भारतेंदु कालीन हिंदी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियां
भारतेंदु काल को आधुनिक काल का प्रवेश द्वार कहा गया है। रीति काल में हिंदी साहित्य अपनी जिस गरिमा को खो रहा था भारतेंदु युग में उस गरिमा को पुनः पाने की चेष्टा इस काल के कवियों ने की। यह काल विविधता से भरा हुआ है। इस काल में गद्य में ही साहित्य रचना की जाने लगी। नाटक, कहानी, निबंध और आलोचना का जैसा विकास किस काल में हुआ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। गद्य का आरंभ इस काल की महत्वपूर्ण घटना है। लेकिन कविता के क्षेत्र में भी एक नया मोड़ आया। उसमें भावनात्मक और कलात्मक परिवर्तन पर स्पष्ट दिखाई देता है। यहां से हिंदी काव्य का नया युग प्रारंभ हुआ। यद्यपि इस काल में रीतिकाल का भी प्रभाव भी देखा जा सकता है। लेकिन अपनी अन्य विशेषताओं के कारण यह काल रीतिकाल से बिल्कुल अलग था। इस काल के कवियों ने वासना प्रधान, श्रृंगार चित्रण को छोड़कर समाज सुधार , देश भक्ति और भारतीय संस्कृति के गौरव गान को अपने काव्य में प्रस्तुत किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र इस काल के प्रवर्तक माने जाते हैं। भारतेंदु के काव्य की विशेषताओं का अन्य कवियों ने भी अनुसरण किया। इस काव्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-
1. देश प्रेम की अभिव्यक्ति
भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के सर्वप्रथम राष्ट्रकवि कहा जा सकता है। उन्होंने अपने नाटकों और कविताओं के माध्यम से जनता को देश प्रेम का संदेश दिया । उनका यह देश प्रेम कहीं विदेशी शासकों के विरोध में प्रकट हुआ तो कहीं अपने काव्य के माध्यम से देशवासियों में देश प्रेम की भावना उत्पन्न करने का प्रयत्न किया। इस काल के कवि भारत की सभी जातियों और भावनाओं के प्रति उदार थे। कुछ आलोचकों ने भारतेंदु पर अंग्रेजों का प्रसंशक और राजभक्त होने का आरोप लगाया है। लेकिन भारतेंदु ने अंग्रेजों की वहीं तक प्रशंसा की है जहां उनकी अच्छी बातों को स्वीकार करना चाहिए। भारतेंदु जी ने अपनी कविताओं में अंग्रेजों की नीति की निंदा की है। उन्होंने 'मुकरियां' लिखकर अंग्रेजों की शोषण नीति के खिलाफ आवाज उठाई है।
भीतर- भीतर सब रस चूसै
हंसी हंसी के तन मन धन मूसै
जाहिर बातन में अति तेज
क्यों सखि! साजन नहीं अंग्रेज
अंग्रेजों की शोषण नीति के खिलाफ भारतेंदु की कविताओं में, नाटकों में अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं।
2. सामाजिक जागृति
भारतेंदु युग के कवियों ने समाज में जागृति उत्पन्न करने का बहुत प्रयास किया। इन कवियों की रचनाओं में स्त्री शिक्षा का महत्व वर्ग एवं वर्ण भेद का विरोध किया गया। सामाजिक बुराइयों जैसे अनमेल विवाह, बाल विवाह आदि के निषेध पर बल दिया है। 'भारत दुर्दशा' नाटक में भारतेंदु जी ने तत्कालीन समाज की गिरती हुई दशा और उसके सुधार पर प्रकाश डाला है। उदाहरण -
जाति अनेक न करि,
नीच अरु उच्च बनायो।
खान-पान संबंध सबन,सो
बरची छुडायो
3. श्रृंगार भावना
रीतिकाल की श्रंगार भावना भारतेंदु युग में भी दिखाई देती है। परंतु उसका स्वरूप बहुत अलग है। इनके प्रेम और श्रृंगार का आदर्श पहुंचा है। इनके प्रेम का यह आदर्श रसखान और घनानंद में देखने को मिलता है।
