है। जैसे-
मतिराम ने श्रृंगार वर्णन के अंतर्गत नायिका की अनेक छोटी-छोटी क्रियाओं का वर्णन किया है। जैसे नायिका का नेत्र बंद करके ध्यान मग्न होना, तनिक से आहट पाकर चौक कर आंखें खोलना, अंगड़ाई लेना आदि क्रियाएं अपनी स्वाभाविकता के कारण अत्यंत रमणीय है। मतिराम के काव्य में श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का वर्णन मिलता है। संयोग श्रृंगार के अंतर्गत मुख, कपोल, नेत्र, अधर केश, हाथ आदि शरीर के अवयवों के सौंदर्य का वर्णन किया है। श्रंगार के अंतर्गत संयोग श्रृंगार के विभाव, अनुभाव और मिलन यह तीन अंग ही ऐसे हैं, जिनका प्रत्यक्ष वर्णन हुआ करता है ।इनमें भी विभाव के अंतर्गत आलंबन के रूप और उद्दीपन- सामग्री तथा मिलन में परिहास वर्णन का विशेष महत्व है। इस प्रकार संयोग श्रृंगार के पाँच वर्ण्य विषय कहे जा सकते हैं- रूप, उद्दीपन, अनुभाव, मिलन और परिहास। मतिराम ने इन सब का वर्णन वस्तुपरक और भावपरक दोनों की प्रकार से किया है। नायिका के मुख, रूप, कपोल, नेत्र केश आदि शरीरावयवों के सौंदर्य का वर्णन मतिराम ने किया है। परिहास वर्णन संयोग श्रृंगार का महत्वपूर्ण अंग होने पर भी मतिराम की रचनाओं में उतना स्थान नहीं प्राप्त कर सका, जो रुपाधिक के वर्णन को प्राप्त हुआ है। लेकिन फिर भी कुछ छंदों की रचना अवश्य हुई है और इन छन्दों की मुख्य विशेषता यह है कि इनसे नायक- नायिका के आपस के हंसी मजाक का केवल बाहरी रूप ही प्रकट नहीं होता बल्कि इनके मूल में विद्यमान वह मधुर और गंभीर विनोद भी व्यक्त हो जाता है जिसका उद्देश्य पारस्परिक प्रेम को अक्षुण्ण बनाए रखना होता है। जैसे-
देखत और तिय हि छबीले की मान छबीली के नैनन छायौ।
प्रीतम यों चतुराई करि मतिराम कछु परिहास बढ़ायौ
रीति रची विपरीति जु प्रीति सौं ताको कवित्त बनाए सुनायौ।
भूलि गई रिस लाजन तै मुस्काय पिया मुख नीचे कौं नायौ।
प्रीतम यों चतुराई करि मतिराम कछु परिहास बढ़ायौ
रीति रची विपरीति जु प्रीति सौं ताको कवित्त बनाए सुनायौ।
भूलि गई रिस लाजन तै मुस्काय पिया मुख नीचे कौं नायौ।
-रसराज
मतिराम के काव्य में रंग वैभव देखते ही बनता है । उन्होंने वस्तु- चित्रण में रेखाओं के साथ-साथ रंगों का भी सहारा लिया है। लेकिन किसी रंग विशेष के प्रति उनका मोह नहीं , बल्कि उन्होंने सभी प्रकार के रंगों का प्रयोग किया है। मतिराम इस प्रकार का वर्णन करने में बहुत ही कुशल है। अमावस्या की काली रात, उस पर घुमड़ते काले मेघों ने उसकी कालिमा को और अधिक बढ़ा दिया है मतिराम नायिका के रूप सौंदर्य को दर्शाने के लिए अन्य वस्तुओं के रंग को हल्का कर देते हैं परंतु जहां पर कभी सजावट लाने का प्रयत्न करता है वहां उसके चित्र एक साथ भडक़ीले हो उठते हैं।
मतिराम की भाषा-
कवि अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति काव्य में भाषा के माध्यम से ही करता है। रीतिकाल ने काव्य भाषा ब्रजभाषा थी। पूरे रीतिकाल में ब्रजभाषा का ही बोलबाला था। मतिराम ने भी अपने ग्रंथों की रचना ब्रजभाषा में ही की है।
मतिराम की भाषा शैली का अध्ययन करते समय सबसे पहले उसके शब्द समूह पर विचार कर सकते हैं। मतिराम का शब्द भंडार काफी समृद्ध है। क्योंकि ब्रजभाषा एक ऐसी भाषा थी जिसको आधुनिक भारतीय भाषाओं के साथ-साथ संस्कृत का विशाल शब्द समूह में मिला हुआ था। जिसको मतिराम ने तत्सम और तद्भव दोनों रूपों में ग्रहण किया। इसके अतिरिक्त अरबी- फारसी आदि विदेशी भाषाओं के जनसाधारण में प्रचलित शब्द भी इन्होंने ग्रहण किए हैं। इस प्रकार ब्रजभाषा की शब्दावली अनेक भाषाओं और बोलियों के शब्दों के योग से शब्द भाषा बन गई थी। हालांकि ब्रज भाषा स्वयं में भी संपन्न भाषा थी। लेकिन इस भाषा ने दूसरी भाषा के शब्दों को भी बिना किसी संकोच के अपनाया। मतिराम ने अपनी अभिव्यक्ति को अधिक मार्मिक और सरस बनाने हेतु ब्रजभाषा के अपने शब्दों का प्रयोग किया है। लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने उन शब्दों का भी प्रयोग किया जो तत्कालीन साहित्यिक ब्रजभाषा ने दूसरी भाषाओं से किए थे। मतिराम का जन्म बुंदेलखंड के प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था।
