हिंदसा

बुधवार, 15 जुलाई 2015

एकांकी

एकांकी सामान्य परिचय
 एकांकी साधारणतया नाटक के उस रूप को कहते हैं जिसमें केवल एक ही अंक में संपूर्ण नाटक समाप्त हो जाता है या जो नाटक एक अंक का होता है उसे एकांकी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे वन एक्ट प्ले कहा गया है।
एकांकी का  उद्भव-
एकांकी के उद्भव को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं।कुछ का मानना है कि एकांकी पश्चिम या वैज्ञानिक युग की देन है तो कुछ का मानना है कि एकांकी का उद्भव संस्कृत नाट्य साहित्य से हुआ है। संस्कृत नाट्य साहित्य से एकांकी का उद्भव मानने वाले विद्वानों का तर्क है कि एक अंक का नाटक लिखने की परंपरा संस्कृत साहित्य में भी मिलती है। इनका मत है कि भास और भरत मुनि ने इसका आरंभ इससे बहुत पहले ही कर दिया था। संस्कृत साहित्य में भरतमुनि ने जो नाटक और उप नाटक के भेद बताए हैं उनमें सत्रह रूप (व्यायोग, प्रहसन, भाण, वीथि, नाटिका,  नाट्य रासक, प्रक्षेपण, उल्लाप्य,  काव्य, गोष्टी, सट्टक, श्रीगदित, विलासिता और अंक आदि ऐसे हैं जिनमें एक ही अंक है| इन सभी एकांकी रूपों का प्राचीन काल में अभिनय होता था। इससे सिद्ध होता है कि संस्कृत साहित्य में एकांकी की समृद्ध परंपरा थी। इस संबंध में डॉ राम चरण महेंद्र का मानना है, "संस्कृत एकांकियों की शिल्प विधि पर्याप्त जटिल थी और नाटककारों ने उपभेदों का अंतर स्पष्ट किया था। आधुनिक हिंदी एकांकी की सभी शैलियां थोड़े से परिवर्तन के साथ इन्हीं में समा सकती हैं।" इसी प्रकार सीताराम चतुर्वेदी एकांकी का उद्भव संस्कृत नाट्य साहित्य से तो मानते ही हैं इसके साथ ही उनका मानना है कि प्राचीन यूनान में भी छोटे प्रहसन लिखे गए थे। वे लिखते हैं, "भारतीय साहित्य में बोलपट के आविष्कार की प्रतिक्रिया के रूप में एकांकी नाटक की सृष्टि हुई। जिन्होंने संस्कृत साहित्य का अध्ययन नहीं किया है उनका यही विश्वास है कि एकांकी नाटक भी वैज्ञानिक आविष्कारों के समान ही बीसवीं शताब्दी की देन है, किंतु एकांकी नाटकों का आरंभ ईसा से बहुत पहले भास ने कर दिया था। जिसके मध्यम-व्यायोग को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। यूरोप में भी छोटे संबद्ध तथा कलात्मक नाटक कोई नए नहीं हैं। प्राचीन यूनान और इतालिया में छोटे प्रहसन पंद्रहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी तक कीमीदियादे लारते के नाम से इतालिया में तथा दूसरे यूरोपीय देशों में प्रचलित थे।"
भारतीय संस्कृत साहित्य में एकांकी के आरंभिक रूप की बात करने के बाद यह देखना भी आवश्यक है कि पाश्चात्य साहित्य में एकांकी का स्वरूप कैसा था? पश्चिम में एकांकियों का उद्भव कर्टेन रेजर (curtain Raiser) या आफ्टर पीसेज़(after Piecess) के रूप में हुआ था। इन रूपों की तुलना संस्कृत के एकांकी रूपों से नहीं की जा सकती, क्योंकि कर्टेन रेजर या आफ्टर पीसेज 18वीं और 19वीं शताब्दी में इंग्लैंड के प्रेक्षागृह में मुख्य एकांकी नाटक के आरंभ होने से पहले जल्दी या समय पर आ जाने वाले दर्शकों का समय बिताने के लिए खेले जाते थे। इनका मूल उद्देश्य मनोरंजन के द्वारा दर्शकों को कुछ समय तक बिठाए रखना मात्र था, पहले इन्हें साहित्य में स्थान नहीं मिला था। इनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना जाता था और यह अधिकतर संस्कृत के भाण और प्रसहन से मिलते जुलते होते थे। आगे चलकर इन एकांकियों को दर्शकों ने इतना अधिक पसंद किया कि एकांकी कला ने अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व बना लिया और एक अंक वाले इन नाटकों को एक अंक का होने के कारण वन एक्ट प्ले कहा जाने लगा।
