हिंदसा

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

मंत्र (कहानी) समीक्षा

                                                                                  मंत्र 
 प्रेमचंद हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों में से एक हैं |  हिंदी साहित्य में प्रेमचंद को कहानी सम्राट के नाम से विभूषित किया जाता है| उन्होंने लगभग 300 कहानियों की रचना की है| प्रेमचंद ने इस क्षेत्र में प्रवेश करते ही एक नए युग का प्रारंभ किया|   प्रेमचंद ने मानव जीवन के अनेक पहलुओं को आधार बनाकर ईदगाह, पंच-परमेश्वर, बूढी काकी, बेटो वाली विधवा, कफ़न आदि  अनेक मार्मिक कहानियों की रचना की है| उनकी 'मंत्र' नामक कहानी भी अत्यंत मार्मिक एवं प्रभावशाली कहानी है, दूसरी कहानियों की भांति इस कहानी में भी उन्होंने मानव स्वभाव का सजीव चित्रण  किया है | इस कहानी में प्रेमचंद बताना चाहते हैं कि ग्राम और नगर तथा स्वार्थ और सेवा में कितना अंतर है?

कथासार-
 मंत्र कहानी का प्रारंभ अत्यंत मर्मस्पर्शी घटना द्वारा होता है| कहानी का मुख्य पात्र भगत है, उसका सातवां और अंतिम पुत्र मृत्यु शैया पर है, वह स्थानीय डॉक्टर चड्ढा के पास अपने पुत्र के इलाज हेतु आता है लेकिन डॉ. चड्ढा का वह वक्त मरीजों के देखने का नहीं होता बल्कि मनोविनोद का होता है इसलिए वह उस समय  बच्चे को देखने से इंकार कर देता है| भगत डॉक्टर चड्ढा  से बहुत अनुनय-विनय करते हुए कहता है कि वे केवल एक नजर उसके पुत्र को देख भर ले, किंतु डॉ. चड्ढा अपने मनोविनोद  में कोई खलल नहीं डालना चाहता और उसका मनोविनोद एक गरीब के प्राणों से अधिक मूल्यवान है| भगत निराश होकर लौट आता है और उसी रात्रि उसका पुत्र प्राण त्याग देता है। 
                                       कथानक  का विकास डॉ. चड्ढा व उसके परिवार के परिचय द्वारा होता है, उनका पुत्र कैलाश, जो सर्पों के पालने में विशेष रुचि रखता है, अपने जन्मदिवस पर सांपों का प्रदर्शन करते हुए उन में से किसी एक क्रोधित सांप द्वारा डसा जाता है, कथानक की चरम स्थिति अत्यंत हृदयस्पर्शी तब बनती है जब  कैलाश के बचने की आशा टूट जाती है और डॉक्टर के घर में कोहराम मच जाता है| तभी भगत को इसकी सूचना मिलती है, उसके मन में अंतर्द्वंद होता है कि वह डॉक्टर के पुत्र के प्राण की रक्षा करें या उसे देखने से उसी प्रकार इंकार कर दे जैसे कि डॉक्टर ने उसके बेटे को देखने से इंकार किया था| अंततः उसकी कर्तव्य भावना जागृत होती है और वह मंत्र के प्रभाव से कैलाश के प्राण बचाता है। वह धन या सम्मान की तनिक भी इच्छा नहीं रखता और चुपचाप लौट जाता है,  इस प्रकार कहानी एक आदर्शवादी प्रभाव छोड़ती हुई समाप्त हो जाती है|  
                       मंत्र कहानी का कथानक यद्यपि अनेक वर्षों की अवधि में फैला हुआ है,  किंतु इसमें मुख्य घटनाएं दो - तीन हैं,  बूढ़े भगत का डॉक्टर चड्ढा के घर से निराश लौटना, कैलाश का सांप के काटने से मूर्छित होना और भगत द्वारा उसे बचाया जाना, ये घटनाएं भिन्न होते हुए भी एक विशेष भावना के सूत्र  से परस्पर जुड़ी हुई हैं , कथावस्तु में रोचकता आदि से अंत तक बनी रही है| प्रारंभ में बूढ़े भगत के पुत्र की मृत्यु हमारे मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न करती है कि अब क्या होगा? पुनः कैलाश द्वारा सांप का खेल दिखाए जाने पर पाठकों के मन में एक नया कुतूहल जागता है, सांप द्वारा कैलाश के डसे जाने पर कुतूहल और भी तीव्र हो जाता है, अंत में बूढ़े भगत की सह्रदयता सभी शंकाओं का समाधान कर देती है। 
पात्र तथा चरित्र चित्रण-
प्रेमचंद की कहानियां चरित्र प्रधान हैं। उनके पात्र यथार्थ जगत के हैं। वे अति मानव न होकर सामान्य मानव होते हैं। उनके पात्र यथार्थ से आदर्श की ओर बढ़ते हैं, सफल कहानी में पात्रों की संख्या अधिक नहीं होती। यद्यपि इस कहानी में अनेक पात्र जैसे- बूढा भगत, बुढ़िया, डॉ. चड्डा, उसकी पत्नी, कैलाश मृणालिनी, मित्रगण, चौकीदार आदि  हैं लेकिन भगत का चरित्र ही इस कहानी का प्राण है। शेष पात्रों के चरित्र तो बूढ़े के चरित्र को उज्ज्वल बनाने के लिए ही चित्रित किए गए हैं। सभी पात्रों का स्वभाव और व्यक्तित्व अपने आप में विलक्षण है। बूढा भगत सीमा से अधिक भावुक, सहृदय और कर्तव्यशील है। डॉक्टर चड्ढा समय की पाबंदी के सामने मनुष्य को भी भुला देता है। कैलाश एक आधुनिक युग का युवक होते हुए भी सांप पालने का विचित्र शौक रखता है। इस कहानी की यह प्रमुख विशेषता है कि सभी पात्रों का चरित्र विभिन्न घटनाओं, स्थितियों और संवादों द्वारा अपने आप ही स्वस्थ होता चला जाता है।
