हिंदसा

सोमवार, 14 अगस्त 2017

रस का स्वरूप-1

  रस का स्वरूप-1
रस सिद्धांत कव्य शस्त्र का प्राचीनतम सिद्धांत है । काव्य शास्त्र में सर्वप्रथम चर्चा रस सिद्धान्त को लेकर ही हुई थी।जो रीतिकाल तक चलती रही। हम देखते हैं  कि भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में जो रस का विशद विवेचन किया है। यह विवेचन दृश्य काव्य के संदर्भ में किया गया है लेकिन आगे के आचार्यों ने विशेष रूप से ध्वनिवादी आचार्य आनंद वर्धन और अभिनव गुप्त ने रस को  दृश्य काव्य के साथ-साथ श्रव्य काव्य के साथ भी रस को जोड़ दिया। और इस तरह से काव्य के संदर्भ में भी रस की चर्चा होने लगी 

 हमें भरतमुनि से लेकर आधुनिक काल तक और यहां तक की पाश्चात्य काव्यशास्त्र में भी रस के स्वरूप  में परिवर्तन के साथ यह परंपरा मिलती है| चाहे वह प्राचीन काव्य शास्त्र हो चाहे आधुनिक कालीन शास्त्र हो,  फिर चाहे वह भावानुभूति की बात करते हो या काव्यानुभूति की बात करते हो तो वह प्रत्यक्ष रूप से या परोक्ष रूप से रस की चर्चा  ही कर रहे होते हैं। भरत मुनि ने पहले ही स्पष्ट रूप में कह दिया था कि रस के बिना काव्य में कुछ भी प्रयोजन संभव नहीं हो सकता।है इसलिए जहां काव्य की चर्चा होती है उसमें  रस का होना जरूरी हो जाता है।

रस के अर्थ, अभिप्राय और  रस का स्वरूप -

सबसे पहले  हम रस के अर्थ  पर बात करते हैं -सामान्य बोलचाल के अर्थ में भी और विशिष्ठ अर्थ में भी।   जब हम रस शब्द के अर्थ को आम बोलचाल में देखते हैं तो वैदिक काल से ही हमें रस शब्द मिलता है, यहाँ  जल के अर्थ में, द्रव के अर्थ में, वीर्य के अर्थ में मिलता है या सार, स्वाद, विष, मधुर, तिक्त आदि षडरस  सोमरस सुरा, शोणित,आयुर्वेद में पारद और परमात्मा के अर्थ में मिलता है। इसी तरह से वहाँ परमात्मा के पर्याय के रूप में भी रस शब्द का प्रचलन रहा है। 

तैत्तिरीयोपनिषद में  कहा गया है - रसो वै स:  अर्थात वह जो परमात्मा है वह रस रूप  है। 