       इसके अतिरिक्त एकांकी के संदर्भ में कहा जाता है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में लंदन के एक प्रसिद्ध प्रेक्षागृह में एक मनोरंजक घटना घटी। माना जाता है कि इस घटना से ही एकांकी विधा के स्वतंत्र अस्तित्व का आरंभ हुआ। हुआ यह कि वहां कर्टन रेजर के रूप में भी द मंकीज पां (बंदर का पंजा) का अभिनय किया गया। यह इतना प्रभावशाली सिद्ध हुआ कि दर्शक मुख्य नाटक को बिना देखे ही उठकर चले गए। इसके प्रभावफलस्वरूप एकांकी नाटक जनता में इतने लोकप्रिय हो गए कि उसके बाद उन्हें साहित्य की एक स्वतंत्र विधा मान लिया गया। इन सभी बातों से यह सिद्ध होता है की पूर्व और पश्चिम दोनों नाट्य साहित्य में एकांकी के निकटतम रूप मिलते हैं। बावजूद इसके बीसवीं शताब्दी में एकांकी का जो स्वरूप, विषय, उद्देश्य, या शिल्प मिलता है, उसमें पहले से अर्थात आरम्भिक एकांकी से देखा जाए तो बहुत परिवर्तन आया है।  और इस दृष्टि से वह परंपरागत एकांकी  भिन्न है। इस परिवर्तन को देखते हुए ही उस पर पश्चिम के प्रभाव की बात की जाती है।
एकांकी  की परिभाषाएं-
एकांकी के स्वरूप को लेकर भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने अपने अपने मत के अनुसार एकांकी की परिभाषा दी हैं।
भारतीय विद्वानों की परिभाषाएं-
भारतीय विद्वान डॉ उदय शंकर भट्ट लिखते हैं- "एकांकी नाटक में जीवन का एक अंश, परिवर्तन का एक क्षण,  सभी प्रकार के वातावरण से प्रेरित लेखकों का,  दिन में एक घंटे की तरह, मेघ में बिजली की तरह, बसंत में फूल के हास की तरह होती है।" दशरथ ओझा ने एकांकी के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखा है- "जो नाटक एक ही अंक में समाप्त होने वाला, एक सुनिश्चित लक्ष्य वाला, एक ही घटना, एक ही परिस्थिति और  एक ही समस्या वाला हो, जिसके कथानक में कौतूहल और वेग, गति में विद्युत-सी वक्रता और तेजी, विकास में एकाग्रता और आकस्मिकता के साथ चरम सीमा तक पहुंचाने की व्यग्रता हो और जिसका पर्यवसान चरम सीमा पर ही प्रभाव की तीव्रता के साथ हो जाता हो, जिसमें प्रासंगिक कथाओं का प्रायः निषेध, घटनाओं की विविधता का निवारण तथा चारित्रिक प्रस्फुटन में आदि, मध्य और अवसान का वर्जन हो, उसे एकांकी कहना चाहिए।"
पाश्चात्य विद्वानों की परिभाषाएं-
       पाश्चात्य विद्वान सिडनी बॉक्स ने 'टेक्निक ऑफ वन एक्ट प्ले' में लिखा है-  "एकांकी का स्वरूप ऐसा नहीं होता जिसमें चरित्र चित्रण की सूक्ष्मताओं को महत्व दिया जा सके। एकांकी साहित्य की वह नियंत्रित और संयमित विधा है जिससे एक ही घटना को इस प्रकार अभिव्यक्त किया जाता है कि उनके प्रभाव एक्य से पाठकों और दर्शकों का मन आकृष्ट और आक्रांत हो उठता है।"  पश्चिम के अन्य विद्वानों ने नाटक की ही भांति एकांकी में भी संघर्ष को भी महत्व दिया है। वह एकांकी में संघर्ष की प्रधानता को स्थान देते हैं। क्योंकि संघर्ष उनकी दृष्टि में सभी नाटकों का प्राण है।
           उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि एकांकी का नाटक से संबंध है। लेकिन वह एक सर्वथा स्वतंत्र विधा भी है। वह समाज के एक खंड का प्रभावशाली चित्र अंकित करती है। एकांकी का निर्माण एक निश्चित लक्ष्य, विचार या समस्या का विवेचन करने के निमित्त, एक ही महत्वपूर्ण घटना या परिस्थिति द्वारा किया जाता है। यह उसी घटना, परिस्थिति या विषय से आरंभ होकर पूर्ण विकास को प्राप्त होती है। इसमें एक ही घटना विस्तार पाकर दर्शकों को प्रभावित करती है।  एकांकी का उद्देश्य गंभीर, हास्यजनक, करूण आदि किसी भी प्रकार का हो सकता है। वह चरित्र प्रधान भी हो सकती है और विषय प्रधान भी हो सकती है। विषय का चयन करते समय लेखक को संक्षिप्तता का अवश्य ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि एकांकीकार के पास समय की कमी होती है। इसलिए इसमें कथा का अनावश्यक विस्तार नहीं किया जाता।
एकांकी के तत्त्व-
नाटक की तरह एकांकी के भी मूल रूप से सात तत्व होते हैं। कथानक, पात्र एवं चरित्र चित्रण, संवाद, उद्देश्य, देश काल और वातावरण, भाषा शैली और रंग संकेत या अभिनय। देखा जाए तो कथा, संवाद और दृश्य विधान के अंतर्गत सभी तत्व आ जाते हैं। डॉक्टर रामगोपाल चौहान ने इन तत्वों का निर्धारण निम्न प्रकार से किया है- पहला है- कथा। कथा के अंतर्गत वे तीन तत्व को शामिल करते हैं- कथा, चरित्र चित्रण और तीसरा उद्देश्य। इसी तरह दूसरा है- संवाद। संवाद में वे संवाद और भाषा शैली दोनों को शामिल करते हैं। और तीसरा है- दृश्य विधान। इसमें वे अर्थात दृश्य विधान में वातावरण सृजन, देशकाल और रंग निर्देश को शामिल करते हैं।
एकांकी की विशेषताएं-
अन्य साहित्यिक विधाओं की तरह एकांकी की भी अपनी विशेषताएं होती हैं। उन विशेषताओं के कारण ही उसका स्वतंत्र अस्तित्व माना जाता है या होता है।  एकांकी की भी अपनी कुछ विशेषताएं हैं जैसे-
1. एकांकी में केवल आधार रूप से एक ही अंक होना चाहिए।2. एक ही मुख्य घटना या जीवन की एक मुख्य संवेदना होनी चाहिए जिसका विकास कोतुहल और जिज्ञासा पूर्ण नाटकीय शैली में होना चाहिए।
3. चरम सीमा पर पहुंचकर एकांकी का अंत होना चाहिए।
4. एकांकी में घटनाओं का चुनाव दैनिक जीवन से हो तथा उसमें यथार्थवाद एवं मनोरंजन के तत्वों का उचित समावेश होना चाहिए।
5. संघर्ष एकांकी का प्राण होता है इसकी अभिव्यंजना का आधार मनोविज्ञान रहना चाहिए।
6. स्वाभाविक यथार्थवादी चित्रण होना चाहिए।
7. संवाद संक्षिप्त, प्रभावी और प्रवाहमय होने चाहिए।
8. एकांकी रंगमंच के गुणों से युक्त होनी चाहिए।
9. एकांकी के कथानक में कौतूहल तथा जिज्ञासा अंत तक बनी रहनी चाहिए।
10. कला पक्ष में एकांकी की स्वाभाविकता और जीवन से निकटता बनाए रखने के लिए संकलनत्रय (थ्री यूनिट्स) का कठोरता से पालन होना चाहिए। एकांकी का आकार छोटा रहे, और अवधि कम रहे, यही अच्छा माना जाता है। उसमें पात्रों के चरित्र अथवा घटना को संक्षेप में प्रकट कर देने की क्षमता होनी चाहिए।
एकांकी के भेद-
रचना- प्रकार या तकनीक के आधार पर- मोनोड्रामा, रेडियो प्ले, फीचर, गीतिनाट्य, ओपेरा, झांकी आदि एकांकी के भेद माने जा सकते हैं।
मूल प्रवृत्ति के आधार पर- समस्या एकांकी, व्याख्यामूलक एकांकी,
विषय वस्तु के आधार पर- सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक, पौराणिक एकांकी आदि एकांकी के अनेक भेद किए जा सकते हैं।
संदेश की दृष्टि से- आदर्शवादी, यथार्थवादी, मनोरंजनवादी, और प्रकृतिवादी एकांकी भी मानी गई है।
रंगमंच है या अभिनेता की दृष्टि से- एकांकी को पठनीय एकांकी और रंगमंचीय एकांकी नामक दो भागों में बांटा जा सकता है।

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