हिंदसा

सोमवार, 9 सितंबर 2019

प्रगतिवाद


प्रगतिवाद

 राजनीति में जो विचारधारा साम्यवाद कहलाती है, दर्शनशास्त्र में वही विचारधारा द्वंद्वात्मक के नाम से जानी जाती है। इसके साथ ही साहित्य में उसे ही प्रगतिवाद कहा जाता है। प्रेमचंद के सभापति में  लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन हुआ था। यह अधिवेशन 1936 में हुआ था। उस अधिवेशन में प्रेमचंद जी ने साहित्य का लक्ष्य केवल मनोरंजन न  मानकर  समाज हित को साहित्य का लक्ष्य स्वीकार किया था। सन 1936 का अधिवेशन हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी क्योंकि यहीं से साहित्य में प्रगतिवाद का जन्म माना जाता है।
     छायावादी काव्य की व्यैक्तिवादता,  पलायनवादिता, निराशा की भावना तथा कल्पना लोक में कवि का विचरण छायावादी कविता की समाप्ति का कारण बन गई। उनकी व्यंजना, ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, तथा प्रतीकात्मकता के कारण छायावादी काव्य सामान्य जनता के लिए दुर्बोध था। इसलिए प्रगतिवाद का आरंभ हुआ।
        पंत, शिवमंगल सिंह 'सुमन', नरेंद्र शर्मा, नागार्जुन डॉ रामविलास शर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, केदारनाथ अग्रवाल, दिनकर आदि प्रगतिवाद के प्रमुख कवि माने जाते हैं। प्रगतिवादी काव्य की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-
शोषित वर्ग की दयनीय स्थिति का चित्रण-
प्रगतिवादी काव्य शोषित वर्ग पर केंद्रित है। इसमें शोषण से पीड़ित मजदूरों और किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण किया गया है। शोषक और शोषित वर्ग की विषमताओं का उद्घाटन किया गया है। दिनकर जी इस विषमताता प्रकट करते हुए कहते हैं-
 "श्वानों  को मिलता वस्त्र, दूध,
 भूखे बालक अकुलाते  हैं।
 मां की हड्डी से ठिठुर चिपक
 जाड़ों की रात बिताते हैं।"
शोषक वर्ग के प्रति घृणा
प्रगतिवादी कवि मानता है कि शोषक वर्ग स्वार्थी, निर्दयी तथा कपटी है। व्यापारी, उद्योगपति और जमीदार आदि उचित अनुचित तरीके अपनाकर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बनाए रखना चाहते हैं। परंतु प्रगतिवादी कवि का मानना है कि जब तक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का विनाश नहीं होता तब तक सामाजिक विषमता भी समाप्त नहीं हो सकती। अतः प्रगतिवादी कवियों में पूंजीपतियों के प्रति आक्रोश तथा घृणा का भाव है। पंत जी अपने इस आक्रोश को प्रकट करते हुए कहते हैं-
 "जन जीवन का दुरुपयोग है 
उनका जीना, अब न प्रयोजन इनका
अंतिम है इनके  क्षण"