 इस तरह से हम देखते हैं कि वैदिक काल से ही विभिन्न अर्थों में, विभिन्न प्रयोगों में रस शब्द प्रचलित रहा है। 
रस शब्द का प्रयोग हमें मुख्य रूप से दो रूपों में दिखाई देता है- 
 वस्तु रूप में
 जैसे जल है, कोई भी द्रव्य ,तरल पदार्थ हैं  उसके अर्थ में, पेय पदार्थ के लिए रस शब्द का प्रयोग मिलता है ,जैसे कह देते हैं गन्ने का रस, फलों का रस तो किसी का भी रस आदि 
 आस्वाद के रूप में- 
रसनेंद्रिय  के स्वाद के रूप में अर्थात  मुख से जो आस्वाद , आनंद लिया जाता है या  जिसका रसग्रहण किया जाता है उस रूप में, जैसे  मिठाई खाकर, , तीखा पदार्थ खाकर जो दिव्य रसास्वाद  प्राप्त हुआ उस रूप में। और विशेष रूप से मधुर रस के लिए, सोमरस के लिए रस शब्द का प्रयोग मिलता है। और आस्वाद के रूप में जो रस शब्द है वो तो मिलता ही है साथ में भौतिक आनंद के रूप में भी रस शब्द का प्रयोग मिलता है। जैसे भौतिक आनन्द के लिए हम शतरंज , ताश खेल रहे हैं,  उसको खेलते समय कहें कि बड़ा आनंद आ रहा है। संगीत सुनने में बड़ा आनंद आ रहा है कोई नाटक देखने में बड़ा आनंद आ रहा है, कहते हैं बड़ा रस आ रहा है। इस तरह से जो भौतिक और अलौकिक आनंद है उसके लिए भी रस शब्द का प्रयोग आम बोलचाल की भाषा में मिलता है। और केवल रसेंद्रियों  के संदर्भ में नही रस शब्द का प्रयोग नहीं मिलता, बल्कि अन्य इंद्रियों के आनंद के लिए भी रस शब्द का प्रयोग मिलता है। जैसे  श्रवनेद्रियों   के संदर्भ में - कानों से कोई मधुर संगीत सुनते हुए, गीत सुनते हैं कहते हैं कि बड़ा आनंद आ रहा है। इसी तरह से नाक से खुशबु,  अर्थात घ्राण इन्द्रियों,
 नेत्र  या चक्षु इन्द्रियों -आंखों से फूल  को देखकर कहते हैं कि बहुत सुंदर है, बड़ा अच्छा लग रहा है आंखों को आनंद मिल रहा है। त्वचा के  स्पर्श से - कोमल त्वचा को स्पर्श करते हैं तो कहते  हैं कि बड़ा रस मिल रहा है, बड़ा आनंद मिल रहा है,  इस तरह पंच इंद्रियों से जो रस का आस्वादन मिलता है उसको भी रस कहा जाता है।  

काव्य रस
काव्य रस की जब हम बात करते हैं तो काव्य रस और जो इंद्रिय जन्य रस है, उसमें अंतर है। जब काव्य रस की बात कही जाती है अर्थात जब हम किसी  कहानी, नाटक आदि विधाओं में रस की बात करते हैं तो वह उस लौकिक रस या आनंद से भिन्न होता है। यहाँ लौकिक और भौतिक वस्तुओं से प्राप्त इंद्रिय जन्य आनंद से भिन्न अनुभूति की बात की जाती है अर्थात इसको मानसिक आनंद के रूप में कहा गया है, यह जो मानसिक आनंद है, यह मानसिक आनंद लौकिक अनुभूति से भिन्न होता है ,और इस मानसिक आनंद के रूप में काव्य रस का सामान्य स्वरूप वैदिक काल में ही निर्मित हो गया था। और यह जो मानसिक आनंद है जिसे काव्य रस कहा गया है, इस मानसिक आनंद को लेकर या यह जो रसानुभूति होती है , यह आनंदानुभूति होती है, इसका स्वरूप कैसा माने ? यह लौकिक है या अलौकिक है, लोकोत्तर है या रसानुभूति है , वस्तु है या आत्म रूप है, इन सभी बिंदुओं पर काव्य शास्त्रियों ने अपने-अपने विचारों के अनुसार चिंतन किया हैऔर अपने ढंग से इस काव्य रस को परिभाषित करने का प्रयास किया है | सबसे पहला प्रयास भरतमुनि का मिलता है। 
नाट्यशास्त्र में उन्होंने लिखा है-   “विभावानु भाव व्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पति” आगे चलकर भरतमुनि के इसी  रस सूत्र को सभी काव्यशास्त्रियों ने अपने रस के विवेचन का   आधार बनाया है
भरतमुनि कहते हैं कि  विभाव् अनुभाव् और व्यभिचारी, इन के सहयोग से रस की निष्पत्ति होती है|  यहां पर शब्द आया है -विभाव अर्थात कारण , अनुभाव अर्थात कार्य, चेष्टा या व्यापार|  नायक या नायिका जो आश्रय हैं, उस रसाअनुभूति के बाद, कैसे उनकी चेष्टाएँ होती हैं, उनका  क्या कार्य व्यापार होता है, वह अनुभाव होगा और व्यभिचारी अर्थात संचारी भाव जो रसानुभूति  में सहायक कारण बनते हैं अर्थात उसको तेज करने में, उसको बढ़ाने में सहायक होते हैं | यहां स्थाई भाव की बात भरतमुनि नहीं कर रहे हैं|  यहाँ स्थाई भाव शब्द नहीं आया है| उन्होंने बस यहां पर इतना कहा कि विभाव् अनुभाव और व्यभिचारी के सहयोग से रस निष्पत्ति होती है| अब इस रस निष्पत्ति को लेकर आगे आने वाले आचार्य शंकुक , भट्ट  लोलट, भट्ट नायक और अभिनव गुप्त आदि ने विस्तार से चर्चा की है| भरत मुनि ने निम्न दो श्लोक से रस को समझाया  है
                         यथा हि नाना व्यंजनौषधिद्रव्यसंयोगादरसनिष्पत्ति

