हिंदसा

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

हिंदी निबंध का विकास

                                                             हिंदी  निबंध का विकास

 निबंध विधा भी हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में ही  प्रकाश में आई| यह विधा साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विधा है इसमें लेखक किसी भी विषय पर खुलकर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होता है इसमें भावों की अभिव्यक्ति के साथ-साथ निबंधकार के स्वयं के व्यक्तिगत गुण भी प्रकाशित हो जाते हैं| निबंध शब्द अंग्रेजी के 'एस्से' शब्द का पर्याय है जिसका अर्थ होता है किसी भी विषय पर स्वतंत्र रूप से विचारों को सूत्र बद्ध तरीके से या संगठित तरीके से व्यक्त करना| 

हिंदी निबंध का प्रारंभ सन 1872 में माना गया है| गद्य विधाओं में यह विधा सबसे अधिक आधुनिकतम मानी गई है|

हिंदी में आधुनिक ढंग से साहित्यिक निबंध लिखने की परंपरा का आरंभ भी भारतेंदु युग से हुआ है | इससे पहले जो भी निबंध लिखे गए वह धर्म और नीति पर केवल विचार व्यक्त करने के रूप में हमारे सामने आते हैं| उनमें निबंध के तत्व कम मिलते हैं | जैसा कि हम सब जानते हैं भारतेंदु काल नवजागरण का काल था| यह काल भारतेंदु हरिश्चंद्र एवं उनकी मंडली के अन्य साहित्यकारों से बहुत प्रभावित था। इस समय ये सब साहित्यकार नई सांस्कृतिक और राजनैतिक चेतना पर लिख रहे थे| प्रेस की स्थापना के कारण भारतेंदु युग में अनेक हिंदी पत्र-पत्रिकाएं निकल रही थी | इस युग की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में भारतेंदु द्वारा प्रकाशित हरिश्चंद्र चंद्रिका, कवि वचन सुधा, बाला बोधिनी हैं| बालकृष्ण भट्ट के द्वारा हिंदी प्रदीप, प्रताप नारायण मिश्र के द्वारा ब्राह्मण आदि प्रमुख पत्र-पत्रिकाएं थी। ऐसी स्थिति में निबंध विधा तेजी से उभर कर आई। इन पत्र-पत्रिकाओं में जो विचार व्यक्त किए जाते थे उन्हें ही हिंदी निबंध का प्रारंभिक रूप कहा जा सकता है| भारतेंदु हरिश्चंद्र , प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', श्रीनिवास दास ,काशीनाथ खत्री आदि यह सब ऐसे साहित्यकार थे जो तत्कालीन समस्याओं का यथार्थ चित्रण निबंध विधा के माध्यम से कर रहे थे और इनके निबंध उस समय निकलने वाली पत्रिकाओं में लगातार छप रहे थे | इन निबंधकारों ने सामाजिक सुधार , राष्ट्रीय भावना का विकास, सांस्कृतिक चेतना , नारी शिक्षा संबंधी विषयों पर निबंध लिखें , इनके निबंधों में हमें समाज की तत्कालीन समस्याओं का प्रतिबिंब और लेखा-जोखा दिखाई देता है| इसके पीछे मूल कारण इस समय के निबंधकारों का पत्रकार होना भी था| यह सब पहले पत्रकार थे और बाद में निबंधकार थे इसलिए निबंध लिखते समय इन्होंने पाठकों की रूचि और तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखा | राष्ट्रीय समस्याएं इनके मस्तिष्क में हरदम ऐसे उग्र रूप में घुमती रहती थी कि प्रत्येक निबंध में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनका जिक्र आ ही जाता था | विदेशी अनुकरण तथा सामाजिक कुरीतियों पर भी निबंधकारों ने तीखा व्यंग्य किया है| यह भी सच है कि इस युग के लेखक अपने व्यक्तित्व को अधिक महत्व देते थे |

