हिंदसा

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

सूरदास

सूरदास

सूरदास भक्ति काल की कृष्ण काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। अन्य भक्त कवियों की तरह ही सूरदास के जीवन के बारे में भी विद्वानों के अनेक मत हैं। अनेक विद्वानों ने सूरदास का जन्म संवत 1540 तथा देहावसान संवत् 1620 के आसपास माना है। सूर के जन्म स्थान को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉक्टर श्यामसुंदर दास सूरदास का जन्म स्थान आगरा के निकट 'रूनकता' गांव को मानते हैं| जबकि गोस्वामी हरिराय और डॉक्टर हरवंस लाल शर्मा सूरदास का जन्म स्थान पलवल के निकट 'सीही' नामक ग्राम को मानते हैं। सूर को कुछ विद्वानों ने ब्राह्मण माना है तो कुछ ने किसी और दूसरी जाति का बताया है। लेकिन जाति-पाति में विश्वास न रखने वाले सूर के भक्तों के सामने यह बात अधिक मायने नहीं रखती। सूरदास के अंधे होने को लेकर भी अनेक मत हैं। कुछ लोग सूरदास को जन्म से अंधा मानते हैं तो कुछ का मानना है कि सूरदास जन्म से अंधे नहीं थे बल्कि बाद में अंधे हो गए थे। सूरदास जिस पुष्टिमार्ग की परंपरा से आते हैं वह उन्हें जन्म से अंधा ही मानती है। सूरदास आरंभ में भगवत भक्ति में लीन रहा करते थे। चौरासी वैष्णव की वार्ता के अनुसार आचार्य वल्लभाचार्य ब्रज यात्रा के दौरान गौ घाट पर ठहरे थे, जहां सूरदास ने उनसे मुलाकात की और उनके सामने हरि के पद गाए, माना गया है कि तब वल्लभाचार्य ने उन्हें दीक्षा दी और सूरदास को भगवत लीला का गान करने को कहा। तब से सूरदास ने कृष्ण की लीला का गान करना आरंभ कर दिया।
सूरदास की रचनाओं की संख्या को लेकर भी विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। कुछ विद्वानों ने उनकी रचनाओं की संख्या 25 बताई है, परंतु सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी, उनकी इन तीन रचनाओं को प्रामाणिक रूप से सब ने स्वीकार किया है| इन तीन रचनाओं को उनके यश और गौरव का आधार माना गया है। सूरदास सबसे पहले भक्त कवि हैं बाद में कुछ और। उन्होंने भगवत लीला का गान करते हुए नवधा भक्ति के विभिन्न रूपों जैसे श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, वंदन इत्यादि का वर्णन किया है। सत्य और माधुर्य भाव की भक्ति का रूप भी हमें सूरदास में देखने को मिलता है। राधा और गोपियों का कृष्ण के प्रति एक निष्ठ अनुराग तो सूरसागर की एक मजबूत कड़ी है, सुर का वात्सल्य वर्णन हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। बालमन की अभिरुचियों, शिशु के सौंदर्य और एक माता के हृदय का जो मर्मस्पर्शी चित्र सूरदास ने बाल लीला में खींचा है वह हिंदी साहित्य में ही नहीं बल्कि अन्यत्र भी दुर्लभ है | सूर के वात्सल्य वर्णन में बाल सुलभ चेष्टाओं का अद्भुत चित्रण है एवं बाल मनोविज्ञान के दुर्लभ चित्र मौजूद हैं। जसोदा हरि पालनै झुलावै, मैया, कबहिं बढ़ेगी चोटी आदि पद सूरदास के प्रसिद्ध पद हैं। सूर का श्रृंगार वर्णन भी अत्यंत मनोहारी है।
सूरदास के काव्य में जितनी मधुरता और भावुकता है उतनी ही विविधता भी है। उनके विनय संबंधी पद ,बाल-लीला, और श्रृंगार के पद, वात्सल्य वर्णन कृष्ण काव्य धारा के साथ-साथ हिंदी साहित्य भी की अनमोल निधि है| सूरदास का भ्रमरगीत बेजोड़ है। सूर का काव्य भाव पक्ष के साथ-साथ कला पक्ष की दृष्टि से भी विशिष्ट है| उन्होंने अपने काव्य के लिए ब्रज भाषा को अपनाया। सूरसागर की भाषा ब्रजभाषा है। उन्होंने ब्रजभाषा की तद्भव शब्दावली का अधिक प्रयोग किया है| छंद और संगीत का अद्भुत समन्वय सूरदास के काव्य की अन्यतम विशेषता है| उन्होंने चौपाई, रोला, रूपमाला, हरिगीतिका आदि छंदों का भी अपने काव्य में प्रयोग किया है | चित्रण कला में इतने प्रवीण है कि उन्होंने कृष्ण की बाल लीलाओं, रूप छवि, मुरली माधुरी आदि के अनेक मनोहारी चित्र प्रस्तुत किए हैं| ऐसा चित्रण हिंदी साहित्य में विरल है|

