हिंदसा

रविवार, 29 सितंबर 2024

      रामकथा : ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक सन्दर्भ 


जन नीति संवाद प्रतिष्ठान के अध्यक्ष जी, आज की परिचर्चा के अध्यक्ष डॉ. अमित राय जी ,संचालक डॉ. कुमार गौरव , छोटे भाई तुल्य डॉ. संतोष कुमार जी एवं कार्यक्रम से जुड़े सभी सुधी गुणी जनों को मेरा नमस्कार |

राम कथा अर्थात  राम के जीवन की कथा|  जिसे हम रामायण कहते हैं, जैसाकि हम सब जानते हैं, भगवान राम की कथा बहुत प्राचीन है लेकिन हमारे लिए आज भी उतनी ही उपयोगी और प्रासंगिक है जितनी पहले थी, दूसरा ये  कथा भारतियों के लिए केवल एक कथा या आख्यान नहीं है बल्कि ये हमारे लिए  एक संकल्प है, एक संस्कार है, एक आदर्श परम्परा है, क्योंकि इस कथा में राम के माध्यम से भारतीय संस्कृति, जीवन दर्शन और मूल्यों और पारिवारिक संबंधों का एक आदर्श रूप प्रस्तुत किया गया है, राम का चरित्र एक पुत्र के रूप में , एक राजा  के रूप में, एक भाई  के रूप में और एक मित्र के रूप में सम्पूर्ण मानव समाज के लिए आदर्श है, आदि युग से लेकर आज तक यह कथा किसी न किसी रूप में चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी क्योंकि यह एक जीवंत कथा है ,हम सबने इसको अनेकोनेक बार पढ़ा है , सुना है और गुना भी है लेकिन आज भी इस अमर कथा को पढ़ने-पढ़ाने, सुनने-सुनाने का हमारा उत्साह कतई कम नहीं हुआ है यही बात इस राम कथा के महात्मय को प्रमाणित करती है| 

                        यहाँ पर मैं अपनी बात, राम कथा से, अपने पहले परिचय से शुरू करना चाहूंगी,  और केवल मेरा ही नहीं बल्कि मुझे लगता है कि अधिकतर का रामकथा से पहला परिचय लोक साहित्य या लोक कलाओं के माध्यम से हुआ होगा, व्यक्तिगत रूप से मुझे तो ऐसा लगता है,  हम सब जानते हैं कि भारत में लोक साहित्य या लोक कलाओं की बहुत ही समृद्ध परंपरा रही है, और अपने अपने क्षेत्र के लोक साहित्य या लोक कलाओं से हमारा विशेष जुडाव होता है, उत्तर भारत का लोक मानस तो अपने बालपन में ही इस पवित्र कथा से परिचय पा लेता है, तो  इसका श्रेय जाता है हमारे अपने अपने क्षेत्र में मंचित हिने वाली  रामलीलाओं को, ये रामलीलाए इसी राम कथा को आधार बनाकर प्रत्येक वर्ष, पुरे भारत में मंचित होती हैं, रामलीलाओं के मंचन की शुरुआत भी प्राचीन काल से ही शुरू हो चुकी थी, कुछ विद्वानों ने इनका आरम्भ 11वीं शताब्दी पूर्व से और कुछ विद्वानों 16वीं सदी से माना है और अनेक शोधो से ये प्रमाणित हो चुका है कि गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस को पूरा करने के पश्चात ही उनके शिष्यों द्वारा वाराणसी में रामलीला का पहली बार मंचन किया गया था। इस प्रकार इन रामलीलाओं का आरम्भ उत्तर भारत से हुआ और यहीं से इसका हर जगह प्रचार-प्रसार हुआ। यहाँ यह कहना भी  गलत नहीं होगा कि राम कथा को जन जन तक पहुँचाने में इन रामलीलाओं का महत्तवपूर्ण योगदान रहा है| क्योंकि पुराने समय में लोग पढ़े- लिखे नहीं होते थे और वाल्मीकि की रामायण का या तुलसी के रामचरित मानस को पढ़ने के लिए शिक्षित होना या संस्कृत, अवधी भाषाओँ का ज्ञान होना ज़रूरी था इसलिए बहुत पहले जब लोग शिक्षित नहीं होते थे तो रामलीलाओं के माध्यम से ही रामकथा से परिचित होते थे, मुझे याद है कि हमारी गली के अंतिम छोर पर रामलीला का मंचन होता था, लोग दूर-दूर से इस लीला को देखने आते थे, रात 9 बजे शुरू होने वाली रामलीला के लिए दर्शक शाम 5 बजे ही सर पर पटरी, मुडे ,छोटी छोटी चारपाई उठाकर इक्कठा होना शुरू कर देते थे| हर साल एक ही राम की कथा होती थी कोई परिवर्तन नहीं लेकिन फिर भी हर साल उतने ही उत्साह के साथ दर्शकों का हुजूम उमड़ता था ,भारत का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने अपने बचपन में रामलीला न देखी हो|  इसलिए जब भी हम अपने घर में अपनी दादी- नानी के सामने जिज्ञासावश राम के जीवन की किसी घटना पर कोई प्रश्न पुछते थे तो उनके उत्तर का आधार उनकी  गली में आयोजित होने वाली रामलीला ही होती थी| लेकिन जैसे जैसे हम बड़े हुए तो पता चला की इस रामलीला का मुख्य आधार आदि कवि महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण’ और गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ हैं  