भारतेंदु इस युग के सर्वश्रेष्ठ निबंधकार माने गए हैं| उन्होंने विविध विषयों पर कुशलतापूर्वक निबंध लिख कर हिंदी निबंध के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनके निबंधों में निबंध कला की विभिन्न विशेषताएं देखी जा सकती है| इतिहास, समाज, धर्म, राजनीति यात्रा, प्रकृति वर्णन जैसे अनेक विषयों पर भारतेंदु ने निबंधों की रचना की। इनके प्रमुख निबंधों में स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन, लेवी प्राण लेवी, पांचवें पैगंबर, बादशाह दर्पण, काश्मीर कुसुम, सरयू पार की यात्रा आदि प्रमुख हैं। भारतेंदु ने अपने सामाजिक निबंधों में जहां समाज की कुरीतियों पर प्रहार किया वहीं दूसरी ओर राजनीतिक निबंधों में अंग्रेजी राज पर तीखे व्यंग्य किए। | इस समय पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने भी बहुत अच्छे और मनोरंजक निबंध लिखें जैसे- पेट, दांत ,नाक, वृद्धि आदि| इन्होंने अपने निबंधों में घरेलू बोलचाल की शब्दावली तथा पूर्वीपन के साथ ही कहावतें और मुहावरे का प्रयोग किया है |

बालकृष्ण भट्ट भी इस युग के प्रतिनिधि निबंधकार माने जाते हैं| वे एक ऐसे निबंधकार हैं जिन्होंने हिंदी की आत्मा को अच्छी तरह से पहचाना| भट्ट जी को संस्कृत बहुत अच्छी तरह आती थी इसलिए उनके निबंधों में संस्कृत भाषा का पुट मिलता है| वैसे इन्होंने अपने निबंधों में अंग्रेजी और फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया है और विषय की आवश्यकता के अनुसार आंचलिक शब्दों का प्रयोग भी हमें इनके निबंधों में मिलता है| इन्होंने 1000 से भी अधिक निबंधों की रचना की। इस युग के अन्य निबंध कारों में बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, ठाकुर जगमोहन सिंह, राधाचरण गोस्वामी और बालमुकुंद गुप्त का नाम भी आता है।

हिंदी निबंध के विकास का दूसरा चरण द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है| इस युग का नामकरण प्रसिद्ध आलोचक एवं युग प्रवर्तक निबंधकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर हुआ है| प्रसिद्ध पत्रिका सरस्वती के प्रकाशन से इस युग का आरंभ माना गया है| महावीर प्रसाद द्विवेदी कुशल संपादक के साथ-साथ श्रेष्ठ निबंधकार भी थे| भाषा तथा साहित्य का उच्च आदर्श प्रस्तुत करके उन्होंने समकालीन निबंध लेखकों का नेतृत्व किया| सबसे पहले उन्होंने भाषा की शुद्धि और परिष्कार पर बल दिया और शुद्ध व्याकरण सम्मत भाषा में निबंध लिखने के लिए लेखकों को प्रोत्साहित किया| द्विवेदी जी के प्रसिद्ध निबंधों में कवि और कविता, कवि कर्तव्य ,साहित्य की महत्ता आदि प्रमुख है| इसी समय अध्यापक पूर्ण सिंह भी प्रभावशाली निबंधकार माने जाते हैं | उनके निबंधों में आचरण की सभ्यता, मजदूरी और प्रेम, सच्ची वीरता , कन्यादान आदि निबंध है | उनकी भाषा में प्रभाव के साथ-साथ एक खास अंदाज है जिससे भाव व्यंजना निराले ढंग से व्यक्त की गई है| इसके साथ ही इनकी भाषा में सहज प्रवाह और मृदुलता का अनुभव पाठक को होता है ,जिससे पाठक निबंध में तल्लीन हो जाते हैं |

