- पुरस्कार कहानी
प्रसाद जी ने अधिकांशतः ऐतिहासिक वातावरण प्रधान कहानियों की रचना की है। प्रसाद की प्रथम कहानी ग्राम 1911 में इंदु पत्रिका में प्रकाशित हुई थी । उन्होंने लगभग 70 कहानियों की रचना की। पुरस्कार नामक कहानी की गणना उनकी अमर कहानियों में की गई है। जिसमें उन्होंने प्रेम के आदर्श और कर्तव्य भावना का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत कहानी में एक और प्रणय और अनुराग है तो दूसरी ओर कुल गौरव तथा राष्ट्र हित रक्षा। दूसरे शब्दों में भावना और कर्तव्य के गहने द्वंद की कहानी है।
तात्विक दृष्टि से यदि प्रस्तुत कहानी की समीक्षा करें तो कहा जा सकता है कि इसमें कहानी कला का उच्चतम रूप दिखाई देता है। यह कहानी कौशल प्रदेश की उर्वरा भूमि से संबंधित है। राष्ट्रीय नियम के अनुसार कौशल नरेश ने इस बार मधुलिका के खेत को वार्षिक कृषि उत्सव के लिए चुना और उसमें परंपरा अनुसार हल चलाकर बीज बोए। मधुलिका ने भूमि के मूल्य स्वरूप स्वर्ण मुद्राएं ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया। मगध के राजकुमार अरुण ने इस उत्सव को देखा और मधुलिका के सौंदर्य ने उसे अभिभूत कर दिया उसने मधुलिका से प्रेम निवेदन किया किंतु मधुलिका ने उसे निराश लौटा दिया 3 वर्षों तक मधुलिका दूसरों के खेतों में परिश्रम करती रही और दरिद्र जीवन व्यतीत करती रही अरुण के प्रति उसके हृदय में भी राग आत्मक भाव उत्पन्न हो गया था एक दिन शीतकाल की रात्रि में राजकुमार अरुण पुन: उसकी पर्ण कुटीर में आश्रय मांगने आता है। इस बार वह मगध से विद्रोही होने पर निष्कासित होकर आया था। अरुण की महत्वाकांक्षा जागृत हो गई और मधुलिका को अपनी ओर आकर्षित जान कर उसने योजना भी बना डाली।
मधुलिका ने अपने खेत के बदले कौशल नरेश से दुर्ग के पास जंगली भूमि प्राप्त कर ली जिससे अरुण के लिए दुर्ग पर आक्रमण करके उसे जीत लेना सरल हो गया किंतु मधुलिका के अंत:मन में प्रेम तथा कर्तव्य में संघर्ष होने लगा कर्तव्य की भावना की विजय हुई और उसने आक्रमण से पूर्व ही सेनापति तथा कौशल नरेश को समस्त सूचना दे दी जिससे अरुण की योजना असफल रही अरुण को प्राण दंड देने की घोषणा हुई मधुलिका से जब पुरस्कार मांगने को कहा गया तब उसने कहा मुझे भी अरुण के साथ मृत्यु दंड मिले
कथानक-
पुरस्कार कहानी का कथानक संक्षिप्त है। कहानी की सारी घटनाएं तीन या चार वर्ष के अंतराल में सिमटी हुई है प्रत्येक घटना कुतूहल लिए हुई है। कहानी का आरंभ ही पाठक के हृदय में जिज्ञासा उत्पन्न कर देता है कि अब क्या होगा? मधुलिका अपने जीवन में एकाकी है। नियमानुसार उसके खेत पर भी राजा का अधिकार हो जाता है। वह अरुण जैसे समृद्ध और सुंदर युवक की प्रेम याचना को भी ठुकरा देती है । ऐसी स्थिति में पाठक कुतूहल मग्न होकर आगे आने वाली घटनाओं का अनुमान लगाता हुआ आगे बढ़ता है। मधुलिका और अरुण की पुन: भेट कहानी का मध्य भाग है फिर धीरे-धीरे कहानी चरम सीमा की ओर बढ़ती है। कहानी की चरम सीमा वह है जब मधुलिका राजा से पुरस्कार के रूप में अरुण के साथ स्वयं को भी मृत्युदंड दिए जाने की इच्छा प्रकट करती है। इस प्रकार रोचकता आदि से अंत तक बनी हुई है।
प्रसाद की कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि उनमें घटनाएं काल्पनिक होते हुए भी ऐतिहासिक सी लगती है। पुरस्कार कहानी को भी उन्होंने मगध, कौशल आदि राज्यों के नाम और पुराने समय की परंपराओं का उल्लेख करके कहानी को ऐतिहासिक रंगत प्रदान की है। इससे कथावस्तु विश्वसनीय और स्वाभाविक बन गई है सभी घटनाएं परस्पर श्रंखला की भांति जुड़ी हुई है इसी कारण सुगठिता का गुण भी विद्यमान है।