                      राम कथा की एतिहासिकता हमेशा से ही चर्चा का विषय रहा है, रामकथा किस समय की है ? राम का जन्म कब हुआ ,राम  भगवान् थे या मानव, क्या राम कभी सच में हुए थे या ये सब मिथ है, क्या राम सेतु  का निर्माण राम ने ही किया था, रामकथा में दिए जाने वाने वरदान और शाप के पीछे कितना सच है, आदि अनेक प्रश्न आज भी विद्वानों के बीच बहस का कारण बनते हैं , हालाँकि रामकथा को लेकर पर्याप्त शोध हो चूका है और प्रचुर मात्रा में साहित्यिक , ऐतिहासिक पुरातात्विक प्रमाण  भी उपलब्ध हो चुके हैं लेकिन फिर भी विद्वानों में राम के अस्तित्व और कालक्रम को लेकर बहुत मतभेद है,  

          साहित्य की दृष्टि से देखें तो वैदिक साहित्य भारत का प्राचीनतम साहित्य माना गया है, रामकथा की धारा इसी वैदिक काल की संस्कृत भाषा से प्रवाहित होती हुई पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और आगे हिंदी के साथ साथ अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओँ में बहुत आदर एवं निष्ठां के साथ निरंतर प्रवाहित हो रही है,| कुछ विद्वान् रामकथा का आरम्भ यहीं से हुआ मानते हैं क्योंकि वेदों में कहीं कहीं रामायण के पात्रों जैसे राम, दशरथ आदि नामशब्दों का प्रयोग हुआ है| लेकिन उनके पारस्परिक संबंधों का कहीं कोई वर्णन नहीं हैं इसलिए वहाँ राम का अर्थ दशरथ पुत्र राम से है या किसी अन्य व्यक्ति से इसके बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा सकता , रामकथा को लेकर कामिल बुल्के का शोध पत्र ‘ राम कथा की उत्पत्ति और विकास’ इस दृष्टि से  बहुत महत्तवपूर्ण माना गया है, इसमे उन्होंने लिखा है- ‘वैदिक काल में रामायण की रचना हुई थी अथवा रामकथा सम्बन्धी गाथाएं प्रसिद्ध हो चुकी थी, इसकी समस्त वैदिक साहित्य में कोई भी सूचना नहीं हैं|” इसलिए वेदों में दशरथ पुत्र राम की कथा का वर्णन है, कामिल बुल्के के अनुसार तो यह बात सही नहीं मानी जा सकती, इसके साथ साथ वाल्मीकि और अन्य राम कथाओं में यह भी उल्लेख है कि राम ने अपने विद्या अध्ययन के दौरान वेदों का अध्ययन किया था तो जब स्वयं राम ने वेदों का अध्ययन किया है तो उनका उल्लेख वेदों में कैसे हो सकता हैं?  लेकिन इतना जरुर कह सकते हैं कि इन नामो के प्राप्त होने पर ये तो कहा जा सकता है कि उस समय के लोग इन नामों से अवश्य परिचित थे 