वे  कहते हैं कि जैसे अनेक प्रकार के व्यंजनों, औषधियों, द्रव्यों  के संयोग से एक रस की निष्पत्ति होती है| जब हम कोई पकवान बनाते है या  कोई भोज्य पदार्थ बनाते हैं तो उसमें हम अनेक व्यंजनों का संयोग करते हैं तो वह सारे पदार्थ मिलकर जो एक व्यंजन बनाते हैं, उससे हमें जो आस्वादन मिलता है, बस उसी प्रकार से नाना भावों के उपगम से अर्थात  नाना भावों के संयोग से काव्य रस की निष्पत्ति होती है| फिर इसी को आगे स्पष्ट करते हुए कहते हैं 
“यथा ही  गुड़आदिभिद्रव्यैव्यंजननैरोषधिभिश्च षाड़वादयो रसा   
निर्वत्यरन्ते, तथा   नाना भावोपगता अपि स्थायिनो भावा 
रसत्व माप्नुवन्तीती|” 
जो पहला  रस सूत्र था उसमें हमने कहा था कि वहां पर भरतमुनि  स्थाई भाव की चर्चा नहीं करते हैं ,अब इसमें स्थाई भाव की बात कर रहे हैं| वे कहते हैं कि स्थाई भाव ही रसत्व को प्राप्त करते हैं, इस बात को वे एक लौकिक दृष्टांत से समझाते हैं ….जैसे गुड़ आदि द्रव्यों से, व्यंजनों से, औषधियों से, षडरस  बनाते हैं, कटु, तिक्त, मधुर, लवन, कसाय आदि जो छ: प्रकार के रस जो बनते है या गुड़ आदि मिलाने से विभिन्न प्रकार के मसाले मिलाने से, जो छ:  रस बनते हैं, उसी प्रकार से नानाभावों के उपगत होने पर , भावों के उत्पन्न होने से जो हमारे स्थाई भाव हैं जैसे रति, हास, शोक आदि, जो हमारे मन के भीतर वासना के रूप में सुप्त अवस्था में रहते हैं,  वे ही इन भावों का संयोग पाकर रस रूप में परिणत होते हैं, अर्थात रसत्व को प्राप्त होते हैं | फिर भरतमुनि कहते हैं-
  रस इति क: पदार्थ: ? 
अर्थात रस् से  किस पदार्थ का कथन  किया जाता है ?       
 उच्यते --  आस्वाद्यत्वात
 अर्थात  आस्वाद्य  होने के कारण रस कहा जाता है|
भरतमुनि ने यहां पर जो  रस को आस्वाद्यत्वात कहा  तो परवर्ती काल में रस को आस्वाद्य रूप माना जाये या आस्वाद्यत्व  है, वह वस्तु रूप है या आत्म रूप है, तो यह भी काव्यशास्त्रियों के बीच  विवाद का विषय बना कि रस आस्वाद्य है या आस्वाद्यत्वात |
कथामास्वाद्यते रस: अर्थात रस का आस्वादन किस प्रकार किया जाये ?
इस पर भरत मुनि कहते है-
“यथा हि नानाव्यन्जन्संस्कृतमन्नं भुंजाना रसानास्वाद्यन्ति सुमनस पुरुषा हर्षादीश्चाधि गच्छन्ति, तथा नाना भावाभिनय व्यनिज्तान वागंगसत्वोपेतान स्थायिभावानास्वादयन्ति सुमनस: प्रेक्षका: हर्षादीश्चाधिगच्छन्ति|” 