बाबू श्यामसुंदर दास जी द्विवेदी युग के श्रेष्ठ निबंध कारों में से एक है| यह निबंधकार होने के साथ-साथ विख्यात आलोचक भी थे | इसलिए इनके निबंधों में आलोचनात्मकता का गुण भी पाया जाता है, लेकिन उस रूप में नहीं हुआ जिस रूप में होना चाहिए था | महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खुद भी निबंध लिखे थे और बालमुकुंद गुप्त ,सरदार पूर्ण सिंह ने भी रोचक और जीवंत निबंध लिखें | सरदार पूर्ण सिंह ने नैतिक और सामाजिक विषयों पर भावपूर्ण निबंध लिखें | कोहिनूर, भारत मित्र ,पत्रों के माध्यम से उन्होंने व्यंग्यात्मक , हास परिहास शैली के निबंधों की झड़ी लगा दी | बालमुकुंद गुप्त ने शिवशंभू के चिट्ठे संग्रह निबंध साहित्य में अपना उच्च कोटि का स्थान रखता है| लेकिन जिस तेजी से भारतेंदु युग में इस विधा की शुरुआत हुई थी उस तेजी से द्विवेदी युग में इसका विकास हमें देखने को नहीं मिलता|

  निबंध  के इतिहास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का योगदान भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है| उन्होंने निबंध विधा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया| भारतीय और पाश्चात्य शैली का समन्वय करते हुए उन्होंने अनेक विचारात्मक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक निबंध लिखें| उनके समकालीन निबंध कारों में बाबू गुलाब राय, जैनेंद्र ,रामवृक्ष बेनीपुरी, बनारसीदास चतुर्वेदी, डॉ नगेंद्र आदि का नाम आता है | शुक्ल गंभीर, विचारवान और विनोदप्रिय स्वभाव के व्यक्ति थे, वे उच्च कोटि के निबंधकार थे| उनके निबंधों में मौलिकता, नवीनता और गंभीर चिंतन तथा हास परिहास के दर्शन होते हैं | उनके अधिकतर निबंध विचारप्रधान है| चिंतामणि भाग- 1,2,3 उनके निबंध संग्रह है| इसके साथ-साथ उन्होंने साहित्यिक समीक्षा संबंधी निबंध भी लिखे और मनोविकार संबंधी निबंध भी | साहित्य समीक्षा संबंधी निबंधों में तुलसी का भक्ति मार्ग, काव्य में रहस्यवाद, काव्य में लोकमंगल की साधना अवस्था, मानस की धर्म भूमि आदि प्रमुख है| मनोविज्ञान और मनोविकार संबंधी निबंधों में उत्साह, लज्जा और ग्लानि, श्रद्धा और भक्ति, क्रोध, करुणा आदि निबंध प्रमुख हैं|

बाबू गुलाब राय भी इस युग के महत्वपूर्ण निबंधकार है | उन्होंने दार्शनिक, साहित्यिक ,विनोदात्मक निबंधों की रचना की| मेरी असफलताएं ,फिर निराशा क्यों , उनके प्रमुख निबंध हैं | इस काल में प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी वर्मा आदि रचनाकारों ने भी निबंध के विकास में योगदान दिया हैं | जयशंकर प्रसाद ने 'काव्य कला तथा अन्य निबंध' संग्रह में महत्वपूर्ण विषयों को आधार बनाकर निबंध लिखें | इसी तरह से सुमित्रानंदन पंत का निबंध 'पल्लव की भूमिका' निबंध लेखन के क्षेत्र में अपना योगदान दिया|

शुक्ल के बाद वाले युग में भी निबंध लिखे गए| इन निबंधकारों में जयशंकर प्रसाद ,सुमित्रानंदन पंत, निराला, माखनलाल चतुर्वेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामकुमार वर्मा आदि का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है| हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध उच्च कोटि के निबंध माने गए हैं | इनके प्रकाशित निबंधों में अशोक के फूल, कुटज ,विचार और वितर्क, आम बोरा गए आदि प्रमुख हैं |समकालीन युवा निबंधकारों में प्रभाकर श्रोत्रिय, चंद्रकांत, नंदकिशोर, प्रकाश चंद्र गुप्त जैसे निबंधकार हैं जिन्होंने सांस्कृतिक और सामाजिक विषय पर निबंध लिखें और वर्तमान समय में भी निबंध लेखन की परंपरा निरंतर जारी है|

        


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