                  भारतीय साहित्य में राम के सम्पूर्ण जीवन को लेकर जो सबसे पहला और प्रामाणिक ग्रन्थ है वो संस्कृत भाषा में लिखा आदि कवि महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण’ है| अत: यह बात तो निश्चित है कि वाल्मीकि कृत रामायण ही सबसे पुरानी राम कथा  है|  समस्त राम साहित्य का मूल स्रोत भी वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण ही है| लेकिन सभी ग्रंथकारों ने रामायण की सभी घटनाओं का अपने -अपने ढंग से उल्लेख किया है, इसलिए रामकथा का वह स्वरूप किसी भी ग्रन्थ में नहीं मिलता जो वाल्मीकि की रामायण में है | इस  ग्रन्थ के रचनाकाल को लेकर सभी विद्वानों का अलग अलग मत हैं-  कोई  ई.पू. ग्याहरवी शताब्दी, कुछ विद्वान छठी और आठवीं शताब्दी ई.पू. के बीच की कृति स्वीकार करते हैं ,  डॉ. कीथ  इसे चौथी शताब्दी ई.पू. की रचना मानते हैं, कुछ विद्वान् इसे बुद्ध के बाद रची हुई मानते हैं, परन्तु वाल्मीकि रामायण में कहीं भी बुद्ध जैसे महापुरुष का उल्लेख नहीं है| अगर  बुद्ध  रामायण काल से पहले होते तो रामायण में बुद्ध जैसे महापुरुष का जरुर उल्लेख मिलता | इसलिए रामायण का रचनाकाल बुद्ध से पहले का माना जा सकता है , फिर रामायण को आदि काव्य भी कहा गया है तो इसकी रचना बुद्ध से पहले ही हुई होगी |  

                       माना कि रामकथा को लेकर महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण’ ही पहला और प्रामाणिक ग्रन्थ है, लेकिन ये भी हो सकता है कि रामकथा का अस्तित्व उससे पहले भी रहा हो, क्योंकि वाल्मीकि की रामायण के प्रारभ में यह उल्लेख है कि राम कथा को पहले नारद मुनि ने महर्षि वाल्मिकी को सुनाया, उसके बाद  ब्रह्मा जी ने वाल्मीकि से कहा कि हे मुनिश्रेष्ठ तुम लोको में धर्मात्मा , गुणवान, और बुद्धिमान हो  इसलिए श्री रामचंद्र जी  के छिपे हुए अथवा प्रकट चरित्रों का वर्णन तुम वैसे ही करो जैसे कि तुम नारद जी के मुख से सुन चुके हो| वे आगे कहते हैं कि श्री रामचंद्र , श्री लक्ष्मण  और श्री जानकी जी के तथा राक्षसों  के प्रकट अथवा गुप्त जो कुछ वृत्तांत हैं वे तुमको प्रत्यक्ष दिख पड़ेंगे और इस काव्य में कहीं भी तुम्हारी कही हुई कोई बात मिथ्या न होगी, अब तुम रामचंद्र जी की मनोहर और पवित्र कथा को  श्लोक बंध बनाओ, जब तक इस धराधाम पर पहाड़ और नदियां रहेगी , तब तक इस लोक में श्री रामचंद्र जी की कथा का प्रचार रहेगा और यह कहकर ब्रह्मा जी वही अंतर्ध्यान हो गए, ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा ने ही श्री वाल्मीकि जी को राम कथा लिखने के लिए प्रोत्साहित किया, उसके बाद वाल्मीकि जी ने रामायण की कथा को लव-कुश को पढाया और इसका गान करना सिखाया, उसके बाद इस कथा को लव-कुश ने राम के दरबार में जाकर श्री राम को सुनाया, इस प्रसंग के साथ कई जगह यह भी वर्णित है कि राम कथा राम के समय में ही लिखी गई, एक प्रसंग भगवान् शिव और पार्वती का भी है,  इस प्रकार कहने का तात्पर्य यह है कि राम कथा के समय को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं, परन्तु ये तो प्रमाणित है कि आदिकवि वाल्मीकि ने राम को नायक बनाकर अपनी रामायण बनाई और तत्पश्चात  उसका अनुसरण करके विश्व के अनेक कवियों और लेखकों ने अपनी अपनी भाषा में किया और राम की कथा को अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया   