सूरदास के पद

मैया मैं नहीं माखन ...............................................सिव बिरंची नहिं पायौ ||
शब्दार्थ:
सबै =सब, लपटायौ =लपेट देना, भजन=बर्तन, डारि=छोड़कर, सांटी =छड़ी, सिव=शिव , विरंचि=ब्रह्मा
प्रसंग :
प्रस्तुत पद महाकवि सूरदास के द्वारा रचित है। यह पद श्री कृष्ण की बाल-लीला से सम्बंधित है| श्री कृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की लीला सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है| माखन चोरी पर कृष्ण और यशोदा के आपसी संवाद से जुड़ा यह पद बाल मन का बेहद मार्मिक चित्र खींचता है| कान्हा को अपने ही घर में माखन चोरी करते यशोदा मैया ने देख लिया है ,लेकिन श्री कृष्ण बाल सुलभ बहाने बनाकर यह साबित करते हैं कि उन्होंने माखन चोरी नहीं की है| सूरदास जी ने श्री कृष्ण के वाक चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्य कहीं नहीं मिलता |
व्याख्या
गोविन्द यशोदा मैया ने कहते हैं कि हे माता! मैंने माखन नहीं खाया है, ये सब मेरे सखा हैं न ये मेरा मजाक उड़ाना चाहते हैं,और इन ग्वाल बालों ने जबरदस्ती मेरे मुख पर माखन लगा दिया है| कन्हैया फिर कहते हैं कि मैया तू ही देख , तूने यह माखन का मटका छींके पर रखकर कितना ऊंचा लटका रखा है? मेरे छोटे-छोटे हाथ भला उस छींके तक कैसे पहुंच सकते हैं? अर्थात मेरे छोटे-छोटे हाथ उस छींके पर रखे मटके को नहीं उतार सकते| यह कहकर कन्हैया ने मुख से लगा माखन पोंछा और एक दोना जिसमें माखन भरा था, बुद्धिमानी दिखाते हुए उसे अपने पीछे छिपा लिया| कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन में मुस्कुराने लगती है और संटी को एक तरफ फेंककर कन्हैया को अपने ह्रदय से लगा लेती हैं | गोविन्द ने अपने बाल-विनोद के आनंद से मैया यसोदा को मोहित कर लिया और अपनी भक्ति का प्रताप दिखा दिया| सूरदास जी कहते हैं कि यशोदा मैया को जिस सुख की प्राप्ति हुई है वह सुख शिव और ब्रह्मा को भी नसीब नहीं होता|
विशेष :
कृष्ण की बाल मन का सुन्दर चित्रण है
ब्रज भाषा का प्रयोग है
राग रामकली में बद्ध है
मैया मैं , बाल-बिनोद, मोद मन .....अनुप्रास अलंकार
2
उधो, मन ..................................................नहीं जगदीस |

