हिंदसा

शनिवार, 25 जुलाई 2015

जीवन की डगर

जीवन की डगर 

हमारा जीवन कभी एक जैसा नहीं रह सकता। जीवन में हमेशा अपने मन की चाही हो जाए, यह कदापि नहीं हो सकता।  जीनव में सुख-दुःख या उतार-चढ़ाव के पल तो आसमान में निरंतर आते-जाते रहने वाले बादलों की तरह होते हैं। देखा जाए तो सुख-दुःख  हमारी क्रियाओं की प्रतिक्रियाओं का नाम है।  जीवन में किसी कार्य के करने से हमें सुख मिल जाता है, तो किसी कार्य को करने से दुःख। लेकिन जब हमें सुख मिलता है तो हम उसका ज्यादा हिसाब-किताब नहीं लगाते और अगर लगाते भी हैं तो उसका पूरा श्रेय अपनी सूझ-बुझ को देते हैं या फिर अपनी अच्छी किस्मत को, लेकिन अगर दुःख  मिलता है तो उसका पूरा हिसाब-किताब लगाया जाता है, उसके लिए अक्सर हम अपने-आप को दोषी कम ही ठहराते हैं और उस दुःख के पैदा होने का दोष हम अपनी फूटी किस्मत को देते हैं या फिर हम अपने किसी निकटतम व्यक्ति को उस दुख का कारण  मान लेते हैं, और अगर कोई भी कारण न मिले तो अंत में पूरा ठीकरा भगवान के सिर पर फोड़ देते है और हम कह देते हैं कि शायद भगवान को यही मंजूर था।.... ऐसा करना मनुष्य का स्वभाव है,  क्योंकि शायद ऐसा करके ही व्यक्ति बड़ी से बड़ी मुसीबत को भी झेल जाता है।  लेकिन विज्ञान की माने तो प्रत्येक कार्य (सुख- दुःख) के पीछे कोई न कोई कारण (हमारा कर्म) अवश्य होता है अर्थात हमने कुछ न कुछ ऐसा  कार्य अवश्य किया था जिससे वो सुख या दुःख पैदा हुआ।
              ये भी सत्य है कि सुख-दुःख की कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती। सुख-दुख हमारे मानने से छोटा-बड़ा होता है। अर्थात कौन, किस छोटी-सी बात को, दुःख मान ले और कौन बड़ी बात को भी दुःख न मान, हंसी में टालकर तनावमुक्त हो जाये, कहा नहीं जा सकता। सही भी है क्योंकि ये जीवन बहुत छोटा है इसलिए हमें सकारात्मक सोच के साथ और सुख की कामना के साथ जीने की कोशिश करनी चाहिए। वर्त्तमान में, आज में, बल्कि इसी एक पल में रहिये, जो मिला है, जैसा मिला है, उसी से संतुष्ट हो जाइये, परेशानी में भी धर्य न खो कर अच्छे समय का इंतजार करना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन को यदि हम नदी के सहज प्रवाह या बहाव की तरह जीवन मे भी कुछ ज्यादा गुना-भाग किये बिना ही बस जीवन की सहज  दिशा में, जिधर वो लेकर जाए बस चलते चले जाए तो जीवन सरल बन जाता है, वरना जीवन की डगर बड़ी कठिन है।


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