                    राम की कथा के विभिन्न प्रसंगों पर पुराणों और संहिताओं में भी उल्लेख मिलाता  है|  पौराणिक साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ हरिवंश में संक्षिप्त राम कथा  मिलती  है जिसमें राम का अवतार रूप में  वर्णन हुआ है,  उसके बाद राम के वनवास गमन से लेकर रावण वध तक की प्रमुख घटनाओं का वर्णन भी किया गया है और अंत में रामराज्य की प्रशंसा भी की गई है, विष्णु पुराण में विशेषकर ताड़का वध , राम और सीता से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख यहां मिलता है| वायु पुराण में भी इसी तरह की कथा का वर्णन है विष्णु पुराण  और वायु पुराण की रामकथा लगभग एक जैसी ही है…..भागवत पुराण में सीता लक्ष्मी का अवतार मानी जाती है सीता स्वयंवर के अवसर पर राम धनुष तोड़ते हैं, राम ही शुर्पणखा को कुरुपित  करते हैं तथा धोबी के कारण सीता त्याग का वर्णन किया गया है, इस पुराण में एक कथा यह भी मिलती है कि समुद्र राम को देखकर तुरंत मार्ग दे देता है, वाराह पुराण में भी  रामचरित का वर्णन है, इस पुराण में पूरी रामकथा तो नहीं मिलती किंतु इस बात का उल्लेख है कि सीता रजा जनक की आत्मजा है और रावण युद्ध के पश्चात, राम द्वारा शिवलिंग की स्थापना की जाती है तथा यह कथा भी इसमे हैं कि दशरथ ने द्वादशी व्रत का पालन किया था जिसके फलस्वरूप उनको राम आदि पुत्र प्राप्त हुए, अग्नि पुराण में राम अवतार की कथा 6 कांडों में वर्णित की गई है, इसमे  रावण वध का उल्लेख किया गया है इसके अनुसार कई वर्षों तक  विश्वामित्र से धनुष विद्या आदि सीखने के बाद  राम, लक्ष्मण ताड़का का वध करते हैं तथा यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षसों का भी अंत  करते हैं , अग्नि पुराण में राम को लोक कल्याणकारी और निष्ठावान शासक के रूप में बताया गया है,  इसमें या भी बताया है राम के वनवास का कारण राम का मंथरा  पर अत्याचार करना था, इसके अतिरिक्त अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी रामकथा की घटनाओं का उल्लेख मिलता है |

                    राम की उपासना को लेकर अनेक संहिताओं का निर्माण हुआ, इन संहिताओं  में राम की महिमा, भक्ति एवं उपासना की पद्धति का पूर्ण विकास उपलब्ध होता है, उनमें राम को ही विश्व की उत्पत्ति और स्थिति के कारण बताया है यहां राम के कृत्यों में उनके ईश्वर होने के संकेत भी स्पष्ट रूप से मिलते हैं, ब्रह्म संहिता में सीताराम की युगलोपासना का उल्लेख भी हमें मिलता है|

