हिंदसा

सोमवार, 15 जून 2015

कहानी और उपन्यास में अंतर

  'उपन्यास और कहानी के अंतर'

कहानी और उपन्यास में सबसे बड़ा अंतर आकार का है।  उपन्यास जीवन की संपूर्ण वृत्ति को लेकर चलता है जबकि कहानी में आंशिक वृत्ति को ही चित्रित किया जाता है। उपन्यास में मानव जीवन की अनेक संवेदनाओं का वर्णन होता है और उनकी एक योजना होती है। जबकि कहानी में एक ही संवेदना छलकती है वह एक अंग की झांकी मात्र है। उपन्यासकार जीवन के नाना प्रकार के पक्षों से संबंधित व्यापक कथा सामग्री का चयन करता है, किंतु कहानीकार जीवन के किसी एक ही मार्मिक पहलू की प्रस्तुत करता है।  उपन्यासकार की भांति वह अपनी कथा को ना तो जटिल रूप दे सकता है और ना ही प्रासंगिक कथाओं में घुमा सकता है। कहानीकार सीधा एक ही कथा को लेकर लक्ष्य की ओर बढ़ता है। उपन्यासकार विभिन्न प्रासंगिक कथाओं से होता हुआ मुख्य कथा को मंथर गति से अंत की ओर ले जाता है। जबकि कहानीकार को यह छूट नहीं होती। उपन्यास में जहां कथा विकास के पांच सोपान होते हैं- आरंभ, विकास ,चरम सीमा ), निगति और अंत होते हैं, वहीं कहानी में केवल तीन तत्व ही मुख्य  रहते हैं। उपन्यास की तरह कहानी में निगति के लिए स्थान नहीं होता।

      कथावस्तु कहानी का अनिवार्य तत्व है। किंतु उपन्यास की भांति इस में कथा सूत्रों का विकास अनिवार्य नहीं है । अनेक आधुनिक चरित्र प्रधान कहानियों में कथावस्तु अत्यंत महत्वपूर्ण होती है जैसे प्रेमचंद की पूस की रात । 

        चरित्र चित्रण की दृष्टि से भी कहानी और उपन्यास में अंतर है। कहानी में पात्रों की संख्या कम होती है, प्रायः एक मुख्य पात्र और एक या दो अन्य पात्र होते हैं। उसमें उपन्यास की तरह अधिक पात्र नहीं होते। उपन्यास में पात्रों के चरित्र को विकसित होने का पूर्ण अवसर मिलता है, जबकि कहानी में पात्रों के चरित्र की रूपरेखा बनाने के लिए पाठकों को कल्पना का आश्रय लेना पड़ता है, कहानीकार उपन्यासकार के समान पात्रों का चरित्रविकास पूरे विस्तार से नहीं दिखा सकता, अपने पात्रों को सजीवता प्रदान करने के लिए उसे कला लाघव से काम लेना पड़ता है।

        उपन्यास में जीवन का सर्वांगीण चित्रण होता है , जबकि कहानी में जीवन के एक पक्ष की झलक या एक क्षण का घनीभूत जीवनदृश्य दिखाया जाता है, यदि उपन्यास जीवन का चक्र है तो कहानी किसी विशेष क्षण में चलते हुए चक्र का दिखावा है। कहानी में उपन्यास की सी अनेकरूपता नहीं होती, उसमें ना ही प्रासंगिक कथाएं होती हैं और ना ही वातावरण और देश काल की परिस्थितियों का विस्तार होता है।

         उपन्यास पढ़कर संपूर्ण जीवन चक्र का परिचय प्राप्त कर एक संतुष्टि का अनुभव होता है, परंतु कहानी एक प्रेरणा देती है, एक चेतना जगाती है, एक शंका उत्पन्न करती है तथा पाठक की जिज्ञासा वृत्ति को अतृप्त छोड़ देती है। देश काल और वातावरण के विस्तार की उपन्यास में अधिक संभावना होती है इसके विपरीत कहानी में इसके लिए कम अवकाश होता है। फिर भी अपनी संक्षिप्त परिधि में ही देश काल की स्पष्टता और   कार्य से परिस्थिति की अनुकूलता व्यंजित करने के लिए यह तत्व आवश्यक है। वातावरण प्रधान तथा ऐतिहासिक कहानियों में इस तत्व की विशेषता रहती है। 

         कहानी में उपन्यास की अपेक्षा भाव तीव्रता की प्रमुखता  होती है। उपन्यास में विस्तार होता है। कहानी एकाग्र दृष्टि को लेकर चलती है तो उपन्यास समग्र दृष्टि लेकर चलता है। उपन्यास में चरित्र का विकास होता है जबकि कहानी में चरित्र के किसी एक पक्ष या व्यक्तित्व की झलक दिखाई जाती है। कहानी में कथानक चरित्र -चित्रण और देशकाल -वातावरण तीनों तत्व होते हैं , किंतु इनमें से किसी एक को प्रधानता प्राप्त हो सकती है। उपन्यास में सभी तत्वों का विस्तीर्ण समावेश हो सकता है और उपन्यास की सफलता सभी तत्वों के यथोचित मिश्रण और प्रसार में है। कहानी एक ही बैठक में पढ़ी जाने वाली रचना होती है जबकि उपन्यास महीनों में समाप्त किया जा सकता है तथा कहानी का प्रभाव उसकी कथन शैली पर निर्भर होता है। कहानी की शैली अपनी संक्षिप्तता के कारण अधिक व्यंजनामयी होती है जबकि उपन्यास की शैली कम व्यंजनामयी में होती है।

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