अर्थात नाना  अर्थात अनेक प्रकार के  व्यंजनों से पकाए गए, तैयार किए गए भोजन या अन्न  का भोग करते हुए अन्न का आस्वादन करते हुए या अन्न  को खाते हुए, जो रस का आस्वादन प्राप्त करते हैं, और ऐसा आनंद कौन प्राप्त करते हैं- सुमनसा अर्थात अच्छे मन वाला या  स्वस्थ पुरुष, क्योंकि रोगी व्यक्ति के सामने कितना भी स्वादिष्ट भोजन रख दिया जाए वह उसका स्वाद नहीं दे सकता, इसलिए भरतमुनि ने कहा है कि जिस व्यक्ति की मानसिक और  शारीरिक अवस्था ठीक होगी या वह सुमन वाला स्वस्थ पुरुष यदि है तो वह अनेक व्यंजनों से पकाए गए व्यंजन का आस्वादन करके रसास्वादन कर सकता है या रस ले सकता है| स्वस्थ व्यक्ति ही  सुख की, हर्ष की और आनंद की अनुभूति कर सकता है| 
तथा उसी प्रकार से नाना भावों से  और अभिनयों से (यहां नाटक के संदर्भ में उन्होंने रस की विवेचना की है तो इसलिए वे अभिनय की बातें कर रहे हैं|) जो व्यंजित हुआ है | व्यंजित क्या हुआ है? वाक् से यानि मुख से आंगिक चेष्टाएँ और सात्विक चेष्टाओं से युक्त जो स्थाई भाव 
 है उनका आस्वादन करते हैं| कौन  करते हैं - सुमनसा माने स्वस्थ, दर्शकों के लिए प्रेक्षक  कहा है| जो संवेदनशील है, अर्थात जो रसास्वादन को करने में सक्षम है, तो ऐसे प्रेक्षक, ऐसे सामाजिक हैं वे ही   स्थई भावो से रस का आस्वादन करते हैं और उनको क्या प्राप्त होता है? हर्ष आदि को प्राप्त करते हैं| अब जब भरतमुनि ने हर्षादि  शब्द कहा तो हर्ष तो ख़ुशी के लिये आ गया और जो आदि कहा , आदि कहने से प्रवृत्ति काल के काव्य शास्त्रियों में यह चर्चा होने लगी कि रस सुख-दुखआत्मक है रस  की जो अनुभूति है वह सुख में भी होती है और दुख में भी होती है अतः यहां पर फिर 2 बिंदु विचार बिंदु उभर कर आते हैं कि रस पूर्णत: आनंदमय है या सुख दुख आत्मक है|  इस तरह से भरतमुनि में रस निष्पत्ति को लेकर विशद विवेचन किया है |
              भरतमुनि के बाद अभिनव गुप्त आए और उन्होंने रस को परिभाषित किया तो उनके अनुसार लोक व्यवहार में रति आदि भावों के जो कारण, कार्य और सहकार्य होते हैं, वे ही नाटय अथवा  काव्य में विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव कहे जाते हैं. जिनके लिए भरतमुनि ने भावा अनुभव व्यभिचारी कहा था उन्हीं को उसी को परिभाषित करते हुए अभिनव गुप्त ने कहा कि लोक व्यवहार में जिन्हें हम कारण कहते हैं, वही नाटय अथवा  काव्य में विभाव् कहलाते हैं| लोक व्यवहार में जिसे हम कार्य कहते हैं वहीं काव्यशास्त्र में अनुभव के नाम से जाने जाते हैं और जो सहकारी कारण है जो उस आनंद को बढ़ाने वाले हैं, वह सहकारी कारण ही काव्यशास्त्र में व्यभिचारी भाव कहे जाते हैं ,तो काव्य