                                                         संस्कृत में भी राम की कथा को आधार बनाकर नाटकों की रचना हुई है |कालिदास ने भी रामाश्रित साहित्य रचा, उनके द्वारा रचित रघुवंश नाटक में राजा दिलीप से आरंभ करके पूरे वंश की कथा रची है, दिलीप, रघु, दशरथ आदि का विशेष वर्णन किया गया है,कालिदास ने इसमें राम का विशद वर्णन किया गया और ये सभी पात्र समाज में एक आदर्श स्थापित करने में सफल हुए हैं, उन्होंने इसमे रघुवंशीयों  के जो गुण बताये हैं जैसे- गौ रक्षा करना, अहिंसा धर्म का पालन करना, सत्य  बोलना प्रेम की बजाए कर्तव्य को महत्व देना  ये सब भारतीय संस्कृति के परिचायक हैं,  भास जो संस्कृत के प्रसिद्ध नाटककारों  में गिने जाते हैं उन्होंने  प्रतिमा नाटक, अभिषेकनाटकं की कथावस्तु रामायण से ली है , प्रतिमा नाटक 7 अंकों का है, राम के राज्याभिषेक स्थगित होने, और उनके वनगमन से लेकर रावण वध तक की घटनाओं का वर्णन इस नाटक में किया गया है,  इस नाटक की कथा प्रचलित कथा से थोड़ी भिन्न है,  इसमे दिखाया गया है कि  प्राचीन काल में राजाओं के देवकूल होते थे जिसमें मृत्यु के उपरांत राजाओं की प्रतिमा स्थापित की जाती थी , रघु वंश का भी ऐसा ही देवकुल था जिसमें मृत नरेशों  की मूर्तियां स्थापित की गई थी , जब भरत ननिहाल से अयोध्या लौट रहे थे तो मार्ग में देवकूल में स्थापित दशरथ की प्रतिमा को देखकर ही भरत ने उनकी मृत्यु का अनुमान लगा लिया था, इसी कारण इस नाटक का नाम प्रतिमा नाटक है| प्रतिमाओ के निर्माण की कथा का प्रसंग भास की अपनी कल्पना है , अभिषेक नाटक के 6 अंक हैं,  इसकी कथावस्तु रामायण पर आधारित है नाटक की कथा किष्किंधा पहुंचने से प्रारंभ होती है बाली वध से लेकर रावण वध तक की कथा का वर्णन भास ने इस नाटक में किया  है                    

            भवभूति  भी संस्कृत के महान कवि और सर्वश्रेष्ठ नाटककार हैं  उनके नाटक कालिदास के नाटकों के समतुल्य माने जाते हैं, उनके दो नाटकों -महावीर चरित और उत्तर रामचरित नाटको की कथावस्तु का आधार भी रामायण है, महावीरचरित्र जिसमें राम विवाह से लेकर राज्याभिषेक तक की कथा को लिया गया है कवि ने कथा में रोचकता लाने के लिए कई काल्पनिक परिवर्तन किए हैं ,  

उत्तररामचरित में राम के उत्तर जीवन को जो अभिषेक के बाद प्रारंभ होता है, जिसमें सीता निर्वासन की कथा का वर्णन है, नाटक के अंत में सीता  की निर्दोषता  सिद्ध हो जाती है और  इसके उपरांत राम सीता और लव कुश के साथ अयोध्या वापस आ जाते हैं इसलिए यह नाटक दुखांत नहीं है सुखांत है 