4. भक्ति भावना
भारतेंदु कालीन काव्य की एक विशेषता भक्ति भावना भी थी। इस काल के कवियों के सामने भक्ति युग का आदर्श था। भारतेंदु जी में सूरदास जैसी भक्ति भावना दिखाई देती है। भारतेंदु जी कृष्ण के भक्त थे। उन्होंने स्वयं को राधा-कृष्ण का अनन्य भक्त स्वीकार करते हुए कहा है - "मेरे तो साधन एक ही है, जय नंदलाला वृषभानु कुमारी"
5. प्रकृति चित्रण
भारतेंदु जी ने अपने काव्य में प्रकृति का सुंदर वर्णन किया है। उनका गंगा अवतरण, "यमुना वर्णन आदि में प्रकृति के मार्मिक और भावपूर्ण वर्णन उपलब्ध है। प्रेमघन और ठाकुर जगमोहन ने भी प्रकृति का सुंदर वर्णन किया है।
6. हास्य-व्यंग्य
भारतेंदु युग में शिष्ट हास्य भी मिलता है। उनका यह हास्य उद्देश्य पूर्ण है। बंदर सभा उर्दू का स्यापा नामक रचना में निम्न कोटि के नाटकों का मजाक उड़ाया गया है। इन की मुकरियों में व्यंग्य भाव बहुत सशक्त रूप में उभरा है। हास्य-व्यंग्य की प्रवृत्ति का पूर्ण विकास तत्कालीन नाटकों में उपलब्ध होता है। 7.भाषा प्रेम
भारतेंदु और उनके समकालीन कवियों ने अपनी भाषा में उन्नति और विकास के लिए बहुत प्रयत्न किया है। इन कवियों ने हिंदी में उच्च कोटि के साहित्य की रचना की है और उसे जनता में लोकप्रिय बनाने की चेष्टा भी की है। भारतेंदु का भाषा प्रेम इन पंक्तियों में प्रकट होता है-
" निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल"
भारतेंदु ने ब्रजभाषा के साथ साथ खड़ी बोली के लिए भी प्रयास किया। लेकिन काव्य रचना के लिए इस काल के कवियों ने ज्यादातर ब्रजभाषा का ही प्रयोग किया है।
8.जनसाधारण का काव्य-
भारतेंदु कालीन कवि रीतिकालीन कवियों के समान राजाश्रित नहीं थे, उन्होंने जो कुछ भी लिखा जनता के लिए लिखा और जनसाधारण की भाषा में लिखा। इसलिए हिंदी साहित्य में इस काल के कवियों का अपना विशिष्ट महत्व है। काव्य को राज दरबारों से निकालकर जनता के समक्ष प्रस्तुत कर लोकप्रिय बनाने का काम इन कवियों ने किया। इसलिए यह काव्य जनता में बहुत लोकप्रिय हुआ।
9. कला पक्ष
भारतेंदु कालीन कवियों की भाषा काव्य के लिए ब्रजभाषा थी। लेकिन इन कवियों ने गद्य के विकास के लिए भी बहुत योगदान दिया है और खड़ी बोली में गद्य की रचनाएं की है। इस काल के छंद कजरी, ठुमरी, लावणी आदि हैं। अलंकारों को भी इन्होंने सहज रूप में प्रस्तुत किया है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यह काल संक्रांति काल था, जिसमें भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल का मिलाजुला रूप देखा जा सकता है। उनकी कविताओं में प्राचीन और आधुनिक काव्य प्रवृत्तियों का समन्वय है। भक्ति, श्रृंगार, देश प्रेम, समाज सुधार, हास्य-व्यंग्य आदि इस काल की प्रमुख विशेषताएं थीं। इन कवियों ने जनता में अध्ययन करने या पढ़ने की इच्छा जागृत की। भारतेंदु के प्रयत्नों से अनेक लेखक तैयार हुए। उन कवियों ने भारतेंदु के आदर्श को अपनाया। इसलिए उनके काव्य में भी भारतेंदु के काव्य की प्रवृत्तियां दिखाई देती है। इस काल के साहित्यकारों का तथा साहित्य का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि इन्होंने जीवन और साहित्य में निकट का संबंध स्थापित किया। इसलिए भारतेंदु युग प्रवर्तक और जनजागृति के अग्रदूत के रूप में जाने जाते हैं