शब्दार्थ:
हुतो = हुआ करता था, भए =हुए , अवराधै = आराधना करना, ईस= निर्गुण ब्रह्म, देही= शरीरधारी, बरिस = वर्ष, सखा= मित्र, जोग के ईस= योग के ज्ञाता |
प्रसंग:
प्रस्तुत पद भ्रमर- गीत प्रसंग का अंश है| श्री कृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियां अत्यधिक व्याकुल हो जाती हैं श्री कृष्ण उद्धव को गोपियों को समझाने के लिए मथुरा भेजते हैं| उद्धव जी गोपियों को योग अर्थात निर्गुण ब्रह्म का संदेश देने मथुरा से गोकुल आए हैं | उद्धव अनेक तरह से गोपियों को समझाते हैं लेकिन भोली-भाली गोपियां सहज भाव से अपने मन की विवशता बताती हैं और उद्धव के सामने श्री कृष्ण के प्रति अपने प्रेम- अनन्यता को प्रकट कर देती हैं |
व्याख्या:
गोपियां उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव हमारे मन दस -बीस तो नहीं है, हमारे पास भी एक ही मन है | दस-बीस मन होते तो हम तुम्हारी बात मान लेते अर्थात एक दूसरे मन से तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म का भी भजन कर लेते, किंतु हमारे पास तो एक ही मन था और वह भी मथुरा जाते हुए कृष्ण के साथ ही चला गया| अब तुम्हारे ईश्वर की आराधना हम किस मन से करें ? कृष्ण के बिना हमारी इंद्रियां भी उसी तरह से शिथिल हो गए हैं जैसे कि सिर के बिना धड़, अर्थात ऐसी स्थिति में शरीर मृत प्राय हो जाता है| गोपियों का विरह प्रतिक्षा जन्य है अभी उसमें निराशा नहीं आई है| जीवन के लक्षण के रूप में हमारी सांस केवल इस आशा में चल रही हैं कि श्री कृष्ण कभी तो मथुरा से अवश्य लौटेंगे और हमें उनके दर्शन हो जाएंगे| शरीर में चलती सांसो से मिलने की आशा लगी हुई है और इस आशा में हम करोड़ों वर्ष तक भी जीवित रह सकती है| हे उद्धव तुम तो मनमोहन श्याम सुंदर की मित्र हो तथा समस्त योग के स्वामी हो, फिर भी इतना नहीं समझते हो कि श्रीकृष्ण के बिना हमारा जगदीश अर्थात ईश्वर दूसरा नहीं है| सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां उससे कह रही है कि हम तुम्हें यह स्पष्ट बता देना चाहते हैं कि नंद जी के पुत्र श्री कृष्ण को छोड़कर हमारा कोई आराध्यम नहीं है हम तो उन्हीं की उपासिका हैं|
गोपियों की अनन्य मना स्थिति अनुकरणीय है जब तक सांस तब तक आज की कहावत चौथी पंक्ति में स्पष्ट है राग धनाश्री में निबंध पद अपनी खेता में अनुपम है व्यक्ति हतप्रभ करने वाली है


विशेष:
प्रस्तुत पद में गोपियों की विरह दशा और श्री कृष्ण के प्रति उनके एक निष्ठ प्रेम का मार्मिक वर्णन है
भाषा सरल सरल और मधुर ब्रज है
श्रृंगार रस है (वियोग)
'सखा श्याम सुंदर के' में अनुप्रास अलंकार है, 'जोग' श्लेष अलंकार है, 'ज्यौं देहि में' उपमा अलंकार है|
गुण माधुर्य है|
शब्द शक्ति व्यंजना है|
जब तक सांस तब तक आज की कहावत चौथी पंक्ति में स्पष्ट है |
राग धनाश्री|
संभावित प्रश्न =
1.सूरदास के काव्य की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए|
2. सूरदास की भक्ति भावना के बारे में लिखिए|
3. सूरदास के वात्सल्य वर्णन पर प्रकाश डालिए|
4. सूरदास के पदों का भावार्थ लिखिए|
5. सूरदास की काव्य भाषा पर प्रकाश डालिए|

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