पात्र एवं चरित्र चित्रण-
किसी भी कहानी की सफलता इसी में है कि पात्र अल्प हों तथा उनका चित्रण सजीव हो। प्रसाद जी ने चरित्र का निर्माण अनुभूति, कल्पना और आदर्श के समन्वय से किया है। प्रस्तुत कहानी के प्रमुख दो पात्र हैं- मधुलिका और अरुण। राजा, मंत्री, सेनापति, सैनिक और नगरवासी आदि अनेक गौण पात्र हैं। इन पात्रों की योजना मधुलिका के चरित्र को अधिक विकसित करने के लिए की गई है। मधुलिका का चरित्र इस कहानी का मूल केंद्र है उसका सौंदर्य अपार है, अप्रतिम है। निर्भीकता, स्पष्टवादिता, भावुकता उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएं हैं। मधुलिका के मन में जो प्रेम और कर्तव्य का अंतर्द्वंद दिखाया है उससे उसका व्यक्तित्व और भी महान और गरिमा युक्त हो उठा है।उसका अंतिम निर्णय उसे पाठक की सहानुभूति और श्रद्धा का पात्र बना देती है। राजकुमार अरुण का व्यक्तित्व भी प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त हुआ है। लेखक ने उसे एक वीर, प्रेमी तथा कूटनीतिज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया है।प्रसाद जी ने विभिन्न घटनाओं और पात्रों के संवादों के अतिरिक्त प्राकृतिक वातावरण द्वारा भी चरित्रों की अभिव्यक्ति की है। मधुलिका के एकाकी जीवन और मानसिक द्वंद्व को स्पष्ट करने के लिए लेखक ने वर्षा की तूफानी रात का वर्णन अत्यंत मर्मस्पर्शी ढंग से किया है।
कथोकथन-
संवादों के द्वारा ही कहानी की घटना क्रमश: आगे बढ़ती है। कहानी के संवाद सरल और संक्षिप्त होने चाहिए। प्रसाद जी ने विभिन्न स्थलों पर पात्रों के द्वारा अति संक्षिप्त कथोपकथनों की योजना की है यथा -
"भद्रे! तुम्हीं न कल के उत्सव की संचालिका रही हो?
उत्सव! हां उत्सव ही तो था।"
ये छोटे-छोटे संवाद मधुलिका और अरुण के चरित्र को स्पष्ट करने में सहायक हैं यहाँ आगामी घटनाओं की ओर भी संकेत कर दिया है। मधुलिका और मंत्री का कथोपकथन भी स्वाभाविक और प्रभावशाली है। जैसे-
"मधुलिका ने सविनय कहा- "देव! यह मेरे पितृ पितामह की भूमि है। इसे बेचना अपराध है, इसलिए मूल्य स्वीकार करना मेरी सामर्थ्य के बाहर है।" मंत्री तीखे स्वर में कहता है- "अबोध! क्या बक रही है? राजकीय अनुग्रह का तिरस्कार!"
इस प्रकार कहानी में आए सभी कथोपकथन प्रभावशाली और साभिप्राय हैं। प्रसाद जी ने विभिन्न स्थलों पर पात्रों के मुख से अति संक्षिप्त किंतु मर्मपूर्ण कथन कहला कर कहानी को नाटकीयता प्रदान की है।
देश काल और वातावरण
पुरस्कार जयशंकर प्रसाद की एक ऐतिहासिक वातावरण प्रधान कहानी है। संकेतों द्वारा ही वातावरण के चित्रण में प्रसाद की कुशलता अभूतपूर्व है। वर्षा ऋतु के प्रारंभ शीतकाल की रजनी, प्रभात की सुषमा आदि का वर्णन चित्र की भांति साकार हो उठा है। जैसे- "प्रभात की हेम किरणों में अनुरंजित नन्ही- नन्ही बूंदों का एक झोंका स्वर्ण मलिका के समान बरस पड़ा।
या
शीतकाल की निस्तब्ध रजनी, कुहरे से धुली हुई चांदनी, हांड कँपा देने वाला समीर .....।
इस प्रकार प्रसाद प्राकृतिक वातावरण के चित्रण में अत्यंत सफल रहे हैं।
प्रस्तुत कहानी में प्राचीन ढंग के राजतंत्र की कूटनीतियों और अन्य गतिविधियां यथार्थ रूप में अंकित हुई हैं। नगर-तोरण , चामरधारी सेवक, पुरोहित वर्ग का स्वस्त्ययन, इंद्रपुजन, रत्नकिरिट आदि अनायास ही भारत के अतीत की झलक हमारे सम्मुख प्रस्तुत कर देते हैं।