                       संस्कृत के इन  नाटकों में रामकथा के माध्यम से  संपूर्ण भारतीय संस्कृति और सभ्यता अपनी भव्यता के साथ व्यक्त  हुई है , राम के आदर्श  रूप को यहां पर अभिव्यक्ति मिली है राम एक देवता भी है और मानव की है और देवता और मानव दोनों का जो यह समन्वय है वह इतना सुंदर है कि ऐसा समय हमें कहीं और देखने को नहीं मिल सकता, राम के चरित्र ने जिन मूल्यों की स्थापना की है वे प्रय्तेक देश और काल में उपयोगी हैं ,  इसके साथ भारतीय संस्कृति की अगर हम बात करें तो धर्म, अर्थ  काम और  मोक्ष ,  इन चार तत्वो  को महत्व दिया जाता है और जब हम रामायण की बात करते राम कथा की बात करते चाहे वह रामचरितमानस हो चाहे वाल्मीकि का रामायण हो सब में धर्म, अर्थ और  काम को समान महत्व दिया गया है इसके अतिरिक्त तप, संयम, प्रेम, कर्तव्य को भी राम कथा में महत्व दिया गया है 

                    कुछ विद्वान् राम कथा का मूल बौद्ध जातक कथाओं को मानते है, वैसे बौद्ध कथाओं में  रामकथा का ज्यादा विस्तार तो नहीं मिलता लेकिन कुछ रामकथा संबंधी प्राचीन गाथाओं का वर्णन जरूर मिलता है, अश्वघोष ने अपनी रचना बुद्धिचरितं में  सुंदरकांड के अनेक रमणीय उपमाओं को निबंध किया है बौद्ध जातक कथाओं में रामायण का वर्णन है, दशरथ जातक, अनामकं तथा चीनी त्रिपिटक के अंतर्गत दशरथ कथानम है इसमे तो रामायण की पूरी कहानी है लेकिन इन जातको में जो राम कथा मिलती है वह बहुत ही अमर्यादित और विकृत है, राम और सीता संबंध को लेकर जो कहा गया है वह भारतीय परंपरा के अनुसार सही नहीं हो सकता और राम रावण युद्ध का भी इसमें अभाव है यह भी कहा जा सकता है कि बौद्ध दर्शन में अहिंसा को महत्त्व दिया जाता है, और राम ने रावण जैसे राक्षसों का वध किया तो ये बात बौद्धों के अंहिसापरक दृष्टिकोण के विरुद्ध है तो इसलिए इनकी रामकथा राम की लोक प्रसिद्ध उत्तरभारतीय कथा से भिन्न मिलती है| फिर ये भी बात है की बौद्ध धर्म को मानने वाले महात्मा बुद्ध को अपना नायक मानते हैं तो उसके ऊपर किसी और को नायक के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं |

                          इसके विपरीत जैन साहित्य में रामकथा पर अनेक रचनाएं मिलती हैं जैन साहित्य में विश्वास करने  वालों ने रामकथा को अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ ग्रहण किया है, रामकथा के प्रसिद्द अध्ययन कर्ता डॉक्टर कामिल बुल्के ने लिखा है कि- बौद्धों की भांति जैनियों ने भी रामकथा अपनायी है, अंतर यह है कि जैन कथा ग्रंथों में हमें एक अत्यंत विस्तृत कथा साहित्य मिलता है”  लेकिन बौद्ध साहित्य में इस तरह से राम की कथा का विस्तार हमें नहीं मिलता है, जैन साहित्य में रामायण की परंपरा के पीछे जैन धर्म की एक विशिष्ट अवधारणा मुख्य रूप से मिलती रही है जो अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक है, जैन धर्म में ‘ तिरेसठ शलाका पुरुषों का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है, इन तिरेसठ (63)शलाका पुरुषों में 24 तीर्थकर 12 चक्रवर्ती, 9 बलदेव, 9  वासुदेव, तथा 9 प्रति वासुदेव माने गए हैं ,जैन धर्म की मान्यता के अनुसार राम इन 63 शलाका पुरुष परंपरा के अंतर्गत आंठवें  ‘बलदेव ‘ के रूप में पूज्य शलाका पुरुष हैं  और लक्ष्मण आठवें  वासुदेव, रावण आठवें  प्रतिवासुदेव के रूप में माने गए हैं,  इस प्रकार हम देखते हैं कि जैन धर्म में राम को तीर्थकरों तथा चक्रवर्तियों के साथ साथ उच्च स्थान दिया गया है, इसके अतिरिक्त जैन साहित्य में रामकथा संस्कृत की  परंपरानुसार वाल्मीकि ‘रामायण’ या  तुलसीदास की भांति ‘रामचरित’ के नाम से नहीं रखी गई है बल्कि राम का नाम जैन रामकथा काव्यों में पउम अर्थात पद्म {पदम} रखकर पउम चरिउ  कहा गया है,