में निबध होने पर इनका  लौकिक स्वरूप नष्ट हो जाता है और वे अलौकिक रूप धारण कर लेते हैं| सामाजिक इन विभाव अनुभाव संचारी भावों का समवेत रूप से प्रत्यक्षीकरण करता है और यह प्रत्यक्षीकरण या चरवाना ही रस है| अब देखिए अभिनव और भरतमुनि के रस की परिभाषा में जो मूल अंतर आया है वह हम देखते हैं कि भरत मुनि ने कहा कि जो स्थाई भाव हैं  वे रसतत्व को प्राप्त करते हैं अभिनव गुप्त यहाँ परिवर्तन के साथ बात कर रहे हैं अभिनवगुप्त ने कहा कि जो विभाव अनुभाव और संचारी भावों का जो एक समवेत रूप है, उन तीनों के मिलने के बाद जो प्रत्यक्षीकरण होता है और वो प्रत्यक्षीकरण जो प्रेक्षक करता है, जो सामाजिक करता है उसको जो रसअनुभूति होती है जिस रस की अनुभूति को वे प्राप्त करते हैं वह अनुभूति या चरवाना  ही रस है , भरत मुनि की जो स्थाई भाव रसत्व को प्राप्त करते हैं उसके स्थान पर अभिनव गुप्त कह रहे हैं कि प्रेक्षक द्वारा जो प्रत्यक्षीकरण किया जाता है वह रस है और वे विभाव अनुभाव और संचारी भाव इनका समवेत रूप है तो अभिनव गुप्त के अनुसार स्थाई भाव आस्वाद का विषय होने से रस न होकर , उसकी प्राप्ति का साधन है| रस , स्मृति , अनुमान, प्रत्यक्ष, अनुभव आदि से भि,न्न अलौकिक होता है ,रस न कार्य है, न  ज्ञाप्य, न सविकल्पक ज्ञान है और न निर्विकल्पक ज्ञान है | रस चरवाना काल में सामाजिक का चित्, देश काल, निज, पर आदि सीमाओं से मुक्त हो जाता है तो रस पूर्णत: आत्म विश्रांति रूप होता है तो अभिनव गुप्त के अनुसार भावों की भूमिका में आत्म परामर्श होने से जो सम्मिलित विश्रांति होती है वही रस है| जो इस तरह से भरतमुनि के अनुसार और अभिनव गुप्त के अनुसार रस के अभिप्राय को लेकर हमने बात की 
अब हम बात करते हैं मम्मट की | मम्मट ने काव्य प्रकाश की रचना की और  भरतमुनि को देखते हुए रस का संक्षिप्त विवेचन किया है उनके अनुसार लोक में रति आदि रूप  स्थाई भावों के जो कारण, कार्य और सहकार्य होते हैं वे यदि काव्य, या नाटक में प्रयुक्त होते हैं तो क्रमशः विभाव अनुभाव और व्यभिचारी भाव कहलाते हैं तथा उन विभावादी से व्यक्त जो रति आदि  स्थाई भाव ही रस कहलाता है तो जो भरतमुनि मान रहे थे कि स्थाई भाव रस त्व को प्राप्त होता हैं तो वही बात मम्मट भी कहते हैं कि रति आदि स्थाई भाव ही रस कहलाता है पर आगे चलकर मम्मट ने अभिनव गुप्त की विचारधारा का ही  पल्लवन किया है| मम्मट का यह विवेचन अत्यंत प्रभावपूर्ण है|  
→ रस 2

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