हिंदसा

बुधवार, 24 जून 2015

सुख-दुःख

                                     सुख-दुःख

हमारे जीवन में सुख-दुःख आसमान में निरंतर आते-जाते रहने वाले बादलों की तरह होते हैं| एक तरह से देखा जाए तो सुख-दुःख  हमारी क्रियाओं की प्रतिक्रियाओं का नाम है|  जीवन में किसी कार्य के करने से हमें सुख मिल जाता है, तो किसी कार्य को करने से दुःख |  लेकिन जब हमें सुख मिलता है  तो हम उसका ज्यादा हिसाब-किताब नहीं लगाते और अगर लगाते भी हैं तो उसका पूरा श्रेय अपनी सूझ-बुझ को देते हैं या फिर अपनी अच्छी किस्मत को, और हाँ, अगर दुःख  मिलता है तो उसका पूरा हिसाब-किताब लगाया जाता है, उसके लिए कभी हम अपने-आप को दोषी नहीं ठहराते हैं|  कभी उस दुःख के पैदा होने का दोष  हम अपनी फूटी किस्मत को देते हैं या फिर हम अपने किसी निकटतम व्यक्ति को उस  दुख का कारण  मानते हैं, और अगर कोई भी  कारण न मिले तो  अंत में पूरा ठीकरा भगवान के सिर पर फोड़ देते है और हम कह देते हैं कि शायद भगवान को यही मंजूर था|...... ऐसा करना मनुष्य का स्वभाव है, यह सही भी है, क्योंकि शायद ऐसा करके ही व्यक्ति बड़ी से बड़ी मुसीबत को भी झेल जाता है|  लेकिन विज्ञान की माने तो प्रत्येक कार्य (सुख- दुःख) के पीछे कोई न कोई कारण (हमारा कर्म) होता है| अर्थात हमने कुछ न कुछ ऐसा अवश्य किया था जिससे वो सुख या दुःख पैदा हुआ| ये भी सत्य है कि सबके लिए सुख-दुःख की कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती | कोई मामूली से सिर-दर्द को ही दुःख मान कर अपने जीवन को दुखमय बना लेता है और कोई बड़े साहस से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जंग लड़कर अपने जीवन को सुखमय बना लेता है |कहने का तात्पर्य यह है कि कौन, किस छोटी-सी बात को, दुःख मान ले और कौन बड़ी बात को भी दुःख न मान, हंसी में टालकर तनावमुक्त हो जाये, कहा नहीं जा सकता| ये जीवन बहुत छोटा है इसलिए सकारात्मक सोच के साथ और सुख की कामना के साथ जीने की कोशिश कीजिये| वर्त्तमान में, आज में, बल्कि इसी एक पल में रहिये, जो मिला है, जैसा मिला है, उसी से संतुष्ट हो जाइये, धैर्य न खो कर अच्छे समय का इंतजार करना चाहिए| कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन को यदि हम नदी के बहाव की तरह समझ कर कुछ ज्यादा गुना-भाग किये बिना ही उसकी दिशा में चलते चले जाए तो जीवन सरल बन जाता है, वरना जीवन की डगर बड़ी कठिन है| 


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