 कथोपकथन
 लेखक ने पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालने, कथानक को अग्रसर करने तथा एकरसता को मिटाकर उसमें सजीवता उत्पन्न करने के लिए संवादों की योजना की है। आरंभ में ही बूढ़े भगत और डॉक्टर चड्ढा का संवाद दोनों के स्वभाव के अंतर को स्पष्ट कर देता है-
 "डॉक्टर साहब ने चिक के अंदर से गरजकर कहा- "कौन है? क्या चाहता है?
बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा- "हजूर बड़ा गरीब आदमी हूं। मेरा लड़का कई दिन से.....
 डॉक्टर साहब ने सिगार जलाकर कहा-  "कल सवेरे आओ, कल सवेरे,  हम इस वक्त मरीज को नहीं देखते।
     इसी प्रकार मृणालिनी, कैलाश और उसके मित्रों का, बूढ़े और बुढ़िया का, आगंतुक और बूढ़े का, चौकीदार और बूढ़े,  के संवाद भी विशेष प्रभावशाली हैं। इन संवादों की स्वाभाविकता और संक्षिप्तता प्रशसनीय है तथा ये संवाद परिस्थितियों के अनुकूल हैं।
 देश काल और वातावरण 
वातावरण के चित्रण में प्रेमचंद कुशल हैं। 'मंत्र' कहानी हमारे समाज के ग्रामीण और शहरी वर्गों से संबंधित है तथा लेखक ने इन दोनों वर्गों का चित्रण पूरी सजगता से किया है| देहाती जीवन से प्रेमचंद का व्यक्तिगत और अंतरंग परिचय है। अतः वे वहां के यथार्थ जीवन की ऐसी झांकी प्रस्तुत करते हैं जिससे वहां का चित्र साकार होता है। उदाहरण के लिए "शहर से कई मील दूर एक छोटे से घर में एक बुड्ढा और बुढ़िया अंगीठी के सामने बैठे जाड़े की रात काट रहे थे। बूढ़ा नारियल पीता था और बीच-बीच में खाँसता, बुढ़िया दोनों घुटनों में सिर डाले आग की ओर ताक रही थी।"
  इसी प्रकार डॉक्टर चड्ढा के शहरी जीवन का भी यथार्थ वर्णन किया है। जैसे-  "संध्या का समय था। हरी-हरी घास पर कुर्सियां बिछी हुई थी। शहर के रईस और हुक्काम एक तरफ और कालेज के छात्र दूसरी तरफ बैठे भोजन कर रहे थे।"  यहां लेखक ने शहरी ढंग की पार्टी का वर्णन, समय, स्थान और साज-सज्जा सहित कर दिया है।
 भाषा शैली-
 प्रस्तुत कहानी वर्णनात्मक शैली में लिखी गई है। कहानी की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा प्रवाहमयी है। प्रेमचंद ने इसमें पात्रों एवं स्थिति के अनुकूल बोलचाल के व्यवहारिक शब्दों का प्रयोग किया है। गांव और शहर के लोग आपस की बातचीत में, जैसी भाषा बोलते हैं उसे बिना किसी बनावटीपन के इस कहानी में देख सकते हैं| खड़ी बोली के साथ साथ उर्दू-अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग किया गया है जैसे मिनट, मोटर, हजूर, मरज, सिंगार आदि। मुहावरों और लोकोक्तियों के सुरुचिपूर्ण प्रयोग द्वारा कहानी में सजीवता और प्रवाह आ गया है जैसे हजारों रुपए फूक चुकाना, अक्ल पर पत्थर पड़ गया था, नहीं वो ऐसा पागल नही हूँ कि जो मुझे काँटे बोवे उसके लिए फूल बोता फिरूँ। कहीँ कहीं अलंकारों का भी अनायास प्रयोग हो गया है- जैसे उसे मालूम हो रहा था उसकी कोई चीज खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए हैं, या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है आदि।
उद्देश्य-
प्रेमचंद की प्रत्येक कहानी किसी न किसी आदर्श को सामने उपस्थित करती है। इस कहानी के माध्यम से भी लेखक ने स्पष्ट किया है कि मानव की महानता मानव सेवा में है। प्रायः नगरों के गुणी और धनी लोग कठोर हो जाते हैं। वे गरीब और ग्रामीण लोगों की ओर ध्यान ही नहीं देते। उन्हें समय की पाबंदी, समय पर खेलना आदि मानवता से अधिक प्रिय हैं। इसके विपरीत दरिद्र, अभाव ग्रस्त और अनपड़ ग्रामीणों में मनुष्यता का उज्ज्वल प्रकाश सुरक्षित है। किसी मनुष्य के दुःख दर्द को सुनकर वे अनायास ही उसकी सहायता को तत्पर हो जाते हैं ईर्ष्या द्वेष अथवा प्रतिशोध की अग्नि भी उनकी मानवता के शीतल जल से शांत जाती है।
शीर्षक की सार्थकता-
कहानी का शीर्षक मंत्र संक्षिप्त, सार्थक एवं कहानी की मुख्य घटना से संबंधित है। वस्तुतः प्रेमचंद की 'मंत्र' कहानी एक श्रेष्ठ कहानी है। जिसमें मानव स्वभाव का यथार्थ चित्रण है। इस कहानी में प्रेमचंद की कहानी कला का उच्चतम रूप दिखाई देता है। 

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