हिंदसा

रविवार, 29 नवंबर 2020

वापसी कहानी, विष्णु प्रभाकर

                                                              वापसी (कहानी)

- विष्णुप्रभाकर


वापसी विष्णुप्रभाकर की प्रमुख कहानी है। लेखक ने कहानी में ग्रामीण क्षेत्र की माली अर्थव्यवस्था, विधवा स्त्री की विवशता, एक परिवार में गरीबी और पारिवारिक संबंधों से उपजे दुख को उजागर किया है। लेखक ने कहानी में यह भी दिखाने की कोशिश की है कि ये परिस्थितियां बालक के बाल मन पर कितना बुरा प्रभाव डालती हैं? ऐसे समाज में जन्मा नन्हा बालक जो अपने पिता की बातों पर अटूट विश्वास रख अपने आप को बड़ा समझ कर मां की जिम्मेदारी अपने नन्हें कंधों पर उठाने का साहस रखता है। उस बालक के मष्तिष्क में पनपा विकार उसे बड़ा होने पर भी बार- बार उद्वेलित करता रहता है। बालमन में उपजी नफरत उसे अपराधी बनने पर मजबूर कर देती है। इस कहानी के कथानक का विकास चार चरणों में होता है। पहला चरण है - प्रारंभ अर्थात रामसिंह के पिता की मृत्यु और माँ का चाचा के घर जाना , दूसरा चरण है- विकास अर्थात रामसिंह का घर से भागकर मुंबई जाना , तीसरा है- चरम अर्थात रामसिंह का वापिस गांव आकर आग में कूदकर बालकों को निकालकर लाना और चौथा और अंतिम चरण है- कहानी का अंत जब रामसिंह के मुँह से माँ शब्द निकलता है। कहानी का अंत दुखात्मक है। लेकिन कहानी यथार्थवादी है । कहानी के अंत में लेखक पाठक पर छोड़ देता है कि वह स्वयं अपने विवेक से सही और गलत का निर्णय ले। कहानी का मुख्य पात्र एक गरीब परिवार में जन्मा रामसिंह है जो गांव में ही एकमात्र पक्के मकान में रहने वाले और उनकी गरीबी का फायदा उठाकर उसकी मां को अपने साथ रहने के लिए एक तरह से मजबूर करने वाले, अपने सगे चाचा से बदला लेना चाहता है। कहानी में लेखक ने आधुनिक कहानियों के लेखन की नई शैली फ्लैश बैक तकनीक का प्रयोग किया है। कहानी की कथा संक्षेप में इस प्रकार है-

राम सिंह बचपन में शांत स्वभाव का 6 या 7 साल का बच्चा था लेकिन जीवन मे आने वाली विपरीत परिस्थितियां उसे उग्र स्वभाव का बालक बना देती हैं । हुआ यूं कि रामसिंह जब छोटा था तो वह अपने माता - पिता के साथ अपने पैतृक गांव में रहता था। उसके गांव में सिंचाई हेतु पानी न होने के कारण खेती लगभग न के बराबर होती थी। पूरा गांव गरीबी में जीवन भसर करता था । लोग कच्चे मकानों में रहते थे। राम सिंह के पिता , जो उसे बहुत प्यार करते थे वे भी गांव के दूसरे लोगों की तरह ही गरीब थे। गरीबी के कारण और ऊपर से सर्दी के कारण उसके पिता की असमय मृत्यु हो जाती है। राम सिंह के चाचा, जो किसानी के साथ-साथ ब्याज-बट्टा भी करते थे और गांव के खलियान में ही पक्का मकान बनाकर रहते थे। जब राम सिंह के पिता बीमार थे तो वह कभी भी उनकी मदद करने के लिए नहीं आए। लेकिन जब उसके पिता की मृत्यु हो जाती है तो उसके चाचा उसके घर बार बार आने लगते हैं और मां से बात करने लगते हैं। शुरू शुरू में मां चाचा से लड़ती भी है उसको झिड़कती भी है। लेकिन महीनों तक उसके चाचा उसके घर बार-बार आते रहे। घर को चलाने में असमर्थ, गरीब मां और विधवा स्त्री क्या करती आखिरकार वही हुआ जो चाचा चाहते थे। एक दिन वह राम सिंह को कहती है- क्यों रे रामू! तू चाचा के घर चलेगा? रामू समझा नहीं । मां ने फिर प्यार से समझाया- 'अरे वही अपने चाचा! उनके घर चलेगा? अपने चाचा के घर! मां ने हकलाते हुए कहा - अब हम वहीं रहेंगे। लेकिन राम सिंह चाचा के घर बिल्कुल नहीं जाना चाहता। वह जाने से सख्त मना कर देता है क्योंकि वह जानता है कि उसका चाचा अच्छा आदमी नहीं है । अगर वह उनका हितैषी होता तो गरीबी में उसके पिता की मदद करता और उसके पिता को गरीबी के कारण मरने न देता। रामू जानता है कि वह अपने स्वार्थ के कारण उसकी मां से बात करता है। ऐसे में उसे अपने बापू की याद आती है। उसे याद आता है कि उसके बापू उसे बहुत प्यार करते थे। उसके मस्तिष्क में बार-बार उसके पिता के कहे हुए शब्द गूंजने लगते हैं। वे उसको कंधे पर बिठाकर कहते थे कि रामू जब बड़ा होगा तो यहां रेत नहीं उड़ेगी, कहत नहीं पड़ेंगे, यहां नहर आ जाएगी, खूब पानी होगा, खूब अनाज होगा, हम खूब मालामाल हो जाएंगे। पिता मि कही गई बातों को याद करके राम सिंह अपनी मां को चाचा के घर जाने से मना करता है वह उसको विश्वास दिलाता है कि वह अब बड़ा हो रहा है इसलिए बापू नहीं रहे तो क्या हुआ वह तो है, और वह सब संभाल लेगा लेकिन मां जानती है कि रामसिंह अभी बहुत छोटा है , जब तक वह बड़ा होगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। तब तक वे मां- बेटा भूखे मर जाएंगे और खत्म हो जाएंगे । अंततः एक दिन मां रामसिंह को लेकर चाचा के घर चली जाती है , लेकिन वह अपने चाचा को पिता के रूप में वह कभी स्वीकार नहीं कर पाया। यहां तक कि एक बार वह अपने चाचा को पीटता भी है। कुछ दिनों के पश्चात चाचा से मां की गोद में एक बालक आ जाता है , यह बालक राम सिंह को नहीं सुहाता था और वह उसे पीटता था। यहां तक कि उसे मिटा देना चाहता था। इसी कारण कई बार मां भी उसे मारती थी। उसे लगा कि चाचा ने उसकी मां को उससे छीन लिया।जब धीरे-धीरे मां उससे दूर होती गई तो एक दिन वह मां और चाचा के घर को छोड़कर मुंबई भाग जाता है लेकिन वहां भी राम सिंह का मन शांत नहीं होता और मन ही मन ठान लेता है कि बड़ा होकर अपने चाचा को मार डालेगा। वह एक छुरा खरीदता है और उसे संभालकर तकिए के नीचे रख लेता है। आठ साल बाद वह चाचा को मारने के लिए वापस अपने गांव आता है। क्योंकि चाचा के कारण मां उससे दूर हो गई थी, वह अनाथ हो गया था, वह बेघर हो गया था , वह अपनी मां को कभी भूल नहीं पाया क्योंकि वह अपनी मां से भी बहुत प्यार करता था उसे परदेश में भी अपनी माँ की बार बार याद आती थी , लेकिन जब माँ का चाचा के साथ चले जाने की बात याद आती है तो वह दुखी हो जाता है और उसका अंतर्मन कह उठता है - माँ तू मर क्यों नहीं गई। उसका अंतर्मन बार-बार उसे अपने अतीत को भुलाने के लिए कहता है, लेकिन वह अपने अतीत को भुला नहीं पाता और चाचा को मारने के लिए गांव की ओर चल पड़ता है।