इन्होंने संस्कृत के रीति ग्रंथों का भी गंभीर अध्ययन किया था, अतएव संस्कार और अर्जन के फलस्वरूप इनकी भाषा में संस्कृत, अरबी फारसी जैसी समृद्ध भाषाओं के शब्द भी आ गए थे। वैसे संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग उनकी रचनाओं में अधिक हुआ है। जैसे-
"कोकिल कपोतन की सरसाती है।"
इसके साथ साथ अपभ्रंश और प्राकृत भाषा के साथ भी इनका निकट का संबंध है यही कारण है कि इन भाषाओं के अनेक शब्द अपने विकसित और मूल दोनों रूपों में ब्रजभाषा में इतने घुल मिल गए हैं कि लगता ही नहीं है कि यह शब्द इस भाषा के नहीं है मतिराम ने भी अपनी रचनाओं में ब्रजभाषा के अंतर्गत इस प्रकार के जैसे- गोवै, सामुहैँ, लौन, हियरा आदि अनेक शब्दों का प्रयोग किया है, चाहे वह तत्सम या तद्भव शब्द हो चाहे अरबी या फारसी के, चाहे प्राकृत या अपभ्रंश के, मतिराम ने अनेक शब्दों को ब्रजभाषा में ढालकर प्रयोग किया है। इसमें संदेह नहीं है कि उन्होंने अनेक शब्दों को गढ़ा था और उनका अपनी रचनाओं में संयत के साथ प्रयोग किया था शब्दों के समान ही व्याकरण की दृष्टि से भी मतिराम की भाषा स्वच्छ है। इसके वाक्य विन्यास में सामान्यतः इस प्रकार का कोई व्यतिक्रम दृष्टिगोचर नहीं होता जिससे अर्थ तक पहुंचने में किसी प्रकार की बाधा पड़ती हो। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि मतिराम की भाषा सर्वथा दोषों से मुक्त हो। उसने व्याकरण संबंधी दोष मिल ही जाते हैं, परंतु इन दोनों पर ध्यान देने से पूर्व यह नहीं भूलना चाहिए कि वह काव्य की भाषा है गद्य के नियमों पर इसे कसना उचित नहीं बल्कि इन्होंने सरल और स्वाभाविक भाषा का प्रयोग किया है।
"कोकिल कपोतन की सरसाती है।"
इसके साथ साथ अपभ्रंश और प्राकृत भाषा के साथ भी इनका निकट का संबंध है यही कारण है कि इन भाषाओं के अनेक शब्द अपने विकसित और मूल दोनों रूपों में ब्रजभाषा में इतने घुल मिल गए हैं कि लगता ही नहीं है कि यह शब्द इस भाषा के नहीं है मतिराम ने भी अपनी रचनाओं में ब्रजभाषा के अंतर्गत इस प्रकार के जैसे- गोवै, सामुहैँ, लौन, हियरा आदि अनेक शब्दों का प्रयोग किया है, चाहे वह तत्सम या तद्भव शब्द हो चाहे अरबी या फारसी के, चाहे प्राकृत या अपभ्रंश के, मतिराम ने अनेक शब्दों को ब्रजभाषा में ढालकर प्रयोग किया है। इसमें संदेह नहीं है कि उन्होंने अनेक शब्दों को गढ़ा था और उनका अपनी रचनाओं में संयत के साथ प्रयोग किया था शब्दों के समान ही व्याकरण की दृष्टि से भी मतिराम की भाषा स्वच्छ है। इसके वाक्य विन्यास में सामान्यतः इस प्रकार का कोई व्यतिक्रम दृष्टिगोचर नहीं होता जिससे अर्थ तक पहुंचने में किसी प्रकार की बाधा पड़ती हो। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि मतिराम की भाषा सर्वथा दोषों से मुक्त हो। उसने व्याकरण संबंधी दोष मिल ही जाते हैं, परंतु इन दोनों पर ध्यान देने से पूर्व यह नहीं भूलना चाहिए कि वह काव्य की भाषा है गद्य के नियमों पर इसे कसना उचित नहीं बल्कि इन्होंने सरल और स्वाभाविक भाषा का प्रयोग किया है।
संदर्भ ग्रंथसूची-
हिंदी साहित्य का समग्र इतिहास रामकिशोर शर्मा पृष्ठ संख्या 190 हिंदी साहित्य का इतिहास लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय पृष्ठ संख्या 204 205 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास डॉ बच्चन सिंह पृष्ठ संख्या 179 180 हिंदी साहित्य का इतिहास डॉ नगेंद्र पृष्ठ संख्या 280-281
हिंदी साहित्य का समग्र इतिहास रामकिशोर शर्मा पृष्ठ संख्या 190 हिंदी साहित्य का इतिहास लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय पृष्ठ संख्या 204 205 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास डॉ बच्चन सिंह पृष्ठ संख्या 179 180 हिंदी साहित्य का इतिहास डॉ नगेंद्र पृष्ठ संख्या 280-281
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