हिंदसा

शुक्रवार, 7 मई 2021

गंगा स्नान करने चलोगे? संस्मरण 2.

  हिंदी साहित्य में संस्मरण की गणना दूसरी अन्य गद्य विधाओं की तरह ही  होती है अर्थात जैसे रेखाचित्र रिपोर्ताज आत्मकथा जीवनी एवं पत्र साहित्य आदि की होती है वैसे ही  संस्मरण विधा होती है। संस्मरण साहित्य में कथावाचक जिन घटनाओं, पात्रों एवं शब्द चित्र प्रस्तुत करता है, उसकी प्रामाणिकता संदिग्ध नहीं होती है।संस्मरण में कथाकार अपनी स्मृतियों के आधार पर कथा का निर्माण करता है। संस्मरण का शाब्दिक अर्थ - सम्यक संस्मरण होता है। यह संस्मरण व्यक्ति, घटना, दृश्य और किसी से भी संबंधित हो सकता है। संस्मरण में कथानक का विकास एक रेखीय रूप अर्थात आदि से अंत तक  एक लय में नहीं होता है बल्कि कथानक की लड़ियां विशृंखलित होती हैं । लेखक समय की आवाजाही कथानक में अपनी स्मृतियों के आधार पर करता है। संस्मरण में यह संभव है कि कोई कथाकार वृद्धा अवस्था की घटना का जिक्र कर रहा है और उसके तुरंत बाद युवा अवस्था के विवरणों को देने लगे। कुल मिलाकर संस्मरण में स्मृति स मुख्य होती है| कथाकार को घटनाएं या पात्र या दृश्य जैसे जैसे याद आते हैं वह वैसे वैसे उनका जिक्र करता चलता है गंगा स्नान करने चलोगे पाठ भी  विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखा गया एक संस्मरण है

गंगा स्नान करने चलोगे? संस्मरण विश्वनाथ त्रिपाठी जी के द्वारा लिखा गया है।  इसमें उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के साथ बिताए गए दिनों  को याद करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के चरित्र की अनेक विशेषताओं को ओर इंगित किया है। विश्वनाथ त्रिपाठी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जब काशी में साथ- साथ रहते थे तो गर्मियों में कई बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी जी को गंगा स्नान करने के लिए कभी-कभी लेकर जाते थे। जब वह गंगा स्नान करने के लिए जाते थे तो रास्ते में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी को अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों के बारे में बताते थे- कि कौन- सी पुस्तक पढ़नी चाहिए और वह पुस्तक कहां मिलेगी? वह पुस्तक किस लाइब्रेरी में मिलेगी? आदि-आदि। एक रात जाड़े के दिनों में लगभग रात के 7:00 बजे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी विश्वनाथ त्रिपाठी जी से  कहते हैं कि गंगा स्नान करने चलोगे? आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कहने पर विश्वनाथ त्रिपाठी उनके साथ चल पड़े।  जाड़े की  रात में, वह भी 7:00 बजे, गंगा स्नान करने जाने की बात सुनकर विश्वनाथ त्रिपाठी जी हैरान थे बावजूद इसके वे बिना कुछ कहे ही हजारी प्रसाद जी के साथ चल पड़े। उस दिन हजारी प्रसाद द्विवेदी गंगा के तट पर जाने की बजाय वे विश्वनाथ त्रिपाठी जी को विश्वविद्यालय के बहुत बड़े विद्वान पंडित सुखलाल जी के यहां लेकर गए और उनसे विश्वनाथ त्रिपाठी जी का परिचय कराया पंडित सुखलाल जी ने भी विश्वनाथ त्रिपाठी जी को संस्कृत पढ़ने की बात कहते हुए अनेक महत्वपूर्ण बात बताई इस तरह से वापस लौटते हुए पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने विश्वनाथ त्रिपाठी को कहा कि हो गया न गंगा स्नान क्योंकि सुखलाल जी उस समय के बहुत बड़े विद्वान थे और उनसे मिलना या उनसे परिचय होना वास्तव में किसी भी गंगा स्नान से कम नहीं था। इसके अतिरिक्त इस संस्मरण के माध्यम से हमें पता चलता है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बहुत बड़े विद्वान थे जिस उम्र में लोग गंभीरता पूर्वक पढ़ना शुरू करते हैं उस उम्र में द्विवेदी जी बहुत बड़े विद्वान बन चुके थे लगभग 30 वर्ष की आयु में हजारी प्रसाद द्विवेदी को आचार्य कहकर पुकारा जाता जाने लगा था।

 एक अध्यापक के रूप में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी जी लिखते हैं कि क्लास में कोई विद्यार्थी नए अर्थ का संकेत करता था तो वे उसकी बहुत तारीफ करते थे पहली बार तारीफ करने से मन नहीं भरता थोड़ी-थोड़ी देर पर पीरियड में तीन चार बार तारीफ करते-  बहुत ठीक मैंने नहीं सोचा था... मैं तो खींच खांचकर अर्थ कर रहा था ..प्रसन्न होकर वह शिष्यों से कहते-  पुस्तकें भी पढ़ो, पुस्तकालय भी पढ़ो, किताबों की दुकान पढ़ो,  किताबों की दुकान पर जाकर पता चलता है कि कितना कम पढ़ा है पढ़ने को कितना है आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी विद्वानों के लिए संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं का आना भी जरूरी मानते थे आचार्य द्विवेदी जी विद्वान होने से ज्यादा अच्छा मनुष्य बनना मानते थे वह कहते थे कि विद्वान होने से क्या है 50 किताबें पढ़ने से तो कोई भी व्यक्ति विद्वान हो सकता है। मनुष्य बनने की साधना करना बड़ी बात है।

  विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का क्लास में पाठ्यक्रम कभी समाप्त नहीं होता था क्योंकि वह पंक्तियों की व्याख्या बहुत विस्तार से करते थे कबीर के 11 दोहे का अर्थ बताने में वे तीन चार घंटे लगाते थे इस तरह से कोर्स खत्म नहीं होता था और परीक्षाएं सिर पर आ जाती थी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने विद्यार्थियों को घर पर बुलाकर भी पढ़ाते थे इसके साथ साथ वे लिखने में उनकी विशेष रूचि रखते थे, तुलसीदास जी पर लिखना चाहते थे, उत्तरमेघ लिखना चाहते थे। हमेशा वह कुछ न कुछ लिखने के लिए सोचते रहते थे । स्वास्थ्य खराब होने पर भी  उनकी इच्छा लिखने की रहती थी। इसलिए वे अपने शिष्यों को घर बुलाकर, बोलकर कुछ लिखवाने का प्रयास करते थे । विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने इस संस्मरण में उस घटना का उल्लेख भी किया है जब 1960 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थी। इस घटना का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। यह उनके साथ गलत हुआ था और इस बात का उन्हें ताउम्र मलाल  रहा भी और इस जैसी कुछ और घटनाओं के कारण ही उनका सत्य और मानवीयता से एक तरह से भरोसा उठ गया था क्योंकि उनको लगता था कि इस संसार में असत्य और अमानवीयता सत्य और मानवीयता से ज्यादा शक्तिशाली है।

   आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तीन बातों से हमेशा नाराज हो जाते थे- अगर कोई व्यक्ति किसी महिला के चरित्र की निंदा करता था जब या फिर दोपहर के भोजन के बाद  सोते में उन्हें जगा दे या फिर रविंद्र नाथ ठाकुर, मदन मोहन मालवीय, गांधी जी और जवाहरलाल नेहरू के बारे में हल्की बात करने पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी नाराज हो जाते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कालिदास से बड़ा किसी अन्य कवि को नहीं मानते थे। आधुनिक साहित्यकार भी हजारी प्रसाद द्विवेदी से अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस करते थे। इसलिए उनकी शव यात्रा में आधुनिक साहित्यकारों की संख्या पुराने साहित्यकारों से भी ज्यादा थी। वे नई पीढ़ी का सम्मान करते थे। उनका मानना था कि काल की वस्तुगत सत्ता नहीं होती। वह केवल बोझ या मनोविकार है। काल घटनाओं से झलकता है । वह केवल घटनाओं को नापने का बोध माध्यम मात्र है इसलिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कोई घटना कब घटी, किसी व्यक्ति की उम्र क्या है? वह बूढ़ा है या किशोर। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी सोच या उसका दृष्टिकोण होता है। नयापन आधुनिकता का पर्याय नहीं है। नया पुरातन पंथी भी हो सकता है। प्राचीन साहित्य को भी आधुनिक दृष्टि से देखा जा सकता है। इसलिए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को आधुनिक साहित्यकार भी बहुत सम्मान देते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी किसी को दुख नहीं पहुंचाना चाहते थे अनुचित के प्रति विरोध करना जानते थे लेकिन संघर्ष करना उनके वश में नहीं था। वे प्रत्येक व्यक्ति में गुण देख लेते थे और मनुष्य के गुणों का ही बखान करते थे उनका मानना था कि तारीफ कर देने से क्या बिगड़ जाता है मनुष्य कोई रचना थोड़ा ना है कि उसकी समीक्षा की जाए। विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखी एक हस्तलिखित नोटबुक का भी जिक्र किया है। उस नोटबुक के कवर पर हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने हनुमान जी का चित्र बनाया था और उन्होंने एक काव्य पत्र भी लिखा था जो उस समय के प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय जी को भेजा था। उन्होंने इसमें लिखा था कि क्या हो गया? बड़े बड़े कवियों की कविताओं से, क्या दमन, शोषण, अन्याय कुछ भी रुक पाया अर्थात नहीं रुक पाया । इसीलिए द्विवेदी जी के मन में सत्य के प्रति अविश्वास पैदा हुआ और उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ गई। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का पद छोड़ने से पहले और बाद के हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के मनोबल में बहुत अंतर आ गया था। क्योंकि उन्होंने भारतीय व्यवस्था के दो मुंहेपन को देखा था । जिसको वह कभी भुला नहीं पाए। इस तरह से विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने अनेक ऐसे स्मृति चित्रों का उल्लेख इस संस्मरण में किया है जो पाठक के मन मस्तिष्क पर हजारी प्रसाद को लेकर एक अलग ही छाप छोड़ते हैं और वह हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के संघर्षशील जीवन से प्रेरणा पाते हैं और हिंदी के महान साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के चरित्र की  अनेक खूबियों से परिचित या अवगत होते हैं

    गंगा स्नान करने चलोगे नामक संस्मरण खड़ी बोली में लिखा गया है। इसकी भाषा सरल है। विषय के अनुसार भाषा और वाक्य संरचना का चयन किया गया है। शब्दों का प्रयोग भी स्वाभाविक है।  ट्रेन, पीरियड, गाड़ी,क्लास आदि अंग्रेजी  के शब्दों के साथ-साथ तत्सम, तद्भव, देशज शब्दों का भी प्रयोग इस संस्मरण में हुआ है । साहित्यिक भाषा का पुट इस संस्मरण के महत्व को और भी बढ़ा देता है। भाषा मे कहीं भी बनावटी पन नजर नहीं आता । कुल मिलाकर या संस्मरण पाठक को भाव विभोर कर देता है। 

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