                              जैन साहित्य में रामकथा की दो धाराएं  हैं - पहली  महाकवि विमल सूरी द्वारा रचित ‘पउम चरियं’ की परंपरा और दूसरी है गुणभद्र आचार्य द्वारा रचित ‘उत्तर पुराण’ की परंपरा| महाकवि विमल सूरी की प्राकृत भाषा में रचित राम कथा परंपरा ही बढ़ती हुई महाकवि स्वयंभू देव कृत  ’पउम चरिउ’ में मिलती है, इस परंपरा की अन्य कृतियों में  हेमचंद्र की जैन रामायण,  जिनदास कृत राम पुराण, सोमसेन कृत रामचरितं प्रमुख हैं |  स्वयंभू को तो अपभ्रंश के वाल्मीकि कहा जाता है और और ये कहा गया है कि महाकवि तुलसीदास के रामचरितमानस पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ा  है क्योंकि साहित्य के महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भी कहा है कि “तुलसी बाबा ने स्वयंभू  की  जैन रामायण जरूर देखी होगी |” यह भी कहा गया है कि दोहा- चौपाई छंद की परंपरा जैन कवियों की ही देन है और जैन साहित्यकार मानस के अनेक प्रसंगों पर जैन रामायण का प्रभाव मानते हैं….. अब जैन रामायण पर मानस का प्रभाव है या मानस का जैन रामायण पर ,ये अलग शोध का विषय है , लेकिन ये जरुर कहा जा सकता है कि रामायण सम्बन्धी इन ग्रंथों में तत्कालीन समाज के सांस्कृतिक व सामाजिक पक्ष की हमें विशेष जानकारी मिलती है , तत्कालीन समाज में बहु विवाह की प्रथा रही थी , रानियों में एक पटरानी भी  होती थी और यह भी बात सच है कि मंथरा और शूर्पनखा जैसी महिलाएं समाज में विघटन और पारिवारिक कलह या क्लेश का भी कारण बनती हैं,  इसके साथ ही समाज में सत्य का पालन करना, वचनों के प्रति निष्ठा, भाइयों की आज्ञा का पालन करना, पिता की आज्ञा का पालन करना, व्यक्ति को अच्छे चरित्र का होना,  ये सब चारित्रिक गुण समझे जाते थे, परस्त्री  से प्रेम करना पाप समझा जाता था , प्रतिज्ञा के लिए अग्नि को साक्षी बनाया जाता था , युद्ध के लिए भी नियम निर्धारित होते थे, इन सबके अतिरिक्त इन ग्रंथों में राम को ईश्वर नहीं बल्कि मानवीय दुर्बलताओं से युक्त  दिखाया गया है|

                            वाल्मीकि की रामायण के बाद  रामकथा को लेकर जो सबसे प्रतिष्ठित ग्रन्थ है वो गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी भाषा में रचित ‘रामचरितमानस’ है| रामचरितमानस हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ है, इसकी लोकप्रियता अद्वितीय है, उत्तर भारत में बहुत से लोगों के द्वारा प्रतिदिन इसका पाठ किया जाता है और सुंदरकांड का पाठ तो पूरे 9 दिन तक किया जाता है मानस का राम हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएं हो फिर जीवन को ख़ुशी ख़ुशी जीना है|  रामचरितमानस की रचना के बाद जितने भी  राम कथा संबंधी ग्रन्थ लिखे गए , सब  पर रामचरितमानस का ही प्रभाव है | तुलसीदास ने इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में  रामचरित मानस को नाना पुराण निगमागम-सम्मत लिखा है, इससे लगता है कि उन्होंने मानस के निर्माण से पहले में अनेक शास्त्रों पुरानों, धार्मिक तथा अन्य काव्य ग्रंथों का अध्ययन किया और अपने पूर्व में लिखे गए समस्त रामचरित सम्बन्धी साहित्य का सार ग्रहण कर उसको रामचरित मानस में संकलित किया है ,परंतु इसके उपरांत भी तुलसी के राम अलग हैं , जब हम पूर्ववर्ती राम साहित्य पर दृष्टि डालते हैं तो लगता है कि तुलसी को मानस के राम का चरित गढ़ने में बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी | मानस का राम का शक्ति, शील और सौन्दर्य से युक्त विविध गुणों से संपन्न , मर्यादा पुरुषोतम  हैं रामकथा सम्बन्धी सारा साहित्य पड़ने के उपरांत भी श्री राम को लेकर वह धारणा नहीं बन पाती जो मानस को पढ़कर बनती है , मानस के अतिरिक्त तुलसीदास ने रामकथा पर आधारित और भी  ग्रन्थ लिखे  जिनमे  रामलला-नहछू , रामाज्ञा प्रश्न , जानकी मंगल आदि प्रमुख हैं| लेकिन सबसे ज्यादा प्रसिद्धि रामचरित मानस को ही मिली, रामानन्द, नाभादास, प्राण चंद चौहान , ह्रदय राम, केशवदास सेनापति आदि कवियों की कृतियाँ भी राम कथा पर आधारित हैं , हिंदी में रामचरित का प्रथम उल्लेख आदिकालीन रचना पृथ्वीराज रासो में प्राप्त हो जाता है, आधुनिक युग में भी राम की कथा को लेकर कुछ रचनाएं हुई है जिनमें रामचरित चिंतामणि (रामचरित उपाध्याय कृत), वैदेही वनवास( हरिओम ) साकेत और पंचवटी (मैथिलीशरण गुप्त ) राम की शक्ति पूजा (निराला )  रचनाएँ विशेष प्रसिद्ध हैं 

                                इस प्रकार वैदिक काल से लेकर आज तक राम के चरित का वर्णन विविध प्रकार से हुआ है, सैकड़ो कवियों, लेखकों ने रामकथा के विभिन्न प्रसंगों पर लिखा है, अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओँ में इस कथा का अनुवाद हो चुका है, अब तक कुल कितने साहित्यकारों ने और कितने प्रकार से लिखा हैं इसकी गिनती करना या इसको बता पाना आसन नहीं है| प्राचीन और समकालीन विभिन्न विषयों के परिप्रेक्ष्य में राम कथा का अनेकोनेक बार विवेचन हो चुका है और हो रहा है| जन नीति प्रतिष्ठान का यह नेक प्रयास भी उसी शृंखला की कड़ी बन कर इतिहास में अंकित होगा| ऐसा मेरा विश्वास है 

           महान कवि तुलसीदास ने भी लिखा है -

                 ‘हरि अनन्त, हरि कथा अनंता| कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता|| 

                  रामचंद्र के चरित सुहाए | कलप कोटि लगि जाहिं न गाए| 

{अर्थात हरि अनंत हैं उनका कोई पार नहीं पा सकता , और उनकी कथा भी अनंत है |सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं | रामचंद्र के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं 

इन्ही शब्दों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देती हूँ 

                                       आप सभी का हार्दिक धन्यवाद और आभार 

संदर्भ सूची -

1 हिंदी रामकाव्य: नए संदर्भ, डॉ.प्रोमिला अवस्थी , चिन्तन प्रकाशन , 22 ए -मछरिया रोड, नौबस्ता, कानपुर 20 8021 ,प्रथम संस्करण 1993 

2. रामचरितमानस, तुलनात्मक अनुशीलन, डॉ. सज्जनराम केणी, पुस्तक संस्थान , नेहरु नगर,कानपुर 



                                

                                                            






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