इसके अतिरिक्त कहानी को ऐतिहासिक पुट देने हेतु पात्रों के नाम तत्कालीन है जैसे मधुलिका अरुण अग्नि से प्रिय मित्र आदि
भाषा शैली-
प्रसाद जी केवल कहानीकार ही नहीं अपितु कवि, नाटककार और दार्शनिक भी थे। उनकी अधिकतर रचनाओं की पृष्ठभूमि भी ऐतिहासिक है इसलिए उनमें संस्कृत तत्सम शब्दावली का प्रयोग भी बहुत मात्रा में मिलता है। प्रस्तुत कहानी में प्राचीन काल के वातावरण को सजीव बनाने के लिए लेखक ने अनायास ही संस्कृत निष्ठ शब्दावली का प्रयोग किया। अनुरंजित, निस्तब्ध, रजनी, ग्राम, पल्लव, निस्पंदन, चामरधारी आदि शब्द प्रसाद जी की संस्कृत म ।।।। के परिचायक हैं। परंतु भाषा की यह जटिलता पाठक को कहीं नहीं खटकती। क्योंकि ऐतिहासिक वातावरण को सजीवता प्रदान करने के लिए ऐसी ही भाषा की आवश्यकता थी। इनकी भाषा में कवित्व का पुट भी विद्यमान है। इसके कारण भी कहीं कहीं जटिलता आ गई है। कहानी का प्रारंभ भी कवित्व पूर्ण शैली से होता है। जैसे - आद्र नक्षत्र आकाश में काले काले बादलों की घुमड़, जिसमें द
दुदुम्भी का गंभीर घोष, विभिन्न अलंकारों के प्रयोग से भी शैली चमत्कारपूर्ण और प्रभावशाली बन पाई है
यथा चील गाड़ी शिशु जैसे ब्राह्मण की संख्या में को पकड़ने के लिए हाथ लगाता है वैसे ही मन ही मन कह रही थी अभी वह निकल गया।
प्रसाद जी के पास समर्थ शब्दों का विपुल भंडार है और थोड़े ही शब्दों द्वारा बहुत सा भाव प्रकट करने की उनमें
अपूर्व शक्ति है
उद्देश्य
पुरस्कार कहानी ऐसे समय मे लिखी गई जब देश में राष्ट्रीय पुनर्जागरण की लहर तीव्र वेग से बह रही थी। ऐसे अवसर पर देश के अतीत का गौरव गान करना और राष्ट्रप्रेम की भावना जगाना प्रत्येक साहित्यकार अपना कर्तव्य समझता था। इस कहानी की रचना के मूल में भी प्रसाद जी का यही अभीष्ट था। प्राचीन भारतीय नरेशों का कृषि प्रेम, सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति उनकी आस्था, इस कहानी में स्पष्ट की गई है। कन्या का स्वाभिमान और जमीन न बेचने का आदर्श भारत जैसे कृषि प्रधान देश के निवासियों के लिए प्रेरणा देने वाला है। इस कहानी का प्रधान उद्देश्य प्रेम और कर्तव्य के द्वंद्व को स्पष्ट करना है प्रसाद जी ने मधुलिका के चरित्र के माध्यम से नारी के कोमल , प्रेममय और बलिदानी व्यक्तित्व का चित्र प्रस्तुत किया है। इसी चरित्र के द्वारा राष्ट्र रक्षा के आदर्श की अभिव्यक्ति भी प्रभावशाली ढंग से हुई है। मधुलिका अपने जीवन के सर्वस्व, अरुण का त्याग कर सकती है, किंतु उसके द्वारा अपने राष्ट्र को परतंत्र बनाया जाना सहन नहीं कर सकती। उसके लिए देश प्रेम सर्वोपरि है, उसके बाद निजी प्रेम का स्थान है, यही इस कहानी का मूल उद्देश्य है।
नामकरण
पुरस्कार कहानी का नामकरण भी सार्थक है। कहानी की नायिका मधुलिका को अंततः क्या पुरस्कार मिलता है इसी हेतु कहानी की रचना की गई है। सभी घटनाएं इसी से संबंधित हैं। अतः कहानी का नाम भी सार्थक है। वास्तव में पुरस्कार कहानी में प्रसाद जी की कहानी कला का उत्तम रूप दिखाई देता है। प्रसाद जी की कहानियों की सारी भक्ति और सुंदरता इसमें लक्षित है, भाषा का सौंदर्य, अलंकृत रूप, दृश्य विधान, सुकोमल, संस्कृत परियोजना की छटा भी इस कहानी में दर्शनीय है। कहानी का अंत भी प्रभावशाली और मार्मिक है। निसंदेह यह कहानी प्रसाद जी की ही नहीं अपितु हिंदी साहित्य जगत की एक श्रेष्ठ कहानी है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें