हिंदसा

सोमवार, 30 नवंबर 2020

हिंदी का आरंभिक रूप तिड

                                                         हिंदी का आरंभिक रूप

हिंदी के आरंभिक रूप से तात्पर्य उस भाषा रूप से है जससे हम हिंदी का आरंभ मान सकते हैं। यहां हिंदी के आरंभ का अर्थ किसी समय सीमा से ना होकर अपभ्रंश के उस परिवर्तित रूप से है जिससे हम हिंदी का आरंभ मान सकते हैं। जैसाकि परवर्ती अध्ययन से पता चलता है कि हिंदी का जन्म अपभ्रंश से हुआ है। अत: आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक का समय वो समय है जब अपभ्रंश की साहित्यिक भाषा जन सामान्य की भाषा के निकट आने लगी थी| इस समय की रचनाओं में अपभ्रंश का जो बदला हुआ रूप मिलता है, उसको हिंदी का आरम्भिक रूप कहा जा सकता है। ये भी सत्य है कि इस समय की कुछ रचनाएँ अपभ्रंश के निकट तो कुछ पुरानी हिंदी के निकट प्रतीत होती हैं और जो रचनाएं मिलती हैं, उनमें से अधिकतर की प्रामाणिकता भी सन्दिग्ध है।
  

अपभ्रंश शब्द का प्रयोग-
अपभ्रंश शब्द का प्रयोग छठी शताब्दी की रचनाओं में मिलता है। संस्कृत के प्रसिद्ध अलंकारवादी आचार्य भामह ने भी अपने ग्रंथ काव्यालंकार में भी अपभ्रंश शब्द का उल्लेख किया है। इस ग्रंथ की रचना भी छठी शताब्दी में ही हुई थी। साथ ही इसी शताब्दी में दंडी ने काव्यादर्श में भी अपभ्रंश भाषा के साहित्य की बात की है। अपभ्रंश भाषा के क्षेत्र को लेकर विद्वानों का मत है कि अपभ्रंश में "देश के विभिन्न भागों में गुजरात से लेकर गौड़ और कलिंग तक का क्षेत्र शामिल था, जिसमें अनेक भाषाएं बोली जाती थीं, उन्हीं का सामूहिक नाम अपभ्रंश था। विद्वानों ने अपभ्रंश के पश्चिमी और पूर्वी भेद किए हैं क्योंकि पश्चिमी और पूर्वी भारत में रचित साहित्य की भाषा में पर्याप्त अंतर है।
आठवीं शताब्दी में जैन कवि स्वयंभू की रचनाओं में अपभ्रंश भाषा का प्रयोग मिलता है, उसके बाद सरहपा, शबरपा आदि सिद्धों की रचनाएं भी अपभ्रंश में मिलती हैं। दसवीं शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी तक अपभ्रंश साहित्य उपलब्ध होता है। आठवीं शताब्दी से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी तक आते-आते अपभ्रंश भाषा के परिवर्तित रूप के लिए अवहत्थ, अवहंस, देशी भाषा, अवहट्ठ आदि शब्द प्रचलन में आए। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे, उन्होंने अपभ्रंश को पुरानी हिंदी कहा है | चन्द्रधर शर्मा गुलेरी विक्रम की सातवीं से ग्याहरवीं शताब्दी तक की भाषा को अपभ्रंश और उसके बाद वाली अपभ्रंश को पुरानी हिंदी माना है। उनका मानना है कि यही वो समय था जब अपभ्रंश पुरानी हिंदी में परिणत हो गई थी।
गुलेरी जी के अनुसार पुरानी हिंदी में देशी शब्दों की प्रधानता हो गई थी , विभक्तियों में परिवर्तन आ गया था , वे घिस गई थी, एक कारक की विभक्ति कई कारकों की विभक्ति बन गई थी। गुलेरी जी ने माना है कि पुरानी अपभ्रंश, संस्कृत और प्राकृत से मिलती है और परवर्ती अपभ्रंश यानी बाद वाली अपभ्रंश पुरानी हिंदी से मिलती है| उन्होंने कहा है कि अपभ्रंश कहां समाप्त होती है और पुरानी हिंदी कहां आरंभ होती है, इस बात का निर्णय करना बहुत कठिन है| इसलिए अपभ्रंश और पुरानी हिंदी को अलग करने के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा नहीं बताई जा सकती| कुछ उदाहरण ऐसे हैं जिन्हें अपभ्रंश भी कह सकते हैं और पुरानी हिंदी भी कह सकते हैं। गुलेरी जी ने पुरानी हिंदी का जो स्वरूप बताया है, वह सिद्ध कवियों की भाषा में मिलता हैं| इसलिए सरहपा को हिंदी का पहला कवि माना गया है|
गुलेरी जी ने 11 वीं शताब्दी तक की अपभ्रंश को अपभ्रंश भाषा माना है, परंतु जैसाकि हम देख चुके हैं, आठवीं शताब्दी तक सिर्फ स्वयंभू और सरहपा जोकि सिद्ध कवि थे, उनकी रचनाएं अपभ्रंश में मिलती हैं| जहाँ तक जैन कवियों की बात है तो उनमे से केवल देवसेन, पुष्पदंत, नयनंदी ही इस समय सीमा में आते हैं| अतः मात्र तीन चार कवियों के आधार पर तत्कालीन भाषा (अपभ्रंश) को और पुरानी हिंदी को अलग रखना उचित नहीं जान पड़ता है| अत: इस आधार पर वह भी पुरानी हिंदी ही सिद्ध होती है |
राहुल सांकृत्यायन ने भी अपभ्रंश को हिंदी ही माना है, वे लिखते हैं - "वह (अपभ्रंश) उससे भी कहीं अधिक हिंदी भाषा है जितनी की आज की मालवी, मारवाड़ी, मल्ली (भोजपुरी) और मैथिली|" गुलेरी जी और राहुल सांकृत्यायन ने लगभग एक ही बात कही थी| अंतर मात्र यह है कि राहुल सांकृत्यायन ने उसे हिंदी कहा है और गुलेरी जी ने उसे पुरानी हिंदी कहा है|
राहुल जी ने अपभ्रंश को संस्कृत, पाली और प्राकृत से भिन्न माना है| उनके अनुसार पालि और प्राकृत प्रायः संस्कृत के नजदीक है पर अपभ्रंश को लेकर ऐसा नहीं कहा जा सकता | वे लिखते हैं -"यहां आकर भाषा में असाधारण परिवर्तन हो गया| इसका ढांचा ही बिल्कुल बदल गया| उसने नए सुबन्तों, तिङन्तों की सृष्टि की और ऐसी सृष्टि की है जिससे वह हिंदी से अभिन्न हो गई है|
साहित्यिक भाषा या बोलचाल की भाषा में अंतर होता है| अपभ्रंश और पुरानी हिंदी के प्रारंभ में भी रहा होगा लेकिन चौदहवीं शताब्दी के अंत तक जनसामान्य की भाषा का कोई रूप और उसके क्षेत्र का कोई परिचय हमें उपलब्ध नहीं होता , हो सकता है इसी को देसी भाषा कहा गया होगा| छठी शताब्दी के आसपास उसमें साहित्य रचना भी प्रारंभ हुई होगी पर वह आज उपलब्ध नहीं है| संभव है कि इस साहित्यिक भाषा को अपभ्रंश नाम दे दिया गया हो यदयपि सरहपा और स्वयंभू दोनों में से किसी ने भी अपनी भाषा को अपभ्रंश नहीं कहा, यह भी निश्चित है कि तत्कालीन अपभ्रंश संस्कृत, पालि, प्राकृत की अपेक्षा जनसामान्य के निकट थी और संभवत: तत्कालीन कवियों ने स्थानीय प्रयोगों को महत्व देते हुए ‍‌‌इन्हीं भाषा शैलियों को अपना लिया होगा पर 11वीं 12वीं शताब्दी तक आते-आते यह साहित्यिक अपभ्रंश प्राकृत के प्रभाव को कम करती हुई जनसामान्य के निकट आने लगी| ऐसी स्थिति में यही उचित प्रतीत होता है कि पूर्ववर्ती अपभ्रंश, परवर्ती अपभ्रंश आदि अलग-अलग नाम देने के स्थान पर संपूर्ण अपभ्रंश भाषा को हिंदी कहना चाहिए और अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य|
एक अन्य पारिभाषिक पद "प्रारंभिक हिंदी" भी देखने में आ रहा है| इस संबंध में गोपाल राय लिखते हैं- "इसका कारण है संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में हिंदी के पाठ्यक्रम में अर्ली हिंदी अंग्रेजी पद का प्रयोग| हिंदी में इसका अनुवाद प्रारंभिक हिंदी तो सटीक है पर कभी-कभी पुरानी हिंदी और प्रारंभिक हिंदी का पर्यायवाची पदों के रूप में प्रयोग होता है, जिससे भ्रम पैदा होता है| वस्तुतः पुरानी हिंदी पद अपभ्रंश (10 वीं शताब्दी के बाद की अपभ्रंश) का द्योतक है| प्रारंभिक हिंदी पद अब तक सुपरिभाषित नहीं है, प्रारंभिक हिंदी के अंतर्गत 1450 ईसवी के पूर्व रचित अवधी, ब्रज भाषा, खड़ी बोली, मैथिली और पिंगल की रचनाएं रखी जानी चाहिए| इस प्रकार की पहली रचना ग्यारहवीं शताब्दी में रचित 'रोडा' कृत 'राउरबेल' है जिसमें अवधी और टक्की (आधुनिक खड़ी बोली) में काव्य रचना के प्रथम उदाहरण मिलते हैं, खड़ी बोली में काव्य रचना के प्रारंभिक प्रयास शेख फरीद शकर गंज (1173 से 1265 ईस्वी) अमीर खुसरो (1253 से 1325) में, महाराष्ट्र के दामोदर पंडित, संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर और गोंडा बाई तथा प्रसिद्ध सूफी संत शेख सरफुद्दीन अली कलंदर आदि की रचनाओं में देखे जा सकते हैं| पर भाषा की दृष्टि से इन रचनाओं की प्रामाणिकता संदिग्ध है| दक्षिणी हिंदी के प्रथम कवि सूफी संत ख्वाजा बंदा नवाज गेसूदराज की रचनाएं की प्रारंभिक हिंदी की उदाहरण मानी जा सकती हैं| यद्यपि उनका लेखन काल 1412 से 1437 ई. है| भाषा की दृष्टि से गेसूदराज की रचनाएं प्रामाणिक मानी जा सकती हैं| 1450 ईसवी के पूर्व में भी कमोबेश मात्रा में रचनाएँ की हों पर उनका प्रामाणिक पाठ आज उपलब्ध नहीं है, अतः भाषा की दृष्टि से हिंदी के स्वरूप निर्धारण में उनसे कोई सहायता मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती | अमीर खुसरो की ब्रजभाषा छंद भी प्रामाणिक पाठ की दृष्टि से संदिग्ध हैं और उनकी संख्या भी अधिक नहीं है | संत नामदेव (1270 से 1350 ईसवी) और उनके समकालीन त्रिलोचन ने भी ब्रज भाषा में कुछ पद लिखे थे | परवर्ती काल में दामोदर पंडित की उक्ति व्यक्ति प्रकरण, मौलाना दाऊद की चंदायन और विद्यापति की मैथिल रचनाओं को ही प्रारंभिक हिंदी की प्रामाणिक रचनाएं स्वीकार किया जा सकता है।
इस काल की भाषा में व्याकरणिक स्थिरता आनी प्रारंभ हो गई थी। विद्यापति की रचनाओं में सरलता एवं सरसता और चंदायन अवधी का अच्छा उदाहरण है |इस प्रकार यद्यपि हिंदी के आरंभिक रूप की कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती तथापि सामान्य रूप से हम इसका काल विक्रमी की पंद्रह शताब्दी मान सकते हैं । इस दृष्टि से उपयुक्त हिंदी को हिंदी का आरंभिक रूप कहा जा सकता है पुरानी हिंदी और प्रारंभिक हिंदी को पर्याय नहीं माना जा सकता पर हिंदी के आरंभिक रूप में इन दोनों का सहज समावेश संभव है।

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