भारतेंदु काल को आधुनिक काल का प्रवेश द्वार कहा गया है। रीति काल में हिंदी साहित्य अपनी जिस गरिमा को खो रहा था भारतेंदु युग में उस गरिमा को पुनः पाने की चेष्टा इस काल के कवियों ने की। यह काल विविधता से भरा हुआ है। इस काल में गद्य में ही साहित्य रचना की जाने लगी। नाटक, कहानी, निबंध और आलोचना का जैसा विकास किस काल में हुआ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। गद्य का आरंभ इस काल की महत्वपूर्ण घटना है। लेकिन कविता के क्षेत्र में भी एक नया मोड़ आया। उसमें भावनात्मक और कलात्मक परिवर्तन पर स्पष्ट दिखाई देता है। यहां से हिंदी काव्य का नया युग प्रारंभ हुआ। यद्यपि इस काल में रीतिकाल का भी प्रभाव भी देखा जा सकता है। लेकिन अपनी अन्य विशेषताओं के कारण यह काल रीतिकाल से बिल्कुल अलग था। इस काल के कवियों ने वासना प्रधान, श्रृंगार चित्रण को छोड़कर समाज सुधार , देश भक्ति और भारतीय संस्कृति के गौरव गान को अपने काव्य में प्रस्तुत किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र इस काल के प्रवर्तक माने जाते हैं। भारतेंदु के काव्य की विशेषताओं का अन्य कवियों ने भी अनुसरण किया। इस काव्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-
1. देश प्रेम की अभिव्यक्ति
भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के सर्वप्रथम राष्ट्रकवि कहा जा सकता है। उन्होंने अपने नाटकों और कविताओं के माध्यम से जनता को देश प्रेम का संदेश दिया । उनका यह देश प्रेम कहीं विदेशी शासकों के विरोध में प्रकट हुआ तो कहीं अपने काव्य के माध्यम से देशवासियों में देश प्रेम की भावना उत्पन्न करने का प्रयत्न किया। इस काल के कवि भारत की सभी जातियों और भावनाओं के प्रति उदार थे। कुछ आलोचकों ने भारतेंदु पर अंग्रेजों का प्रसंशक और राजभक्त होने का आरोप लगाया है। लेकिन भारतेंदु ने अंग्रेजों की वहीं तक प्रशंसा की है जहां उनकी अच्छी बातों को स्वीकार करना चाहिए। भारतेंदु जी ने अपनी कविताओं में अंग्रेजों की नीति की निंदा की है। उन्होंने 'मुकरियां' लिखकर अंग्रेजों की शोषण नीति के खिलाफ आवाज उठाई है।
भीतर- भीतर सब रस चूसै
हंसी हंसी के तन मन धन मूसै
जाहिर बातन में अति तेज
क्यों सखि! साजन नहीं अंग्रेज
अंग्रेजों की शोषण नीति के खिलाफ भारतेंदु की कविताओं में, नाटकों में अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं।
2. सामाजिक जागृति
भारतेंदु युग के कवियों ने समाज में जागृति उत्पन्न करने का बहुत प्रयास किया। इन कवियों की रचनाओं में स्त्री शिक्षा का महत्व वर्ग एवं वर्ण भेद का विरोध किया गया। सामाजिक बुराइयों जैसे अनमेल विवाह, बाल विवाह आदि के निषेध पर बल दिया है। 'भारत दुर्दशा' नाटक में भारतेंदु जी ने तत्कालीन समाज की गिरती हुई दशा और उसके सुधार पर प्रकाश डाला है। उदाहरण -
जाति अनेक न करि,
नीच अरु उच्च बनायो।
खान-पान संबंध सबन,सो
बरची छुडायो
3. श्रृंगार भावना
रीतिकाल की श्रंगार भावना भारतेंदु युग में भी दिखाई देती है। परंतु उसका स्वरूप बहुत अलग है। इनके प्रेम और श्रृंगार का आदर्श पहुंचा है। इनके प्रेम का यह आदर्श रसखान और घनानंद में देखने को मिलता है।
4. भक्ति भावना