जब वह गांव में पहुंचता है तो देखता है कि गांव अब पहले जैसा नहीं रहा। गांव में पानी आ गया है, नहर आ गई है और खूब फसल हो रही है , अब गांव में उसका कड़वा व्यतीत नहीं था बल्कि आनंद था जो थकान उतारता है और तन मन सहलाता है। वह एक बार फिर अपने अतीत को भूलकर फिर से जिंदगी जीना चाहता है, उसे फिर से अपने पिता के कहे हुए शब्द याद आने लगे। वही परिचित प्यार भरा स्वर , "रामू जब बड़ा होगा तो यहां रेत नहीं उड़ेगी, कहत नहीं पड़ेगी, यहां नहर आ जाएगी, खूब पानी होगा, खूब अनाज होगा, हम खूब मालामाल हो जाएंगे .... यह शब्द बार-बार उसके मस्तिष्क में घूमने लगे ...लेकिन उसे फिर याद आता है कि वह अपने चाचा को मारने आया है और वह उसे मारेगा वह भी अपने चाचा और उसके परिवार को दर-दर का भिखारी बना देगा। यह सब सोचते हुए वह गांव के पास पहुँच गया
उसका गांव पेड़ों के उस पार छिपा हुआ था। उसके मस्तिष्क में वही अतीत के चित्र उभरने लगे, वह सोचने लगा कि शायद सब लोग सो गए होंगे , शायद मर्द अभी बैठे हुक्का पी रहे होंगे, शायद चाचा भी वही हो, शायद माँ भी जाग रही हो ...यह सब फुसफुसाते हुए वह आगे बढ़ रहा था। गांव के तालाब के पास पहुंचते ही कुत्तों के भौंकने की आवाज आने लगी। उसने देखा कि गांव में धुआं उठ रहा है और कहीं आग लगी है। शायद आग खलियान में लगी है जब वह आग के पास पहुंचता है तो उसने देखा कि आग खलियान में नहीं बल्कि गांव के एकमात्र पक्के मकान में अर्थात उसके चाचा के घर आग लगी हुई है। उसने देखा कि एक व्यक्ति दबे पांव खलियान की ओर जाकर कुछ फेंकना चाहता है, हालांकि लेखक ने यहाँ कहानी में थोड़ी अस्पष्टता दिखाई है लेकिन पाठक समझ जाता है कि यह कोई और नहीं बल्कि उसका चाचा ही था,राम सिंह उसे पकड़ लेता है और कुछ क्षणों में उसकी जांघ में छुरा घोंप कर उसे वहीं ढेर कर देता है और उसके बाद वह उसी आवेश में जलते हुए मकान की ओर भागता है। आग की लपटे मकान के बीच में से इधर से उधर लपलपाती हुई ऊपर की ओर उठ रही थी। आसपास के लोग पानी, रेत , मिट्टी जो भी मिल रहा था आग पर फेंक रहे थे , राम सिंह ने बिना घबराए हुए आग के अंदर प्रवेश किया । कुछ देर बाद दरवाजा खुला और माँ के साथ साथ रामसिंह दो संज्ञाहीन बालकों को छाती से चिपका कर आग से बाहर आया। उसने बालकों को मां के समीप धरती पर लेटा दिया और खुद भी पछाड़ खाकर वही मां के चरणों में गिर पड़ा और गिरते-गिरते उसके मुंह से मां शब्द निकला। यह माँ शब्द सब सुनने वालों के कानों में गूंजता है । इस तरह रामसिंह अपनी मां से अलग होकर भी अलग नहीं हुआ था वह माँ के निर्णय को बर्दाश्त नहीं कर पाया। कहानी का अंतिम भाग बताता है कि राम सिंह ऊपर से उग्र स्वभाव का दिखने वाला अंदर से बहुत ही कोमल हृदय वाला था। वह अपनी जान पर खेलकर मां और बच्चों को बचाने के लिए आग में कूद पड़ता है। उसके मन मे नफरत बस अपने चाचा के लिए थी क्योंकि वह जानता था कि उसका चाचा भला मानुष नहीं है इसलिए वह माँ को चाचा के घर जाने से मना करता है। मां का चाचा के घर जाना उसका बाल मन भुला नहीं पाया। परिणामस्वरूप मां का चाचा के घर जाने से अंत मे किसी का भी भला नहीं हो पाया न चाचा का, न रामसिंह का , न ही उसकी माँ का और न ही चाचा के बच्चों का , अर्थात सब खत्म हो गया ।
कहानी खड़ी बोली में लिखी गई है, अध्ययन के उपरांत पता चलता है कि भाषा प्रभावपूर्ण, प्रवाहमयी और सरल है । लेखक ग्रामीण परिवेश को व्यक्त करने में पूरी तरह से सफल रहा है। कहानी पढ़ते-पढ़ते पाठक की आँखों के सामने खेत खलियान, कच्चे मकान के चित्र अंकित होने लगते हैं। कुत्तों के भौंकने में श्रव्य बिम्ब, आग लगने के दृश्य में चक्षु बिम्ब भाषा को सार्थक बनाते हैं । साथ ही फ्लैश बैक तकनीक, सटीक वाक्य संरचना और सार्थक शब्दों के चयन से कहानी शुरू से लेकर अंत तक पाठक को बांधे रखती है।

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