 धर्म और ईश्वर का विरोध
 प्रगतिवादी कवि का मानना है कि उच्च वर्ग धर्म व ईश्वर का नाम लेकर शोषित पर अत्याचार करता है। शोषक वर्ग अपने भाग्य को ईश्वर का वरदान मान्यता है तथा शोषित वर्ग अपनी दीनता व सहायता को अपना भाग्य मान कर स्वीकार कर लेता है। प्रगतिवादी कवियों ने भाग्य का विरोध करते हुए कहा है कि "भाग्य व दुर्भाग्य ईश्वर का दिया हुआ नहीं है। मानव अपने हाथों से ही अपने भाग्य का निर्माता होता है।" अतः  कवि ईश्वर तथा धर्म में आस्था नहीं रखता , वह ईश्वर को सृष्टा नहीं मानता था। उसकी दृष्टि में मंदिर, मस्जिद, गीता तथा कुरान का मनुष्य के भाग्य से कोई संबंध नहीं है। अतः ये कवि अंधविश्वासी और मिथ्या परंपराओं तथा सामाजिक कुरीतियों पर तीव्र प्रहार  करता है।
 'विप्लव गायन कविता' में नवीन जी का आक्रोश इन पंक्तियों में प्रकट होता है -
"नियम और उपनियमों के ये बंधन,
 टुकटुक हो जाए,
 विश्वंभर की पोषक वीणा की तार मूक हो जाए।"
क्रांति की भावना
प्रगतिवादी कवियों ने शोषित तथा शोषक वर्ग में समानता उत्पन्न करने के लिए तथा प्राचीन रूढ़ियों और अंधविश्वासों को दूर करने के लिए अपने काव्य में क्रांति का आह्वान किया है। कवि जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों का विरोधी है। पन्त अपने काव्य में कोकिल को पावक कण बरसाकर संसार की बुराइयों को दूर करने के लिए आमंत्रित करते हुए कहते हैं-
" गा कोकिल बरसा पावक कण
 नष्ट भ्रष्ट हो जीर्ण पुरातन।"
 नारी संबंधी दृष्टिकोण
 प्रगतिवादी कवि ने नारी के स्थूल शारीरिक सौंदर्य का वर्णन किया है। कवि किसी रूपसी का चित्रण न करके कृषक वाला और मजदूर स्त्रियों का चित्रण करता है। प्रगतिवादी कवि प्रेम की स्वतंत्रता के पक्ष में है। नारी को मजदूर और किसान के समान ही शोषित और दलित मानकर उसकी मुक्ति तथा उसकी स्थिति में सुधार के लिए आवाज उठाता है। प्रगतिवादी कवि कहता है-
 "योनि नहीं है रे नारी! वह भी मानवी प्रतिष्ठित
 उसे पूर्ण स्वाधीन करो वह रहे न पर अवस्थित।"
 सामाजिक जीवन का यथार्थ चित्रण
 प्रगतिवादी कवियों ने यथार्थवाद का समर्थन किया है। वह कल्पना लोक में विश्वास नहीं करता  अध्यात्म में भी उसकी रुचि नहीं है। उसके विचार में दृश्य जगत ही सत्य है। पंत छायावादी कवियों का विरोध करते हुए कहते हैं-
 "ताक रहे हो गगन ? मृत्यु नीलिमा गहन गगन
 देखो  भू को जीव परसु को"
 मार्क्सवाद में आस्था
 प्रगतिवादी कवि मार्क्सवाद से बहुत प्रभावित हैं। मार्क्स के प्रति अपने विचारों को प्रकट करते हुए पंत जी ने मार्क्स को पुलन्यकर  शिव का तीसरा नेत्र बताया है। प्रगतिवादी कवियों के विचार में जिस प्रकार संसार में बुराइयों के बढ़ जाने पर  भगवान शिव अपना तीसरा नेत्र अशुभ, आशक्त और अशिव  को नष्ट कर देते हैं। उसी प्रकार मार्क्स के प्रभाव से समाज में मानवता का उद्धार हो सकता है। कवि कहता है-
"साम्यवाद के साथ स्वर्ण युग करता मधुर पदार्पण
 मुक्त निखिल मानवता करी मानव का अभिवादन"
भाषा शैली
प्रगतिवादी कवि भाषा में सरलता, स्पष्टता और सहजता को ही गुण मानता है। वह किसी भी प्रकार के आडंबर का विरोधी है। प्रगतिवादी साहित्य क्योंकि जनसाधारण का काव्य है अतः वह सीधी और सरल स्वाभाविक भाषा शैली को अपनाने के पक्ष में है। इनकी भाषा में अलंकारों का व्यर्थ का बोझ नहीं है। भाषा के विषय में प्रगतिवादी कवियों का विचार है-
 तुम वहन कर सको, जन-जन में मेरे विचार।
 वाणी मेरी चाहिए, तुम्हें क्या अलंकार।।
 छंद
प्रगतिवादी कवियों ने छंद के बंधन को कभी नहीं स्वीकारा। छंद युक्त काव्य का विरोध करते हुए पंत कहते हैं-
 "खुल गए छंद के बंद प्रातः के रजत पास नए उपमान प्रतीक आदि का प्रयोग प्रगतिवादी कवियों ने पुराने मानो उपनाम और प्रतीकों का प्रयोग किया है जिनका संबंध जनजीवन से है कोयले की खाल की मजदूरी नीसी रात वह ज्योति तिमिर का विश्रांत से अवतार प्रगतिवादी कवि का कला संबंधी दृष्टिकोण भाषा छंद अलंकार प्रतीकों तथा वर्णित भाव से स्पष्ट हो जाता है कि वे कला को जीवन के लिए मानते हैं ना की कला को कला के लिए प्रगतिवादी काव्य का हिंदी साहित्य में अपना एक विशेष स्थान है लेकिन इसमें कुछ त्रुटियां भी हैं यह कभी भौतिकता के पक्षधर है तथा इनमें नास्तिकता की भावना बहुत प्रबल है यह शोषित वर्ग का ही चित्रण करते हैं तथा सामाजिक समानता के लिए हिंसा को भी को ही एकमात्र रास्ता स्वीकार करते हैं यथार्थ के नाम पर इस साहित्य में नग्नता और अश्लीलता का चित्रण किया गया है प्रगतिवादी काव्य दृश्य की गहराइयों को छू नहीं पाता लेकिन सामाजिक विषमताओं को दूर करने का इन कवियों का प्रयास शहर सराहनीय है इन्होंने ही कल्पना लोक में खोए हुए कवि को धरातल पर लाने का प्रयास किया है

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