भारतेंदु कालीन काव्य की एक विशेषता भक्ति भावना भी थी। इस काल के कवियों के सामने भक्ति युग का आदर्श था। भारतेंदु जी में सूरदास जैसी भक्ति भावना दिखाई देती है। भारतेंदु जी कृष्ण के भक्त थे। उन्होंने स्वयं को राधा-कृष्ण का अनन्य भक्त स्वीकार करते हुए कहा है - "मेरे तो साधन एक ही है, जय नंदलाला वृषभानु कुमारी"
5. प्रकृति चित्रण
भारतेंदु जी ने अपने काव्य में प्रकृति का सुंदर वर्णन किया है। उनका गंगा अवतरण, "यमुना वर्णन आदि में प्रकृति के मार्मिक और भावपूर्ण वर्णन उपलब्ध है। प्रेमघन और ठाकुर जगमोहन ने भी प्रकृति का सुंदर वर्णन किया है।
6. हास्य-व्यंग्य
भारतेंदु युग में शिष्ट हास्य भी मिलता है। उनका यह हास्य उद्देश्य पूर्ण है। बंदर सभा उर्दू का स्यापा नामक रचना में निम्न कोटि के नाटकों का मजाक उड़ाया गया है। इन की मुकरियों में व्यंग्य भाव बहुत सशक्त रूप में उभरा है। हास्य-व्यंग्य की प्रवृत्ति का पूर्ण विकास तत्कालीन नाटकों में उपलब्ध होता है। 7.भाषा प्रेम
भारतेंदु और उनके समकालीन कवियों ने अपनी भाषा में उन्नति और विकास के लिए बहुत प्रयत्न किया है। इन कवियों ने हिंदी में उच्च कोटि के साहित्य की रचना की है और उसे जनता में लोकप्रिय बनाने की चेष्टा भी की है। भारतेंदु का भाषा प्रेम इन पंक्तियों में प्रकट होता है-
" निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल"
भारतेंदु ने ब्रजभाषा के साथ साथ खड़ी बोली के लिए भी प्रयास किया। लेकिन काव्य रचना के लिए इस काल के कवियों ने ज्यादातर ब्रजभाषा का ही प्रयोग किया है।
8.जनसाधारण का काव्य-
भारतेंदु कालीन कवि रीतिकालीन कवियों के समान राजाश्रित नहीं थे, उन्होंने जो कुछ भी लिखा जनता के लिए लिखा और जनसाधारण की भाषा में लिखा। इसलिए हिंदी साहित्य में इस काल के कवियों का अपना विशिष्ट महत्व है। काव्य को राज दरबारों से निकालकर जनता के समक्ष प्रस्तुत कर लोकप्रिय बनाने का काम इन कवियों ने किया। इसलिए यह काव्य जनता में बहुत लोकप्रिय हुआ।
9. कला पक्ष
भारतेंदु कालीन कवियों की भाषा काव्य के लिए ब्रजभाषा थी। लेकिन इन कवियों ने गद्य के विकास के लिए भी बहुत योगदान दिया है और खड़ी बोली में गद्य की रचनाएं की है। इस काल के छंद कजरी, ठुमरी, लावणी आदि हैं। अलंकारों को भी इन्होंने सहज रूप में प्रस्तुत किया है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यह काल संक्रांति काल था, जिसमें भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल का मिलाजुला रूप देखा जा सकता है। उनकी कविताओं में प्राचीन और आधुनिक काव्य प्रवृत्तियों का समन्वय है। भक्ति, श्रृंगार, देश प्रेम, समाज सुधार, हास्य-व्यंग्य आदि इस काल की प्रमुख विशेषताएं थीं। इन कवियों ने जनता में अध्ययन करने या पढ़ने की इच्छा जागृत की। भारतेंदु के प्रयत्नों से अनेक लेखक तैयार हुए। उन कवियों ने भारतेंदु के आदर्श को अपनाया। इसलिए उनके काव्य में भी भारतेंदु के काव्य की प्रवृत्तियां दिखाई देती है। इस काल के साहित्यकारों का तथा साहित्य का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि इन्होंने जीवन और साहित्य में निकट का संबंध स्थापित किया। इसलिए भारतेंदु युग प्रवर्तक और जनजागृति के अग्रदूत के रूप में जाने जाते हैं
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